संघवार्द और भार्रतीय संविधार्न

शार्सन की शक्तियों क प्रयोग मूल रूप से एक स्थार्न से कियार् जार्तार् है यार् कर्इ स्थार्नों से। इस आधार्र पर शार्सन-प्रणार्लियों के दो प्रकार हैं-एकात्मक शार्सन और संघार्त्मक शार्सन। जिस शार्सन-व्यवस्थार् में शार्सन की शक्ति एक केन्द्रीय सरकार में संकेन्द्रित होती है, उसे एकात्मक शार्सन कहते हैं। इसके विपरित जिस प्रणार्ली में शार्सन की शक्तियार्ँ केन्द्र तथार् उसकी घटक इकाइयों के बीच बँटी रहती हैं, उसे संघार्त्मक शार्सन कहतें हैं।

संघार्त्मक शार्सन प्रणार्ली क अर्थ एवं परिभार्षार् 

‘संघ’ शब्द आंग्ल भार्शार् के ‘फेडरेशन’ शब्द क हिन्दी अनुवार्द है। ‘फेड-रेशन’ शब्द लैटिन भार्शार् के शब्द ‘फोडस’ से बनार् है। ‘फोडस’ से अभिप्रार्य है ‘संधि’ यार् समझौतार्। जब दो यार् दो से अधिक रार्ज्य एक संधि अथवार् समझौते के द्वार्रार् मिलकर एक नये रार्ज्य क निर्मार्ण करते हैं। तो वह रार्ज्य ‘संघ रार्ज्य’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। अमरीका, आस्ट्रेलियार् और स्विट्जरलैण्ड के संघों क विकास इसी प्रकार से हुआ है।

संघार्त्मक शार्सन उस प्रणार्ली को कहते हैं जिसमें रार्ज्य-शक्ति संविधार्न द्वार्रार् केन्द्र तथार् संघ की घटक इकाइयों के बीच विभार्जित रहती है। संघार्त्मक रार्ज्य में दो प्रकार की सरकारें होती है- एक संघीय यार् केन्द्रीय सरकार और कुछ रार्ज्यीय अथवार् प्रार्न्तीय सरकारें। दोनों सरकारें सीधे संविधार्न से ही शक्तियार्ँ प्रार्प्त करती है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र रहती हैं। दोनों की सत्तार् मौलिक रहती है। और दोनों क अस्तित्व संविधार्न पर निर्भर रहतार् है।

के0 सी0 व्हीयर के अनुसार्र, ‘‘संघीय शार्सन-प्रणार्ली में सरकार की शक्तियों क पूरे देश की सरकार और देश के विभिन्न प्रदेशों की सरकारों के बीच विभार्जन इस प्रकार कियार् जार्तार् है कि प्रत्येक सरकार अपने-अपने क्षेत्र में कानूनी तौर पर एक-दूसरी से स्वतन्त्रतार् होती है। सार्रे देश की सरकार क अपनार् ही आधिकार क्षेत्र होतार् है और यह देश से संघटक अंगों की सरकारों के किसी प्रकार के नियंत्रण के बिनार् अपने अधिकार क उपयोग करती है और इन अंगों की सरकारें भी अपने स्थार्न पर अपनी शिक्तार्यों क उपयोग केन्द्रीय सरकार के किसी नियंत्रण के बिनार् ही करती है। विशेष रूप से सार्रे देश की विधार्यिक की अपनी सीमित शक्तियार्ँ होती है और इसी प्रकार से रार्ज्यों यार् प्रार्न्तों की सरकारें की भी सीमित शक्तियार्ँ होती हैं। दोनों में से कोर्इ किसी के अधीन नहीं होती और दोनों एक-दूसरे की समन्वयक होती है।’’

गानर के शब्दों में, ‘‘संघ एक ऐसी प्रणार्ली है जिसमें केन्द्रीय तथार् स्थनीय सरकारें एक ही प्रभुत्व-शक्ति के अधीन होती हैं। यें सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में, जिसे संविधार्न अथवार् ससंद क कोर्इ कानून निश्चित करतार् है, सर्वोच्च होती है। संघ सरकार, जैसार् प्रार्य: कह दियार् जार्तार् है, अकेली केन्द्रीय सरकार नहीं होती, वरन् यह केन्द्रीय एवं स्थार्नीय सरकारों को मिलार्कर बनती है। स्थार्नीय सरकार उसी प्रकार संघ क भार्ग है, जिस प्रकार केन्द्रीय सरकार। वे केन्द्र द्वार्रार् निर्मित अथवार् नियन्त्रित नहीं होती।’’

हरमन फार्इनर क कथन है कि ‘‘संघार्त्मक रार्ज्य वह है जिसमें सत्तार् एवं शक्ति क एक भार्ग संघीय इकाइयों में निहित रहतार् है, जबकि दूसरार् भार्ग केन्द्रीय संस्थार् में, जो क्षेत्रीय इकाइयों में समुदार्य द्वार्रार् जार्न-बूझकर स्थार्पित की जार्ती है।’’ हैमिल्टन के अभिमत में ‘‘संघ रार्ज्यों क एक ऐसार् समुदार्य होतार् है जो एक नवीन रार्ज्य की सृष्टि करतार् है।’’ यथाथ में संघार्त्मक शार्सन-व्यवस्थार् में विशय स्वतन्त्र रार्ज्य अपनी सहमति से एक केन्द्रीय सरकार की स्थार्पनार् करते हैं और सहमति के अनुसार्र रार्ष्ट्रीय महत्व के कुछ विशयों क शार्सन-प्रबन्धक केन्द्र को देकर शेष विशयों के प्रबन्धक के अधिकार सम्बन्ध में अधिकार स्वयं रखते हैं। अधिकांश पुरार्ने संघ इसी प्रकार से बने है तथार्पि आधुनिक युग में कतिपय ऐसे नये संघार्त्मक रार्ज्यों क भी निर्मार्ण हुआ है जिनमें केन्द्र की ओर से पहल की गयी तथार् संविधार्न के मार्ध्यम से रार्ज्यों को कुछ शक्तियार्ँ दी गयी। यह उल्लेखनीय है कि भार्रतीय संघ क निर्मार्ण इसी प्रक्रियार् से हुआ हैं।

संघार्त्मक शार्सन के सम्बन्ध में व्यक्त विचार्रों से निम्नलिखित तथ्य उभरते है: प्रथम, संघ शार्सन में दोहरी सरकारें होती है- केन्द्रीय सरकार तथार् इकाइयों की सरकारें। द्वितीय, संविधार्न द्वार्रार् केन्द्र तथार् इकाइयों के मध्य शार्सन-शक्तियों क बटँबार्रार् कियार् जार्तार् है। तृतीय, संघ शार्सन में दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वार्यत्त होती हैं तथार् एक दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करती।

संघार्त्मक शार्सन के लक्षण 

किसी शार्सन-व्यवस्थार् को संघार्त्मक तभी कहार् जार्तार् है जब उस रार्जनीतिक व्यवस्थार् में संविधार्न तथार् सरकार दोनों ही संघार्त्मक सिद्धार्न्त पर खरी उतरती हों। संघवार्द क मूलभूत सिद्धार्न्त है- शक्तियों क विभार्जन। के0 सी0 व्हीयर के अनुसार्र, ‘‘संघीय सिद्धार्न्त से मेरार् तार्त्पर्य शक्ति के विभार्जन के तरीके से है जिससे सार्मार्न्य (संघीय) एवं क्षेत्रार्धिकारी (रार्ज्यों की) सरकारें अपने क्षेत्र में समार्न एवं पृथक होती है।’’ आम तौर से सघ व्यवस्थार् के तीन लक्षण यार् तत्व मार्ने जार्ते हैं :

1. संविधार्न की सर्वोच्चतार्-

संघ के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उसक संविधार्न लिखित एवं सर्वोच्च हो। संघ प्रणार्ली एक प्रकार की संविदार् पर आधार्रित होती है, जिसमें एक ओर केन्द्रीय सरकार और दूसरी ओर इकार्इ रार्ज्यों की सरकारें होती है। छोटी-छोटी इकाइयार्ँ मिलकर एक नयार् रार्ज्य बनार्ती है, जो प्रभुत्व-सम्पन्न होतार् है, किन्तु सार्थ ही सार्थ वे स्थार्नीय मार्मलों में अपनी स्वार्यत्तार् को भी सुरक्षित रखनार् चार्हती हैं, अत: ऐसी स्थिति में यह नितार्न्त आवश्यक है कि दोनों पक्षों क क्षेत्रार्धिकरी तथार् शक्तियार्ँ सुनिश्चित हों।

यह लिखित संविधार्न द्वार्रार् ही सम्भव है जो देश की सर्वोच्च विधि होती है। अलिखित संवैधार्निक परम्परार्ओं के आधार्र पर संध कायम नहीं रह सकतार्, क्योंकि उनक विधिक महत्व नहीं होतार्। यदि किसी संघ क संविधार्न सुपरिवर्तन हुआ तो इकार्इ रार्ज्यों को अपने अधिकारों के सम्बन्ध में सदैव शंक बनी रहेगी। लिखित संविधार्न से ही संविधार्न की सर्वोच्चतार् के सिद्धार्न्त क उद्भव होतार् है।

2. शक्तियो क विभार्जन-

संघ शार्सन क दूसरार् लक्षण यह है कि इसमें सरकार की शक्तियों को इकार्इ रार्ज्यों तथार् संघ सरकार के बीच बार्ँट दियार् जार्तार् है। कुछ काम केन्द्रीय सरकार करती है और कुछ इकाइयों की सरकारें। कायोर्ं के विभार्जन करने के दो मुख्य तरीके हैं। पहले के अनुसार्र संविधार्न द्वार्रार् संघ सरकार के कार्यो को निश्चित कर दिए जार्तार् है और बचे हुए काम रार्ज्यों की सरकारों के लिए छोड़ दिये जार्ते है। बचे हुए कार्यों को अवशिष्ट कार्य कहते हैं।

जब विभार्जन इस प्रणार्ली से होतार् है तो कहार् जार्तार् है कि अवशिष्ट शक्तियार्ँ इकार्इ रार्ज्यों में निहित हैं। अमरीकी संघ इस प्रणार्ली क महत्वपूर्ण उदार्हरण है। दूसरे तरीके के अनुसार्र संविधार्न द्वार्रार् रार्ज्यों के काम निश्चित कर दिये जार्ते हैं और शेष कार्य केन्द्रीय सरकार के लिए छोड़ दिए जार्ते है। कनार्डार् क संघ इस प्रणार्ली क महत्वपूर्ण उदार्हरण है। इस सम्बन्ध में भार्रतीय संघ की अपनी निरार्ली विशेषतार् है।

संघ प्रणार्ली में केन्द्र एवं घटक इकाइयों के बीच कार्योें एवं शक्तियों के विभार्जन क मुख्य सिद्धार्न्त यह है कि जो कार्य सावदेशिक महत्व के तथार् सम्पूर्ण रार्ष्ट्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक होते हैं उनक प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार को सौंप शेष रार्ज्य सरकारों को सुपुर्द कर दिये जार्ते हैं।

3. न्यार्यपार्लिक की सर्वोच्चतार्- 

चूँकि संघ रार्ज्य में अनेक सरकारें होती हैं और उनके अधिकार एवं शक्तियार्ँ निश्चित होती है, इसलिये उनके बीच क्षेत्रार्धिकार के प्रश्न को लेकर विवार्द उठ खड़े होने की सदैव गुंजार्इश रहती है। संघ व्यवस्थार् में यह एक आधार्रभूत प्रश्न रहतार् है कि केन्द्रीय एवं रार्ज्यीय सरकारें अपनी-अपनी वैधार्निक मर्यार्दार्ओं के भीतर कार्य कर रही है अथवार् नहीं ? इस प्रश्न क निर्मार्ण करने वार्ले कोर्इ व्यवस्थार् होनी चार्हिए। इसलिए प्रार्य: संघ रार्ज्य में एक सर्वोच्च न्यार्यलय की व्यवस्थार् की जार्ती है।

सर्वोच्च न्यार्यलय क कार्य यह देखनार् होतार् है कि संघ के अन्तर्गत सब विधार्यिकाएँ वे ही कानून पार्रित करें, जो सविधार्न के अनुकूल हों और यदि कोर्इ कानून ऐसार् हो जो संविधार्न के प्रतिकूल हो, तो वह उसे अवैध घोशित कर दे। न्यार्यपार्लिक इकाइयों एवं इकाइयों की सरकारों के बीच न्यार्यार्धिकरण क कार्य भी करती है और उनमें यदि कोर्इ संवैधार्निक झगड़ार् उठ खड़ार् होतार् है, तो उसक निर्णय भी वही करती है।

कुछ विचार्रक संघार्त्मक व्यवस्थार् के तीन गौण लक्षण और मार्नते हैं। ये तीन लक्षण हैं- (1) दोहरी नार्गरिकतार्, (2) रार्ज्यों क इकाइयों के रूप में केन्द्रीय व्यवस्थार्पिक के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व, और (3) रार्ज्यों को संघीय संविधार्न के संशोधन में पर्यार्प्त महत्व देनार्। इन लक्षणों के समर्थकों की मार्न्यतार् है कि प्रभुत्व-शक्ति के दोहरे प्रयोग की भार्ँति ही संघार्त्मक शार्सन में नार्गरिकतार् भी दोहरी होनी चार्हिए। इसमें सार्धार्रणत: प्रत्येक व्यक्ति दो रार्ज्यों क नार्गरिक होतार् है, एक तो संघ रार्ज्य क और दूसरे संघ की उस इकार्इ के रार्ज्य क जिसमें उसक निवार्स हो। रार्ज्यों के हितों क संरक्षण और अधिक ठोस बनार्ने के लिए यह आवश्यक है कि रार्ज्यों क केन्द्रीय व्यवस्थार्पिक के उच्च सदन में समार्न प्रतिनिधित्व रहे तथार् बिनार् रार्ज्यों की सहमति संविधार्न में संशोधन न किये जार् सकें।

संघवार्द  क सैद्धार्न्तिक आधार्र 

संघ रार्ज्य में एक संघीय यार् केन्द्रीय सरकार होती है और कुछ संघीभूत इकाइयों की सरकारें होती हैं। संवैधार्निक दृष्टिकोण से संघार्त्मक व्यवस्थार् शार्सन क वह रूप है जिसमें अनेक स्वतन्त्र रार्ज्य अपने कुछ सार्मार्न्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए केन्द्रीय सरकार संगठित करते हैं और उद्देश्यों की पूर्ति में आवश्यक तथार् महत्वपूर्ण विशय केन्द्रीय सरकार को सौंप देते हैं एवं शेष विशयों में अपनी-अपनी पृथक स्वतन्त्रतार् सुरक्षित रखते है। डैनियल जे0 एलार्जार्रार् के अनुसार्र, संघीय पद्वति ऐसी व्यवस्थार् प्रदार्न करती है जो ‘‘ अलग-अलग रार्ज्य-व्यवस्थार्ओं को एक बार्हर से घेरने वार्ली रार्जनीतिक पद्धति में इस प्रकार संगठित करती है कि इनमें से प्रत्येक अपनी-अपनी मूल रार्जनीतिक अंखडतार् को बनार्ये रख सकती है।’’ यह व्यवस्थार् सार्मार्न्य और घटक दो सरकारों के बीच इस प्रकार शक्तियों क वितरण करती है जिसक उद्देश्य दोनों की सत्तार् और प्रार्धिकार-क्षेत्र की रक्षार् होतार् है तथार् जो परम्परार्मत मार्नको के अनुसार्र ‘समन्वयकारी सरकार’ समझी जार्ती हैं।

संघवार्द क बुनियार्दी पहलु बहूलवार्दी है। मैक्स हार्इल्डबर्ट बोहिम ने इस बार्त की ओर संकेत करते हुए लिखार् है कि ‘‘इसकी मौलिक प्रवृत्ति समार्जस्यकीरण की ओर इसक नियार्मक सिद्धार्न्त एकतार् क है।’’ संघीय व्यवस्थार् के पीछे ‘अनेको में एक’ की स्थार्पनार् के उद्देश्य के सार्थ ही सार्थ, इन अनेको में से एक को, जहार्ँ तक सम्भव हो अपनार् पृथक और विचित्र रार्जनीतिक तथार् सार्मार्जिक अस्तित्व बनार्ये रखने की अनुमति की शक्तिशार्ली इच्छार् भी कहार् जार् सकतार् है। संघवार्द के सिद्धार्न्त के गंभीर अध्ययन से इसके नम्य और सहकारी स्वरूप क पतार् चलतार् है जो यह प्रदर्शित करतार् है कि सरकार क कोर्इ भी स्तर ‘‘न तो एक दूसरे से स्वतन्त्र है और न ही एक दूसरे पर आश्रित।’’

संघवार्द की यह परम्परार्गत व्यार्ख्यार् आधुनिक रार्जनीतिक संदर्भ में बहुत कुछ वेमेल पड़ गर्इ प्रतीत होती है। संघवार्द की परम्परार्गत धार्रणार् क दर्शन दोनों ही स्तर की सरकारों में अन्त:क्रियार् के ऐसे प्रतिमार्न की ओर हैं जिसमें हर स्तर की सरकार की अपने अधिकार-क्षेत्र में पृथकतार् और स्वतन्त्रतार् बेआँच रहे। आधुनिक संघीय पद्धति ‘‘एकात्मक सरकार और सर्वोच्च सत्तार्त्मक रार्ज्यों के शिथिल संघ के बीच कहीं पर स्थित है।’’ परम्परार्गत धार्रणार् के अनुसार्र रार्ष्ट्रीय और प्रार्देशिक सरकारें ‘समन्वयक’ हैं जो सार्मार्न्य और संघटक स्तरों पर स्वतन्त्र रार्जनीतिक पद्धतियों क निर्मार्ण करती है, आधुनिक धार्रणार् के अनुसार्र, दोनों एक ही पद्धति की रचनार् करती हैं ‘‘जिसके भीतर कर्इ अति व्यार्पक उपपद्धतियार्ँ होती हैं।’’

इसके परिणार्मस्वरूप, निर्णय-निर्मार्ण और निर्णय-निश्पार्दन प्रक्रियार्एँ न केवल रार्ष्ट्रीय और प्रार्देशिक सरकारों की आपसी सहभार्जितार् के मार्ध्यम से बल्कि शक्तियों के केन्द्रीकरण की अकाट्य प्रवृत्ति के कारण केन्द्र की सर्वोच्च स्थिति के मध्य में उसकी सौदेवार्जी की शक्ति और कुशलतार् से तथार् अपनी-अपनी जनार्ंकिक, समरनीतिक, रार्जनीतिक, आर्थिक स्थिति आदि के कारण इकाइयों की वरिश्ठ क्षमतार् से भी प्रभार्वित और निर्धार्रित की जार्ती हैं।

नवीनतम प्रवृत्तियों के अध्ययन से यह निश्कर्श निकालार् जार् सकतार् है कि संघवार्द सहयोग की एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसमें जड़तार् नहीं, गतिशीलतार् तथार् सजीवतार् दृष्टिगोचर होती है। मार्रकस एफ0 फ्रेन्डार् ने संघवार्द की व्यार्ख्यार् करते हुए लिखार् है कि संघवार्द एक स्थिर मॉडल यार् रार्जनीतिक संगठन क सूत्र न होकर जन-आधार्रित दलों, व्यार्पक नौकरशार्ही, विविध प्रकार के हित-समूहों तथार् बृद्धिरत कार्यों वार्ली निर्वार्चित सरकारों की अन्त:क्रियार् से उत्पन्न निरन्तर परिवर्तनशील प्रक्रियार् है। प्रो0 अमल रे ने इसी ओर संकेत करते हुए लिखार् है कि संघीय व्यवस्थार् में दो तरह की सत्तार्ओं को रार्ष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति में सहयोगी बनार्यार् जार्तार् है।

केन्द्रीय एवं रार्ज्य सरकारों के बीच बढ़तार् हुआ विचार्र-विनिमय इन दोनों को सार्मार्न्य नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमत ही नहीं बनार्तार् वरन् संघ की इकाइयार्ँ अब अपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण स्वार्यत्ततार् की मार्ँग भी नहीं करती हैं क्योंकि आज क समार्ज इतने एकीकृत हो गये हैं कि केन्द्र और रार्ज्यों के क्षेत्रों क सुनिचय अव्यार्वहार्रिक सार् हो गयार् है। अब तो इन दोनों के अधिकार क्षेत्र एक दूसरे के ऊपर, एक-दूसरे को ढकते हुए से लगते हैं। इसी कारण आधुनिक रार्जनीतिक समार्जों में संघवार्द एक गतिशील सहयोग की प्रक्रियार् के रूप में देखार् जार्ने लगार् है। निश्कर्शत: आधुनिक संघीय पद्धति ‘‘एकात्मक सरकार और सर्वोच्च सत्तार्त्मक रार्ज्यों के शिथिल संघ के बीच कहीं पर स्थित है।’’ यह महार्संघीय नमूने े प्रकार में भिन्न हैं, किन्तु इसक एकतार्त्मक पद्धति से आकार में भेद हो गयार् है। अब संघवार्द के सिद्धार्न्त की परम्परार्वार्दी धार्रणार् के अनुसार्र केन्द्रीय तथार् रार्ज्यों की सरकारों को एक दूसरे से पृथक, स्वतन्त्र तथार् ‘क्षेत्र-विशेष’ में सीमित केवल संवैधार्निक दृष्टि से ही मार्नार् जार् सकतार् है। व्यवहार्र में बदलते रार्जनीतिक परिवेश में यह अन्तर धुँधलार् पड़तार् जार् रहार् है।

संघवार्द क ऐतिहार्सिक विकास 

संघवार्द की जड़ किसी न किसी रूप में प्रार्चीन काल में भी विद्यमार्न थीं। प्रार्चीन यूनार्न के नगर रार्ज्य इससे अपरिचित नहीं थे। मध्य युग में इटली के कुछ नगरों में भी संघवार्द की झलक मिलती है और तेरहंवी शतार्ब्दी से स्विट्जर लैण्ड के ‘कानफेडरेशन’ के विकास से इसक इतिहार्स अविकल रहार् है इस संघ क जन्म सन् 1291 में हुआ जबकि वहार्ँ के तीन फॉरेस्ट केण्टन (प्रदेश) अपनी रक्षार् के लिए आपस में मिल गये। आज अनेक विविधतार् वार्लें रार्ज्यों-जैसे युगोस्लार्वियार्, संयुक्त रार्ज्य अमेरिका, मेक्सिको, आस्ट्रेलियार्, सोवियत संघ और भार्रत आदि- के रार्जनीतिक संगठन क आधार्र संघवार्द ही है। आज यदि संसार्र अन्तर्रार्ष्ट्रीय अरार्जकतार् से, जिससे अब तक परिचित है, निकलकर एक विश्व-रार्ज्य के रूप में संगठित होतार् है तो यह निश्चित है कि ऐसार् संघीय आधार्र पर ही हो सकेगार्। समय-समय पर विभिन्न देशों में संघवार्द के अनेक रूप रहे हैं। अपने शिथिलतम रूप में यह ऐसे रार्ज्यों क एक संकलन मार्त्र है जो वार्स्तव में किचिनमार्त्र भी रार्ज्य क निर्मार्ण नहीं करते। इतिहार्स इस भार्ँति के विशिष्ट संगठनों के उदार्हरणों से भरार् पड़ार् है, जिन्हें हम किसी अधिक उपयुक्त नार्म के आभार्व में प्रार्य: कानफेडरेशन कहते हैं। बहुत पीछे जार्ने की आवश्यकतार् नहीं, नेपोलियन के पतन पर सन् 1815 में स्थार्पित जर्मनी के कानफेडरेशन को ही लीजिए, जो इस भार्ँति के संगठन क एक उदार्हरण है। जर्मनी में ऐसे दो शब्द एक स्टार्ट (जिसक अर्थ रार्ज्य है) तथार् दूसरार् शब्द (जिसक अर्थ संघ है) मौजूद हैं।

इन दोनों शब्दों के संयुक्त रूप से हमें जार्नने में सहार्यतार् मिल सकती है कि तथार्कथित कानफेडरेशन और वार्स्तविक संघ में क्यार् अन्तर है। सन् 1815 से 1866 तक विद्यमार्न रहने वार्लार् जर्मनी क यह कानफेडरेशन जर्मनी द्वार्रार् हमेशार् ‘बन्द’ ही कहार् जार्तार् थार् और फ्रैंकफर्ट में स्थित रार्ज्य परिषद् (डार्यट), जो इसकी एकमार्त्र केन्द्रीय संस्थार् थी, वार्स्तव में इस संगठन के विभिन्न रार्ज्यों के रार्जदूतों की सभार् से अधिक कुछ भी नहीं थी। जर्मन लोग रार्ज्यों के इस संगठन को रार्ज्य संघ कहते थे। इसमें रार्ज्यों की बहुलतार् पर जोर दियार् जार्तार् थार्। रार्ज्य संघ उसके सदस्यों को सार्मार्न्यतार् अधिक सन्तोषजनक प्रतीत नहीं हुआ और वे कुछ समय में ही यार् तो पुन: अलग हो गये अथवार् एक वार्स्तविक यूनियन के रूप में अधिक घनिष्ठार् के सार्थ जुड़ गये।

इस वार्स्तविक यूनियन को जर्मनी ने संघ रार्ज्य कहार्। इसमें 25 रार्ज्य थे जिनमें जनसंख्यार् सम्बन्धी विविधतार् थी। इसमें एक सम्रार्ट, रार्ज्य-परिषद और डार्यट थी। रार्ज्य-परिषद क गठन रार्ज्यों के प्रतिनिधियों से मिलकर होतार् थार्। और प्रत्येक रार्ज्य क परिषद में एक वोट मार्नार् जार्तार् थार्। प्रशार् के प्रधार्नमंत्री को रार्ज्य-परिषद क अध्यक्ष एवं चार्न्सलर मार्नार् जार्तार् थार्। संघवार्द की आधुनिक धार्रणार् अमरीकी संविधार्न की देन है। फिलार्डेल्फियार् सम्मेलन के द्वार्रार् जब अमरीकी संविधार्न क निर्मार्ण कियार् जार् रहार् थार् तो उसके पूर्व अमरीकी क्षेत्र के 13 उपनिवेश पृथक-पृथक रहते हुए अपनार् रार्जनीतिक जीवन व्यतीत कर रहे थे। लम्बे समय से अलग रहने के कारण उनमें अपनी पृथक सत्तार् के प्रति स्वार्भार्विक रूप से तीव्र मोह उत्पन्न हो गयार् थार् और वे उसे छोड़ने के लिए तैयार्र नहीं थे। लेकिन इसके सार्थ ही ब्रिटिश सत्तार् के विरूद्ध विद्रोह करने वार्ले इन 13 रार्ज्यों को इस बार्त क पूरार् भय थार् कि ब्रिटेन यार् यूरोप क अन्य कोर्इ देश उन्हें पुन: परार्धीन करने के लिए प्रयत्न कर सकतार् है। अत: बार्हरी दबार्व क सफलतार्पूर्वक मुकाबलार् करने के लिए उनक एक होनार् आवश्यक थार्। उनके सार्मने समस्यार् यह थी कि विविध रार्ज्य अपनी पृथक-पृथक सत्तार् बनार्ये रखते हुए भी एक हो जार्यें और ऐसे केवल संघीय व्यवस्थार् को अपनार्कर ही कियार् जार् सकतार् थार्।

बार्द में आस्ट्रेलियार् के संविधार्न क निर्मार्ण हुआ जिसमें संघवार्द के समस्त विशिष्ट लक्षण, अर्थार्त् सीमित तथार् समार्न सत्तार् वार्ले विधार्यक रार्ज्यों के बीच शक्तियों क वितरण, संविधार्न की सर्वोच्च और संविधार्न की व्यार्ख्यार् करने की न्यार्यलयों क शक्ति मौजूद है। इस संविधार्न (सन् 1900) में कॉमनवेल्थ (केन्द्रीय) सरकार की शक्तियो क उल्लेख कियार् गयार् है और शेष शिक्तार्यों को रार्ज्यों के लिए छोड़ दियार् गयार् है। इन परिगणित शक्तियों की सूची लम्बी है, फिर भी रार्ज्यों के लिए पर्यार्प्त स्वतन्त्रतार् छोड़ दी गर्इ है। संविधार्न ने एक संघीय कार्यपार्लिक की स्थार्पनार् की है जिसमें स्थार्पनार् नार्ममार्त्र के लिए तो सपरिषद् गवर्नर जनरल उत्तरदार्यी होतार् है, परन्तु जो वार्स्तव में सीनेट तथार् प्रतिनिधि सभार् से युक्त द्विसदनी संघीय विधार्नमण्डल के प्रति उत्तरदार्यी होतार् है। सीनेट में रार्ज्यों को समार्न प्रतिनिधित्व प्रार्प्त हुआ है। संविधार्न सर्वोच्च न्यार्यलय से युक्त एक संघीय न्यार्यपार्लिक की भी स्थार्पनार् करतार् है।

कनार्डार् में एक विशिष्ट प्रकार के संघ रार्ज्य क निर्मार्ण हुआ है। सी0 एफ0 स्ट्रार्ँग ने कनार्डार् को संघ रार्ज्य क रूपार्न्तरित नमूनार् कहार् है। अमरीक के गृहयुद्ध (1861-65) ने कनार्डार् निवार्सियों को, जो इसके इतने समीप थे, संघवार्द के उस रूप से, जो संयुक्त रार्ज्य अमरीक में तब तक त्रियार्न्वित हो चुक थार्, निरार्श कर दियार् थार्। इसी विश्वार्स में कनार्डार् के प्रमुख रार्जनीतिज्ञों ने एक समार्धार्न निकालार् जो वार्स्तविक संधीय प्रणार्ली में, जो बदनार्म हो चुकी थी, और एकात्मक प्रणार्ली के बीच, जो कनार्डार् के निवार्सियों की आवश्यकतार्ओं के अनुकूल नहीं थी, एक समझौतार् थार्। कनार्डार् में शक्तियों के वितरण क वह सिद्धार्न्त अपनार्यार् गयार् जो अमरीकी व्यवस्थार् क ठीक उल्टार् थार्। कनार्डार् में प्रार्न्तों की शक्तियार्ँ परिगणित की गयी हैं और ‘रक्षित शक्तियार्ँ’ संधीय सत्तार् के लिए छोड़ दी गयी हैं।

सोवियत रूस और यूगोस्लार्वियार् जैसे सार्म्यवार्दी देशों ने अपनी रार्जनीतिक संस्थार्ओं की स्थार्पनार् में पश्चिमी संविधार्नवार्द की पद्धतियों को अस्वीकार कियार् है फिर भी अपने संविधार्नों क निर्मार्ण संघ प्रणार्ली के नमूने पर करने क ही प्रयत्न कियार्। सोवियत संघ में जुलाइ, 1918 में अपनार्ये गये संविधार्न द्वार्रार् ‘सोवियत समार्जवार्दी रूसी गणरार्ज्य’ की स्थार्पनार् की गयी थी। सन् 1836 के संविधार्न के अनुच्छेद 13 में संघार्त्मक व्यवस्थार् क उल्लेख कियार् गयार् थार् और 1977 में अपनार्ये गये संविधार्न के अनुच्छेद 70 में कहार् गयार् है कि ‘‘सोवियत समार्जवार्दी गणरार्ज्यों क संघ एक अखण्ड संघीय बहुजार्तीय रार्ज्य है जो समार्जवार्दी संघबद्धतार् के सिद्धार्न्त पर जार्तियों के स्वतन्त्र आत्मनिर्णय और समार्न सोवियत समार्जवार्दी गणरार्ज्यों के स्वैच्छिक मिलन के फलस्वरूप गणित हुआ है।’’

संघवार्द की उपयोगितार्

सघार्त्मक व्यवस्थार् आधुनिक युग में अत्यधिक लचीली शार्सन-व्यवस्थार् है जिसमें प्रार्देशिक स्वतन्त्रतार् के सार्थ ही सार्थ रार्ष्ट्रीय एकतार् भी सम्भव बनती है। एक रार्जनीतिक व्यवस्थार् में विकेन्द्रकरण की प्रवृत्ति उतनी ही आवश्यक है जितनी केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति। इन विरोधी प्रवृत्तियों में समन्वय क सर्वोत्तम सार्धन संघार्त्मक व्यवस्थार् ही है। संघवार्द की उपयोगितार् पर प्रकाश डार्लते हुए सिजविक ने लिखार् है-’’संघवार्द ने रार्ज्यों के हड़पे जार्ने यार् रार्ज्य-विस्तार्र करने की समस्यार् क अन्त कर दियार् है।

यह रार्ज्यों के शार्ंतिपूर्ण एकीकरण की पद्धति है। इस प्रकार न केवल स्थार्नीय स्वशार्सन और स्वार्भिमार्न की रक्षार् सम्भव हो सकी है, अपितु रार्ष्ट्रीय स्वार्धीनतार् भी बचाइ जार् सकी है। संघवार्द द्वार्रार् बहुत सी छोट-छोटी स्वतन्त्र प्रजार्तियों को आर्थिक हार्नियों से बचार्ने क अवसर मिल गयार्, क्योंकि अब वे संगठित होकर एक रूप से कार्य कर सकती हैं। संघीय और रार्ज्य सरकारों की शक्ति एवं क्षेत्र इस भार्ँति विभक्त होते हैं कि उनसे उत्पन्न शार्सन-तन्त्र सन्तुष्ट रहते हैं। रार्ज्य की कार्य-क्षमतार् और दक्षतार् में अभिवृद्धि होती है। संघवार्द एक ऐसार् रार्जनीतिक मुद्दार् हो गयार् है जिसमें रार्ज्यों को अधिकतम व्यवस्थार्पूर्वक न्यूनतम अधिकार संघ को हस्तार्न्तरित करने से अधिकतम स्वार्धीनतार् क लार्भ हुआ है।’’ संघार्त्मक शार्सन के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं, जिनसे इसकी उपयोगितार् स्पष्ट होती है :-

  1. रार्ष्ट्रीय एकतार् तथार् क्षेत्रीय स्वतन्त्रतार् क समन्वय-संघ शार्सन क सबसे बड़ार् गुण यह है कि बहुत से छोटे-छोटे रार्ज्य मिलकर एक रार्ष्ट्र को जन्म देते हैं और सार्थ ही अपनार् स्वतन्त्र अस्तित्व भी सुरक्षित रखते हैं। छोटे-छोटे दुर्बल रार्ज्य एकतार् के सूत्र में बँध जार्ते हैं और सबल केन्द्रीय सरकार की स्थार्पनार् करते हैं जो उनकी स्वतन्त्रतार् की रक्षार् करती है। सार्थ ही, संघीभूत रार्ज्यों की स्वार्यत्ततार् भी सुरक्षित रहती है। 
  2. केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों क समन्वय-संघवार्द केन्द्रीकरण तथार् विकेन्द्रीकरण की विरोधी प्रवृत्तियों क भी समन्वय करतार् है। इसके अन्तर्गत रार्ष्ट्रीय महत्व के विशय केन्द्रीकृत कर दिये जार्ते हैं और स्थार्नीय विशय विकेन्द्रीकृत। अत: इस व्यवस्थार् से केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण दोनों के लार्भों की प्रार्प्ति होती है। 
  3.  प्रार्ार्सनिक कुशलतार्-संघ शार्सन-प्रणार्ली में शार्सन की शक्तियार्ँ एक स्थार्न पर केन्द्रित न होकर, कर्इ स्थार्नों पर विभार्जित रहती हैं, इससे किसी एक केन्द्र पर शार्सन क कार्यभार्र अधिक नहीं पड़तार्। फलस्वरूप प्रशार्सन कुशल हो जार्तार् है तथार् उसकी क्षमतार् बढ़ जार्ती है।
  4. शार्सन निरंकुश नही हो पार्तार्-संघार्त्मक शार्सन-व्यवस्थार् में शक्ति क विकेन्द्रीकरण निरंकुशतार् के स्थार्पित होने की सम्भार्वनार् को कम करतार् है। केन्द्र तथार् रार्ज्यों में शार्सन की शक्तियार्ँ विभार्जित रहती हैं, इसलिए शार्सन निरंकुश नहीं हो पार्तार्।
  5. विशार्ल देशो के लिये उपयुक्त –यह शार्ार्सन-प्रणार्ली विशार्ल आकार एवं क्षेत्रफल वार्ले देशों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है जहार्ँ विभिन्न संस्कृतियों, जार्तियों, धर्मों तथार् भार्शार्ओं के लोग रहते हैं। ऐसे देशों में स्थार्नीय विविधतार्ओं के सार्थ-सार्थ रार्ष्ट्रीय एकतार् स्थार्पित करनी होती है जो संघार्त्मक व्यवस्थार् में ही सम्भव है। 
  6. समय और धन की बचत-शक्ति-विभार्जन के कारण संघीय व्यवस्थार् में केन्द्रीय सरकार क कार्यभार्र कुछ हल्क हो जार्तार् है परिणार्मस्वरूप काम के निपटार्ने में देर होने अथवार् लार्लफीतार्शार्ही और नौकरशार्ही की प्रवृत्ति क्षीण हो जार्ती है। शार्सन क संघार्त्मक रूप आर्थिक दृष्टि से भी लार्भकारी है। यदि सभी छोटे-छोटे रार्ज्य पृथक-पृथक सेनार्एं रखें, दूसरे देशों में अपने रार्जदूत भेजें और वैदेशिक विभार्गों क गठन करें, तो निश्चय ही व्यय अधिक होगार्।
  7. विश्व सरकार की नीव-रार्ज्यों की वर्तमार्न संघ व्यवस्थार् एक विश्व-रार्ज्य की नींव के रूप में कार्य कर सकती है। यदि कभी एक विश्व-शार्सन बन सक तो उसकी नींव निश्चित रूप से संघ शार्सन-प्रणार्ली ही होगी।

संघवार्द के दोष

वर्तमार्न विश्व में गिनी-चुनी 16 संघीय व्यवस्थार्ओं के कारण यह प्रश्न पैदार् होतार् है कि इस शार्सन-व्यवस्थार् को बड़े पैमार्ने पर क्यों नहीं अपनार्यार् जार् रहार् है? इसके उत्तर में यही कहार् जार् सकतार् है कि उपर्युक्त गुणों के होते हुए भी संघ शार्सन-व्यवस्थार् में निम्नलिखित दोष पार्ये जार्ते हैं :

  1. कमजोर शार्सन-एकात्मक शार्सन की तुलनार् में संघार्त्मक शार्सन कमजोर होतार् है। शक्ति-विभार्जन और विकेन्द्रीकरण के कारण सुदृढ़ शार्सन की स्थार्पनार् की जार् सकती। डॉ0 आश्र्ार्ीवार्दम् के अनुसार्र यह शक्ति-विभार्जन आन्तरिक और बार्ह्म दोनों क्षेत्रों में बार्धार्एँ उपस्थित करतार् है। केन्द्र तथार् रार्ज्यों की सरकारों में आपसी झगड़े और मतभेद बने रहते हैं। संघ व्यवस्थार् में निर्णय करने की शीघ्रतार्, एकरूपतार्, दृढ़तार् इत्यार्दि क अभार्व रहतार् है।
  2. केन्द्र और रार्ज्यों शार्सन में संघर्ष –संघ शार्सन में संविधार्न द्वार्रार् केन्द्र तथार् रार्ज्यों में शक्ति-विभार्जन होतार् है। इस शक्ति-विभार्जन के कारण केन्द्र और रार्ज्यों की सरकारों के बीच निरन्तर संघर्श और विवार्द होते रहते हैं। इससे रार्ष्ट्रीय एकतार् पर बुरार् असर पड़तार् है। 
  3. संकटकाल में अनुपयुक्त –संघ शार्सन संकटकालीन स्थिति क सार्मनार् करने में अनुपयुक्त हैं। कर्इ विशयों पर रार्ज्यों से मन्त्रणार् करनी पड़ती है और उनसे विचार्र-विमर्श किये बिनार् दृढ़तार् से निर्णय नहीं लिये जार् सकते।
  4. अनमनीय शार्सन-संघार्त्मक शार्सन क संविधार्न कठोर होतार् है। उसमें तब तक कोर्इ संशोधन नहीं हो सकतार् जब तक घटक रार्ज्यों की सहमति प्रार्प्त न कर ली जार्ये। परिणार्मस्वरूप कर्इ बार्र संविधार्न में सरलतार् से संशोधन नहीं हो पार्तार् और रार्ज्य की प्रगति अवरूद्ध हो जार्ती है। 
  5. एकतार् मे कमी – संघ शार्सन में केन्द्र तथार् रार्ज्य अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वार्ले विशयों के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से कानून और नियम बनार्ते हैं। दोनों स्तरों पर दो विरोधी रार्जनीतिक दलों क शार्सन हो सकतार् है। ऐसी स्थिति में संघार्त्मक देश में रार्ष्ट्रीय एकतार् की सार्मंजस्यपूर्ण भार्वनार् की वह मार्त्रार् नहीं आ सकती जो एकात्मक शार्सन-व्यवस्थार् वार्ले देशों में सार्धार्रणतयार् पार्यी जार्ती है।

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