श्रीमद्भगवद्गीतार् क महत्व
गीतार् तार्त्पर्य -श्रीमदभगवदगीतार् विश्व के सबसे बडे महार्काव्य महार्भार्रत के “भीश्मपर्व” क एक अंश है। भगवदगीतार् भगवार्न कृष्ण द्वार्रार् कुरूक्षेत्र युध्द में दियार् गयार् दिव्य उपदेश है जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर किंकर्तव्यविमूढ़ कि स्थिति में पहुच चुके थे। इस प्रकार अर्जुन को केन्द्र में रखकर दियार् गयार् यह भगवार्न क गीतार् अमृत रूपी वार्णी से समन्वित उपदेश है। इस प्रकार श्रीमदभगवदगीतार् भगवार्न की सार्क्षार्त दिव्य वार्णी होने से इसके श्लोकों को मंत्र क दर्जार् प्रार्प्त है।-

 “सर्वोपनिशदो गार्वो दोग्धार् गार्ोपार्लनन्दन:। 

पाथोवत्स: सुधीभोक्तार् दुग्धं गीतार्मृतं महत”।। 

अर्थार्त् यह गोपार्लनन्दन श्री कृष्ण के द्वार्रार् अर्जुन को बछड़ार् बनार्कर उपनिशद रूपी गार्यों से दुहार् गयार् अमृतमय दूध है जिसे सुधीजन पीते हैं। श्रीमदभगवदगीतार् संसार्र के अति महत्वपूर्ण ग्रन्थों में अपनार् विशेष स्थ्ज्ञार्न रखती है। श्रीकृष्ण भगवार्न स्वयं इसके वक्तार् हैं और उनक कहनार् है ‘गीतार् मे हृदयं पाथं’ अर्थार्त हे अर्जुन गीतार् मेरार् हृदय है इस प्रकार गीतार् को ‘सर्वशार्स्त्रमयी’ कहार् गयार् है क्योंकि सभी शार्स्त्रों में मंथन करके अमृतमयी गीतार् काउदय यार् प्रकटीकरण हुआ है। इसक दिव्य संदेश किसी जार्ति – विशेष सम्प्रदार्य के लिये नही है बल्कि सम्पूर्ण मार्नव जार्ति के लिये है जो सर्वभौम है। विभिन्न मत मतार्न्तरों को यदि ध्यार्न न दियार् जार्य तो अधिकांश विद्वार्न इस मत पर सहमत हैं कि गीतार् में 18अध्यार्य है और 700 श्लोक है इसके संकलनकर्तार् स्वयं वेदव्यार्स जी हैं वेद भगवार्न के नि:श्वार्स हैं किन्तु गीतार् भगवार्न की वार्णी है नि:श्वार्स तो स्ववभार्विक होते हैं, इसमें कोर्इ अतिरिक्त श्रम नहीं करनार् पड़तार् है। किन्तु गीतार् को भगवार्न ने योग में स्थित होकर अपने श्री मुख से कही है अतेव गीतार् को वेदों की अपेक्षार् भी श्रोश्ठ कहार् गयार् है। प्रसथार्नत्रयी के अन्तर्गत ब्रह्मसूत्र, गीतार् और उपनिशद आते हैं । इसमें गीतार् क महत्व और अधिक बढ़ जार्तार् है कि गीतार् में ब्रह्मसूत्र और उपनिशद दोनों क ही तार्त्पर्य आ जार्तार् है गीतार् एक परम रहस्यमय ग्रन्थ है इसमें सम्पूर्ण वेदों क सार्रसंग्रह कियार् गयार् है। स्वयं भगवार्न वेदव्यार्स ने कहार् है कि –

गीतार् सुगीतार् कर्तव्यार् किमन्यै:शार्स्त्रसंग्रहै:। 

यार् स्वयं पद्मनार्भस्य मुखपदमार्द्विनि:सृतार्।।(महार्0 भीश्म0 43/1) 

अर्थार्त् गीतार् क ही भली प्रकार से श्रवण मनन, किर्तन, पठन- पार्ठन, और धार्रण करनार् चार्हिये, अन्य शार्स्त्रों के संग्रह की क्यार् आवश्यकतार् है ? क्योंकि वह स्वयं पùनार्भ भगवार्न के सार्क्षार्त् मुख-कमल से निकली हुर्इ है। भगवार्न ने स्वयं गीतार् के विषय में कही है कि -मैं गीतार् के आश्रम में रहतार् हूँ, गीतार् मेरार् श्रेष्ठ घर है। गीतार् के ज्ञार्न क सहार्रार् लेकर ही मैं तीनों लोकों क पार्लन करतार् हूँ।

गीतार्ार्श्रयेSहं तिश्ठार्मि गीतार् मे चोत्तमं गृहम। 

गीतार्ज्ञार्नमुपश्रित्य त्रील्लोकान्पार्लयार्म्यहम।।(वरार्हपुरार्ण) 

गीतार् की महिमार् बतलार्ते हुये भगवार्न कहते हैं कि गीतार् गंगार् से भी बढ़कर है शार्स्त्रों में गंगार् स्नार्न क फल मुक्ति बतार्यार् गयार् है परन्तु गंगार् में स्नार्न करने वार्लार् स्वयं मुक्त तो हो सकतार् है किन्तु दूसरे को तार्रने की सार्मथ्र्य नही रखतार् है किन्तु गीतार् रूपी गंगार् में गोतार् लगार्ने वार्लार् स्वयं मुक्त तो होतार् ही है और दूसरे को तार्रने में भी सार्मथ्र्यवार्न होतार् है एक तरफ से उद्गम देखार् जार्य तो गंगार् भगवार्न के श्री चरणों से निकली हुर्इ है गंगार् में जार्कर जो स्नार्न करेगार् गंगार् उसी को मुक्त करती है किन्तु गीतार् धर धर में जार्कर उन्हें मुक्ति क माग दिखलार्ती है इन्ही सब कररणों से गीतार् को गंगार् से भी बढ़कर भगवार्न बतलार्ते हैं-

गंगार् गीतार् च सार्वित्री सीतार् सत्यार् पतिव्रतार्। 

ब्रह्मार्वलिबर््रùविद्यार् त्रिसंध्ययार् मुक्तिगोहिनी।। 

गीतार् क महत्व बतलार्ते हुये कहार् गयार् है कि गीतार् अर्धमार्त्रार्, पिदार्नन्दस्वरूपिणी, भवरोगनार्षिनी, भ्रार्न्ति क नार्श करने वार्ली त्रिवेदमयी, परमार्नन्दस्वरूपिणी तत्वाथ ज्ञार्न देने वार्ली है जो मनुष्य प्रतिदिन स्थिर चित्त से इन नार्मों क जप करतार् है , उसे इस लोक में नित्य ज्ञार्न की सिध्दि तथार् जीवन क अन्त होने पर परमपद की प्रार्प्ति होती है सम्पूर्ण गीतार् क पार्ठ करनें में असमर्थ होने पर अध्दांश क पार्ठ करनार् चार्हिये उसे गोदार्न क पुन्य फल मिलतार् है इसमें सन्देह नही है तृतीयार्ंश क पार्ठ करने से गंगार् स्नार्न क फल मिलतार् है जो व्यक्ति गीतार् के दो अध्यार्यों क पार्ठ करतार् है वह इन्द्रलोक जार्तार् है और वहार्ँ एक ब्रùार् के कल्प तक निवार्स करतार् है अन्तिम में गीताथ क पार्ठ यार् श्रवण करने से महार्पार्पी भी मुक्तिभार्गी हो जार्तार् है। आगे गीतार् की महिमार् बतलार्ते हुए कहार् गयार् है कि-

गीतार् पुस्तक संयुक्त: प्रार्णार्स्त्यार्क्त्वार् प्रयार्ति य: । 

बैकुण्ठ सम्वार्प्नोति विष्णुनार् सह मोदते ।। 

अर्थार्त जो व्यक्ति गीतार् की पुस्तक लिए हुए, प्रार्णत्यार्ग कर देतार् है वह बैकुण्ठ धार्म जार्कर विष्णु के सार्थ आनन्द भोग करतार् है। इस प्रकार गीतार्सार्र र्इश्वर सार्क्षार्त्कार क दर्शन् है। जिसे भी र्इश्वर दर्शन् की इच्छार् होगी, उसे गीतार् से बढ़कर कोर्इ ग्रन्थ नहीं मिलेगार्-

‘‘गीतार्भार्श्यं पुन: कृत्वार् लभते मुक्ति मुत्तमार्म’’ ।।(वार्रार्हपुरार्ण) 

गीतार्शार्स्त्र की एक अप्रतिम विशेषतार् है कि यह किसी वार्द को लेकर नहीं चली है अर्थार्त् द्वैत, अद्वैत, विशिष्टतार्द्वैत, विशुद्धार्द्वैत, अचिन्त्य भेदार्भेद आदि किसी भी वार्द को यार् किसी के सिद्धार्न्त को लेकर नहीं चली है। गीतार् क मुख्य उद्धेश्य है कि व्यक्ति किसी भी वार्द मत सिद्धार्न्त को मार्नने वार्लार् क्यों न हो उसक प्रत्येक परिस्थिति में कल्यार्ण हो जार्य। वह किसी भी परिस्थिति परमार्त्म प्रार्प्ति से वंचित न रह जार्य। क्योंकि मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जिसमें जन्म केवल अपने कल्यार्ण के लिए ही हुआ है। गीतार् की अद्वैतवार्दी टीकाओं भगवदगीतार् को वस्तुत: गीतोपनिशद के रूप में ही स्वीकार कियार् है और श्रुति प्रस्थार्न क स्थार्न दे दियार् गयार् है। अधिकांश आचाय मार्नते है कि गीतार् में जहार्ं-जहार्ं श्रीभगवार्नुवार्च् है वह श्रुति है, स्मृति प्रस्थार्न तो वह है ही। पुन: इन दोनों प्रस्थार्नों से बढ़कर उसी ब्रह्मसूत्र क भी प्रकार्य कर दियार् है। अधिकांश अद्वैतवार्दी सन्यार्सी क गीतार् क ही अध्ययन करते है, जो गृहस्थ अद्वैतवेदार्न्ती है, वे भी भार्गवत्पुरार्ण, रार्मार्यण, रार्म चरित मार्नस, दुर्गार्सप्तषती आदि ग्रन्थों की अपेक्षार् गीतार् क ही स्वार्ध्यार्य करते है। इसलिए कहार् जार्तार् है कि गीतार् ने अद्वैतवेदार्न्त के प्रचार्र-प्रसार्र में जितनार् योगदार्न दियार् है उतनार् किसी अन्य ग्रन्थ ने नहीं दियार् है। इस प्रकार गीतार् क मार्हार्त्म्य प्रतिपार्दित करते है। स्वयं भगवार्न कृष्ण ने कहार् है-

‘‘जो कोर्इ मेरे इस गीतार् रूप आज्ञार् क पार्लन करेगार् वह नि:संदेह मुक्त हो जार्येगार्।’’ (गीतार् 3/31)

यही नहीं भगवार्न यह भी कहते है कि जो इसक अध्ययन भी करेगार्, उसके द्वार्रार् मैं ज्ञार्न यज्ञ से पूजित होऊँगार्। (गीतार् 18/70)

जब गीतार् क अध्ययन मार्त्र क मार्हार्त्म्य है तब जो मनुष्य इसके अनुसार्र अपनार् जीवन व्यतीत करतार् है और इसके आदर्श को जीवन में उतार्र कर चलतार् है, तब उसकी बार्त ही क्यार्? ऐसे भक्तों के लिए भगवार्न कहते है वह मुझे सबसे प्रिय होते है और ऐसे भक्तों के अधीन मैं स्वयं हो जार्तार् हॅूं।

इस प्रकार गीतार् भगवार्न क प्रधार्न रहस्यमय आदेश है। भगवार्न श्रीकृष्ण ने गीतार् के उपदेश क कितनार् ही अंश श्लोकों में, पद्यों में कहार् थार् और कुछ गद्यों में, पद्यों क अंश ज्यों क त्यों वेद व्यार्स जी ने रख दियार् किन्तु गद्यार्त्मक भार्ग को स्वयं श्लोकबद्ध कर लियार् और इस सार्त सौ श्लोक और अठ्ठार्रह अध्यार्य वार्ली ग्रन्थ गीतार् को महार्भार्रत के अन्दर मिलार् लियार्, जो आज हमें इस अपने विशद् और मनोरम् कलेवर में प्रार्प्त होती है। इस प्रकार गीतार् शार्स्त्र ब्रह्म विद्यार् है। उसमें ब्रह्म विद्यार् के सार्ध्य और सार्धन दोनों क वर्णन प्रार्प्त होतार् है जबकि और अन्य ग्रन्थों में यार् तो सार्ध्य क यार् सार्धन क वर्णन होतार् है। इस दृष्टि से गीतार् सर्वशार्स्त्रमयी, सर्वधर्ममयी है। विश्व में गीतार् जैसार् कोर्इ ग्रन्थ नहीं है जिसमें सर्वधर्म क सार्र संग्रह हो, जिसमें र्इश्वर और र्इश्वर प्रार्प्ति दोनों के विधार्न किये गये है। इस दृष्टि से गीतार् के व्यवहार्रिक दर्शन् को भली भार्ंति रेखार्ंकित कियार् जार् सकतार् है। इसमें कर्तव्य पार्लन पर बल दियार् गयार् है, वर्णार्श्रम व्यवस्थार् को र्इश्वर प्रार्प्ति क केन्द्र बिन्दु मार्नार् गयार् है, जिससे पराथवार्द यार् परोपकार की प्रार्संगिकतार् सिद्ध होती है। इस प्रकार गीतार्सार्र र्इश्वर सार्क्षार्त्कार क दर्शन् है।

गीतार् क दाशनिक तत्वविवेचन की दृष्टि से महत्व 

गीतार् की ज्ञार्न मीमार्ंसार् में ज्ञार्न, ज्ञेय और ज्ञार्तार् ये तीनों विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि यही तीनों कर्म प्रवृत्ति हेतु है और इन तीनों के अभार्व में कर्म सम्पन्न नहीं हो सकतार् है। जब मनुष्य को जीवन मुक्ति की अवस्थार् प्रार्प्ति होती है, तब यह त्रिपुटी एक हो जार्ती है तब मनुष्य में कर्म प्रवृत्ति क उदय नहीं होतार् है। इस प्रकार गीतार् क महत्व तत्त्व मीमार्ंसीय दृष्टि से हो यार् ज्ञार्न मीमार्ंसीय दृष्टि से यार् आचार्र मीमार्ंसार् की दृष्टि से देखार् जार्य तो तीनों ही दृष्टि से गीतार् क वर्ण्य विषय महत्वपूर्ण हो जार्तार् है। गीतार् के महत्व के अन्तर्गत निम्नलिखित दाशनिक तत्व सिद्धार्न्त मुख्य है उन मुख्य बिन्दुओं पर हम प्रकाश डार्लेगें- जो इस र्इकार्इ की विषयवस्तु होगी। 1- त्रिविधयोग- एवं 2 निष्कामकर्मयोग। 3- स्थितप्रज्ञ 4-आत्मार् 5-ब्रह्म यार् परमेश्वर 6-जीव 7- वर्ण, धर्म यार् स्वधर्म 8- दैवार्सुर-सम्पद 9- मोक्ष

त्रिविधयोग 

वार्स्तविक अर्थ में श्रीमद्भगवदगीतार् को ‘योगशार्स्त्र‘ की संज्ञार् दी गर्इ है इसके प्रत्येक अध्यार्य की पुश्पिक में ‘‘ब्रह्म विद्यार्यार्ं योगशार्स्त्रे’’ ऐसार् कहार् गयार् है। अत: गीतार् क ‘योग’ सम्बन्धी विचार्र बहुत महत्वपूर्ण स्थार्न रखतार् है। ‘योग’ शब्द वस्तुत: सम्बन्धवार्चक है अर्थार्त आत्मार् क परमार्त्मार् के सार्थ समन्वित सम्बन्ध को जो द्योतित करतार् है वह ‘योग’ है। ‘योग’ शब्द के अर्थ को तीन रूपों में देख सकते है-

  1. ‘युजिर् योगे’ घार्तु से बनार् ‘योग’ शब्द जिसक अर्थ है समरूप परमार्त्मार् के सार्थ नित्य सम्बन्ध जैसे-’समत्वंयोगउच्यते’ (2/48) आदि। यही अर्थ गीतार् में मुख्यत: से आयार् है।
  2. ‘‘युज् समार्धौ’’ धार्तु से योग शब्द निश्पन्न है जिसक अर्थ है- समार्धि में स्थित चित्त्ार् की स्थिरितार् ।
  3. ‘युज् संयमने’- धार्तु से बनार् ‘योग’ शब्द जिसक अर्थ है संयमन, सार्मथ्र्य और प्रभार्व जैसे-’पष्य मे योगमैष्वरम् (9/5) आदि। गीतार् में जहार्ं भी योग शब्द आयार् है उसमें तीनों अर्थों में से एक अर्थ की मुख्यतार् और शेष दो अर्थों की गौणतार् है। जैसे ‘युजिरयोगे’ वार्ले ‘योगशब्द’ में समतार् (सम्बन्ध) की मुख्यतार् है परमार्त्मार् आने पर स्थिरतार् और सार्मथ्र्य भी स्वत: आ जार्ती है। 

पार्तंजल्ययोग दर्शन् में चित्त वृत्तियों के निरोध को ‘योग’ नार्म से कहार् गयार् है- ‘‘योगष्चित्तवृत्ति निरोध:’’ (1/12) और उस योग क परिणार्म बतार्यार् है- ‘द्रष्टार् की स्वरूप में स्थित हो जार्नार्- ‘तदार् दृश्टु: स्वरूपेSवस्थार्नम्’ (1/3) इस प्रकार पार्तंजल्ययोग दर्शन में जो ‘योग’ क परिणार्म बतलार्यार् गयार् है उसी को गीतार् में ‘योग’ के नार्म से अभिहित कियार् गयार् है। ‘‘योगशब्दस्य गीतार्यार्मर्थस्तु त्रिविधो मत:। सार्मथ्र्ये चैव सम्बन्धे समार्धौ हरिणार् स्वयम्।।’’ आत्मार् क परमार्त्मार् के सार्थ नित्य सम्बन्ध स्थार्पित करने के लिये तीन योग माग बतलार्ये गये है- जिन्हें 1- कर्मयोग, 2- ज्ञार्न योग और 3- भक्तियोग से जार्नार् जार्तार् है। इन्हीं तीन योगों की त्रिपुटी गीतार् है। यद्यपि ‘योग’ की प्रार्प्ति के लिये भगवार्न ने मुख्य रूप दो निष्ठार्एं बतार्यी गयी हैं- कर्मयोग और सार्ंख्य योग। जैसार् कि गीतार् में वर्णित है-

लोकेSस्मिन् द्विविधार् निष्ठार् पुरार् प्रोक्तार् मयार्नघ। ज्ञार्नयोगेन सार्ंख्यार्नार्ं कर्मयोगेन योगिनार्म् ।। (3/3) 

अर्थार्त असत् से सम्बन्ध विच्छेद करनार् ही कर्मयोग है और सत् के सार्थ योग होनार् सार्ंख्य योग है परन्तु ये दोनों निष्ठार्एं सार्धकों की अपनी है- भक्तियोग सार्धक की अपनी निष्ठार् नहीं है अपितु यह भगवद् निष्ठार् है। जो भक्त भगवार्न के लिए स्वयं को समर्पित कर दे उसे ‘भक्ति योग’ कहते है। इन तीनों योगों को सिद्ध करने के लिये यार् मनुष्य को अपनार् उद्धार्र करने के लिए र्इश्वर से तीन शक्तियों प्रार्प्त है- 1- कर्म करने की शक्ति (कर्म),2- जार्नने की शक्ति (ज्ञार्न),3- मार्नने की शिक्तार् (विश्वार्स) करने की शक्ति नि:स्वाथ भार्व से संसार्र की सेवार् करने के लिए है जो ‘कर्म योग’ है। जार्नने की शक्ति से तार्त्पर्य है अपने स्वरूप को वार्स्तविक रूप में जार्ननार् और मार्नने की शक्ति से तार्त्पर्य है अपने को भगवार्न के लिए समर्पित कर देनार् भक्ति योग है। ये तीनों ही माग परमार्त्मार् प्रार्प्ति के स्वतंत्र सार्धन है और अन्य सार्धन इन तीनों के ही अन्तर्गत आ जार्ते है। इन तीनों क पृथक-पृथक वर्णन तो अन्य शार्स्त्रों में भी प्रार्प्त होतार् है किन्तु तीनों के समन्वय क गौरव गीतार् को ही प्रार्प्त है। इन तीनों योगों से कर्मों (पार्पों) क नार्श सम्भव है- 

कर्मज्ञार्न भक्तियोगार्: सर्वेSपि कर्मनार्शका: । 

तस्मार्त् केनार्पि युक्त: स्यार्न्निष्कर्मार् मनुजो भवेत्।। 

1. कर्मयोग- 

‘कर्मयोग’ वह योग है जिसमें कर्म की ही प्रधार्नतार् होती है। इसको मुख्य रूप से मार्नने वार्ले लोकमार्न्य बार्ल गंगार्धर तिलक जी भी जो अपने ग्रन्थ ‘गीतार् रहस्य’ में गीतार् क मुख्य विषय कर्मयोग मार्नते है। ज्ञार्तव्य है कि सकाम और निष्काम के भेद से कर्म दो प्रकार के होते है। इनमें सकाम कर्म ही बंधन क कारण है जबकि निष्काम कर्म मोक्ष क कारण है। जो सार्धक केवल कर्तव्य कर्म यज्ञ की परम्परार् को सुरक्षित रखने के लिए, लोक संग्रह के लिए सृष्टि चक्र की परम्परार् चलार्ने के लिए ही कर्तव्य कर्म क पार्लन करतार् है, अर्थार्त कर्मों के लिए केवल दूसरों के लिए ही करतार् है अपने लिए नहीं वह सम्पूर्ण पार्पों से मुक्त हो जार्तार् है- 

‘‘यज्ञशिष्टार्शिन: सन्तो मुच्यन्तेसर्वकिल्विशै:।’’ (3/13) 

2. ज्ञार्न योग- 

‘ज्ञार्न योग’ को गीतार् क मुख्य प्रतिपार्द्य विषय मार्नने वार्ले सर्वप्रमुख विद्वार्न आचाय शंकर है। इनके अनुसार्र संसार्र को असार्र मार्ननार् तथार् आत्मार् को परमार्त्मार् के रूप में समझनार् ही ‘ज्ञार्नयोग’ है। ज्ञार्नी के लिए जो कुछ भी दृश्य पदाथ है वह मृग तृष्णार् यार् रज्जू में सर्प की प्रतीति की भार्ंति मिथ्यार् है। क्योंकि आचाय शंकर क प्रमुख सिद्वार्न्त है-

 ‘‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्यार् जीवोब्रह्मैव नार्Sपर:’। 

अर्थार्त ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्यार् है। जीव तथार् ब्रह्म एक ही है। सबकुछ ब्रह्म ही है। यह ब्रह्म एक, अद्वैत तथार् शुद्ध ज्ञार्न स्वरूप है। ब्रह्म ही आत्मार् है और आत्मार् ही ब्रह्म है। यही एकत्व की प्रतीति ही ‘‘ज्ञार्नयोग’’ है। गीतार् में कहार् गयार् है कि- 

‘‘सर्वभूतस्थमार्त्मार्नं सर्वभूतार्नि चार्त्मनि। 

र्इक्षते योगमुक्तार्त्मार् सर्वत्र समदर्शन:’’ ।। (गीतार् 6/29) 

अर्थार्त समार्धि योग में अवस्थित पुरूष सर्वत्र ब्रह्म क दर्शन कर अविद्यार् से उत्पन्न शरीरार्दि की सीमार् रहित आत्मार् को सब प्रार्णियों में अवस्थित और सब प्रार्णियों को अभिन्न रूप में आत्मार् में कल्पित देखते है। इसी विषय को और स्पष्ट करते हुये आगे कहार् गयार् है कि- 

‘यो मार्ं पष्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति। 

तस्यार्हं न प्रणष्यार्मि स च मे न प्रणष्यति’’।। (गीतार् 6/30) 

अर्थार्त जो पुरूष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्म रूप मुझ वार्सुदेव को ही व्यार्पक रूप से देखतार् है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वार्सुदेव के अन्तर्गत देखतार् है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होतार् और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होतार् है। गीतार् में ज्ञार्नयोगी को समदष्र्ार्ी बतार्यार् गयार् है। ज्ञार्न रूपी सूर्य के उदय होने पर अज्ञार्न रूपी अन्धकार नष्ट हो जार्तार् है। वैसी स्थिति ज्ञार्नयोगी की होती है। ज्ञार्नयोगी समस्त प्रार्णियों को समार्न भार्व से देखतार् है- 

‘‘विद्यार्-विनय-सम्पन्ने ब्रार्ह्मणे गवि हस्तिनि। 

शुनि चैव श्वपार्के च पण्डितार्: समदर्शिन:’’ ।। (गीतार् 5/18) 

अर्थार्त ज्ञार्नी लोग विद्यार् और विनय युक्त ब्रार्ह्मण में तथार् गौ, हार्थी और कुत्ते तथार् चार्ण्डार्ल में भी समदश्र्ार्ी ही होते है। तार्त्पर्य यह है कि ज्ञार्न योगी क विषयभार्व सर्वथार् नष्ट हो जार्तार् है। उसकी दृष्टि में एक मार्त्र सच्चिदार्नन्द परमार्त्मार् की सत्तार् है। अत: उसकी दृष्टि सर्वत्र समभार्व वार्ली हो जार्ती है तथार् परमार्त्मार् में ही सम्पूर्ण भूतों क विस्तार्र जब देखतार् है तभी उसी क्षण वह सच्चिदार्नन्द ब्रह्म को प्रार्प्त हो जार्तार् है- 

‘यदार् भूत पृथग्भार्वमेक्स्थमनुपष्यति। 

तत् एव च विस्तार्रं ब्रह्म सम्पद्यते तदार्’’।। (गीतार् 13/30) 

क्योंकि जैसे प्रज्वल्लित अग्नि र्इधनों को जलार्कर भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञार्न रूपी अग्नि समस्त कर्मों क भस्म कर देती है- 

‘‘ यथैधार्ंसि समिद्धोSग्रिर्भस्मसार्त् कुरूतेSर्जुन। 

ज्ञार्नार्ग्नि: सर्वकमार्णि भस्मसार्त्कुरुते तथार्’’ ।। (गीतार् 4/37) 

इसीलिए गीतार् में जोर देकर ज्ञार्न की महत्तार् को प्रतिपार्दित कियार् गयार् है और कहार् गयार् है कि इस संसार्र में ज्ञार्न के समार्न पवित्र करने वार्लार् नि:संदेह कुछ भी नहीं है- ‘‘नहि ज्ञार्नेन सदृषं पवित्रमिह विद्यते’’ । इसी बार्त को उपनिशदों में भी कहार् गयार् है कि ‘‘ज्ञार्नार्त् ऋते न मुक्ति:’’ अर्थार्त बिनार् ज्ञार्न के मुक्ति सम्भव नहीं है। गीतार् के 10/10 में कहार् गयार् है कि जो भक्त सदार् मेरी चिन्तार् करते हुए श्रद्धार् से मेरी अरार्धनार् करते है उन्हें मैं अपने सम्बन्ध क सम्यक ज्ञार्न प्रदार्न करतार् हूॅं जिससे वो मुझकों प्रार्प्त कर सके- ‘‘ददार्मि बुद्धियोगं तं येन मार्मुपयार्न्ति ते’’। आगे 4/33) जो पुरुश जितेन्द्रिय, सार्धन परार्यण और श्रद्धार्वार्न होते है वह ज्ञार्न को शीघ्र ही प्रार्प्त कर लेते है तथार् ज्ञार्न प्रार्प्ति के बार्द भगवत् प्रार्प्ति रूप परम आनन्द को प्रार्प्त हो जार्तार् है- ‘‘श्रद्धार्वॉंल्लभते ज्ञार्नं तत्पर: संयतेन्द्रिय:। ज्ञार्नं लब्ध्वार् परार् शार्ंतिमचिरेणधि गच्छति’’।। (5/39) भक्तों में ज्ञार्नी भक्त को भगवार्न से श्रेष्ठ कहार् है। (7/17) गीतार् के ज्ञार्नयोगी को ‘स्थितप्रज्ञ’ भी कहार् गयार् है। क्योंकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति केवल एक मार्त्र परमार्त्मार् को ही सत्य मार्नतार् है और जार्गतिक पदाथों को जो ब्रह्म से अतिरिक्त है, को मिथ्यार् मार्नतार् है। गीतार् की ज्ञार्नयोग की सबसे बड़ी विशेषतार्: यह है कि संसार्र क त्यार्ग न करके संसार्र के प्रति आसक्ति कर त्यार्ग करने की बार्त कहते है। 3- भक्ति योग:-भक्ति शब्द ‘भज्’ धार्तु से निष्पन्न है जो सेवार् करने के अर्थ में प्रयुक्त होती है अपने उपस्य देव की श्रध्दार्पूर्वक सेवार् करनार् ही ‘भक्ति’ है। जो संसार्र से विमुख होकर केवल भगवार्न की शरण में शरणार्गत हो जार्तार् है , उसे भगवार्न सम्पूर्ण पार्पों से मुक्त कर देते हैं। क्योंकि भगवार्न अर्जुन से कहते हैं कि तूँ सम्पूर्ण धर्मों क आश्रय छोड़कर एक मेरी शरण हो जार् ,मैं तुझे सम्पूर्ण पार्पों से मुक्त कर दूगार्ँ । तू चिन्तार् मत कर – 

सर्व धर्मार्न् परित्यज मार्मेकं शरणं ब्रज । 

अहं त्वार्ं सर्वपार्पेभ्यो मोक्षयिश्यार्मि मार् शुच:।। (गीतार् 18/66) 

भक्तियोग को सर्वश्रेष्ठ सार्धन मार्नने श्री रार्मार्नुजार्चाय ने गीतार् में भक्तियोग क प्रतिपार्दन कियार् है भक्ति क तार्त्पर्य ध्यार्न, भजन, कीर्तन, मनन, उपार्सनार् आदि से है । परमार्त्मार् के अतिरिक्त किसी अन्य क भार्व मन में न लार्नार् ही अनन्य भार्व कहार् जार्तार् है । यही अनन्यभार्व ही भक्ति योग है – 

अनन्यार्ष्चिन्तयतो मार्ं ये जनार्: पर्युपार्सते । 

तेशार्ं नित्यार्भियुक्तार्नार्ं योगक्षेमं वहार्म्यहम् ।।(गीतार् 9/22) 

अनन्य भक्ति को ही गीतार् में ‘अनन्यचित्त्ार्’ भी कहार् गयार् है । इस अनन्यचित्त वार्ले व्यक्ति को र्इश्वर की प्रार्प्ति दुर्लभ नही होती । जैसार् की भगवार्न श्री कृष्ण कहते हैं – 

अनन्यचेतार्: सततं यो मार्ं स्मरति नित्यष:। 

तस्यार्ं सुलभ: पाथ नित्ययुक्तस्य योगिन:।। (गीतार् 8/14) 

अर्थार्त् जो व्यक्ति मुझमें अनन्यचित्त होकर सदार् ही निरन्तर मुझ पुरूषोत्तम को स्मरण करतार् है। उस योगी के लिए मैं सर्वथार् सुलभ हूँ अर्थार्त् उसे मैं सहजतार् से प्रार्प्त हो जार्तार् हूँ आगे 18/65 में भगवार्न कहते हैं कि- 

मन्मनार् भव मद्भक्तो मद्यार्जी मार्ं नमस्कुरू। 

मार्मेवैश्यसि सत्यं ते प्रतिजार्ने प्रियोSसि में।। (गीतार् 18/65) 

अर्थार्त्-तुम मुझमें हृदय अर्पण करो, मेरे भक्त हो जार्ओ, मेरी पूजार् करो और मुझे नमस्कार करो, मै सत्य प्रतिज्ञार् करके कहतार् हूँ, इससे मेरे प्रसार्द लब्ध ज्ञार्न के द्वार्रार् तुम मुझे ही पार्ओगे, क्योंकि तुम मेरे अति प्रिय हो इस प्रकार भक्ति द्वार्रार् ही भक्त सभी सार्ंसार्रिक अज्ञार्न जनित बन्धनों को तोडकर भगवार्न को प्रार्प्त कर लेतार् है। इस प्रकार र्इश्वर क सर्व श्रेष्ठ सार्धन भक्ति है र्इश्वर के प्रति निष्काम भार्व से अनन्य अनुरार्ग को भक्ति कहार् गयार् है। गीतार् मैं भगवार्न ने बार्रम्बार्र इस प्रकार आश्वार्सन दिये है- मेरे भक्त क कभी नार्श नहीं होतार् है- 

‘‘न मैं भक्त: प्रणष्यति’’ (गीतार् 9/31) 

ज्ञार्न कर्म तथार् भक्तियोग क समन्वय- समस्त शार्स्त्रों के मन्थन से अमृत मयी गीतार् क आविर्भार्व हुआ है। इस लिये गीतार् को ‘सर्व शार्स्त्रमयी’ कहार् गयार् है। इसमें सभी मतों, दृष्टियों, सिद्धार्न्तों और विचार्रों क जो युक्ति युक्त समन्वय देखने को मिलतार् है। वह अन्यत्र दुर्लभ है। ज्ञार्न, कर्म और भक्ति ये तीनों मोक्ष के ही सार्धन बतार्ये गये हैं। इनमें से किसी एक क आश्रय लेकर सार्धक आसार्नी से अपने सार्ध्यों (मोक्ष) को प्रार्प्त कर सकतार् है। जैसे वार्मदेव, शुकदेव, आदि ज्ञार्नियों ने ज्ञार्न रूपी सार्धन से र्इश्वर रूपी सार्ध्य को प्रार्प्त कियार् जनक आदि महार् पुरूषों ने अपने निष्काम कर्म के द्वार्रार् र्इश्वर को प्रार्प्त कियार् तथार् भक्त प्रह्लार्द ने आदि ने भक्ति के द्वार्रार् र्इश्वर को प्रार्प्त कियार् अत: तीनों माग समयक और उचित है। तीनों में से कोर्इ किसी माग को अपनार् सकतार् है। माग भले ही अलग-अलग हैं लेकिन तीनों क मन्तव्य एक ही है- र्इश्वर प्रार्प्ति। किसी भी माग क किसी के सार्थ कोर्इ विरोध नहीं है। इन तीनों क समन्वय गीतार् के 9/34 में करते हुये भगवार्न कहतें है- 

मन्मनार् भव मद्भक्तो मद्यार्जी मार्ं नमस्कुरू। 

मार्मेवैश्यसि युक्त्वै वमार्त्मार्नं मत्परार्णय।। (गीतार् 9/34) 

अर्थार्त् मुझमें मन लगार्ने वार्लार् होओ, मेरार् भक्त बनो- (भक्तियोग), मेरार् पूजन कर, तथार् मुझे प्रणार्म कर (कर्मयोग) इस प्रकार आत्मार् को मुझमें निश्चय करके (ज्ञार्नयोग) मेरे परार्यण होकर तुम मुझको ही प्रार्प्त होगार्। अर्थार्त् कहने क तार्त्पर्य है कि भगवार्न के नार्मरूप, गुण आदि क श्रवण कीर्तन आदि भक्ति है, निष्काम भार्व से यज्ञ आदि क अनुश्ठार्न करनार् निष्काम कर्म है और र्इश्वर के विषय में यह जार्न लेनार् कि र्इश्वर ही कर्तार्, धर्तार् विधार्तार् है और एक मार्त्र यही सत्य है, सर्वव्यार्पी है, सर्वज्ञ है, परम पुरूष पुरूषोत्तम है, यही ज्ञार्न है, इस प्रकार गीतार् में तीनों मागों क समन्वित प्रतिपार्दन देखने को मिलतार् है। 

निष्काम कर्म योग 

कर्म योग वह है जिसमें कर्म की प्रधार्नतार् होती है। सकाम और निष्काम के भेद से कर्म दो प्रकार के होते है- सकाम कर्म बन्धन के हेतु होते है तो निष्काम कर्म मोक्ष के हेतु होते है। गीतार् को मुख्य प्रतिपार्द्य विषय निष्काम कर्म है। यह वह कर्म है जिसमें कामनार्ओं क सर्वथार् अभार्व रहतार् है क्योंकि इसक उपदेश कर्म से पलार्यित अर्जुन को कर्मरत् करने के लिए उस समय दियार् गयार् है। जब कुरूक्षेत्र में सगे सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन मोह ग्रस्त हो जार्ते हैं और किं कर्तव्य विमूढ़ की अवस्थार् को प्रार्प्त हो जार्ते है। इस प्रकार अर्जुन युद्ध नहीं करने क निश्चय करते है। ऐसे समय में गीतार् क उपदेश श्री कृष्ण के द्वार्रार् दियार् गयार् है। कर्मयोगी कर्म फल के प्रति अनार्सक्त होतार् है क्योंकि आसक्त कर्म जीव को बन्धन में डार्लतें है जिससे मनुष्य विभिन्न योनियों में भटकतार् हुआ अधोगति को प्रार्प्त होतार् है निष्काम कर्म योगी अनार्सक्त भार्व के कारण सुख, दु:ख, लार्भ-हार्नि, जय-परार्जय सबमें समभार्व रहतार् है यथार्- 

सुख-दु:खे समेकृत्वार् लार्भार्लार्भौ जयार्जयौ। 

ततो युद्धार्य युज्यस्व नैव पार्पं वार्प्स्यसि।। (गीतार् 2/38) 

अर्थार्त् अर्जुन को जय-परार्जय, लार्भ-हार्नि आदि से ऊपर उठकर क्षत्रिय धर्म रूपी स्वकर्तव्य पार्लन क उपदेश देते है। आसक्ति के कारण ही अर्जुन के मन भयार् रूढ़ वैरार्ग्य उत्पन्न हुआ। ऎसार् वैरार्ग्य स्वभार्विक न होकर बन्धन क हेतु बन रहें थ। इसी लिये श्री कृष्ण ने निष्काम कर्म करने क उपदेश दियार् है। क्योंकि इस प्रकार के कर्मों क कोर्इ शुभार्-शुभ फल नहीं होतार् है। अत: व्यक्ति ऎसे कर्मों की मार्ध्यम से जन्म और मृत्यु के चक्र को तोडकर सदार् के लिये अपने को परमेश्वर में विलीन कर लेतार् है यही निष्काम कर्म ही ‘कर्मयोग’ है। गीतार् के द्वितीय अध्यार्य के 47 श्लोक में निष्काम कर्म की व्यार्ख्यार् करते हुये भगवार्न श्री कृष्ण ने कहार् है- 

कर्मण्ये वार्धिकारस्ते मार् फलेशु कदार्चन। 

मार् कर्म फलहेतुभ्र्ार्ूमार् ते संगोSस्त्वकर्मणि।। 

अर्थार्त ‘‘ तेरार् कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलो में कभी नहीं इसलिये तुम कर्मों के फल क हेतु मत बन तथार् कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न होवे’’ यहार्ं निष्काम कर्म के बन्धन में एक स्वार्भार्विक प्रश्न मन में उठतार् है कि कोर्इ भी मुर्ख व्यक्ति भी किसी प्रयोजन के बिनार् कार्य में प्रवृत्त नहीं होते है- ‘‘ प्रयोजनमनूदिष्य मन्दों•पि न प्रवर्तते’’ इस न्यार्य के अनुसार्र निष्काम कर्म तो असम्भव है। क्योंकि यदि कोर्इ कामनार् ही नहीं होगी तो हम कर्म क्यों करे ? क्योंकि कर्तार्पन और आसक्ति, निष्काम कर्म के दो अंग बतार्ये गये है इन दोनों क अभार्व असम्भव है अत: निष्काम कर्म भी असम्भव है। इस समस्यार् क समार्धार्न करते हुये स्वयं भगवार्न श्री कृष्ण ने कहार् है- 

प्रकृते क्रियमार्णार्नि गुणै: कर्मार्णि सर्वश:। 

अहंकार विमूढ़ार्त्मार् कर्तार्Sहमिति मन्यते।। (3/26) 

अर्थार्त् कर्तार्पन क अभार्व तभी सम्भव है, जब व्यक्ति यह भलि-भार्ंति समझ ले कि इसक कर्तार् मैं नहीं हूँ कर्म तो प्रकृति की गुणों द्वार्रार् किये जार्ते हैं। अत: जो ज्ञार्नी व्यक्ति है वह यह जार्नतार् है कि सभी कर्म प्रकृति जनित गुणो द्वार्रार् ही कियार् जार्तार् है अर्थार्त् समस्त मनुष्य प्रकृत जनित गुणों द्वार्रार् परवष होकर कर्म करने के लिये बार्ध्य होतार् है- 

‘‘कार्यते ह्यवष: कर्म सर्व: प्रकृतिजैगुणै:’’ (गीतार् 3/5)। 

इसलिये जो ज्ञार्नी मनुष्य होतार् है वह यह जार्नतार् है कि जो कर्तार् कर्म क अभिमार्न वह केवल अज्ञार्नतार् के कारण है। इस प्रकार निष्काम कर्म ही वार्स्तविक कर्म योग है। गीतार् में निष्काम कर्म क उद्देश्य दो रूपों में बतार्यार् गयार् है- (1) आत्मशुद्धि और (2) र्इश्वर के प्रयोजन को पूरार् करनार्। पहलार् कर्म केवल योगी करतार् है। अपने समूह के लिये जिसक वह अंग होतार् है लेकिन दूसरे के अनुसार्र र्इश्वर के लिए कर्म कियार् जार्तार् है। और जिसक फल र्इश्वर को अर्पित कियार् जार्तार् है। परस्पर एक दूसरे के प्रति कर्तव्य क बोध है। और दूसरे में लोक की सेवार् वह र्इश्वर के लिए करतार् है परन्तु ध्यार्न देने की बार्त यह है कि कर्म चार्हे कर्तव्य के लिये कियार् जार्य यार् र्इश्वर सेवार् के लिए वह सम्पूर्ण अर्थों में निष्काम नहीं कहार् जार् सकतार् है। गीतार् में भी निष्काम क अर्थ लक्ष्यविहीनतार् न होकर कर्म फल के प्रति आसक्ति से विरत होने में है। गीतार् अपने सार्मार्जिक और आध्यार्त्मिक दोनों अर्थों में लक्ष्य विहीन न होकर निष्काम कर्म योग क अनुपार्लन करती है। इस लिये श्री कृष्ण अर्जुन को अपने दार्यित्व निर्वार्ह करने क तथार् सार्मार्जिक दार्यित्व के रूप में स्वधर्म पार्लन करने क तथार् निष्काम कर्म योगी बनने क उपदेश देते हैं। निष्काम कर्मयोगी के विषय में गीतार् में कहार् गयार् है कि जो कर्म योगी अपने स्वधर्म क पार्लन निष्काम यार् अनार्सक्त भार्व से करतार् है वह सार्ंसार्रिक भव बन्धन से मुक्त हो जार्तार् हैं। इस प्रकार गीतार् के ‘ब्रार्ह्मी’ स्थिति को प्रार्प्त हो जार्तार् है। गीतार् के निष्काम कर्म क उपदेश कर्तव्य के लिये कर्तव्य करने जैसार् है। (Duty for Duty) व्यक्ति की श्रेष्ठतार् फल प्रार्प्ति में नहीं है बल्कि फल त्यार्ग में है, कर्म करने की क्ुशलतार् भी योग है- ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ वर्ण व्यवस्थार् के किसी भी वर्ण क शूद्र व्यक्ति क्यों न हों यदि वह स्वधर्म क पार्लन कर्तव्य निश्ठ भार्व से करतार् है तो वही स्थिति वह भी प्रार्प्त करेगार्। जिस स्थिति को ब्रार्ह्मण प्रार्प्त करतार् है। क्योंकि वर्ण व्यवस्थार् क निर्धार्रण व्यक्ति के गुण और कर्म के अनुसार्र ही है- ‘‘चातुवर्णयं मयार् सृश्टम गुण: कर्म विभार्गश:’’ इस प्रकार निष्काम रूप में कह सकते है कि गीतार् कर्मयोग नैशकम्र्य यार् कर्म निशेध नहीं है किन्तु कामनार् क त्यार्ग है, अर्थार्त् कामनार् के त्यार्ग से तार्त्पर्य कर्म फल के त्यार्ग से है। गीतार् 18/2 में कहार् गयार् है ‘‘काम्यार्नार्म कर्मणार् न्यार्सं सन्यार्सं कवयो विदु:’’ इस प्रकार निष्काम कर्म अकर्मण्यतार् की शिक्षार् नहीं देतार् है अपितु कर्म फल के त्यार्ग की शिक्षार् देतार् है, तथार् सिद्धि असिद्धि समस्त स्थितियों में कर्तार्पन के अभिमार्न से रहित समत्व बुद्धि को उत्पन्न करतार् है-‘‘सिद्ध्यसिद्भ्यो: समो भूत्वार् समत्वं योग उच्यते’’। (गीतार् 2/48) इस प्रकार कह सकते है कि निष्काम कर्म र्इश्वराथ कर्म है और र्इश्वराथ कर्म ही अनार्सक्त कर्म है। जो बन्धन क बार्धक तथार् मोक्ष क सार्धक है गीतार् में वर्णित है- 

‘‘ ब्रह्मण्यधार्य कर्मार्णि संगं त्यक्त्वार् करोतिय:। 

लिप्यते न स पार्पेन पद्मपत्रमिवार्म्भसार्।।’’ (गीतार् 5/10) 

स्थित प्रज्ञ 

जिसकी प्रज्ञार् यार् बुद्धि आत्मार् यार् र्इश्वर में प्रतिष्ठित है वह ‘िस्थ्त प्रज्ञ’ है। भगवार्न कहते है कि जब निष्काम कर्म योगि की बुद्धि मोह यार् अज्ञार्न रूपी पार्प को छोड देगी तब सुनने योग्य और सुने हुये विषयों तुम्हें वैरार्ग्य प्रार्प्त होगार् अर्थार्त् वे विषय तुम्हार्रे सार्मने निरर्थक प्रतीत होंगें। इसके पश्चार्त् तुम्हार्री बुद्धि समार्धि में स्थित हो जार्येगी और इसके बार्द भी समबुद्धि की योगार्वस्थार् को प्रार्प्त हो जार्ओगें। अर्थार्त् बुद्धि तत्व ज्ञार्न में प्रतिष्ठित हो जार्येगी इस प्रकार जिसे कुछ भार्रतीय दर्शनों में ‘‘जीवनमुक्त’’ नार्म से जार्नार् जार्तार् है। वही गीतार् में ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ है। इस प्रकार स्थित प्रज्ञ गीतार् में समत्व योगी को यार् समार्धि में पहुंचे सार्धक के लिए प्रयुक्त हुआ है। ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ की अवस्थार् निष्काम कर्म योगी की चरमार्वस्थार् क समन्वित रूप होतार् है यह कर्म क अपितु कर्म फल क त्यार्ग करतार् है। वह संसार्र क नहीं अपितु संसार्र के प्रति अपनी आसक्ति क त्यार्ग कर देतार् है। ‘‘स्थित प्रज्ञ’’ प्रार्प्त व्यक्ति सब प्रार्णियों में र्इश्वर को और र्इश्वर में सब प्रार्णियों को देखतार् हुआ सर्वेष्वरवार्दि हो जार्तार् है। िस्थ्त प्रज्ञ रूपी समार्धि में पहुंचनार् ब्रह्म ज्ञार्नी के ही वश की बार्त है। 

‘स्थिर बुद्धि’ और स्थित प्रज्ञ दोनो को कुह लोभ भ्रम से एक मार्न बैठतें है किन्तु दोनों में सूक्ष्म अन्तर है गीतार् में भेद करते हुये स्पष्ट रूप से कहार् गयार् है- कि स्थिर बुद्धि वार्लार् व्यक्ति इन्द्रियों द्वार्रार् विषयों को ग्रहण तो नहीं करतार् है अर्थार्त् इन्द्रियों को उनके विषयों से विमुख कर लेतार् है। किन्तु उन विषयों से रार्गार्त्मक निवृत्ति नहीं मिल पार्ती है। जबकि स्थित प्रज्ञ व्यक्ति क रार्ग परमार्त्मार् क सार्क्षार्तकर करके निवृत्त हो जार्तार् है- 

‘‘विषयार् विनिवर्तन्ते निरार्हार्रस्य देहिन:। 

रसवर्जं रसोSप्यस्य परं दृश्टतार् निर्वतते।। (गीतार् 2/59)

इस प्रकार विषयों से इन्द्रियों क हटार् लेनार् ही केवल स्थित प्रज्ञ क लक्षण नहीं हो सकतार् है। बल्कि रार्गार्त्मक विकारों से मुक्त होकर शुद्ध बुद्धि रूप आत्म प्रकाश में प्रतिष्ठित होनार् ही प्रज्ञार् कहलार्ती है। ऎसी प्रज्ञार् से युक्त व्यक्ति मन की अपनी चंचलतार् को वश में करके ‘स्थित प्रज्ञ’ हो जार्तार् है। 

स्थित प्रज्ञ की अवस्थार् ध्यार्न जन्य समार्धि की अवस्थार् से भिन्न है क्योंकि स्थित प्रज्ञ की अवस्थार् जग्रतार् अवस्थार् की सहज समार्धि की अवस्थार् है। जबकि ध्यार्न जन्य समार्धि की अवस्थार् में एकाग्रतार् की स्थिति सप्रयार्स प्रार्प्त की जार्ती है और इस अवस्थार् में मन की वृत्तियों में भी परिवर्तन होतार् रहतार् है जबकि स्थित प्रज्ञ की अवस्थार् जार्ग्रत अवस्थार् होते हुये भी र्इश्वर ने समार्धिस्थ होने के कारण स्थिर होती है गीतार् के द्वितीय अध्यार्य में अर्जुन के द्वार्रार् ‘स्थित प्रज्ञ’ क लक्षण जार्नने की जिज्ञार्सार् (उत्सुकतार्) बढ़ जार्ती है और वह भगवार्न से पूंछते है कि- 

स्थितप्रज्ञस्य क भार्षार् समार्धिस्थस्य केशव। 

स्थितधी: किं प्रभार्शेत किमार्सीत व्रजेत किम्।।

अर्थार्त् अर्जुन ने पूछार् कि हे केशव समार्धि युक्त स्थित प्रज्ञ व्यक्ति क क्यार् लक्षण है, स्थित बुद्धि होने पर वह किस प्रकार की बार्तें करतार् है, किस तरह रहतार् है, और किस तरह विचरण करतार् है ? इस प्रकार अर्जुन द्वार्रार् स्थित प्रज्ञ क लक्षण पूछे जार्ने पर श्री कृष्ण ने स्थित प्रज्ञ की निम्नलिखित लक्षण बतार्ये है- 

  1. स्थित प्रज्ञ सभी प्रकार की सार्त्विक, तार्मसिक और रार्जसिक कामनार्ओं वार्सनार्ओं पर विजय प्रार्प्त किये रहतार् है तथार् आत्मार् को वार्ह्य विषयों से हटार्कर स्वरूपार्नन्द में संतुष्ट रहतार् है उसे स्थित प्रज्ञ कहते है। प्रजहार्ति यदार् कामार्नं् सर्वार्न पाथ मनोगतार्न्। आत्मन्येवार्त्मनार् तुष्ट: स्थित प्रज्ञस्यतदोच्यते।। अर्थार्त् जो सभी प्रकार के विषय-चिन्तन को छोड़कर सदार् श्री भगवार्न में चित्त को लगार्ये रखते है उनको ही र्इश्वर के दर्शन् प्रार्प्त होते है। 
  2. स्थित प्रज्ञ भक्त को काम-क्रोध आदि विकार ग्रस्त नहीं कर पार्ते हैं केवल नार्म-मार्त्र के ही रह जार्तें हैं जैसे- जली हुर्इ रस्सी में ऐंठन दिखतार् है, रस्सी क आकार तो है किन्तु फूंक देने से वह उड़ जार्ती है। इसी प्रकार र्इश्वर को प्रार्प्त कर लेने से और उसमें समार्धिस्थ होने से ज्ञार्न-विचार्र नहीं रह जार्तार् है। ब्रह्म ज्ञार्न होने पर संसार्रसक्ति नहीं रह जार्ती है क्योंकि र्इश्वर के समीप जितनार् अधिक पहुंच जार्येगें उतनी ही अधिक शार्न्ति मिलेगी। 
  3. विभिन्न प्रकार के दु:खों में जिसक मन उद्विग्न नहीं होतार् है, सुखों में भी जो आंकाक्षार् रहित है तथार् जो भय-क्रोध से रहित है, ऐसे व्यक्ति को ‘स्थित प्रज्ञ’ मुनि कहते है। (गीतार् 2/56)। अत: सुख-दु:ख, आसक्ति भय, क्रोध आदि के पीछे कामनार् यार् वार्सनार् ही है। वार्सनार् रहित होने से ‘स्थित प्रज्ञ’ की अवस्थार् प्रार्प्त होती है। 
  4. स्थित प्रज्ञ अनीह होने से रार्ग, द्वेश और क्रोध से मुक्त होतार् है। 
  5. स्थित प्रज्ञ सभी विषयों से अनार्सक्त होकर र्इश्वर में लीन होतार् है। 
  6. स्थित प्रज्ञ व्यक्ति क मुख्य लक्षण यह होतार् है कि वह अपनी इन्द्रियों को अपने वष में किये रहतार् है अर्थार्त् जितेन्द्रिय बन जार्तार् है। जिस प्रकार कछुआ विविध अंगों को अपने अन्दर समेट लेतार् है उसी प्रकार जब यह जितेन्द्रिय योगी इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतयार् अपने भीतर लौटार् लेतार् है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित मार्नी जार्ती है- 

यदार् संहरते चार्यं कुर्मोंSगार्ंनीव सर्वष:। 

इन्द्रियार्णीन्द्रियाथेभ्यस्तस्य प्रज्ञार् प्रतिष्ठितार्।। (गीतार् 2/58)

स्थित प्रज्ञ प्रार्प्त सार्धक इन्द्रियों को विषय भार्गों से हटार् तो लेतार् है और शब्दार्दि विषय दूर हो जार्ते है किन्तु उसकी रस यार् आसक्ति रह जार्ती है स्थित प्रज्ञ क यह रस भी परमार्त्मार् क सार्क्षार्त्कार करने से निवृत्त हो जार्तार् है- (गीतार् 2/59) भगवार्न अर्जुन को समझार्ते हुये आगे कहते हैं कि कुन्ती पुत्र अर्जुन निश्चय ही बलवार्न इन्द्रियार्ं यत्नषील विवेकी पुरूष के भी मन क बल पूर्वक हरण कर लेती है- ‘इन्द्रियार्णि प्रमार्थीनि हरन्ति प्रसभमं मन:’ अन्तिम श्लोक जो स्थित प्रज्ञ से सम्बन्धित है उसमें भगवार्न कहते हैं कि मेरे एकान्त भक्त यार् आत्मनिश्ठ योगी को उन इन्द्रियों को संयत करके समार्हित होकर अवस्थित रहनार् चार्हिये क्योंकि जिसकी इन्द्रियार्ं वश में उसकी प्रज्ञार् प्रतिष्ठित है। (गीतार् 2/61) स्थित प्रज्ञ व्यक्ति में सम्पूर्ण भोग विषय उसी प्रकार विकार उत्पन्न नहीं कर पार्ते जिस प्रकार चलार्यमार्न नदियार्ं सार्गर में गिर कर भी सार्गर को चलार्यमार्न नहीं कर पार्ती हैं। स्थित प्रज्ञ पुरूष सभी कामार्नार्ओं को त्यार्ग कर ममतार् रहित और अंहकार रहित, िस्त्रीहार् रहित हुआ, वर्ततार् हुआ “ार्ार्न्ति को प्रार्प्त करतार् है। ‘स्थित प्रज्ञतार्:’ की स्थिति ब्रह्म को प्रार्प्त हुये पुरूष की स्थिति है। इस स्थिति को प्रार्प्त होकर पुन: मोहित नहीं होतार् है। और अन्तकाल में ब्रह्मलोक को प्रार्प्त हो जार्तार् है। उदार्हरण के रूप में- यार्ज्ञवल्क्य, जनक, कबीर, नार्नक, तुलसी, शंकरार्चाय, स्वार्मी रार्मकृष्ण परमहंश आदि स्थित प्रज्ञ कहे जार्ते है। 

स्थित प्रज्ञ प्रार्प्त सिद्ध पुरूषों क कोर्इ स्वाथ नहीं होतार् है उनक कार्य लोकसंग्रह यार् लोककल्यार्ण के लिये होतार् है, ब्रह्म ज्ञार्न के बार्द कोर्इ ज्ञार्नतव्य, कोर्इ पार्तव्य और कोर्इ कर्तव्य से शेष नहीं रह जार्तार् है। लोक कल्यार्ण की कामनार् से कोर्इ कर्म नहीं करतार् अपितु उसके द्वार्रार् सम्पार्दित कार्यों से स्वत: लोक कल्यार्ण होतार् है। 

गीतार् में आत्मतत्व

गीतार् में आत्मतत्व को मुख्य रूप से प्रतिपार्दित कियार् गयार् है। गीतार् में आत्मतत्व के लिये नित्य, अविनार्शी, अज, अव्यय, सर्वगत, अचल, सनार्तन, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य आदि पद प्रयुक्त हुये है। ‘नित्य’ उसे कहार् जार्तार् है जिसकी सत्तार् त्रैकालिक हो। त्रिकाल से तार्त्पर्य भूत, वर्तमार्न और भविश्य से है। क्योंकि आत्मार् के अतिरिक्त और कोर्इ वस्तु ऎसी नहीं है जो तीनों कालों में नित्य रह सके अत: आत्मार् ही नित्य सिद्ध होती है। ‘अविनार्शी’ से तार्त्पर्य है जिसक विनार्श न हो अर्थार्त् विनष्ट न हो। शरीर नश्वर है आत्मार् नित्य है, शरीर नष्ट हो जार्तार् है और पंच महार्भूतों में विलीन हो जार्तार् है किन्तु आत्मार् एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेष करती रहती है। जिस प्रकार कोर्इ व्यक्ति पुरार्ने जीर्ण वस्त्रों को उतार्रकर दूसरे नये वस्त्रों को पहन लेतार् उसी प्रकार आत्मार् भी पुरार्नी शरीरों को छोडकर नये शरीर को धार्रण करती है- 

वार्सार्ंसि जीर्णार्नि यथार् विहार्य। 

नवार्नि गृह्णार्ति नरोSपरार्णि।। 

तथार् शरीरार्णि विहार्य जीर्णार्। 

न्यन्यार्नि संयार्ति नवार्नि देही।। (2/22)

‘आत्मार् को सत् भी कहार् गयार् है क्योंकि जो सत् उसी क भार्व है और जो असत् है उसक भार्व नहीं हो सकतार् है और जो सत् है उसक अभार्व नहीं हो सकतार्- 

‘नार्सतो विद्यते भार्व नार् भार्वो विद्यते सत:’ (गीतार् 2/16) 

अर्थार्त् सत् वही हो सकतार् है जो त्रिकालार् बार्ध हो अर्थार्त् भूत, वर्तमार्न और भविष्य में जो तीनों कालों में सदार् सर्वदार् नित्य एक रस और अपरिवर्तन शील रहे यह लक्षण शुद्ध आत्मतत्व यार् ब्रह्म क है। और वही ‘सत’ है। 

गीतार् में भगवार्न श्री कृष्ण ने आत्मार् के स्वरूप के विषय में कहार् है कि आत्मार् सदैव एक रूप है। उसमे कभी विकार उत्पन्न नहीं होतार् है। इसलिये आत्मार् को अविकारी कहार् जार्तार् है। आत्मार् देह आदि उपार्ध्यों से युक्त होतार् है जो औपार्धिक है वार्स्तविक नहीं। जीवार्त्मार् पहले कुमार्रार्वस्थार् पुन: युवार्वस्थार् और फिर वृद्धार्वस्थार् को प्रार्प्त होतार् है। अर्थार्त् पहले स्थूल शरीर को प्रार्प्त करतार् है और पुन: सूक्ष्म शरीरों में प्रवेश करतार् है। विनार्श तो शरीर क होतार् है आत्मार् क नहीं जिस तरह जार्ग्रत, स्वप्न एवं सुशुप्ति तीनों अवस्थार्ओं में जीव हमेसार् सत्य एवं नित्य रहतार् है। उसी तरह आत्मार् की सत्यतार् एवं नित्यतार् है। अर्थार्त् उत्पत्ति एवं विनार्श देह आदि क होतार् है, आत्मार् क नहीं है।

‘‘देहिनोSस्मिन यथार् देहे कौमार्रं यौवनं जरार्। 

यथार् देहार्न्तर प्रार्प्तिध्र्ार्ीरस्तत्र न मुह्यति।। (2/13)

भगवार्न आत्मार् क स्वरूप समझार्ते हुये कहते है कि यह दृष्टिगोचर होने वार्लार् जगत अविद्यार् से उत्पन्न है यह जिस अत्यन्त सूक्ष्म, व्यार्पक, सद्रूप, ब्रह्म से व्यार्प्त है उसे सत् कहते हैं कोर्इ भी इस नित्य आत्मार् क विनार्श करने में समर्थ नहीं होतार्। 

‘‘अविनार्शी तु तद्विद्वि येन सर्वमिदं ततम्। 

विनार्शमव्ययस्यार्स्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।। (2/17)

आत्मार् के अतिरिक्त जो कुछ भी दिखार्यी पड़तार् है किसी की पृथक सत्तार् नहीं है। ब्रह्म यार् आत्मार् ही एक मार्त्र सत् है, सुख-दु:ख आदि अन्त: करण के धर्म है आत्मार् के नहीं मन, बुद्धि, चित्त्, और अंहकार इन चार्र वृत्तियों की समष्टि अन्त:करण है। और इसी से सुख-दु:ख आदि क अनुभव होतार् है जो हम यह समझते है कि हम सुखी यार् दु:खी है इस भ्रम क कारण है ‘अज्ञार्न’ अर्थार्त् सत् और असत् वस्तुओं के ज्ञार्न क अभार्व मैं चेतनमय, ज्ञार्न स्वरूप आनन्दमय आत्मार् हूँ इस सत् तत्व को भूलकर जीव, शरीर, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार आदि को अपनार् स्वरूप समझतार् है, फलस्वरूप उसे जीवन भर दु:ख ही भोगनार् पड़तार् है। 

गीतार् के अनुसार्र यह आत्मार् अविनार्शी एवं अतुलनीय है जो व्यक्ति इसे अर्थार्त आत्मार् को मार्रने वार्लार् जार्नतार् है तथार् जो व्यक्ति इसे मृत समझतार् है वे दोनो ही नहीं जार्नते है यह न मरतार् है और न ही मार्रार् जार्तार् है- 

‘‘य एनं वेत्ति हन्तार्रं यश्चैनं मन्यते हतम्। 

उभौ तौ न विजार्नीतो नार्यं हन्ति न हन्यते।। (गीतार् 2/19)

आत्मार् को गीतार् में शरीरी, देही, भी कहार् गयार् है। और आगे भगवार्न अर्जुन को यह उपदेश देते हैं कि शरीरी नित्य है शरीर नार्शवार्न है इसे जार्नकर स्वधर्म पार्लन के लिए हे अर्जुन ! तुम युद्ध करो, यथाथ में किसी की मृत्यु नहीं होती है केवल अवस्थार्न्तर होकर सब कुछ आत्मार् में लीन हो जार्तार् है। आत्मार् सर्वव्यार्पी है और परमसूक्ष्म है, इस कारण वह हत्यार् नहीं कर सकतार् और न हत् ही होतार् है- 

‘‘न जार्यते म्रियते वार् कदार्चिन्नार्यं भूत्वार् भवितार् वार् न भूय:। 

अजो नित्य: शार्ष्वतोSयं पुरार्णो न हन्यते हन्यमार्ने शरीरे।। (2/20)

इसलिये हे अर्जुन! इस आत्मार् को अविनार्शी, नित्य, त्रिकाल में परिणार्म शून्य, जन्मरहित, क्षयशून्य जार्नतार् है। हे पाथ, वह व्यक्ति किस प्रकार किसक वध करार्तार् है यार् किसक वध करतार् है ? इस प्रकार इस अग्रिम श्लोक में भगवार्न आत्मार् क ही प्रकारार्न्तर से वर्णन करते हुये कहते हैं कि- 

‘‘नैनं छिन्दन्ति “ार्स्त्रार्णि नैनं दहति पार्वक:। 

न चैनं क्लेदयन्त्यार्पो न शोशयति मार्रूत:।। (2/23)

अर्थार्त् इस आत्मार् को नहीं काट सकते हैं अग्नि इस आत्मार् को नहीं जलार् सकती तथार् जल इसे गीलार् नहीं कर सकतार् वार्यु इस आत्मार् को नहीं सुखार् सकती है। इस प्रकार यह आत्मार् नित्य, सर्वव्यार्पी, स्थिर, निश्चल, और सनार्तन है- ‘‘नित्य: सर्वगत: स्थार्नुरचलोSयं सनार्तन:।’’ आत्मार् के स्वरूप के विषय में और वर्णन कियार् गयार् है कि यह आत्मार् वार्णि से व्यक्त नहीं कियार् जार् सकतार्, मन से इसक विचार्र नहीं कियार् जार् सकतार् और यह आत्मार् विकार रहित कहार् जार्तार् हैं। अत: इसे इस प्रकार क जार्नकर हे अर्जुन! तुम्हें शोक करनार् नहीं चार्हिये और आगे भगवार्न कहते है कि हे अर्जुन यदि तुम यह मार्न भी लो कि यह आत्मार् सदार् उत्पन्न और मरणषील है तो भी तुमको इसके लिये शोक नहीं करनार् चार्हिये क्योंकि जन्म लेने वार्ले की मृत्यु निष्चित है मृत व्यक्ति क पुर्नजन्म लेनार् निश्चित है। इस कारण ऎसे अवष्य समभार्वी विषय में तुम्हें शोक नहीं करनार् चार्हिये- 

जार्तस्य हि ध्रुवो मृत्युधर््रुवं जन्म मृतस्य च। 

तस्मार्दपरिहायेSर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।। (गीतार् 2/27)

भगवार्न शरीरी यार् आत्मार् के विषय में अर्जुन को सार्धार्रण दृष्टि से समझार्ते है कि हे अर्जुन सभी प्रार्णी जन्म के पूर्व अव्यक्त यार् अज्ञार्त थे, बीच में कुछ समय के लिये दिखाइ पड़ रहें है और जो विनार्श के बार्द अज्ञार्त हो जार्येंगे उनके लिए शोक करनार् अनुचित है जिन सगे सम्बन्धियों के लिए तुम चिन्तार् कर रहें हो व जन्म के पूर्व तुम्हार्रे कौन थे और मृत्यु के बार्द इनसें तुम्हार्रार् क्यार् सम्बन्ध रहेंगार्, उसे तुम नहीं जार्नते यह जो कुछ समय के लिए तुम्हार्रार् इनके सार्थ परिचय हुआ है मार्नों रार्त भर के लिए धर्मशार्लार् के यार्त्रियों के मिलन की तरह है। प्रार्त: काल होते ही सब लोग उस धर्मशार्लार् को छोडकर अपने-अपने गन्तव्य स्थार्न को चले जार्येंगें। अत: इस संसार्र में यह मेरार् पुत्र है पत्नी है, पति है, ऎसार् सम्बन्ध मार्नकर मोहित होकर शोक करनार् उचित नहीं है- 

‘‘ अव्यक्तार्दीनि भूतार्नि व्यक्त मध्यार्नि भार्रत। 

अव्यक्त निधनार्न्येव तत्र क परिदेवनार्।। (गीतार् 2/28)

भगवार्न आगे कहते है कि हे अर्जुन यह आत्मार् सबके शरीर में सदार् अवध्य है, इसलिये तुम्हें किसी भी प्रार्णी के निधन से शोक करनार् उचित नहीं। इसलिये हे अर्जुन अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर अपने स्वधर्म से विचलित होनार् शोभार् नहीं देतार् है, क्योंकि धर्म युद्ध के अतिरिक्त क्षत्रिय के लिये कुछ भी कल्यार्णकारी नहीं है। इसलिये अपने स्वधर्म क पार्लन करते हुयें तुम्हें युद्ध करनार् चार्हिये क्योंकि यदि युद्ध नहीं करोगे तब आपकी अपकीर्ति पूरे विश्व में फैल जार्येगी जो मृत्यु से भी बढ़कर दुख दार्यी होती है- और आगे समझार्तें हुये कहते है कि युद्ध करने से क्यार् लार्भ है ? यदि युद्ध में मार्रार् जार्येगार् तो स्वर्ग की प्रार्प्ति होगी और यदि युद्ध मेंं जीत जार्येगार् तो पृथ्वी क रार्ज्य भोगेगार्। इसलिये हे अर्जुन युद्ध से विचलित न होकर युद्ध के लिये कृत निश्चय करके उठ खड़े होओ। सुख-दु:ख, लार्भ-हार्नि, जय-परार्जय को समार्न समझकर फिर तुम युद्ध के लिये सन्नद्ध हो जार्ओ इस प्रकार कर्तव्य कर्म करने से तुम्हें पार्प स्पर्श नहीं करेगार्। इस प्रकार भगवार्न ने गीतार् के द्वितीय अध्यार्य में आत्मार् की अमरतार् से सम्बन्धित मुख्य उपदेश दिये है। इस प्रकार आत्मतत्व बड़ार् ही गहन है और अत्यन्त मूढ़ विषय है जो व्यक्ति अज्ञार्नी है, मोह, मार्यार् से ग्रस्त है उसे आत्मतत्व समझ में नहीं आतार् है। 

ब्रह्म यार् परमेश्वर 

गीतार् की तत्व विवेचन में ब्रह्म यार् परमार्त्मार् क महत्वपूर्ण एवं विषद् वर्णन कियार् गयार् है गीतार् ब्रह्म की सगुण निर्गुण दोनो रूपों को मार्नती है। और यह भी मार्नती है कि दोनों रूप एक ही अभिन्न तत्व के है ब्रह्म जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय क अभिन्न निमित्तोपार्दार्न कारण है, वह शूद्ध चैतन्य और अखण्ड आनन्द स्वरूप है। वह निर्विकल्प, निरूपार्धि और विश्वार्तीत भी है। ब्रह्म अन्र्तयार्मी के रूप में सार्री प्रकृति और समस्म प्रार्णियों में वार्स करतार् है। जिस प्रकार सूत में मणि पिरोर्इ रहती है उसी प्रकार मणियों की तरह यह समस्त जगत मुझमें अनुस्यूत है। ब्रह्म यार् र्इश्वर ही विश्वार्त्मार् होते हुये भी वह विश्व में सीमित नहीं है, वह विश्वार्तीत भी है, अज्ञार्नी लोग भी मेरार् अक्षय, सर्वश्रेष्ठ महार्नभार्व अर्थार्त् स्वरूप न जार्नकर अव्यक्त, संसार्र से परे मुझे मनुष्य रूप में आविभ्र्ार्ूत समझते हैं। ब्रह्मनिर्विकार, निरार्कार, निर्गुण, निविशेष है। वह अपनी मार्यार् की सहार्यतार् से भी संसार्र के कल्यार्ण के लिए लीलार्वष सविशेष गुणमय, सार्काररूप धार्रण करते है और संसार्र में अवतीर्ण होते है। भगवार्न श्री कृष्ण ने गीतार् में वर्णन कहते हुये कहते है कि हे अर्जुन इस पूरे श्रृष्टि में मुझसे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। मैं जल में रस, चन्द्र सूर्य में ज्योति, समस्त वेदों में ओंकार स्वरूप, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरूषार्कार हूँ, जीव में जो शुद्ध चैतन्य प्रकाशित हो रहार् है वही ब्रह्म रूप से इस समस्त वार्ह्य जगत में भी व्यार्पत है। अखण्डचिदार्नन्द स्वरूप परमतत्व को आत्मार् यार् ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म यार् र्इश्वर स्वत: शुद्ध चैतन्य एवं स्वयं प्रकाश है। गीतार् में श्री भगवार्न ने क्षर, अक्षर पुरूषोत्तम इन तीन प्रकार के पुरूषों क उल्लेख कियार् है। जहार्ं सार्ंख्य दर्शन पुरूष को एक मार्नतार् है। वही गीतार् में पुरूषनार्नार् है। और उनके सार्थ प्रकृति नार्नार् मार्नी गयी है जैसे- ‘क्षेत्रज्ञ´्चार्पि मार्ं विद्धि सर्वक्षेत्रेशु भार्रत’’। तथार्पि वेदार्न्त के एकात्मवार्द के समार्न गीतार् में भी एकात्मवार्द समर्थित हुआ है जैसे- 

मन्त: परतरं नार्न्यत् कि´्चिदस्ति धन´्जय। 

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रं मणिगणार् इवं ।। (गीतार् 7/7)

हे अर्जुन और जो कुछ समस्त प्रार्णियों क बीज कारण है, वह मै ही हूँ मेरे अतिरिक्त इस चरार्चर जगत में कोइ ऎसी वस्तु नहीं है जो मेरे बिनार् रह सके इस प्रकार सब कुछ ब्रह्म है- ‘‘सर्वखल्विदं ब्रह्म’’ यह श्रुति वार्क्य समर्थित होतार् है जो वेदार्न्त दर्शन क मुख्य आधार्र स्तम्भ है। ब्रह्म ही समस्त भूतों और प्रार्णियों की स्थिति है तथार् ब्रह्म में ही सब कुछ लय प्रार्प्त हो जार्तार् हैं। अत: ब्रह्म को अलग कर देने से ब्रह्मार्ण्ड की कोर्इ यथाथ सत्तार् ही नहीं रह जार्येगी। ब्रह्म आत्मार् रूप से रहने के कारण ही सब प्रार्णी जीवित है। जैसे- कुम्हार्र घट क निमित्त कारण है और मिट्टी घट क उपदार्न कारण है। उसी प्रकार ब्रह्म भी निमित्त और उपदार्न कारण हैं। गीतार् के सार्तवें अध्यार्य के छठें श्लोक में भगवार्न कहतें है कि चेतन और अचेतन स्वरूप समस्त भूत इन दो प्रकार की प्रकृतियों से उत्पन्न इसे धार्रणार् करों अथाथ जार्नलो मै ही समस्त जगह की उत्पत्ति और प्रलय क कारण हूँ- 

एतद् योनीनि भूतार्नि सर्वार्णीत्युपधार्रय। 

अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथार्।।

योग दर्शन कहतार् है कि- ‘‘क्लेश कर्म विपार्काष यैर परार्मृश्ट: पुरूषविशेष र्इश्वर:’’ अर्थार्त् क्लेश, कर्म विपार्क और आशय ये चार्रो जीव मार्त्र में सतत् वर्तमार्न रहते है। इनके ही द्वार्रार् पुरूष भोक्तृत्व रूप को प्रार्प्त होतार् है। ये चार्रो जिसमें नहीं होते है। अथवार् जिसे स्पर्श नहीं कर पार्ते वहीं र्इश्वर है। जीव के सार्थ र्इश्वर क इतनार् ही भेद है जीव के कर्म होते है। अतएव उस कर्म के संस्कार भी होते है। र्इश्वर क कोर्इ कर्म नहीं होतार् है। अतएव उनक कोर्इ संस्कार नहीं होतार् है इस कारण र्इश्वर स्वभार्वत: चिरमुक्त है। र्इश्वर को ‘‘पुरूषविशेष’’ भी कहार् गयार् है। इसक कारण यह है कि पुरूष तीन प्रकार के होते हैं- 1- क्षर पुरूष 2- अक्षर पुरूष और पुरूषोत्तम है। पुरूषोत्तम ही र्इश्वर है वह अन्य दो पुरूषों से विशेष यार् विलक्षण है- 

उत्तम: पुरूषस्त्वन्य: परमार्त्मेत्युदार्हृत:। 

यो लोकत्रय भार्विष्य तिभत्र्यव्यय र्इश्वर:।। (गीतार् 15/17)

अर्थार्त् उन क्षर और अक्षर से भिन्न एक उत्तम पुरूष है जिन्हें ‘परमार्त्मार्’ कहते हैं। जो अक्षर ब्रह्म सर्वज्ञ, नार्रार्यण तीनों लोकों में अपनी शक्ति से प्रविष्ट होकर उनक पार्लन करते हैं। भगवार्न आगे कहते है कि क्योंकि मैं क्षर से परे और अक्षर से भी अतीत तथार् श्रेष्ठतम हूँ। इस कारण लोक व्यवहार्र यार् पुरार्ण आदि में और वेदों में मैं पुरूषोत्तम नार्म से प्रख्यार्त हूँ- 

यस्मार्त्क्षमतीतोSहमक्षरार्दपि चोत्तम:। 

अतोSस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरूषोत्तम:।। (गीतार् 15/18)

गीतार् परमेश्वर की दो प्रकृतियों क वर्णन करती है। (1) अपरार् (2) परार्। ‘अपरार्’ प्रकृति को ‘क्षेत्र और ‘क्षर’ ‘पुरूष’ भी कहार् गयार् है इसे जड़ प्रकृति भी कहते हैं क्योंकि इसके अन्तर्गत समस्त भौतिक पदाथ विद्यमार्न हैं। ‘परार् प्रकृति’ के अन्तर्गत चेतन जीव आते है। इसक अन्य नार्म क्षेत्रयज्ञ और ‘अक्षर’ पुरूष भी है। ‘क्षर: सर्वार्णि भूतार्नि कूटस्थो•क्षर उच्यते।’ (15/16)। इस प्रकार संसार्र में दो प्रकार के पुरूष है। 1- विनार्शषील 2- अविनार्शी। उनमें जीव-जगत विनार्शषील है और कूटस्थआत्मार् अविनार्शी कहलार्तार् है। जीव चैतन्य रूप होने से उत्कृश्ट यार् परार्प्रकृति यार् विभूति है। जीव ‘कूटस्थ’ और ‘अक्षर’ है। भगवार्न जीव को अपनार् अंश कहते है- 

‘ममैवार्ंषो जीव लोके जीवभूत: सनार्तन:।’ (गीतार् 15/7) क्षर पुरूष (जड़ प्रकृति) और अक्षर पुरूष (जीव) इन दोनों के ऊपर उत्तम पुरूष यार् पुरूषोत्तम है- (गीतार् 15/17) यह पुरूषोत्तम ही परमतत्व है जो जड़ प्रकृति और चेतन जीव दोनों से ऊपर की कोटि क है और यह इन दोनों की ‘आत्मार्’ भी है। और यह दोनों में अन्तर्यार्मी रूप में रहकर दोनों क नियमन करतार् है फिर भी इसे विश्वतीत पुरूषोत्तम कहार् गयार् है। इस प्रकार गीतार् भी सगुण र्इश्वर और निगुर्ण ब्रह्म क अत्यधिक सुन्दर समन्वय दृष्टिगोचर होतार् है जिसक वर्णन श्रुतियों एवं वेदों में भी कियार् गयार् है। सगुण ब्रह्म ही सोपार्धिक और सविकल्पक होकर र्इश्वर बन जार्तार् है। र्इश्वर ही समस्त विश्व के कर्तार्-धर्तार्, नियन्तार् और आरार्ध्य है और पर ब्रह्म निर्गुण, निर्विषेश, निर्विकल्पक, निरूपार्धिक, निश्प्रप´्च, अनिर्वचनीय और अपरोक्षार्नु-भूतिगम्य है। निर्गुण ब्रह्म क केवल निशेध मुख ‘‘नेतिनेति’’ से ही वर्णन सम्भव है। तैत्तरीय उपनिशद में कहार् गयार् है- ‘यतो वार् इमार्नि भूतार्नि जार्यन्ते, येन जार्तार्नि जीवन्ति, यत प्रयन्त्यार्भिसं विषन्ति …………………. तद् ब्रह्म’’- अर्थार्त् ‘‘ब्रह्म वह है जिससे इस जगत के समस्त पदाथ उत्पन्न होते है। जिसमें स्थित और जीवित रहते है और जिसमे ंपुन: विलीन हो जार्ते है। निर्गुण ब्रह्म ही गीतार् दर्शन के अुसार्र कभी-कभी अपने आपको मार्यार् शक्ति द्वार्रार् सीमित करके अवतार्र ग्रहण करतार् है। यही र्इश्वर क सगुण स्वरूप होतार् है इस सम्बन्ध में स्वयं भगवार्न श्री कृष्ण ने कहार् है कि- 

यदार्-यदार् हि धर्मस्य ग्लार्निर्भवति भार्रत्। 

अभ्युत्थार्नम धर्मस्य तदार्त्मार्नम सृजार्म्यहम।। (गीतार् 4/7) 

इस प्रकार सगुण ब्रह्म की उपार्षनार् पर गीतार् में विशेष बल दियार् गयार् है किन्तु इसक तार्त्पर्य यह कदार्पि नहीं है कि निर्गुण ब्रह्म की उपार्सनार् को महत्वहीन समझार् गयार् है। पूर्ण विश्वार्स और श्रद्धार् से की गयी किसी भी तरह उपार्सनार् र्इश्वर प्रार्प्ति क यथोचित माग है। इस प्रकार गीतार् में ब्रह्म क ज्ञार्न करनार् ही परम सार्ध्य तत्व मार्नार् गयार् है। र्इश्वर प्रार्प्ति के लिए त्रिविध माग निर्दिष्ट किये गये है। जो ज्ञार्न कर्म और भक्तियोग नार्म से जार्ने जार्ते है। गीतार् वर्णित विश्व रूप दर्शन क एक मार्त्र लक्ष्य र्इश्वर सार्क्षार्त्कार है। गीतार् में र्इश्वर जीव मार्यार् प्रकृति विश्व उत्पत्ति, विनार्श, आत्मार् तथार् जरार्-मरण आदि समस्त लौकिक तथार् पार्रलौकिक दृष्टियों से वैज्ञार्निक तथार् मनो वैज्ञार्निक रूप से सम्यक विवेचन कियार् गयार् है। यही कारण है कि भगवदगीतार् आज समस्त विश्व की प्रदर्षिक के रूप में प्रतिदिन आगे बढ़ रही हैं। और इसकी कीर्ति दिग-दिगार्न्तर तक व्यार्प्त है। गीतार् क अमर संदेश आज के अशार्न्त जगत में विक्षुब्ध मार्नव समार्ज को परम “ार्ार्न्ति प्रदार्न करने वार्लार् है। 

जीव 

गीतार् में भगवार्न कहते हैं कि यह जीव जो है यह मेरार् ही अंश है- 

ममैवार्ंषो जीवलोके जीवभूत: सनार्तन:। 

मन:शष्ठार्नीन्द्रियार्णि प्रकृतिस्थार्नि कर्शति।। (गीतार् 15/7) 

अर्थार्त् मुझ परमेश्वर क ही अनार्दि एक अंश संसार्र में जीव बनकर प्रकृति अवस्थित होंकर मन के सार्थ पार्ंच इन्द्रियों को आकर्षित करतार् है। परमेश्वर की दो प्रकृतियार्ं है अपरार् प्रकृति और परार् प्रकृति । ‘अपरार् प्रकृति’ जहार्ं जड़ है इसमें सभी भौतिक पदाथ विद्यमार्न होते है वहीं परार् प्रकृति चेतन जीव है। इस चेतन जीव को ‘अक्षर’ और ‘क्षेत्रज्ञ पुरूष भी कहते है ‘जीव’ र्इश्वर क सूक्ष्म शरीर है तो जगत स्थूल शरीर है। र्इश्वर जीवों के और जगत की आत्मार् है। इस सृष्टि से मेर सनतार्न अंश जीव रूप में प्रकृति में विद्यमार्न मन सहित छ: इन्द्रियों को आकृश्ट करतार् है। जब जीव शरीर रूप को धार्रण करतार् है और पुन: उसक त्यार्ग करतार् है तब जैसे वार्यु, अपने स्थल से गन्धों को सार्थ लिये चलतार् है यह जीव भी उसी प्रकार इन्द्रियों के वषीभूत हो जार्तार् है। समस्त ज्ञार्नेन्द्रियों तथार् मन के योग से जीव विषयों क सेवन करतार् है। प्रत्येक अवस्थार् में स्थित इस जीव आत्मार् को ज्ञार्नी लोग ही पहचार्न सकते हैं। मलिन अन्त:करण युक्त अज्ञार्नी के लिए जार्ननार् असम्भव है। यथार् 

प्रकाशत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि:। 

क्षेत्रं क्षेत्री तथार् कृत्स्नं प्रकाशयति भार्रत।। (गीतार् 13/35)

इस श्लोक क तार्त्पर्य है कि जिस प्रकार एक ही सूर्य समस्त पृथ्वी को प्रकाशित करतार् है उसी प्रकार आत्मार् भी जीव के सम्पर्ण शरीर प्रकाशित करती है। भगवार्न ने गीतार् में जीव की मुख्य रूप से तीन गतियों क वर्णन कियार् है। 1- ऊध्र्वगति 2- अधोगति 3-मध्यगति। जो मनुष्य सत्व गुण में स्थित रहने वार्लार् है उसको ऊध्र्वगति प्रार्प्त होती है। (गीतार् 14/14, 18) तमोगुण की तार्त्कालिक वृत्ति के बढ़ने पर मरने वार्लार् और तमोगुण में स्थित रहने वार्लार् मनुष्य अधोगति में जार्तार् है- (14/15, 18) रजोगुण के तार्त्कालिक वृत्ति के बढ़ने पर मरने वार्लार् और रजोगुण में स्थित रहने वार्लार् मनुष्य अधोगति को प्रार्प्त होतार् है- ‘‘जीवार्त्मार्’’ किस भार्व से सत्वार्दि गुणो से युक्त होकर शरीर में अवस्थित रहतार् है विषयों क भोग करतार् है यार् किस भार्व से शरीर छोडकर चलार् जार्तार् है उसे अज्ञार्नी लोग नहीं देख सकते हैं क्योंकि उनक मन विषयों के आकर्शण से बर्हिमुख रहतार् है किन्तु इसके विपरीत ज्ञार्नियों क मन अन्र्तमुख रहतार् है। इसी कारण ज्ञार्नी लोग ही आत्मार् क दर्शन कर पार्तें हैं भगवार्न जीवार्त्मार् क वर्णन करते हुये कहते है कि इस संसार्र में दो प्रकार पुरूष है- विनार्शषील और अविनार्शी उनमें जीव, जगत विनार्शषील है और इससे अलग कूटस्थार्त्मार् अविनार्शी है- ‘क्षर: सर्वार्णि भूतार्नि कूटस्थो अक्षर: उच्यते’। (गीतार् 15/16) वेदार्न्त दर्शन में जीव क वर्णन कुछ इस प्रकार कियार् गयार् है- शंकर के अनुसार्र अनार्दि अविद्यार् के कारण आत्मार् अनेक रूपों प्रतिभार्सित होने लगती है। इसी को अद्वैत वेदार्न्त में ‘जीव’ कहते है। जीव अपने र्इश्वर से भिन्न कर्तार् है यार् भोक्तार् समझने लगतार् है। जबकि जीव और ब्रह्म में कोर्इ तार्त्विक भेद नहीं है- ‘जीवो ब्रह्मैव नार्पर:’ पर व्यवहार्रिक दृष्टि से जीव और र्इश्वर अलग है क्योंकि जीव मार्यार् क कार्य है। मार्यार् के कारण ही जीव अपने वार्स्तविक स्वरूप को नहीं जार्न पार्तार् है किन्तु गीतार् में भगवार्न जीव को अपनार् एक अंश स्वीकार करते है। 

मोक्ष 

पुरूषाथ सिध्दार्न्त में मनुष्य की सभी र्इच्छार्ओं ,आवश्यकतार्ओं और उद्देश्यों को चार्र वर्गो में विभक्त कियार् गयार् है -धर्म, अर्थ काम, मोक्ष,मनुष्य जीवन क अन्तिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ है। मोक्ष प्रार्प्ति के लिये गीतार् कभी नही कहती है कि संसार्र त्यार्ग करने से मोक्षप्रार्प्ति सम्भव नही है मोक्ष से तार्त्पर्य है ‘आवार्गमन के बन्धन से मुक्ति पार्नार्’। गीतार् में यह अन्तिम निश्कर्ष के रूप में वर्णित है ,कि र्इश्वर के प्रतिपूर्ण समर्पण की भार्वनार् ही परमपद प्रदार्न कर सकती है । गीतार् में कहार् गयार् है- 

‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभार्वेन भार्रत । 

तत्प्रसार्दार्त्परार्ं “ार्ार्न्तिं स्थार्नं प्रार्प्स्यसि शार्श्वतम्।।

अर्थार्त् “हे भार्रत ! तू सब प्रकार से उस परमार्त्मार् की ही शरण में ही जार् । उस परमार्त्मार् क कृपार् से ही तुम्हें परम शार्न्ति तथार् सनार्तन परन धन प्रार्प्त होगार् “ । गीतार् के अन्तिम अध्यार्य क नार्म ही ‘मोक्षयोग’ है भगवार्न ने कहार् है त्रिविधत्यार्ग और सन्यार्स मुख्य है । काम्यकर्म क त्यार्ग ही सन्यार्स है और सार्रे कर्मो के फल मार्त्र क त्यार्ग ही यथाथ त्यार्ग है जो कर्मफल त्यार्गी है वही यथाथ सन्यार्सी है । देहधरीजीव देह में वर्तमार्न रहते सभी कर्मो क त्यार्ग नहीं कर सकतार् है क्योंकि श्वार्स प्रश्वार्स की स्वार्भार्विक वृत्ति भी कर्म है पूजार् अर्चनार् भगवार्न क स्मरण मनन भी कर्म है स्वधर्म भी कर्म है इस कारण गीतार् कर्मत्यार्ग क उपदेश नहीं देती है कर्मफल त्यार्ग करके स्वधर्म क अनुश्ठार्न ही भगवार्न क स्पष्ट निर्देष है ।भगवार्न कहते हैं कि जो अनन्य भार्व से मेरी उपार्सनार् करते है और जो इसप्रकार नित्य मुझमे ही रत् रहते है उनके योगक्षेम क भर मैं स्वयं उठार्तार् हूँ कहार् भी गयार् है – 

अनन्यार्श्चिन्तयतो मार्ं ये जनार्: प्र्युपार्सते । 

तेशार्ं नित्यभियुक्तार्नार्ं योगक्षेमं वहार्म्यहम् ।।(गीतार् 9/22)

इस प्रकार इस श्लोक में कहार् गयार् है कि अपनार् आत्मसर्पण र्इश्वर के सार्मने पूरी तरह से कर दो इस प्रकार मोक्ष, आत्मज्ञार्न के परमपुरूष के स्वरूप की अनुभूति है। र्इश्वर यार् परमपुरूष नित्य शुद्ध चैतन्य एवं अखण्ड आनन्द स्वरूप है। आत्मार् ज्ञार्न स्वरूप है और मोक्ष आत्मार् क स्वरूप ज्ञार्न है। अविद्यार् के कारण ही जीव अहंकार और ममकार युक्त होकर स्वयं को शुभ-अशुभ कर्मों क कर्तार्, भोक्तार् मार्न बैठतार् है और जन्म मरण चक्र में संसरण करतार् रहतार् है। यही उसक ‘बन्धन’ है जब आत्मज्ञार्न द्वार्रार् अविद्यार् निवृत्ति हो जार्ती है तो जीव नित्य, शुद्ध, ब्रह्म भार्व को प्रार्प्त कर लेतार् है। यह उसकी बन्धन से मुक्ति है। किन्तु वार्स्तव में जीव क न तो बन्धन होतार् है और न ही मोक्ष होतार् है। केवल अविद्यार् ही आती और जार्ती है। इसलिये बन्धन और मोक्ष परमाथत: मिथ्यार् है। केवल व्यवहार्रिक सत्यतार् है। परमार्त्मार् पूर्ण आत्मसम्र्पण चार्हतार् है। और उसके बदले में हमें आत्मार् की वह शक्ति प्रदार्न करतार् है जो प्रत्येक स्थिति को बदल देती है- 

सर्व धर्मार्न: परित्यज्य मार्मेकं शरणं ब्रज। 

अहमं त्वार्ं सर्व पार्पेभ्यो मोक्षयिश्यार्मि मार् शुच:।।(गीतार् 18/66)

अर्थार्त् सब व्यक्तियों को छोडकर तुम केवल मेरी शरण में आ जार्, तू दु:खी मत हो मैं तुझे सब पार्पों से मुक्त कर दूंगार् इस प्रकार सर्वज्ञ, समदश्र्ार्ी क्षेत्रज्ञ ही इन्द्रियों को देखतार् है जैसे- सूर्य रष्मि द्वार्रार् हमको स्पर्श करतार् है, इन्द्रिय शक्ति भी उसी प्रकार विषयों को स्पर्श करती है। मन के द्वार्रार् इन्द्रियार्ं रष्मियार्ं सम्यक नियमित होने पर दीप में जैसे ज्वार्लार् प्रकाशित होती है आत्मार् भी उसी प्रकार देह घट में प्रकाशित होतार् है। पार्प कर्म क क्षय होने पर जीव को ज्ञार्न उत्पन्न होतार् है- 

यथार्दर्शतल प्रख्ये पष्यत्यार्त्मार्न मार्त्मनि। 

इन्द्रियार्णिन्द्रियाथार्ष्च महार्भूतार्दि प´्च च।। 

मनो बुद्धिमहंकामव्यक्तं पुरूषं तथार्। 

प्रसंख्यार्न परार्वार्प्तौ विमुक्तो बन्धनैर्भवेत् ।। 

अर्थार्त् जैसे दर्पण में अपने रूप क दर्शन कियार् जार्तार् है उसी प्रकार जीव निर्मल बुद्धि में इन्द्रियार्ं, इन्द्रियों के विषय, पंचमहार्भूत, मन, बुद्धि, अहंकार प्रकृति तथार् पुरूष को भी देखतार् है। तब प्रसंख्यार्नम यार् विवेक ज्ञार्न द्वार्रार् देहन्द्रियार्दि से आत्मार् क पाथक्य निश्चय कर देह आदि बन्धन से विमूक्त होकर परमाथ को प्रार्प्त होतार् है। जीव को जब यह ज्ञार्न हो जार्तार् है कि मैं परमज्योति स्वरूप ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार की उपलब्धि प्रार्प्त करके मुक्त हो जार्तार् है। चतुर्विष तत्व से पृथक होकर पंचविष रूप में जो प्रसिद्ध पुरूष है वह विवेक विचार्र द्वार्रार् प्रकृति से पृथक होकर केवल लार्भ प्रार्प्त करतार् है। और शडविंश तत्व स्वरूप जो ब्रह्म है उसक सार्क्षार्त्कार करतार् है। गीतार् में वर्णित विश्वरूप दर्शन क एक मार्त्र लक्ष्य र्इश्वर सार्क्षार्त्कार ही है। चार्हे कर्मयोगी हो यार् ज्ञार्नयोगी अथवार् भक्तियोगी सभी उस परश्रद्धेय की दृष्टि में एक हैं और मोक्ष प्रार्प्ति के योग हैं इस प्रकार भगवार्न ने यमं, नियम, आसन, प्रार्णार्यार्म, प्रत्यार्हार्र, ध्यार्न, धार्रणार्, और समार्धि से अष्टार्ंग योग विमूक्त के उपार्य कहे गये हैं।

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