सार्मुदार्यिक संगठन में निपुणतार्
सार्मुदार्यिक संगठन समार्ज कार्य की एक प्रणार्ली है। एक प्रणार्ली क अर्थ ज्ञार्न और सिद्धार्न्तों क योग ही नही है। प्रणार्ली क अर्थ ज्ञार्न और सिद्धार्न्तों क एक क्रियार्कलार्प में इस प्रकार प्रयोग कि उससे परिवर्तन हो जार्ए। यही निपुणतार् कहलार्ती है। इसे वर्जीनियार् रॉबिन्सन (Virginia Robinson) ने किसी विशेष पदाथ में परिवर्तन की एक प्रक्रियार् को इस प्रकार गतिमार्न करने और उसे नियन्त्रण में रखने की क्षमतार् कहार् है जिससे परिवर्तन जो पदाथ में आतार् है वह उस पदाथ की योग्यतार् और गुणतार् के प्रयोग से प्रभार्वित हो।

सार्मुदार्यिक संगठन में निपुणतार् क आशय

जॉनसन के अनुसार्र प्रत्येक व्यवसार्य की अपनी-अपनी निपुणतार्एॅ होती हैं। निपुणतार्ओं क मार्नकीकरण नहीं कियार् जार् सकतार्। निपुणतार् में कार्यकर्त्तार् और विषय की क्षमतार् सम्मिलित होती है उसके अनुसार्र क्षमतार् निम्न तरीकों से सार्मने आती है:-

  1. जिस तरीके से सौहाद यार् घनिश्ठतार् स्थार्पित की जार्ती है:
  2. जिस तरीके से व्यक्तियों की अपनी भार्वनार्ओं को निर्मुक्त करने में और प्रतिरोध पर काबू पार्ने में सहार्यतार् दी जार्ती है:
  3. जिसे तरीके से व्यक्तियों को वैयत्तिक एवं सार्मार्जिक प्रबोध क विकास करने और वार्ंछित सार्मार्जिक उद्देश्यों के लिये संप्रेरित कियार् जार्तार् है;
  4. जिस तरीके से व्यक्तियों को अपने विचार्र स्पष्ट करने और अपने उद्देश्यों की व्यार्ख्यार् करने में सहार्यतार् दी जार्ती है;
  5. जिस तरीके से समार्ज कल्यार्ण सम्बन्धी आवश्यकतार्ओं, सार्धनों और कार्यक्रम क ज्ञार्न व्यक्तियों को उनके प्रयोग के लिये दियार् जार्तार् है;
  6. जिस तरीके से विचार्रों की एकतार् और एकीकरण प्रयार्स के आधार्र के रूप में प्रार्प्त कियार् जार्तार् है; और 
  7. जिस तरीके के उद्देश्यों की ओर गति को बनार्ये रखार् जार्तार् है।

सार्मुदार्यिक संगठन में निपुणतार्ओं और कार्यविधियों क उल्लेख करते हुए रार्व ने कहार् कि विभिन्न क्षेत्रों में दक्षतार् से कार्य करने के लिए सार्मुदार्यिक कार्यकर्त्तार् को समार्ज कार्य की मौलिक प्रणार्लियों में अपने प्रशिक्षण पर अधिक निर्भर रहनार् पड़तार् है जिसमें उसकी मनोवृतियॉ, ज्ञार्न और प्रबोध और अभ्यार्स सम्मिलित होते है। सार्मुदार्यिक संगठन में कार्यकर्त्तार् के ज्ञार्न क आधार्र सार्मुदार्यिक प्रक्रियार्ओं जैसे सार्मार्जिक परिवर्तन, सार्मार्जिक स्तरीकरण, नेतृत्व, सार्मूहिक गतिकी आदि पर होतार् है। सबसे अधिक महत्पूर्ण सार्मार्जिक अन्त:क्रियार्ओं (सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक) और सार्मार्जिक नियन्त्रण के सार्धनों क ज्ञार्न होतार् है। रार्व ने जॉनसन क हवार्लार् देते हुए सार्मुदार्यिक संगठन कार्यकर्त्तार् में कर्इ प्रकार की निपुणतार्ओं क होनार् अनिवाय बतार्यार् है जैसे (1) व्यक्तियों, समूहों और समुदार्य के आन्तरिक सम्बन्धों क निर्मार्ण और उन्हें बनार्ये रखने की योग्यतार्; (2) उर्पयुक्त समय को देखकर व्यार्वसार्यिक निर्णय के प्रयोग की मौलिक निपुणतार्; (3) समुदार्य में रूचि के कम होने यार् समार्प्त होने के प्रति संवेदनशीलतार् (4) समुदार्य के कल्यार्ण सम्बन्धी योजनार् को कब आरम्भ कियार् जार्ए और कब प्रयार्स को रोक जार्ए, इसकी सूझ-बूझ; और (5) सार्मार्न्य उद्देश्यों के लिये सार्मूहिक चिंतन को विकसित करने और उसक प्रयोग करने में निपुणतार्ओं में रार्व ने जिनको मार्नार् है वह है:-

सार्क्षार्त्कार और परार्मर्श में निपुणतार्

एक समार्ज कार्यकर्तार् को सार्क्षार्त्कार एवं परार्मर्श सम्बन्घी समस्त जार्नकारी होनी चार्हिये तार्कि वह सार्क्षार्त्कार के दौरार्न उन सभी पहलुओं को शार्मिल कर सकें जो उस कार्य हेतु अति आवश्यक है और जो उद्देश्य पूर्ति हेतु सहजतार् प्रदार्न करते हैं। एक सार्मुदार्यिक कार्यकर्तार् को सार्क्षार्त्कार की निपुणतार्ओं एवं कौशलों क बड़ी निपुणतार् से पार्लन करनार् चार्हिए। समुदार्य की आवश्यकतार्ओं एवं समस्यार्ओं क पूर्ण ज्ञार्न होनार् चार्हिये। परार्मर्श के दौरार्न निश्पक्षतार् से कार्य संपार्दित करनार् चार्हिये। कि कुशल परार्मर्शदार्तार् सदैव ही परार्मर्श की कुशलतार्ओं क प्रयोग करते हुए कार्य करतार् है।

अभिलेखन एवं प्रतिवेदन में निपुणतार्

प्रत्येक कार्य की कुशलतार् इस बार्त पर निर्भर करती है कि उसक अभिलेखन कितने प्रभार्वी ढ़ग से एवं कुशार्ग्रतार् से कियार् गयार् है। अभिलेखन की प्रभार्विकतार् से ही कार्य संपार्दन एवं साथकतार् प्रार्प्त की जार् सकती है।एक कुशल अभिलेखनकर्तार् को ,अभिलेखन के 51 दौरार्न समार्ज कार्य की निपुणतार्ओं क पूर्ण ज्ञार्न आवश्यक होतार् है जिसके द्वार्रार् अभिलेखन को प्रभार्वी ढ़ग से सम्पार्दित कियार् जार् सकतार् है।अभिलेखन एवं प्रतिवेदन की निपुणतार् से एक समार्ज कार्य कर्तार् अपने कार्यकुशलतार्ओं क प्रयोग करते हुए कार्य प्रतिपार्दित करतार् है।

अनुसंधार्न की विधियों में निपुणतार्

आंकडे एकत्रित करते समय समार्ज कार्य कर्तार् अनुसंधार्न की प्रविधियों क प्रयोग करतार् है जिससे उसे कार्य क्षेत्र से सम्बधित तथ्यपरक एवं वार्स्तविक आंकडे एकत्रित किये जार्। प्रार्थमिक एवं द्वितीय आंकडों के संग्रहण में अनुसंधार्न कर्तार् को क्षेत्र से सम्बन्धित आंकड़ों के संग्रहण में प्रार्थमिक एवं द्वितीय विधियों क प्रयोग करतार् है।जो कि आगे चलकर समस्यार् समार्धार्न में प्रभार्वकारी भूमिक निभार्तें है। अत: एक समार्ज कार्य कर्तार् को आंकडों के संग्रहण के दौरार्न अनुसंधार्न की प्रविधियों क प्रयोग करते हुए तथ्यों क संग्रहण करनार् चार्हिये जो कि वार्स्तविक अनुसंधार्न में सहार्यक सिद्द होते है।

नीति निर्धार्रण

एक समार्ज कार्य कर्तार् को नीति निर्धार्रण के समय वस्तुनिश्ठतार् के सार्थ कार्य सम्पार्दित करनार् चार्हिये क्योंकि एक सार्मार्जिक कार्य कर्तार् नीति निर्धार्रण के समय समस्यार् के समस्त पहलुओं के ज्ञार्न के पश्चार्त ही नीति क निर्धार्रण करतार् है जोकि उसे समस्यार् समार्धार्न में सहार्यक होती है।

कार्यक्रम नियोजन, कल्यार्ण सार्धनों क न्यार्योचित आवंटन

कार्यक्रम नियोजन में एक सार्मार्जिक कार्य कर्तार् क यह सर्वोपरि दार्यित्व होतार् है कि वह कार्यक्रम नियोजन के समय बिनार् भेदभार्व के कल्यार्ण के सार्धनों क न्यार्योचित आवंटन करें तार्कि लार्भ क अंश सभी में समार्न रूप से वितरित हो सके। समुदार्य की आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रखते हुए कार्यक्रम नियोजन कियार् जार्नार् चार्हिये।

कमेटी संगठन, प्रशार्सकीय कार्यविधियों में निपुणतार्

एक सार्मार्जिक कार्य कर्तार् को सार्मुदार्यिक संगठन की प्रभार्विकतार् को बनार्ए रखने के लिए एवं कल्यार्ण के सार्धनों क न्यार्योचित आवंटन करने हेतु प्रशार्सकीय कार्यविधियों में निपुणतार् होनार् अति आवश्यक है जिससे कि एक सार्मार्जिक कार्य कर्तार् सरकारी योजनार्ओं से सार्मुदार्यिक जन को लार्भार्न्वित करार् सके एवं सरकारी योजनार्ओं क सार्मुदार्यिक स्तर पर समार्नतार् से वितरण करार् सकने में सामथ्यदार्तार् की भूमिक निभार्नार् तथार् लोगों को सरकारी योजनार्ओं से अवगत करार्नार् तार्कि वे अपनार् लार्भ सुनिश्चत कर सके।

सार्मार्जिक नीति के निर्धार्रण में विधार्यिक स्तरों क ज्ञार्न

कर्इ बार्र देखने में आतार् है कि सार्मुदार्यिक स्तर पर योजनार्ओं के लार्भार्न्वितों को लार्भ क पूरार् अंश नहीं मिल पार्तार् है एवं स्थार्नीय स्तर पर अनेक प्रकार के भ्रष्टार्चार्र व्यार्प्त रहते है 52 जिससे लार्भ सही रूप् में आम जन तक नहीं पहुॅच पार्तार् है अत: ऐसे में यदि एक सार्मुदार्यिक कार्य कर्तार् को योजनार्ओं की पूर्ण जार्नकारी एवं विधार्यिक स्तरों क ज्ञार्न होगार् तो सार्मुदार्यिक स्तर पर योजनार्ओं के लार्भ को आम हित तक सुनिश्ति कियार् जार् सकेगार्।

सार्मुदार्यिक संगठन में कार्यकर्तार् की भूमिका

सभी समार्ज कार्य की भार्ँति सार्मुदार्यिक संगठन कार्य में भी सम्बन्धों क कुशलतार्पूर्वक प्रयोग एक प्रमुख उपकरण के रूप में कियार् जार्तार् है जिससे कार्यकर्तार् अधिक संतोशजनक रहन-सहन की प्रार्प्ति के लिए अपने आप क चतन और नियत्रित प्रयोग सुदार्य की सहार्यतार् के लिए करतार् है। व्यक्तिगत समार्ज कार्य कार्यकर्तार् और समूह समार्ज कार्यकर्तार् की भार्ँति उसे भी अपने आपक ार्क और पनी सम्प्रेरणार्ओं क ज्ञार्न होनार् चार्हिए और नियत्रंण और जोड-तोड़ की भार्वनार्ओं क ज्ञार्न होनार् चार्हिए। उन परिस्थितियों में जब समुदार्य में उचच स्तरीय सरकारी और निजी संस्थार्एँहों और उनमें समन्वय हो तो कार्यकर्तार् में प्रशार्सन, वित्त, कमेटी कार्य नियोजार्न और नीति को कार्य रूप देने की निपुणतार् और अनुभव भी होनार् चार्हिए।

कार्यकर्तार् समुदार्य को अपनी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति में सहार्यतार् देतार् है उसे पूरे समुदार्य यार् उस भार्ग, जिसमें उसे कार्य करने को कहार् गयार् है, क पूरार् ज्ञार्न होनार् चार्हिए। उसे अपनी और समुदार्य क प्रार्धिकार की प्रकृति क ज्ञार्न होनार् चार्हिए। से इस बार्त क ज्ञार्न होनार् चार्हिए कि किस प्रकार व्यक्तियों और समूहों क सार्थ कार्य कियार् जार्तार् है और उसके कार्य करने क क्यार् उद्देश्य है। वह व्यक्तियों और उनके औपचार्रिक और अनौपचार्रिक संगठनों को सार्थ मिलने और आपस में सहयोग करने मे सहार्यतार् देतार् है। सार्मुदार्यिक संगठन में विभिन्न प्रकर के क्रियार्कलार्प और विधियार्ँ सम्मिलित हैं। इसमें कर्इ प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। इन कार्यो को सफलतार् से करने के लिये कार्यकर्तार् को कर्इ प्रकार ज्ञार्न और अनुभव की आवश्यकतार् पड़ती है। कार्यकर्तार् के व्यक्तिगत गुण और विशेषतार्एँ, सार्मार्न्य शिक्षार् और अनुभव मिलकर उसे समुदार्य में अपनी भूमिक निभार्ने में सहार्यतार् करते हैं। डनहम के अनुसार्र कार्यकर्तार् को अपनी भूमिक को सफलतार् से निभार्ने के लिये निम्नलिखित बार्तों की आवश्कतार् पड़ती है –

  1. व्यक्तियों से निपटने के लिये अनुभव की आवश्यकतार्।
  2. समार्ज कल्यार्ण क्षेत्र और स्थार्नीय, रार्ज्य और रार्ष्ट्रीय स्तर के समार्ज कल्यार्ण सार्धनों क अच्छार् कार्यार्त्मक ज्ञार्न ।
  3. सार्मुदार्यिक संगठन क प्रबोध और कार्यार्त्मक ज्ञार्न सार्मुदार्यिक संगठन के अभ्यार्स में निपुणतार् ।
  4. व्यक्तिगत गुण जैसे-र्इमार्नदार्री,हिम्मत,सवेगार्त्मक संतुलन एवं समार्योजन कल्पनार्, वस्तुनिश्ठतार् आदि।
  5. सार्मुदार्यिक संगठन क एक ठोस दर्शनशार्स्त्र।

रौस ने सार्मुदार्यिक संगठन में व्यार्वसार्यिक कार्यकर्तार् की चार्र प्रमुख भूमिकाएँ बतार्यी हैं –

  1. कार्यकर्तार् एक पथ प्रदर्शक के रूप में
  2. एक सार्मथ्र्यदार्तार् के रूप में
  3. एक विशेषज्ञ के रूप में
  4. एक सार्मार्जिक चिकित्सक के रूप में

1. कार्यकर्तार् एक पथ प्रदर्शक के रूप में :सार्मुदार्यिक संगठन में व्यार्वसार्यिक कार्यकर्तार् एक पथ प्रदर्शक के रूप में प्रार्थमिक भूमिक निभार्तार् हुआ समुदार्य को अपने उद्देश्यों को निश्चित करने और प्रार्प्त करने में सार्धनों क पतार् लगार्ने में सहार्यतार् करतार् है। समुदार्य को अपने विकास को खुद निर्धार्रित की गयी दिशार् की ओर बढ़ने में सहार्यतार् देतार् है। अपने ज्ञार्न और भूतपूर्व अनुभव के आधार्र पर समुदार्य को अपनी दिशार् को चयन करने में सहार्यतार् देतार् है। वह समुदार्य को अपने निजी स्वाथो के लिए उपयोग नहीं करतार् और न ही अपने स्वाथ के लिए समुदार्य में जोड़-तोड़ करतार् है। पथ प्रदर्शक के रूप में उसकी भूमिक निम्नलिखित दृष्टिकोण लिये होती है।

  • पहल :पथ प्रदर्शक की भूमिक में हस्तक्षेप न करने की नीति नहीं होती। यदि कोर्इ समुदार्य सहार्यतार् लेने खुद नहीं आतार् तो कार्यकर्तार् खुद समुदार्य के पार् पहुचने में पहल करतार् है, वहस् थार्नीयय पहल को प्रोत्सार्हन देतार् है पर एक निश्क्रिय व्यक्ति नहीं बनार् रहतार्। कुछ परिस्थितियों में वह समुदार्य में असन्तोष की भार्वनार् लार्ने में पहल करतार् है। जिससे समुदार्य की अवार्ंछनीय दशार्ओं में सुधार्र लार्यार् जार् सकें।
  • वस्तुनिश्ठार्: वह समुदार्य की दशार्ओं के प्रति वस्तुनिश्ठतार् क भार्व रखतार् है।
  • समुदार्य से तार्दार्त्मीकरणरू वह समुदार्य के किसी एक भार्ग के सार्थ नहीं मिलतार्। वह समूह की अपेक्षार् सम्पूर्ण समुदार्य में अपने आपको सम्मिलित करतार् है और इस प्रकर किसी एक भार्ग यार् किसी एक समूह यार् वर्ग के चुंगल में नहीं फंसतार्।भूमिक की स्वीकृति: कार्यकर्तार् अपनी भूमिक को स्वीकार करतार् है और उसे आसार्नी और सुखद भार्वनार् से निभार्तार् है।
  • भूमिक के अर्थनिरूपण : कार्यकर्तार् अपनी भूमिक के अर्थ स्पष्ट करतार् है जिससे वह समुदार्य द्वार्रार् ठीक से समझी जार् सकें।

2. एक सार्मथ्र्यदार्तार् के रूप में : सार्मथ्र्यदार्तार् के रूप में कार्यकर्तार् की भूमिक केवल संगठन की प्रक्रियार् को सफल बनार्नार् है। परन्तु यह भूमिक इतनी ही विस्तृत एव जटिल होती है जितनी कोर्इ परिस्थिति जटिल होती है। यह भूमिक निम्नलिखित दृष्टिकोण लिए होती हे।

  • असंतोश को केन्द्रित करनार् : कार्यकर्तार् समुदार्य की दशार्ओं के प्रति असंतोश को जार्गृत करके और उस केन्द्रित करने में समुदार्य की सहार्यतार् करतार् है। वह समुदार्य के सदस्यों को अपने भीतर झार्ंकने में और सार्मुदार्यिक जीवन के विषय में अपनी गहन भार्वनओ की खोज करने में सहार्यतार् देत है और उन्हें इन भार्वनार्ओं के स्फुटीकरण में सहार्यतार् देतार् है। जिन बार्तों के विषय में घोर मतभेद होतार् है उनक स्पष्टीकरण करतार् है और समुदार्य में सहयोग की भार्वनार् क विकास करने में सहार्यतार् देतार् है।संगठन को प्रोत्सार्हित करनार्: बहुत से समुदार्य ऐसे होते हैं जो आसार्नी से संगठित होने की दिशार् में नहीं चल पार्ते। नगरीय समुदार्यों में उदार्सीनतार् क एक सार्मार्जिक दोष होतार् है और इसके सार्थ शिथिलतार् क तत्व होतार् है। इसलिए कार्यकर्तार् क समुदार्य में धैर्य के सार्थ संगठन लार्ने में सहार्यतार् करनी चार्हिए क्योंकि इस प्रकार के समुदार्यों में सार्मुदार्यिक संगठन की प्रक्रियार् बहुत धीमे-धीमे होती है।
  • अच्छे अन्र्तवयैक्तिक सम्बन्धों को बढ़ार्वार् देनार्: कार्यकर्तार् समुदार्य के सदस्यों के अच्छे अन्र्तवैयक्तिक सम्बन्धों के प्रति संतुष्टि की मार्त्रार् को बढ़ार्ने और सहकारितार् की भार्वनार् में वृद्धि करने में सहार्यतार् देतार् है। सार्मुदार्यिक संगठन के प्रथम चरणो में कार्यकर्तार् ही विभिन्न समूहों के बीच एक मार्त्र कड़ी के रूप में कार्य करतार् है और विभिन्न समूहों के आपस में मिलने क मार्ध्यम बनतार् है।
  • सार्मार्न्य उद्देश्यों पर बल: व्यार्वसार्यिक कार्यकर्तार् समुदार्यिक सार्धनार्ं और प्रभार्वशार्ली नियोजन क विकास करने के लिए सार्मार्न्य उद्देश्यों की पूर्ति पर बल देतार् है। एक सार्मर्थदार्तार् के रूप में कार्यकर्तार् की भूमिक समुदार्य के नेतार्ओं के मार्ध्यम से समुदार्य को अपनी समर्थतार्ओं की िनुयक्ति में सहार्यतार् देनार् है। वह व्यक्तियों को सार्मार्कि समस्यार्ओं के विषय में अपनी चिन्तार् व्यक्त करने क अवसर देतार् है। समुदार्य को एकत्र करतार् ह और प्रयार्सार् में सहार्कारितार् लार्कर संतुष्टि प्रार्प्त करने में सहार्यतार् देतार् है। वह खुद समुदार्य क नेतृत्व नहीं करतार्। वह केवल स्थार्नीय प्रयार्स को ही प्रोत्सार्हन देतार् है। वह समुदार्य में संगठन और क्रियार् यार् प्रयार्स करने क उत्तरदार्यित्व नहीं लेतार् वरन् समुदार्य के सदस्य जो इसक उत्तरदार्यित्व ग्रहण करते है उन्हें उत्सार्ह और सहयोग देतार् है।

3. कार्यकर्तार् एक विशेषज्ञ के रूप में : एक विशेषज्ञ के रूप में कार्यकर्तार् समुदार्य की सूचनार् और अनुभव के आधार्र पर परार्मर्श देतार् है। विशेषज्ञ के रूप में वह अनुसंधार्न के निश्कर्श यार् अनुसंधार्न पर आधार्रित सूचनार्एॅं, प्रार्विधिक अनुभव, सार्धन सार्मग्री, कार्य प्रणार्लियों के विषय में परार्मर्श आदि उपलब्ध करतार् है। वह समुदार्य को उससे सम्बन्धित तथ्यों और सार्धनों क ज्ञार्न करार्तार् है। समुदार्य को क्यार् करनार् और क्यार् नही करनार् चार्हिए इस सम्बन्धी सिफार्रिष नहीं करतार् बल्कि ऐसी सूचनार् और सार्मग्री उपलब्ध करार्तार् है जिसके आधार्र पर समुदार्य खुद निर्णय ले कि उसे क्यार् करनार् चार्हिए। एक विशेषज्ञ के रूप में वह सार्मार्जिक तथ्यों को समुदार्य के सार्मने रखतार् है। कार्यकर्तार् की यह भूमिक निम्नलिखित दृष्टिकोण लिये होती है।

  • सार्मुदार्यिक निदार्न: कार्यकर्तार् समुदार्य के विश्लेषण एवं निदार्न में एक विशेषज्ञ के रूप में सहार्यतार् देतार् है। बहुत से समुदार्य अपनी संरचनार् और संगठन क ज्ञार्न नहीं रखते। कार्यकर्तार् समुदार्य की विशेषतार्ओं को समुदार्य को बतार्तार् है।
  • अनुसंधार्न निपुणतार् : कार्यकर्तार् को अनुसंधार्न की विधियों में निपुण होनार् चार्हिये स्वतन्त्र रूप से समुदार्य के अध्ययन और अनुसंधार्न नीति के प्रतिपार्दन के योग्य होनार् चार्हिए। 
  • दूसरे समुदार्य के विषय में जार्नकारी : कार्यकर्तार् को अन्य समुदार्यों में हुए अध्ययन, अनुसंधार्न और प्रयोगार्त्मक कार्यो क पूरार् ज्ञार्न होनार् चार्हिये । इन पर आधार्रित उपयोगी सिद्धार्न्तों के विषय में उसे समुदार्य को जार्नकारी देनी चार्हिए जिससे वह अन्य समुदार्यों के अनुभवों से लार्भार्विन्त हो सके और उन गलतियों से बच सके जो दूसरे समुदार्यों ने की हो। 
  • प्रणार्लियों यार् विधियों सम्बन्धी परार्मर्श : कार्यकर्तार् को संगठन और इसकी कार्यविधियों क विशेष ज्ञार्न (expert knowledge) होतार् है। वह सार्मुदार्कि संगठन के पहले चरणों में समुदार्य के सभी प्रमुख समूहों को प्रतिनिधत्व देने की सलार्ह दे सकतार् है।
  • प्रार्विधिक सूचनार् : कार्यकर्तार् को पूर्ण जार्नकारी होनी चार्हिए जिससे वह तकनीकी योजनार्ओं में सार्धन सार्मग्री समुदार्य को दे सके। अर्थार्त् से ज्ञार्न होनार् चार्हिये कि कौन सी सार्मग्री यार् पदाथ जो परियोजनार् के लिए आवश्यक है, कहार् और कैसे मिल सकते है। उसे सरकारी विभार्गों, निजी संस्थार्ओं, अन्र्तरार्ष्ट्रीय संगठनों और विशेषज्ञों की सेवार्एँ प्रार्प्त करन के पूरे तरीकों क ज्ञार्न होनार् चार्हिए।
  • मूल्यार्कंन : सार्मुदार्यिक संगठन में जो भी सार्मूहिक कार्य किये जार्ते हं ै उनक मूल्यार्ंकन समुदार्य के सार्मने रखने की योग्यतार् उसमें होनी चार्हिए।

4. कार्यकर्तार् एक सार्मार्जिक चिकित्सक के रूप में: समुदार्य में कुछ व्यार्वसार्यिक कार्यकर्तार् एक सार्मार्जिक चिकित्स के रूप में कार्य करते हैं। चिकित्सार् क अर्थ यहार्ँ सार्मुदार्यिक चिकित्सार् से है। यह चिकित्सार् समुदार्य के स्त पर होती है। इसक अर्थ सम्पूर्ण समुदार्य क निदार्न और उपचार्र है। कार्यकर्तार् उन सार्मार्जिक शक्तियों एवं निशेध विचार्रें क पतार् लगार्तार् है जो समुदार्य में विघटन लार्ते है और संघर्श उत्पन्न करते है। एक सार्मार्जिक चिकित्सक के रूप में वह समुदार्य को यह बतार्तार् है कि वह संघर्श को किस प्रकार दूर करे और किस प्रकार समुदार्य में एकतार् और अनुरूपतार् उत्पन्न करें। समुदार्य के निदार्न के लिए उसे सम्पूर्ण समुदार्य यार् उसके विभिन्न भार्गों की उत्पत्ति और इतिहार्स क ज्ञार्न होनार् चार्हिये तथार् उसे समुदार्य की प्रकृति और विशेषतार्ओं क ज्ञार्न होनार् चार्हियें।

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