सार्क्षार्त्कार अनुसूची

अनुसूची अंग्रेजी के शिड्यूल (Schedule) क हिन्दी रूपार्न्तर है। जिसक अर्थ होतार् है सूची (A list)] नार्मार्वली (A tabulated statement) आदि। अनुसूची की विद्वार्नों ने जो परिभार्षार्एँ दी हैं, वे इस प्रकार हैं-

  1. बोगाडस के अनुसार्र– अनुसूची उन तथ्यों को प्रार्प्त करने के लिये एक औपचार्रिक पद्धति क प्रतिनिधित्व करती है, जो वैषयिक स्वरूप में है और स्पष्ट रूप से दिखाइ देने योग्य है। 
  2. गुडे और हार्ट के अनुसार्र- अनुसूची सार्धार्रण प्रश्नों के एक समूह क नार्म है, जो एक अनुसंधार्नकत्र्तार् द्वार्रार् दूसरे व्यक्ति से आमने-सार्मने से सम्बन्धों द्वार्रार् पूछे जार्ते हैं और भरे जार्ते हैं।
  3. एम.एच.गोपार्ल के अनुसार्र- अनुसूची उन विभिन्न मदों की एक विस्तृत वर्गीकृत नियोजित तथार् क्रमबद्ध सूची होती है, जिसके विषय में सूचनार्एँ एकत्रित करने की आवश्यकतार् पड़ती है। 

इस प्रकार अनुसूची सार्मार्जिक अनुसंधार्न की वह पद्धति है जिसमें प्रश्न संग्रहित रहते हैं और अनुसंधार्नकत्र्तार् द्वार्रार् सूचनार्दार्तार्ओं से इन प्रश्नों के प्रार्प्त उत्तर भरे जार्ते हैं। इन परिभार्षार्ओं से अनुसूची की अग्र विशेषतार्एँ स्पष्ट हार्ती है।

  1. अनुसूची क प्रयोग सार्मार्जिक अनुसंधार्न की एक पद्धति के रूप में कियार् जार्तार् है। 
  2. इसमें प्रश्न संकलित होते हैं। 
  3. ये प्रश्न अनुसंधार्न समस्यार् से सम्बन्धित होते हैं। 
  4. अनुसंधार्नकत्र्तार् इन प्रश्नों क उत्तर सूचनार्दार्तार्ओं से प्रार्प्त करतार् है।

श्रेष्ठ अनुसूची की विशेषतार्एँ

अनुसूची समंकों के संकलन के लिये प्रयुक्त की जार्ती है। एक अनुसूची के द्वार्रार् उत्तम सार्मग्री तभी प्रार्प्त की जार् सकती हैं, जब वह उत्तम होगी। अब मौलिक प्रश्न यह है कि श्रेष्ठ अनुसूची किसे कहार् जार्येगार्? संक्षेप में हम यहार्ँ एक उत्तम अनुसूची की विशेषतार्ओं क वर्णन करेंगे। यंग ने उत्तम अनुसूची की निम्न दो विशेषतार्एँ बताइ है।

  1. सही सन्देशवार्हन- अनुसूची सन्देशवार्हन क एक सार्धन है। यह इस प्रकार प्रश्नों से युक्त हों कि सूचनार्दार्तार् इसे समझ सके। इसकी भार्षार् सरल और स्पष्ट हो, तभी सूचनार्दार्तार् ठीक-ठीक समझ सकेंगे।
  2. सह उत्तर- इसक तार्त्पर्य यह है कि प्रश्नों द्वार्रार् जिस प्रकार की सूचनार्एँ अपेक्षित हों, उसी प्रकार के उत्तर प्रार्प्त हों। इसके द्वार्रार् सूचनार्दार्तार् सही और उपयोगी उत्तर प्रदार्न करते हैं। 

अनुसूची की गुण-

  1. वह आकार और प्रकार दोनों ही दृष्टि से आकर्षक हो। 
  2. अनुसूची में जितने भी प्रश्न हों, वे सभी स्पष्ट, सरल और एकाथ्र्ार्ी हों। 
  3. प्रश्नों की प्रकृति इस प्रकार हो कि सूचनार्दार्तार् उत्तर देने में आनार्कान न करें। 
  4. प्रश्न ऐसे हों जिनके मार्ध्यम से सही सूचनार्एँ पर्यार्प्त मार्त्रार् में प्रार्प्त हो सकें। 
  5. सभी प्रश्नों को इस प्रकार व्यवस्थित करनार् चार्हिए कि उनमें परस्पर अन्त:सम्बन्धित और क्रमबद्धतार् बनी रहे। 
  6. प्रश्नों के द्वार्रार् ऐसी सूचनार्एँ एकत्रित करनी चार्हिये जिन्हें तार्लिकाओं और संख्यार्ओं के मार्ध्यम से प्रदर्शित कियार् जार् सके। 7. अनुसूची संक्षिप्त हो। प्रश्न इतने लम्बे न हों कि उत्तरदार्तार् ऊब जार्ये। 
  7. प्रश्नार्वली ऐसी हो जिसके प्रश्नों के उत्तर उत्तरदार्तार् के लिये रूचिपूर्ण प्रतीत हों। 
  8. समस्त अनुसूची शीर्षकों और उपशीर्षकों में विभार्जित होनी चार्हिए। 
  9. अनुसूची वैज्ञार्निक हो।

अनुसूची के निमाण में सार्वधार्नियार्ँ

इससे पहले एक उत्तम अनुसूची की विशेषतार्ओं क वर्णन कियार् गयार् है। अनुसूची में उन उत्तम गुणों क समार्वेश एक मौलिक समस्यार् है। इन गुणों क समार्वेश तभी हो सकतार् है, जबकि अनुसूची के निर्मार्ण में सार्वधार्नियार्ँ रखी जार्ए। अनुसूची के निर्मार्ण में जिन सार्वधार्नियों की आवश्यकतार् होती है, उन्हें निम्न भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-

(1) प्रार्रम्भिक सार्वधार्नियार्ँ- 

प्रार्रम्भिक सार्वधार्नियों क तार्त्पर्य उन सार्वधार्नियों से है, जिनकी आवश्यकतार् अनुसूची के निर्मार्ण के पहले होती है। एक अनुसूची के निर्मार्ण से पहले अनुसंधार्नकत्र्तार् को निम्न प्रश्नों के उत्तर प्रार्प्त कर लेनार् चार्हिये-

  1. अनुसूची के निर्मार्ण के समय इस बार्त क ध्यार्न रखार् जार्नार् चार्हिए कि इसमें अनुसंधार्न विषय से सम्बन्धित सभी पहलुओं क निर्धार्रण हुआ है यार् नहीं। 
  2. अध्ययन विषय के विभिन्न पहलू निर्धार्रित करने के बार्द प्रत्येक पहलू से सम्बन्धित प्रत्येक प्रकार की सूचनार्ओं क निर्धार्रण। 
  3. इसके बार्द अनुसूची की अन्तर्वस्तु क निर्मार्ण कियार् जार्नार् चार्हिये। अनुसूची की भार्षार् सरल और स्पष्ट हो
  4. अनुसूची में सम्मिलित सभी प्रश्नों को क्रम के अनुसार्र व्यवस्थित करनार् चार्हिए। 
  5. अनुसूची क उपयोग करने से पहले इसक पूर्व परीक्षण कियार् जार्नार् चार्हिए।

सेक्रिस्ट ने अनुसूची के निर्मार्ण से पहले जो विवरण आवश्यक मार्नार् है, उसे निम्न भार्गों में विभार्जित कियार् है-

  1. समस्यार् क्यार् है? 
  2. इस समस्यार् के सार्ंख्यिकीय उपयोग की क्यार् आवश्यकतार् है? 
  3. ऐसे कौन-से तथ्य आवश्यक हैं जिनकी सहार्यतार् से समस्यार् क विश्लेषण कियार् जार् सकतार् है? 
  4. जिस समस्यार् क अध्ययन कियार् जार्नार् है, क्यार् वह उपयुक्त स्वरूप में प्रार्प्त हो सकेगी? 
  5. क्यार् प्रार्प्त तथ्य उद्देश्य की पूर्ति कर सकेंगे? 
  6. क्यार् उन तथ्यों में परिशुद्धतार्, एकरूपतार् और तुलनार्त्मकतार् आ सकेगी? 
  7. तथ्यों के प्रयोग पर कोर्इ प्रतिबन्ध तो नहीं होगार्? 
  8. क्यार् ये तथ्य अनुसंधार्न की एक निश्चित अवधि के भीतर प्रार्प्त हो सकेंगे? 
  9. जिन तथ्यों की आवश्यकतार् है, उनकी प्रार्प्ति के लिए किन पद्धतियों क उपयोग कियार् जार्येगार्।

सेक्रिस्ट क विचार्र है कि जब उपयुक्त सभी प्रश्नों के सन्तोषजनक उत्तर प्रार्प्त हो जार्यें, तभी अनुसूची क निर्मार्ण करनार् चार्हिए। ऐसार् करने से वह भविष्य में आने वार्ली कठिनार्इयों से मुक्त हो जार्येगार्। अनुसूची अनुपयुक्त न हो पार्ए, इसलिए इसके निर्मार्ण से पहले उपयुक्त बार्तों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए।

(2) अनुसूची के भौतिक स्वरूप से सम्बन्धित सार्वधार्नियार्ँ- 

जहार्ँ तक अनुसूची के भौतिक स्वरूप क सम्बन्ध है, विभिन्न विद्वार्नों ने इस सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के सुझार्ार्व दिये हैं। संक्षेप में, अनुसूची के भौतिक स्वरूप के सम्बन्ध में निम्नलिखित सार्वधार्नियों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए-

  • आकार- अनुसूची क आकार प्रमार्णित होनार् चार्हिए। यह आकार न तो बहुत छोटार् और न ही अधिक बड़ार् हो। अनुसूची के दो प्रमार्णित आकार मार्ने गए हैं- 

 (a) 5” चौड़ाइ 8” लम्बाइ (b) 8” चोड़ाइ 11” लम्बाइ

पाटेन के अनुसार्र, यदि अनुसूचियार्ँ छोटी हैं तो उन्हें एक पर्स में अथवार् कोट की जेब में लार्यार् जार् सकतार् है अथवार् दरवार्जे की घण्टी क उत्तर प्रार्प्त हो जार्ने पर निकालार् जार् सकतार् है। यदि अनुसूची 4ग6 अथवार् 3ग5 के कार्डो पर बनाइ जार्ती है, तो उनको छार्ँटने, गिनने, फार्इल करने तथार् जॉँचने इत्यार्दि में सुविधार् होती है। इसके अतिरिक्त

  • कागज- अनुसची निर्मार्ण के लिये जिस कागज क प्रयोग कियार् जार्ये, वह अच्छे किस्म क हो। ऐसार् कागज न हो कि स्यार्ही फैले यार् स्यार्ही दूसरी ओर निकल आए। 
  • हार्ँसियार्- अनुसूची हार्ँसियार् क उपयोग टिप्पणी आदि लिखने के लिऐ आवश्यक है। हार्ँसियार् दोनों और छोड़ार् जार्नार् चार्हिए, किन्तु बार्यीं ओर क हार्ँसियार् चौड़ हो जबकि दार्हिनी ओर क हार्ँसियार् सँकरार् हो।
  • स्थार्न छोड़नार्- अनुसूची के प्रश्नों के बार्द इतनी जगह हो कि उत्तर को आसार्नी से भरार् जार् सके। प्रत्येक प्रश्न के बार्द पर्यार्प्त स्थार्न होनार् चार्हिये। 
  • छपाइ- अनुसूची छपी हुर्इ होनी चार्हिये। छपाइ आकर्षक और स्पष्ट होनी चार्हिए। सार्थ ही छपाइ एक ओर होनी चार्हिए।
  • चित्र- अनुसूची में इस प्रक के चित्र भी होने चार्हिए, जिनसे प्रश्न को समझने में अधिक सुविधार् मिले। ये चित्र आकर्षक होने चार्हिए।

(3) अन्तर्वस्तु सम्बन्धी सार्वधार्नियार्ँ- 

अनुसूची के अन्तर्वस्तु क अर्थ है कि इसमें प्रार्रम्भ से लेकर अन्त तक किन-किन प्रश्नों क समार्वेश कियार् जार्ये। सुविधार् के लिये अन्तर्वस्तु को तीन भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-

  1. प्रार्रंभिक भार्ग- यह अनुसूची क पहलार् अंग है। इसमें अनुसंधार्नकत्र्तार् और सूचनार्दार्तार् के बार्रे में सार्मार्न्य जार्नकारी से सम्बन्धित प्रश्न होते हैं, जैसे-सूचनार्दार्तार् क नार्म, आयु, लिंग, जार्ति, सार्क्षार्त्कार की तिथि आदि। 
  2. मुख्य भार्ग- वार्स्तव में यह सही अनुसूची है। इसमें समस्यार् से सम्बन्धित विविध प्रकार के प्रश्न होते हैं। 

प्रश्नों की प्रकृति- अनुसूची के मुख्य भार्ग में जो प्रश्न होते हैं, वे प्रकृति अनुसार्र निम्न प्रकार के हो सकते हैं-

  1. अनिर्दिष्ट प्रश्न- ये वे प्रश्न हैं जिनमें जनमत जार्नने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है और उत्तरदार्तार् को किसी भी तरह क ेमत व्यक्त करने की स्वतन्त्रतार् रहती है। उदार्हरण के लिए, आपके विचार्र में एक अच्छे विद्यार्थ्र्ार्ी में कौन-कौन से गुणों क होनार् आवश्यक है? 
  2. निर्दिष्ट प्रश्न- इस प्रकार के प्रश्नों से उत्तरदार्तार् बँधार् रहतार् है। उसे कुछ उत्तरों में से एक उत्तर के सार्थ अपनी अभिमति व्यक्त करनी पड़ती है। उदार्हरण के लिए, विवार्ह के समय आपकी आयु क्यार् थी? 
  3. दोहरे प्रश्न- दोहरे प्रश्न वे हैं, जिनके सिर्फ दो ही उत्तर होते हैं और उत्तरदार्तार् को उनमें से एक क चुनार्व करनार् पड़तार् है, जैसे- आप धर्म को मार्नते हैं? हार्ँ/नहीं 
  4. वैकल्पिक प्रश्न- वैकल्पिक प्रश्न, जैसार् कि इसके नार्म से स्पष्ट हैं, इसमें अनेक उत्तरों में से किसी क भी चुनव करनार् पड़तार् है, जैसे- आप अनुक शार्दी को क्यों पसन्द करते हैं? सुन्दर पत्नी, पर्यार्प्त दहेज, सार्स-ससुर क ऊँचार् पद, अन्य कोर्इ। 
  5. सन्देहपूर्ण प्रश्न- कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो अनेक अर्थो को स्पष्ट करते हैं यार् उत्तरदार्तार् जिन प्रश्नों के कर्इ अर्थ लगार्तार् है। ऐसे प्रश्नों को अनुसूची में स्थार्न नहीं देनार् चार्हिए। जैसे- आपकी आयु क्यार् है? यह प्रश्न सन्देह पूर्ण है क्योंकि इससे तीन सम्भार्वित उत्तर हो सकते हैं। (अ) वर्तमार्न वार्स्तविक आयु, (ब) पिछले जन्मदिन पर आयु, (स) पिछले जन्म दिन और वर्तमार्न समय के बीच की आयु। 
  6. निर्देशक प्रश्न- ऐसे प्रश्न वे हैं, जो सूचनार्दार्तार् को निश्चित उत्तर प्रदार्न करने क संकेत दें, जैसे-क्यार् तुम विवार्हित हो? 
  7. अस्पष्ट प्रश्न- अनुसूची में अनुसूची मे ऐसे प्रश्नों को सम्मिलित नहीं करनार् चार्हिए, जो निश्चित न हो, जैसे- मकानों की दशार् कैसी है आदि। 
  8. श्रेणीबद्ध प्रश्न- कभी-कभी उत्तरदार्तार् के उत्तरों में से सिर्फ एक क चुनार्व ही नहीं करनार् पड़तार् अपितु सभी प्रकार के उत्तरों को महत्व के अनुसार्र क्रम में लिखनार् पड़तार् है। 
  9. अनुमार्नित प्रश्न- अनुसूची में ऐसे प्रश्न नहीं होने चार्हिए, जिनसे सूचनार्दार्तार् के बार्रे में अनुमार्न पहले से ही लगार् लियार् गयार् हो, जैसे-आप कौन-सी सिगरेट पीते हैं? 
  10. उपकल्पनार्त्मक प्रश्न- अनुसूची में ऐसे प्रश्न भी होने चार्हिए, जिनसे किसी प्रकार की उपकल्पनार् क निर्मार्ण होतार् हो, जैसे-क्यार् आप उच्च शिक्षार् प्रार्प्त करनार् पसन्द करेंगे? 
  11. व्यक्तिगत प्रश्न- अनुसूची में ऐसे प्रश्नों को नहीं रखनार् चार्हिए, जो व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित हो, जैसे-क्यार् आप शरार्ब पीते हैं? 
  12. विरोधी प्रश्न- अनुसूची में ऐसे प्रश्न नहीं होने चार्हिए, जिनसे उत्तरदार्तार् के मन में किसी भी प्रकार की विरोधी भार्वनार् क जन्म हो।

अनुसूची में शार्मिल योग्य प्रश्न- अभी अनुसूची में प्रश्नों के प्रकारों क वर्णन कियार् गयार् है। मौलिक समस्यार् यह है कि अनुसूची में किसी प्रकार के प्रश्न रखे जार्एँ। अनुसूची में जो प्रश्न शार्मिल किये जार्एँ, उनमें निम्नलिखित विशेषतार्एँ हों-

  1. उत्तर देने में सहज, सरज और छोटे प्रश्न हों, 
  2. प्रश्न ऐसे हों जिनको सार्रणी में दिखार्यार् जार् सके, 
  3. सूचनार्दार्तार् के ज्ञार्नस्तर के अनुकूल हों, 
  4. जिनसे अनुसंधार्न के बार्रे में सही सूचनार् प्रार्प्त की जार् सके, 
  5. जो जार्ँच के योग्य हो, 
  6. प्रश्न प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के हों,  
  7. प्रश्न ऐसे हों जिनक व्यक्तिगत जीवन से कोर्इ सम्बन्ध न हो, 
  8. प्रश्न ऐसे हों जिनके बार्रे में सूचनार्दार्तार् को किसी प्रकार क सन्देह न हो,  
  9. प्रश्न संक्षिप्त और चित्रमय हों, 
  10. प्रश्न ऐसे हों जो कार्य-कारण-सम्बन्धों को व्यक्त करें। 
  11. प्रश्न ऐसे हों जिनसे अनुसूची में कम लिखनार् पड़े। उत्तर हार्ँ यार् नार् तथार् टिकमाक (✓) यार् क्रार्समाक (X) में दियार् जार्ये। 
  12. विचार्रों और भार्वनार्ओं से सम्बन्धित प्रश्नों में क्यों, कब, कैसे? आदि जोड़ देनार् चार्हिये तार्कि विचार्र और भार्वनार्एँ स्पष्ट हो जार्एँ।

अनुसूची में न रखने योग्य प्रश्न- निम्नलिखित प्रश्नों को अनुसूची में सम्मिलित नहीं करनार् चार्हिये-

  1. ऐसे प्रश्न जो सन्देहपूर्ण हों, 
  2. ऐसे प्रश्न जो लम्बे और जटिल हों, 
  3. जो व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित हों, 
  4. ज्ो किसी निश्चित उत्तर की ओर निर्देश करते हों, 
  5. ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर अन्य सार्धनों से भी प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् हो, 
  6. ऐसे प्रश्न जिनक उत्तर अन्य सार्धनों से भी प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् हो, 
  7. ऐसे प्रश्न जिनक सही उत्तर मिलनार् सम्भव न हो, 
  8. जो प्रश्न सूचनार्दार्तार् को असमंजस में डार्लने वार्ले हों, 
  9. जो प्रश्न अस्पष्ट हों, 
  10. ऐसे प्रश्न जिनके अनेक अर्थ होते हों, 
  11. ऐसे प्रश्न जो उपकल्पनार्त्मक हों, 
  12. ऐसे प्रश्न जो जीवन के गोपनीय भार्ग से सम्बन्धित हों,  
  13. ऐसे प्रश्न जो विरोधी भार्वनार् उत्पन्न करने वार्ले हों। 
  14. ऐसे प्रश्न जिनसे उत्तरदार्तार् दुविधार् में पड़ जार्ये। 
  15. जो अनुसंधार्न के उद्देश्यों से सम्बन्धित न हों।

प्रश्नों की भार्षार्- प्रश्नार्वली के प्रश्नों की जो भार्षार् हो, उसमें निम्न विशेषतार्एँ होनी चार्हिए-

  1. प्रश्नों की भार्षार् सरल हो, 
  2. अनुसंधार्न विषय को स्पष्ट करती हो, 
  3. शब्द प्रभार्वक और सार्पेक्षिक हों।

प्रश्नों क क्रम-प्रश्नों क क्रम भी अनुसूची क महत्वपूर्ण भार्ग है। एक अच्छी अनुसूची में प्रश्न निम्न क्रम में रखे जार्ने चार्हिये-

  1. प्रार्रम्भिक प्रश्न अत्यन्त ही सरल हों। इस सरलतार् से जटिलतार् की ओर धीरे-धीरे विकसित हों। 
  2. अनुसूची के आरम्भ में ऐसे प्रश्न रखे जार्एँ, जो अत्यन्त ही आकर्षक हों। 
  3. पहले ऐसे प्रश्न हें जिनसे सूचनार्दार्तार् की रार्य मार्ँगी गर्इ हो। 
  4. प्रश्न समूहों में हों। समूहों क निर्मार्ण विषय के आधार्र पर कियार् जार्ये। 
  5. अनुसूची के प्रश्नों में बिखरार्व न हो। वे अनुसूची कीएक इकार्इ के रूप में स्पष्ट करें। 
  6. प्रश्नों में विषय क जो परिवर्तन हो, वह अत्यन्त स्वभार्विक प्रकार क हो।

सार्क्षार्त्कत्र्तार्ओं को हिदार्यतें- ये निर्देश अनुसंधार्नकत्र्तार् के लिए होते हैं और इनक उद्देश्य अनुसूची के प्रयोग से सम्बन्धित है। ये निर्देश दो रूपों में होते हैं। ये यार् तो अनुसूची के अन्त में होते हैं यार् अलग से छपवार् दिये जार्ते हैं। निर्देश निम्न विशेषतार्ओं से युक्त हों-

  1. ये स्पष्ट और विस्तृत हों, 
  2. सार्क्षार्त्कार की विधि की व्यार्वहार्रिक व्यवस्थार् करते हों, 
  3. अनुसूची भरने के नियमों से सम्बन्धित हों, 
  4. इकार्इयों और शब्दों की स्पष्ट व्यार्ख्यार् हो।

(4) परीक्षण से पूर्व सम्बन्धित सार्वधार्नियार्ँ- 

अनुसूची क प्रयोग करने से पहले एक बार्र इसकी जार्ँच कर लेनी चार्हिये। जार्ँच कर लेने से प्रयोग में आने वार्ली कठिनाइयार्ँ समार्प्त हो जार्ती है। ऐसार् करके अनुसंधार्नकत्र्तार् प्रश्नों की प्रकति की और उत्तरों के बार्रे में जार्नकारी प्रार्प्त कर लेतार् है। सार्थ ही उसे अनुसंधार्नकत्र्तार् की प्रकृति क भी ज्ञार्न हो जार्तार् है तथार् वह सूचनार्दार्तार्ओं की कठिनाइयों से भी अवगत हो जार्तार् है।

अनुसूची की उपयोगितार् यार् महत्व

अनुसूची यार् सार्मार्जिक अनुसंधार्न के क्षेत्र में निम्न उपयोगितार् यार् महत्व है-

  1. व्यक्तिगत सम्पर्क- अनुसूची की पहली उपयोगितार् यह है कि इसके मार्ध्यम से अनुसंधार्नकत्र्तार् और सूचनार्दार्तार् के बीच व्यक्तिगत सम्पर्क स्थार्पित कियार् जार्तार् है। इस व्यक्तिगत सम्बन्ध के मार्ध्यम से प्रार्थमिक और वार्स्तविक सूचनार्ओं की प्रार्प्ति में सहार्यतार् मिलती है। 
  2. अवलोकन शक्ति क विकास- अनुसूची पद्धति में अनुसंधार्नकत्र्तार् स्वयं क्षेत्र में जार्कर सूचनार्एँ एकत्र करतार् है। ऐसार् करने से उसके अवलोकन शक्ति में वृद्धि हो जार्ती है। 
  3. प्रमार्णित तथ्य- अनुसूची में जो तथ्य भरे जार्ते हैं वे व्यवस्थित और प्रमार्णित होते है। इसक कारण यह है कि इन तथ्यों को स्वयं अनुसंधार्नकत्र्तार् क्षेत्र में जार्र प्रार्प्त करतार् है। 
  4. गहन अवलोकन- अनुसूची पद्धति के मार्ध्यम से अनुसंधार्नकत्र्तार् स्वयं क्षेत्र में जार्कर घटनार्ओं को देखतार् है और उनकी परीक्षार् करतार् है। इसलिए गहन अवलोकन संभव होतार् है।
  5. लिखित समंक- अनुसूची के मार्ध्यम से जो तथ्य प्रार्प्त होते हैं, वे लिखित रूप में होते हैं। इसलिए हमें किसी भी हार्लत में कल्पनार् यार् स्मरण-शक्ति क सहार्रार् लेनार् पड़तार् है। 
  6. दोषपूर्ण लेख से बचार्व- अनुसूची के सभी प्रश्नों के उत्तर अनुसंधार्नकत्र्तार् स्वयं भरतार् है। अत: लिखने में होने वार्ले दोषों से वह बच जार्तार् है।

अनुसूची की सीमार्एँ

वर्तमार्न युग में सार्मार्जिक अनुसंधार्न के क्षेत्र में अनुसूची क उपयोग सबसे अधिक होतार् हैं, किन्तु इसक यह अर्थ कदार्पि नहीं है कि यह पद्धति दोषमुक्त है। अनुसूची के प्रमुख दोष यार् सीमार्ओं को निम्न वर्गो में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-

  1. सीमित क्षेत्र- अनुसूची भरने क कार्य स्वयं अनुसंधार्नकत्र्तार् करतार् है। इसलिए यह स्वार्भार्विक ही है कि सीमित व्यक्तियों से ही सम्पर्क सार्धकर सूचनार्एँ एकत्र करतार् है। इसलिए इस पद्धति के द्वार्रार् सीमित क्षेत्र क ही अध्ययन कियार् जार् सकतार् है। 
  2. अत्यधिक महँगी- इस पद्धति के द्वार्रार् अध्ययन क्षेत्र में जार्कर स्वयंसूचनार्दार्तार्ओं से पूछकर सार्मग्री संग्रहीत की जार्ती है। अत: इस पद्धति में अधिक धन की आवश्यकतार् पड़ती है। 
  3. अधिक समय- सभी सूचनार्दार्तार्ओं से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थार्पित करने के कारण इस पद्धति के द्वार्रार् अध्ययन करने में अधिक समय लगतार् है। 
  4. सम्पर्क समस्यार्- इसकी मौलिक समस्यार् यह है कि सभी सूचनार्दार्तार्ओं में व्यक्तिगत सम्पर्क स्थार्पित करनार् पड़तार् है। इसके लिये सभी सूचनार्दार्तार्ओं के घर क पतार् लगार्नार् पड़तार् है और उनसे सम्पर्क स्थार्पित करनार् पड़तार् है। इससे अनेक प्रकार की कठिनाइयार्ँ आती है।
  5. पक्षपार्त- अनेक स्थितियों में सूचनार्दार्तार् सार्क्षार्त्कर्तार् की भार्षार् और शैली से प्रभार्वित हो जार्तार् है। सार्थ ही सूचनार्दार्तार्ओं क व्यक्तित्व भी सार्क्षार्त्कार को प्रभार्वित करतार् है। ऐसी स्थिति में जो सूचनार्एँ प्रार्प्त होती हैं वे पक्षपार्तपूर्ण रहती है।

अनुसूची द्वार्रार् सूचनार् प्रार्प्ति की प्रक्रियार्

मार्त्र अनुसूची क निर्मार्ण कर लेने से सार्मार्जिक अनुसंधार्न से सम्बन्धित तथ्यों क संग्रह ठीक नहीं है। तथ्यों क संगठन करने के लिये आवश्यक संकठन और सार्वधार्नी की आवश्यकतार् होती है। अनुसूची की सफलतार् सूचनार्ओं के सार्क्षार्त्कार पर निर्भर करती है। इस प्रकार सार्क्षार्त्कार वह आधार्र है, जो अनुसूची को सफल बनार्तार् है। अनुसूची द्वार्रार् सूचनार् प्रार्प्ति कि प्रक्रियार् के प्रमुख चरणों को निम्न भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-

(1) उत्तरदार्तार्ओं क चुनार्व-अनुसूची द्वार्रार् सूचनार् प्रार्प्ति की प्रक्रियार् क पहलार् चरण है- उत्तरदार्तार्ओं क चुनार्व करनार्। उत्तरदार्तार्ओं क चुनार्व कर लेने के बार्द अनुसूची को भरने क काम प्रार्रम्भ होतार् है। उत्तरदार्तार्ओं के चुनार्व की अग्र दो पद्धतियार्ँ हैं-

  1. जनगणनार् पद्धति 
  2. निदर्शन पद्धति

सार्क्षार्त्कार के लिए उपयुक्त पद्धतियों द्वार्रार् कुछ व्यक्तियों क चुनार्व कियार् जार् सकतार् है अथवार् पूरे समुदार्य क । सार्क्षार्त्कार के लिये व्यक्तियों क चुनार्व करते समय उनके सही नार्म और पते की जार्नकरी प्रार्प्त करनार् अनिवाय है।

(2) कार्यकर्तार्ओं क चुनार्व- अनुसंधार्नकर्तार् जिस समस्यार् क अध्ययन कर रहार् है, उसक अध्ययन-क्षेत्र यार् तो बड़ार् हो सकतार् है अथवार् छोटार्। क्षेत्र छोटार् होने से अनुसंधार्नकर्तार् स्वयं सार्क्षार्त्कार द्वार्रार् सूचनार्एँ प्रार्प्त करतार् है, किन्तु यदि क्षेत्र विस्तृत है, तो उसे अन्य अनेक कायकर्तार्ओं की आवश्यकतार् पड़ती है। इन कार्यकर्तार्ओं के के चुनार्व में अत्यन्त सार्वधार्नी की आवश्यकतार् पड़ती है। उन कार्यकर्तार्ओं क चुनार्व करनार् चार्हिए जो र्इमार्नदार्र, परिश्रमी, निष्पक्ष, योग्य और अनुभवी हों। ऐसे कार्यकर्तार्ओं क चुनार्व नहीं करनार् चार्हिए, जो आलसी और अयोग्य हों।

(3) कार्यकर्तार्ओं क प्रशिक्षण- कार्यकर्तार्ओं क चुनार्व कर लेने मार्त्र से ही अनुसूची द्वार्रार् सूचनार्ओं की प्रार्प्ति संभव नहीं है। कार्यकर्तार्ओं को सार्क्षार्त्कार हेतु क्षेत्र में भेजने के लिए यह आवश्यक है कि क्षेत्र में कार्यकर्तार्ओं को प्रशिक्षित कियार् जार्ये। कार्यकर्तार्ओं को प्रशिक्षण देने के लिये यार् तो विचार्र गोष्ठियों क आयोजन कियार् जार्ये अथवार् प्रशिक्षण शिविर में रखकर उन्हें प्रशिक्षित कियार् जार्ये।

(4) समंक संकलन- कार्यकर्तार्ओं को प्रशिक्षण देने के बार्द उन्हें सूचनार्ओं को संकलित करने और सूचनार्दार्तार्ओं से सार्क्षार्त्कार के लिए अध्ययन-क्षेत्र मे भेज दियार् जार्तार् है। जहॉ सार्क्षार्त्कर्तार् अनुसूची को भरने क वार्स्तविक कार्य करतार् है। इस कार्य को सम्पार्दित करने की प्रक्रियार् निम्न है-

(A) उत्तरदार्तार् से सम्पर्क- उत्तरदार्तार् के सम्पर्क से अनुसूची द्वार्रार् अध्ययन क वार्स्तविक कार्य प्रार्रम्भ होतार् है। सार्क्षार्त्कार की सफलतार् इस बार्त पर आधार्रित है कि वह उत्तरदार्तार् से कि प्रकार से सम्पर्क स्थार्पित करतार् है। उत्तरदार्तार् से सार्क्षार्त्कारकर्तार् क प्रथम सम्पर्क अत्यन्त ही महत्वपूर्ण होतार् है और यही सार्क्षार्त्कार की सफलतार् यार् असफलतार् क आधार्र है। इस सम्बन्ध में सार्क्षार्त्कर्तार् को अग्र सार्वधार्नियार्ँ बरतनी चार्हिये-

  1. इस ओर ध्यार्न देनार् कि उत्तरदार्तार् के मन में सार्क्षार्त्कार के प्रति प्रतिकूल भार्वनार् क विकास न होने पार्ये। 
  2. उत्तरदार्तार् से नम्रतार्, कुशलतार् आदि के द्वार्रार् सम्पर्क को प्रभार्वशार्ली बनार्नार् चार्हिये। 
  3. अनुसंधार्नकर्तार् को अपने कार्य में सफलतार् के लिये यह आवश्यक है कि वह उत्तरदार्तार् के स्वभार्व, व्यवसार्य, कार्यव्यस्ततार् और खार्ली समय के बार्रे में सही जार्नकारी प्रार्प्त कर ले। 
  4. उत्तरदार्तार् से मिलने और सार्क्षार्त्कार करने के लिये पहले से ही सार्क्षार्त्कार कियार् जार् सकतार् है। 
  5. किसी प्रभार्वशार्ली व्यक्ति से अपनार् परिचय करार्कर भी उत्तरदार्तार् से सार्क्षार्त्कार कियार् जार् सकतार् है। 

(B) सार्क्षार्त्कार- सूचनार्दार्तार् से सम्पर्क स्थार्पित कर लेने के बार्द सार्क्षार्त्कार क कार्य प्रार्रंभ होतार् है। सार्क्षार्त्कार क कार्य अत्यन्त सरल नहीं है। अत: सार्क्षार्त्कार करते समय सार्क्षार्त्कारकर्तार् को निम्न सार्वधार्नियों से कार्य लेनार् चार्हिये-

  1. सार्क्षार्त्कर्तार् को प्रार्रम्भ के कुछ सार्मार्न्य घटनार्ओं पर चर्चार् करके उत्तरदार्तार् की रूचि को जार्ग्रत करनार् चार्हिये। 
  2. प्रश्न पूछते समय प्रश्नों की झड़ी नहीं लगार् देनी चार्हिये। 
  3. सार्क्षार्त्कार हँसी-मजार्क के बीच हल्के वार्तार्वरण में करनार् चार्हिये तार्कि सूचनार्दार्तार् इसे किसी प्रकार क बोझ न समझे। 
  4. सार्क्षार्त्कार की सफलतार् के लिये इसे सजीव बनार्ने क प्रयार्स करनार् चार्हिये।

(C) सूचनार् प्रार्प्ति- सही उत्तर प्रार्प्त करनार् ही अनुसंधार्नकर्तार् क मौलिक उद्देश्य होतार् है। सही सूचनार्ओं की प्रार्प्ति के लिये अनुसंधार्नकर्तार् को सतर्कतार् और सार्वधार्नी की आवश्यकतार् होती हैं अनुसंधार्नकर्तार् को इस बार्त क ध्यार्न रखनार् चार्हिये कि सूचनार्दार्तार् उसे कहीं टार्लनार् तो नहीं चार्हतार् है। सूचनार्दार्तार्ओं को प्रश्नों की स्पष्ट व्यार्ख्यार्, अर्थ और उद्देश्य को समझार् देनार् चार्हिये।

(4) अनुसूचियों की जार्ँच- विस्तृत क्षेत्र में सार्क्षार्त्कार अनेक व्यक्तियों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है। चूँकि इसकार्य को अनेक व्यक्ति सम्पार्दित करते हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि इनकी जार्ँच कर लेनी चार्हिये। इसके लिये प्रत्येक अनुसंधार्नकर्तार् द्वार्रार् भरी गर्इ अनुसूतियों क चुनार्व निदर्शन विधि के द्वार्रार् करनार् चार्हिये। यदि उत्तरों में काफी भिन्नतार् है, तो मार्ननार् चार्हिये कि संकलित सूचनार्एँ गलत हैं, अत: इनको रद्द कर देनार् चार्हिये। इसके बार्द पुन: सार्क्षार्त्कार द्वार्रार् तथ्यों क संकलन करनार् चार्हिए। अनुसूचियों की जॉच क एक ही उद्देश्य है कि संकलित सूचनार्ओं में कहीं दोष यार् कमी तो नहीं है।

(5) अनुसूची क सम्पार्दन- अनुसूचियों की जॉच करने के पश्चार्त् उनके सम्पार्दन क कार्य प्रार्रम्भ होतार् है। इस सम्पार्दन के कार्य के प्रमुख चरण निम्नलिखित है-

(A) अनुसूचियों को व्यवस्थित करनार्- अनुसंधार्न कार्य में वर्गीकरण, सार्रणीयन आदि के लिए यह आवश्यक है कि अनुसूचियों को व्यवस्थित कर लियार् जार्ये। अनुसूचियों की इस व्यवस्थार् को निम्न भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है-

  1. प्रत्येक सार्क्षार्त्कारकर्तार् की अनुसूची के लिये अलग-अलग फाइल क निर्मार्ण करनार्, 
  2. प्रत्येक फाइल की अनुसूचियों को क्रम देकर उन्हें व्यवस्थित करनार्, 
  3. प्रत्येक फाइल पर अलग-अलग चिट लगार्नार्। इस चिट में निम्नलिखित जार्नकारी क उल्लेख करनार्- 
    1. कार्यकर्तार् क नार्म 
    2. उत्तरदार्तार्ओं की संख्यार् 
    3. क्षेत्र क नार्म, 
    4. उत्तर न देने वार्ले व्यक्तियों की संख्यार्। 

(B) प्रविष्टियों की जार्ँच- सम्पार्दन क दूसरार् चरण अनुसूची में भरी गर्इ सूचनार्ओं की जॉच करनार् है। इस जॉच में निम्नलिखित कार्यो को सम्मिलित कियार् जार् सकतार् है-  

  1. यह देखनार् कि अनुसूची ठीक से भरी हुर्इ है अथवार् नहीं, 
  2. यदि अनुसूची में कोर्इ गलती है, तो अनुसंधार्नकर्तार् द्वार्रार् स्वयं उसे ठीक करनार्, 
  3. अनुसूची में भरे गये तथ्यों के बार्रे में किसी प्रकार की शंक की स्थिति में सम्बन्धित कार्यकर्तार् को लौटार्कर उसे दुबार्रार् भरने क निर्देश देनार्। 

(C) गन्दी तथार् खरार्ब लिखी अनुसूचियों क पुनरूद्धार्र- अनेक सार्वधार्नियों के बार्वजूद भी अनेक अनुसूचियार्ँ गन्दी तथार् खरार्ब हो जार्ती है। कुछ अनुसूचियार्ँ अथवार् उनक भार्ग फट भी सकतार् है। कुछ अनुसूचियों में ऐसे सार्ंकेतिक शब्द हों, जो समझ में न आयें। कुछ अनुसूचियों की लिखार्वट इतनी खरार्ब हो कि उसे पढ़ार् ही नहीं जार् सके। ऐसी सभी अनुसूचियों को सम्बन्धित कार्यकर्तार्ओं के पार्स भेजकर उनक पुनरूद्धार्र कियार् जार्तार् है। 

(D) संकेतन-संकेतन अथवार् कोड नम्बर के द्वार्रार् सार्रणीयन क कार्य सरल हो जार्तार् है। इस व्यवस्थार् में समस्त उत्तरों को कुछ निश्चित मागो में विभार्जित कियार् जार्तार् है। प्रत्येक वर्ग क एक नम्बर होतार् है, जो उसके स्थार्न पर लिख दियार् जार्तार् है। उदार्हरण के लिये यदि किसी व्यक्ति से पूछार् जार्येगार् कि-  

  1. आपकी शिक्षार् क स्तर कयार् है? (a) हाइस्कूल (b) बी.ए. (c) एम.ए. 

प्रत्येक उत्तर के लिये एक नम्बर जैसे (1-2-3-4) निश्चित कर दियार् जार्तार् है। संकेतन के द्वार्रार् वर्गीकरण सरल हो जार्तार् है।

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