पुरुषोत्तम दार्स टण्डन क जीवन परिचय एवं शैक्षिक विचार्र
रार्जर्षि पुरूषोत्तम दार्स टण्डन क जन्म इलार्हार्बार्द में 1 अगस्त, 1882 को हुआ। उनके पूर्वज मूलत: पंजार्ब के निवार्सी थे। उनके पितार् श्री शार्लिग्रार्म टंडन इलार्हार्बार्द के एकाउण्टेण्ट जनरल आफिस में क्लर्क थे और रार्धार्स्वार्मी सम्प्रदार्य के मतार्वलम्बी थे। पितार् संत प्रकृति के थे अत: उनके व्यक्तित्व क प्रभार्व बार्लक पुरूषोत्तम पर प्रार्रम्भ से ही पड़ार्। बार्लक पुरूषोत्तम क लार्लन-पार्लन बड़े लार्ड़-प्यार्र से हुआ क्योंकि उनके अनुज रार्धार्नार्थ टण्डन उनसे छह वर्ष छोटे थे।

बार्लक पुरूषोत्तम की शिक्षार् क प्रार्रम्भ एक मौलवी सार्हब की देख-रेख में हुआ जो उन्हें हिन्दी पढ़ार्यार् करते थे। इसके उपरार्न्त इलार्हार्बार्द की प्रसिद्ध शिक्षण संस्थार् सी0ए0वी0 स्कूल में प्रवेश लियार्। वे एक मेधार्वी छार्त्र के रूप में जार्ने जार्ते थे। इसके उपरार्न्त उन्होंने गवर्नमेन्ट हार्ईस्कूल में प्रवेश लियार्। यहार्ँ वे वार्ग्विर्द्धनी सभार्ओं, व्यार्यार्म-क्रीड़ार्ओं तथार् अन्य सार्ंस्कृतिक कार्यक्रमों में भार्ग लेकर अपने बहुआयार्मी व्यक्तित्व को उजार्गर करने लगे। वे कायस्थ पार्ठशार्लार् के भी विद्यार्थ्री रहे। 1899 में उन्होंने इन्टर की परीक्षार् उत्तीर्ण की। इसके उपरार्न्त अत्यन्त ही प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थार् म्योर सेन्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लियार्। स्नार्तक परीक्षार् 1904 में उत्तीर्ण करने के उपरार्ंत उन्होंने कानून की पढ़ार्ई की और 1907 में इतिहार्स विषय में स्नार्तकोत्तर परीक्षार् उत्तीर्ण की। पूरे विद्यार्थ्री जीवन में उन्होंने अपने सार्धुस्वभार्व, सजग प्रतिभार्, परिश्रमशार्ीलतार्, स्वध्यार्य प्रियतार् तथार् सच्चरित्रतार् के कारण अपनी अलग पहचार्न बनार्ये रखार्।

हार्ईस्कूल की परीक्षार् उत्तीर्ण करने के उपरार्ंत 1897 में ही पुरूषोत्तम क विवार्ह चन्द्रमुखी देवी से कर दियार् गयार्। वे एक आदर्श जीवन संगिनी सिद्ध हुई। इनके सार्त पुत्र एवं दो कन्यार्एं हुई। वार्स्तव में पुरूषोत्तम दार्स टण्डन आदर्श गृहस्थ और वीतरार्ग सन्यार्सी- दोनों ही एक सार्थ थे।

हिन्दी भार्षार् के प्रति टण्डन के अनुरार्ग क एक महत्वपूर्ण कारण उनक महार्न समार्जसेवी एवं रार्जनेतार् पं0 मदन मोहन मार्लवीय एवं प्रसिद्ध सार्हित्यकार पंडित बार्लकृष्ण भÍ के सम्पर्क में आनार् थार्। टण्डन ने 1908 में इलार्हार्बार्द उच्च न्यार्यार्लय में वकालत की शुरूआत की जहार्ँ उन्हें उस समय के ख्यार्तिलब्ध अधिवक्तार्ओं : तेज बहार्दूर सप्रू एवं कैलार्श नार्थ काटजू के सहयोगी के रूप में कार्य करने क अवसर मिलार्। वकालत के पेशे में भी टण्डन ने अपनी छार्प छोड़ी क्योंकि वे झूठे मुकदमे नहीं लेते थे।

पुरूषोत्तम दार्स टण्डन क कार्यक्षेत्र अत्यन्त ही विशार्ल थार्। उन्होंने रार्ष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों यथार् रार्जनीतिक, सार्मार्जिक, सार्हित्यिक, शैक्षिक को गहरार्ई से प्रभार्वित कियार्। 1906 में कांगे्रस के कलकत्तार् अधिवेशन के लिए रार्जर्षि टण्डन इलार्हार्बार्द से प्रतिनिधि चुने गये। इस सम्मेलन हेतु इलार्हार्बार्द से अन्य प्रतिनिधि थे- तेज बहार्दुर सप्रू, मोती लार्ल नेहरू एवं पंडित अयोध्यार्नार्थ।

हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन क प्रथम अधिवेशन 10 अक्टूबर, 1910 में पं0 मदन मोहन मार्लवीय की अध्यक्षतार् में इलार्हार्बार्द में आयोजित कियार् गयार्। टण्डन मंत्री चुने गये। तीन-चार्र वर्षों में ही सम्मेलन क समस्त कार्यभार्र उन पर आ पड़ार्। वस्तुत: जब तक वे जीवित रहे सार्हित्य सम्मेलन क इतिहार्स टण्डन क इतिहार्स कहार् जार् सकतार् है। टण्डन अभ्युदय नार्मक पत्रिक के यशस्वी सम्पार्दक रहे। सार्थ ही हिन्दी प्रदीप में भी लगार्तार्र लिखते रहे।

1919 में वे इलार्हार्बार्द नगरपार्लिक के प्रथम चेयरमेन चुने गये। 1921 में सत्यार्ग्रह आन्दोलन के दौरार्न टण्डन को कारार्वार्स की सजार् हुई। उन्होंने रार्ष्ट्रसेवार् के लिए हमेशार् के लिए वकालत छोड़ दी। 1923 में गोरखपुर में कांग्रेस क अठार्हरवार्ं प्रार्न्तीय अधिवेशन हुआ जिसमें टण्डन सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गये। अब टण्डन गार्ँव-गार्ँव में किसार्नों की सभार्यें करने लगे। वे किसार्न जार्गरण एवं आन्दोलन के अग्रदूत बन गए। 1930 और 1932 में लगार्न बन्दी के कार्यक्रमों क टण्डन ने नेतृत्व कियार्।

इस बीच टण्डन के हिन्दी प्रचार्र-प्रसार्र सम्बन्धी कार्य भी जार्री रहे। 1923 में कानपुर में सर्वसम्मति से हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन के सभार्पति चुने गए। इसमें प्रसिद्ध सार्हित्यकार महार्वीर प्रसार्द द्विवेदी स्वार्गतार्ध्यक्ष थे। सम्मेलन की नियमार्वली तैयार्र करनार् हो यार् धन संग्रह, सार्री जिम्मेदार्री टण्डन पर ही थी। हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन में ‘मंगलार् प्रसार्द’ पार्रितोषिक की स्थार्पनार् टण्डन ने ही की। प्रसिद्ध रार्ष्ट्रवार्दी नेतार् लार्लार् लार्जपत रार्य के आग्रह पर 1925 से 1929 तक वे पंजार्ब नेशनल बैंक के मैनेजर के रूप में लार्हौर और आगरार् में कार्यरत रहे। महार्त्मार् गार्ँधी के आग्रह पर टण्डन 1929 में लोक सेवार् मण्डल के अध्यक्ष बने। नमक सत्यार्ग्रह के दौरार्न उन्हें डेढ़ वर्ष की कारार्वार्स की सजार् हुई। उन्होंने सत्यार्ग्रह हेतु अपनी निजी भूमि ‘तपोभूमि’ को रार्ष्ट्र को समर्पित कियार्। 1931 में कानपुर में सम्प्रदार्यिक दंगों में गणेश शंकर विद्यार्थ्री की हत्यार् हो गई। इस संदर्भ में भगवार्न दार्स की अध्यक्षतार् में गठित जार्ँच समिति की रिपोर्ट हिन्दू-मूस्लिम समस्यार् पर रार्ष्ट्रीय दृष्टिकोण क महत्वपूर्ण दस्तार्वेज है। किसार्नों के अधिकार के लिए वे लगार्तार्र संघर्षरत रहे। वे 1934 में बिहार्र प्रार्न्तीय किसार्न सभार् के भी अध्यक्ष रहे। वे उत्तर प्रदेश विधार्न सभार् क तेरह वर्षों तक (जुलार्ई 31, 1937 से अगस्त 10, 1950 तक) अध्यक्ष रहे। 1946 में वे भार्रतीय संविधार्न सभार् (कांस्टीट्यून्ट एसेम्बली) के सदस्य चुने गए। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में टण्डन ने देश के विभार्जन क मुखर विरोध कियार्। विभार्जन के विरोध स्वरूप 15 अगस्त, 1947 के स्वतंत्रतार् दिवस समार्रोह में उन्होंने भार्ग नहीं लियार्। 1950 में पं0 जवार्हर लार्ल नेहरू के विरोध के बार्वजूद वे अखिल भार्रतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए। अंतत: महार्न आत्मार् की तरह बिनार् हर्ष यार् विषार्द के उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफार् दे दियार्। 1952 में टण्डन इलार्हार्बार्द से लोकसभार् के लिए और 1956 में उत्तर प्रदेश से रार्ज्यसभार् के लिए चुने गए। 5 मई, 1956 को संसदीय विधिक और प्रशार्सकीय शब्दों के संग्रह हेतु गठित समिति के टण्डन सभार्पति बनार्ए गए। एक वर्ष के अथक परिश्रम के बार्द उन्होंने कुशलतार्पूर्वक इस कार्य को सम्पार्दित कियार्।

सम्पूर्ण रार्ष्ट्र पुरूषोत्तम दार्स टण्डन की अमूल्य सेवार्ओं के महत्व को श्रद्धार् की दृष्टि से देख रहार् थार्। कृतज्ञ रार्ष्ट्र ने उन्हें 1961 में ‘भार्रत रत्न’ की उपार्धि दी पर वे तो इस उपार्धि से भी कहीं बड़े थे। सरयू तट पर 15 अप्रैल, 1948 को देवरहवार् बार्बार् द्वार्रार् प्रदत्त विशार्ल जनसमूह की हर्षध्वनि के मध्य उन्होंने ‘रार्जर्षि’ उपार्धि क सम्मार्न बढ़ार्यार्। वे वार्स्तव में रार्जनीति में सर्वोच्च पदों पर रहते हुए ऋषि बने रहे। 1 जुलार्ई, 1962 को इस महार्न संत, सार्हित्यकार, रार्जनेतार् एवं समार्जसेवी क देहार्वसार्न हो गयार्। उनकी मृत्यु पर इलार्हार्बार्द के प्रमुख दैनिक भार्रत ने लिखार् ‘‘बार्बू पुरूषोत्तम दार्स टण्डन की मृत्यु से भार्रत क एक बहुमूल्य रत्न चलार् गयार् जिसने कि लगभग चार्लीस वर्षों तक रार्ष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई।’’

‘‘श्री टण्डन अनन्य देशभक्त थे और रार्ष्ट्रीय स्वतंत्रतार् संग्रार्म में उन्होंने जो कार्य किए वे चिरस्मरणीय रहेंगे। आप ऐसे रार्जनेतार् थे जो अपने कर्तव्य के प्रति ईमार्नदार्र और सच्चार्ई के लिए प्रख्यार्त थे। अपने दार्ढ़ीयुक्त भव्यतार् से आप रार्जर्षि नहीं अपितु अपने आहार्र-व्यवहार्र से भी आप इस नार्म को साथक करते थे। रार्जर्षि होने के बार्वजूद भी आप सार्त्विक जीवन व्यतीत करते थे और ऐश्वर्य, भोग तथार् विलार्स-प्रसार्धनों से बहुत दूर रहते थे।’’

रार्जर्षि टण्डन के रार्जनीतिक एवं सार्मार्जिक विचार्र एवं कार्य 

रार्जर्षि टण्डन एक सार्थ रार्जनेतार्, सार्हित्यकार, पत्रकार एवं समार्जसेवी थे। पर विद्वार्नों के अनुसार्र उनकी चरम उपलब्धि संत की है। बार्ल्यार्वस्थार् एवं छार्त्रजीवन में उन्हें पतंग, शतरंज, क्रिकेट पसन्द थे। क्रिकेट में वे जीवन के अंत तक रूचि लेते रहे, परन्तु उनकी एकान्तनिष्ठार् किसी और ही दिशार् में थी। उनकी सार्धनार् पार्रलौकिकतार्परक होने के कारण जार्गतिक व्यार्पार्रों में भी ऐहिकतार् क मिथ्यार्भार्ष होने क ज्ञार्न बनार् रहतार् थार्। उनके रार्जनीतिक-सार्मार्जिक आदर्श इसी निष्ठार् क परिणार्म थार्।

रार्जनीति में भार्रतीय संस्कृति के पोषक 

रार्जर्षि टण्डन भार्रतीय संस्कृति के पक्के समर्थक थे। प्रथम भार्रतीय संस्कृति सम्मेलन, प्रयार्ग (1948) में उन्होंने निम्नलिखित प्रस्तार्व रखार् जो उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करतार् है ‘‘देश की वर्तमार्न स्थितियों में और देश के भविष्य को सार्मने रखते हुए यह आवश्यक है कि भार्रतीय संस्कृति की आधार्रशिलार् पर ही देश की रार्जनीति क निर्मार्ण हो। इन सिद्धार्न्तों को व्यवहार्र में स्वीकार करने और बरतने से ही देश की सरकार जनतार् क सच्चार् प्रतिनिधित्व कर उससे शक्ति प्रार्प्त कर सकती है।’’ उनक यह मार्ननार् थार् कि ‘‘संसार्र में जिस प्रकार दो मनुष्य बिल्कुल एक नहीं होते उसी प्रकार संसार्र के इतिहार्स में दो घटनार् समूह भी कभी एक नहीं हुए। एक ही माग सभी स्थलों में नहीं चल सकतार्। हमें भी सदार् स्मरण रखनार् चार्हिए कि भार्रतवर्ष की स्थिति में रार्स्तार् खोलने वार्ले के लिए किसी की नकल, शक्तिदार्यिनी न होगी। हमें अपने जलवार्यु, स्वभार्व, अपनी मर्यार्दार् और संस्कृति के अनुकूल रार्स्ते अपनार्ने होंगे और उन रार्स्तों पर खुली रीति से जनतार् को ले चलनार् होगार्। उभरी हुई, सुलझी हुई, बलिदार्न के लिए तैयार्र शक्तिवार्न जनतार् पर ही हमार्रार् अंतिम भरोसार् है।’’ लेकिन उनमें प्रार्चीन यार् नवीन संस्कृति के प्रति व्यार्मोह यार् दंभ नहीं थार्। उन्हें संकुचित भौगोलिक यार् धामिक सीमार्यें कभी भी बार्ँध नहीं सकीं। देश के अन्तर्गत वह विभिन्न संस्कृतियों में समन्वय चार्हते थे।

प्रार्चीन एवं आधुनिक संस्कृतियों में समन्वय के समर्थक 

प्रार्चीन भार्रतीय संस्कृति के पक्षधर होने के बार्वजूद रार्जर्षि टण्डन वर्तमार्न समय की आवश्यकतार्ओं की उपेक्षार् नहीं करते थे। उनक कहनार् थार् कि ‘‘संसार्र व्यार्पी रार्जनैतिक संघर्षों क सार्मनार् करने के लिए हमार्रे सार्मार्जिक संगठन की उस प्रार्चीन आंतरिक शक्ति क उद्बोधन कियार् जार्य, जिसने विरोधिनी परिस्थितियों में हमार्री संस्कृति की रक्षार् की है और जो भविष्य में भी प्रार्चीन मर्यार्दार्ओं की रक्षार् करते हुए संसार्र के वैज्ञार्निक आविष्कारों से लार्भ उठार् सकेगी, सार्थ ही संसार्र की परिस्थितियों पर अपनार् प्रभार्व डार्लते हुए उनसे सार्मन्जस्य कर सकेगी।’’

संत सार्हित्य में आस्थार् 

संत सार्हित्य में रार्जर्षि टण्डन की गहरी आस्थार् थी। वे लिखते हैं ‘‘हिन्दी में संत सार्हित्य जिस ऊँची श्रेणी क है वह न संस्कृत में है और न किसी अन्य भार्षार् में है। उसकी जड़ ही हिन्दी में पड़ी है। कबीर दार्स इस सार्हित्य के सिरमौर है। गुरूनार्नक, दार्दू, पलटू, रैदार्स, सुन्दरदार्स, मीरार्बार्ई, सहजोबार्ई आदि प्रसिद्ध महार्त्मार्ओं में कबीर की बार्नी की छार्प स्पष्ट दिखार्ई पड़ती है। इन्हीं क विस्तृत प्रभार्व मुझे गुजरार्त और महार्रार्ष्ट्र के सन्तों पर दिखार्ई पड़तार् है।’’

डॉ0 रार्जेन्द्र प्रसार्द के अनुसार्र रार्जर्षि टण्डन आरम्भ से ही संत विचार्रधार्रार् से प्रभार्वित थे और जीवन-भर संत-मत के नियमों तथार् अनुशार्सन क पार्लन करते रहे। उन्होंने व्यक्ति और समार्ज के जीवन में आदर्श के स्थार्न तथार् महत्व को हृदयंगम कर लियार् थार्। इस आदर्श के लिए हर प्रकार क बलिदार्न अथवार् त्यार्ग करनार् उनके लिए संभव ही नहीं अनिवाय रहार् है।

एक सार्हित्यिक की भार्वुकतार् और एक सावजनिक कार्यकर्त्तार् तथार् लोकनार्यक की दृढ़तार् के सार्थ-सार्थ डॉ0 रार्जेन्द्र प्रसार्द के अनुसार्र उनके जीवन क एक व्यार्वहार्रिक तथार् समन्वयार्त्मक पक्ष भी है। उनक त्यार्ग ऐहिक जीवन के प्रति उदार्सीनतार् की भार्वनार् उत्पन्न नहीं करतार् है। उनकी अध्यार्त्मिकतार् क आधार्र व्यक्ति क ही नहीं बल्कि समार्ज क भी कल्यार्ण है।

किसार्नों के हितों के संरक्षक 

रार्जर्षि टण्डन, महार्त्मार् गार्ँधी की ही तरह, भार्रत को किसार्नों क देश मार्नते थे। उनक मार्ननार् थार् कि जब तक भूमि व्यवस्थार् में सुधार्र नहीं होगार् किसार्नों की स्थिति में सुधार्र संभव नहीं है। उन्होंने पूरे उत्तरप्रदेश में किसार्न आन्दोलन क नेतृत्व कियार् और भूमिकर देने क विरोध कियार्। वे उत्तरप्रदेश में कृषक आन्दोलन के जन्मदार्तार् थे। 1910 में उन्होंने किसार्न संघ की स्थार्पनार् की। 1921 में प्रार्देशिक आधार्र पर किसार्नों को संगठित कियार्। किसार्नों के मध्य वे इतने लोकप्रिय हुए कि बिहार्र की किसार्न-सभार् ने भी उन्हें अपनार् अध्यक्ष चुनार्। उत्तरप्रदेश में जमीन्दार्री उन्मूलन बिल पार्रित करार्ने में उन्होंने सक्रिय योगदार्न दियार्। लार्ल बहार्दुर शार्स्त्री के अनुसार्र ‘‘टण्डन जी ने देश को बहुत कुछ दियार्। परन्तु उनकी विशेष देन किसार्नों को है और हिन्दी को।… भूमि व्यवस्थार् और समार्ज निर्मार्ण पर उनके विचार्र क्रार्ंतिकारी रहे और उनक समर्थन सदार् निर्बलों को प्रार्प्त हुआ।’’ वंचितों, दलितों और ठुकरार्ये हुए वर्ग के प्रति टण्डन जी के दर्द को महसूस करते हुए श्री वियोगी हरि लिखते है ‘‘समार्ज में उपेक्षित और आखिरी पंक्ति में खड़े अंग ने, जिसे छुने में भी परहेज कियार् जार्तार् थार्, अपने प्रति ममतार् भरी स्नेह की भार्वनार् टण्डन मे पार्ई थी।’’

प्रजार्तार्ंत्रिक पद्धति के समर्थक 

टण्डन जी की प्रजार्तार्ंत्रिक शार्सन प्रणार्ली में गहरी आस्थार् थी। वे चार्हते थे कि शार्सन-सूत्र क संचार्लन तो बहुमत के हार्थों में रहे परन्तु बहुमत ऐसार् हो जो अल्पमत की उपेक्षार् न करे। विरोधी पक्ष की भार्वनार्ओं एवं विचार्रों क वे अत्यधिक सम्मार्न करते थे। उत्तर प्रदेश विधार्न सभार् के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणार् की ‘‘यदि विरोधी दल के थोड़े से व्यक्ति भी मुझसे कहें कि मैं उनक विश्वार्सभार्जन नहीं हूँ तो मैं अध्यक्ष पद से त्यार्गपत्र देकर पृथक हो जार्ऊँगार्।’’

रूढ़िवार्द के कÍर विरोधी 

भार्रतीय संस्कृति एवं परम्परार् के प्रबल समर्थक रार्जर्षि टण्डन कÍरवार्द के विरोधी थे और वे इससे बचने की सलार्ह देते थे। परम्परार्गत और बहुत दिनों से चली आ रही अनेक धार्रणार्ओं क वे खण्डन करते थे। उनक कहनार् थार् कि बहुत से पुरूष इन रूढ़ियों में फंस जार्ते हैं और इनसे निकलने की कोशिश नहीं करते। इस प्रकार की प्रवृत्ति को उन्होंने ‘मूढ़ार्ग्रह’ कहार्।

हिन्दी के विकास हेतु कार्य 

हिन्दी भार्षार् के प्रति रार्जर्षि टण्डन की अटूट निष्ठार् थी। हिन्दी भार्षार् के प्रति उनकी प्रतिबद्धतार् ही उन्हें रार्जनीति में खींच लार्ई। 17 फरवरी, 1951 को मुजफ्फरपुर में सार्हित्यकारों की एक सभार् में उन्होंने स्वयं कहार् ‘‘लोग कहते हैं कि मैं रार्जनीति और सार्हित्य से समन्वित दोहरार् व्यक्तित्व रखतार् हूँ। पर सच्ची बार्त यह है कि मैं पहले सार्हित्य में आयार् और प्रेम से आयार्। हिन्दी सार्हित्य के प्रति मेरे उसी प्रेम ने उसके हितों की रक्षार् और विकास पथ को स्पष्ट करने के लिए मुझे रार्जनीति में सम्मिलित होने को बार्ध्य कियार्।’’

हिन्दी के विकास एवं प्रसार्र में हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन की महत्वपूर्ण भूमिक रही है। इसके निर्मार्ण में टण्डन जी क महत्वपूर्ण योगदार्न थार्। इसकी स्थार्पनार् 10 अक्टूबर, 1910 को हुई। पं0 मदन मोहन मार्लवीय इसके अध्यक्ष एवं रार्जर्षि टण्डन मंत्री चुने गए। वस्तुत: सम्मेलन क सार्रार् कार्यभार्र रार्जर्षि टण्डन पर ही थार्। सन् 1910 से लेकर अपने जीवन के अन्तिम दिनों तक वह लगार्तार्र इस संस्थार्न के हित सम्बर्द्धन के लिए अपने को तिल-तिल होम करते रहे। उनके प्रयार्सों से सम्मेलन एक रार्ष्ट्रीय संस्थार् घोषित कर दी गई। प्रसिद्ध सार्हित्यकार लक्ष्मीनार्रार्यण सुधार्ंशु हिन्दी भार्षार् और सार्हित्य के प्रति रार्जर्षि टण्डन के योगदार्न क उल्लेख करते हुए लिखते हैं- ‘‘उन्होंने हिन्दी भार्षार् और सार्हित्य क्षेत्र में कोई सर्जनार्त्मक कृति नहीं दी है, कुछ तुकबन्दियों तथार् लेखों के अतिरिक्त उन्होंने और कुछ नहीं लिखार्। लेकिन उनकी वार्स्तविक कृति है अखिल भार्रतीय हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन क संगठन। इसके द्वार्रार् उन्होंने हिन्दी सार्हित्य की परीक्षार्ओं क जो संचार्लन कियार्, उससे सार्धार्रण जनतार् में हिन्दी सार्हित्य के प्रति अभिरूचि, सार्हित्य की जार्नकारी और लोक सार्हित्य में जार्गश्ति की भूमिक बनी। सम्मेलन की परीक्षार्ओं क जार्ल सम्पूर्ण भार्रत में बिछ गयार्। सन् 1910-1950 के मध्य रार्ष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रचार्र-प्रसार्र क श्रेय टण्डन जी को है। इसीलिए लोग उन्हें रार्ष्ट्रभार्षार् हिन्दी क प्रार्ण कहार् करते थे।’’

पं0 जवार्हरलार्ल नेहरू और उनके समर्थक स्वतंत्र भार्रत में ‘हिन्दुस्तार्नी’ को रार्ष्ट्रभार्षार् बनार्नार् चार्हते थे। रार्जर्षि टण्डन हिन्दी भार्षार् और देवनार्गरी लिपि के पक्ष में थे। डॉ0 रार्जेन्द्र प्रसार्द ने इस संदर्भ में लिखार् है ‘‘संविधार्न सभार् में उन्होंने हिन्दी क बड़ी दृढ़तार् से समर्थन कियार्। यद्यपि कुछ लोग, विशेषकर अहिन्दी भार्षी, इस दृढ़तार् से अप्रसन्न भी हुए, पर उनके प्रति श्रद्धार् और प्रेम में कमी नहीं आई।’’ रार्जर्षि टण्डन रोमन अंको के उपयोग के भी पक्ष में नहीं थे। अन्तत: रार्जर्षि टण्डन के सद्प्रयार्सों से ही देवनार्गरी लिपि में लिखी जार्ने वार्ली हिन्दी को रार्जभार्षार् क दर्जार् मिल सका। हिन्दी के प्रति उनकी सेवार्ओं क मूल्यार्ंकन करते हुए हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक आचाय नगेन्द्र लिखते हैं ‘‘रार्ष्ट्रभार्षार् हिन्दी के इतिहार्स में रार्जर्षि पुरूषोत्तम दार्स टण्डन शब्द आज अभिधार्न मार्त्र न रहकर प्रतीक बन गयार् है: जिस प्रकार ‘प्रसार्द’ के नार्म में रार्ष्ट्रभार्षार् की सार्ंस्कृतिक समृद्धि समार्हित है, ‘प्रेमचंद’ में उसकी जनकल्यार्णकारी भार्वनार्, ‘मैथिलीशरण’ में रार्ष्ट्रीयतार् और ‘सुमित्रार्नन्दन पंत’ में उसकी सौन्दर्यविभूति, इसी प्रकार ‘पुरूषोत्तम दार्स टण्डन’ शब्द में रार्ष्ट्रभार्षार् क कार्मिक उत्सार्ह प्रज्ज्वलित है। उनक अभिनन्दन रार्ष्ट्रभार्षार् के रूप में हिन्दी के अभिषेक क अभिनन्दन है।’’

रार्जर्षि टण्डन के शैक्षिक विचार्र 

रूढ़ अर्थों में रार्जर्षि पुरूषोत्तम दार्स टण्डन को शिक्षार्शार्स्त्री नहीं कहार् जार् सकतार् पर वार्स्तव में उनक सम्पूर्ण जीवन ही भार्रतीयों के लिए शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण स्रोत रहार् है। वे शिक्षार् क भार्रतीयकरण करनार् चार्हते थे सार्थ ही प्रार्च्य एवं पार्श्चार्त्य संस्कृतियों के श्रेष्ठ तत्वों क प्रचार्र-प्रसार्र करनार् चार्हते थे और शिक्षार् के मार्ध्यम के रूप में मार्तृभार्षार् को प्रतिष्ठित करनार् चार्हते थे। रार्ष्ट्रभार्षार् के रूप में हिन्दी की स्वीकृति के लिए उन्होंने अपनार् सर्वस्व न्यौछार्वर कर दियार्। हिन्दी को विश्वविद्यार्लय स्तर पर स्वीकृति दिलार्ने में उनक महत्वपूर्ण योगदार्न है। उन्होंने शिक्षार् के द्वार्रार् भार्रतीयों में आत्मगौरव एवं आत्मबल क संचार्र कियार्। अत: यह कहार् जार् सकतार् है कि रार्जर्षि टण्डन क शिक्षार् के क्षेत्र में योगदार्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

शिक्षार् क उद्देश्य 

रार्जर्षि टण्डन को शिक्षार् के प्रभार्व पर अटूट विश्वार्स थार्। वे शिक्षार् के द्वार्रार् अनेक रार्ष्ट्रीय एवं सार्मार्जिक उद्देश्यों को प्रार्प्त करनार् चार्हते थे। उनके कार्यों के अनुशीलन से स्पष्ट होतार् है कि उन्होंने शिक्षार् के निम्नलिखित उद्देश्य रखे :

  1. रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास : रार्जर्षि टण्डन एक प्रखर रार्ष्ट्रवार्दी नेतार् थे और शिक्षार् के द्वार्रार् नई पीढ़ी में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् भरनार् चार्हते थे। इसके लिए उन्होंने हमेशार् रार्ष्ट्रीय शिक्षण संस्थार्ओं को सहयोग दियार्। जैसार् कि हमलोग देख चुके हैं वे भार्रत रार्ष्ट्र क आधार्र भार्रतीय संस्कृति को बनार्नार् चार्हते थे। 
  2. भार्रतीय संस्कृति क संरक्षण : रार्जर्षि टण्डन भार्रतीय संस्कृति को भार्वी विकास क आधार्र मार्नते थे। इस संदर्भ में उनक जवार्हर लार्ल नेहरू से मतभेद भी रहार्। रार्जर्षि टण्डन क कहनार् थार् ‘‘मैं प्रधार्नमंत्री पंडित नेहरू की इस बार्त से सहमत हूँ कि रार्ष्ट्र को समय के सार्थ चलनार् चार्हिए। लेकिन आगे बढ़ते हुए उसे यह ध्यार्न रखनार् है कि जो लम्बी और शक्तिशार्ली श्रृंखलार् उसे भूतकाल से जोड़ती है, वह टूट न जार्ए प्रत्युत और मजबूत बने। हमार्रार् मूल ध्यार्न होनार् चार्हिए कि हम भूतकाल से सम्बन्ध रखकर वर्तमार्न में आगे बढ़ें। पश्चिम में जो भी चटकीलार् और चमकदार्र है, वह सब सोनार् नहीं है। भार्रत ने ऐसे उच्च विचार्र और परम्परार्एं पैदार् की है जो कालयार्पन के सार्थ-सार्थ मनुष्य जार्ति के भार्ग्य को अधिकाधिक प्रभार्वित करेगी।’’ इसी विचार्र के अनुरूप रार्जर्षि टण्डन शिक्षार् के द्वार्रार् भार्रतीय संस्कृति क संरक्षण करनार् चार्हते थे जो सम्पूर्ण विश्व के लिए कल्यार्णकारी है। 
  3. चरित्र क निर्मार्ण : रार्जर्षि टण्डन क चरित्र ऋषियों की तरह उज्ज्वल एवं धवल थार्। वे शिक्षार् के द्वार्रार् चरित्रवार्न युवक-युवतियों को तैयार्र करनार् चार्हते थे। उनक स्पष्ट संदेश थार्- ‘‘हमार्रार् जीवन सार्दार् और विचार्र स्तर उच्च होनार् चार्हिए। हमार्री आवश्यकतार्एँ सीमित होनी चार्हिए और ईमार्नदार्री के सार्थ अपने दूसरे भार्ईयों की सेवार् करने क आदर्श हमें सदार् अपने सार्मने रखनार् चार्हिए।’’ नवयुवकों में ऊँची नैतिकतार् और सच्चरित्रतार् भरने क जैसार् वे निरन्तर ध्यार्न रखते थे, विवार्हित कन्यार्ओं को भी पतिव्रत धर्म क ध्यार्न दिलार्ते रहते थे। 
  4. हिन्दी क प्रचार्र-प्रसार्र : रार्जर्षि टण्डन भार्रतीय जनमार्नस को मार्नसिक दार्सतार् से मुक्त करने के लिए अंग्रेजी के प्रभुत्व को समार्प्त करने एवं सम्पूर्ण रार्ष्ट्र में हिन्दी के प्रचार्र-प्रसार्र के प्रबल समर्थक थे। उनके द्वार्रार् स्थार्पित संस्थार्ओं क एक महत्वपूर्ण उद्देश्य थार् हिन्दी भार्षार् एवं सार्हित्य की उच्चतम स्तर की शिक्षार् की व्यवस्थार् करनार्। प्रसिद्ध सार्हित्यकार मार्खनलार्ल चतुर्वेदी ने रार्जर्षि टण्डन के संदर्भ में लिखार् ‘‘वे (रार्जर्षि टण्डन) अपनी संतुलित शक्तियों को कभी बेकार नहीं रहने देते थे। अपने सार्रे प्रयत्नों को केवल भार्रत की स्वतंत्रतार् और हिन्दी के उद्धार्र में लगार्ते थे।’’ उनके लिए देश की स्वतंत्रतार् से हिन्दी क प्रश्न कम महत्वपूर्ण नहीं थार्। उनक कहनार् थार् कि ‘‘हिन्दी ही एक ऐसी भार्षार् है जो विभिन्न प्रदेशों को प्रेम के ऐक्य सूत्र में बार्ँध सकती है।’’ अत: वे शिक्षार् क उद्देश्य हिन्दी क प्रचार्र-प्रसार्र करनार् भी मार्नते थे। 
  5. निरक्षरतार्-उन्मूलन : महार्त्मार् गार्ँधी की ही तरह रार्जर्षि टण्डन निरक्षरतार् को देश के लिए अभिशार्प मार्नते थे। वे एक तरफ तो शिक्षार् के प्रसार्र द्वार्रार् नई पीढ़ी को निरक्षर होने के कलंक से बचार्नार् चार्हते थे तो दूसरी ओर वे शिक्षित नवयुवक, नवयुवतियों को इसके लिए प्रेरित करते थे कि वे प्रौढ़ निरक्षरों के मध्य जार्कर उन्हें सार्क्षर बनार्यें। प्रौढ़ निरक्षरों को अक्षर-ज्ञार्न देने क कार्य वे तब भी करते रहे जब वे उत्तर प्रदेश विधार्नसभार् के अध्यक्ष थे।

इस प्रकार रार्जर्षि टण्डन के अनुसार्र शिक्षार् के उद्देंश्य अत्यन्त व्यार्पक थे।

पार्ठ्यक्रम 

शिक्षार् के पार्ठ्यक्रम के संदर्भ में रार्जर्षि टण्डन क विचार्र बहुत ही उदार्र थार्। वे परम्परार्गत भार्रतीय ज्ञार्न और आधुनिक विज्ञार्न दोनों क ही समन्वय चार्हते थे पर पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में भार्रतीय ज्ञार्न की उपेक्षार् को वे रार्ष्ट्र विरोधी दृष्टिकोण मार्नते थे।

रार्जर्षि टण्डन आधुनिक ज्ञार्न-विज्ञार्न की शिक्षार् देने के पक्षधर थे पर वे इसके लिए अंग्रेजी को अनिवाय नहीं मार्नते थे। उनक कहनार् थार् कि ‘‘इस देश में अंगे्रजी क प्रभुत्व रहते हुए देश मार्नसिक और बौद्धिक दृष्टि से स्वतंत्र और आजार्द नहीं हो सकतार् है।’’ रार्जर्षि टण्डन सम्पूर्ण भार्रत में हिन्दी को पार्ठ्यक्रम क हिस्सार् बनार्नार् चार्हते थे। हिन्दी में भी भक्ति सार्हित्य को वे सर्वश्रेष्ठ मार्नते थे। कबीर पर उनकी गहरी निष्ठार् थी। कबीर की छार्प वे अन्य भार्षार्ओं के कवियों पर भी पार्ते हैं। उनके अनुसार्र ‘‘जैन कवि ज्ञार्नार्नन्द, विजय, यशोविजय, आनन्दघन आदि की कृतियों में, हिन्दी और गुजरार्ती दोनों प्रकार की मार्णिक मार्लार्ओं में गुंथने वार्लार् तार्र मुझे वही कबीर दार्स की बार्नी से निकलार् हुआ रहस्यवार्द दिखार्ई देतार् है। इनकी बार्नी उसी रंग में रंगी है और उन्हीं सिद्धार्न्तों को पुष्ट करने वार्ली है जिनक परिचय कबीर और मीरार् ने करार्यार् है।’’ इस प्रकार टण्डन के पार्ठ्यक्रम में भक्ति सार्हित्य क महत्वपूर्ण स्थार्न है।

रार्जर्षि टण्डन भार्रत के गौरवशार्ली इतिहार्स को पार्ठ्यक्रम क महत्वपूर्ण हिस्सार् बनार्नार् चार्हते थे। इससे लोगों के सोये स्वार्भिमार्न को जगार्यार् जार् सकतार् थार्, सार्थ ही उनके अनुसार्र बिनार् अतीत को आधार्र बनार्ये बेहतर भविष्य क निर्मार्ण नहीं कियार् जार् सकतार् है।

रार्जर्षि टण्डन छार्त्रों को रार्जनीति एवं प्रजार्तार्ंत्रिक जीवन पद्धति की सैद्धार्न्तिक एवं व्यार्वहार्रिक शिक्षार् देनार् चार्हते थे। वे उच्च स्तर पर अरविन्द के दर्शन, विवेकानन्द तथार् रार्मतीर्थ के ग्रन्थ, पतंजलि की विभूति और कैवल्यपार्द के अध्ययन की अनुशंसार् करते हैं।

रार्जर्षि टण्डन बच्चों एवं नवयुवकों के लिए खेल एवं व्यार्यार्म को आवश्यक मार्नते थे। सार्थ ही वे प्रार्कृतिक चिकित्सार् के भी प्रशिक्षण के पक्षधर थे। इस संदर्भ में उनक सिद्धार्न्त थार् ‘‘अस्पतार्लों और शय्यार्ओं की संख्यार् बढ़ार्ने के बदले स्वस्थ जीवन के समुचित सार्धनों को उपलब्ध करार्नार् रार्ष्ट्रीय जीवन के लिए परम आवश्यक है।’’

इन सबके अतिरिक्त वे पूरी शिक्षार् प्रक्रियार् को इस तरह से क्रियार्न्वित करनार् चार्हते थे कि छार्त्रों में नैतिकतार् और सदार्चार्र क विकास हो सके।

रार्जर्षि टण्डन लिखार्वट को शिक्षार् क महत्वपूर्ण अंग मार्नते थे और इस पर बहुत ध्यार्न देते थे। वे न केवल विद्यार्लयों-महार्विद्यार्लयों के विद्याथियों को ही नहीं वरन् अपेक्षार्कृत प्रौढ़ लोगों को भी देवनार्गरी को सही ढ़ंग से लिखने की विधि बतार्यार् करते थे। तेजी से लिखते समय ‘एकार’ एवं ‘ओकार’ की मार्त्रार् को दार्हिनी ओर झुकाने के वे विरोधी थे। वे इन्हें बार्ंयी ओर झुकाने क आग्रह करते थे। टण्डन ‘ए’ के स्थार्न पर ‘ये’ लिखनार् शुद्ध बतार्ते थे। अंग्रेजी शब्दों को अल्प विरार्म के बीच बन्द कर देने यार् रेखार्ंकित कर देने के आग्रही थे।

प्रौढ़ शिक्षार् कार्यक्रम 

रार्जर्षि टण्डन भार्रत को सार्क्षर देखनार् चार्हते थे। वे अपने प्रार्ंत, उत्तरप्रदेश, में प्रौढ़ शिक्षार् के द्वार्रार् निरक्षरतार् को समार्प्त करने के प्रयार्स में व्यक्तिगत रूप से लगे रहे। इस संदर्भ में उनकी भूमिक को ओंकार शरद के लेख ‘एक इस्पार्ती व्यक्तित्व’ के निम्नलिखित अंश से समझार् जार् सकतार् है।

‘‘टण्डन जी संयुक्त प्रार्ंत के स्पीकर थे। पूरे प्रार्ंत भर में उनक सार्क्षरतार् आन्दोलन चल रहार् थार्। यह आन्दोलन उन्हीं क थार्। प्रार्ंत क कोई भी व्यक्ति निरक्षर न रह जार्य- यही उनक सपनार् थार्।

इलार्हार्बार्द में घंटार्घर के नीचे, चौड़ी सड़क पर, एक दिन सुबह-सुबह दोनों ओर पÍियार्ं बिछार् दी गई। और उस पर बैठार्ए गए गरीब, मजदूर, बूढ़े जो निरक्षर थे। उन्हें एक-एक स्लेट दी गई और टण्डन जी उन्हें अक्षर ज्ञार्न करार् रहे थे।

तब हम सब थे उनके सिपार्ही। हजार्रों की संख्यार् में बैठे लोग अक्षर-ज्ञार्न कर रहे थे और टण्डन जी एक सावजनिक शिक्षक बने सबों को ककहरार् सिखार् रहे थे। यह क्रम विभिन्न रूपों में- रार्त्रि पार्ठशार्लार् और सार्मूहिक विद्यार्लय की शक्ल में भी हमलोग बहुत दिनों तक चलार्ते रहे। असंख्य लोग टण्डन जी की प्रेरणार् से सार्क्षर हुए। हजार्रों लोग अंगूठार् टेक के अभिशार्प से मुक्त हुए।’’

रार्जर्षि टण्डन द्वार्रार् स्थार्पित शैक्षिक-सार्मार्जिक संस्स्थार्यें 

रार्जर्षि टण्डन ने अनेक शैक्षिक सार्ंस्कृतिक एवं सार्मार्जिक संस्थार्ओं की स्थार्पनार् की। इनमें से प्रमुख संस्थार्यें हैं-

गौरी पार्ठशार्लार् 

रार्जर्षि टण्डन लड़कियों की शिक्षार् को समार्ज और रार्ष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक मार्नते थे। वे उनको चरित्रवार्न एवं सुसंस्कृत बनार्नार् चार्हते थे तार्कि वे भविष्य में पतिव्रतार् पत्नी एवं योग्य मार्तार् सिद्ध हो सकें। इस उद्देश्य को ध्यार्न में रखते हुए उन्होंने अपने मुहल्ले में महार्मनार् मार्लवीय एवं बार्लकृष्ण भÍ के सहयोग से गौरी पार्ठशार्लार् की स्थार्पनार् की। रार्जर्षि टण्डन इस संस्थार् के अध्यक्ष थे। इस कन्यार् विद्यार्लय के विकास में उनकी पुत्रवधू श्रीमती रार्नी टण्डन ने महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई। यह विद्यार्लय वर्तमार्न में उच्चतर मार्ध् यमिक विद्यार्लय हो गयार् है जिसमें एक हजार्र से भी अधिक लड़कियार्ँ अध्ययन करती हैं।

हिन्दी विद्यार्पीठ 

हिन्दी भार्षार् एवं सार्हित्य में उच्चस्तरीय शिक्षार् की व्यवस्थार् हो सके इसके लिए महेवार्, प्रयार्ग में रार्जर्षि टण्डन ने हिन्दी विद्यार्पीठ की स्थार्पनार् की। इस संदर्भ में प्रसिद्ध कवि हरिवंश रार्य ‘बच्चन’ अपने लेख ‘बार्बू पुरूषोत्तम दार्स टण्डन : एक संस्मरण’ में कहते हैं ‘‘हिन्दी के उच्चकोटि के सार्हित्य क पठन-पार्ठन विधिवत् हो सके, उसके लिए उन्होंने प्रयार्ग में हिन्दी विद्यार्पीठ की स्थार्पनार् की थी। हमें यह नहीं भूलनार् नहीं चार्हिए कि यह वह समय थार् जब हिन्दी को विश्वविद्यार्लयों में प्रवेश की बार्त तो दूर उसे झरोखों से झार्ँकने की भी आज्ञार् नहीं थी। इण्टरमीडिएट में भी नहीं पढ़ार्ई जार्ती थी, उसक सार्हित्य केवल हार्ईस्कूल तक पढ़ार्ने योग्य समझार् जार्तार् थार्।’’ अहिन्दी भार्षी भी हिन्दी को सीख सके इसके लिए रार्जर्षि टण्डन ने डॉ0 काटजू के सहयोग से नैनी में हिन्दी विद्यार्पीठ की स्थार्पनार् की। दक्षिण भार्रत के हिन्दी सीखने वार्ले बहुत सार्रे विद्याथियों के खर्च क वहन वे स्वयं करते थे यार् किसी सहयोगी को इस कार्य के लिए प्रेरित करते थे।

हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन 

जैसार् कि हमलोग देख चुके हैं हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन की स्थार्पनार् 10 अक्टूबर, 1910 को हुई। महार्मनार् मार्लवीय इसके प्रथम अध्यक्ष एवं रार्जर्षि टण्डन मंत्री बने पर सम्मेलन क सार्रार् कार्य टण्डन ही सम्पार्दित करते थे। इस संदर्भ में रार्जर्षि टण्डन के योगदार्न क उल्लेख करते हुए श्री प्रकाश लिखते हैं ‘‘हिन्दी सार्हित्य सम्मेलन के रूप में उन्होंने अपनी अमर कीर्ति छोड़ी है। इसके द्वार्रार् सार्रे देश में सहस्त्रों नर-नार्रियों ने हिन्दी को प्रेम से पढ़ार् और उसकी परीक्षार्ओं में उत्तीर्ण होकर भार्षार् पर काफी अधिकार भी प्रार्प्त कियार्। वह हिन्दी भार्षार् और नार्गरी लिपि क आग्रह करते रहे। अंको के लिए भी उसक अन्तर्रार्ष्ट्रीय रूप लेनार् उन्होंने अस्वीकार कर दियार्।’’

पंजार्ब में हिन्दी पार्ठशार्लार्ओं को सहयोग 

1925 से 1939 तक वे पंजार्ब नेशनल बैंक के मैनेजर के रूप में लार्हौर एवं आगरार् में कार्यरत थे। पंजार्ब में निवार्स के दौरार्न उन्होंने हिन्दी पार्ठशार्लार्ओं की स्थार्पनार् और संचार्लन में गहरी रूचि दिखार्ई। इस दौरार्न वे अपने वेतन क एक भार्ग पंजार्ब में चलार्ई जार् रही हिन्दी पार्ठशार्लार्ओं के लिए खर्च करते थे।

तिलक स्कूल ऑफ पार्लिटिक्स (लोक सेवार् मण्डल) 

1921 में लोकमार्न्य बार्लगंगार्धर तिलक की स्मृति में लार्लार् लार्जपत रार्य ने ‘तिलक स्कूल ऑफ पार्लिटिक्स’ की स्थार्पनार् की। इसक कार्य जनसार्मार्न्य की सेवार् करनार् तथार् भार्रतीयों के मध्य रार्जनीतिक जार्गरूकतार् को बढ़ार्नार् थार्। इस संस्थार् के संचार्लन में रार्जर्षि टण्डन ने महत्वपूर्ण भूमिक निभार्यी। बार्द में इसक नार्म बदलकर ‘लोक सेवार् मंडल’ कर दियार् गयार्। 17 नवम्बर, 1928 को लार्लार् लार्जपत रार्य की मृत्यु हो गई। महार्त्मार् गार्ँधी के आग्रह पर जनवरी, 1929 में रार्जर्षि टण्डन लोक सेवक मण्डल के अध्यक्ष बने। रार्जर्षि टण्डन के नेतृत्व में लार्लार् लार्जपत रार्य स्मार्रक निधि के लिए पार्ँच लार्ख रूपये क संग्रह कियार् गयार्।

इन संस्थार्ओं के अतिरिक्त रार्जर्षि टण्डन ने विभिन्न नगरों में अनेक संस्थार्ओं की स्थार्पनार् की, जैसे कानपुर में व्यार्यार्मशार्लार्, फैजार्बार्द में रार्जनीतिक कान्फ्रेन्स आदि। इलार्हार्बार्द में प्रौढ़ शिक्षार् की व्यार्पक व्यवस्थार् इन्हीं के प्रयार्सों क परिणार्म थार्। रार्जर्षि टण्डन द्वार्रार् स्थार्पित एवं संचार्लित इन संस्थार्ओं से कहीं महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे स्वयं एक संस्थार् थे जिनसे रार्जनेतार्, शिक्षक, सार्हित्कार सभी प्रेरणार् ग्रहण करते थे। प्रसिद्ध सार्हित्यकार मार्खन लार्ल चतुर्वेदी ने उनके बार्रे में यथाथ टिप्पणी की ‘‘ज्ञार्न जब कालार् पड़ने लगतार् है और उद्योग जब शिथिल होने लगतार् है, तब टण्डन जी को देखकर बल मिलतार् है।’’

रार्जर्षि टण्डन की नीतियों एवं कार्यों की आलोचनार् 

अनेक रार्जनीतिज्ञों एवं बुद्धिजीवियों ने रार्जर्षि टण्डन की नीतियों की आलोचनार् की है। हिन्दू संस्कृति क कÍर समर्थक बतार्कर उन्हें सम्प्रदार्यिकतार् के विकास में एक कारक मार्नार् है। पर शार्यद पं0 जवार्हर लार्ल नेहरू एवं उनके समर्थक टण्डन के विचार्रों को सही ढ़ंग से समझ नहीं पार्ये। श्री वियोगी हरि इस संदर्भ में रार्जर्षि टण्डन के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं ‘‘हिन्दू धर्म की चन्द घिसी पिटी मार्न्यतार्ओं यार् परम्परार्ओं पर विश्वार्स करनार्, इसी को बहुतेरे लोग संस्कृति मार्नते हैं। टण्डन जी ऐसे विश्वार्सों से बहुत दूर थे। ‘कल्चर’ शब्द को भी वह संस्कृति के रूप में नहीं लेते थे। जो कृति सम्यक हो, सच्ची हो, दूसरों क उद्वेग करने वार्ली न हो और सब प्रकार से समीचीन हो, सुन्दर हो, उसी को वह भार्रतीय संस्कृति मार्नते थे। वह आक्रमणार्त्मक नहीं, किन्तु समन्वयार्त्मक थे। मगर समन्वय वह, जिसमें न तो तुष्टीकरण होतार् है और न स्वाथ की गंध पार्ई जार्ती है। इसी संस्कृति के टण्डन उपार्सक थे और इसी के पुनरूद्धार्र के लिए वह व्यार्कुल रहते थे।’’

रार्जर्षि टण्डन की दूसरी आलोचनार् हिन्दी के प्रति उनके अत्यधिक लगार्व के कारण की गई है। उन्होंने संविधार्न सभार् में जिस दृढ़तार् से हिन्दी क पक्ष रखार् उसकी अनेक लोग सरार्हनार् नहीं करते हैं। पर इस तथ्य से इंकार नहीं कियार् जार् सकतार् है कि स्वतंत्र रार्ष्ट्र की एक रार्ष्ट्रभार्षार् होनी ही चार्हिए और हिन्दी इसके लिए सबसे उपयुक्त है। रार्जर्षि टण्डन अंग्रेजी के प्रभुत्व के विरूद्ध थे। उनकी मार्न्यतार् हिन्दी को लोकग्रार्ह्य बनार्ने और उसे सार्कार रूप देने में है। रार्जर्षि टण्डन उर्दू के विरोधी नहीं थे। उसे तो वह हिन्दी की ही एक विशिष्ट शैली मार्नते थे। उन्होंने कहार् थार् ‘‘हिन्दी वार्ले अनगिनत अरबी-फार्रसी शब्दों को पचार्ये हुए हैं, पर उर्दू वार्ले अपरिचित और दुरूह शब्दों से अपनी भार्षार् को क्लिष्ट और बोझिल बनार् कर हिन्दी से इसे अलग करते जार् रहे हैं।’’

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि रार्जर्षि टण्डन भार्रत की उन महार्न विभूतियों में गिने जार्ते हैं जिन्होंने देश और समार्ज की नि:स्वाथ सेवार् करनार् ही अपने जीवन क चरम लक्ष्य मार्नार्। उन्होंने देश की सेवार् विभिन्न रूपों में कियार्- रार्जनेतार् के रूप में, समार्ज सेवक के रूप में, सार्हित्यकार के रूप में, पत्रकार के रूप में और अध्यार्पक के रूप में। उनक सम्पूर्ण जीवन भार्रतीयों को प्रेरणार् देतार् रहेगार्।

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