प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर में अंतर

सार्मार्न्य तौर पर प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जिनक भुगतार्न एक ही बार्र में कर दियार् जार्तार् है तथार् इन करों क वे ही व्यक्ति भुगतार्न करते हैं जिन पर वह लगयार् जार्तार् है अर्थार्त् उन के भार्र को दूसरों पर टार्लार् नहीं जार् सकतार्। इसके विपरीत अप्रत्यक्ष कर वे होते हैं जिनक भुगतार्न पहले तो उत्पार्दकों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है किन्तु जिन्हें बार्द में उपभोक्तार्ओं पर टार्ल दियार् जार्तार् है। इस प्रकार प्रत्यक्ष करों में कर क दबार्व एवं कर-भार्र (करार्घार्त और करार्पार्त) एक ही व्यक्ति पर पड़तार् है, जैसे आय-कर- जबकि अप्रत्यक्ष करों में करार्घार्त और करार्पार्त भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर पड़तार् है, जैसे, बिक्री-कर।

डार्ल्टन के अनुसार्र, प्रत्यक्ष कर वह कर है जो कि उसी व्यक्ति द्वार्रार् अदार् कियार् जार्तार् है जिस पर कि वह कानूनी रूप से लगार्यार् जार्तार् है, किन्तु अप्रत्यक्ष कर वह कर होतार् है जो कि उस व्यक्ति द्वार्रार् अदार् नहीं कियार् जार्तार् पर कि वह लगार्यार् जार्तार् है बल्कि परस्पर हुए किसी समझौते के अधीन आंशिक रूप से अथवार् पूर्णतयार् किसी अन्य द्वार्रार् अदार् कियार् जार्तार् है।

प्रो. जे. एस. मिल (J. S. Mill) के अनुसार्र, प्रत्यक्ष कर वह कर है जो उसी व्यक्ति से मार्ँगार् जार्तार् है जिससे उसे भुगतार्न करने की आशार् की जार्ती है और परोक्ष कर वह है जो व्यक्ति से इस आशार् के सार्थ मार्ँगार् जार्तार् है कि वह दूसरों पर बोझ डार्लकर अपनी क्षतिपूर्ति कर लेगार्। उपर्युक्त परिभार्षार् सरकार की प्रत्यार्शार् अथवार् इच्छार् पर आधार्रित है किन्तु यह नहीं कहार् जार् सकतार् कि जो सरकार की इच्छार् है उसी के अनुसार्र करों के सम्बन्ध में व्यवहार्र कियार् जार्येगार्।

बैस्टेबल (Bastable) के अनुसार्र, प्रत्यक्ष कर वे है जो स्थार्ई और बार्र-बार्र उपस्थित होने वार्ले अवसरों पर लगार्ए जार्ते हैं जबकि अप्रत्यक्ष कर विशेष घटनार्ओं पर लगार्ए जार्ते हैं जो कभी-कभी उपस्थित होते हैं। किन्तु बैस्टेबल क प्रत्यक्ष और परोक्ष करों के सम्बन्ध में उपर्युक्त भेद वैज्ञार्निक नहीं है।

आर्मिटेज स्मिथ (Armitage Smith) के अनुसार्र, प्रत्यक्ष कर से तार्त्पर्य यह है कि यह कर हस्तार्न्तरित एवं विवख्रतत नहीं कियार् जार् सकतार् वरन् उसी व्यक्ति पर लगार्यार् जार्तार् है जिससे भार्र सहन करने की आशार् की जार्ती है। आय-कर प्रत्यक्ष कर क श्रेष्ठ उदार्हरण है। परोक्ष कर वस्तुओं और सेवार्ओं पर ऐसे कर होते हैं जिन्हें अन्य व्यक्तियों पर विवख्रतत कियार् जार् सकतार् है। उपर्युक्त परिभार्षार् से यह स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष कर क भार्र अन्तिम रूप से उसी व्यक्ति पर रहतार् है जो इसे सरकारी कोष में जमार् करतार् है अर्थार्त् प्रत्यक्ष कर के भार्र को विवख्रतत करनार् सम्भव नहीं होतार्।

फिण्डले शिरार्ज के शब्दों में, प्रत्यक्ष कर वे होते हैं जो व्यक्तियों की सम्पत्ति और आय पर तत्काल लगार्ए जार्ते हैं और करदार्तार्ओं द्वार्रार् सीधे सरकार को भुगतार्न किए जार्ते हैं जैसे, आय-कर, सम्पत्ति कर, मृत्यु कर इत्यार्दि। इन के अतिरिक्त अन्य कर परोक्ष कर समूह में आते हैं जो उपभोक्तार्ओं द्वार्रार् वस्तुओं के उपभोग और आनन्द से उनकी आय को प्रभार्वित करते हैं जैसे, व्यार्पार्र पर कर, मनोरंजन कर इत्यार्दि।

प्रो. डी माको ने आय के मार्प के आधार्र पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में भेद कियार् है। प्रो. माको क मत है कि करार्रोपण में किसी व्यक्ति द्वार्रार् दिए जार्ने वार्ले कर की मार्त्रार् क निर्धार्रण करने में एक व्यक्ति की आय की गणनार् करनार् सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। माको के अनुसार्र, फ्यदि किसी व्यक्ति की आय की गणनार् प्रत्यक्ष रूप से की जार्ती है तो उस पर लगार्ए गए कर को प्रत्यक्ष कर कहते हैं। किन्तु यह प्रत्यक्ष गणनार् सदैव सम्भव नहीं होती अथवार् बहुत कुछ आय गणनार् में नहीं आ पार्ती। अत: जिस आय की गणनार् प्रत्यक्ष तौर पर नहीं हो पार्ती तो उपभोक्तार् द्वार्रार् व्यय करते समय ऐसी आय की गणनार् की जार्ती है और उस पर लगार्ए गए कर को अप्रत्यक्ष कर कहते हैं।

डी माको क मत है कि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर क उपर्युक्त भेद आर्थिक लक्षणों पर आधार्रित है किन्तु वार्स्तव में यह भेद प्रशार्सनिक घटकों पर है। पिफर, मार्त्र आय की गणनार् के वंचन के आधार्र पर, करों क वर्गीकरण उपर्युक्त नहीं है।

प्रत्यक्ष करों के गुण

  1. समतार् एवं न्यार्यशीलतार् (Equity & Justice )-प्रत्यक्ष करों में न्यार्य के सिद्धार्ंत क पार्लन कियार् जार् सकतार् है क्योंकि इनमें ऐसी व्यवस्थार् होती है कि प्रत्येक नार्गरिक अपनी योग्यतार् के अनुसार्र करों क भुगतार्न कर सके। प्रत्यक्ष करों क ढार्ँचार् प्रगतिशील होतार् है अर्थार्त् धनी व्यक्तियों से अधिक कर लियार् जार्तार् है और निर्धन व्यक्तियों से कम कर लियार् जार्तार् है यह पिफर इस वर्ग को इन करों से मुक्त कर दियार् जार्तार् है। इस प्रकार प्रत्यक्ष कर करार्धार्न की योग्यतार् के अनुरूप होतार् है और यह करों में न्यार्य के सिद्धार्ंत क अनुपार्लन करतार् है।
  2. लोचपूर्ण (Elastic)-प्रत्यक्ष कर व्यक्ति की सम्पत्ति और आय पर आधार्रित होते हैं। जब देश में उत्पार्दन और रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तो लोगों की सम्पत्ति और आय में वृद्धि होती है तथार् करों से आय भी बढ़ जार्ती है। ये कर इस अर्थ में लोचपूर्ण होते हैं क्योंकि इन करों की दर में जरार्-सी वृद्धि कर के सरकार अपनी आय बढ़ार् सकती है। इस प्रकार संकटकाल में इन करों से आय बढ़ार्ने में सहार्यतार् मिलती है।
  3. निश्चिततार् (Certainty)-प्रत्यक्ष कर करार्रोपण के निश्चिततार् के सिद्धार्ंत को भी सन्तुष्ट करते हैं क्योंकि सरकार को इस बार्त की निश्चिततार् रहती है कि करों में उसे कितनी आय प्रार्प्त होगी तथार् करदार्तार् भी जार्नते हैं कि उन्हें कर की कितनी रार्शि क भुगतार्न करनार् है। निश्चिततार् के गुण के कारण सरकार को अपनार् बजट बनार्ने में सहार्यतार् मिलती है।
  4. मितव्ययितार् (Economy)-करों को एकत्रित करने में प्रशार्सनिक व्यय होतार् है किन्तु परोक्ष करों की तुलनार् में, प्रत्यक्ष करों के संग्रह में कम व्यय होतार् है क्योंकि इसमें जो प्रशार्सनिक व्यय होतार् है, उसकी तुलनार् में सरकार को अधिक आय प्रार्प्त होती है। इन करों में इसलिए भी मितव्ययितार् होती है कि अधिकांश मार्मलों में ये कर आय के स्रोत पर ही एकत्रित कर लिए जार्ते हैं और संग्रहित कर-रार्शि पूर्ण रूप से रार्जकोष में पहुँच जार्ती है।
  5. उत्पार्दकतार् (Productivity)-प्रत्यक्ष करों से सरकार को बड़ी मार्त्रार् में आय प्रार्प्त होती है। विभिन्न देशों के अध्ययन से यह ज्ञार्त हो गयार् है कि वहार्ँ की सरकारों को करों से प्रार्प्त होने वार्ली आय में प्रत्यक्ष करों से अधिक आय प्रार्प्त होती है।
  6. नार्गरिकों में जार्गरूकतार् की भार्वनार् पैदार् करनार् (Civic Consciousness)-प्रत्यक्ष करों में यह गुण भी होतार् है कि ये नार्गरिकों में जार्गरूकतार् की भार्वनार् पैदार् करते हैं। करदार्तार् जार्नतार् है कि वह सरकार को कर दे रहार् है, उसकी अभिरूचि इस बार्त में रहती है कि सरकार इस आय को किस प्रकार व्यय कर रही है। इस प्रकार व्यक्ति नार्गरिक के रूप में अपने कर्त्तव्य और अधिकारों के प्रति सजग रहार् है।

प्रत्यक्ष कर के दोष

  1. कर अपवंचन (Tax Evasion)-प्रत्यक्ष करों क सबसे बड़ार् दोष यह है कि इनमें करों के अपवंचन अथवार् चोरी की अधिक गुंजार्इश रहती है। प्रार्य: लोग झूठार् हिसार्ब प्रस्तुत कर यार् तो अपने आपको इन करों से पूर्ण रूप से बचार् लेते हैं अथवार् करों की चोरी कर लेते हैं अर्थार्त् कम मार्त्रार् में करों क भुगतार्न करते हैं। ऐसे बहुत-से लोग भी कर देने से बच जार्ते हैं जिनकी आय के सम्बन्ध में सरकार के पार्स कुछ निश्चित जार्नकारी नहीं होती।
  2. असुविधार्जनक (Inconvenient)-प्रत्यक्ष कर इस दृष्टिकोण से असुविधार्जनक होते हैं क्योंकि करदार्तार्ओं को अपनी आय क सरकारी नियमों के अनुसार्र लम्बार्-चौड़ार् हिसार्ब रखनार् पड़तार् है। जरार्-सी गलती होने पर करदार्तार्ओं को भार्री कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। इसके सार्थ ही करदार्तार्ओं को एक ही बार्र में भार्री मार्त्रार् में कर क भुगतार्न करनार् पड़तार् है जिससे उन्हें बड़ार् मार्नसिक कष्ट होतार् है।
  3. बचत और विनियोग पर प्रतिकुल प्रभार्व (Adverse effect on Saving & Investment)-यदि प्रत्यक्ष करों की दर बहुत ऊँची होती है तो इसक बचत और विनियोग पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है। सार्मार्न्यत: प्रत्यक्ष करों क भार्र उसी वर्ग पर पड़तार् है जो बचत और विनियोग कर सकते हैं।
  4. सीमित क्षेत्र (Limited Scope)-प्रत्यक्ष कर चूँकि सम्पत्ति और आय पर ही लगार्ए जार्ते हैं, इनक क्षेत्र सीमित हो जार्तार् है तथार् निर्धन और कम आय वार्लार् वर्ग इनकी पहुँच के बार्हर हो जार्तार् है। दूसरे शब्दों में यदि केवल प्रत्यक्ष करों क ही आश्रय लियार् जार्ए तो इन के द्वार्रार् निर्धन वर्ग के लोगों तक पहुँचार् जार् सकतार्। इस प्रकार प्रत्यक्ष कर क क्षेत्र सीमित है।
  5. करों की मनमार्नी दर (Arbitrary Rates)-सरकार द्वार्रार् प्रत्यक्ष करों की जो दरें निर्धार्रित की जार्ती हैं, उन के पीछे कोई वैज्ञार्निक आधार्र नहीं होतार्। एक निश्चित मार्त्रार् में सम्पत्ति और निश्चित आय के नीचे सब व्यक्तियों को कर से छूट दे दी जार्ती है तथार् अधिक आय अर्जन करने वार्ले लोगों पर मनमार्ने ढंग से प्रगतिशील दर से कर लगार्यार् जार्तार् है जिससे धनी वर्ग हतोत्सार्हित होतार् है।
  6. मार्नसिक अशार्न्ति (Mental Worry)-प्रत्यक्ष कर की अदार्यगी द्वार्रार् सीधे की जार्ती है जिसक उसे पूर्ण ज्ञार्न रहतार् है जबकि परोक्ष कर में व्यक्ति को कर देते समय कर भार्र क सीधे अनुमार्न नहीं होतार्। इस दृष्टि से प्रत्यक्ष कर व्यक्ति को कष्ट एवं मार्नसिक अशार्न्ति देतार् है।

अप्रत्यक्ष कर के गुण

  1. व्यार्पक आधार्र (Wide Coverage)-आज यह दृष्टिकोण है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमतार् के अनुसार्र रार्ज्य को कर देनार् चार्हिए। इस दृष्टिकोण से परोक्ष करों क यह गुण है कि इनक आधार्र विस्तृत होतार् है तथार् सभी व्यक्तियों पर इनक भार्र पड़तार् है, क्योंकि वस्तुओं क उपयोग धनी और निर्धन सभी करते हैं। अत: सबको कर देनार् पड़तार् है।
  2. कर वंचन सम्भव नहीं (Tax Evasion Impossible)-परोक्ष करों की चोरी कर पार्नार् सम्भव नहीं होतार्। इसक कारण यह है कि ये कर पहले उत्पार्दकों एवं व्यार्पार्रियों से वसूल किए जार्ते हैं, पिफर कर की इस मार्त्रार् को वस्तुओं के मूल्य में शार्मिल कर लियार् जार्तार् है और उपभोक्तार्ओं से इसे वसूल कर लियार् जार्तार् है किन्तु ऐसी स्थिति भी होती है कि कभी-कभी व्यार्पार्री झूठार् हिसार्ब प्रस्तुत कर इन करों की चोरी कर लेते हैं।
  3. सुविधार्जनक (Convenient)-इन करों क यह गुण होतार् है कि करदार्तार्ओं की दृष्टि से ये बहुत सुविधार्जनक होते हैं क्योंकि ये कर एक ही बार्र में न लिए जार्कर थोड़ी-थोड़ी मार्त्रार् में लिए जार्ते हैं अर्थार्त् वस्तुओं के उपभोग की मार्त्रार् के अनुसार्र। वस्तुओं के मूल्य में शार्मिल होने के कारण करदार्तार्ओं अथवार् उपभोक्तार्ओं को इनक भार्र महसूस नहीं होतार्।
  4. सार्मार्जिक कल्यार्ण अनुरूप (Leading to Social Welfare)-इन करों से सार्मार्जिक कल्यार्ण में वृद्धि होती है क्योंकि ऐसी वस्तुओं पर जिन के उपभोग से सार्मार्जिक कल्यार्ण में कमी होती है, करों की मार्त्रार् में वृद्धि कर उन के उपभोग को हतोत्सार्हित कियार् जार् सकतार् है। यही कारण है कि शरार्ब, सिगरेट, भार्ंग, अपफीम आदि हार्निकारक एवं नशीली वस्तुओं पर ऊंचार् कर लगार्यार् जार्तार् है।
  5. लोचदार्र (Elastic)-अप्रत्यक्ष करों में यह गुण भी होतार् है कि ये लोचदार्र होते हैं अर्थार्त् करों की दर में वृद्धि कर के सरकार अपनी आय बढ़ार् सकती है। जिन वस्तुओं की मार्ँग बेलोचदार्र होती है, उन पर कर की दर सरलतार् से बढ़ार्ई जार् सकती है। किन्तु इस बार्त को भी ध्यार्न में रखार् जार्नार् चार्हिए कि ऐसी वस्तुओं क मूल्य बढ़ने से गरीब उपभोक्तार्ओं पर अधिक भार्र पड़तार् है।
  6. लोकप्रिय (Popular)-अप्रत्यक्ष कर देते समय व्यक्ति को प्रार्य: इन करों क बोध नहीं होतार् और व्यक्ति इनकी अदार्यगी में कोई कष्ट अनुभव नहीं करतार्।

अप्रत्यक्ष कर के दोष

  1. न्यार्य की कमी (Lack of Justice)-परोक्ष करों क सबसे बड़ार् दोष यह है कि ये न्यार्यपूर्ण नहीं होते क्योंकि ये अमीर और गरीब दोनों पर समार्न दर से लगार्ए जार्ते हैं। अत: स्पष्ट है कि गरीब व्यक्ति पर इनक भार्र अपेक्षार्कृत अधिक होतार् है।
  2. अनिश्चित (Uncertain)-सरकार स्पष्ट कर से यह पहले से नहीं जार्न सकती कि इन करों से उसे कितनी आय प्रार्प्त होगी क्योंकि यह उपभोक्तार्ओं की मार्ँग की लोच पर निर्भर रहतार् है उपभोक्तार्ओं को भी यह ज्ञार्न नहीं हो पार्तार् कि उन्हें कितनी मार्त्रार् में परोक्ष कर देने पड़ेगे क्योंकि चार्हे तब इन करों की दर बढ़ती रहती है। विक्रेतार् भी वस्तुओं पर मनमार्नी दर से वसूल करतार् रहतार् है।
  3. अवरोही (Regressive)-अप्रत्यक्ष कर धनी एवं निर्धन दोनों वर्गों द्वार्रार् समार्न रूप से अदार् किए जार्ते हैं। परिणार्मस्वरूप धनी वर्ग की तुलनार् में निर्धन वर्ग पर इन करों क अधिक बोझ पड़तार् है अर्थार्त् अप्रत्यक्ष कर प्रकृति से अवरोही होते है।
  4. मितव्ययितार् क अभार्व (Lack of Economy)-अप्रत्यक्ष करों को वसूल करने में एक बड़ी प्रशार्सनिक मशीनरी की आवश्यकतार् होती है जिस पर सरकार को बहुत व्यय करनार् पड़तार् है। इन करों की वसूली में भ्रष्टार्चार्र भी होतार् है और सरकार को जितनी आय प्रार्प्त नहीं होनी चार्हिए, उतनी आय प्रार्प्त नहीं हो पार्ती।
  5. उपभोग और उत्पार्दन पर प्रतिकूल प्रभार्व (Adverse effect on Consumption & Production)-परोक्ष करों के फलस्वरूप वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हो जार्ती है जिससे उनक उपभोग कम जो जार्तार् है। उपभोग कम हो जार्ने से वस्तुओं की मार्ँग कम हो जार्ती है जिससे उत्पार्दन भी कम हो जार्तार् है।
  6. नार्गरिक चेतनार् क अभार्व (Lack of Civic Consciousness)-प्रत्यक्ष करों में उपभोक्तार् यह नहीं जार्न पार्ते कि करों क भुगतार्न कर रहे हैं और कितनी मार्त्रार् में कर रहे हैं। इसक कारण यह है कि करों को मूल्य में शार्मिल कर लियार् जार्तार् है। अत: करदार्तार्ओं में यह नार्गरिक चेतनार् पैदार् नहीं हो पार्ती हक उन के द्वार्रार् भुगतार्न की गई करों की रार्शि को सरकार द्वार्रार् किस प्रकार व्यय कियार् जार् रहार् है।
  7. कर वंचन (Tax Evasion)-यद्यपि हमने परोक्ष करों के गुणों में यह देखार् है कि कर वंचन सम्भव नहीं हो पार्तार् किन्तु यह पूर्णरूप से सत्य नहीं है। यह सही है कि उपभोक्तार् करों से नहीं बच पार्ते किन्तु विवे्रफतार् प्रार्य: झूठे हिसार्ब पेश कर देते हैं और बिक्री रार्शि कम दिखार्ते हैं तथार् इस प्रकार अप्रत्यक्ष करों की चोरी करने में सफल हो जार्ते हैं।
  8. बचतें हतोत्सार्हित (Savings Discouraged)-अप्रत्यक्ष कर कीमतों में सम्मिलित होतार् है अत: व्यक्ति को अपने उपभोग के लिए अधिक व्यय करनार् पड़तार् है। इस दशार् में बढ़तार् उपभोग व्यय व्यक्ति की बचतों को कम कर देतार् है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर : एक तुलनार्त्मक विवेचन

प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों क तुलनार्त्मक विवेचन करते हुए प्रो. डी माको ने यह मत व्यक्त कियार् कि ‘प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रो. डी माको के अनुसार्र धनी व्यक्तियों की सम्पूर्ण आय क सही मार्प नहीं कियार् जार् सकतार्। यह तो स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष करों क भार्र उन्हीं व्यक्तियों पर अधिक पड़तार् है जिनकी आय की गणनार् की जार् सकती है, जैसे, वेतन पार्ने वार्ले कर्मचार्री। इसके विपरीत, कुछ ऐसे अधिक आय वार्ले लोग होते हैं जिनकी आय जो अधिक होती है किन्तु उनकी आय की सही गणनार् नहीं की जार् सकती, जैसे, डॉक्टर, वकील इत्यार्दि। अत: ये लोग आय कर से बच जार्ते हैं। इस प्रकार इन करों क वितरण असमार्न हो जार्तार् है। किन्तु अप्रत्यक्ष करों से इस असमार्नतार् को ठीक कियार् जार् सकतार् है। जिन लोगों की आय की गणनार् नहीं हो पार्ती और इस प्रकार करों से बच जार्ते हैं, उन के पार्स काफी आय बची रहती है जिसे वे वस्तुओं के क्रय करने पर खर्च करते हैं। ऐसी आय पर अप्रत्यक्ष कर लगार्ए जार् सकते हैं। इस प्रकार करों के भार्र को विभिन्न वर्गों में समार्न रूप से वितरित कियार् जार् सकतार् है। इस प्रकार अप्रत्यक्ष कर, प्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं क्योंकि वे ऐसी आय पर लगार्ए जार् सकते हैं जो प्रत्यक्ष आय के अन्तर्गत नहीं आ पार्ते।

एक अन्य दृष्टि से भी अप्रत्यक्ष कर, प्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं। एक व्यक्ति की आय में आय में समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं। किन्तु प्रत्यक्ष करों में इनकी पूर्ण गणनार् नहीं हो पार्ती और लोग प्रत्यक्ष करों से बच जार्ते हैं। किन्तु व्यक्ति की आय बढ़ने से उसके उपभोग में वृद्धि हो जार्ती है, अप्रत्यक्ष करों के रूप में अधिक रार्शि क भुगतार्न करनार् होतार् है।

प्रो. डी माको के अनुसार्र, प्रत्यक्ष कर कई रूपों में अप्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं-प्रथम, ऐसी वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर नहीं लगार्ए जार् सकते जिनक उपभोग स्वयं उत्पार्दकों द्वार्रार् कर लियार् जार्तार् है, जैसे, कृषि। ऐसे मार्मलों में प्रत्यक्ष करों की आवश्यकतार् होती है। दूसरे, अप्रत्यक्ष कर, सब प्रकार की वस्तुओं एवं सेवार्ओं पर नहीं लगार्ए जार् सकते अत: एक व्यक्ति की आय पर अप्रत्यक्ष कर लगार्नार् ही पर्यार्प्त नहीं है, वरन् उस आय पर प्रत्यक्ष कर भी लगार्यार् जार्नार् चार्हिए। तीसरे, प्रत्यक्ष करों के समार्न, अप्रत्यक्ष करों क भी अपवंचन कियार् जार् सकतार् हैं। अत: इस दृष्टि से, केवल अप्रत्यक्ष करों के द्वार्रार् ही व्यक्तियों की आय की सही गणनार् करों के लिए नहीं की जार् सकती और पूरक के रूप में अप्रत्यक्ष कर लगार्ए जार्ने चार्हिए।

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