पोषण के प्रकार
स्वास्थ्य से तात्पर्य भी यह है कि ‘‘केवल बीमारी नहीं होना, शारीरिक कमजोरी का नहीं होना, ही स्वास्थ्य नहीं है बल्कि शारीरिक, मानसिक, And सामाजिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से भी पूर्ण स्वस्थ होना स्वास्थ्य कहलाता है। आर्युवेद शास्त्र में वैद्याचार्य कहते है कि शारीरिक स्वास्थ्य हेतु वातपित्त कफ त्रिदोश, समान मात्रा में हों, शरीर के तेरह प्रकार की अग्नि सम मात्रा में हो Earth, जल, तेज, वायु And आकाश की भूताग्नियां तथा Seven:- रस, रक्त, मांस, भेद, अस्थि, मज्जा,And शुक्र की धातु अग्नियां And Single प्रधान जाठराग्नि कुल 13 प्रकार की अग्नियां) शरीर की Seven धातुऐं रस धातु, रक्त धातु, मांस धातु, भेद धातु, अस्थि धातु, मज्जा धातु, शुक्र धातु, ये सम मात्रा में हो, जिसके शरीर का मल, मूत्र, थूक, पसीना, आदि उत्सर्जित किये जाने वाले द्रव्य समान मात्रा में हों तथा सम्यक उनका निर्हरण (निश्कासन) हो शारीरिक आरोग्यता में माना जाता है। मानसिक स्वस्थता हेतु जिसकी आत्मा इन्द्रियां (5 कमेन्द्रियां And 5 ज्ञानेन्द्रियां) And प्रधान इन्द्रियों में ‘‘मन’’ जिसका प्रसन्न हो वे मानसिक Reseller से स्वस्थ कहे जाते है। तात्पर्य यह है कि पूर्ण Reseller से स्वस्थ व्यक्ति के शारीरिक And मानसिक दोनों पक्षों पर आधारित है।
पोषण के प्रकार
- सुपोषण –पोषण की वह स्थिति जब भोजन द्वारा मनुष्य को अपनी Needनुसार All पोषक तत्व उचित मात्रा में मिले, सुपोषण कहलाती है।
- कुपोषण- पोषण की वह स्थिति जब भोजन द्वारा मनुष्य को या तो अपनी Needनुसार कम पोषक तत्व मिले या Need से अधिक पोषक तत्व मिले, कुपोषण कहलाती है। कुपोषण में अल्पपोषण And अत्यधिक पोषण दोनों शामिल हैं।
- अल्पपोषण- कुपोषण की वह स्थिति जिसमें पोषक तत्व गुण व मात्रा में शरीर के लिये पर्याप्त नहीं होते Meansात् Single या Single से अधिक पोषक तत्वों की कमी पायी जाती है, अल्पोषण कहलाती है। इस प्रकार का पोषण अधिक समय तक दिया जाने पर शारीरिक And मानसिक विकास रूक जाता है। जैसे आयरन की कमी से एनीमिया होना।
- अत्यधिक पोषण-पोषण की वह स्थिति जिसमें पोषक तत्व गुण व मात्रा में Need से अधिक हो अत्यधिक पोषण कहलाती है।