भाषा किसे कहते हैं, भाषा की परिभाषा, भेद और माध्यम

‘भाषा’ Word भाष् धातु से निष्पन्न हुआ है। शास्त्रों में कहा गया है- ‘‘भाष्
व्यक्तायां वाचि’’ Meansात् व्यक्त वाणी ही भाषा है। भाषा स्पष्ट और पूर्ण
अभिव्यक्ति प्रकट करती है।

भाषा का History उतना ही पुराना है जितना पुराना Human का
History। भाषा के लिए सामान्यत: यह कहा जाता है कि- ‘भाषा मनुष्य के
विचार-विनिमय और भावों की अभिव्यक्ति का साधन है।’ भाषा की परिभाषा
पर विचार करते समय रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव की यह बात ध्यान देने योग्य है
कि- ‘भाषा केवल अपनी प्रकृति में ही अत्यन्त जटिल और बहुस्तरीय नहीं है
वरन् अपने प्रयोजन में भी बहुमुखी है।’ उदाहरण के लिए अगर भाषा व्यक्ति
के निजी अनुभवों And विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है; तब इसके साथ
ही वह सामाजिक सम्बन्धों की अभिव्यक्ति का उपकरण भी है, Single ओर अगर
वह हमारे मानसिक व्यापार(चिन्तन प्रक्रिया) का आधार है तो दूसरी तरफ वह
हमारे सामाजिक व्यापार(संप्रेषण प्रक्रिया) का साधन भी है। इसी प्रकार संCreation
के स्तर पर जहाँ भाषा अपनी विभिन्न इकाइयों में सम्बन्ध स्थापित कर अपना
संश्लिष्ट Reseller ग्रहण करती है जिनमें वह प्रयुक्त होती है। प्रयोजन की विविधता
ही भाषा को विभिन्न सन्दर्भों मे देखने के लिए बाध्य करती है। यही कारण है
कि विभिन्न विद्वानों ने इसे विभिन्न Resellerों में देखने और परिभाषित करने का
प्रयत्न Reseller है –

भाषा की परिभाषा

  1. डॉ. कामता प्रसाद गुरु :
    ‘भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों तक
    भलीभाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्टतया समझ
    सकता है।’
  2. आचार्य किशोरीदास :
    ‘विभिन्न Meansों में संकेतित Wordसमूह ही भाषा है, जिसके द्वारा हम अपने
    विचार या मनोभाव दूसरों के प्रति बहुत सरलता से प्रकट करते हैं।’’
  3. डॉ. श्यामसुन्दर दास :
    ‘मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति
    का आदान-प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि-संकेतों का जो व्यवहार होता है
    उसे भाषा कहते हैं।’
  4. डॉ. बाबूराम सक्सेना :
    ‘जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है,
    उनको समष्टि Reseller से भाषा कहते हैं।’
  5. डॉ. भोलानाथ :
    ‘भाषा उच्चारणावयवों से उच्चरित यादृच्छिक(arbitrary) ध्वनि-प्रतीकों
    की वह संचरनात्मक व्यवस्था है, जिसके द्वारा Single समाज-विशेष के लोग
    आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं ।’
  6. रवीन्द्रनाथ :
    ‘भाषा वागेन्द्रिय द्वारा नि:स्तृत उन ध्वनि प्रतीकों की संCreationत्मक
    व्यवस्था है जो अपनी मूल प्रकृति में यादृच्छिक And रूढ़िपरक होते हैं और
    जिनके द्वारा किसी भाषा-समुदाय के व्यक्ति अपने अनुभवों को व्यक्त करते हैं,
    अपने विचारों को संप्रेषित करते हैं और अपनी सामाजिक अस्मिता, पद तथा
    अंतर्वैयक्तिक सम्बन्धों को सूचित करते हैं।’
  7. महर्षि पतंजलि ने पाणिनि की अष्टाध्यायी महाभाष्य में भाषा की परिभाषा करते हुए कहा है-
    “व्यक्ता वाचि वर्णां येषां त इमे व्यक्तवाच:।” जो वाणी से व्यक्त हो उसे भाषा की संज्ञा दी जाती है।
    दुनीचंद ने अपनी पुस्तक “हिन्दी व्याकरण” में भाषा की परिभाषा करते हुए लिखा है –
    “हम अपने मन के भाव प्रकट करने के लिए जिन सांकेतिक ध्वनियों का उच्चारण करते हैं, उन्हें
    भाषा कहते हैं।”
  8. डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सेना ने अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए लिखा है – “भाषा मुख से उच्चरित उस
    परम्परागत सार्थक And व्यक्त ध्वनि संकेतों की व्यक्ति को कहते हैं, जिसकी सहायता से Human आपस
    में विचार And भावों को आदान-प्रदान करते हैं तथा जिसको वे स्वेच्छानुसार अपने दैनिक जीवन में
    प्रयोग करते हैं।”
  9. डॉ. सरयू प्रसाद अग्रवाल के According – “भाषा वाणी द्वारा व्यक्त स्वच्छन्द प्रतीकों की वह रीतिबद्ध
    पद्धति है जिससे Human समाज में अपने भावों का परस्पर आदान-प्रदान करते हुए Single-Second को
    सहयोग देता है।”
  10. श्री नलिनि मोहन सन्याल का कथन है – “अपने स्वर को विविध प्रकार से संयुक्त तथा विन्यस्त
    करने से उसके जो-जो आकार होते हैं उनका संकेतों के सदृश व्यवहार कर अपनी चिन्ताओं को
    तथा मनोभावों को जिस साधन से हम प्रकाशित करते हैं, उस साधन को भाषा कहते हैं।”
  11. डॉ. देवीशंकर द्विवेदी के मतानुसार – “भाषा यादृच्छिक वाक्प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके माध्यम
    से Human समुदाय परस्पर व्यवहार करता है।”
  12. प्लेटो ने विचार तथा भाषा पर अपने भाव व्यक्त करते हुए लिखा है-’विचार आत्मा की मूक बातचीत
    है, पर वही जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है उसे भाषा की संज्ञा देते हैं।’ 
  13. मैक्समूलर के According-”भाषा और कुछ नहीं है केवल Human की चतुर बुद्धि द्वारा अविष्कृत ऐसा उपाय
    है जिसकी मदद से हम अपने विचार सरलता और तत्परता से दूसरों पर प्रकट कर सकते हैं और
    चाहते हैं कि इसकी व्याख्या प्रकृति की उपज के Reseller में नहीं बल्कि मनुष्य कृत पदार्थ के Reseller
    में करना उचित है।”
  14. क्रोचे द्वारा लिखित परिभाषा इस प्रकार है – “Language is articulate, limited organised sound, employed
    in expression”. Meansात् भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुसंगठित ध्वनि को कहते हैं, जो अभिव्यंजना
    के लिए नियुक्त की जाती है।
  15. ब्लॉक और ट्रेगर के According – “A Language is a system of arbitrary vocal symbols by means of
    which a social group co-operates”. Meansात् भाषा व्यक्त ध्वनि चिह्नों की उस पद्धति को कहते हैं
    जिसके माध्यम से समाज-समूह परस्पर व्यवहार करते हैं।
  16. हेनरी स्वीट का कथन है – “Language may be defined as expression of thought by means of speechsound.”
    Meansात् जिन व्यक्त ध्वनियों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति होती है, उसे भाषा कहते हैं।
  17. ए. एच. गार्डिनर के विचार से “The common definition of speech is the use of articulate sound
    sybols for the expression of thought.” Meansात् विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त And स्पष्ट
    ध्वनि-संकेतों का व्यवहार Reseller जाता है, उन्हें भाषा कहते हैं।  

उपर्युक्त
परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि- ‘‘मुख से उच्चरित ऐसे
परम्परागत, सार्थक And व्यक्त ध्वनि संकेतों की समष्टि ही भाषा है जिनकी
सहायता से हम आपस में अपने विचारों And भावों का आदान-प्रदान करते हैं।’’

भाषा के भेद

मनुष्य सामाजिक प्राणी है, अत: समाज में रहते हुए सदा विचार-विमर्श की Need होती है। सामान्य Reseller
में भावाभिव्यक्ति के All साधनों को भाषा की संज्ञा दी जाती है। भावाभिव्यक्ति संदर्भ में हम अनेक माध्यमों
को सहारा लेते हैं; यथा – स्पर्श कर, चुटकी बजाकर, आँख घुमा या दबाकर, उँगली को आधार बनाकर, गहरी
साँस छोड़कर, मुख के विभिन्न अंगों के सहयोग से ध्वनि उच्चारण कर आदि।
भाषा की स्पष्टता के ध्यान में रखकर उसके वर्ग बना सकते हैं –

  1. मूक भाषा – भाषा की ध्वनि रहित स्थिति में ही ऐसी भावभिव्यक्ति होती है। इसे भाषा का अव्यक्त Reseller भी कहा जा
    सकता है। संकेत, चिह्न, स्पर्श आदि भावाभिव्यक्ति के माध्यम इसी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। पुष्प की
    भाषा भी मूक है।
  2. अस्पष्ट भाषा – जब व्यक्त भाषा का पूर्ण या स्पष्ट ज्ञान नहीं होता है, तो उसे अस्पष्ट कहते हैं, यथा – चिड़ियाँ प्रात:
    काल से अपना गीत शुरू कर देती है, किन्तु उनके गीत का स्पष्ट ज्ञान सामान्य व्यक्ति नहीं कर पाता
    है। इस प्रकार पक्षियों का गीत Human के लिए अस्पष्ट भाषा है।
  3. स्पष्ट भाषा – जब भावाभिव्यक्ति पूर्ण स्पष्ट हो, तो ऐसी व्यक्त भाषा को स्पष्ट कहते हैं। जब मनुष्य मुख अवयवों के
    माध्यम से Meansमयी या यादृच्छिक ध्वनि-समष्टि का प्रयोग करता है, तो ऐसी भाषा का Reseller सामने आता
    है। यह भाषा Human-व्यवहार और उसकी उन्नति में सर्वाधिक सहयोगी है। 
  4. स्पर्श भाषा :- इसमें विचारों की अभिव्यक्ति शरीर के Single अथवा अधिक अंगों के स्पर्श-माध्यम से
    होती है। इसमें भाषा के प्रयोगकर्ता और ग्रहणकर्ता में निकटता आवश्यक होती है। 
  5. इंगित भाषा :- इसे आंगिक भाषा भी कहते हैं। इसमें विचारों की अभिव्यक्ति विभिन्न प्रकार के संकेतों
    के माध्यम से होती है; यथा – हरी झंडी या हरी बत्ती मार्ग साफ या आगे बढ़ाने का संकेत है
    या बत्ती मार्ग अवरुद्ध होने या रुकने का संकेत है। 
  6. वाचिक भाषा :- इसके लिए ‘मौखिक’ Word का भी प्रयोग होता है। ऐसी भाषा में ध्वनि-संकेत भावाभिव्यक्ति
    के मुख्य साधन होते हैं। इसमें विचार-विनिमय हेतु मुख के विभिन्न अवयवों का सहयोग लिया जाता
    है, Meansात इसमें भावाभिव्यक्ति बोलकर की जाती है। यह सर्वाधिक प्रयुक्त भाषा है। सामान्यत: इस
    भाषा का प्रयोग सामने बैठे हुए व्यक्ति के साथ होता है। यंत्र-आधारित दूरभाष (टेलीफोन), वायरलेस
    आदि की भाषा भी इसी वर्ग के अन्तर्गत आती है। भाषा के सूक्ष्म विभाजन में इसे यांित्रक या यंत्र-आधारित
    भाषा के भिन्न वर्ग में रख सकते हैं।
  7. लिखित भाषा – भावाभिव्यक्ति का सर्वोत्त माध्यम लिखित भाषा है, इसमें अपने विचार का विनिमय
    लिखकर Meansात् मुख्यत: लिपि का सहारा लेकर Reseller जाता है। इस भाषा में लिपि के आधार पर
    समय तथा स्थान की सीमा पर करने की शक्ति होती है। Single समय लिपिबद्ध Reseller गया विचार
    शताब्दियों बाद पढ़ कर समझा जा सकता है और कोई भी लिपिबद्ध विचार या संदेश देश-विदेश
    के किसी भी स्थान को भेजा जा सकता है। किसी भी समाज की उन्नति मुख्यत: वहाँ की भाषा-उन्नति
    पर निर्भर होती है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि उन्नत देश की भाषा भी उन्नत होती है। इसके साथ
    भाषा को Humanीय सभ्यता का उत्कर्ष आधार माना गया है। काव्यदर्श में वाणी (भाषा) को जीवन
    का मुख्याधार बताते हुए कहा गया है – “वाचामेय प्रसादेन लोक यात्र प्रवर्तते।”

भाषा की प्रवृत्ति

भाषा के सहज गुण-धर्म को भाषा के अभिलक्षण या उस की प्रकृति कहते हैं। इसे ही भाषा की विशेषताएँ
भी कहते हैं। भाषा-अभिलक्षण को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। भाषा का First अभिलक्षण वह है जो
All भाषाओं के लिए मान्य होता है, इसे भाषा का सर्वमान्य अभिलक्षण कह सकते हैं। द्वितीय अभिलक्षण वह
है जो भाषा विशेष में पाया जाता है। इससे Single भाषा से दूसरी भाषा की भिन्नता स्पष्टता होती है। हम
इसे विशिष्ट भाषागत अभिलक्षण भी कह सकते हैं। यहाँ मुख्यत: ऐसे अभिलक्षणों के विषय में विचार Reseller जा रहा है, जो विश्व की समस्त भाषाओं में पाये जाते हैं –

  1. भाषा सामाजिक सम्पत्ति है – सामाजिक व्यवहार भाषा का मुख्य उद्देश्य है। हम भाषा के सहारे अकेले में सोचते या चिन्तन करते हैं,
    किन्तु वह भाषा इस सामान्य यादृच्छिक ध्वनि-प्रतिकों पर आधारित भाषा से भिन्न होती है। भाषा अघोपांत
    समाज से संबंधित होती है। भाषा का विकास समाज में हुआ, उसका अर्जन समाज में होता है और उसका
    प्रयोग भी समाज में ही होता है। यह तथ्य दृष्टव्य है कि बच्चा जिस समाज में पैदा होता है तथा पलता
    है, वह उसी समाज की भाषा सीखता है।
  2. भाषा पैत्रिक सम्पत्ति नहीं है – कुछ लोगों का कथन है कि पुत्र को पैित्रक सम्पत्ति (घर, धन, बाग आदि) के समान भाषा भी प्राप्त
    होती है। अत: भाषा पैित्रक सम्पत्ति है, किन्तु यह सत्य नहीं है। यदि किसी Indian Customer बच्चे को Single-दो
    वर्ष अवस्था (शिशु-काल) में किन्हीं विदेशी भाषा-भाषी लोगों के साथ कर दिया जाये, तो वह उनकी ही
    भाषा बोलेगा। यदि भाषा पैित्रक सम्पत्ति होती, तो वह बालक बोलने के योग्य होने पर अपने माता-पिता
    की ही भाषा बोलता।
  3. भाषा व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं है –भाषा सामाजिक सम्पत्ति है। भाषा का निर्माण भी समाज के द्वारा होता है। महान साहित्यकार या भाषा-प्रेमी
    भाषा में कुछ Single Wordों को जोड़ या उसमें से कुछ Single Wordों को घटा सकता है इससे स्पष्ट होता
    है कि कोई साहित्यकार या भाषा-प्रेमी भाषा का निर्माता नहीं हो सकता है। भाषा में होने वाला परिवर्तन
    भी व्यक्तिकृत न होकर समाजकृत होता है।
  4. भाषा अर्जित सम्पत्ति है – भाषा परम्परा से प्राप्त सम्पत्ति है, किन्तु यह पैित्रक सम्पत्ति की भांति नहीं प्राप्त होती है। मनुष्य को
    भाषा सीखने के लिए प्रयास करना पड़ता है। सामाजिक व्यवहार भाषा सीखने में मार्ग-दर्शन के Reseller में
    कार्य करता है, किन्तु मनुष्य को प्रयास के साथ उसका अनुकरण करना होता है। मनुष्य अपनी मातृभाषा
    के समान प्रयोगार्थ अन्य भाषाओं को भी प्रयत्न कर सीख सकता है। इसे स्पष्ट होता है, भाषा अर्जित
    सम्पत्ति है।
  5. भाषा व्यवहार अनुकरण द्वारा अर्जित की जाती है – शिशु बौद्धिक विकास के साथ अपने आसपास के लोगों की ध्वनियों को अनुकरण के आधार पर उन्ही
    के समान प्रयोग करने का प्रयत्न करता है। प्रारम्भ में वह या, मा, बा आदि ध्वनियों का अनुकरण करता
    है फिर सामान्य Wordों को अपना लेता है। यह अनुकरण तभी सम्भव होता है जब उसे सीखने योग्य
    व्यवहारिक वातावरण प्राप्त हो। वैसे व्याकरण, कोश आदि से भी भाषा सीखी जा सकती है, किन्तु यह
    सब व्यवहारिक आधार पर सीखी गई भाषा के बाद ही सम्भव है। यदि किसी शिशु को निर्जन स्थान
    पर छोड़ दिए जाए तो वह बोल भी नहीं पाएगा, क्योंकि व्यवहार के अभाव में उसे भाषा का ज्ञान
    नहीं हो पाएगा। 
  6. भाषा सामाजिक स्तर पर आधारित होती है – भाषा का सामाजिक स्तर पर भेद हो जाता है। विस्तृत क्षेत्र में प्रयुक्त किसी भी भाषा की आपसी भिन्नता
    देख सकते हैं। सामान्य Reseller में All हिन्दी भाषा-भाषी हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं, किन्तु विभिन्न क्षेत्रों
    की हिन्दी में भिन्नता होती है। यह भिन्नता उनके शैक्षिक, आर्थिक, धार्मिक, व्यावसायिक तथा सामाजिक
    आदि स्तरों के कारण होती है। भाषा के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी Wordावली होती है जिसके कारण भिन्नता
    दिखाई पड़ती है। शिक्षित व्यक्ति जितना सतर्क रहकर भाषा का प्रयोग करता है सामान्य अथवा अशिक्षित
    व्यक्ति उतनी सतर्कता से भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता है। यह स्तरीय तथ्य किसी भी भाषा के विभिन्न
    कालों के भाषा-प्रयोग से भी अनुभव कर सकते हैं।
  7. भाषा सर्वव्यापक है – यह सर्वमान्य तथ्य है कि विश्व के समस्त कार्यों का सम्पादन प्रत्यक्ष या परोक्ष Reseller से भाषा के ही माध्यम
    से होता है। समस्त ज्ञान भाषा पर आधारित है। व्यक्ति-व्यक्ति का संबंध या व्यक्ति-समाज का संबंध भाषा
    के अभाव में असम्भव है। भतर्ृहरि ने वाक्यपदीय में इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा है – “न सोsस्ति प्रत्ययों लोके य: Wordानुगमादृते। अनुविद्धमिव ज्ञानं सवं Wordेन भासते।”
    वाक्यपदीय 123.24 
    मनुष्य के मनन-चिन्तन तथा भावाव्यक्ति का मूल माध्यम भाषा है, यह भी भाषा की सर्वव्यापकता का प्रबल-प्रमाण है।
  8. भाषा सतत प्रवाहमयी है – मनुष्य के साथ भाषा सतत गतिशीली अवस्था में विद्यमान रहती है। भाषा की उपमा प्रवाहमान जलस्रोत-नदी
    से दी जा सकती है, जो पर्व से निकल कर समुद्र तक लगातार बढ़ती रहती है, अपने मार्ग में वह कहीं
    सूखती नहीं है। समाज के साथ भाषा का आरम्भ हुआ और आज तक गतिशील है। Human समाज जब
    तक रहेगा तब तक भाषा का स्थायित्व पूर्ण निश्चित है किसी व्यक्ति या समाज के द्वारा उसमें परिवर्तन
    Reseller जा सकता है, किन्तु उसे समाप्त करने की किसी में शक्ति नहीं होती है।
  9. भाषा सम्प्रेषण मूलत: वाचिक है – भाव सम्पे्रषण सांकेतिक, आंगिक, लिखित और यांित्रक आदि अनेक Resellerों में होता है, किन्तु इनकी कुछ
    सीमाएँ हैं Meansात् इन माध्यमों के द्वारा पूर्ण भावाभिव्यक्ति सम्भव नहीं। स्पर्श तथा संकेत भाषा तो स्पष्ट
    Reseller में अपूर्ण है, साथ ही लिखित भाषा से भी पूर्ण भावाभिव्यक्ति सम्भव नहीं। वाचिक भाषा में आरोह-अवरोह
    तथा विभिन्न भाव-भंगिमाओं के कारण पूर्ण सशक्त भावाभिव्यक्ति सम्भव होती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण
    पूर्ण सशक्त भावाभिव्यक्ति सम्भव होती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण वाचिक भाषा को सजीव तथा लिखित
    तथा अन्य भाषाओं को निर्जीव भाषा कह सकते हैं। वाचिक भाषा का प्रयोग भी सर्वाधिक Reseller में होता
    है। अनेक अनपढ़ व्यक्ति भी ऐसी भाषा का सहज, स्वाभाविक तथा आकर्षक प्रयोग करते हैं।
  10. भाषा चिरपरिवर्तनशील है – संसार की All वस्तुओं के समान भाषा भी परिवर्तनशील है। किसी भी देश के Single काल की भाषा परवर्ती
    काल में पूर्वत् नहीं रह सकती, उसमें कुछ-न-कुछ परिवर्तन अवश्य हो जाता है। यह परिवर्तन अनुकूल
    या प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण होता है। संस्कृत में ‘साहस’ का Means अनुचित या अनैतिक कार्य के
    लिए उत्साह दिखाना था, तो हिन्दी में यह Word अच्छे कार्य के लिए उत्साह दिखाने के Means में प्रयुक्त
    होता है। भाषा अनुकरण के माध्यम में सीखी जाती है। मूल-भाषा (वाचक-भाषा) का पूर्ण अनुकरण सम्भव
    नहीं है। इसके कारण हैं- अनुकरण की अपूर्णता, शारीरिक तथा मानसिक Creation की भिन्नता And भौगोलिक,
    सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों की भिन्नता। इस प्रकार भाषा प्रतिफल परिवर्तित होती रहती है।
  11. भाषा का प्रारम्भिक Reseller उच्चरित होता है –भाषा के दो Reseller मुख्य हैं – मौखिक तथा लिखित। इनमें भाषा का प्रारम्भिक Reseller मौखिक ही होता है।
    लिपि का विकास तो भाषा जन्म के पर्याप्त समय बाद में होता है। लिखित भाषा में ध्वनियों का ही अंकन
    Reseller जाता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि ध्वन्यात्मक भाषा के अभाव में लिपि की कल्पना भी असम्भव
    है। उच्चरित भाषा के लिए लिपि आवश्यक माध्यम नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज
    भी ऐसे अनगिनत व्यक्ति मिल जाएँगे जो उच्चरित भाषा का सुन्दर प्रयोग करते हैं, किन्तु उन्हें लिपि का
    ज्ञान होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भाषा का प्रारम्भिक Reseller उच्चरित या मौखिक है और उसका परवर्ती
    विकसित Reseller लिखित है।
  12. भाषा का आरम्भ वाक्य से हुआ है – सामान्यत: भाव या विचार पूर्णता के द्योतक होते हैं। पूर्ण भाव की अभिव्यक्ति सार्थक, स्वतंत्र और पूर्ण
    Meansवान इकाई-वाक्य से ही सम्भव है। कभी-कभी तो Single Word से भी पूर्ण Means का बोध होता है; यथा-
    ‘जाओ’ आदि। वास्तव में ये Word न होकर वाक्य के Single विशेष Reseller में प्रयुक्त हैं। ऐसे वाक्यों में वाक्यांश
    छिपा होता है। यहाँ पर वाक्य का उद्देश्य-अंश ‘तुम’ छिपा हुआ है। श्रोता ऐसे वाक्यों को सुनकर व्याकरणिक
    ढंग से उसकी पूर्ति कर लेता है। इस प्रकार ये वाक्य बन जाते हैं – ‘तुम जाओ।’ ‘तुम आओ’ बच्चा
    Single ध्वनि या वर्ण के माध्यम से भाव प्रकट करता है। बच्चे की ध्वनि भावात्मक दृष्टि से संबंधित होने
    के कारण Single सीमा में पूर्णवाक्य के प्रतीक में होती है; यथा – ‘प’ से भाव निकलता है-मुझे प्यास लगी
    है या मुझे दूध दे दो या मुझे पानी दे दो। यहाँ ‘खग जाने खग ही की भाषा’ का सिद्धान्त अवश्य लागू
    होता है। जिसके हृदय में ममता और वात्सल्य का भाव होगा या जग सकेगा वह ही ऐसे वाक्यों की
    Means-अभिव्यक्ति को ग्रहण कर सकेगा।
  13. भाषा मानकीकरण पर आधारित होती है – भाषा परिवर्तनशील है, यही कारण है कि Single ही भाषा Single युग के बाद Second युग में पहुँचकर पर्याप्त
    भिन्न हो जाती है। इस प्रकार परिवर्तन के कारण भाषा में विविधता आ जाती है। यदि भाषा-परिवर्तन
    पर बिल्कुल ही नियंत्रण न रखा जाए तो तीव्रगति के परिवर्तन के परिणामस्वReseller कुछ ही दिनों में भाषा
    का Reseller अबोध्य बन जाएगा। भाषा परिवर्तन पूर्णReseller से रोका तो नहीं जा सकता, किन्तु भाषा में बोधगम्यता
    बनाए रखने के लिए उसके परिवर्तन-क्रम का स्थिरीकरण आवश्यक होता है। इस प्रकार की स्थिरता से
    भाषा का मानकीकरण हो जाता है।
  14. भाषा संयोगावस्था से वियोगावस्था की ओर बढ़ती है – विभिन्न भाषाओं के प्राचीन, मध्ययुगीन तथा वर्तमान Resellerों के अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट है कि भाषा का
    प्रारम्भिक Reseller संयोगावस्था में होता है। इसे संश्लेषावस्था भी कहते हैं। धीरे-धीरे इसमें परिवर्तन आता
    है और वियोगावस्था या विश्लेषणावस्था आ जाती है। भाषा की संयोगावस्था में वाक्य के विभिन्न अवयव
    आपस में मिले हुए लिखे-बोले जाते हैं। परवर्ती अवस्था में यह संयोगवस्था धीरे-धीरे शिथिल होती जाती
    है; यथा –
    “रमेशस्य पुत्र: गृहं गच्छति।
    रमेश का पुत्र घर जाता है। ‘रमेशस्य’ तथा ‘गच्छति’ संयोगवस्था में प्रयुक्त हैं।
  15. भाषा का अन्तिम Reseller नहीं है – वस्तु बनते-बनते Single अवस्था में पूर्ण हो जाती है, तो उसका अन्तिम Reseller निश्चित हो जाता है। भाषा
    के विषय में यह बात सत्य नहीं है। भाषा चिरपरिवर्तशील है। इसलिए किसी भी भाषा का अन्तिम Reseller
    ढूँढ़ना निरर्थक है और उसका अन्तिम Reseller प्राप्त कर पाना असम्भव है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि यह
    प्रकृति जीवित भाषा के संदर्भ में ही मिलती है।
  16. भाषा का प्रवाह कठिनता से सरलता की ओर होता है – विभिन्न भाषाओं के ऐतिहासिक अध्ययन के बाद यह स्पष्ट Reseller से कहा जा सकता है कि भाषा का
    प्रवाह कठिनता से सरलता की ओर होता है। मनुष्य स्वभावत: अल्प परिश्रम से अधिक कार्य करना चाहता
    है। इसी आधार पर Reseller गया प्रयत्न भाषा में सरलता का गुण भर देता है। इस प्रकृति का उदाहरण
    द्रष्टव्य है – डॉक्टर साहब > डाक्टर साहब > डाटर साहब > डाक साहब > डाक् साब > डाक्साब।
  17. भाषा नैसिर्गिक क्रिया है – मातृभाषा सहज Reseller में अनुकरण के माध्यम से सीखी जाती है। अन्य भाषाएँ भी बौद्धिक प्रयत्न से सीखी
    जाती है। दोनों प्रकार की भाषाओं के सीखने में अन्तर यह है कि मातृभाषा तब सीखी जाती है जब
    बुद्धि अविकसित होती है, Meansात् बुद्धि विकास के साथ मातृभाषा सीखी जाती है। इससे ही इस संदर्भ
    में होनेवाले परिश्रम का ज्ञान नहीं होता है। जब हम अन्य भाषा सीखते हैं, तो बुद्धि-विकसित होने के
    कारण ज्ञान-अनुभव होता है। कोई भी भाषा सीख लेने के बाद उसका प्रयोग बिना किसी कठिनाई के
    Reseller जा सकता है। जिस प्रकार शारीरिक चेष्टाएँ स्वाभाविक Reseller से होती हैं ठीक उसी प्रकार भाषा-ज्ञान
    के बाद उसकी भी प्रयोग सहज-स्वाभाविक Reseller में होता है।
  18. प्रत्येक भाषा की निश्चित सीमाएँ होती है – प्रत्येक भाषा की अपनी भौगोलिक सीमा होती है Meansात् Single निश्चित दूरी तक Single भाषा का प्रयोग होता
    है। भाषा-प्रयोग के विषय में यह कहावत प्रचलित है-”चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी।”
    Single भाषा से अन्य भाषा की भिन्नता कम या अधिक हो सकती है, किन्तु भिन्नता होती अवश्य है। Single
    निश्चित सीमा के बाद दूसरी भाषा की भौगालिक सीमा प्रारम्भ हो जाती है; यथा – असमी भाषा असम
    सीमा तक प्रयुक्त होती है, उसके बाद बंगला की सीमा शुरू हो जाती है। प्रत्येक भाषा की अपनी ऐतिहासिक
    सीमा होती है। Single निश्चित समय तक Single भाषा प्रयुक्त होती है, उससे पूर्ववर्ती तथा परवर्ती भाषा उससे
    भिन्न होती है। संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभं्रश तथा हिन्दी निश्चित-प्रयोग समय से यह तथ्य सुस्पष्ट हो
    जाता है।

भाषा का माध्यम 

भाषा : अभिव्यक्ति का माध्यम 

अपने भावों को अभिव्यक्त करके Second तक पहुँचाने हेतु भाषा का
उद्भव हुआ। भाषा के माध्यम से हम न केवल अपने, भावों, विचारों, इच्छाओं
और आकांक्षाओं को Second पर प्रकट करते हैं, अपितु दसू रों द्वारा व्यक्त भावों,
विचारों और इच्छाओं को ग्रहण भी करते हैं। इस प्रकार वक्ता और श्रोता के
बीच अभिव्यक्ति के माध्यम से Humanीय व्यापार चलते रहते हैं। इसलिए सुनना
और सुनाना अथवा जानना और जताना भाषा के मूलभूत कौशल हैं जो
सम्प्रेषण के मूलभूत साधन हैं। अभिव्यक्ति के माध्यम के Reseller में भाषा के
अन्यतम कौशल है पढ़ना और लिखना जो विधिवत् शिक्षा के माध्यम से
विकसित होते हैं।

भाषा : चिन्तन का माध्यम 

विद्याथ्री बहुत कुछ सुने, बोले या लिखें-पढे़, इतना पर्याप्त नहीं है,
अपितु यह बहुत आवश्यक है कि वे जो कुछ पढे़ं और सुनें, उसके आधार पर
स्वयं चिन्तन-मनन करें। भाषा विचारों का मूल-स्रोत है। भाषा के बिना विचारों
का कोई अस्तित्व नहीं है और विचारों के बिना भाषा का कोई महत्त्व नहीं।
पाणिनीय शिक्षा में कहा गया है कि ‘‘बुद्धि के साथ आत्मा वस्तुओं को
देखकर बोलने की इच्छा से मन को प्रेरित करती है। मन शारीरिक शक्ति पर
दबाव डालता है जिससे वायु में प्रेरणा उत्पन्न होती है। वायु फेफड़ों में चलती
हुई कोमल ध्वनि को उत्पन्न करती है, फिर बाहर की और जाकर और मुख
के ऊपरी भाग से अवरुद्ध होकर वायु मुख में पहुँचती है और विभिन्न ध्वनियों
को उत्पन्न करती है। ‘‘अत: वाणी के उत्पन्न के लिए चेतना, बुद्धि, मन और
शारीरिक अवयव, ये चारों अंग आवश्यक हैं। अगर इन चारों में से किसी के
पास Single या Singleाधिक का अभाव हो तो वह भाषाहीन हो जाता है।

भाषा : संस्कृति का माध्यम 

भाषा और संस्कृति दोनों परम्परा से प्राप्त होती हैं। अत: दोनों के बीच
गहरा सम्बन्ध रहा है। जहाँ समाज के क्रिया-कलापों से संस्कृति का निर्माण
होता है, वहाँ सास्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए भाषा का ही आधार लिया जाता
है। पौराणिक And साहसिक कहानियाँ, पर्व-त्यौहार, मेला-महोत्सव,
लोक-कथाएँ, ग्रामीण And शहरी जीवन-शैली, प्रकृति-पर्यावरण,
कवि-कलाकारों की Creationएँ, महान विभूतियों की कार्यावली, राष्ट्रप्रेम,
समन्वय-भावना आदि सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रभाव भी भाषा
पर पड़ता है।
दरअसल, किसी भी क्षेत्र विशेष के Human समुदाय को परखने के लिए
उसकी भाषा को समझना आवश्यक है। किसी निर्दिष्ट गोष्ठी के ऐतिहासिक
उद्भव तथा जीवन-शैली की जानकारी प्रात्प करने हेतु उसकी भाषा का
अध्ययन जरूरी है। संपृक्त जन-समुदाय के चाल-ढाल, रहन-सहन, वेशभूषा
ही नहीं, अपितु उसकी सच्चाई, स्वच्छता, शिष्टाचार, सेवा-भाव, साहस,
उदारता, निष्ठा, श्रमशीलता, सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता, कर्त्तव्यपरायणता आदि
उसकी भाषा के अध्ययन से स्पष्ट हो जाते हैं।

भाषा : साहित्य का माध्यम 

भाषा साहित्य का आधार है। भाषा के माध्यम से ही साहित्य अभिव्यक्ति
पाता है। किसी भी भाषा के बोलनेवालों जन-समुदाय के रहन-सहन,
आचार-विचार आदि का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने वाला उस भाषा का साहित्य
होता है। साहित्य के जरिए हमें उस निर्दिष्ट समाज के सामाजिक And
सांस्कृतिक जीवन का परिचय मिलता है। केवल समकालीन जीवन का ही नहीं,
बल्कि साहित्य हमें अपने अतीत से उसे जोड़कर Single विकसनशील
Human-सभ्यता का पूर्ण परिचय देता है। साथ ही साहित्य के अध्ययन से Single
उन्नत And उदात्त विचार को पनपने का अवसर मिलता है तो उससे हम अपने
Humanीय जीवन को उन्नत बनाने की प्रेरणा ग्रहण करते हैं। अत: भाषा का
साहित्यिक Reseller हमारे बौद्धिक And भावात्मक विकास में सहायक होता है और
साहित्य की यह अनमोल सम्पत्ति भाषा के माध्यम से ही हम तक पहुँच पाती
है। उत्तम साहित्य समृद्ध तथा उन्नत भाषा की पहचान है।

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