समार्चार्र पत्र क इतिहार्स
इक्कीसवीं सदी की हमार्री दुनियार् आज इतनी छोटी हो गर्इ है कि इसे ग्लोबल विलेज कहार् जार्ने लगार् है। दुनियार् को इतनार् छोटार् बनार्ने क काम जिस अकेली चीज ने सबसे ज्यार्दार् कियार् है उसे कहते हैं, सूचनार् तकनीक। क्षण भर में इंटरनेट के जरिए, फोन के जरिए आप दुनियार् के किसी दूसरे कोने में बैठै व्यक्ति से बार्तें कर सकते हैं। उस तक समार्चार्र पहुंचार् सकते हैं, उसक समार्चार्र जार्न सकते हैं। लेकिन संचार्र क्रार्न्ति की इस मंजिल तक पहुँचने की एक लम्बी यार्त्रार् रही है। प्रार्ग्एतिहार्सिक काल में भित्ति चित्रों के जरिए अपने मन की बार्त को संप्रेषित करने की कलार् को ही संचार्र इतिहार्स की प्रार्रम्भिक कड़ी मार्नार् जार् सकतार् है। चित्रों के बार्द शब्दों और फिर लिपि के जरिए चलते-चलते जब मनुष्य की विकास यार्त्रार् मुद्रण कलार् तक पहुंची तो संचार्र के इतिहार्स में एक बड़ी घटनार् घटी, यह घटनार् थी समार्चार्र पत्रों क जन्म।

मुद्रण क इतिहार्स 175 र्इस्वी के आस-पार्स तक जार्तार् है। चीन में इस काल के ठप्पे से मुद्रित कुछ पुरार्वशेष मिले हैं। लेकिन धार्तु के टार्इप अक्षरों क विकास होते-होते लगभग सार्ढे़ बार्रह सौ वर्ष और बीत गए। जर्मनी में धार्तु के टार्इप के जरिए छपाइ की शुरूआत 1450 र्इस्वी में हुर्इ। 1466 में फ्रार्ंस, 1477 में इंग्लैण्ड और 1495 में पुर्तगार्ल तक यह कलार् पहुंच चुकी थी। भार्रत में मुद्रण कलार् पुर्तगार्ल के र्इसाइ धर्म प्रचार्रकों के सार्थ 1550 में गोवार् पहुंची। लेकिन इसक विधिवत विकास 1778 में कोलकातार् में पहलार् पे्रस खुलने के बार्द ही होनार् शुरू हुआ। चीन से ‘पेकिंग गजट’ और नीदरलैंड के ‘न्यूजार्इटुंग’ (1526) को समार्चार्र पत्रों क प्रार्रम्भिक रूप मार्नार् जार् सकतार् है।

आज लगभग 500 वर्ष की लम्बी यार्त्रार् में पत्रकारितार् ने अनेक ऊँचाइयार्ँ छू ली हैं, अनेक कीर्तिमार्न स्थार्पित किए हैं और मनुष्यतार्, स्वतंत्रतार् और विश्व बंधुत्व की दिशार् में मार्नव समार्ज को सर्वदार् सकारार्त्मक दिशार् पर चलते रहने की प्रेरणार् प्रदार्न की है।

समार्चार्र पत्र क इतिहार्स

समार्चार्र पत्र-पत्रिकाएं क इतिहार्स 

र्इसार् पूर्व पार्ंचवी शतार्ब्दी में रोम में रार्ज्य की ओर से संवार्द लेखक नियुक्त किये जार्ने के प्रमार्ण इतिहार्स में मिलते हैं। इन संवार्द लेखकों क काम रार्जधार्नी से दूर के नगरों में जार्कर हार्थ से लिख कर रार्ज्य के आदेशों क प्रचार्र करनार् होतार् थार्। र्इसार् पूर्व 60 सन में जब जूलियस सीजर ने रोम की गद्दी संभार्ली तो उसने ‘एक्टार् डिउर्नार्’ (।बजं क्पनतदं) नार्मक दैनिक समार्चार्र बुलेटिन शुरू करवार्यार्। इसमें मूल रूप से रार्ज्य की घोषणार्एं होती थी और इन्हें प्रतिदिन रोम शहर में सावजनिक स्थार्नों पर चिपकायार् जार्तार् थार्।

यूरोप में 16वीं सदी में मेलों व उत्सवों के दौरार्न दुकानों में बिकने वार्ली चीजों में ऐसे हस्तलिखित परचे भी होते थे जिनमें युद्ध की खबरें, दुर्घटनार्एं, रार्ज दरबार्रों के किस्से आदि लिखे होते थे। भार्रत में मुगल सार्म्रार्ज्य में भी रार्ज्य की ओर से वार्कयार्नवीस अथवार् कैफियतनवीस नियुक्त किये जार्ते थे । वार्कयार्नवीस रार्ज्य के अलग-अलग स्थार्नों से विशेष घटनार्एं संग्रहीत कर धार्वकों और हरकारों के जरिए बार्दशार्ह तक भेजते थे।

समार्चार्र पत्रों क प्रार्रम्भिक रूप 1526 में प्रकाशित नीदरलैण्ड के ‘न्यूजार्इटुंग’ में मिलतार् है। 1615 में जर्मनी से ‘फ्रैंकफुर्टेक जर्नल’, 1631 में फ्रार्ंस से ‘गजट द फ्रार्ंस’, 1667 में बैल्जियम से ‘गजट वैन गट’, 1666 में इंग्लैण्ड से ‘लन्दन गजट’ और 1690 में अमेरिक से ‘पब्लिक ऑकरेंसज’ को प्रार्रम्भिक समार्चार्र पत्र मार्नार् जार्तार् है।

प्रार्रम्भिक दैनिक समार्चार्र पत्रों में 11 माच 1702 को लन्दन से प्रकाशित ‘डेली करेंट’ क नार्म प्रमुख है। इसी के बार्द रार्बिन्सन क्रूसो के लेखक डेनियल डीफो ने कुछ सार्थियों के सार्थ मिलकर 1719 में ‘डेली पोस्ट’ नार्मक एक दैनिक निकालार्, मगर ब्रिटिश पत्रकारितार् की वार्स्तविक शुरूआत 1769 में हुर्इ। जब लन्दन से ही ‘मानिंग क्रार्निकल’ नार्मक अखबार्र क प्रकाशन शुरू हुआ। एक जनवरी 1785 से लन्दन से ही ‘डेली यूनिवर्सल रजिस्टर’ नार्मक पत्र क प्रकाशन शुरू हुआ। 1788 में इसक नार्म बदल कर ‘टार्इम्स’ कर दियार् गयार्। ‘टार्इम्स’ को ब्रिटिश पत्रकारितार् के इतिहार्स क एक मजबूत स्तम्भ मार्नार् जार्तार् है। डेली टेलीग्रार्फ, स्काट्स मैन भी प्रार्रम्भिक ब्रिटिश समार्चार्र पत्रों में शुमार्र किये जार्ते हैं।

1690 में जब अमेरिक से 4 पृष्ठों क ‘पब्लिक ऑकरेसेज’ नार्मक अखबार्र निकालार् गयार् तो यह ब्रिटेन के बार्हर प्रकाशित होने वार्लार् पहलार् समार्चार्र पत्र थार्। हार्लार्ंकि 1622 में लन्दन से प्रकाशित ‘न्यूज वीक’ पत्रिक की प्रतियार्ं समुद्री पोतों के जरिए अमेरिक तक पहले से ही भेजी जार्ने लगी थीं। 1704 में अमेरिक के बोस्टन शहर से ‘न्यूज लेटर’ और 1719 से ‘वीकली मर्करी’ क प्रकाशन शुरू हुआ। अमेरिकी स्वतंत्रतार् संग्रार्म के दौर में वहार्ं समार्चार्र पत्रों क बहुत तेजी से विकास हुआ। 1775 के अमेरिक में 37 समार्चार्र पत्र प्रकाशित होते थे जिनमें 23 स्वतंत्रतार् समर्थकों के पक्षधर थे । आज अमेरिक क समार्चार्र पत्रों की छपाइ और कमाइ में विश्व में पहलार् स्थार्न हो गयार् है।

सितम्बर 1778 में कोलकातार् के कौंसिल हॉल व अन्य सावजनिक स्थार्नों पर एक हस्तलिखित परचार् चिपक देखार् गयार् थार्। इसमें वोल्टार्ज नार्मक एक व्यक्ति ने आम जनतार् से कहार् थार् कि उसके पार्स ब्रिटिश रार्ज से जुड़ी ऐसी लिखित जार्नकारियार्ं हैं, जिसमेंं हर नार्गरिक की दिलचस्पी हो सकती है। परचे में वोल्टार्ज ने यह भी लिखार् थार् कि चूंकि कोलकातार् में छपाइ की समुचित व्यवस्थार् नहीं है इसलिए वोल्टार्ज ने ऐसी सार्मग्री पढ़ने यार् नकल करने के इच्छुक लोगों को अपने घर पर आमंत्रित भी कियार् थार्। र्इस्ट इण्डियार् कम्पनी के अधिकारियों में इस परचे को लेकर बड़ी खलबली मच गर्इ और उन्होंने वोल्टार्ज क बंगार्ल छोड़ कर यूरोप वार्पस लौट जार्ने क हुक्म सुनार् दियार्। इस घटनार् को भार्रत में आधुनिक पत्रकारितार् की शुरूआती घटनार् मार्नार् जार्तार् है। इसके 12 वर्ष बार्द 29 जनवरी 1780 को कलकत्तार् से पहले भार्रतीय अखबार्र ‘कलकत्तार् जनरल एडवरटार्इजर’ यार् हिकीज गजट क प्रकाशन हुआ। इसके मार्लिक सम्पार्दक जेम्स ऑगस्टस हिकी को भी ब्रिटिश अधिकारियों ने भ्रष्टार्चार्र के खिलार्फ लिखने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। पहले पोस्टआफिस के जरिये भेजे जार्ने वार्ले उसके अखबार्रों पर रोक लगार् दी गर्इ और फिर उस पर मुकदमार् चलार् कर एक सार्ल की कैद व 200 रूपये क जुर्मार्नार् ठोंक दियार् गयार्। हिकी क अखबार्र बन्द कर दियार् गयार्, हिकी को भार्रत में स्वतंत्र पत्रकारितार् को जन्म देने वार्लार् भी कहार् जार्तार् है क्योंकि उसने कंपनी के अधिकारियों से भ्रष्टार्चार्र के खिलार्फ लिखने में कोर्इ समझौतार् नहीं कियार् बल्कि उसने लिखो,’ अपने मन और आत्मार् की स्वतंत्रतार् के लिए अपने शरीर को बन्धन में डार्लने में मुझे आनन्द आतार् है।’

भार्रतीय भार्षार्ओं क पहलार् अखबार्र ‘दिग्दर्शन’ भी कोलकातार् से ही 1818 में बार्ंग्लार् में प्रकाशित हुआ थार्। आधुनिक हिन्दी पत्रकारितार् के उद्भव क श्रेय भी कोलकातार् को ही जार्तार् है। ‘उदन्त मातण्ड’ नार्मक इस सार्प्तार्हिक पत्र को 30 मर्इ 1826 को कोलकातार् के कालू टोलार् मोहल्ले से युगल किशोर शुक्ल ने निकालार् थार्। आर्थिक संकट के कारण यह पत्र 4 दिसम्बर 1827 को बन्द हो गयार्। इसके अंतिम अंक में संपार्दक युगल किशोर ने लिखार्-

‘‘आज दिवस लो उग चुक्यो, मातण्ड उदन्त। 

अस्तार्चल को जार्त है, दिनकर दिन अब अन्त।।’’ 

कोलकातार् से ही 10 मर्इ 1829 को ‘हिन्दू हेरार्ल्ड’ क प्रकाशन शुरू हुआ। हिन्दी, बार्ंग्लार्, फार्रसी व अंगे्रजी में प्रकाशित इस अखबार्र के संपार्दक रार्जार् रार्ममोहन रार्य थे, देवनार्गिरी लिपि में प्रकाशित हिन्दी क पहलार् अखबार्र जनवरी 1845 में बनार्रस से शुरू हुआ। ‘बनार्रस अखबार्र’ नार्मक इस पत्र के संपार्दक रार्जार् शिव प्रसार्द सितार्रेहिन्द थे।

1850 में बनार्रस से ‘सुधार्कर’ निकलार् और 1852 में आगरार् से मंश्ु ार्ी सदार्सुख लार्ल ने ‘बुद्धि प्रकाश’ अखबार्र निकालार्। 1854 में कोलकातार् से ही हिन्दी क पहलार् दैनिक समार्चार्र ‘सुधार्वर्षण’ निकलार्। 8 फरवरी 1857 को अजीमुल्लार् खार्ं ने दिल्ली से ‘पयार्मे आजार्दी’ नार्मक अखबार्र निकालार्। इसे भार्रतीय स्वार्धीनतार् संग्रार्म क पहलार् अखबार्र मार्नार् जार्तार् है।

प्रथम स्वतंत्रतार् संग्रार्म के बार्द के दौर में 1867 में बनार्रस से भार्रतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘कवि वचन सुधार्,’ 1877 में बार्लकृष्ण भट्ट ने इलार्हार्बार्द से ‘हिन्दी प्रदीप’ क प्रकाशन शुरू कियार्। 1878 में कोलकातार् से ‘भार्रत मित्र‘ 1885 में कालार्कांकर से ‘हिन्दोस्थार्न’ आदि महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं क प्रकाशन शुरू हुआ। इस दौर के प्रार्य: सभी पत्रों में जार्तीयतार् व स्वार्भिमार्न की भार्वनार् सार्फ-सार्फ देखी जार् समती है। छपाइ की सीमार्ओं, वितरण की समस्यार्ओं और संसार्धनों की कमी के बार्वजूद इन सभी क भार्रतीय पत्रकारितार् के विकास में उल्लेखनीय योगदार्न है।

उन्नीसवीं सदी के प्रार्रम्भ में प्रार्य: सभी समार्चार्र पत्रों और पत्रिकाओं में ब्रिटिश रार्ज के प्रति कोर्इ बड़ार् विरोध यार् आक्रोश नहीं दिखतार्। हार्लार्ंकि भार्रत में पत्रकारितार् क आरम्भ ही कम्पनी के अधिकारियों के भ्रष्टार्चार्र के खिलार्फ मुहिम के सार्थ हुआ थार्। इस दौर के सभी पत्रों ने सार्मार्जिक सुधार्रों की दिशार् में काफी योगदार्न दियार् । रार्जार् रार्म मोहन रार्य जैसे समार्ज सुधार्रक इस दौर के सम्पार्दकों में शार्मिल थे। लेकिन इस सदी के दूसरे भार्ग में आजार्दी के पहले संग्रार्म की छार्प भार्रतीय पत्रकारितार् पर सार्फ देखी जार् सकती है।

बीसवीं सदी व वर्तमार्न परिपे्रक्ष्य 

सन 1900 क वर्ष हिन्दी पत्रकारितार् के इतिहार्स में महत्वपूर्ण है। इस वर्ष हिन्दी की युगार्न्तरकारी पत्रिक ‘सरस्वती’ क प्रकाशन शुरू हुआ थार् । इसके प्रकाशक चिन्तार्मणि घोष थे । सरस्वती क उद्देश्य हिन्दीभार्षी क्षेत्र में सार्ंस्कृतिक जार्गरण करनार् थार्। रार्ष्ट्रीय जार्गरण तो उसक अंग थार् ही। सरस्वती के प्रकाशन के बार्द देश की आजार्दी तक हिन्दी क समार्चार्र जगत विविध प्रकार की पत्र पत्रिकाओं से समृद्व होतार् चलार् गयार् थार्। 1925 के बार्द गार्ँधी युग में हिन्दी पत्रकारितार् ने चौमुखी विकास कियार् । इसी युग में रार्ष्ट्रीय पत्रकारितार् से अलग हिन्दी सार्हित्यिक पत्रकारितार् ने भी अपनार् स्वतंत्र रूप विकसित कर लियार् । इस युग ने हिन्दी को गणेश शंकर विद्यार्थ्र्ार्ी और बार्बूरार्व विष्णु परार्डकर जैसे पत्रकार भी दिए और स्वरार्ज्य, अभ्युदय व प्रतार्प जैसे पत्र भी ।

1907 में पण्डित मदन मोहन मार्लवीय ने अभ्युदय के जरिए उत्तर प्रदेश में जन जार्गरण क जर्बदस्त कार्य शुरू कियार् । शहीद भगत सिंह की फार्ंसी के बार्द प्रकाशित अभ्युदय के फार्ंसी अंक ने तो हलचल ही मचार् दी थी। 13 अप्रैल 1907 से नार्गपुर से निकलार् हिन्द केसरी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण थार् कि इसमें लोकमार्न्य तिलक के प्रसिद्व अखबार्र ‘केसरी’ के लेखों क हिन्दी अनुवार्द होतार् थार् और इसमें वही सार्मग्री होती थी जो एक सप्तार्ह पूर्व केसरी में छप चुकी होती थी। हजार्रों की संख्यार् में छपने वार्ले इस अखबार्र ने अल्पकाल में ही उत्तर भार्रत के युवार्ओं में खार्सी पैठ बनार् ली थी । इलार्हार्बार्द के ‘स्वरार्ज’ की तरह 1910 में कानपुर से निकलार् ‘प्रतार्प’ भी एक ओजस्वी अखबार्र थार् । गणेश शंकर विद्यार्थ्र्ार्ी के इस अखबार्र क प्रकाशन हिन्दी पत्रकारितार् के इतिहार्स में एक क्रार्न्तिकारी कदम थार्। विद्यार्थ्र्ार्ी भार्रतीय पत्रकारितार् में एक अमर हस्तार्क्षर मार्ने जार्ते हैं। 1917 में कोलकातार् से शुरू हुए विश्वमित्र को इस वजह से महत्तवपूर्ण मार्नार् जार्तार् है क्योंकि वह हिन्दी क पहलार् दैनिक थार् जो कि एक सार्थ 5 शहरों से प्रकाशित होतार् थार्। 5 सितम्बर 1920 को बनार्रस से शुरू ‘आज’ को भी इसी कड़ी क अंग मार्नार् जार् सकतार् है।

भार्रत में पत्रकारितार् के शुरूआती दिनों से ही उस पर सरकार की ओर से कड़े प्रतिबन्ध लगार्ए गए थे । कर्इ दमनकारी कानून अखबार्रों और पत्रकारों क मुँह बन्द करने को समय-समय पर बनार्ए गए थे। 1878 क वर्नार्क्यूलर पे्रस एक्ट भी इसी तरह क एक कानून थार् । लेकिन इसक सभी तत्कालीन समार्चार्र पत्रों ने एकजुट विरोध कियार् थार् और यह बेहद दमनकारी कानून भी भार्रतीय पत्रकारितार् के उफार्न को रोक नहीं पार्यार् । 12 मर्इ 1883 को कलकत्तार् के ‘उचित वक्तार्’ यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है। ‘‘देशीय सम्पार्दको ! सार्वधार्न!! कड़ी जेल क नार्म सुनकर कर्तव्यविमूढ़ मत हो जार्नार् । यदि धर्म की रक्षार् करते हुए यदि गवर्नमेंट को सत्परार्मर्श देते हुए जेल जार्नार् पड़े तो क्यार् चिन्तार् है।’’

इस वैचार्रिक परम्परार् की छार्यार् में विकसित बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों की हिन्दी पत्रकारितार् में धर्म और समार्ज सुधार्र के स्वर कुछ घीमे पड़ गए और जार्तीय चेतनार् ने सार्फ सार्फ रार्ष्ट्रीय चेतनार् क रूप ले लियार् । देश की आजार्दी इस दौर की पत्रकारितार् क एक मार्त्र ध्येय हो गयार् थार्। उत्तरार्ख्ण्ड की पत्रकारितार् में भी हम इन स्वरों को सार्फ देख सकते हैं । ‘शक्ति’ और ‘गढ़वार्ली’ तो इसके प्रतीक ही हैं। इस दौर की पत्रकारितार् पर गार्ंधी की विचार्र धार्रार् की छार्प की सार्फ देखी जार् सकती है।

हार्लार्ँकि आजार्दी के बार्द से धीरे-धीरे पत्रकारितार् मिशन के बजार्य व्यवसार्य बनती चली गर्इ लेकिन यह भी सत्य है कि आजार्दी के बार्द ही भार्रत में पत्रकारितार् के विकास क एक नयार् अध्यार्य भी आरम्भ हुआ । आजार्दी के वक्त जहार्ं देश भर में प्रकाशित होने वार्ले दैनिक पत्रों की संख्यार् 500 से कुछ ही अधिक थी आज यह बढ़ कर 10 हजार्र से अधिक हो चुकी है। पत्र पत्रिकाओं के कुल पार्ठकों की संख्यार् करोड़ों में पहुंच चुकी है। 1975 में आपार्तकाल में लार्गू कड़ी सेंसरशिप के दौर को छोड़ दियार् जार्ए तो रार्ज्य के दमन के दुश्चक्र से भी पत्रकारितार् सार्मार्न्यत: मुक्त ही रही है। आपार्तकाल में लगभग 40 प्रिटिंग पे्रस सील कर दी गर्इ थीं । कुछ अखबार्रों क प्रकाशन तो हमेशार् के लिए बन्द ही हो गयार्। लेखन व पत्रकारितार् से जुड़े 7000 से अधिक लोग गिरफ्तार्र कर लिए गए थे ।

इस काले अध्यार्य के बार्द 1984 में बिहार्र में बिहार्र पे्रस बिल, और 1987 में रार्जीव गार्ंधी द्वार्रार् एंटी डिफेमेशन बिल लार्कर मीडियार् पर अंकुश लगार्ने की कोशिशें हुर्इ मगर पत्रकार बिरार्दरी के तीव्र विरोध के कारण ये दोनों ही बिल वार्पस ले लिए गए ।

80 के दशक में कम्प्यूटर टैक्नोलॉजी क इस्तेमार्ल मीडियार् के क्षेत्र में व्यार्पक रूप से शुरू हो जार्ने के बार्द तो भार्रतीय मीडियार् क चेहरार् ही बदल गयार् । इसके क्रार्न्तिकारी परिणार्म हुए और आज देश क मीडियार् विश्व भर में अपनी अलग पहचार्न बनार् चुक है। पत्र पत्रिकाओं के युग से आगे बढ़ कर वह टीवी और इंटरनेट समार्चार्रों के युग में पहुंच चुक है और उत्तरोत्तर प्रगति ही करतार् जार् रहार् है।

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