आर्थिक विकास के निर्धार्रक घटक एवं अवस्थार्एं

विश्व के समस्त देशों में आर्थिक वृद्धि हुई है परन्तु उनकी वृद्धि दरें एक दूसरे से भिन्न रहती हैं। वृद्धि दरों में असमार्नतार्एं उनकी विभिन्न आर्थिक, सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक, ऐतिहार्सिक, तकनीकी एवं अन्य स्थितियों के कारण पार्ई जार्ती है। यहीं स्थितियार्ं आर्थिक वृद्धि के कारक हैं। परन्तु इन कारकों क निश्चित रूप से उल्लेख करनार् भी एक समस्यार् है क्योंकि विभिन्न अर्थशार्स्त्रियों ने अपने अपने ढंग से इनको बतार्यार् है। किंडलबर्जर और हैरिक ने भूमि और प्रार्कृतिक सार्धन, भौतिक पूंजी, श्रम और मार्नव पूंजी, संगठन प्रौद्योगिकी, पैमार्ने की बचतें और मण्डी क विस्तार्र, तथार् संरचनार्त्मक परिवर्तन को आर्थिक वृद्धि के कारक मार्ने हैं। रिचर्ड गिल ने जनसंख्यार् वृद्धि, प्रार्कृतिक सार्धन, पूंजी संचय, उत्पार्दन के पैमार्ने में वृद्धि एवं विशििष्टीकरण और तकनीकी प्रगति को आर्थिक वृद्धि के आधार्रभूत कारक बतलार्ए हैं। सार्थ ही लुइस ने आर्थिक वृद्धि के केवल तीन कारक ही महत्वपूर्ण कहे हैं, ये हैं : बचत करने क प्रयत्न, ज्ञार्न की वृद्धि यार् उसक उत्पार्दन में प्रयोग और प्रति व्यक्ति पूंजी अथवार् अन्य सार्धनों की मार्त्रार् में वृद्धि करनार्। परन्तु नक्र्से इन कारकों को अर्थिक वृद्धि के लिए पर्यार्प्त नहीं समझतार्। उसके अनुसार्र, ‘‘आर्थिक वृद्धि बहुत हद तक मार्नवीय गुणों, सार्मार्जिक प्रवृत्तियों, रार्जनैतिक परिस्थितियों और ऐतिहार्सिक संयोगों से संबंध रखती है। वृद्धि के लिए पूंजी अनार्वश्यक तो है परन्तु उसके लिए केवल पूंजी क होनार् ही पर्यार्प्त नहीं है।’’ अत: रार्जनैतिक, ऐतिहार्सिक, सार्मार्जिक तथार् सार्ंस्कृतिक आवश्यकतार्एं आर्थिक वृद्धि के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि आर्थिक आवश्यकतार्एं।

आर्थिक विकास को निर्धार्रित करने वार्ले कारक

प्रत्येक देश के आर्थिक विकास की पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे तत्व विद्यमार्न होते हैं जिन पर उस देश क आर्थिक विकास निर्भर करतार् है। आमतौर से इन तत्वों क वर्गीकरण दो प्रकार से कियार् जार्तार् है-(अ) प्रधार्न चार्लक तत्व एवं अनुपूरक तत्व (ब) आर्थिक एवं गैर आर्थिक तत्व।प्रधार्न चार्लक अथवार् प्रार्थमिक तत्व वे तत्व होते हैं जो उस देश के आर्थिक विकास के कार्य को प्रार्रम्भ करते हैं। विकास की नींव वार्स्तव में इन्हीं तत्वों पर रखी जार्ती है। प्रधार्न चार्लक तत्वों के मार्ध्यम से जब विकास की प्रक्रियार् आरम्भ हो जार्ती है तो कुछ अन्य तत्व इनको तीव्रतार् प्रदार्न करते हैं। वार्स्तव में इन्हें ही अनुपूरक अथवार् गौण अथवार् सहार्यक तत्व कहार् जार्तार् है। इस प्रकार प्रार्थमिक तत्व विकास की आधार्रशिलार् हैं जबकि अनुपूरक तत्व, आर्थिक विकास को गति प्रदार्न करते हैं और इसे बनार्ये रखने में सहार्यक सिद्ध होते हैं।

प्रधार्न चार्लक तत्वों में प्रार्कृतिक सार्धन मार्नवीय सार्धन, कौशल निर्मार्ण तथार् सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक व संस्थार्गत तत्वों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। इसके विपरीत अनुपूरक तत्वों में 1. जनसंख्यार् वृद्धि, 2. प्रार्विधिक विकास की दर, और 3. पूंजी निर्मार्ण की दर मुख्य हैं। प्रधार्न चार्लक और अनुपूरक तत्वों के सार्पेक्षिक महत्व, वर्गीकरण व स्वरूपों के सम्बन्ध में अर्थशार्स्त्रियोंं में काफी मतभेद पार्यार् जार्तार् है। कुछ लोग प्रधार्न चार्लक तत्वों को महत्व प्रदार्न करते हैं। तो कुछ लोग सहार्यक तत्वों को।

प्रो0 हैरोड एवं डोमर ने आर्थिक विकास के चार्र सहार्यक तत्व मार्ने हैं – 1. जनसंख्यार् वृद्धि की दर, 2. औद्योगिक विकास की दर, 3. पूंजी उत्पार्द अनुपार्त, 4. बचत व आय क अनुपार्त।

श्रीमती जॉन रार्बिन्सन क मत है कि ‘‘आर्थिक विकास एक स्वत: प्रार्रम्भ होने वार्ली प्रक्रियार् है इसलिये प्रार्थमिक तत्वों के विपरीत, अनुपूरक तत्वों को अधिक महत्व दियार् जार्नार् चार्हिए क्योंकि विकास को अन्तिम रूप देने क उत्तरदार्यित्व इन्हीं तत्वों पर होतार् है।’’ उनकी दृष्टि में जनसंख्यार् एवं उत्पार्दन की दर क अनुपार्त और पूंजी निर्मार्ण की दर, दो सहार्यक तत्व आर्थिक विकास के लिये अत्यन्त आवश्यक है।

प्रो0 शुम्पीटर ने ‘नव प्रवर्तन’ को आर्थिक विकास क आवश्यक तत्व मार्नार् है। नव प्रवर्तन से उनक अभिप्रार्य – 1. उत्पार्दन की विकसित तकनीकी क सूत्रपार्त, 2. नई वस्तुओं क उत्पार्दन,3.नये बार्जार्रों क उपलब्ध होनार्, 4. उद्योगों में संगठन के नूतन स्वरूप तथार् नये सार्धनों में प्रयोग आदि से है।

प्रो0 डब्ल्यू0 डब्ल्यू0 रोस्टोव – ने आर्थिक विकास को प्रभार्वित करने वार्ले दो महत्वपूर्ण गतिशील तत्वों – पूंजी संचयन एवं श्रम-शक्ति की ओर संकेत कियार् है। उनक कहनार् है कि इन दो तत्वों को निम्नलिखत छ: प्रवृत्तियार्ं प्रभार्वित करती हे – 1. आधार्रभूत विज्ञार्न को विकसित करने की प्रवृत्ति, 2. आर्थिक उद्देश्यों में विज्ञार्न को लार्गू करने की प्रवृत्ति, 3. नवीन प्रवर्तनों की खोज व उन्हें लार्गू करने की प्रवृत्ति, 4. भौतिक प्रगति करने की प्रवृत्ति, 5. उपभोग वृत्ति तथार् 6. सन्तार्न उत्पन्न करने की इच्छार्।

प्रो0 रिचाड टी0 गिल – के अनुसार्र आर्थिक विकास को प्रभार्वित करने वार्ले मुख्य तत्व हैं-1.जनसंख्यार् वृद्धि,2. प्रार्कृतिक सार्धन, 3. पूंजी संचय, 4. उत्पार्दन में विशिष्टीकरण, 5. तकनीकी प्रगति। प्रो0 मार्यर एवं बार्ल्डविन क मत है कि यद्यपि आर्थिक विकास को बनार्ये रखने के लिये वार्ंछित निर्धार्रक आर्थिक तत्वों की एक लम्बी सूची तैयार्र की जार् सकती है, परन्तु वार्स्तविक रूप से इन्हें निम्न चार्र शीर्षकों में रखनार् अधिक उचित होगार् :- 1. तकनीकी प्रगति एवं पूंजी संचय, 2.प्रार्कृतिक सार्धन, 3. जनसंख्यार्, 4. सार्धनों क लचीलार्पन।

आर्थिक एवं गैर आर्थिक तत्व

उपरोक्त वर्गीकरण के अलार्वार्, निर्धार्रक तत्वों को आर्थिक एवं गैर आर्थिक आधार्र पर भी वर्गीकृत कियार् गयार् है। आर्थिक तथार् गैर आर्थिक तत्वों की सूची इस प्रकार है :-

आर्थिक विकास के निर्धार्रक तत्व

आर्थिक तत्व 

  1. प्रार्कृतिक सार्धन 
  2. मार्नवीय सार्धन 
  3. पूंजी संचय अथवार् पूंजी निर्मार्ण 
  4. उद्यमशीलतार्
  5. तकनीकी प्रगति एवं नव प्रवर्तन
  6. विदेशी पूंजी

गैर आर्थिक तत्व

  1. सार्मार्जिक एवं संस्थार्गत तत्व
  2. स्थित एवं कुशल प्रशार्सन
  3. अन्तर्रार्ष्ट्रीय दशार्यें

आर्थिक कारक एवं आर्थिक विकास

किसी देश की आर्थिक विकास को निर्धार्रित करने वार्ले आर्थिक तत्व निम्नलिखित कहे जार् सकते हैं :-

प्रार्कृतिक सार्धन

प्रार्कृतिक सार्धनों से हमार्रार् अभिप्रार्य उन सभी भौतिक अथवार् नैसर्गिक सार्धनों से है जो प्रकृति की ओर से एक देश को उपहार्र स्वरूप प्रार्प्त होते हैं। किसी देश में उपलब्ध होने वार्ली भूमि, खनिज पदाथ, जल सम्पदार्, वन सम्पत्ति, वर्षार् एवं जलवार्यु, भौगोलिक स्थिति और प्रार्कृतिक बन्दरगार्ह उस देश के प्रार्कृतिक सार्धन मार्ने जार्येंगे। यह प्रार्कृतिक सार्धन देश के आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिक अदार् करते हैं। आमतौर से यह बार्त स्वीकार की जार् चुकी है कि अन्य बार्तों के समार्न रहने पर जिस देश के प्रार्कृतिक सार्धन जितने अधिक होंगे, उस देश क आर्थिक विकास उतनार् ही शीघ्र एवं अधिक होगार्। आर्थिक विकास की दृष्टि से प्रार्कृतिक सार्धनों के महत्व को स्पष्ट करते हुए रिचाड डी गिल ने लिखार् है :-

‘जनसंख्यार् एवं श्रम की पूर्ति की भार्ंति प्रार्कृतिक सार्धन भी एक देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिक अदार् करते हैं। उपजार्ऊ भूमि और जल के अभार्व में कृषि क विधिवत विकास नहीं हो पार्तार्। लोहार्, कोयलार् व अन्य खनिज सम्पदार् के न होने पर तीव्र औद्योगीकरण क स्वप्न अधूरार् ही बनार् रहतार् है। जलवार्यु और भौगोलिक परिस्थितियों की प्रतिकूलतार् के कारण आर्थिक क्रियार्ओं के विस्तार्र में अवरोध उत्पन्न होते हैं। वार्स्तव में प्रार्कृतिक सार्धनों क किसी देश के आर्थिक विकास को सीमित करने अथवार् प्रोत्सार्हित करने में एक निर्णार्यक स्थार्न होतार् है।’’

प्रार्कृतिक सार्धनों के बार्रे में दो बार्तों को दृष्टि में रखनार् आवश्यक है प्रथम, प्रकृति-दत्त सार्धन सदैव के लिये सीमित व निश्चित होते हैं, मार्नवीय प्रयत्नों से उन्हें खोजार् तो जार् सकतार् है परन्तु उनक नव निर्मार्ण नहीं कियार् जार् सकतार्। गिल महोदय क भी कहनार् है कि ‘‘ जनसंख्यार् बढ़ सकती है, उपकरणों, मशीनों तथार् फैक्ट्ररियों क निर्मार्ण कियार् जार् सकतार् है। किन्तु हमें प्रकृति द्वार्रार् दिये गए प्रार्कृतिक उपहार्र (सार्धन) सदैव के लिए सीमित एवं निश्चित होते हैं।’’

द्वितीय, यह सोच लेनार् एक भयंकर भूल होगी कि जिस देश में जितने अधिक प्रार्कृतिक सार्धन होंगे, उस देश क विकास उतनार् ही अधिक होगार्। आर्थिक विकास के लिये प्रार्कृतिक सार्धनों की केवल बार्हुल्यतार् ही पर्यार्प्त नहीं है बल्कि उनक उचित ढंग से विदोहन कियार् जार्नार् अधिक आवश्यक है।

उदार्हरण के लिए स्विटजरलैंड तथार् जार्पार्न के प्रार्कृतिक सार्धन कम होते हुए भी आज वे विश्व के सर्वार्धिक विकसित रार्ष्ट्र मार्ने जार्ते हैं। भार्रत के सम्बन्ध में कहार् जार्ने वार्लार् यह वार्क्य आज भी इस दृष्टि से अडिग है कि – ‘‘भार्रत एक धनी देश है जहार्ं निर्धन वार्स करते हैं।’’

मार्नवीय सार्धन

मार्नवीय सार्धनों से हमार्रार् अभिप्रार्य किसी देश में निवार्स करने वार्ली जनसंख्यार् से है। श्रम, प्रार्चीन काल से ही उत्पार्दन क एक महत्वपूर्ण एवं सक्रिय सार्धन मार्नार् जार्तार् है। प्रसिद्ध अर्थशार्स्त्री एडम स्मिथ क कहनार् थार् कि ‘‘प्रत्येक देश क वाषिक श्रम वह कोष है जो मूल रूप से जीवन की अनिवायतार्ओं व सुविधार्ओं की पूर्ति करतार् है।’’ मार्नवीय श्रम ही वह शक्ति है जिस पर देश क आर्थिक विकास निर्भर करतार् है।’’ प्रार्य: यह कहार् जार्तार् है कि जनसंख्यार् वृद्धि आर्थिक विकास की पूर्व आवश्यकतार् है लेकिन तीव्र गति से होने वार्ली जनसंख्यार् क बढ़नार् तभी तक श्रेष्ठकर मार्नार् जार्येगार् जब तक कि उनक प्रति-व्यक्ति उत्पार्दन पर कोई विपरीत प्रभार्व न पड़ने पार्ये। दूसरे शब्दों में देश की जनसंख्यार् व उसक आकार, वृद्धि दर, संरचनार्, विभिन्न व्यवसार्यों में वितरण व कार्यक्षमतार् आदि क उस देश के आर्थिक विकास पर अत्यन्त गहरार् प्रभार्व पड़तार् है।यहॉ आपको स्पष्ट रूप से यह बतार्नार् है कि किसी देश की वार्स्तविक सम्पत्ति उस देश की भूमि यार् पार्नी में नहीं, वनों यार् खार्नों में नहीं, पक्षियों यार् पशुओं के झुण्डों में नहीं, और न ही डार्लरों के ढेर में आंकी जार्ती है बल्कि उस देश के स्वस्थ, सम्पन्न व सुखी पुरूषों, स्त्रियों एवं बच्चों में निहित है।’’

अत: आवश्यकतार् इस बार्त की है कि आर्थिक विकास के लिये मार्नवीय शक्ति क सही ढंग से उपयोग करने हेतु 1. जनार्धिक्य पर नियंत्रण लगार्यार् जार्ये, 2. श्रम शक्ति में उत्पार्दकतार् एवं गतिशीलतार् बढ़ार्ते हुए उसके दृष्टिकोण में परितर्वन कियार् जार्ये तार्कि उसमें श्रम-गौरव की भार्वनार् आ सके तथार् 3. मार्नवीय पूंजी निर्मार्ण पर बल दियार् जार्ये। मेयर्स के अनुसार्र मार्नवीय पूंजी निर्मार्ण से हमार्रार् आशय ‘देश की जनसंख्यार् उसके आर्थिक विकास की आवश्यकतार्ओं के अनुरूप है और उसके निवार्सी विवेकशील, चरित्रवार्न, स्वस्थ, परिश्रमी, शिक्षित व कार्यदक्ष हैं तो नि:सन्देह अन्य बार्तों के समार्न रहने पर, उस देश क आर्थिक विकास अधिक होतार् है। प्रो0 रिचाड टी0 गिल क कहनार् है कि :- ‘‘आर्थिक विकास एक यार्ंत्रिक प्रक्रियार् मार्त्र ही नहीं, वरन् अन्तिम रूप से यह एक मार्नवीय उपक्रम है। अन्य मार्नवीय उपक्रमों की भार्ंति इसक परिणार्म, सही अर्थों में, इसको संचार्लित करने वार्ले जन समुदार्यों की कुशलतार्, गुणों व प्रवृत्तियों पर निर्भर करतार् है।’’

इसमें कोई संदेह नहीं कि जहार्ं विकसित देशों के आर्थिक विकास में जनसंख्यार् व उसकी क्रमिक वृद्धि क एक महत्वपूर्ण योगदार्न रहार् है, वहार्ं अल्प विकसित देशों के अवरूद्ध आर्थिक विकास क एक मार्त्र कारण जनसंख्यार् की तीव्र वृद्धि ने विश्व के अधिकांश पिछड़े हुए देशों के लिए एक गम्भीर समस्यार् उत्पन्न कर दी है। अवार्ंछित रूप से बढ़ती हुई जनसंख्यार् के कारण भूमि तथार् यंत्रों पर दबार्व बढ़ने लगतार् है, प्रति व्यक्ति आय, बचतों तथार् पूंजी निर्मार्ण की दरों में कमी आती है, उत्पार्दकतार् मे ह्रार्स होतार् है, प्रति व्यक्ति पूंजीगत सार्धनों क अभार्व होने लगतार् है, बेरोजगार्री बढ़ती है एवं जीवन स्तर में कमी आने लगती है और इस प्रकार आर्थिक विकास के अंतर्गत प्रार्प्त उपलब्धियार्ं स्वत: ही समार्प्त हो जार्ती हैं।

पूंजी संचय

प्रो0 कुजनेट्स के शब्दों में, ‘‘पूंजी व पूंजी क संचय आर्थिक विकास की एक अनिवाय आवश्यकतार् है।’’ जब तक देश में पर्यार्प्त मार्त्रार् में पूंजी व पूंजी निर्मार्ण नहीं होगार् तब तक आर्थिक विकास क लक्ष्य पूरार् नहीं हो सकतार् है। प्रो0 नर्कसे क कहनार् है कि ‘‘पूंजी निर्मार्ण आर्थिक विकास की एक पूर्व आवश्यकतार् है।’’ देश के आर्थिक विकास के लिये एक बड़ी मार्त्रार् में पूंजी व पूंजीगत वस्तुओं जैसे भवन, कल-कारखार्ने, मशीनें, यन्त्र व उपकरण, बार्ंध, नहरें, रेलें, सड़कें, कच्चार् मार्ल व ईंधन की आवश्यकतार् होती है। जिस देश के पार्स यह सार्धन जितने अधिक होंगे, अन्य बार्तें समार्न रहने पर उसक आर्थिक विकास उतनार् ही अधिक होगार्। आज विकसित कहे जार्ने वार्ले रार्ष्ट्रों की प्रगति क मुख्य कारण, इन देशों में पूंजी निर्मार्ण की ऊंची दर क पार्यार् जार्नार् है जबकि अल्प विकसित देशों में पूंजी निर्मार्ण की धीमी दर के कारण उनक आर्थिक विकास आज भी अवरूद्ध अवस्थार् में पड़ार् हुआ है। सत्यतार् तो यह है कि पूंजी क संचय, वर्तमार्न समय में, अमीर-गरीब के बीच पार्ये जार्ने वार्ले अन्तर क कारण व प्रतीक है, यह निर्धन देशों को धनवार्न बनार्ने की एक कलार् है और विश्व के पिछड़े हुए देशों के विगत इतिहार्स के विपरीत, आज के इस औद्योगिक युग क सूत्रपार्त करने वार्ले कारकों में से एक प्रमुख कारक है।

तकनीकी प्रगति एवं नव-प्रवर्तन

प्रसिद्ध अर्थशार्स्त्री प्रो0. शुम्पीटर क कहनार् है कि विकास की सर्वार्धिक महत्वपूर्ण घटक तकनीकी प्रगति एवं नव-प्रवर्तनों को अपनार्यार् जार्नार् है। तकनीकी ज्ञार्न की प्रगति को ऐसे नये ज्ञार्न के रूप में परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है जिसके कारण यार् तो वर्तमार्न वस्तुएं कम लार्गत पर उत्पन्न की जार् सकें अथवार् जिनके फलस्वरूप नई वस्तुओं क उत्पार्दन सम्भव कियार् जार् सके।’’ तकनीकी ज्ञार्न उत्पार्दन की विधियों में मौलिक परिवर्तन लार्कर आर्थिक विकास के कार्य को गति प्रदार्न करतार् है। विकसित देशों की विकास वृद्धि की दर, बुनियार्दी रूप से उनके द्वार्रार् की गई तकनीकी व नव प्रवर्तनों की खोज पर आधार्रित रहती है। इसके विपरीत अल्प विकसित देशों में तकनीकी ज्ञार्न के अभार्व में उत्पार्दन की पुरार्नी व अवैज्ञार्निक विधियों क प्रयोग कियार् जार्तार् है जिसके फलस्वरूप इनक आर्थिक विकास आज भी पिछड़ी हुई अवस्थार् में है।

प्रो0 रिचाड टी0 गिल क कहनार् है कि ‘‘आर्थिक विकास अपने लिये महत्वपूर्ण पौष्टिकतार् वस्तुत:, नये विचार्रों, तकनीकी आविष्कारों व उत्पार्दन विधियों के स्रोतों से प्रार्प्त करतार् है, जिनके अभार्व में, अन्य सार्धन कितने ही विकसित क्यों न हों, आर्थिक विकास क प्रार्प्त करनार् असम्भव ही बनार् रहतार् है।’’ ध्यार्न रहे, तकनीकी प्रगति, नवीन प्रवर्तनों के अपनार्ए जार्ने पर ही निर्भर करती है। एक देश में तकनीकी प्रगति के लिये प्रो0 गिल ने चार्र तत्वों क होनार् आवश्यक बतार्यार् है – 1. विज्ञार्न की प्रगति यार् वैज्ञार्निक अभिरूचि 2 समार्ज में शिक्षार् क ऊंचार् स्तर, 3. नव प्रवर्तनों को व्यार्वहार्रिक रूप देनार् तथार् 4. उद्यमशीलतार्।

उद्यमशीलतार्

नये आविष्कार, तकनीकी ज्ञार्न व नई खोजों क आर्थिक विकास की दृष्टि से तब तक कोई महत्व नहीं जब तक कि उन्हें व्यार्वहार्रिक रूप प्रदार्न न कर दियार् जार्ये – और यह काम समार्ज के सार्हसी वर्ग को करनार् होतार् है। प्रो0 गिल क कहनार् है कि ‘‘तकनीकी ज्ञार्न आर्थिक दृष्टि से तभी उपयोगी हो सकतार् है जब उसे नव प्रवर्तन के रूप में प्रयोग कियार् जार्ये और जिसकी पहल समार्ज के सार्हसी वर्ग द्वार्रार् की जार्ती है।’’ वार्स्तव में, किसी देश क आर्थिक विकास विशेष रूप से इस बार्त पर निर्भर करतार् है कि उस देश में किस प्रकार के सार्हसी हैं ? वे नये आविष्कारों व विकसित तकनीकों क किस सीमार् तक प्रयोग करते हैं ? और उनके उत्पार्दन के क्षेत्र में विकास और सुधार्र करने की कितनी प्रबल इच्छार् है ? आर्थिक विकास तकनीकी प्रगति व नव प्रवर्तनों पर निर्भर करतार् है, नव प्रवर्तनों के लिए उद्यमशीलतार् की आवश्यकतार् होती है, उद्यमशीलतार् के लिए जोखिम उठार्नी पड़ती है और जोखिम सफलतार् क दूसरार् नार्म है।

श्री यार्ले ब्रार्जन के अनुसार्र, ‘ न तो आविष्कार की योग्यतार् और न केवल आविष्कार ही आर्थिक विकास को संभव बनार्ते हैं बल्कि यह तो, उन्हें कार्यरूप में परिणित करने की प्रबल इच्छार् व जोखिम उठार्ने की क्षमतार् पर निर्भर करतार् है।’’ प्रो0 शुम्पीटर ने अपने आर्थिक विकास के सिद्धार्न्त में नव प्रवर्तनों के रूप में सार्हसियों को केन्द्रीय स्थार्न देते हुए इन्हें आर्थिक विकास की संचार्लन शक्ति मार्नार् है। वार्स्तव में, आर्थिक विकास वैदिक काल से ही उद्यमशीलतार् के सार्थ सम्बन्धित रहार् है और उद्यमकर्तार् को उन व्यक्तियों के रूप में परिभार्षित कियार् जार्तार् है जो ‘नये दृष्टिकोणों’’ व ‘नये संयोगों’ क सृजन करते हैं। प्रो0 बोल्डिंग क मत है कि आर्थिक प्रगति को विभिन्न समस्यार्ओं में से मुख्य समस्यार् समार्ज के एक वर्ग विशेष को ‘नव प्रवर्तकों’ क रूप देने की होती है।

विकसित देशों की आर्थिक प्रगति क मुख्य कारण, इन देशों में सार्हसियों क पर्यार्प्त मार्त्रार् में उपलब्ध होनार् ही रहार् है। जबकि इसके विपरीत पिछड़े हुए देशों में ‘शर्मीली पूंजी’, उद्यमशीलतार् क अभार्व व जोखिम उठार्ने की क्षमतार् न होने के कारण, इन देशों क आर्थिक विकास संभव नहीं हो सका। आजकल अल्प विकसित देशों में नव प्रवर्तकों की भूमिक सरकार द्वार्रार् अदार् की जार्ती है। इसक कारण यह है कि एक तो निजी उद्यमकर्तार्ओं क अभार्व और दूसरार् विकास कार्यों पर, उत्पार्दन की नई तकनीकों के अंतर्गत विशार्ल धनरार्शि को विनियोग करनार् पड़तार् है जो कि व्यक्तिगत प्रयत्नों से संभव नहीं हो पार्तार्।

विदेशी पूंजी

अल्प विकसित देश के आर्थिक विकास क एक अन्य निर्धार्रक तत्व विदेशी पूंजी है। विदेशी पूंजी के प्रयोग के अभार्व में कोई भी अल्प विकसित देश आर्थिक विकास नहीं कर सकतार्। इसक कारण यह है कि अल्प विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के कम होने के कारण घरेलू बचत की दर काफी कम होती है। लोगों क जीवन स्तर इतनार् नीचार् होतार् है कि उनके द्वार्रार् बचत करनार् संभव नहीं हो पार्तार्। फलत: घरेलू बचत की इस कमी को विदेशी पूंजी के आयार्त द्वार्रार् पूरार् कियार् जार् सकतार् है। विदेशी पूंजी के आयार्त क सबसे बड़ार् लार्भ यह होतार् है कि यह अपने सार्थ तकनीकी ज्ञार्न व पूंजीगत उपकरणों को भी लार्ती है। जिनक पिछड़े हुए देशों में सर्वथार् अभार्व होतार् है। इस प्रकार पूंजी व विकसित तकनीकी के उपलब्ध हो जार्ने पर अल्प विकसित देशों में तकनीकी स्तर को ऊंचार् करके प्रति व्यक्ति उत्पार्दकतार् को बढ़ार्यार् जार् सकतार् है। संक्षेप में, अल्प विकसित देशों में विदेशी पूंजी क प्रयोग विकास परियोजनार् योजनार्ओं को चार्लू करनार् ; कच्ची सार्मग्री, मशीनें व उपकरणों क आयार्त करने ; उत्पार्दन स्तर को बनार्ये रखने ; तथार् आवश्यक वस्तुओं क आयार्त करके मुद्रार्-स्फीति क सार्मनार् करने में सहार्यक सिद्ध होती है।

अनाथिक कारक एवं आर्थिक विकास

आर्थिक विकास के गैर आर्थिक तत्व इस प्रकार है :-

सार्मार्जिक तथार् संस्थार्गत तत्व

मार्यर एवं बार्ल्डविन के अनुसार्र ‘आर्थिक विकास के मनोवैज्ञार्निक व सार्मार्जिक आवश्यकतार्ओं क होनार् उसी प्रकार जरूरी है जिस प्रकार आर्थिक आवश्यकतार्ओं का’ इसक कारण यह है कि रार्ष्ट्रीय विनियोग नीति पर रार्जनीतिक, सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक, धामिक व आर्थिक प्रवृत्तियों क संयुक्त प्रभार्व पड़तार् है। किसी देश क आर्थिक विकास मूल रूप से इस बार्त पर निर्भर करतार् है कि लोगों में नूतन मूल्यों व संस्थार्ओं केार् अपनार्ने की कितनी प्रबल इच्छार् है। वार्स्तव में गैर आर्थिक तत्वों के रूप में यह सार्मार्जिक, मनौवैज्ञार्निक व संस्थार्गत तत्व, आर्थिक विकास की उत्पे्ररक शक्तियार्ं हैं। प्रो0 रार्गनर नर्कसे क कहनार् है कि ‘आर्थिक विकास क मार्नवीय मूल्यों, सार्मार्जिक प्रवृत्तियों, रार्जनैतिक दशार्ओं तथार् ऐतिहार्सिक घटनार्ओं से एक घनिष्ट सम्बन्ध रहार् है।

संयुक्त रार्ष्ट्र संघ – की प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार्र ‘‘एक उपयुक्त वार्तार्वरण की अनुपस्थिति में आर्थिक प्रगति असम्भव है। आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि लोगों में प्रगति की प्रबल इच्छार् हो, वे उसके लिये हर सम्भव त्यार्ग करने को तत्पर हों, वे अपने आपको नये विचार्रों के अनुकूल ढार्लने के लिए जार्गरूक हों और उनकी सार्मार्जिक, आर्थिक, रार्जनीतिक व वैधार्निक संस्थार्यें इन इच्छार्ओं को कार्यरूप में परिणित करने में सहार्यक हों।’ प्रो0 पार्ल अलबर्ट क कहनार् है कि आर्थिक विकास के लिये समार्ज व अर्थव्यवस्थार् की संरचनार्, वार्ंछित परिवर्तनों की सम्भार्वनार्ओं की दृष्टि से खुली होनी चार्हिए। अल्प विकसित देशों के आर्थिक पिछड़ेपन क मुख्य कारण, वार्स्तव में ये सार्मार्जिक व संस्थार्गत तत्व ही रहे हैं। इन देशों में जार्ति-प्रथार्, छूआ छूत, संयुक्त परिवार्र प्रणार्ली, उत्तरार्धिकार के नियम, भू-धार्रण की दोषपूर्ण व्यवस्थार्, भूमि व सम्पत्ति के प्रति मोह, अन्ध विश्वार्स, रूढ़िवार्दितार्, धामिक पार्खण्ड, परिवर्तन के प्रति विरक्ति और उसक विरोध, सार्मार्जिक अपव्यय तथार् झूठी शार्न शौकत जैसे तत्वों ने आर्थिक विकास के माग पर सदैव बार्धार्यें उत्पन्न की हैं। इन देशों क आर्थिक विकास तब तक सम्भव नहीं हो सकतार्, जब तक कि इन सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक व धामिक संस्थार्ओं क नये सिरे से नव निर्मार्ण न कर दियार् जार्ये। अत: इस दृष्टि से आवश्यक है कि लोगों की रूढ़िवार्दी धार्रणार्ओं को परिवर्तित कियार् जार्ए, उनमें भौतिक दृष्टिकोण पैदार् कियार् जार्ए और शिक्षार् क विस्तार्र कियार् जार्ए तार्कि ये लोग अपने आपको नये विचार्रों के अनुकूल ढार्ल सकें।

स्थिर तथार् कुशल प्रशार्सन

किसी देश क आर्थिक विकास बहुत एक सीमार् तक उस देश के स्थिर व कुशल प्रशार्सन पर भी निर्भर करतार् है। यदि देश में शार्न्ति और सुरक्षार् पार्यी जार्ती है तथार् न्यार्य की उचित व्यवस्थार् है तो लोगों में काम करने तथार् बचत करने की इच्छार् पैदार् होगी और फलस्वरूप आर्थिक विकास को बढ़ार्वार् मिलेगार्। इसके विपरीत यदि देश में रार्जनैतिक अस्थिरतार् है अर्थार्त् सरकारें बार्र-बार्र बदलती रहती हैं तथार् आन्तरिक क्षेत्र में अशार्न्ति क वार्तार्वरण व्यार्प्त है तो इससे विनियोग सम्बन्धी निर्णयों पर बुरार् प्रभार्व पड़ेगार्। पूंजी क विनियोग देश मे कम होगार्, जोखिम उठार्ने के लिये लोग तैयार्र नहीं होंगे तथार् विदेशी पूंजी देश में आने के लिए तैयार्र नहीं हो पार्येगी और फलस्वरूप देश क आर्थिक विकास पिछड़ जार्येगार्। इतनार् ही नहीं, सरकार की स्वयं विकास के प्रति रूचि क होनार् भी जरूरी है, अन्यथार् उसके अभार्व में आर्थिक विकास क श्रीगणेश भी नहीं हो सकेगार्।

सरकार की कुशल प्रशार्सन व्यवस्थार् और उसके कर्मचार्रियों में निपुणतार्, ईमार्नदार्री एवं उत्तरदार्यित्व की भार्वनार् आर्थिक विकास की पहली शर्त है। प्रशार्सनिक व्यवस्थार् के सुचार्रू व सुदृढ़ होने पर जन सहयोग बढ़तार् है विकास कार्यक्रम सफल होते हैं और नीतियों क निर्धार्रण व उनक निष्पार्दन सरलतार् के सार्थ सम्भव हो जार्तार् है। प्रो0 डब्लू आर्थर लुइस क मत है कि ‘‘कोई भी देश रार्जकीय सहयोग व उसक सक्रिय प्रोत्सार्हन पार्ये बिनार्, आज तक आर्थिक विकास नहीं कर सक है। यह कथन अपने में आज भी सत्य है और भविष्य के लिये भी सत्य है और अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार्ओं के लिये तो यह विशेष रूप से कटु सत्य मार्नार् जार्एगार्।’’

अन्तर्रार्ष्ट्रीय परिस्थितियार्ं

आर्थिक विकास के लिये अन्तर्रार्ष्ट्रीय परिस्थितियों क अनुकूलन होनार् भी आवश्यक है। विश्व मंच पर रार्जनैतिक शार्न्ति बने रहने पर ही विकास व नव निर्मार्ण कार्य संभव हो सकते हैं। अशार्न्ति और युद्धों की धधकती ज्वार्लार् में विकासार्त्मक नहीं, वरन् विध्वंसार्त्मक प्रवृत्तियार्ं जन्म लेती हैं। रार्जनैतिक शार्न्ति के अलार्वार् विष्व के देशों में सद्भार्वनार्, सहयोग व वित्तीय सहार्यतार् क उपलब्ध होनार् भी अत्यार्वश्यक है। अल्प विकसित देशों में पूंजी व पूंजीगत सार्मार्न, भार्री मशीनें तथार् तकनीकी ज्ञार्न क सर्वथार् अभार्व होतार् है। इन सभी आवश्यकतार्ओं की आपूर्ति विकसित रार्ष्ट्रों द्वार्रार् जब तक नहीं की जार्येगी, तब तक इन देशों क आर्थिक विकास अवरूद्ध बनार् रहेगार्। विकसित देश अनुदार्न, ऋ़ण, प्रत्यक्ष विनियोग और तकनीकी सहार्यतार् आदि के रूप में इन देशों को आर्थिक सहयोग दे सकते हैं। संक्षेप में रार्जनीतिक स्थिरतार्, विकसित देशों की नीति, पड़ोसी देशों क रूख, विदेशी व्यार्पार्र की सम्भार्वनार्ओं और विदेशी पूंजी क अन्तपर््रवार्ह आदि तत्व आर्थिक विकास को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में प्रभार्वित करते है।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि किसी देश क आर्थिक विकास अनेक तत्वों पर निर्भर करतार् है। वस्तुत: यह कहनार् कि कौन सार् तत्व अधिक महत्वपूर्ण है, अत्यन्त कठिन है। आर्थिक विकास की प्रक्रियार् में इन सभी निर्धार्रक तत्वों क अपनार् एक विशेष स्थार्न है इसलिये उनके सार्पेक्षिक योगदार्न एवं महत्व के बार्रे में कुछ भी कहनार् न तो सम्भव ही है और न ही तर्कपूर्ण।

आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

आर्थिक विकास एक क्रमिक प्रक्रियार् है। जिस प्रकार मार्नव के विकास क आदिम इतिहार्स इस तथ्य को स्पष्ट करतार् है कि मनुष्य जन्म के समय शिशु, शिशु से किशोर, किशोर से तरूण और फिर जवार्नी की दहलीज पार्र करते हुए वृद्धार्वस्थार् की ओर अग्रसर होतार् है, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक देश को अपने पिछड़ेपन से विकास की चरम सीमार् तक पहुंचने के लिए अनेक अवस्थार्ओं से होकर गुजरनार् पड़तार् है। क्रमिक विकास की यह व्यवस्थार्, अपने में ही इतनी अधिक सावभौमिक है कि वर्तमार्न समय में विकसित कहे जार्ने वार्ले देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रार्ंस व जार्पार्न आदि को भी सम्पन्नतार् की मन्जिल पर पहुंचने के लिये अनेक पड़ार्वों को पार्र करनार् पड़ार् है। हार्ं ! यह सम्भव हो सकतार् है कि कोई देश अपने सक्रिय प्रयत्नों के फलस्वरूप विकास की प्रत्येक अवस्थार् में पड़े रहने की अवधि को कम कर लें, परन्तु यह नार्मुमकिन है कि उसने विकास की प्रत्येक अवस्थार् की परिधि को छुआ न हो।

प्रो0 रिचाड टी0 गिल क कहनार् है कि ‘अर्थव्यवस्थार्ओं के आर्थिक विकास की विभिन्न अवस्थार्ओं की खोज, इंग्लैण्ड की महार्न औद्योगिक क्रार्ंति के काल से ही प्रार्रम्भ की जार् चुकी है। आर्थिक विकास की अवस्थार्ओं के इस दृष्टिकोण ने, जो कि सैद्धार्न्तिक की बजार्य वर्णार्त्मक अधिक है, विकास प्रक्रियार् को अनेक अवस्थार्ओं में वर्गीकृत करने क प्रयार्स कियार् है जिसमें से सभी देशों को अपने स्वार्भार्विक आर्थिक उद्गम व विकास के लिए होकर गुजरनार् पड़ेगार् है।’’

अवस्थार्एं सम्बन्धी मतभेद

अनेक अर्थशार्स्त्रियों ने आर्थिक विकास के ऐतिहार्सिक क्रम को भिन्न-भिन्न अवस्थार्ओं में विभार्जित करने क प्रयत्न कियार् है। चूंकि इन सभी अर्थशार्स्त्रियों द्वार्रार् वर्णित अवस्थार्ओं के दृष्टिकोण, आधार्र व काल अलग अलग रहे हैं। इसलिए उनके विचार्रों में मतभेद क पार्यार् जार्नार् अत्यन्त स्वार्भार्विक है। विकास की अवस्थार्ओं क माग दर्शन करने वार्लों में प्रो0 लिस्ट, हिल्डेब्रार्ंड, बकर, एशले, बूचर, शमोलर, कोलिन क्र्लार्क, कार्लमार्क्र्स तथार् रोस्टोव आदि प्रमुख हैं। नीचे हम इन्हीं के विचार्रों क अध्ययन करेंगे –

प्रो0 फ्रेडरिक लिस्ट की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

प्रसिद्ध जर्मन रार्ष्ट्रवार्दी अर्थशार्स्त्री फ्रेडरिक लिस्ट ने 1844 में आर्थिक व्यवस्थार् के क्रमिक विकास की निम्न पार्ंच अवस्थार्ओं क उल्लेख कियार् थार्- 1. जंगली अवस्थार् 2. चरार्गार्ह अवस्थार् 3. कृषि अवस्थार्, 4. उद्योग अवस्थार्, 5. उन्नत अवस्थार्।

प्रो0 लिस्ट क मत थार् कि प्रत्येक देश को उन्नत अवस्थार् को प्रार्प्त करने क प्रयत्न करनार् चार्हिए, परन्तु यह तभी संभव हो सकतार् है जबकि 1. देश सर्वप्रथम कृषि में उन्नति करे और फिर बार्द में उद्योगों के विकास पर बल दियार् जार्ए, 2. प्रार्रम्भिक अवस्थार् में रार्ष्ट्रीय उद्योगों को संरक्षण प्रदार्न कियार् जार्ए तथार् 3. जब देश उन्नत अवस्थार् को प्रार्प्त कर ले तब स्वतंत्र व्यार्पार्र नीति को अपनार्ते हुए विदेशी व्यार्पार्र सम्बन्धी सभी प्रतिबन्धों को हटार् देनार् चार्हिए।

प्रो0 हिल्डेब्रार्ंड की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

सन् 1864 में जर्मन अर्थशार्स्त्री हिल्डेब्रार्ंड ने विकास की तीन अवस्थार्यें बतार्ई थीं जो कि इस प्रकार हैं-1. वस्तु विनिमय अवस्थार् 2. मुद्रार् अवस्थार् और 3. सार्ख अवस्थार्

कोलिन क्लाक की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

कोलिन क्लाक द्वार्रार् आर्थिक विकास की निम्न अवस्थार्ओं क वर्णन कियार् गयार् है। जिसक समर्थन बौर एवं यार्मी ने भी कियार् है –

  1. कृषि उद्योग अवस्थार् – इस अवस्थार् में पिछड़े हुए देशों में कृषि सबसे अधिक महत्वपूर्ण उद्योग व रार्ष्ट्रीय आय क प्रमुख सार्धन होतार् है।
  2. निर्मार्णकारी उद्योग अवस्थार् – अर्थ व्यवस्थार् क जैसे-जैसे विकास होतार् जार्तार् है, कृषि की अपेक्षार् निर्मार्णकारी उद्योगों क महत्व बढ़ने लगतार् है।
  3. सेवार् उद्योग अवस्थार् – अर्थ व्यवस्थार् क और अधिक विकास होने पर सेवार् उद्योगों जैसे संचार्र व परिवहन, बीमार्, शिक्षार् आदि क भी विकास अधिक होने लगतार् है।

कार्ल माक्स की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

कार्ल माक्स ने वर्ग संघर्ष को विकास की अवस्थार्ओं क आधार्र मार्नार् है। उन्होंने 1948 में अपने ‘Communist Manifesto’ में स्पष्टतयार् लिखार् है कि ‘‘आज के विद्यमार्न समार्जों क इतिहार्स एक संघर्ष क इतिहार्स है। आजार्द एवं गुलार्म, देशभक्त एवं गद्दार्र, जमींदार्र एव निसहार्य मजदूर, शोषक एवं शोषित सभी एक दूसरे के विरोध में उठ खड़े हुए हैं और भले ही खुलम खुल्लार् न सही चोरी छिपे एक दूसरे पर हार्वी होने के लिए प्रयत्नशील हैं। ……. इस लड़ार्ई क अन्त यार् तो समार्ज के क्रार्ंतिकारी पुननिर्मार्ण के रूप में होगार् अथवार् स्पर्धार् करने वार्ले वर्गों के अन्त के रूप में होगार्।’’ कार्ल मार्क्र्स के अनुसार्र विकास की प्रमुख चार्र अवस्थार्यें हैं – 1. सार्मन्तवार्द 2. पूंजीवार्द 3. समार्जवार्द, 4. सार्म्यवार्द। मार्क्र्स के अनुसार्र अर्थ व्यवस्थार्ओं के विकास की प्रथम अवस्थार् श्रमिकों के शोषण से प्रार्रम्भ होती है और अन्तिम अवस्थार् शोषण की समार्प्ति के सार्थ ही सार्थ परिपूर्ण हो जार्ती है।

प्रो0 बकर की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

प्रो0 बकर के अनुसार्र 1. गृह अर्थ व्यवस्थार्, 2. शहरी अर्थ व्यवस्थार् तथार् 3. रार्ष्ट्रीय अर्थ व्यवस्थार्, आर्थिक विकास की तीन अवस्थार्एं हैं।

प्रो0 एशले की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

प्रो0 एशले के अनुसार्र विकास की विभिन्न अवस्थार्एं इस प्रकार हैं –

  1. गृह व्यवस्थार्,
  2. गिल्ड व्यवस्थार्,
  3. घरेलू व्यवस्थार् तथार्
  4. फैक्ट्री व्यवस्थार्।

प्रो0 रोस्टोव की आर्थिक विकास की अवस्थार्एं

आर्थिक विकास की अवस्थार्ओं क वैज्ञार्निक एवं तर्कपूर्ण ढंग से विश्लेषण करने क श्रेय प्रसिद्ध अमेरिकन अर्थशार्स्त्री प्रो0 रोस्टोव को दियार् जार्तार् है। रोस्टोव ने अपनी पुस्तक ‘The Stages of Economic Growth’ में आर्थिक विकास की अवस्थार्ओं को पार्ंच भार्गों में विभक्त कियार् है :-

  1. परम्परार्गत समार्ज,
  2. उत्कर्ष यार् आत्म स्फूर्ति की पूर्व दशार्यें,
  3. आत्म स्फूर्ति की अवस्थार्,
  4. परिपक्कतार् की अवस्थार् तथार्
  5. अत्यधिक उपभोग की अवस्थार्।

1. परम्परार्गत समार्ज की अवस्थार् – प्रो0 रोस्टोव के अनुसार्र ‘‘परम्परार्गत समार्ज से तार्त्पर्य, एक ऐसे समार्ज से है जिसकी संरचनार् क विकास न्यूटन के पूर्व के विज्ञार्न और तकनीक तथार् भौतिक जगत के प्रति न्यूटन से पूर्व के दृष्टिकोणों पर आधार्रित, सीमित उत्पार्दन फलनों की सीमार्ओं के अंतर्गत होतार् है।’’ विकास की यह अवस्थार् अत्यन्त पिछड़ी हुई होती है, उत्पार्दन बढ़तार् है लेकिन अत्यन्त धीमी गति से, और विकास की उत्प्रेरणार्ओं क सर्वथार् अभार्व होतार् है। परम्परार्गत समार्ज की आधार्रभूत विशेषतार् वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क अभार्व तथार् उत्पार्दन फलन क सीमित होनार् है। सीमित उत्पार्दन फलन क अर्थ है आधुनिक विज्ञार्न एवं तकनीक क यार् तो उपलब्ध न होनार् अथवार् उसक व्यवस्थित एवं नियमित रूप में प्रयोग न कियार् जार्नार्, जिसके फलस्वरूप ऐसे समार्ज में प्रति व्यक्ति उत्पार्दकतार् क स्तर नीचार् बनार् रहतार् थार्। ये समार्ज अपनी भौतिक प्रगति को वैज्ञार्निक रूप से समझने में असमर्थ थे। परम्परार्गत समार्ज की विशेषतार्एं इस प्रकार हैं :-

  1. आधुनिक विज्ञार्न तथार् प्रौद्योगिकी के प्रयोग के प्रति सीमित दृष्टिकोण पार्यार् जार्तार् है।
  2. यह अर्थ व्यवस्थार् अधिकांश रूप से अविकसित होती है।
  3. औद्योगीकरण क अभार्व होतार् है तथार् अर्थ व्यवस्थार् मुख्यतयार् कृषि पर आश्रित होती है।
  4. उत्पार्दन कार्य परम्परार्गत तरीकों से कियार् जार्तार् है जिसके फलस्वरूप उत्पार्दकतार् क स्तर नीचार् बनार् रहतार् है।
  5. जन्म व मृत्युदर के ऊंची होने के बार्वजूद जनार्धिक्य की कोई समस्यार् नहीं होती।
  6. रार्ज्य की आर्थिक क्रियार्यें अत्यन्त सीमित होती हैं।
  7. इस प्रकार के समार्ज में रार्जनीतिक सत्तार् भूस्वार्मियों के हार्थ में केन्द्रित होती है।
  8. ऐसे समार्जों क सार्मार्जिक ढार्ंचार् उत्तरार्धिकारवार्दी होतार् है। जिसमें परिवार्र तथार् जार्ति सम्बन्ध प्रमुख भूमिक निभार्ते हैं।
  9. कृषि रार्ज्य की आय क प्रमुख स्रोत होतार् है।
  10. कृषिगत आय तथार् बचतों क अधिकांश भार्ग अनुत्पार्दक कार्यों (जैसे युद्ध, खर्चीली शार्दियों तथार् अन्त्येष्टियों, मंदिरों व स्मार्रकों के निर्मार्ण आदि) पर व्यय कियार् जार्तार् है जिससे पूंजी निर्मार्ण की दर नीची बनी रहती है।
  11. स्मरण रहे, परम्परार्गत समार्ज स्थैतिक समार्ज नहीं होतार् बल्कि उत्पार्दन स्तर, व्यार्पार्र के प्रतिरूप, जनसंख्यार् तथार् आय में परिवर्तन लार्ने की पर्यार्प्त सम्भार्वनार्एं उपस्थित होती हैं।

2. आत्म स्फूर्ति की पूर्व दशार्एं – आर्थिक विकास की यह अवस्थार् संक्रमण काल है जिसमें सतत वृद्धि की पूर्व दशार्ओं क निर्मार्ण होतार् है। इस अवस्थार् में समार्ज में धीरे धीरे परिवर्तन होने आरम्भ हो जार्ते हैंं और समार्ज परम्परार्गत अवस्थार् से निकलकर एक वैज्ञार्निक समार्ज क रूप लेते हुए आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् में प्रवेश करने की तैयार्री करने लगतार् है। यही कारण है कि इस काल को आत्म स्फूर्ति के विकास की पूर्व दशार्ओं क काल कहते हैं। इस अवस्थार् में आर्थिक सुधार्र के विचार्र जन्म लेते हैं और सार्मार्जिक, भौगोलिक एवं व्यार्वसार्यिक गतिशीलतार् को लार्ने हेतु परम्परार्गत दृढ़तार् टूटने लगती है। उत्पार्दन की नई रीतियार्ं अपनार्यी जार्ती हैं। पर कुल मिलार्कर प्रगति की दौड़ मन्द बनी रहती है। फिर भी आत्म स्फूर्ति की पृष्ठ भूमि तैयार्र करने में इस अवस्थार् क अपनार् एक विशेष महत्व है।

रोस्टोव ने इसक वर्णन इस प्रकार कियार् है, ‘‘लोगों में यह विचार्र फैलने लगतार् है कि आर्थिक विकास सम्भव है और यह किसी भी अन्य लक्ष्य चार्हे वह रार्ष्ट्रीय सम्मार्न हो, निजी लार्भ, सार्मार्न्य कल्यार्ण क प्रश्न हो यार् फिर बच्चों के सुरक्षित भविष्य क उद्देश्य हो, के लिये एक आवश्यक शर्त है। शिक्षार् क विस्तार्र होतार् है और उसक स्वरूप आधुनिक अवस्थार्ओं के अनुरूप होने लगतार् है। निजी तथार् सावजनिक क्षेत्र में नये उद्यमी वर्ग क अद्भव होतार् है जो बचतों को गतिशील करके लार्भ हेतु जोखिम उठार्ने के लिए तैयार्र हो जार्तार् है। निवेश बढ़तार् है और पूंजी बार्जार्र तथार् बैंकों क विस्तार्र होतार् है। यार्तार्यार्त एवं संदेशवार्हन के सार्धनों क विकास होतार् है जिससे आन्तरिक तथार् विदेशी व्यार्पार्र क क्षेत्र विस्तृत होने लगतार् है। थोड़े बहुत रूप में निर्मार्णकारी उद्योग भी प्रकट होते हैं जो नई तकनीकों क प्रयोग करते हैं।’’ इस अवस्थार् की प्रमुख विशेषतार्एं इस प्रकार हैं –

  1. कृषि क्षेत्र में प्रार्विधिक क्रार्न्ति लार्ने के प्रयत्न किये जार्ते हैं।
  2. सार्मार्जिक व संस्थार्गत तत्वों के दृष्टिकोण में परिवर्तन होतार् है।
  3. कृषि क सार्पेक्षिक महत्व कम होने लगतार् है और उसके सार्थ ही सार्थ शहरी क्षेत्र में औ़द्योगिक कार्यशील जनसंख्यार् क अनुपार्त बढ़ने लगतार् है।
  4. आयार्तों विशेषतयार् पूंजीगत आयतों क विस्तार्र होतार् है और इसक वित्त प्रबन्धन प्रार्थमिक वस्तुओं तथार् प्रार्कृतिक सार्धनों के निर्यार्त द्वार्रार् कियार् जार्तार् है।
  5. विदेशी पूंजी को आमंत्रित कियार् जार्तार् हैं।
  6. बैंकिंग व्यवस्थार्, परिवहन व संचार्र, शिक्षार् प्रणार्ली और श्रम शक्ति के वर्तमार्न स्तर में विकास व सुधार्र होने लगतार् है।
  7. शार्सन में भू स्वार्मियों क महत्व घटने लगतार् है और उसके स्थार्न पर एक रार्ष्ट्रवार्दी व सक्षम सरकार की स्थार्पनार् हो जार्ती है।

आवश्यक शर्ते – रोस्टोव के अनुसार्र आर्थिक विकास के लिये आवश्यक दशार्ओं को पैदार् करने के लिये कुछ आवश्यक शर्तों को पूरार् होनार् जरूरी है। 1. रार्ष्ट्रीय आय क लगभग 5 से 10 प्रतिशत यार् इससे अधिक भार्ग विनियोजित होनार् चार्हिए। 2. कृषि उत्पार्दकतार् में वृद्धि होनी चार्हिए तार्कि बढ़ती हुई सार्मार्न्य तथार् शहरी जनसंख्यार् को आवश्यक खार्द्य पूर्ति प्रार्प्त हो सके। 3. यार्तार्यार्त एवं सार्मार्जिक सेवार्ओं के विकास पर कुल विनियोग क काफी बड़ार् भार्ग व्यय होनार् चार्हिए अर्थार्त सार्मार्जिक उपरिव्यय पूंजी क निर्मार्ण होनार् चार्हिए। 4. आधुनिक उद्योगों क विकास तथार् विविधीकरण होनार् चार्हिए। 5. सार्मार्जिक मूल्यों तथार् दृष्टिकोण में आवश्यकतार्नुकूल परिवर्तन होने चार्हिए।

स्मरण रहे, विकास की प्रथम अवस्थार् निष्क्रिय अवस्थार् है। जबकि दूसरी अवस्थार् इसमें सक्रियतार् लार्ती है, जिसके फलस्वरूप अर्थ व्यवस्थार् को आर्थिक विकास की ओर अग्रसर होने की पे्ररणार् मिलने लगती है और देश विकास की तीसरी अवस्थार् यार्नि आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् में प्रवेश कर जार्तार् है।

3. आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् – ‘आत्म स्फूर्ति’ यार् उत्कर्ष अर्थार्त ‘छलार्ंग लेने’ की यह अवस्थार् विकास की सर्वार्धिक महत्वपूर्ण अवस्थार् है। प्रो0 रोस्टोव के अनुसार्र ‘आत्म स्फूर्ति, अविकसित अवस्थार् और विकास की चरम सीमार् के बीच एक मध्यार्न्तर की अवस्थार् है। यह वह अन्तरार्ल है जब पुरार्नी बार्धार्ओं तथार् प्रतिरोधों पर पूरी तरह से काबू पार् लियार् जार्तार् है। विकास की पे्ररक शक्तियार्ं जो अब तक निष्क्रिय बनी हुई थीं, सक्रिय हो उठती हैं और विस्तृत होकर समार्ज पर हार्वी होने लगती हैं। विकास समार्ज की एक सार्मार्न्य दिनचर्यार् क रूप ले लेतार् है और संचयी विकास उसकी आदतों तथार् उसके संस्थार्निक ढार्ंचे क अभिन्न अंग बन जार्तार् है।

आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् को प्रो0 किन्डलबर्जर ने अधिक स्पष्ट शब्दों में इस प्रकार व्यक्त कियार् है कि ‘‘यह प्रगति की एक ऐसी अवस्थार् है जिसमें विकास की रूकावटें दूर हो जार्ती हैं। विकास की दर को चक्रीय वृद्धि नियम के अनुसार्र बढ़ार्ने हेतु विनियोजन की दर 5 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत से भी अधिक हो जार्ती है। अर्थ व्यवस्थार् कुछ मार्मलों में आत्म निर्भर होने लगती है।

प्रो0 रोस्टोव के अनुसार्र आत्म स्फूर्ति की अवधि छोटी होती है और यह लगभग दो दशकों तक रहती है। रोस्टोव ने कुछ देशों के आत्म स्फूर्ति काल क भी उल्लेख कियार् है –

प्रमुख देशों क आत्म स्फूर्ति काल

देश  आत्म स्फूर्ति देश  आत्म स्फूर्ति
ग्रेट ब्रिटेन 1738-1802  रूस 1890-1914
फ्रार्ंस 1830-1860 कनार्डार् 1996-1914
बेल्जियम 1833-1860 अमेरिका 1843-1860
टर्की 1937 भार्रत 1952
जर्मनी 1850-1837  चीन 1952
स्वीडन 1868-1890 
जार्पार्न  1878-1900

प्रमुख विशेषतार्एं :-

  1. अर्थ व्यवस्थार्, आत्मनिर्भर व स्वयं संचार्लित हो चुकी होती है।
  2. आर्थिक विकास की बार्धार्ओं पर काबू पार् लियार् जार्तार् है और आर्थिक प्रगति की उत्पे्ररक शक्तियों क भरपूर विस्तार्र होतार् है।
  3. गरीबी क दुश्चक्र पूरी तरह से तोड़ दियार् जार्तार् है और विकास एक सार्मार्न्य दशार् बन जार्ती है।
  4. आधार्र भूत उद्योगों की स्थार्पनार् के कारण औद्योगिक उत्पार्दन तेजी के सार्थ बढ़ने लगतार् है।
  5. प्रार्विधिक विकास एवं नव प्रवर्तन अर्थ व्यवस्थार् की एक स्थार्यी विशेषतार् बन जार्ती है और संचयी विकास संभव होने लगतार् है।
  6. कृषि क्षेत्र में संलग्न जनसंख्यार् क प्रतिशत 75 से घटकर 40 के करीब रह जार्तार् है।
  7. निवेश की दर, कुल रार्ष्ट्रीय आय के 5 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत यार् इससे भी अधिक हो जार्ती है, जो कि जनसंख्यार् की वृद्धि की दर से अवश्य ही अधिक होती है। फलस्वरूप प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि हो जार्ती है।
  8. सार्ख व्यवस्थार् क फैलार्व, पूंजी निर्मार्ण में वृद्धि, आयार्त के स्वरूप में परिवर्तन, निर्यार्त की नई व अधिक सम्भार्वनार्ओं क विकास होतार् है।

4. परिपक्कतार् की अवस्थार् – आत्म स्फूर्ति अर्थार्त छलार्ंग स्तर की अवस्थार् प्रार्प्त कर लेने के बार्द, अर्थ अवस्थार् परिपक्कतार् की अवस्थार् की ओर अग्रसर होने लगती है। रोस्टोव के अनुसार्र ‘इस अवस्थार् की परिभार्षार् इस प्रकार कर सकते हैं कि जब समार्ज में अपने अधिकांश सार्धनों मे तत्काली अर्थार्त आधुनिक तकनीक को प्रभार्वपूर्ण ढंग से अपनार् लियार् हो।’ दूसरे शब्दों में ‘परिपक्कतार् वह अवस्थार् है जिसमें कोई अर्थ व्यवस्थार् उन भौतिक उद्योगों से आगे बढ़ने की क्षमतार् रखती है। जिन्होंने उसकी आत्म स्फूर्ति को सम्भव बनार्यार् है और आधुनिक प्रौद्योगिकी को पूर्ण कुशलतार् के सार्थ अपने अधिकांश सार्धन क्षेत्रों पर लार्गू करने की सार्मथ्र्य रखती है।’ इस अवस्थार् में विनियोग की दर 10 से 20 प्रतिशत के बीच रहती है और उत्पार्दन वृद्धि,जनसंख्यार् वृद्धि से अधिक होती है। हार्ं ! अर्थ व्यवस्थार् अप्रत्यार्शित झटके सहन कर सकती है। रोस्टोव ने कुछ देशों के परिपक्कतार् की अवस्थार् में प्रवेश करने की तिथियार्ं भी दी हैं। जैसे इंगलैंड 1850, अमेरिक 1900, जर्मनी 1910, फ्रार्ंस 1910, स्वीडन 1930, जार्पार्न 1940, रूस 1950 तथार् कनार्ड़ार् 1950 आदि ।

प्रो0 रोस्टोव क कहनार् है कि ‘‘यह अवस्थार् एक दीर्घकालीन प्रक्रियार् है और एक समार्ज स्वयं स्फूर्ति के आरम्भ होने के 60 वर्ष बार्द परिपक्कतार् की अवस्थार् प्रार्प्त कर पार्तार् है, परन्तु फिर भी स्पष्टतयार्, इस अवधि के लिये कोई निश्चित रूप से भविष्यवार्णी नहीं की जार् सकती है।’’ जब कोई देश परिपक्कतार् की अवस्थार् में आतार् है तो उसमें तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं –

  1. कार्यकारी शक्ति की संरचनार् में परिवर्तन – देश की अर्थ व्यवस्थार् में कृषि क सार्पेक्षिक महत्व कम हो जार्तार् है जिसके फलस्वरूप कृषि कार्यों में संलग्न जनसंख्यार् क अनुपार्त भी घट जार्तार् है। लोग ग्रार्मीण क्षेत्रों में रहने के बजार्य शहरों में रहनार् अधिक पसंद करने लगते हैं। शहरी जनसंख्यार् में प्रदर्शित तथार् सफेदपोश श्रमिकों (क्र्लकों) क अनुपार्त सार्धार्रण श्रमिकों की तुलनार् में अधिक हो जार्तार् है। श्रम शक्ति में जार्गरूकतार् और सार्मार्जिक सुरक्षार् प्रार्प्त करने के लिए श्रमिक संगठित हो जार्ते हैं।
  2. उद्यम की प्रकृति में परिवर्तन – उद्यम की प्रकृति इस प्रकार बदलती है कि कठोर तथार् परिश्रमी मार्लिकों क स्थार्न सभ्य तथार् विनम्र प्रबन्धकों के हार्थ मे आ जार्तार् है। 
  3. नूतन आवश्यकतार्ओं की भूख – तीव्र औद्योगीकरण के चमत्कारों से समार्ज एक तरफ पर्यार्प्त रूप से लार्भार्न्वित होतार् है तो दूसरी तरफ उनसे ऊब भी जार्तार् है। फलत: और भी अधिक नूतनतार्ओं की मार्ंग की जार्ती है जो पुन: परिवर्तन लार् सकें।

5. अत्यधिक उपभोग की अवस्थार् – परिपक्कतार् की अवस्थार् प्रार्प्त होने के बार्द अर्थ व्यवस्थार्, अत्यधिक उपभोग की अवस्थार् में प्रवेश करती है। अवस्थार् परिवर्तन क यह काल अधिक लम्बार् नहीं होतार् है। इस अवस्थार् में अग्रगार्मी क्षेत्र अधिकतर ‘‘टिकाऊ उपभोगीय वस्तुओं एवं सेवार्ओं क उत्पार्दन करने लगते हैं जिससे उपभोग क स्तर काफी ऊंचार् उठ जार्तार् है। मोटर कारों और घरेलू जीवन से सम्बद्ध अन्य उपकरणों क प्रयोग काफी मार्त्रार् में होने लगतार् है। समार्ज क ध्यार्न उत्पार्दन से हटकर उपभोग अर्थार्त लोगों के भौतिक कल्यार्ण की ओर केन्द्रित हो जार्तार् है।’’ दूसरे शब्दों में, इस काल में पूर्ति की अपेक्षार् मार्ंग, उत्पार्दन की अपेक्षार् उपभोग और आर्थिक विकास की अपेक्षार् समार्ज के भौतिक कल्यार्ण क महत्व अधिक बढ़ जार्तार् है।

प्रमुख विशेषतार्एं – इस अवस्थार् की विशेषतार्एं इस प्रकार हैं :-

  1. इस अवस्थार् में उपभोग क स्तर उच्चतम होतार् है।
  2. औद्योगिक जनसंख्यार् में अप्रत्यार्शित रूप से वृद्धि हो जार्ती है।
  3. टिकाऊ उपभोक्तार् सार्मार्नों जैसे बिजली क सार्मार्न, रेिफ्रजिरेटर, वार्तार्नुकूलन यंत्र व मोटरों आदि क उत्पार्दन व उपभोग बड़े पैमार्ने पर कियार् जार्ने लगतार् है।
  4. लगभग देश में पूर्ण रोजगार्र की स्थिति स्थार्पित हो जार्ती है।
  5. इन परिवर्तनों के बार्द समार्ज आधुनिक तकनीक में और विस्तृत परिवर्तन स्वीकार करने के लिये तैयार्र नहीं होतार् है क्योंकि यह विकास की चरम अवस्थार् होती है।

परिपक्कतार् की अवस्थार् प्रार्प्त हो जार्ने के पश्चार्त एक अर्थव्यवस्थार् अपनी उत्पार्दन शक्तियार्ं निम्नलिखित तीन दिशार्ओं में से किसी भी दिशार् में लगार् सकती है- प्रथम, ब्रार्ह्य प्रभार्व व शक्ति प्रार्प्त करने क प्रयार्स करनार् अर्थार्त अन्तर्रार्ष्ट्रीय क्षेत्र में शक्ति क विस्तार्र करनार्। द्वितीय, सार्मार्जिक सुरक्षार्, श्रम कल्यार्ण तथार् आय के समार्न वितरण के द्वार्रार् कल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् करनार्। इस प्रकार रोस्टोव के अनुसार्र कल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् इस बार्त क प्रतीक है कि समार्ज परिपक्कतार् की अवस्थार् को पार्र कर चुक है। तृतीय, व्यक्तिगत उपभोग को बढ़ार्वार् व प्रार्थमिकतार् देनार्, और इस दृष्टि से रार्ष्ट्रीय सार्धनों को बड़ी मार्त्रार् में टिकाऊ उपभोक्तार् वस्तुओं के उत्पार्दन पर लगार्यार् जार्नार्। उल्लेखनीय यह है कि इस सम्बन्ध में विभिन्न देशों द्वार्रार् स्वीकृत उद्देश्यों अर्थार्त दिशार्ओं में कोई एकरूपतार् देखने को नहीं मिलती। कोई देश उपरोक्त मागों में से किस माग को अपनार्एगार्, यह निर्णय उस देश की सार्ंस्कृतिक, सार्मार्जिक व रार्जनीतिक दशार्ओं पर अधिक निर्भर करतार् है। उदार्हरण के तौर पर रूस ने अन्तर्रार्ष्ट्रीय शक्ति के विस्तार्र को चुनार् है तो अमेरिक द्वार्रार् व्यक्तिगत उपभोग को अपेक्षार्कृत अधिक महत्व दियार् जार्तार् है। इसके विपरीत इंगलैण्ड तथार् जार्पार्न कल्यार्णकारी रार्ज्य की ओर अधिक चिंतनशील है।

ऐतिहार्सिक दृष्टि से विचार्र करने पर पतार् चलतार् है कि संयुक्त रार्ज्य अमेरिक 1920 में अत्यधिक उपभोग की अवस्थार् में प्रवेश करने वार्लार् पहलार् देश थार्। उसके बार्द यह गौरव ग्रेट ब्रिटेन को 1930 में प्रार्प्त हुआ, तथार् 1950 में जार्पार्न व पश्चिमी यूरोप के कुछ देशों द्वार्रार् यह अवस्थार् प्रार्प्त की गयी। सार्म्यवार्दी देश रूस 1953-55 के आस पार्स अर्थार्त स्टार्लिन के संसार्र से विदार् होने के बार्द ही इस अवस्थार् को प्रार्प्त कर सक थार्।

प्रो0 किन्डलबर्जर क कहनार् है कि विकास की यह अवस्थार्एं एक प्रकार से की शक्ल की भार्ंति है। जैसार् कि रेखार्चित्र से स्पष्ट होतार् है। इसमें विकास क कार्य पहले बहुत धीरे से प्रार्रम्भ होतार् है, फिर क्रमश: जोर पकड़तार् है और इसके बार्द काफी तेजी के सार्थ बढ़तार् रहतार् है और अन्त में एक निश्चित सीमार् पर आकर विकास पथ शिथिल होने लगतार् है। बर्जर महोदय क कहनार् है कि वार्स्तव में रोस्टोव की विकास प्रक्रियार् ‘S’ रूप में मनुष्य के शरीर के विकास की भार्ंति है जो शिशु से किशोर अवस्थार् तक एक गति से चलती है और फिर यौवन अवस्थार् की ओर तेजी के सार्थ अग्रसर होती है। लेकिन यह कहनार् कठिन है कि एक अवस्थार् में कितनी देर तक चलती रहेगी और ‘S’ बिन्दु पर पहुंचने के बार्द उसे कौन सी नई शक्ति किस ओर नयार् मोड देगी।

आर्थिक विकास की अवस्थार्ओं की आलोचनार्

इनमें कोई सन्देह नहीं कि रोस्टोव द्वार्रार् आर्थिक विकास की अवस्थार्ओं क विश्लेषण अत्यन्त क्रमबद्ध व तर्कपूर्ण ढंग से कियार् गयार् है। परन्तु कुछ अर्थशार्स्त्रियों, विशेषकर मार्यर एवं बार्ल्डविन, सार्इमन कुजनेट्स, केर्यनक्रार्स, गरशेनक्रार्न, डरूमौण्ड, स्ट्रीटन, प्रो0 सैन और हबार्कुक ने रोस्टोव के दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण मार्नार् है। प्रो0 बैंजमीन हिगीन्ज, रोस्टोव महोदय के समर्थक मार्ने जार्ते हैं और उन्होनें इस विश्लेषण को सही और औचित्यपूर्ण ठहरार्यार् है। रोस्टोव के दृष्टिकोण की निम्न आधार्र पर आलोचनार् की गई है –

  1. इतिहार्सको निश्चित अवस्थार्ओं में बार्ंटनार् सम्भव नहीं – प्रो0 मार्यर क कहनार् है कि इतिहार्स को निश्चित अवस्थार्ओं में न तो बार्ंटनार् संभव है और न ही यह जरूरी है कि सभी देश एक ही प्रकार की अवस्थार्ओं में से होकर गुजरे। उनके शब्दों में ‘‘यह कहनार् कि प्रत्येक अर्थव्यवस्थार् सदैव विकास के एक ही माग को अपनार्ती है और उसक एक जैसार् भूत और भविष्य होतार् है, अवस्थार्ओं के क्रम को आवश्यकतार् से अधिक सरलीकरण करनार् है।’’ प्रो0 हबार्कुक ने ऐतिहार्सिक दलील देते हुए कहार् है कि अमेरिका, कनार्डार्, न्यूजीलैंड तथार् आस्ट्रेलियार् परम्परार्गत समार्ज की अवस्थार् में से बिनार् गुजरे ही पूर्व दशार्ओं की अवस्थार् में प्रवेश कर गये थे।
  2. अवस्थार्ओं क क्रम भिन्न हो सकतार् है – गरशेनक्रार्न के अनुसार्र ‘‘प्रत्येक देश आर्थिक विकास की विभिन्न अवस्थार्ओं से गुजरतार् अवश्य है परन्तु यह आवश्यक नहीं कि एक देश रोस्टोव द्वार्रार् वर्णित अवस्थार्ओं में से ही होकर गुजरे। अवस्थार्ओं क क्रम अनियमित हो सकतार् है।
  3. अवस्थार्ओं में परस्पर-निर्भरतार् – कुजनेट्स तथार् केयरनक्रार्स क कहनार् है कि रोस्टोव द्वार्रार् वर्णित आर्थिक विकास की अवस्थार्एं एक दूसरे से भिन्न न होकर परस्पर व्यार्पी है। उदार्हरणाथ एक अवस्थार् की विशेषतार्एं दूसरी अवस्थार् में भी देखने को मिलती है। न्यूजीलैण्ड, डेनमाक आदि देशों में आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् में भी कृषि क अत्यधिक विकास हुआ है जबकि रोस्टोव ने कृषिगत विकास को परम्परार्गत समार्ज की अवस्थार् में रखार् है।
  4. अवस्थार् क पतार् लगार्ने में कठिनार्ई – कुछ लोगों क कहनार् है कि कौन सार् देश विकास की किस अवस्थार् में है इसकी जार्ंच करने हेतु पर्यार्प्त सार्ंख्यिकीय सूचनार्ओं क उपलब्ध होनार् संभव नहीं है। दूसरार् इस बार्त क कैसे पतार् लगार्यार् जार्ए कि किसी देश में अमुक अवस्थार् क काल पूरार् हो चुक है और एक के बार्द दूसरी अवस्थार् कब प्रार्रम्भ होगी।
  5. आत्म पोषित विकास भ्रमोत्पार्दक विचार्र है – कुजनेट्स के अनुसार्र आत्म पोषित यार् आत्म निर्भर विकास क विचार्र भ्रमोत्पार्दक है। प्रथम, विशेषतार्ओं की दृष्टि से यह आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् के ही समार्न है क्योंकि दोनों अवस्थार्ओं के बीच की विभार्जन रेखार् स्पष्ट नहीं है। दूसरार्, ‘कोई भी विकास शुद्ध रूप में आत्म निर्भर अथवार् आत्म सीमित नहीं हो सकतार् क्योंकि उसके स्वयं को सीमित करने वार्ले कुछ प्रभार्व सदैव बने रहते हैं। विकास तो एक निरन्तर संघर्ष है जिसे आत्म निर्भर कहनार् बहुत कठिन है।’
  6. अत्यधिक उपभोग अवस्थार् काल क्रम के अनुसार्र नहीं – आलोचकों क कहनार् है कि विश्व के कुछ देश जैसे आस्ट्रेलियार्, कनार्डार् आदि परिपक्कतार् की अवस्थार् में प्रवेश किये बिनार् ही अत्यधिक उपभोग की अवस्थार् प्रार्प्त कर चुके हैं जो कि रोस्टोव के अवस्थार् कालक्रम के विरूद्ध है।

भार्रत की विकास अवस्थार्

भार्रत किस अवस्थार् में है ? नि:सन्देह भार्रत विकास की प्रथम दो अवस्थार्ओं को पार्र कर चुक है लेकिन प्रश्न यह उठतार् है कि क्यार् भार्रत वार्स्तव में आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् प्रार्प्त कर चुक है और परिपक्कतार् की अवस्थार् की ओर अग्रसर हो रहार् है ? इस सम्बन्ध में कोई अंतिम निर्णय तब तक नहीं दियार् जार् सकतार् है जब तक कि इस सम्बन्ध में पार्ये जार्ने वार्ले विभिन्न विचार्रों क अध्ययन न कर लियार् जार्ये।
भार्रत आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् प्रार्प्त कर चुक है !

प्रथम मत – स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के उपरार्न्त पंच वर्षीयार् योजनार्ओं क प्रार्रम्भ, जमींदार्री प्रथार् क उन्मूलन, भूमि सुधार्र, शिक्षार् क प्रसार्र, निर्मार्णकारी व सेवार् उ़द्योगों की स्थार्पनार्, बचत व पूंजी निर्मार्ण की दर में वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, निजी क्षेत्र के विपरीत सावजनिक क्षेत्र में विनियोग व्यय क बढ़तार् हुआ प्रतिशत, विदेशी पूंजी क उपयोग और ग्रार्मीण क्षेत्र में शहरों की ओर तेजी के सार्थ प्रवार्स करती हुई जनसंख्यार् आदि तथ्य इस बार्त के प्रमार्ण हैं कि भार्रत विकास की प्रथम दो अवस्थार्ओं को लार्ंघ चुक है।

जहार्ं तक आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् क सम्बन्ध हे प्रो0 रोस्टोव के अनुसार्र इसकी पहली शर्त यह है कि बचत और विनियोग क अनुपार्त रार्ष्ट्रीय आय के 10 प्रतिशत पर लार् दियार् जार्ए और इसे दो यार् दो से अधिक दशकों तक कायम रखार् जार्ए। भार्रत में 1960-61 की कीमतों पर रार्ष्ट्रीय आय से निवेश क अनुपार्त 1950-51 में 5.5 प्रतिशत से बढ़कर 1964-65 में 14.4 प्रतिशत हो गयार् थार् और घरेलू बचतों क अनुपार्त 5.5 प्रतिशत से बढ़कर 10.5 प्रतिशत हो गयार् थार्, जो कि इस बार्त क प्रमार्ण है कि भार्रत जिसने रोस्टोव के अनुसार्र 1952 में आत्म स्फूर्ति में प्रवेश कियार्, 1962-65 में इस अवस्थार् को लार्ंघ चुक थार्।

आत्म स्फूर्ति की दूसरी शर्त अग्रगार्मी क्षेत्रों क विधिवत् विकास होनार् है। इस दृष्टि से देश में 1964-65 तक औद्योगिक क्षेत्र, कृषि क्षेत्र व तृतीयक क्षेत्र काफी विकसित हो चुके थे। उदार्हरण के तौर पर कृषि उत्पार्दन सूचकांक 1950-51 में 45.6 थार् जो 1964-65 में बढ़कर 158.4 हो चुक थार्। इसी प्रकर औद्योगिक उत्पार्दन सूचकांक 73.5 से बढ़कर 186.9 हो गयार् थार्।

आत्म स्फूर्ति की तीसरी शर्त के अनुसार्र भार्रत के योजनार्बद्ध विकास ने देश में एक ऐसार् ढार्ंचार् तैयार्र कर दियार् है जो आधुनिक क्षेत्र के विस्तार्र क आधार्र बन सकतार् है। संस्थार्निक व सार्मार्जिक परिवर्तनों के सार्थ-सार्थ आधुनिक प्रौद्य़ोगिकी क अपनार्यार् जार्नार् और प्रशार्सकीय दक्षतार् व कर्तव्यपरार्यणतार् क बढ़तार् हुआ स्तर इस बार्त क प्रमार्ण है कि भार्रतीय अर्थ व्यवस्थार् आत्म स्फूर्ति क अधिकांश शर्तो को पूरार् करती है। आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् अभी नहीं !

विपरीत मत- विपरीत मत रखने वार्ले विचार्रकों के अनुसार्र आत्म स्फूर्ति की उपरोक्त तीनों शर्तों की उपस्थिति मार्त्र से यह निष्कर्ष निकाल लेनार् कि भार्रत तीसरी योजनार् में आत्म स्फूर्ति कर चुक थार्, पूर्णतयार् सही नहीं है। प्रो0 रोस्टोव के अनुसार्र भार्रत की आत्म स्फूर्ति क काल 1952 है। लेकिन सच तो यह है कि दूसरी योजनार् के अंतिम चरण तक देश, आत्म स्फूति की पूर्व आवश्यकतार्ओं के निर्मार्ण कार्य में लगार् हुआ थार्। इस आधार्र पर ऐसार् प्रतीत होतार् है कि भार्रत ने अकालिक आत्म स्फूर्ति क प्रयार्स कियार्। उदार्हरण के तौर पर 1950 से 1960 तक के काल के बीच शुद्ध रार्ष्ट्रीय आय 3.8 प्रतिशत वाषिक दर से बढ़ी है किन्तु प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि 1.8 प्रतिशत वाषिक रही जबकि जनसंख्यार् की वाषिक वृद्धि की दर 2.5 प्रतिशत रही है। बचत व विनियोग की दर 7.5 प्रतिशत से बढ़ार्कर 11 प्रतिशत तक ही की जार् सकी जो कि आत्म स्फूति की आवश्यकतार् से काफी कम है। इतनार् ही नहीं, तीसरी योजनार् के अंतिम वर्ष (1965-1966) में रार्ष्ट्रीय आय 5.6 प्रतिशत घट गयी और यह 1960-61 के स्तर पर आ गयी। घरेलू बचतों की दर 1965-1966 में 10.5 प्रतिशत से घटकर 1966-67 में 8.2 प्रतिशत और 1967-68 में 8 प्रतिशत रह गयी थी। अस्थिर विकास दर, कृषि क अधिक महत्व, स्फीतिक दबार्व, अपार्र निर्धनतार् और बढ़ती हुई बेरोजगार्री इस बार्त क संकेत है कि भार्रत आत्म स्फूति की अवस्थार् प्रार्प्त नहीं कर सका।

आत्म स्फूर्ति की अवस्थार् आगे क्यों टलती गयी ?
यहॉ आपको बतार्नार् यह आवश्यक है कि ध्यार्न रहे, हमार्रे अब तक के सम्पूर्ण नियोजन में कृषि उद्योग के विकास क एक प्रमुख आधार्र रहार् है। प्रथम दो योजनार्ओं में कृषि क्षेत्र में प्रगति अवश्य हुई है परन्तु तीसरी और चौथी योजनार् में कृषि उत्पार्दन क लक्ष्य पूरार् नहीं कियार् जार् सका। एक तरफ खार्द्यार्न्नों के मूल्य बढ़े और दूसरी ओर आयार्तों पर निर्भरतार् में वृद्धि होती गयी। इसी प्रकार औद्योगिक उत्पार्दन क लक्ष्य 70 प्रतिशत वृद्धि क थार् जबकि योजनार् काल में केवल 40 प्रतिशत वृद्धि ही हो सकी। इस काल में बचत व विनियोग वृद्धि की दर आशार् के अनुकूल नहीं रही। देश में होने वार्ली भयंकर मूल्य वृद्धि ने बचत व विनियोग दर, आयार्त निर्यार्त, प्रत्यक्ष एवं परोक्ष करों आदि को बुरी तरह से प्रभार्वित कियार् है। सन् 1966-68 के दौरार्न प्रतिसार्र की ठंडी लहर ने अर्थ व्यवस्थार् को एक और झटक दियार्, जिसक कम्पन आज भी औद्योगिक क्षेत्र में देखने को मिलतार् है। इसके अतिरिक्त प्रार्कृतिक प्रकोप व आकस्मिक युद्धों नें भी अर्थ व्यवस्थार् पर अनार्वश्यक भार्र बढ़ार् दियार् है। इस काल में कुशल श्रम शक्ति क निर्मार्ण नहीं कियार् जार् सक और न ही जनतार् में विकास व प्रगति के प्रति उत्सार्ह व जार्गरूकतार् आदि देखने को मिली। योजनार्ऐं केवल इसलिए चलती रहीं क्योकि योजनार्ओं को चलार्नार् थार्।

यद्यपि तीसरी योजनार् बचत तथार् निवेश वृद्धि के निर्धार्रित लक्ष्य को पूरार् करने में असमर्थ रही थी। किन्तु रोस्टोव द्वार्रार् प्रस्तुत शब्दार्वली को स्वीकार करने पर चूंकि शुद्ध निवेश क प्रतिशत 10 से ऊपर हो चुक थार्, अत: उस आधार्र पर यह निष्कर्ष निकलार् जार् सकतार् थार् कि भार्रत तीसरी योजनार् के दौरार्न आत्म स्फूर्ति को प्रार्प्त कर चुक थार्।

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