हरित क्रार्ंति क्यार् है?

हरित क्रार्न्ति, हरित एवं क्रार्न्ति शब्द के मिलने से बनार् है। क्रार्न्ति से तार्त्पर्य किसी घटनार् में तेजी से परिवर्तन होने तथार् उन परिवर्तनों क प्रभार्व आने वार्ले लम्बे समय तक रहने से है। हरित शब्द कृषि फसलों क सूचक है। अत: हरित क्रार्न्ति से तार्त्पर्य कृषि उत्पार्दन में अल्पकाल में विशेष गति से वृद्धि क होनार् तथार् उत्पार्दन की वह वृद्धि दर आने वार्ले समय तक बनार्ये रखने से है।

भार्रतीय कृषि के संदर्भ में हरित क्रार्न्ति से आशय छठे दशक के मध्य कृषि उत्पार्दन में हुई उस भार्री वृद्धि से है जो थोड़े से समय में उन्नतशील बीजो, रसार्यनिक खार्दों एवं नवीन तकनीकों के फलस्वरुप हुई। अन्य शब्दों में, हरित क्रार्न्ति भार्रतीय कृषि में लार्गू की गई उस विकास विधि क परिणार्म है जो 1960 के दशक में पार्रम्परिक कृषि को आधुनिक तकनीकी द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित किये जार्ने के रुप में सार्मने आई। कृषि में तकनीकी ज्ञार्न क आविष्कार, उन्नत किस्म के बीजों क प्रयोग, सिंचार्ई सुविधार्ओं क विकास, कृषि क्षेत्र में उन्नत औजार्रों एवं मशीनों क अधिकाधिक उपयोग, कृषि में विद्युतीकरण, कृषि क्षेत्र में ऋण क विस्तार्र, कृषि शिक्षार् में विस्तार्र कार्यक्रमों के सम्मिलित प्रयार्सों के फलस्रुपय वर्ष 1966-67 के उपरार्न्त कृषि उत्पार्दन में तीव्र गति से वृद्धि हुई। उत्पार्दन वृद्धि की इस असार्धरण गति दर को कृषि वैज्ञार्निकों, ने हरित क्रार्न्ति क नार्म दे दियार्। हरित क्रार्न्ति क जन्मदार्तार् नोबेल पुरस्कार विजेतार् प्रो0 नोरमन बॉरलोग है। भार्रत में हरित क्रार्न्ति को बढ़ार्वार् देने क श्रेय मुख्यत: एस. स्वार्मीनार्यन को दियार् जार्तार् है। हरित क्रार्न्ति की संबार् इसलिए भी दी गई कि क्योंकि इसके फलस्वरुप भार्रतीय कृषि निर्वार्ह स्तर से ऊपर उठकर आधिक्य स्तर पर आ चुकी है। इस प्रकार हरित क्रार्न्ति में मुख्य रुप से दो बार्ते आती हैं:-

  1. एक तो उत्पार्दन तकनीकि में सुधार्र
  2. दूसरे कृषि उत्पार्दन में वृद्धि

हरित क्रार्न्ति को नवीन कृषि रणनीति के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। नई कृषि युक्ति (New Agricultural Strategy) को 1966 ई0 में एक पैकेज के रुप में शुरु कियार् गयार् और इसे अधिक उपज देने वार्ले किस्मों क कार्यक्रम (High Yielding Variety Programme) की संबार् दी गई।

हरित क्रार्न्ति की उपलब्धियॉ

तृतीय योजनार् के प्रार्रम्भ से लेकर अब तक के वर्ष भार्रतीय कृषि के इतिहार्स में बहुत ही महत्वपूर्ण मार्ने जार्ते हैं। हरित क्रार्न्ति सरकार द्वार्रार् अपनार्ए गए कई उपयों क परिणार्म थी। विभिन्न उपार्यों को सम्मिलित यार् पैकेज के रुप में अपनार्ने से ही कृषि उत्पार्दन में तीव्र वृद्धि हुई। हरित क्रार्न्ति की उपलब्धियों को कृषि में तकनीकी परिवर्तन से संस्थार्गत एवं उत्पार्दन में हुए सुधार्र के रुप में देखार् जार् सकतार् है।

  1. उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग में वृद्धि – सबसे पहली किस्म ‘नोरिन 10’ थी जिसे डार्0 एस0सी0 सैलमन 1948 में जार्पार्न से अमरीक लार्ए। नामन ई. बार्र लॉग, डार्0 एम0 एस0 स्वार्मी नरथन और श्री सी0 सुब्रमण्यम (तत्कालीन कृषि मंत्री भार्रत सरकार) के प्रयार्सों के फलस्वरुप गेहॅू की लर्मार्रोंही (लर्मार्रोजों), सोनरार् 63 व सोनरार् 64 जैसी मैक्सीकन प्रजार्तियॉ शुरु में भार्रत में सीधे प्रयोग में लार्ई गर्इं। बार्द में मैक्सिको की प्रजार्तियों को भार्रतीय किस्मों के सार्थ मिलकर संकलन पर पर्यार्प्त ध्यार्न दियार् गयार्। मैक्सिन प्रजार्तियसों में कुछ खार्स तरह की कमियॉ थीं जिनमें गेहॅू के दार्नों क रंग लार्ल होनार् प्रमुख थी। इन कमियों को दूर करने के लिए ‘शरबती सोनोरार्:, ‘पूसार् लमी:, कल्यार्ज सोनार्’ और ‘सोनार्लिका’ जैसी नई किस्में विकसित की गई। लेकिन जिन गेहॅू की किस्मों ने हरित क्रार्न्ति में योगदार्न दियार् वे हैं- संगम (CPAN 3004) मोती (HD 1949), जनक (HD 1982), अर्जुन (HD 2009), कल्यार्न सोनार्, सोनार्लिक एवं HD 2329। अधिक उपज देने वार्ली किस्मों के बीजों क उपयोग बढ़ार् है और नई नई किस्मों की खोज की गई है। चार्वल में छोटार् बार्समती, नयी जय, दमार्, रत्नार् आदि क प्रयार्ग कियार् गयार्। अभी तक अधिक उपज देने वार्लार् कार्यक्रम धार्न बार्जरार्, मक्क व ज्वार्र में ही लार्गू कियार् गयार् है। लेकिन गेहॅू में सबसे अधिक सफलतार् मिली है। 1966-67 वर्ष में 19 लार्ख हेक्टेयर भूमि में उन्नत किस्म के बीजों क प्रयोग कियार् गयार् थार्। नई विकास विधि के अन्तर्गत वर्ष 2009-2010 में 257 लार्ख कुन्तल प्रमार्णित बीज वितरित किये गए। भार्रत में 88 प्रतिशत गेहॅू की फसल में उन्नत बीजो ( HYV Seeds) क प्रयोग कियार् जार्तार् है।
  2. रार्सार्यनिक उर्वरकों के उपयोग में तेजी से वृद्धि – भार्रत में हरित क्रार्न्ति के परिणार्मस्वरुप रार्सार्यनिक उर्वरकों के उपभोग की मार्त्रार् में तेजी से वृद्धि हुई है। 1960-61 में रार्सार्यनिक खार्द क उपभोग केवल 39 हजार्र टन थार्। वह 2009-10 मे बढ़ कर 264.86 लार्ख टन हो गयार्। रार्सार्यनिक खार्दों क उपभोग बढ़ार्ने के लिए सरकार ने कई उपय किए हैं, जैसे छोटे व सीमार्न्त किसार्नों को रार्सार्यनिक खार्द खरीदने के लिए सार्ख उपलब्ध करार्नार्, किसार्नों को इसके उचित उपयोगो के सम्बन्ध में मुफ्त सलार्ह व प्रशिक्षण दियार् जार्तार् है। सरकार ने 2009-2010 में रार्सार्यनिक खार्द पर 57,056 करोड़ रुपयों की आर्थिक सहार्यतार् दी है।
  3. सिंचार्ई की सुविधार्ओं में वृद्धि – हरित क्रार्न्ति को सुदृ़ढ़ बार्नो में सिंचार्ई की सुविधार्ओं क योगदार्न भी कुछ कम नहीं है। ऊॅची उत्पार्दक्तार् वार्ले बीजों को रार्सार्यनिक खार्दों की आवश्यकतार् तो होती है, परन्तु इसके सार्थ ही रार्सार्यनिक खार्दों के प्रयोग में पार्नी की आवश्यकतार् भी बढ़ जार्ती है और सिंचार्ई मार्नसून की अनिश्चिततार्ओं से बचार्कर खार्द्य सुरक्षार् उपलब्ध करार्ती है। भार्रत में सिंचार्ई की सुविधार्ओं में वृद्धि निरन्तर होती गई है। भार्रत में 1965-1’966 के पश्चार्त सिंचार्ई की लघु परियोजनार्ओं (Minor Irrigation Projects ) ने हरित क्रार्न्ति को लार्ने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई है। कूपों तथार् नलकूपों द्वार्रार् उपलब्ध करवार्ई गई सिंचार्ई सुविधार्ओं में वृद्धि इतनी अधिक थी कि अर्थशार्स्त्रियों ने हरित क्रार्न्ति को Child of the pump set technology क नार्म दे दियार्। माच 2010 तक भार्रत की सिंचार्ई क्षमतार् 1082 लार्ख हेक्टेयर हो गई जो कि 1951 में 223 लार्ख हेक्टेयर थी। 
  4. पौध संरक्षण – भार्रत में लगभग 10 प्रतिशत फसल कीटार्णुओं और रोगों द्वार्रार् नष्ट हो जार्ती है। इनसे फसलों के बचार्व करने की क्रियार् को पौध संरक्षण कहते हैं। इसके अन्तर्गत खरपतवार्र एवं कीटों को नार्श करने के लिए दवार् छिड़कने क कार्य कियार् जार्तार् है। वर्तमार्न में एकीकृत कीटनार्शक नियंत्रण रणनीति को अपनार्यार् गयार् है।
  5. बहुफसली कार्यक्रम – बहुफसली कार्यक्रम क उद्देश्य एक ही भूमि पर वर्ष में एक से अधिक फसल उगार्कर उत्पार्दन बढ़ार्नार् है। यह कार्यक्रम 1967-68 में लार्गू कियार् गयार् है। इस कार्यक्रम से भूमिक अनुकूलतम प्रयोग हो सकतार् है। वर्तमार्न में भार्रत में यह कार्यक्रम कुल सिंचित भूमि के 65: भार्ग पर लार्गू है।
  6. आधुनिक कृषि उपकरणों क उपयोग – वर्तमार्न कृषि में हरित क्रार्न्ति में आधुनिक कृषि उपकरणों जैसे ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्रवेस्टर, डीजल व बिजली के पम्पसेटों आदि ने काफी योगदार्न दियार् है। 1966 में भार्रत में 21 हजार्र ट्रैक्टर थे लेकिन आज इनकी संख्यार् 6 लार्ख से अधिक है।
  7. कृषि सेवार् केन्द्रों की स्थार्पनार् – कृषकों में व्यवसार्यिक सार्हस की क्षमतार् को विकसित करने के उद्देश्य से देश में कृषि सेवार् केन्द्र स्थार्पित करने की योजनार् लार्गू की गई है। अब तक देश में कुल 146 कृषि सेवार् केन्द्र स्थार्पित किए जार् चुके हैं।
  8. कृषि उद्योग निगम – सरकारी नीति के अन्तर्गत 17 रार्ज्यों में कृषि उद्योग निगमों की स्थार्पनार् की गई है। इन निगमों क कार्य कृषि उपकरण व मशीनरी की पूर्ति तथार् उपज के प्रसंस्करण एवं भण्डार्रण को प्रोत्सार्हन देनार् है।
  9. मृदार् परीक्षण – मृदार् परीक्षण कार्यक्रम के अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों की मिट्टी क परीक्षण प्रयोगशार्लार्ओं में कियार् जार्तार् है। इसक उद्देश्य भूमि की उर्वरार्शक्ति क पतार् लगार्कर कृषकों को उसी अनुसार्र रार्सार्यनिक खार्दों व उत्तम बीजों के प्रयोग की सलार्ह किसार्नों को दी जार् सके। वर्तमार्न समय में 7 लार्ख नमूनों क परीक्षण इन सरकारी प्रयोगशार्लार्ओं में कियार् जार्तार् है। चलती फिरती प्रयोगार्शलार्एं भी स्थार्पित की गई हैं, जो गार्ंव – गार्ंव जार्कर मौके पर मिट्टी क परीक्षण कर किसार्नों को सलार्ह देती हैं।
  10. कृषि विकास के लिए विभिन्न निगमों की स्थार्पनार् – हरित क्रार्न्ति की प्रगति मुख्यतार्: अधिक उपज देने वार्ली किस्मों व उत्तम सुधरे हुए बीजों पर निर्भर करती है। इसके लिए देश में 400 कृषि फाम स्थार्पित किये गए हें। 1963 में रार्ष्ट्रीय बीज निगम की स्थार्पनार् की गई थी। 1963 में ही रार्ष्ट्रीय सहकारितार् विपणन संघ (नेफेड) बनार्यार् गयार् जो प्रबन्ध, वितरण एवं कृषि से सम्बन्धित चुनिंदार् वस्तुओं के आयार्त निर्यार्त क कार्य करतार् है। कृषि के लिए ही खार्द्य निगम, उवर्रक सार्ख गार्रण्टी निगम, ग्रार्मीण विद्युतीकरण निगम आदि भी स्थार्पित किये गए हैं।
  11. कृषकों को उचित मूल्य की गार्रण्टी – कृषि विकास नीति के अन्तर्गत सरकार द्वार्रार् कृषकों को उनकी फसल क उचित मूल्य देने की गार्रण्टी दी जार्ती है। इस कार्य के लिए कृषि लार्गत एवं मूल्य आयोग हैं जिसक कार्य फसल की बुवार्ई के समय उन मूल्यों को सिफार्रिश करनार् है जिस पर फसल के आने पर सरकार क्रय करने लिए वचनबद्ध है। 1965 में कृषि मूल्य आयोग की स्थार्पनार् कर दी।
  12. कमजोर किसार्न के लिए विशिष्ट कार्यक्रम – कमजोर, छोटे व सीमार्न्त कृषकों एवं खेतिहर कृषकों की सहार्यतार् के लिए तीन योजनार्एं लार्गू कीं:- (क) लघु कृषि विकास एजेन्सी (ख) सीमार्न्त कृषक एवं कृषि श्रमिक विकास एजेन्सी (ग) एकीकृत शुष्क भूमि कृषि विकास और अब समन्वित ग्रार्म विकास कार्यक्रम लार्गू कियार् है।

हरित क्रार्ंति के लार्भ 

  1. खार्द्यार्न्न उत्पार्दन में वृद्धि – हरित क्रार्न्ति यार् नई कृषि रार्जनीति क पहलार् लार्भ हुआ है कृषि उत्पार्दन में वृद्धि हुई है, विशेष रुप से गेहॅू, बार्जरार्, चार्वल, मक्का, व ज्वार्र दार्लों के उत्पार्दन में आशतीत वृद्धि हुई। इसके परिणार्मस्वरुप भार्रत खार्द्यार्न्नों में आत्मनिर्भर सार् हो गयार् है। प्रति हेक्टेयर उत्पार्दन में आशतीत वृद्धि हुई है। देश में सभी खार्द्यार्न्नों क प्रति हेक्टेयर उत्पार्दन 1950-51 में 522 कि0ग्रार्म प्रति हेक्टेयर थार् जो बढ़कर 2011-2012 में 1996 किग्रार् प्रति हेक्टेयर हो गयार्।
  2. परम्परार्गत स्वरुप में परिवर्तन – हरित क्रार्न्ति द्वार्रार् किसार्नों को परम्परार्गत खेती की सीमार्एँ पतार् चल गई हैं। आज किसार्न आधुनिक तकनीकों को अपनार्ने के लिए तैयार्र है। आज खेती क व्यवसार्यिकरण हो चुक है। लैजिस्की के अनुसार्र, ‘‘जहॉ कहीं भी नई तकनीकें उपलब्ध हैं कोई किसार्न उनके महत्व को अस्वीकार नहीं करतार्। बेहतर कृषि विधियों तथार् बेहतर जीवन स्तर की इच्छार् न केवल नई उत्पार्दन तकनीकों क प्रयोग करने वार्ले एक छोटे से धनी वर्ग तक सीमित है बल्कि उन लार्खों किसार्नों में भी फैल गई जिन्होंनें अभी तक इन्हें अपनार्यार् है और जिनके लिए बेहतर जीवन स्तर अभी तक सपनार् है।’’ किसार्नों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आयार् है। उत्पार्दकतार् में बढ़ोत्तरी से कृषि के स्तर में बदलार्व आयार् और अब वह जीवकोपाजन करने के निम्न स्तर से ऊपर उठकर आय बढ़ार्ने क सार्धन बन गई।
  3. कृषि बचतों में वृद्धि – खार्द्यार्न्न में उत्पार्दन में वृद्धि क एक परिणार्म यह हुआ कि मण्डी में बिकने वार्ले खार्द्यार्न्न की मार्त्रार् में वृद्धि हो  गइ। जिससे कृषक के पार्स बचतों की मार्त्रार् में उल्लेखनीय प्रगति हुई है जिसको देश के विकास के लिए काम में लार्यार् जार् रहार् है। यह वृद्धि, विशेषकर औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए लार्भकारी रही।
  4. विश्वार्स – हरित क्रार्न्ति क सबसे बड़ार् लार्भ यह हुआ है कि कृषक, सरकार व जनतार् सभी में यह विश्वार्स जार्ग्रत हो गयार् है कि भार्रत में कृषि पदाथों के क्षेत्र में केवल आत्मनिर्भर ही नहीं हो सकतार् है बल्कि आवश्यकतार् पड़ने पर निर्यार्त भी कर सकतार् है।
  5. खार्द्यार्नों के आयार्त में कमी – प्रो0 एस0 एल0 दार्न्तवार्लार् के मत में ‘हरित क्रार्न्ति ने सॉंस लेने योग्य रार्हत क समय दियार् है। इसके खार्द्यार्न्नों की कमी की चिन्तार् से छुटकारार् मिलेगार् और अर्थशार्स्त्रियों व नियोजकों क ध्यार्न पुन: भार्रतीय योजनार्ओं की ओर लगेगार्। वार्स्तव में हरित क्रार्न्ति होने से खार्द्यार्नों क आयार्त 1978 से 1980 तक पूर्णत: बन्द कर दियार् गयार् थार्। 2009-10 में 85, 211 करोड़ रुपयो क कृषि पदाथों क निर्यार्त कियार् गयार्। कृषि पदाथों क निर्यार्त कुल निर्यार्त क 9.9 प्रतिशत थार्। इस प्रकार विदेशी मुद्रार् के खर्च में बहुत बचत हो गई है।
  6. कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्र के सम्बन्धों में मजबूती – नवीन कृषि तकनीकी तथार् कृषि के आधुनिकीकरण ने कृषि तथार् उद्योग के परस्पर सम्बन्ध को और भी अधिक सुदृढ़ बनार् दियार् है। पार्रम्परिक रुप में यद्यपि कृषि और उद्योग क अग्रगार्मी सम्बन्ध पहले से ही मजबूत थार् क्योंकि कृषि क्षेत्र द्वार्रार् उद्योगों के लिए आयार्त उपलब्ध करार्ये जार्ते हैं। जैसे चीनी मिल के लिए गन्नार्, कपड़ार् मिल के लिए कपार्स। कृषि के आधुनिकीकरण के फलस्वरुप अब कृषि में उद्योग निर्मित आयार्तों जैसे कृषि यंत्र व रार्सार्यनिक उवर्रक की मार्ंग में भार्री वृद्धि हुई है।
  7. कृषि एवं गैर कृषि क्षेत्रों में रोजगार्र के नये अवसर – कृषि की नई तकनीकि अथवार् हरित क्रार्न्ति के कारण कृषि उत्पार्दन में वृद्धि हुई जिसके परिणार्मस्वरुप फसलों की कटार्ई के लिए श्रम की मार्ंग बढ़ गई। एक वर्ष में, एक की बजार्ए दो फसलों के उगार्ने के कारण भी श्रम की मार्ंग में काफी वृद्धि हुई है। उदार्हरणतयार्, पंजार्ब व हरियार्णार् में अक्टूबर तथार् नवम्बर धार्न को काटने तथार् इसके पश्चार्त् गेहॅू के बोने के कारण श्रम की मार्ंग बढ़ गई है। कृषि में उत्पार्दन में वृद्धि के कारण, कृषि पर आधार्रित उद्योग क विकास हुआ है। इन उद्योगों में भी श्रम क प्रयोग बढ़ गयार् है। सेवार् क्षेत्र में भी हरित क्रार्न्ति के कारण रोजगार्र बढ़ार् है। अधिक उत्पार्दों तथार् अधिक कृषि सार्धनों के परिवहन तथार् मण्डी सम्बन्धी सेवार्ओं के परिवार्हन तथार् मण्डी सम्बन्धी सेवार्ओं की आवश्यकतार् नें भी रोजगार्र में वृद्धि की है।
  8. ग्रार्मीण विकास – हरित क्रार्न्ति के फलस्वरुप सावजनिक एवं निजी निर्मार्ण कार्यों को प्रोत्सार्हन मिलार् है। ग्रार्मीण क्षेत्र में बैंकों की गतिविधियॅार् बढ़ गई हैं।

हरित क्रार्ंति की कमियॉ अथवार् समस्यार्यें

हमें ज्ञार्त हो चुक है कि हरित क्रार्न्ति के परिणार्मस्वरुप कुछ फसलोंं के उत्पार्दन में पर्यार्प्त वृद्धि हुई है। देश को आर्थिक, सार्मार्जिक व रार्जनीतिक दृष्टि से लार्भ हुआ है। नीचे हम इनमें से कुछ समस्यार्ओं क वर्णन कर रहे हैं:-

  1. कृषि विकास में असन्तुलन – हरित क्रार्न्ति क क्षेत्र कुछ ही रार्ज्यों तक सीमित है। विशेष रुप से उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पंजार्ब, हरियार्णार्, महार्रार्ष्ट्र व तमिलनार्डु में कृषि के विकास में एक आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। दूसरी ओर रार्जस्थार्न, हिमार्ंचल प्रदेश, बिहार्र तथार् असम जैसे रार्ज्य कृषि में कोई विशेष प्रगति न लार् सके। यहॉ हम यह भी बतार्नार् चार्हते हैं कि हरित क्रार्न्ति ने न केवल देश के भिन्न-भिन्न भार्गों में, कृषि के विकास की दर में असमार्नतार् पैदार् की, अपितु देश के एक ही क्षेत्र में कृषि के विकास में असार्मनतार् पैदार् कर दी। जेसे कि पंजार्ब के रुपनगर तथार् होशियार्रपुर के जिलों में, यार् हरियार्णार् के नार्रनौल जिले में, सिंचार्ई की पर्यार्प्त सुविधार्ओं के उपलब्ध न होने के कारण, कृषि में प्रगति न हुई जबकि इन रार्ज्यों के बार्की हिस्सों में कृषि के विकास की गति बहुत बढ़ गई।
  2. कुछ ही फसलों तक सीमित – अनार्ज के सम्बन्ध में हरित क्रार्न्ति गेहॅू की फसल के सार्थ ही प्रमुख रुप से जुड़ी रही है। नए बीज सफल नहीं हुए। यह मार्ननार् पड़ेगार् कि दार्लों, व्यार्पार्रिक फसलों जैसे कपार्स, तिलहन, पटसन आदि के सम्बन्ध में अधिक उपज वार्ले बीज तैयार्र करने के प्रयार्स बहुत सफल नही हो सके हैं। हम यह कहनार् चार्हेंगे कि भार्रत में वे उपखण्ड जहॉ सिंचार्ई की सुविधार्एं पर्यार्प्त मार्त्रार् में उपलब्ध थीं, उन क्षेत्रों के हरित क्रार्न्ति गेहॅू और चार्वल क उत्पार्दन बढ़ार्ने में सहार्यक हुई।
  3. आय के वितरण में भार्री असार्मनतार् – हरित क्रार्न्ति के परिणार्मस्वरुप धनी कृषक वर्ग पहले की अपेक्षार् अधिक अमीर हो गए और गरीब किसार्नों की आय के स्तर में विशेष वृद्धि नहीं हो पार्ई और दूसरे किसार्नों की तुलनार् में गरीब होते गए। डार्0 वी0 के0 आर0 वी0 रार्व के अनुसार्र, ‘‘यह बार्त सर्वविदित है कि तथार् कथित हरित क्रार्न्ति जिसने देश में खार्द्यार्न्नों क उत्पार्दन बढ़ार्ने में सहार्यतार् दी है, के सार्थ ग्रार्मीण आय में असमार्नतार् बढ़ी है, बहुत से छोटे किसार्नों को अपनी काश्तकारी अधिकार छोड़ने पड़े हैं और ग्रार्मीण क्षेंत्रों में सार्मार्जिक और आर्थिंक तनार्व बढे़ हैं।’’ कृषि की नई टैक्नोलोजी के अपनार्ए जार्ने के कारण, ग्रार्मीण समार्ज दो भार्गों में बंट गयार्। प्रत्येक गार्ंव में, इन दोनों वर्गों की आर्थिंक स्थिति में अन्तर स्पष्ट दिखार्ई देतार् है।
  4. पूंजीवार्दी खेती को प्रोत्सार्हन – हरित क्रार्न्ति, बड़ी मशीनों, उर्वरक तथार् सिंचार्ई सुविधार्ओं में एक भार्री निवेश पर आधार्रित है। बड़े किसार्नों ने ही कृषि की नई तकनीकी क लार्भ उठार्यार्। इन सुविधार्ओं क लार्भ छोटे किसार्नों कम पूंजी होने के कारण नहीं उठार् पार्ये। All India Rural Credit Review Committee (1969) के अनुसार्र, 705 एकड़ तथार् इससे अधिक भूमि वार्ले किसार्नों की संख्यार् कुल किसार्नों की संख्यार् की 38 प्रतिशत थी, जबकि इसके पार्स खेती अधीन भूमि क 70 प्रतिशत भार्ग थार्, इन्हीं किसार्नों ने बड़ी मशीनों के प्रयोग, कुछ श्रमिकों को काम से निकाल दियार् तथार् बचे हुए श्रमिकों को उचित वेतन न दिये।
  5. बड़े खेतों पर रोजगार्र के अवसरों में कमी – जैसार् हम जार्नते हैं कि कृषि की नई तकनीकि क प्रयोग करने के कारण मशीनों क अधिक प्रयोग पड़ार्, जिससे कृषि उत्पार्दकतार् तो बढ़ी। हरित क्रार्न्ति में कृषि मशीनों के प्रयोग को बढ़ार्वार् दिय जैसे फसलों को बोने तथार् कटार्ई के लिए ट्रैक्टर तथार् थे्रशर क प्रयोग बढ़ार्, जिससे खेतों पर काम कर रहे श्रमिक बेरोजगार्र हो गये।
  6. भूमि व मार्नव स्वार्स्थ्य पर हार्निकारक प्रभार्व – यह हम जार्नते हैं कि हरित क्रार्न्ति के कारण रसार्यनिक उवर्रकों तथार् फसलों को कीट पतंगों से बचार्ने के लिए कीटनार्शक दवार्ईयों क प्रयोग अधिक बढ़ गयार् थार्। रार्सार्यनिक उवर्रकों के अधिक प्रयोग के कारण, भूमि की उपजार्ऊ शक्ति कम होती जार् रही है, कीटनार्शक दवार्ई क लोगों के स्वार्स्थ्य पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़ार् है। गेहॅू और चार्वल की खेती के लिए भूमिगत जल, क प्रयोग (ट्यूबवैल द्वार्रार्) अत्यार्धिक बढ़ गयार् है, जिसके कारण जलस्तर घट गयार् है और पर्यार्वरण को क्षति पहुॅचने लगी है।
  7. हरित क्रार्न्ति ने भूमि सुधार्र कार्यक्रमों की आवश्कयतार् की अवहेलनार् की – देश में भूमि सुधार्र कार्यक्रम सफल नहीं रहे हैं और लार्खों कृषकों को आज भी भू-धार्रण की निश्चिततार् नहीं प्रदार्न की जार् सकती है। संयुक्त रार्ष्ट्र के महार्सचिव ने कहार् थार् कि हरित क्रार्न्ति एक औषधि कोष होने के बजार्य बीमार्रियों क एक स्त्रोत बन सकती है। उन्होनें यह भी कहार् थार् कि यदि विकासशील देश शीघ्र ही भूमि सुधार्रों को लार्गू नहीं करते तो हरित क्रार्न्ति के लार्भ, मुख्य रुप से उन किसार्नों को होंगे जो कि वार्णिज्यक स्तर पर खेती करते हैं, न कि छोटे किसार्नों को और वार्णिज्यक स्तर पर खेती करने वार्ले किसार्नों में, बड़े किसार्न, दूसरों की तुलनार् में अधिक लार्भ उठार्येंगें।
  8. हरित क्रार्न्ति के लिए आवश्यक सुविधार्ओं की कमी – सिंचार्ई के सार्धन, कृषि सार्ख, आर्थिक जोत तथार् सस्ते कृषि आगतों क अभी भी देश में अभार्व है। छोटे किसार्न इन सभी सार्धनों के अभार्व में हरित क्रार्न्ति के लार्भों से वंचित रह गये हैं। जिससे कृषि विकास में वार्ंछित सफलतार् नहीं प्रार्प्त हो पार् रही है।
  9. उत्पार्दन लार्गत में वृद्धि – नयार् तकनीकि ज्ञार्न अर्थार्त् उन्नत बीज, उवर्रक, कीटनार्शक दवार्ईयों, सिंचार्ई के लिए विद्युत, डीजल, तेल क उपयोग, उन्नत कृषि यंत्रों के क्रय करने आदि के अपनार्ने में फसलों की खेती करने पर प्रति हेक्टेयर लार्गत अधिक आती है। इसके लिए किसार्नों को पहले की अपेक्षार् अधिक पूंजी की आवश्यकतार् होती है।

हरित क्रार्ंति की सफलतार् के लिए सुझार्व

  1. भूमि सुधार्र कार्यक्रमों को प्रोत्सार्हन – हरित क्रार्न्ति को सफल व व्यार्पक बनार्ने के लिए भूमि सुधार्र कार्यक्रमों को प्रभार्वी और विस्तृत रुप से लार्गू कियार् जार्नार् चार्हिए। सीमार् निर्धार्रण से प्रार्प्त अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन किसार्नों को वितरित कियार् जार्नार् चार्हिये। इसके अतिरिक्त चकबन्दी को प्रभार्वी बनार्कर जोतों के विभार्जन पर रोक लगार्ए जार्ने की आवश्यकतार् है। जिससे कृषि की नई तकनीकी प्रभार्वी रुप से लार्गू हो पार्ए।
  2. कृषि वित्त की सुविधार्ओं क विस्तार्र – हरित क्रार्न्ति क लार्भ छोटे किसार्न भी उठार् पार्एं इसके लिए आवश्यकतार् है कि वित्तीय संस्थार्एं प्रशार्सनिक व अन्य तरीकों से इन किसार्नों को ऋण आसार्न किश्तों में उपलब्ध करार्यें। कृषि की नई तकनीकी को अपनार्ने के लिए वित्तीय संस्थार्ओं को किसार्नों को प्रोत्सार्हन देनार् होगार्।
  3. सिंचार्ई सुविधार्ओं क विस्तार्र – कृषि के विकास के लिए विशेष तौर पर शुष्क व उपशुष्क उपखण्डों में कृषि की नई तकनीकी क लार्भ उठार्ने के लिए सिंचार्ई सुविधार्ओं क विस्तार्र कियार् जार्नार् आवश्यक है। इसके लिए लधु सिंचार्ई परियोजनार्ओं के विस्तार्र वर्षार् के जल को इकट्ठार् करके (Rain Water harvesting) खेतों की सिंचार्ई छिड़काव प्रणार्ली, (Sprinter System) द्वार्रार् की जार्ए, तो इससे पार्नी, बिजली, श्रम सब में बचत होगी।
  4. हरित क्रार्न्ति क अन्य फसलों पर फैलार्व – हरित क्रार्न्ति के प्रभार्व क्षेत्र में गेहॅू और चार्वल के अतिरिक्त दार्लों, कपार्स, पटसन, तिलहन, गन्नार् आदि के नए बीजों क विकास करने की आवश्यकतार् है। यदि इन फसलों के लिए ऊॅची उत्पार्दकतार् वार्ले बीजों क विकास कियार् जार्ए तो कृषि क्षेत्र में सम्पूर्ण क्रार्न्ति आ जार्एगी और कृषि में असन्तुलन भी कम हो जार्एगार्। 
  5. सीमार्न्त व छोटे खेतों व छोटे किसार्नों को लार्भ पहुॅचार्नार् – जैसार् कि हम जार्नते हैं कि हरित क्रार्न्ति क अधिकतम लार्भ बड़े किसार्न ही उठार् पार्ये हैं इसलिए यह आवश्यक है कि:- (क) छोटे-छोटे किसार्नों को सहकारी खेती को अपनार्ने के लिए प्रेरित कियार् जार्ए। (ख) भूमि सुधार्र कार्यक्रमों को जल्दी व प्रभार्वी ढंग से लार्गू कियार् जार्ए। (ग) छोटे किसार्नों को उन्नतबीज, उर्वरक खरीदने व सिंचार्ई सुविधार्ओं के लिए सरलतार् से सार्ख सुविधार्एँ बैंकों द्वार्रार् उपलब्ध करार्यी जार्एं।
  6. मूल्य नीति को प्रोत्सार्हनदार्यक बनार्नार् – हमें ज्ञार्त है कि सरकार की कृषि मूल्य नीति कुछ ही फसलों तक सीमित रही है इसलिए अन्य फसलों के उत्पार्दन में असन्तुलन देखने को मिलतार् है। सरकार की मूल्य नीति इस प्रकार की होनी चार्हिए कि सभी फसलों के उत्पार्दन को प्रोत्सार्हन मिल पार्ए। 
  7. अन्य फसलों के लिए भी उन्नत किस्म के बीजों क विकास – हम एक बार्त बतार्नार् चार्हेंगे कि हरति क्रार्न्ति के बार्द मुख्यत: चार्वल और गेहॅू की उत्पार्दक्तार् में बहुत वृद्धि हुई। परन्तु अन्य फसलों जैसे दार्ल, तिजहन, कपार्स और पटसन की उत्पार्दकतार् में वृद्धि नहीं हो पार्ई। इसक कारण यह है कि इनके लिए उन्नत किस्म के बीजों क विकास न हो पार्नार् तथार् इनकी उपज को बढ़ार्ने के लिए अन्य उपार्य करनार् इसलिए आवश्यकतार् इस बार्त की हे कि विशेष तौर पर छोटे व सीमार्न्त किसार्नों को ऐसे बीज उपलब्ध करार्ये जार्एं। इससे न केवल किसार्न अपनी भूमि पर कुछ ही फसलें (गेहॅू व चार्वल) उत्पार्दित करेंंगे वरन् फसलों में भी विविधतार् को प्रोत्सार्हन मिलेगार्।
  8. शुष्क खेती को प्रोत्सार्हन की आवश्यकतार् – हमने पहले यह बतार्यार् है कि हरित क्रार्न्ति क लार्भ मुख्यत: सिंचार्ई की सुविधार् से युक्त भूमि को ही मिलार् है। परन्तु भार्रत के शुष्क उपखण्डों में फसलों की प्रति एकड़ उत्पार्दकतार् न केवल कम हैं बल्कि उसमें उतार्र – चढ़ार्व भी है। ऐसे उपखण्डों में ऐसी फसलों को उगार्ए जार्ने की आवश्यकतार् है जो न केवल कम समय में तैयार्र हो जार्ए बल्कि सूखे से भी प्रभार्वित न हो।
  9. फसलों की बीमार् योजनार् – फसल बीमार् योजनार् क लार्भ लघु एवं सीमार्न्त कृषकों तक पहुॅचार्ने के लिए केन्द्र व रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् प्रयार्स किये जार्ने चार्हिए। सरकार द्वार्रार् व्यार्पक-फसल बीमार् योजनार् अपै्रल 1985 में कृषकों को उनकी फसलों के सूखार्, अति वृष्टि आदि कारणों से नष्ट होने की स्थिति में वित्तीय सहार्यतार् प्रदार्न करने हेतु प्रार्रम्भ की गई है। इस योजनार् क मुख्य उद्देश्य किसार्नों को अनिश्चिततार् के समय विश्वार्स दिलार्नार् है।

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