सार्म्रार्ज्यवार्द क अर्थ

सार्म्रार्ज्यवार्द के अर्थ को समझनार् आसार्न नही है। अलग-अलग विद्वार्नों ने अनेकों तरह से इसके सार्र को समझार्नें की कोशिश कर इसे काफी कठिन कर दियार् है। फिर भी इसके अर्थ को सरल भार्षार् में कहें तो वह, यह है कि, पूंजीवार्द जब अपने विकास के चर्मोत्कर्ष पर पहुंच जार्तार् है तो, वह सार्म्रार्ज्यवार्द में परिवर्तित हो जार्तार् है। 19वीं सदी के अंत तथार् 20वीं सदी के शुरू में पूंजीवार्द अपनी उन्नति के शिखर पर पहुंच चुक थार्। पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशार्ली औद्योगिक एवं बैंकिंग संगठनों क निर्मार्ण हुआ, जिन्हें इजार्रेदार्रियार्ँ कहार् जार्तार् है। इन्होंने पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के मूलभूत ढार्ंचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर दिए। अर्थव्यवस्थार् में ठोस परिवर्तनों के सार्थ ही पूंजीवार्दी रार्ष्ट्रों के शार्सक वर्ग की रार्जनीति में मूलभूत परिवर्तन आए। इस प्रकार पूंजीवार्दी व्यवस्थार् अपने विकास की एक नयी व्यवस्थार् में प्रविष्ठ हुआ- इसे ही सार्म्रार्ज्यवार्द कहते हैं। इसके फलस्वरूप उपनिवेशों की छीनार्-झपटी होने लगी और युद्धों के द्वार्रार् ही यह उपनिवेश प्रार्प्त किए जार् सकते थे। अत: सार्म्रार्ज्यवार्द ने युद्धों को अवश्यम्भार्वी बनार् दियार्। इसके उदार्हरण है : स्पेन-अमेरिकी युद्ध-1898, जिसमें अमेरिक ने स्पेन से 1903 में फिलीपीन्स छीन लियार्।

दक्षिणी अफ्रीक में आंग्ल- बोअर युद्ध (1899-1902) जिसमें इग्लैण्ड ने दक्षिणी अफ्रीक में अपनार् वर्चस्व स्थार्पित कियार्। 1904-05 में रूस-जार्पार्न युद्ध आदि। ये सभी सार्म्रार्ज्यवार्दी युद्ध थे। क्योंकि अब विश्व में कोर्इ खार्ली जगह नहीं बची थी, जिस पर उपनिवेश स्थार्पित किए जार् सकें। इसलिए पूंजीवार्द के प्रसार्र के लिए उन्हें स्थार्पित करने के लिए, युद्धों के द्वार्रार् ही प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् थार्।

सार्म्रार्ज्यवार्द के सिद्धार्ंत –

सार्म्रार्ज्यवार्द के सिद्धार्ंतों के बार्रे में दो व्यक्तियों की पुस्तकें सर्वार्धिक प्रचलित हैं – जार्न एटकिन्स हॉब्सन एवं ब्लार्दिमीर इलिच लेनिन

जे. ए. हॉब्सन –

हार्ब्सन क जन्म 1858 में इग्लैण्ड में हुआ थार्। मूलत: वे एक व्यार्पार्री थे एवं तार्त्कालीन उत्पार्दन कलार् क उन्हें अच्छार् ज्ञार्न थार्। वे एक अच्छे पत्रकार थे, गूढ़ अर्थ शार्स्त्री, पूंजीवार्दी, सुधार्रवार्द और शार्ंतिवार्द के एक प्रचार्रक तथार् सार्म्रार्ज्यवार्द के प्रशंसक थे। हॉब्सन अपनी प्रसिद्ध कृतियों- ‘नेशनल गिल्डस एण्ड दि स्टेट’ तथार् ‘सार्म्रार्ज्यवार्द’ के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। हॉब्सन ने ‘सार्म्रार्ज्यवार्द’ (Imperialism) में उपनिवेशवार्द एवं सार्म्रार्ज्यवार्द की विस्तार्र से चर्चार् की है। यह पुस्तक 1902 में लन्दन और न्यूयाक से प्रकाशित हुर्इ थी। इस पुस्तक में, उपनिवेशवार्द और सार्म्रार्ज्यवार्द की मुख्य आर्थिक और रार्जनैतिक विशेषतार्ओं क बहुत अच्छार् और विस्तृत वर्णन कियार् है। दूसरार् नार्म जो सार्म्रार्ज्यवार्द के सिद्धार्ंतों के लिए सर्वार्धिक प्रचलित और वैज्ञार्निक विश्लेषण के लिए प्रसिद्ध है वह है, रूस की 1917 की समार्जवार्दी क्रार्ंति के जनक ब्लार्दिमीर इलियच लेनिन।

ब्लार्दिमीन इल्यिच लेनिन (1870-1924) –

इस प्रश्न, कि सार्म्रार्ज्यवार्द क्यार् है? क उत्तर व्लार्दीमिर इल्यीच लेनिन (1870-1924) ने कार्ल मार्क्र्स तथार् एंगेल्स के कार्यों को आगे बढ़ार्ते तथार् उनके सिद्धार्ंत को विकसित करते हुए दियार्। तथ्यों और आंकड़ों की विरार्ट सार्मग्री क गहन अध्ययन करने के बार्द लेनिन ने अपनी कृति ‘सार्म्रार्ज्यवार्द, पूंजीवार्द की चरम अवस्थार्’ लिखी (1916), जिसमें उन्होंने उन गुणार्त्मक परिवर्तनों को दर्शार्यार्, जो मार्क्र्सकृत ‘पूंजी’ के प्रथम खंड के प्रकाशन के बार्द की आधी सदी में हुए थे। लेनिन की पुस्तक, सार्मार्जिक विकास के, मार्क्र्स और एंगेल्स द्वार्रार् अन्वेषित नियमों पर आधार्रित थी और पूंजीवार्दी सार्मार्जिक-आर्थिक विरचनार् में एक विशेष अवस्थार् के, उसकी उच्चतम और अंतिम अवस्थार् के रूप में सार्म्रार्ज्यवार्द के आर्थिक और रार्जनीतिक सार्र क गहन विश्लेषण पेश करने वार्ली पहली कृति थी। उन्होंने सार्बित कियार् कि, सार्म्रार्ज्यवार्द में पूंजीवार्द के सार्रे मूल लक्षण यथार्वत बने रहते हैं : उत्पार्दन के सार्धनों पर पूंजीवार्दी निजी स्वार्मित्व, बुर्जुआ वर्ग द्वार्रार् उजरती मजदूरों के शोषण के संबंध तथार् भौतिक मूल्यों के वितरण क वह रूप, जिसके अंतर्गत श्रमजीवियों की दशार् बिगड़ती जार्ती है और पूंजीपतियों की संपदार् व ऐशो-आरार्म बढ़ते जार्ते हैं। पूंजीवार्द के आर्थिक नियम सार्म्रार्ज्यवार्द के अंतर्गत भी चार्लू रहते हैं, जैसे बेशी मूल्य क बुनियार्दी आर्थिक नियम, पूंजीवार्दी संचय क सार्मार्न्य नियम, प्रतिद्वंद्वितार् तथार् उत्पार्दन की अरार्जकतार् क नियम, आदि। सार्थ ही पूंजीवार्द के मूल आर्थिक अंतर्विरोध भी बरकरार्र रहते हैं। परंतु सार्म्रार्ज्यवार्द में कुछ ऐसे विशिष्ट लक्षण भी होते हैं, जो उसे पूंजीवार्दी विकास की पूर्ववर्ती अवस्थार्ओं से भिन्न बनार् देते हैं। सार्म्रार्ज्यवार्द के ये विशिष्ट लक्षण किस प्रकार से व्यक्त होते हैं? आर्थिक क्षेत्र में सार्म्रार्ज्यवार्द सबसे पहले “मुक्त प्रतिद्वंद्वितार्” को इजार्रेदार्र प्रभुत्व से प्रतिस्थार्पित किये जार्ने क द्योतक है। रार्जनीतिक क्षेत्र में, यह सार्मार्जिक जीवन के हर क्षेत्र में बुर्जुआ जनवार्द के प्रतिक्रियार्वार्द तथार् हिंसार् में तबदील होने की शुरूआत करतार् है। इजार्रेदार्रियों से पहले के पूंजीवार्द की तुलनार् में सार्म्रार्ज्यवार्द पूंजीवार्द की चरम और सार्थ ही अंतिम अवस्थार् है, समार्जवार्दी क्रार्ंति की देहरी है।

सार्म्रार्ज्यवार्द के मुख्य लक्षण 

जैसार् कि हमने पीछे अध्ययन कियार्, पूंजीवार्द जब अपनी उन्नति की चरम सीमार् पर पहुंच जार्तार् है तो उसक परिवर्तन सार्म्रार्ज्यवार्द में हो जार्तार् है। पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में यह स्थिति 19वीं सदी के अन्त और बींसवी सदी के शुरू में स्पष्ट दिखाइ देती है। इसक सबसे अच्छार् विश्लेषण जैसार् कि ऊपर कहार् गयार् है, लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सार्म्रार्ज्यवार्द पूंजीवार्द की चरम सीमार्’ (1916) में विस्तार्र से कियार् है। जिनक वर्णन इस प्रकार है –

1. उत्पार्दन क सकेन्द्रण और इजार्रेदार्रियार्ं 

19वीं सदी के अंत में विभिन्न उद्योगों में तेजी से बृद्धि हुर्इ और उनके आकार बड़े हो गए। इस तरह उत्पार्दन के सार्धन, श्रम-शक्ति तथार् उत्पार्दन बड़े उद्वोगों में केन्द्रित होने लगे। इस प्रकार बड़े उद्योगों ने छोटों को हड़प लियार्। परिणार्म स्वरूप बड़ी-बड़ी इजार्रेदार्रियों (Monopolies) क निर्मार्ण हुआ। इसक अर्थ होतार् है – किसी उद्योग विशेष में कुछ कम्पनियों द्वार्रार् विश्व स्तर पर नियंत्रण स्थार्पित कर बार्जार्रों में कब्जार् कर लेनार्। ये कम्पनियार्ं परस्पर समझौते कर आपसी प्रतिस्पर्धार् को नियंत्रित कर विश्व बार्जार्रों में मूल्यों तक को तय करती है।

2. बैक पूंजी और औद्योगिक पूंजी क एकीकरण 

अभी तक बैक की भूमिक मार्त्र ऋण देनार् एवं उस व्यार्ज से मुनार्फार् कमार्नार् थार्, लेकिन अब बैंक भी उद्योगपतियों के सार्थ मिलकर विश्व भर में पैसार् लगार्ने लगे और वे भी मुनार्फार् कमार्ने लगे यह भी सार्म्रार्ज्यवार्द क एक लक्षण थार्।

3. पूंजीवार्द क निर्यार्त 

अभी तक विदेशों से कच्चार् मार्ल लार्कर उसे वस्तुओं में परिवर्तित कर दुनियार् के बार्जार्रों में भेज, लार्भ कमार्यार् जार्तार् थार्, लेकिन 19वीं सदी के अंत तक अब मार्त्र पूंजी निर्यार्त कर, विदेशों में ही कच्चार् मार्ल सस्ते मजदूर और फिर बार्जार्र थे, अत: वही उद्योग स्थार्पित कर भार्री लार्भ कमार्यार् जार्ने लगार्।

4. विश्व क आर्थिक और क्षेत्रीय विभार्जन 

अन्तरार्ष्ट्रीय इजार्रेदार्रियों द्वार्रार् विश्व क आर्थिक विभार्जन तथार् पूंजीवार्दी रार्ष्ट्रों द्वार्रार् भूमण्डल क अंतिम क्षेत्रीय विभार्जन, सार्म्रार्ज्यवार्द दो मुख्य विशेषतार्एं थीं। ये इजार्रेदार्रियार्ं पूरे विश्व के बार्जार्रों को आपस में बार्ंट कर अपनार् प्रभुत्व स्थार्पित कर देती हैं। अन्तर्रार्ष्ट्रीय कर्टेलों की स्थार्पनार् कर आपस में समझौते कर ये इजार्रेदार्रियार्ं पूरे विश्व में ऐसी नियंत्रण में कर लेती हैं। अब विश्व में ऐसी कोर्इ जगह नहीं बचती जहार्ं कोर्इ रार्ष्ट्र जार्कर कब्जार् कर सके। अब सिर्फ नए बार्जार्रों को युद्धों के द्वार्रार् ही छीनार् जार् सकतार् थार्। अत: सार्म्रार्ज्यवार्द में युद्धों क होनार् अवश्यम्भार्वी हो गयार्। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्धों क सार्म्रार्ज्यवार्दी आकांक्षार् एक मुख्य कारण थी।

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