गैर सरकारी संगठन के Means Need तथा प्रकार्य

भारत Single लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहाँ जनता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन चलाया जाता है। भारत की स्वाधीनता के साथ ही देश के नए भाग्य विधाताओं ने ‘‘कल्याणकारी राज्य’’ की कल्पना को मूर्त रुप प्रदान करने के लिए राज्य और केन्द्र की सरकारों का स्वरुप निर्धारित Reseller था। इन सरकारों के अन्र्तगत जन विकास और कल्याण के लिए अनेक विभाग निर्मित हुए। विभागों के संचालन के लिए बड़े नौकरशाह, अफसर और दीगर कर्मचारियों की फौज नियुक्त की गयी। सरकारी व्यवस्था का जो स्वरुप आज हमें दिखार्इ देता है, उसका आधार और बनावट का अधिकांश रुप अंग्रेजो से ‘‘जैसा-का-तैसा’’ ले लिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है हमारी शासन व्यवस्था Single अजीब किस्म के द्वैत में काम करने के लिए अभिषप्त हो गयी। जिस नौकरशाही को गरीबों, पीड़ितों और वंचितों के प्रति जवाबदेह बनकर उनके विकास व कल्याण के लिए कार्य करने का जिम्मा सांपै ा गया है, वही नौकरशाही, गरीबों, पीडितों और वंचितों पर शासन करने की मानसिकता से प्रेरित है। वे उनके प्रति ‘स्वामी-भाव’ रखने की अश्लील हरकतें करते दिखार्इ देते है। उनके कार्यकाल राजमहल बन गए है जहाँ आला-अफसरों की महिला-मंडित जीवन शैली लोकतंत्र का वीभत्स-रस बनकर बहती रहती है। गैर सरकारी संगठनों की Need तब और बढ़ गयी जब सरकारी विभागों का स्वरुप कुछ निम्नलिखित प्रकार में बदल गया :-

  1. सरकारी विभाग Single तरह की सरकारी संस्कृति की गिरफ्त में आ गए है। 
  2. परिभाषा ‘‘जनसेवक’’ मानने के बजाय ‘‘King वर्ग’’ मानी जाने लगी है।
  3. पूर्ण कार्यकाल की आकर्षण पूर्ण कैद में रहने का इतना आनंद आता है कि वास्ताविक समस्याओं से कोर्इ सरोकार नही रहा।
  4. कार्यशैली का स्वरुप जनता से दूर ले जाता है। 
  5. विकास की समग्रता और निरंतरता से सरोकार रखने की अपेक्षा वे उसके उतने ही अंश से रिश्ता रखते हैं, जितना कि उनकी सेवा से Added हो। 
  6. मशीनी जीवन के मातहत कार्य करते हैं। 

गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ) [ अन्र्तगत ऐसे समूह व संस्थान आते हैं जो पूर्ण रुप से या अधिकांश रुप से गैर-सरकारी होते हैं। इनका उद्देश्य व्यवसायिक न होकर मुख्यत: Human मात्र के कल्याण और सहकारी तौर पर काम करना होता है। औद्योगिक देशों में ये पा्र इवेट एजेंसियां होती हैं ये (एजेसियां) संगठन अंर्तराष्ट्रीय विकास के लिए सहायता प्रदान करती हैं। यह सहायता प्रादेशिक स्तर पर या राष्ट्रीय स्तर पर गठित देशीय (ग्रुपों) समूहों और गांवों के सदस्य समूहों को भी प्रदान की जाती है। गैर सरकारी संगठनों के अंतर्ग त ऐसी परोपकारी और धार्मिक संस्थाएं समाविष्ट होती हैं जो विकास कार्यों, खाद्य सामाग्री के वितरण और परिवार नियोजन सेवाओं के विभिन्न और सामुदायिक संगठनों को प्रोत्साहन देने के लिए (गैरसरकारी) निजी तौर पर फंड (पैसे) Singleत्रित करती है। इनके अन्र्तगत स्वतंत्र समितियां, सामुदायिक संस्थाएं, पानी का प्रयोग करने वाली सोसाइटियां (समाजिक समूह), महिला समूह तथा अन्य समूह भी आते हैं। संक्षेप में जो समूह नागरिकों में जागरुकता पैदा करते हैं और प्रभावकारी नीतियां अपनाते है। वे ही गैर सरकारी संगठन कहलाते हैं।

  1. गैर सरकारी संगठन लाभ अर्जित न करने वाला स्वयंसेवी, सेवा भाव वाला/विकास प्रवृत्ति वाला Single ऐसा संगठन है, जो अपने संगठन के मूल सदस्यों या जन समुदाय के अन्य सदस्यों के हितों के लिए काम करता है। 
  2. यह निजी व्यक्तियों द्वारा बनाया गया Single ऐसा संगठन है जो कुछ मूलभूत सामाजिक सिद्धान्तों पर विश्वास करता है, और अपनी गतिविधियों का गठन समुदाय के Single ऐसे वर्ग के विकास के लिए करता है जिसको वह अपनी सेवाएं प्रदान करना चाहता है। 
  3. यह Single समाज विकास प्रेरित संगठन है जो समाज को सशक्त और समर्थ बनाने में सहयोग देता है।
  4. यह Single ऐसा संगठन या जनता का Single ऐसा समूह है, जो स्वतंत्र रुप से कार्य करता है और इस पर किसी तरह का कोर्इ बाहरी नियंत्रण नहीं होता। प्रत्येक (एन.जी.ओ.) गैर सरकारी संगठन के अपने कुछ खास उद्देश्य और लक्ष्य होते हैं, जिनके आधार पर वे किसी समुदाय, इलाके या परिस्थिति विशेष में उपयुक्त बदलाव लाने के लिए अपने निर्दिश्ट कार्यो को पूरा करते हैं। 
  5. यह स्वतंत्र लोकतांत्रिक और गैर-सम्प्रदायिक व्यक्तियों का Single ऐसा संगठन है जो आर्थिक और सामाजिक स्तर से नीचे के स्तर के लोगों के समूहों को सशक्त-समर्थ बनाने का काम करता है। 
  6. यह Single ऐसा संगठन है जो किसी भी राजनीतिक समूह से Added नहीं होता और आम तौर पर जनसमुदाय को मदद देने, उनके विकास और कल्याण के कार्यो में Added रहता है। 
  7. यह Single ऐसा संगठन है जो जन समुदाय द्वारा बनाए जाते हैं या जन समुदाय के लिए बनाए जाते हैं, और जिनमें सरकार का कोर्इ हस्तक्षेप नहीं होता या बहुत ही कम होता है। ये धर्मार्थ संगठन ही नहीं होते बल्कि, ये सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का भी आयोजन करते हैं। गैर सरकारी संगठनों को निम्नलिखित नामों से भी जाना जाता है, 
    • स्वयं सेवी संगठन (VOs)
    • स्वयं सेवी एजेन्सियां (VAs)
    • स्वयं सेवी विकास संगठन  (VDOs)
    • गैर सरकारी विकास संगठन  (NGDOs)

 गैर सरकारी संगठनों तथा स्वयं सेवी संगठनों में कुछ अन्तर भी पाए जाते है जो निम्नलिखित हैं :-
अन्तर

गैर सरकारी संगठन (NGO) स्वयं सेवी संगठन (VO)
1.  मानदेय/पारिश्रमिक सहित कार्य करता है किसी मानदेय की आशा नहीं करता।
2.  मन के अनुरुप कायांर् े का सुनिश्चित किन्तु अवधि, आरंभ, समापन सम्बन्धी नियंत्रण वित्त प्रदाता संस्था मन के अनुरुप कार्यों का चुनाव किन्तु अवधि, आरंभ, समापन सम्बंधी स्वनियंत्रण का
3.  निश्चित संविधान, पंजीयन, पदाधिकारी और कार्य पद्धति अनिवार्यता नहीं।
4.  नियमित कार्यकाल And कार्यावधि होती है Need नहीं।
5.  चाहे तो स्वयंसेवी संगठन की तरह पारिश्रमिकविहीन कार्य भी कर सकता है। चाहे तो गैर सरकारी संगठन की तरह कार्य कर सकता है। शर्ते पूरी करनी होगी’-ऐच्छिक रुपेण।
6.  दस्तावेजों का संधारण करने की अनिवार्यता होती है।

वस्तुत: संक्षेप में गैर सरकारी संगठन को हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं :- 

  1. वयस्क व्यक्तियों का ऐसा संगठन, जो स्वतंत्र रुप से गठित Reseller गया हो। 
  2. संगठन की वैधानिकता कानूनों और सरकार की नीतियों के परिप्रेक्ष्य में प्रामाणित हो।
  3. शासन के किसी विभाग के व्यक्तियों की सेवा के अन्र्तगत किए जाने वाले कार्यो के क्रियान्वयन हेतु उसे गठित न Reseller गया हो।
  4. प्रजातांत्रिक मूल्यों व पद्धतियों पर विश्वास अभिव्यक्त होता हो। 

Need को जन्म देने में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि सरकार चलाते हुए, नौकरशाहों को यह सिखाने में असफल ही रहे हैं कि उनका कत्तर्व् य भारत के बहुसंख्यक समाज का जिसमें गरीब, शोशित, पीड़ित और पिछड़ो की तादाद भरी पड़ी है, कल्याण करना और उन्हें मुसीबतों के दुश्चक्र से निजात दिलाना ही है। उलटे नौकरशाहों और बाजारीकरण की नयी दवा ने सरकारों को जल्दी से जल्दी कल्याणकारी मानसिकता से अपना पिंड छुड़ा लेना चाहिए। सरकारों ने इसमें इतना आकर्शण देखा कि उन्होंने इस पर अमल करने में जरा भी देर नहीं लगार्इ। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक-विकास के क्षेत्रों में इसके दुष्परिणामों की झलक भी दिखार्इ देने लगी है। सरकारी कार्यालयों के अधिकारी और कर्मचारी Single ऐसी ‘‘सरकारी संस्कृति’’ में ढल गए हैं, जो उन्हें आम-नागरिकों से अलगांव रखने के लिए दुश्प्रेरित करती है। उनके कक्ष के बाहर पीड़ित आरै फरियादी लोगों की भीड़ लगी रहती है और वे अंदर बेहद इत्मीनान से फाइलों पर या तो झुके रहते हैं या फोन पर बातें करते हैं, कोइर् जरुरतमंद पहंचु जाए तो उसकी सनु वार्इ नहीं होती और उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। अत्एव जन संस्कृति के ज्ञान के लिए पिछड़ों के लिए, गरीबों, किसानों, महिलाओं, बच्चों, शहरी मलिन-बस्तियों तथा पहाड़ी और घुमंतु जातियों का अनौपचारिक अध्ययन गैरसरकारी संगठनों के लिए अनिवार्य हो जाता है और यही इन संगठनों की Need की जननी भी मानी जा सकती है। 

गैर सरकारी संगठनों की अवधारणा को वास्तविक रुप से Single उदाहरण समझा सकता है जो कि निम्नलिखित है :-इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो व्याकुल भी हैं और बेचैन भी है, क्योंकि वो बनी बनायी जीवन शैली और बंधी -बंधायी जिन्दगी से Agree नहीं होते। उनके लिए व्याकुलता ही ऐसे लोगों की पूंजी होती है, वही दुनिया को बदल डालने का करगर औजार भी होती है। और इसी के दम पर समाज का बिगड़ा स्वरुप बदलता है। तभी शेष समाज को हैरानगी होती है और वह कुछ कुछ अवाक हो जाता है कि अरे हमने First ऐसा क्यूं नहीं सोचा ? 

अत: मूल रुप में गैर सरकारी संगठन की ‘अवधारणा’ के अन्र्तगत हम इसे Single ऐसी संस्था के रुप में परिकल्पित करते हैं, जिसकी संCreation कुछ व्यक्तियों ने मिलकर या व्यक्तियों की Single समिति ने मिलकर की हो। इसका Single निश्चित नाम तथा उद्देश्य होता है। यह संगठन पंजीकृत भी हो सकता है, और नहीं भी। परन्तु जब यह संगठन कोर्इ लोकोपकारी या अन्य सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बाहर से वित्तीय सहायता प्राप्त करना चाहता है तो धन मुहैया कराने वाली एजेंसियां (अन्तर्राश्ट्रीय तथा राष्ट्रीय) चाहती है कि वो Single वैध संगठन को ही दान स्वरुप धन दें तथा वह वैधता की कसौटी पर खरी उतरें। और यह वैधता हर संगठन के लिए आवश्यक होती है और यह स्वरुप तभी प्राप्त होता है जब व्यक्तियों के समूह को किसी लागू कानून के अन्र्तगत पंजीकृत करा दिया गया हो। कानून जो कि किसी भी संगठन हेतु आवश्यक है वो इस प्रकार है:- 

  1. Single धमार्थ ट्रस्ट के रुप में; 
  2. सोसार्इटी पंजीकरण अधिनियम के तहत Single सोसाइटी के रुप में, 
  3. कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अन्र्तगत Single लार्इसेंस प्राप्त कम्पनी के रुप में पंजीकृत हो। 

    गैर सरकारी संगठन के प्रकार्य 

    सरकार ने अपनी राज्य नीति के निर्देशित सिद्धांतों के तहत राज्य को कल्याणकारी राज्य का दर्जा दिया है। अत: निश्चित रुप से सोसाइटी और सामाजिक संगठनों के लिए यह आवश्यक हो जाता है, कि वे भी अनाथ, दलित और कमजोर वर्गो (महिला और बच्चों) की समस्याओं को हल करने के लिए उनकी मूलभूत Needओं और सुविधाओं को प्रदान करने के लिए अपनी विशेष भूमिका निभाएं। सरकार ने नागरिकों के जीवन स्तर और उनकी Needओं को ध्यान में रखते हुए, कुछ योजनाएं निर्धारित की है जिनमें (एन.जी.ओ) गैर सरकारी संगठन और स्वयं सेवी संगठन अपना योगदान दे सकते हैं। इनका विस्तृत History नीचे Reseller है :- 

    1. वृद्धों का संरक्षण 
    2. कृषि 
    3. पशुकल्याण 
    4. कला व दस्तकारी 
    5. शिशु कल्याण 
    6. शहर और नगर 
    7. संस्कृति और धरोहर 
    8. विकलांगता 
    9.  शिक्षा 
    10. पर्यावरण 
    11. स्वास्थ्य 
    12. Human संसाधन 
    13. ग्रामीण विकास 
    14. जनजातीय लोग 
    15. कूडे़ -कर्कट का नियंत्रण 
    16. महिला विकास 
    17. अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां और भी कर्इ अन्य क्षेत्र ऐसे हैं जो कि एन.जी.ओ को कार्यों के तहत आते हैं। वस्तुत: समाज के कल्याण हेतु हर Single क्षेत्र ही गैरसरकारी संगठनों के कार्यो व उद्देश्यों के तहत आते हैं। मुख्य रुप से निम्न कार्यो को गैरसरकारी संगठनों के प्रकार्यो के रुप में अपेक्षा की जाती है, – 

    गैरसरकारी संगठन:- 

    1. जन-संस्कृति के साथ तालमेल को तत्पर रहते हैं। 
    2. खदु को जनता का हिस्सा मानते हैं व जन-मनोविज्ञान को समझने की चेश्टा करते हैं। 
    3. अपने कार्यकाल से उनका उतना ही सरोकार होता है, जितना रिकार्ड – रजिस्टर आदि के संधारण के लिए आवश्यक होता है। 
    4. वे किसी कार्यविधि के अधीन नहीं होते। 
    5. विकास की समग्रता व निरंतरता ही उनका सबसे बड़ा मुद्दा होता है।
    6. मशीनी-प्रक्रिया और लक्ष्य पर आधारित कार्य उनके लिये अस्प्रष्य होते हैं। 
    7. उनके मन में सामाजिक मूल्य तथा विशेष अवधारणाएं होती है। इन्ही की स्थापनाओं के लिए वे कार्य करते हैं। 
    8. वे उन्ही परियोजनाओं का चुनाव करते हैं जो उनके मूल उद्देश्यों और अवधारणाओं के अनुकूल हों। 
    9. अपने कार्यों में लोकतांत्रिक पद्धति तो अपनाते ही हैं, संगठन में उसे वरीयता देते हैं। 
    10. सामूहिक Discussionओं और विचार-विमर्ष से निश्पादित निर्णयों को ही अंगीकृत करते हैं।
    11.  पारदर्षिता और सुचिता उनकी कसौटी होते हैं। 
    12. वे लोकप्रियता की बजाय जन आस्था से भरपूर होते हैं। 
    13. वे राष्ट्रीय नीतियों और अंतरराष्ट्रीय रुझानों को भी ध्यान में रखते हैं। 
    14. नैसर्गिक न्याय समतामूलक समाज के निर्माण में आस्था रखते हैं। 
    15. धर्म, लिंग जातिगत भेदभाव से दूर होते हैं।
    16. जन अधिकारों के प्रति सजग रहना उनका प्रकार्य व दायित्व होता है। 
    17. अपने ज्ञान व कोषल को सदैव परिभाशित करते रहते हैं। 
    18. सतत् अध्ययन और सहचिंतन जीवन का अभिन्न अंग होता है। 

    इन All प्रकार्यों के साथ कुछ अनकहे व अनजाने कार्य भी Needओं पर निर्भर हो कर गैर सरकारी संगठनों के प्रकायोर्ं में शामिल हो जाते है। और असल में Needएं ही गैर सरकारी संगठन के प्रकार्यो की जननी है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण निम्नलिखित है: 

    ‘तरुण भारत संघ’ Single ऐसी ही संस्था है, जिसके जन्मदाता ‘राजेन्द्र सिंह’ है। उन्होंने राजस्थान के गांवों में पानी के संकट से ग्रस्त ग्रामीणों को राहत पहुँचाने और पानी की प्रबंधन व्यवस्था कराने का जिम्मा लिया और पूरा Reseller। शुरु में उन्हें लोगों के अविश्वास, असहयोग का सामना करना पड़ा। तरुण भारत संघ जैसी स्वयंसेवी संस्था ने यहाँ (राजस्थान) में ‘‘जोहड़’’ जैसी जल संचय परंपरा को ही पुनजीर्वित Reseller और मरुभूमि की तकदीर बदल दी। ‘जोहड़’ को इस तरह से समझा जा सकता है, कि वह वर्षा के जल को Singleत्र करनेवाला ऐसा बांध है, जहां वर्षा के पश्चात इसी भूमि पर खेती की जाती है। 

    इस संस्था के संचालक ने बिना सरकारी मदद लिए (शुरु में) यह कार्य आरम्भ Reseller और सफलता पूर्वक सम्पन्न Reseller। राजेन्द्र सिंह के Wordों में ‘‘अलवर जिले ने 1985 और 1986 में सूखे की मुश्किल मार झेली। औरतों को पीने का पानी लाने के लिए 2 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था और ‘कुओं’’’ के पानी की राशनिंग थी। लोग कुपोषण का शिकार बने और बड़ी संख्या में जानवर मरे। पारंपरिक रुप से यहां के लोग सिचांर्इ का पानी जमा करने के लिए जोहड़ों का निर्माण करते थे, लेकिन आधुनिक और सामुदायिक कामों में भागीदारी कम होने के चलते इस प्रणाली का चलन कम हो गया। मुश्किलों के बाद कुछ गांव के परिवार तरुण भारत संघ के विचार से जुड़ने को तैयार हो ही गए, और बिना किसी बाहरी सुविधा तथा सहायता के (तकनीकि सहायता बगैर) साढ़े चार मीटर लंबे तीन बांध बना डालें। बरSeven आयी, पानी बरसा और जोहड़ों ने वर्षा जल को रोक लिया। इससे भूमिगत जल का स्तर बढ़ गया, कुओं में पानी थमा और खेती के लिए नमी मिली। नालों को बंद करने से उपजाऊ मिÍी का बहकर जाना भी ठहर गया। इस आंखों देखे चमत्कार ने लोगों को मोह लिया उन्हें अपनी तकदीर की कंजु ी मिलगयी। यह कुंजी राजेन्द्र सिंह जैसे ‘‘जल पुरोधा’’ आरै तरुण भारत संघ ने उन्हें खोज कर दी थी, जो कि श्ुारु से उनके पास थी, परन्तु दिशा दिखाने वाला कोर्इ न था, कह सकते हैं ‘‘मोको कहाँ ढूढे बंदे, मै तो मेरे पास में’’। इस उदाहरण से गैर सरकारी संगठनों के प्रकार्यों की व्याख्या उनके समाज हेतु हितोपकारी उद्देश्यों को देखते हुए की जा सकती है।

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