श्रीमद्भगवद्गीतार् क परिचय

गीतार् संस्कृत सार्हित्य काल में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व क अमूल्य ग्रन्थ है। यह भगवार्न श्री कृष्ण के मुखार्रबिन्द से निकली दिव्य वार्णी है। इसमें 18 अध्यार्य और 700 श्लोक हैं। इसके संकलन कर्तार् महर्षि वेद ब्यार्स को मार्नार् जार्तार् है। आज गीतार् क विश्व की कर्इ भार्षार्ओं में अनुवार्द हो चुक है। जिससे इसकी कीर्ति दिगदिगंतर तक व्यार्प्त है। श्रीमद्भगवद्गीतार् एक ऎसार् विलक्षण ग्रन्थ है जिसक पार्र आज तक कोर्इ नहीं पार्यार् है। इसक अध्ययन मनन चिन्तन करने पर नित्य नये भार्व उत्पन्न होंगे कहार् जार्तार् है कि गीतार् में जितनार् भार्व भरार् है उतनार् बुद्धि में नहीं आतार् हैं। बुद्धि की एक सीमार् है, और जब बुद्धि में आतार् है तब मन में नहीं आतार् और जब मन में आतार् है तब फिर कहने में नहीं आतार् है। यदि कहने में आतार् है तो लिखने में नहीं आतार् है। इस प्रकार गीतार् असीम है। गीतार् में ज्ञार्न योग, कर्मयोग, और भक्तियोग क वर्णन कियार् गयार् है। प्रस्तार्वनार् के अन्तर्गत गीतार् के 18 अध्यार्यों क संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कियार् गयार् है। गीतार् को सार्मार्न्य जन समझ नहीं सकतार् है तो उसकी विषय में लिखनार् तो दूर। किन्तु गीतार् के विषय में कोर्इ कुछ कहतार् है तो वह वार्स्तव में अपने बुद्धि क ही परिचय देतार् है –

सब जार्नत प्रभु प्रभुतार् सोर्इ। 

तदपि कहे बिनु रहार् न कोर्इ।।(मार्नस बार्लका0 13/9) 

श्रीमद्भगवद्गीतार् क परिचय 

भगवदगीतार् संस्कृत महार्काव्य क ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में अत्यन्त समार्दर प्रार्प्त ग्रन्थ है। इसमें भगवार्न कृष्ण द्वार्रार् अर्जुन को कुरूक्षेत्र युद्ध में दियार् गयार् द्विव्य उपदेश है यह गीतार् वेदार्न्त दर्शन क सार्र है। यह ग्रन्थ महार्भार्रत की एक घटनार् के रूप में प्रार्प्त होती है। महार्भार्रत में वर्तमार्न कलियुग तक की घटनार्ओं क विवरण मिलतार् है। इसी युग के प्रार्रम्भ में आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व भगवार्न श्री कृष्ण ने अपने मित्र तथार् भक्त अर्जुन को यह गीतार् सुनाइ थी।

1. गीतार् क रचनार्काल – 

गीतार् के रचनार्काल के सम्बन्ध में डार्0 रार्मकृष्ण गोपार्ल भण्डार्रकर ने चर्तुव्यूह को आधार्र मार्नकर सिद्ध कियार् है कि भगवदगीतार् की रचनार् सार्त्तवत यार् भार्गवत सम्प्रदार्य की सुव्यस्थित होने के पूर्व हुर्इ है उनके मत में इसक काल चौथी र्इ0पू0 क आरम्भ है तथार् यह भक्ति सम्प्रदार्य यार् ऐकान्तिक धर्म की प्रार्चीनतम व्यार्ख्यार् है। यद्यपि गीतार् के काल निर्णय के बार्रे में भिन्न-भिन्न प्रकार की गवेशणार्ए भी हैं और आज भी हो रही है।

इसलिये गीतार् को महार्भार्रत के भीष्म पर्व पर आधार्रित मार्ननार् उचित है महार्भार्रत के भीष्म पर्व के 25 से 42 अध्यार्य के अन्तर्गत भगवदगीतार् आती है फिर शार्न्तिपर्व और अश्वमेधपर्व में भी गीतार् क कुछ प्रसंग उल्लिखित मिलतार् है।

भगवदगीतार् भार्गवत धर्म पर आधार्रित द्विव्य ग्रन्थ है इसकी रचनार्काल और सन्देश के विषय में विद्वार्नों में मतभेद है। पार्श्चार्त्य विद्वार्नों क मार्ननार् है कि गीतार् में परस्पर विरोध विचार्रों क सार्मन्जस्य है। जो यह सिद्ध करतार् है कि एक व्यक्ति द्वार्रार् रचित होनार् सम्भव नहीं है। बल्कि विभिन्न व्यक्तियों ने विभिन्न समयों में लिखार् होगार्। परन्तु भार्रतीय विचार्रक एवं चिन्तक मार्नतें है कि भार्गवत धर्म क अभ्युदयकाल र्इ0सन् के 1400 वर्ष पहले रहार् होगार् और गीतार् कुछ शतार्ब्दियों के बार्द प्रकाश में आयी होगी मूल भार्गवत धर्म भी निष्काम कर्म प्रधार्न होते हुये भी आगे चलकर भक्ति प्रधार्न स्वरूप धार्रण कर विशिष्टार् द्वैत क समार्वेश कर लियार् तथार् प्रचलित हुआ।

गीतार् महार्भार्रत क ही अंश है और यदि महार्भार्रत काल निर्धार्रण है तो गीतार् क भी उसी आधार्र पर सहज ही लगार्यार् जार् सकतार् है महार्भार्रत लक्ष श्लोकात्मक ग्रन्थ है और शक् के लगभग 500 पूर्व अस्तित्व में थार्- गावे के अनुसार्र ‘‘मूल गीतार् की रचनार् 200 र्इ0पू0 के लगभग हुर्इ होगी जब विश्णु और कृष्ण क तार्दार्त्म्य स्थार्पित कियार् जार् चुक थार्। हार्ँपकिन्स, कीथ, डार्उसन और फर्कुआर आदि विद्वार्न इसे श्वेतार्श्वतर उपनिशद् से मिलतार् जुलतार् मार्नतें है। लेकिन समयार्नुसार्र कुछ बार्द क उपनिशद मार्नतें है। ओटो और यार्कोबी मूलगीतार् ग्रन्थ को दाशनिक यार् धामिक ग्रन्थ नहीं मार्नतें है’’। इन लोगों क मार्नन है कि यह मूलत: महार्काव्य क सुन्दर अंश है जिसे बार्द में दाशनिकों ने वर्तमार्न कलेवर में सुसज्जित कर नयार् रूप प्रदार्न कियार्।

2. महार्भार्रत ,गीतार् में सार्म्य – 

महार्भार्रत में 18 पर्व है जिनमें पूर्वाद्ध में 6 पर्व है एवं उत्तराद्ध में 12 पर्व है। इस ग्रन्थ क महार्भार्रत से बड़ार् सार्म्य है महार्भार्रत में 18 पर्व है वहीं गीतार् में 18 अध्यार्य है। जिसको 6-6 के क्रम से तीन भार्गों में बार्टार् जार् सकतार् है पहले 6 अध्यार्य कर्मयोग पर आधार्रित है और 7-12 वें तक अध्यार्य भक्तियोग पर आधार्रित है और अन्तिम 6 अध्यार्य ज्ञार्न की परार्काश्ठार् से ओत-प्रोत है और इस प्रकार पूरी गीतार् में महार्भार्रत से कितनार् सार्म्य दिखलाइ पडतार् है एक तरफ 7-7 अक्षौहिणी सेनार् थी तो दूसरी तरफ 11 अक्षौहिणी सेनार् ऎसे वार्तार्वरण में गीतार् कही गयी है, जो तत्व ज्ञार्न ऋशि महार्त्मार् लोग गुफार् कन्दरार्ओं में रहकर प्रदार्न किये हैं वह भी गीतार् के तत्वज्ञार्न के सार्मने कुछ भी नहीं है। सम्पूर्ण गीतार् ग्रन्थ अष्टार्दश अध्यार्यों में विरचित है। प्रत्येक अध्यार्य एक-एक योग है। गीतार् की पृश्ठ भूमि युद्ध क्षेत्र है। भगवार्न श्री कृष्ण क मुख्य प्रयोजन मार्नव अवतार्र रूप धार्रण करके अधर्म क नार्श और धर्म क उत्थार्न करनार् थार्- जो कि स्वयं कहते है-

‘‘ यदार्-यदार् हि धर्मस्य ग्लार्निर्भवति भार्रत । 

अभ्युत्थार्नमधर्मस्य तदार्त्मार्नम सृजार्म्यहम् ।।’’ (गीतार् 4/7) 

कुरू क्षेत्र में युद्ध की तैयार्री चल रही थी इस युद्ध क कारण रार्ज्य के अधिकार क्षेत्र को लेकर थार्। कौरव अपने रार्ज्य से सूर्इ के नोंक के बरार्बर जमीन देने को तैयार्र नहीं थे। जबकि पूर्व में ही सहमति दी गयी थी इस वचन से विमुक्त होने पर युद्ध की पृश्ठ भूमि तैयार्र होनार् तय हो गयार् थार्। दोनो पक्ष से श्रेष्ठ वीर युद्ध भूमि में उपस्थित थे शार्रीरिक बल प्रयोग से इस झगडे क निपटार्रार् होनार् है। कुरूक्षेत्र के युद्ध भूमि में एक तरफ पार्ण्डव सेनार् और दूसरी ओर कौरव सेनार् युद्ध के लिये सन्नद्ध खडी है। भगवार्न कृष्ण अर्जुन के सार्रथि है और रथ को दोनों सेनार्ओं के मध्य ले जार्कर जब खडार् कर देते है तब अर्जुन को मोह हो जार्तार् है। क्योंकि सभी लोग युद्ध में अपने ही सगे सम्बन्धी थे अर्जुन को श्री कृष्ण समझार्ते हुये कहते हैं कि अपने स्वधर्म अर्थार्त् क्षत्रिय धर्म क पार्लन करो और अधर्म क नार्श करके धर्म को विजयी बनार्ओ तर्क-वितर्क बुद्धि युक्त अर्जुन को बार्रम्बार्र श्री कृष्ण ‘स्वधर्म’ और अपने ‘स्वभार्व’ के अनुसार्र निश्काम कर्म क पार्लन करने क उपदेश देते हैं। ध्यार्तव्य है कि गीतार् क उपदेश समार्प्त होने पर श्री कृष्ण ने केवल यही कहार् है कि ‘‘यथेच्छसि तथार् कुरू’’ अर्थार्त् (गीतार् 18/63) जैसी तुम्हार्री इच्छार् हो वही करो और अर्जुन ने उत्तर दियार्- आपकी कृपार् से मेरार् मोह नश्ट हो गयार् है। अत: जैसार् आपने कहार् है वैसार् ही करूंगार्-

‘‘करिश्ये वचनं तव’’ (गीतार् 18/73) 

इस प्रकार हम देखते है कि सम्पूर्ण गीतार् में श्री कृष्ण परमार्त्मार् के रूप में प्रतिश्ठित हैं। श्री कृष्ण अर्जुन को निश्काम कर्म क सदुपदेश देते हैं । गीतार् के ‘‘अश्टार्दश’’ अध्यार्य के विषय में अर्थार्त् 18 अंक को देखार् जार्य तो यह परिलक्षित होतार् है कि सम्पूर्ण चरार्चर जगत की साथकतार् 18 अंको में ही समार्विश्ट है। क्योंकि जगत में 4 वेद, 4 युग, 4 वर्ण, 4 आश्रम इन्हीं सोलह “ार्ार्खार्ओं रूपी वृक्ष के ऊपर जीवार्त्मार् और परमार्त्मार् रूपी दो पक्षियों क चिर निवार्स है जो मिलकर 18 हो जार्ते हैं-

‘‘ द्वार्सुपर्णार् सुयजार्सखार्यार् समार्नं वृक्षं परिशस्वजार्ते’’ (मु0 उप03/1/5) 

महर्षि कृष्ण द्वैपार्यन वेद व्यार्स को 17 पूरार्णों की रचनार् के बार्द भी आध्यार्त्मिक शार्न्ति नहीं प्रार्प्त हुर्इ है। वे 18 वें महार्पुरार्ण के रूप में श्री कृष्ण भक्ति भार्वनार् से ओत-प्रोत श्रीमदभार्गवदगीतार् महार्पुरार्ण वर्णित कियार्। वेद व्यार्स महार् पुरूष थे। उन्होने महार्भार्रत के लौकिक कौरव- पार्ण्डव के महार्भार्रत के युद्ध को श्रीमदभगवदगीतार् में दैव तथार् आसुर स्वभार्व के अन्र्तद्वन्द क चित्र इस प्रकार चित्रित कियार् है कि विवेक और विचार्रपूर्वक मनन करके सम्पूर्ण चरार्चर जगत क एक मार्त्र स्वार्मी जीवार्त्मार् मोह मयी निद्रार् से जार्गृत होकर अधिभौतिक जगत कि नश्वरतार् को भली-भार्ंति समझ लेतार् है और जरार्मृत्यु के भय से सर्वदार् मुक्त हो जार्तार् है महर्षि 18 अंको की प्रेरणार् सम्भवत: यहीं से मिली हुर्इ होगी। क्योंकि उन्होनें महार्भार्रत ग्रन्थ को 18 पर्वार्त्मक ही रचार्। और उसके महार् संग्रार्म की अवधि 18 दिन तथार् गीतार् रूप महार्योग शार्स्त्र क ज्ञार्न और कर्म रूपी तत्व क वर्णन भी गीतार् के 18 अध्यार्यों में कहकर वर्णित कियार् गयार् है। जिससे प्रार्णियों को परमपद क माग सुनिश्चित रूप से प्रार्प्त हो सके।

3. गीतार् की श्लोक संख्यार् – 

गीतार् की श्लोक संख्यार् को लेकर विद्वार्नों में प्रार्चीन काल से लेकर आज तक मतभेद विद्यमार्न है। आचाय शंकर ने गीतार् पर अपनार् श्रीमदभगवद गीतार् शार्ंकरभार्श्य लिखार् है और सार्थ ही श्लोंको की संख्यार् 700 मार्नकर गीतार् भार्श्य की रचनार् की थी। परवर्ती भार्ष्यकार, टीकाकार और व्यार्ख्यार्कारों ने शंकर के ही मत को स्वीकार कियार् है। महार्भार्रत के भीष्मपर्व के 43 अध्यार्य के चौथे और पार्ंचवें श्लोकों में वैषम्पार्यन ने भगवदगीतार् की प्रषंसार् करते हुये कहार् है-

‘‘शट्षतार्नि सविंषार्नि श्लोकानार्ं प्रार्ह केषव:। 

अर्जुन: सप्तपंचार्षं सप्तशश्ठि च संजय:।। 

धृतरार्ष्ट्र: श्लोकमेकं गीतार्यार्: मार्नमुच्यते।’’ 

अर्थार्त् गीतार् में श्री कृष्ण के द्वार्रार् कथित श्लोंकों की संख्यार् 620 है, अर्जुन कथित 56 श्लोक है तथार् संजय कथित 67 और धृतरार्श्ट्र कथित एक श्लोक है। इस प्रकार उपर्युक्त यदि सभी श्लोकों की संख्यार् परिगणित की जार्य तो 745 हो जार्येगी। आधुनिक विद्वार्नों में भी श्लोक संख्यार् को लेकर मतभेद उपस्थित है और आधुनिक लोग गीतार् के आकार को अपूर्ण मार्नते है। इस प्रकार कुछ लोग तो गीतार् की श्लोक संख्यार् 745 ही मार्नते किन्तु वर्तमार्न मे प्रचलित गीतार् की श्लोक संख्यार् 700 ही मार्नी जार् रही है। महार्भार्रत के भीष्मपर्व के 25 से 42 अध्यार्य की भगवदगीतार् भी 700 श्लोकों में पूर्ण है। कहीं-कहीं पर श्री भगवार्नुवार्च, संजयउवार्च, अर्जुनउवार्च, धृतरार्श्ट्रउवार्च आदि कुल 58 उक्तियों में श्लोक संख्यार् नहीं दी गयी हैं इसी प्रकार दुर्गार् सप्तशती भी 700 श्लोंको में पूर्ण में है। उसमे माकण्डेयउवार्च, वैश्यउवार्च इत्यार्दि 56 उवार्चार्त्मक वार्क्यों को भी क्रमिक श्लोक संख्यार् के रूप में चण्डी के 700 श्लोंकों के अन्तर्गत लियार् गयार् है।

महार्भार्रत में वैशम्पार्यन की उक्ति के अनुसार्र गीतार् की श्लोक संख्यार् 745 होती है। और वह भी धृतरार्श्ट्रउवार्च 9, अर्जुनउवार्च-20, श्री भगवार्नुवार्च-28 ऎसी कुल 58 उक्तियों को महार्भार्रत के 700 श्लोंको के अन्तर्गत नहीं कियार् गयार् है, और इसी कारण गीतार् की श्लोक संख्यार् में कुछ भेद परिलछित होतार् है। यथाथ में भी जो मूल महार्भार्रत है उसमें भी 700 श्लोक ही प्रार्प्त होते हैं और मूल महार्भार्रत श्लोकों के अवलम्बन से ही आचाय शंकर ने अपने भार्श्य की रचनार् की थी।

4. प्रमुख टीकाकार 

गीतार् हिन्दू धर्म क प्रार्चीन ग्रन्थ है और यह प्रस्थार्नत्रयी के अन्तर्गत समार्वेशित है। इसकी प्रमार्णिकतार् उपनिशदों और ‘ब्रम्हसूत्र‘ के बरार्बर मार्नी गयी है। भार्रत में जब बौद्ध धर्म क हरार्स हो गयार् थार् उस समय विभिन्न धर्म और उसके धर्मार्वलम्बी अपने-अपने मत को उत्कृष्ट रूप प्रदार्न करने के लिए उठ खडे हुये जिनमें से प्रमुख-अद्वैवत वार्द, द्वैतवार्द, शुद्धार्द्वैतवार्द, विशिष्टार्द्वैतवार्द आदि प्रमुख थे। गीतार् की विभिन्न टिकायें आचायों द्वार्रार् एक ओर अपने मत के समर्थन, प्रोत्सार्हन और वृद्धि के लिए लिखी गयी तथार् दूसरी ओर दूसरे सम्प्रदार्यों के खण्डन के लिए लिखी गर्इ है।

शंकरार्चाय की टीक (र्इ0 सन् 788-820) इस समय विद्यमार्न टीकाओं में सबसे प्रार्चीन है इससे भी पूरार्नी अन्य टीकायें की जिनक नार्म निर्देश शंकरार्चाय ने अपनी भूमिक में कियार् है। परन्तु वे इस समय प्रार्प्त नहीं होती है। शंकरार्चाय के दृष्टिकोण क विकास आनन्दगिरि ने जो सम्भवत: 13 वीं शतार्ब्दी में हुये तथार् इनके बार्द श्रीधर (1400र्इ0सन्) ने और मधुसूदन (16वीं शतार्ब्दी) ने तथार् अन्य परवर्ती लेखकों ने कियार्। रार्मार्नुज ने (11वीं शतार्ब्दी र्इ0) ने अपनी टीक में संसार्र की अवार्स्तविकतार् और कर्म त्यार्ग के माग के सिद्धार्न्त क खण्डन कियार् उसमें यमुनार्चाय द्वार्रार् अपने ‘गीताथ संग्रह’ में प्रतिपार्दित व्यार्ख्यार् क अनुसरण कियार् रार्मार्नुज ने गीतार् पर अपनी टीक में एक प्रकार क वैयक्तिक रहस्यवार्द विकसित कियार् है और ये भगवार्न विश्णु को ही एक मार्त्र सच्चार् देवतार् स्वीकार करते हैं।

मध्व ने (र्इ0सन् 1199-1276) तक भगवदगीतार् पर दो ग्रन्थ ‘गीतार्भार्श्य’ और ‘गीतार्तार्त्पर्य’ लिखें उसमें गीतार् में से द्वैतवार्द के सिद्धार्न्त को ढूंढ निकालने क प्रयार्स कियार् है। यह मार्नते हैं कि आत्मार् और परमार्त्मार् को एक तरह से तदनुरूप न मार्नकर भिन्न मार्नन चार्हियें। ‘वहतू है’ अर्थार्त् ‘तत्वमसि’ क अर्थ करते हुये कहते हैं कि हमें मेरे तेरे के भेदभार्व को त्यार्ग देनार् चार्हिये और समझनार् चार्हिये कि प्रत्येक वस्तु भगवार्न के नियन्त्रण के अधीन है।

नीम्बाक (1162र्इ0सन्) में द्वैतार्द्वैत के सिद्धार्न्त को अपनार्यार् और ब्रम्हसूत्र पर टीक लिखी इनके शिष्य केशव कश्मीरी ने गीतार् पर एक टीक लिखी जिसक नार्म ‘‘तत्वप्रकाशिका’’ है।

गीतार् पर अनेक टीक कारों ने अपने-अपने समय में बार्ल गंगार्धर तिलक और अरविन्द, गार्ंधी की टीकायें मुख्य है और सबके अपने-अपने विचार्र हैं।

सन्दर्भग्रन्थ 
यदीयं तदीयम् इति भेदम आपहार्य सर्वम् र्इश्वरार्धीनम् इति स्थिति:। (भार्गवत-तार्त्पर्य)।

डार्0 रार्धार्कृष्णन लिखते हैं कि उपदेश देते समय कृष्ण के लिए युद्ध क्षेत्र में 700 श्लोकों को पढ़नार् सम्भव नहीं हुआ होगार् उन्होनें कुछ थोडी सी बार्तें कहीं होगी जिन्हें बार्द के लेखको नें विस्तार्रित कर दियार्।

‘‘भगवदगीतार् उस महार्न आन्दोलन के बार्द की, जिसक प्रतिनिधित्व प्रार्रम्भिक उपनिशद् करते हैं और दाशनिक प्रणार्लियों के विकास और उनके सूत्रों में बंध जार्ने के काल से पहले की रचनार् है। इसकी प्रार्चीन वार्क्य रचनार् और आन्तरिक निर्देशों से हम यह परिणार्म निकाल सकते हैं कि यह निश्चित रूप से र्इ0पू0 काल की रचनार् है इसक काल र्इ0पू0 5वीं शतार्ब्दी कहार् जार् सकतार् है, हलार्ंकि बार्द में भी इसके मूल पार्ठ में अनेक हेर-फेर हुये हैं।’’

1. हमें गीतार् के रचयितार् क नार्म मार्लूम नहीं है। भार्रत के प्रार्रम्भिक सार्हित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लेखकों क नार्म अज्ञार्त हैं यद्यपि गीतार् की रचनार् क श्रेय व्यार्स को दियार् जार्तार् है, जो महार्भार्रत क पौरार्णिक संकलन कर्तार् है। गीतार् के 18 अध्यार्य महार्भार्रत के भीष्मपर्व के 23-40 तक के अध्यार्य हैं।

गावे मार्नतें है कि गीतार् पहले सार्ंख्य योग सम्बन्धी ग्रन्थ थार्। जिसमें बार्द में कृष्ण वसुदेव पूजार्पद्धति आ मिली और र्इ0पू0 तीसरी शतार्ब्दी में इसक मेल-मिलार्प कृष्ण को विश्णु क रूप मार्नकर वैदिक परम्परार् के सार्थ बिठार् दियार् गयार्। मूल रचनार् र्इ0ूप0 200 में लिखी गयी थी और इसक वर्तमार्न रूप र्इ0 की दूसरी शतार्ब्दी में किसी वेदार्न्त के अनुवार्यी द्वार्रार् प्रस्तुत कियार् गयार् है। गर्वे के सिद्धार्न्त को दाशनिक लोग समार्न्यतयार् अस्वीकार करते हैं।

‘कीथ’ मार्नते है कि मूलत: गीतार् श्वेतार्श्वतर उपनिशद की तरह थी, बार्द में उसे कृष्ण पूजार् के अनुकूल बनार्यार् गयार् होगार्। हौल्टजमन गीतार् को सर्वेष्वरवार्दि कवितार् क रूप मार्नते हैं। जो बार्द में विश्णु प्रधार्न हो गयार् है। रूडोल्पओटो के अनुसार्र ‘‘मूलगीतार् महार्काव्य क एक शार्नदार्र खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार क कोर्इ सैद्धार्न्तिक सार्हित्य नहीं थार् जैकोबी क ओटो से मतैक्य है।’’

अपने प्रयोजन के लिये हम गीतार् के उस मूलपार्ठ को अपनार् सकते है जिस पर शंकरार्चाय की टीकाएं एवं भार्श्य उपलब्ध है। क्योंकि गीतार् की सबसे पुरार्नी टीक शंकरभार्श्य ही अत्यन्त प्रार्चीन रूप में उपलब्ध है।

प्रो0 काषीनार्थ बार्बू ने एक सार्म्प्रदार्यिक श्लोक के अधार्र पर श्री शंकरार्चाय क जन्मकाल 845 विक्रमीसंवत (शक् 710) निश्चत कियार् है। अत: आचाय शंकर के जन्म से दो-तीन सौ वर्ष पूर्व ही गीतार् लगभग शक् 400 तक प्रकाश में आ चुकी थी। पार्ष्चार्त्य विद्वार्न तैलंग ने कालिदार्स और बार्णभट्ट को गीतार् से परिचित बतलार्यार् है। कालिदार्स कृत रघुवंश में (10-39) विश्णु की स्तुति में ‘‘अनवार्प्तमवार्प्तव्यं न ते किंचन विद्यते्’’ इस श्लोक को गीतार् के (3.22) नार्न-वार्प्तवार्प्तव्यं’’ श्लोक से संभवत: ग्रहण कियार् गयार् होगार् और बार्णभट्ट के ‘‘महार्भार्रतमिवार्वार्नन्तगीतार्कर्णनार् नन्दितरं’’ इस “लेश प्रधार्न वार्क्य में गीतार् की झलक दिखलाइ पड़ती है। यह तथ्य और अधिक स्पष्ट हो जार्तार् है जब एक 691 संवत (शक 556) के शिलार्लेख में कालिदार्स और भार्रवि क नार्म उल्लिखित प्रार्प्त होतार् है। और बार्णभट्ट हर्श के समकालिन मार्ने जार्तें है। इन प्रमार्णो से गीतार् क “ार्क् 400, 500 से कम से कम 200 वर्ष पहले ही महार्भार्रत में भीष्मपर्व में होनार् निश्चित होतार् है।

भार्रतीय विद्वार्न यह मार्नते हैं कि गीतार् में परस्पर विरोधी लगनेवार्ली विचार्रधार्रार्ओं क विवेचन अवश्यक कियार् गयार् है। परन्तु समस्त तत्व बिखरे न होकर आबद्ध हैं। इससे सिद्ध होतार् है कि गीतार् की रचनार् एक बार्र ही हुर्इ होगी। गीतार्कार में भार्गवत धर्म के प्रभार्व को बढ़तार् देखकर उपनिशदों के सिद्धार्न्तों क नये भक्ति आन्दोलन के सार्थ समन्वित करने क प्रयार्स कियार् है। इसी कारण गीतार् में विभिन्न विचार्र धार्रार्यें मिलती हैं। डार्0 रार्धार्कृष्णन ने इसे 5वीं शतार्ब्दी र्इ0पू0 की रचनार् मार्नार् है। जो सत्य के निकट सिद्ध होतार् है। गीतार् क प्रार्रम्भिक उपनिशदों र्इश, केन, कठ से सम्बन्ध थार् और वेदों के प्रति भी दृष्टिकोण उपनिशदों के समार्न ही थार्। गीतार् में बौद्ध धर्म क परिचय न मिलनार् यह सिद्ध करतार् है कि उस समय प्रचार्र प्रसार्र नहीं रहार् होगार्। शड्दर्शनों में से केवल सार्ंख्य और योग क ही विशद वर्णन मिलतार् है इससे यह स्पष्ट होतार् है कि गीतार् की रचनार् दाषनिक सम्प्रदार्यों के अभ्युदय़ पूर्व ही हो चुकी थी।

5. गीतार् के अष्टार्दश अध्यार्यों क सार्र संक्षेप 

सम्पूर्ण गीतार् ग्रन्थ अष्टार्दश अध्यार्यों में रचित है प्रत्येक अध्यार्य ही एक-एक योग हैं गीतार् के प्रथम अध्यार्य क नार्म अर्जुन विशार्द योग है। गीतार् की पृश्ठ भूमि युद्ध क्षेत्र है। भगवार्न कृष्ण अपनी अवतार्र लीलार् में अधर्म क नार्श और धर्म उत्थार्न करने के लिए अवतरित हुये हैं। कौरव और पार्ण्डवों में रार्ज्य के अधिकारी को लेकर युद्ध होनार् अवश्य सम्भार्वी हो गयार् है। कौरव पक्ष में 11 अक्षौहिणी और पार्ण्डव पक्ष में सार्त अक्षौहिणी सेनार् सुसज्जित होकर कुरूक्षेत्र के मैदार्न पर खडी है। “ार्ार्रीरिक बल प्रयोग से ही इस युद्ध क निपटार्रार् होनार् है और दोनो तरफ की सेनार्ओं के बीच में अर्जुन खडे होते हैं और जब नजर उठार्कर देखते है तो सभी सगे सम्बन्धी दिखाइ देते है और अर्जुन क मन क्षुब्ध हो जार्तार् है कि भिक्षार् वृद्धि करके जीवन यार्पन कर लूंगार् लेकिन अपनो को नहीं मार्रूंगार् तब भगवार्न श्री कृष्ण किंकर्तव्य विमूढ़ अर्जुन को गीतार् क उपदेश देते है जो अष्टार्दश अध्यार्य वार्ली श्री मदभगवदगीतार् में वर्णित है। अर्जुन क शरीर कांपने लगार्, गलार् सूख गयार्, शरीर शिथिल होने से गार्ण्डीव धनुश हार्थ से नीचे गिर पड़ार् प्रश्न उठतार् है कि अर्जुन ने इस परिवर्तन के लिए उत्तर दार्यी कौन है। फिर यह भी सोचने पर विवश हो जार्तार् है कि जब स्वयं भगवार्न श्री कृष्ण अर्जुन के सार्रथि है तो इस प्रकार की जड़तार् और तार्मसिकतार् कैसे अर्जुन जैसे महार्वीर को आच्छार्दित कर लेती है। श्री कृष्ण अर्जुन को भरी बार्तों से ही समझार्ते हैं कि- ‘‘तुम शोक करने के अयोग्य व्यक्तियों के लिये शोक कर रहे हो, और पण्डितों की तरह बार्त कर रहें हो। अत: युद्ध के लिए तुम दृढ़ प्रतिज्ञ होकर उठ खडे होओ।’’

अषोच्यार्नन्वशोचस्त्वं प्रज्ञार्वार्दार्ंष्च भार्शसे। 

तस्मार्द् उत्तिश्ठ कौन्तेय, युद्धार्य कृत निश्चय:।। 

श्री कृष्ण के समझार्ने पर भी अर्जुन की दुर्बलतार् और कायरतार् कम होने क नार्म नहीं ले रही हैं कैसार् दुर्योग है। श्री कृष्ण को लगभग दो घण्टे तक 18 अध्यार्य वार्ली गीतार् क उपदेश देनार् पडार् तथार् अनेक प्रकार के वचनों क आश्रय लेनार् पड़ार् इस अध्यार्य में देखेंगे कि श्री कृष्ण परमार्त्मार् रूप होते हुये भी अर्जुन के मन के भी सार्रथि बन गये है और उनकों क्षत्रियोचित कर्तव्य यार्द दिलार्कर कल्यार्ण माग में परिचार्लित किये हैं। यथाथ में श्री कृष्ण ‘भवरोग-वैद्य’ थे गीतार् में अर्जुन के मार्ध्यम से समूची मार्नव जार्ति की मनोवृत्तियों क विश्लेषण हुआ है।

गीतार् के द्वितीय अध्यार्य क नार्म ‘सार्ंख्य योग’ है इसमें 72 श्लोक समार्विष्ट है। सार्ंख्य शब्द क अर्थ है ज्ञार्न और योग क अर्थ है कर्म ज्ञार्न और कर्म पर सम्मिलित रूप से विशेष चर्चार् होने के कारण इस अध्यार्य क नार्म सार्ंख्य योग रखार् गयार् है। अर्जुन क विशार्द दूर करने के लिए इस अध्यार्य में विशेषतयार् श्री कृष्ण द्वार्रार् आत्मतत्व क उपदेश दियार् गयार् है आत्मार् और शरीर की नित्यतार्-अनित्यतार् क वर्णन कियार् गयार् है। उसके पष्चार्त श्री कृष्ण ने निष्काम कर्म योग के सम्बन्ध में भी उपदेश दिये है। निश्काम कर्म योग नार्मक उपदेश यद्यपि अर्जुन को भले ही लक्ष करके प्रकट कियार् गयार् है। तब भी समस्त बुद्धिजीवी सदसद विवेकी मनुष्य जार्ति के लोग इनसे विशेष रूप से उपकृत होंगे ज्ञार्न ओर कर्म क विरोध सनार्तन युग से चलार् आ रहार् है कि ज्ञार्न श्रेष्ठ है कि कर्म श्रेष्ठ है। इस प्रकार के प्रश्न क उत्तर देने में इस अध्यार्य क महत्व पूर्ण योग दार्न है। निश्काम कर्म योग के सार्थ ज्ञार्न क मेल करके निश्काम भक्ति रूप से अमृत रस से सिंचित होकर यह अध्यार्य मंगल मय दीपशिखार् की तरह मनुष्यों के जीवन को अवलोकित कर सुशोभित हो रही है निष्काम कर्म, भक्ति, ज्ञार्न तीनों के संयोग के परिणार्म स्वरूप भी परम लक्ष्य ‘स्थितप्रज्ञ’ एवं आत्मस्वरूप सार्क्षार्त्कार रूपी अवस्थार् को प्रार्प्त होतार् है। इसी को ब्रार्ह्मी स्थिति कहते हैं। ब्रार्ह्मी स्थिति ही मोक्ष है। ब्रार्ह्मी स्थिति को प्रार्प्त कर लेने के पष्चार्त् मनुष्य निश्काम भार्व से अपने वर्ण और आश्रम के शार्स्त्रविहित कर्म करके अन्त में ब्रह्म निर्वार्ण यार् ‘मोक्ष’ को प्रार्प्त करतार् है। इस अध्यार्य में 20 वें श्लोक के बार्द ही श्री कृष्ण अर्जुन संवार्द आरम्भ होतार् है।

तृतीय अध्यार्य क नार्म ‘कर्मयोग’ है। इसमें मार्त्र 43 श्लोक वर्णित है शोक मोह ग्रस्त अर्जुन के प्रश्न पूंछने पर श्री भगवार्न ने ज्ञार्न और कर्म क मेल करके इस अध्यार्य में विशेष रूप से कर्म मार्हार्त्म्य और स्वधर्म पार्लन क उपदेश दियार् है। सन्यार्सियों के लिए ज्ञार्न योग और अन्य के लिए कर्म योग क उपदेश दिये हैं। अनार्शक्त भार्व से र्इश्वरापित बुद्धि से कर्म करनार् ही कर्मयोग है। कर्मयोगी फल सहित सभी कर्म श्री भगवार्न को अर्पित कर देतार् है। तथार् कर्तृत्वभिमार्न क त्यार्ग कर देतार् है। दोनों ही कठिन सार्धनार्यें हैं। श्री मदभगवदगीतार् मनुष्य मार्त्र के अनुभव पर आधार्रित ग्रन्थ है। मनुष्य ही परमार्त्मार् प्रार्प्ति क एक मार्त्र अधिकारी है। इस प्रकरण में भगवार्न ने कहीं भी बुद्धि शब्द क प्रयोग नहीं कियार् है। क्योंकि नित्य और अनित्य, सत् और असत्, अविनार्शी और विनार्शी, शरीर और शरीर को अलग-अलग समझने के लिए ‘विवेक’ की ही आवश्यकतार् है। ‘बुद्धि’ की नहीं विवेक बुद्धि से परे है विवेक बुद्धि में प्रकट होतार् है, बुद्धि विवेक में नहीं कर्मयोग प्रकरण में बुद्धि के विशेषतार् बतलाइ गयी है कि ‘‘व्यवसार्यित्मक बुद्धिरेकेह’’ अर्थार्त् बुद्धि में निश्चय कि प्रधार्नतार् होती है। इस तरह कर्मयोग में निष्यचयार्त्मिक बुद्धि की अत्यन्त आवश्यकतार् बतार्ने के बार्द भगवार्न अर्जुन को समभार्व पूर्वक कर्तव्य कर्म करने के लिए विशेष रूप से कहते हैं- जैसे कर्मण्येवार्धिकारस्ते’ (2/47) ‘योगस्थ: कुरूकर्मणि (2/48) बुद्धौशरणमन्विच्छ (2/49), योग: कर्मसुकौशलम्(2/50)

आदि श्लोकों में भगवार्न अर्जुन को समभार्व पूर्वक कर्तव्य कर्म करने के लिए प्रेरित करते है इसी अध्यार्य में जनकादि क उदार्हरण सम्मुख रखकर अर्जुन को लोकसंग्रह क महत्व बतलार्ते है, इसकी साथकतार् सिद्ध करते है। समबुद्धि रूपी कर्मयोग के द्वार्रार् परमेश्वर को प्रार्प्त हुये स्थितप्रज्ञ सिद्ध पुरूष के लक्षण, आचरण और महत्व क भी प्रतिपार्दन इसी अध्यार्य में कियार् गयार् है।

श्री मदभगवदगीतार् के चतुर्थ अध्यार्य क नार्म ‘ज्ञार्नयोग’ है। इसमें 42 श्लोक वर्णित है इस चतुर्थ अध्यार्य में भगवार्न ने अपने अवतरित होने के रहस्य और तत्व के सहित कर्म योग तथार् सन्यार्स योग क अर्थ इन सबके फलस्वरूप जो परमार्त्मार् के तत्व यथाथ ज्ञार्न है। उसक वर्णन कियार् है इसलिये इसक नार्म ज्ञार्नकर्मसन्यार्सयोग भी कहार् जार्तार् है इसमें प्रार्रम्भ में कर्मयोग की प्रशंसार् की गयी है इसी अध्यार्य में चतुर्थ वर्णों की उत्पत्ति, जन्म कर्मरूप लीलार्तत्व, कर्म अकर्म और विकर्म क विश्लेशण, ज्ञार्न क्यार् है, ज्ञार्न लार्भ क उपार्य, फल और अधिकारी क विचार्र, वर्ण भेद, कर्मभेद, ज्ञार्न लार्भ के बहिरंग और अन्तरंग सार्धन आदि अनेक आध्यार्त्मिक विषयों क उपदेश दियार् है। निश्काम कर्म योग के मार्ध्यम से ही ‘ज्ञार्नयोग’ को प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। क्योंकि भगवार्न स्वयं कहते है- ‘‘सर्वकर्मार्खिलंपाथज्ञार्नंपरिसमार्प्यते- हे अर्जुन, समस्त कर्म ज्ञार्न उत्पन्न होने पर समार्प्त हो जार्ते है कर्म, योग, भक्ति और ज्ञार्न अलग-अलग न होकर परस्पर एक दूसरे के सहार्यक है। और अन्तत: श्री भगवार्न के स्वरूप परमधार्म की प्रार्प्ति करार् देते हैं। उस अध्यार्य में वर्ण विभार्ग क भी वर्णन कियार् गयार् है- ‘चार्तुर्वण्र्य मयार् सृश्टं गुण कर्म विभार्गष:’। मार्नव समार्ज को धर्म समार्ज परिवर्तित करने के लिए वर्ण विभार्ग की व्यवस्थार् की गयी इससे यह संकेत मिलतार् है कि श्री भगवार्न भी जिनके लिए कुछ भी अप्रार्प्त नहीं है वह भी र्निलिप्त होकर कर्म क सम्पार्दन करते है। इससे कर्म करने की पद्धति क यथाथ संकेत मिलतार् है। इसके अनन्तर वार्ह्य कर्म, विविध लार्क्षणिक यज्ञों की विशेषतार्, ज्ञार्न यज्ञ की श्रेष्ठतार्, ज्ञार्न क्यार् है, ज्ञार्न लार्भ क उपार्य क्यार् है। इसके फल और अधिकारी क विचार्र आदि अनेक तत्वों की आलोचनार् इस अध्यार्य में की गयी है। यज्ञों क वर्णन करके इसके भेद बतार्ये गये हैं तथार् इसमें द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षार् ज्ञार्न यज्ञ को उत्तम बतलार्यार् गयार् है।

29 श्लोक युक्त इस गीतार् के पंचम अध्यार्य में कर्म योग निश्ठार् और सार्ंख्य योग निश्ठार् क वर्णन हुआ है। सार्ंख्य योग को ही सन्यार्स नार्म से अभिहित कियार् जार्तार् है इसलिये अध्यार्य क नार्म कर्म सन्यार्स योग रखार् गयार् है। इसमें अर्जुन भगवार्न से पूछते हैं कि सार्ंख्य योग और कर्म योग में कौन श्रेष्ठ है। इसके उत्तर में भगवार्न स्पष्ट करते है कि दोनो ही श्रेष्ठ और कल्यार्ण कारक है। परन्तु कर्म सन्यार्स की अपेक्षार् कर्मयोग भी श्रेष्ठ है इस अध्यार्य के 10वें और 11वें श्लोक में भगवत दर्पण बुद्धि से कर्म करने वार्ली की और कर्म प्रधार्न कर्म योगी की प्रशंसार् करके कर्मयोगियों के कर्मों को आत्मशुद्धि में हेतु बतलार्यार् गयार् है। आगे कहार् गयार् है कि अज्ञार्न के द्वार्रार् जब ज्ञार्न आवृत्त हो जार्तार् है तब जीव को मोह मार्यार् घेर लेती है। इसलिये ज्ञार्न क महत्व बतलार्यार् गयार् है और ज्ञार्न योग के एकान्त सार्धन क भी वर्णन कियार् गयार् है इस अध्यार्य में 22वें श्लोक में भोगों को दु:ख क कारण और विनार्श शील बतलार्यार् गयार् है तथार् विवेकी व्यक्ति को इससे आसक्त नार् होने की बार्त कही गयी है। योगी के विषय में कहार् गयार् है जो काम क्रोध के वेग को सहन कर लेतार् है वही पुरूष योगी और सुखी है इस अध्यार्य में यह ध्यार्न देने योग्य है कि भगवार्न ने यह कहीं भी नहीं कहार् है कि कर्म, अकर्म, विकर्म सब कुछ छोडकर सन्यार्सी हो जार्ओं यथाथ रूप में यह कहार् है कि पूर्णतयार् कर्म फल क परित्यार्ग करके कर्मयोगी यार् नित्य सन्यार्सी होने क ही आदेश दियार् है। कर्म त्यार्ग यार् स्वधर्म त्यार्ग गीतार् क उपदेश नहीं है अपितु स्वधर्म पार्लन और कर्म फलत्यार्ग गीतार् क उपदेश है क्योंकि कर्म त्यार्ग करके संसार्र में रहनार् सम्भव नहीं है। केवल वैरार्ग्य सम्पन्न व्यक्ति ही कर्म त्यार्ग करके सन्यार्सी हो सकते हैं। श्री भगवार्न ने स्वयं कहार् है कि- ‘न हि कश्चित् क्षणमपि जार्तु तिश्ठत्यकर्मकृत’ इत्यार्दि अर्थार्त किसी भी अवस्थार् में क्षण भर भी ज्ञार्नी यार् अज्ञार्नी कोर्इ भी कर्म बिनार् किये रह नहीं सकतार् है क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण, रार्ग, द्वेश आदि बार्ध्य करके कर्म करार्ते है। इस अध्यार्य क मुख्य उद्देश्य यह है कि फलार्शक्ति ही बन्धन क कारण है, फल क त्यार्ग ही यथाथ सन्यार्स और आसक्ति त्यार्ग ही मोक्ष है। इसी प्रकार सत्य तक क निर्णय कियार् गयार् है।

गीतार् के शश्ठ अध्यार्य में 46 श्लोक है और इस अध्यार्य क नार्म “ध्यार्नयोग” है। ध्यार्नयोग में शरीर,इन्द्रिय, मन और बुध्दि क संयम करनार् परमार्वश्यक है तथार् शरीर, इन्द्रिय, मन और बु़िध्द इन सबको आत्मार् के नार्म से कहार् जार्तार् है। और इस अध्यार्य में इन्हीं के विशेष संयम क वर्णन है इसलिये इस अध्यार्य क नार्म “आत्मसंयमयोग” रखार् गयार् है ध्यार्नयोग बहुत कठिन है। इसलिये इसके लिये विविध प्रकार के प्रयत्न की आवश्यकतार् होती है। यम, नियम, आसन, प्रार्णार्यार्म, प्रत्यार्हार्र, धार्रणार्, ध्यार्न और समार्धि के मार्ध्यम से ही ध्यार्नयोग के ब्रार्ह्मी स्थिति की अवस्थार् प्रार्प्त होती है। इन योगार्ंगो के मार्ध्यम से तथार् अभ्यार्स और वैरार्ग्य क आलम्बन लेकर चंचल मन और इन्द्रियों को वश में कियार् जार् सकतार् है इस अध्यार्य में भगवार्न ने एक आशार् की वार्णी सुनाइ है शुभ कर्म करने वार्लों को कभी दु:ख नही होतार् है

“न हि कल्यार्णकृतकश्चिद् दुर्गतिं तार्त गच्छति” और भी “स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रार्यते महतो भयार्त्” अर्थार्त धर्म कर्म क अति अल्प अनुश्ठित होने पर भी वह अन्त में हमें मृत्यु भय और नरक भय से मुक्त करके ब्रह्मपद की यार् चरम लक्ष्य की प्रार्प्ति करार् देतार् है किन्तु वह धर्म कर्म निश्काम भार्व से ही करनार् चार्हिये इस अध्यार्य के 46वें श्लोक में योगी की महिमार् बतलार्कर अर्जुन को योगी बनने की आज्ञार् दी गयी है और 46वें श्लोक में सब योगियों में से अनन्य प्रेम से श्रध्दार् पूर्वक भगवार्न क भजन करने वार्ले योगी की प्रसंशार् करके इस अध्यार्य क उपसंहार्र कियार् गयार् है निश्कामकर्मी, निश्कामयोगी, निश्कामज्ञार्नी और निश्कामभक्त सभी श्री भगवार्न के परमपद को प्रार्प्त होते हैं ऎसार् कहकर भगवार्न ने ज्ञार्न, कर्म, योग और भक्ति क समन्वय स्थार्पित कियार् है।

गीतार् के सप्तम अध्यार्य क नार्म ‘ज्ञार्नविज्ञार्नयोग’ है इस अध्यार्य में कुल 30 श्लोक वर्णित है। इस अध्यार्य की संज्ञार् से प्रतीत होतार् है कि जिस विशेष आयोग के आलम्बन से ज्ञार्न और विज्ञार्न क विकास होतार् है उसी क िवेस्तृत वर्णन कियार् गयार् है श्री कृष्ण ने आार्गे कहार् है कि जो मनुष्य केवल इतनार् जार्न गयार् है कि ‘र्इश्वर है’ वह ज्ञार्नी है और लकडी में आग है, इसको जो जार्ने वह भी ज्ञार्नी है किन्तु लकडी जलार्कर रसोर्इ पकानार् और खार्नार् तथार् पूर्ण परितृप्त हो जार्नार्, जिसको इसक ज्ञार्न होतार् है उसे विज्ञार्नी कहते हैं। अर्थार्त कहने क तार्त्पर्य यह है कि ब्रह्म को शब्द और अर्थ से जार्नने क नार्म ‘ज्ञार्न’ है और ब्रह्म को विशेष रूप से जार्नकर उसमें निरन्तर विलार्स करनार्, ब्रह्मार्नन्द में डूबार् रहनार् विज्ञार्न है उन्होंने विज्ञार्नी के लक्षण में बतार्यार् है कि विज्ञार्नी के 8पार्श (बन्धन)खुल जार्ते हैं केवल काम क्रोध आदि क आकार मार्त्र रहतार् है विज्ञार्नी सदार् र्इश्वर क (ब्रह्म)दर्शन करतार् रहतार् है ये कभी नित्य आंखे खोलकर यार् लीलार्भार्व में भी दर्शन करते रहते हैं

जो योगी निरन्तर र्इश्वर चिन्तन करते हुये श्री भगवार्न वसुदेव को विशेष रूप से जार्न सके है वही “युक्ततम” है स्वरूप तत्व क वर्णन करते हुये भगवार्न कहते हैं कि मेरी दो प्रकृतियार्ं हैं अपरार् और परार्। अपरार् प्रकृति आठ भार्गों में विभक्त है, जैसे बुध्दि, अहंकार, मन, क्षिति, अप, तेज, मरूत, व्योम और परार् प्रकृति समस्त प्रपंच जगत को धार्रण करती है। इन दोनों प्रकृतियों के संयोग से इस संसार्र की सृष्टि होती है। भगवार्न ही इस संसार्र के मूल कारण हैं प्रलयकाल में स्थार्वर जंगम रूपी समस्त सृष्टि लय को प्रार्प्त कर भगवार्न में ही समार् जार्ती है। इसी को छन्दोग्य उपनिशद् में भी कहार् गयार् है।

“तत् जलार्न् इति शार्न्त उपार्सीत्”(3/14/1) 

गीतार् क अश्टम अध्यार्य 28 श्लोकों से सुषोभित है ‘अक्षर’ और ब्रह्म दोनों शब्द भगवार्न के सगुण और निर्गुण दोनो ही स्वरूपों के वार्चक हैं। तथार् भगवार्न क नार्म ओम भी है, इसे भी अक्षर और ब्रह्म कहते हैं इस अध्यार्य में भगवार्न के सगुण निर्गुण रूप और ओंकार क वर्णन कियार् गयार् है इसलिये इस अध्यार्य क नार्म “अक्षरब्रह्मयोग” रखार् गयार् है इस अध्यार्य में परमेश्वर के स्वरूप क वर्णन के प्रसंग में ब्रह्मतत्व, ब्रह्मोपार्सनार् और अन्तकाल में र्इश्वरचिन्तार् की विशेष रूप से आलोचनार् हुर्इ है। भगवार्न ने र्इश्वर परार्यण होने क उपदेश दियार् है।

श्री भगवार्न ने समझार्ते हुये कहार् है कि मृत्युकाल में व्यक्ति जिस भार्व को स्मरण करके अपनी देह छोडतार् है उसी भार्व को प्रार्प्त होतार् है अत: अन्तिम समय में जो मुझे यार्द करतार् है वह मुझे ही प्रार्प्त कर मुक्ति लार्भ को प्रार्प्त कर लेतार् है अर्जुन के प्रति श्री भगवार्न क स्पष्ट आदेश है। ‘मार्मनुस्मर युध्य च’- यह भार्व केवल भगवार्न की भक्ति से ही होनार् संभव है। श्री कृष्ण ने ही कहार् है- ‘‘अन्य विषय की चिन्तार् छोडकर जो भक्त सदार् भगवार्न क स्मरण करतार् है उसे अनार्यार्स उनक लार्भ होतार् है और उसे पुन: जन्म नहीं लेनार् पड़तार्।’’ उसके अनन्तर श्री भगवार्न ने कहार् है- ‘‘इन्द्रिसंयम के द्वार्रार् प्रार्ण को भ्रू-युगल के बीच में स्थार्पित करके मन को संयमित रखते हुये और समतत्व की चिन्तार् करते हुये देहत्यार्ग करतार् है तो परमगति प्रार्प्त होती है। अश्टम अध्यार्य क अन्तिमश्लोक विशेष भार्वपूर्ण और गंभीर है- ‘वेदेशु यज्ञेशु’ योग की महिमार् सुनो। उत्तम रूप से वेद क अध्ययन करने से, यज्ञार्नुश्ठार्न, दार्न, तीव्र, तपस्यार् करने से पुण्य कल क उदय होतार् है और सुख की प्रार्प्ति होती है। इस अध्यार्य क मुख्य उद्देश्य-सदार् र्इश्वर चिन्तन करनार् उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।

गीतार् के नवमोSध्यार्य क नार्म ‘रार्जीवद्यार्रार्ज गुह्ययोग’ है। इस अध्यार्य में भगवार्न ने जो उपदेश दियार् है उसको उन्होने समस्त विद्यार्ओं और समस्त गुप्त रखने योग्य भार्वों क रार्जार् बतलार्यार् है। इस अध्यार्य में 34 श्लोक है। इस अध्यार्य में विशेष रूप से ‘र्इश्वरीय योग- सार्मथ्र्य, भगवार्न के भक्त, देवी सम्पदार् सम्पन्न और अभक्त आसुरी सम्पदार् मुक्त, र्इश्वर क विश्वार्नुगत् भार्व, योगक्षेम और भगवदभक्ति के फल क स्वरूप, श्री भगवार्न भक्ति के लिये इच्छुक, र्इश्वर में एकान्त शरणगति ही भक्ति लार्भ क श्रेष्ठ उपार्य आदि विषयों पर विस्तृत विवेचनार् हुर्इ है। इस अध्यार्य में श्रेष्ठ विद्यार् और उसकी प्रार्प्ति क सर्वोत्तम सार्धन वर्णित है। इस अध्यार्य के अन्त में भगवार्न कहते हैं कि मेरी शरणगति से स्त्री, वैश्य-शुद्र और चार्ण्डार्ल आदि किसी को भी परमगति की प्रार्प्ति संभव हो सकती है। 33वें और 34वें में पुण्यशील ब्रार्ह्मण और रार्जर्शि भक्तजनों की बड़ाइ करके शरीर की अनित्यतार् स्पष्ट कियार् गयार् है।

गीतार् के ‘दशमोSध्यार्य’ में प्रधार्न रूप से भगवार्न की विभूतियार्ं क ही वर्णन है इसलिये इस अध्यार्य क नार्म ‘‘विभूतियोग’’ रखार् गयार् है। इस अध्यार्य में 42 श्लोक है। इस अध्यार्य में विशेष रूप से ‘र्इश्वरीय’ विभूतियों क वर्णन कियार् गयार् है। श्री भगवार्न की बड़ी विभूति यह है कि वह विश्वार्नुगत होकर भी विश्वार्तीत है, निगुर्ण होते हुए भी सगुण की तरह प्रतीत होतार् है। एक होकर भी अनेक रूपों में प्रतीत होतार् है। वेदो में- ‘अपार्णिपार्दो जवनो ग्रहीतार् प्ष्यत्यचक्ष: स श्रुणोत्यकर्ण:’ कहार् गयार् है। पुरूष सुक्त में ‘सहर्शशीर्शार्’ पुरूष है। इस विभूति अध्यार्य के प्रार्रम्भ में ही भगवार्न ने स्वयं कहार् है कि मेरार् स्वरूप तत्व देवतार् भी नहीं जार्नते क्योंकि मैं उनक भी आदि कारण हूँ, सभी महर्षि, चतुर्दश मनु आदि समस्त भगवार्न से ही उत्पन्न है। अर्जुन के द्वार्रार् पूछे जार्ने पर भगवार्न कहते हैं कि मेरी विभूतियों क अन्त नहीं है। मैं प्रार्णीवर्ग क आदि, मध्य और अन्त हूँ। आदित्यों में मैं विश्णु, ज्योतिशों में मैं सूर्य, नक्षत्रों में मैं चन्द्र, देवतार्ओं में मैं इन्द्र, रूद्रों में मैं शंकर वार्युओं में मैं मरीचि हूँ…………………। इस प्रकार भगवार्न ने कृपार् करके अर्जुन को निर्देशित कर जगतवार्सियों को स्वयं प्रार्प्ति क सुगममाग बतार् दियार् है- जो लोग मुझमें चित्त अर्पण कर भक्ति से मेरी उपार्सनार् करते हैं वे मुझे पार्ने में समर्थ होते है। गीतार् के चार्लीसवें श्लोक में अपनी दिव्य विभूतियों के विस्तार्र को अनन्त बतलार्कर इस प्रकरण की समार्प्ति की है।

गीतार् के एकादशोSध्यार्य क नार्म ‘विश्वरूप दर्शन योग’ है। 55 श्लोकों में यह अध्यार्य समार्प्त है। इस अध्यार्य में अर्जुन ने भगवार्न से कातर भार्व प्राथनार् किये है कि हे भगवार्न आप अपने विश्वरूप क दर्शन मुझको करवार् दें। इसलिये इस अध्यार्य में विश्वरूप क और उसके स्तवन क ही प्रकरण है। इसलिये इस अध्यार्य क नार्म ‘विश्वरूप दर्शन योग’ रखार् गयार् है। इस अध्यार्य में पहले से चौथे श्लोक में अर्जुन ने भगवार्न की और उनके उपदेश की प्रशंसार् करके विश्वरूप के दर्शन् करार्ने के लिये भगवार्न से अनुनय-विनय की है। इसके बार्द प्रसन्न होकर भगवार्न ने अपनार् र्इश्वरीय रूप दिखलार्यार् है। किन्तु स्थूल नेत्रों से भगवार्न के चिन्मय स्वरूप क दर्शन् नहीं हो सकतार् है केवल इससे सार्ंसार्रिक पदाथ ही देखे जार् सकते है। इस कारण भगवार्न ने दिव्यचक्षु यार् भार्व नेत्र अर्जुन को प्रदार्न किये थे। और इन दिव्य चक्षुओं से अर्जुन ने भगवार्न के विश्वरूप क दर्शन् कियार् जिसको देखकर लोग परमगति को प्रार्प्त होते हैं। दसवें से तेरहवें तक अर्जुन को कैसार् रूप दिखलार्यी दियार्, इसक वर्णन कियार् गयार् है। यह संसार्र ब्रह्म क विरार्ट शरीर है वेद में ‘सहस्रशीर्शार्’ पुरूष: सहस्रार्क्ष: सहार्स्रपार्त्……….. …। से वर्णन कियार् गयार् है। यह विश्वब्रह्मार्ण्ड उन्हीं क विरार्ट रूप है इसी कारण वह विश्वरूप है। इस प्रकार इस विरार्ट रूपी भगवार्न क दर्शन् करने से-

भिद्यते हृदय ग्रन्थिष्छिद्यन्ते सर्वसंशयार्:। 

क्षीयन्ते चार्स्य कर्मार्णि तस्मिन दृश्टे परार्वरे।। 

ऐसी अवस्थार् प्रार्प्त होती है। श्री भगवार्न ने अर्जुन को जिस दिव्य रूप क दर्शन् करार्यार् थार् वह यथाथ में ही अद्भुत, अनिर्वचनीय और अदृश्ट पूर्व है। वह विश्व रूप सभी ओर पूर्ण, सर्वव्यार्पी, आदि-अन्त-मध्य रहित तथार् ज्योतिर्मय है फिर विश्व के जन्म-स्थिति लय भी उन्हीं में हो रहें हैं। भगवार्न के विश्वरूप को देखकर अर्जुन भय से कांपने लगे तब भगवार्न के शार्न्त मूर्ति धार्रण कर अर्जुन को आश्वार्सन देते हुये कहार्- ‘‘जिस विश्वरूप क तुमने दर्शन् कियार् है वह देवतार्ओं के लिये भी दुर्लभ है। केवल एक निश्ठ भक्ति के बिनार् मेरार् यह विश्वरूप कोर्इ देख नहीं सकतार् है तुम मेरे प्रिय भक्त हो इसलिये मेरे इस विश्वरूप क दर्शन् तुमको प्रार्प्त हो सका। मैं ही तुम्हार्रार् परमगति हूँ और समस्त कर्मों क कर्तार् मैं ही हूँ और सार्रे कर्म मेरे ही हैं। ऐसार् समझकर तुम अनार्सक्त चित्त से युद्धार्दि समस्त कर्म करते रहो’’ यही श्री भगवार्न क उपदेश है। कुछ प्रार्प्त करनार् अभीश्ट हो तो मार्ंगनार् अति आवश्यक होतार् है। जब तक अर्जुन ने पुरूषोत्तम के पार्स- ‘द्रश्टुमिच्छार्मि ते रूपं ऐष्वरम्’ ऐसी प्राथनार् नहीं की थी तब तक भगवार्न ने अपनार् अव्यय आत्मार्स्वरूप प्रगट नहीं कियार् थार्।

गीतार् क द्वार्दश अध्यार्य 20 श्लोकों में ही समार्प्त है। किन्तु यह अध्यार्य भक्ति सार्धन के पथ निर्देश के लिये विशेष महत्वपूर्ण है। भक्तियोग, कर्मयोग, ज्ञार्नयोग, रार्जयोग के सार्धनों सहित भगवार्न की भक्ति क वर्णन एवं भगवद् भक्तों क लक्षण बतलार्यार् गयार् है। इस अध्यार्य क उपक्रम और उपसंहार्र भगवद् भक्ति में ही हुआ है। केवल तीन श्लोकों में ज्ञार्न के सार्धन क वर्णन हैं वह भी भगवद्भक्ति और ज्ञार्नयोग की परस्पर तुलनार् करने के लिये ही है। अतएव इस अध्यार्य क नार्म ‘‘भक्तियोग’’ रखार् गयार् है।

इस अध्यार्य के प्रार्रम्भ में अर्जुन क प्रश्न है- सगुण-सार्कार, निर्गुण-निरार्कार के उपार्सकों में कौन सहज यार् श्रेष्ठ है ? इसके उत्तर में भगवार्न कहते हैं कि यद्यपि दोनों ही मागों क उद्देश्य एक ही है तो भी सगुण ब्रह्मो पार्सनार् यार् भक्ति क माग श्रेष्ठ है। इस भक्ति माग के भी अनेक उपार्य है उनमें भक्तियुक्त निश्काम कर्म ही श्रेष्ठ है। जो मनुष्य भक्ति माग क अवलम्बन लेकर, इन्द्रिय संयम करते हुये तथार् सर्वत्र समत्व बुद्धि युक्त होकर सम्पूर्ण प्रार्णियों में आत्म दर्शन करतार् है वे भी परमार्त्मार् को प्रार्प्त करतार् है। इस अध्यार्य में विशेष रूप से भक्ति माग क सहार्रार् लेकर र्इश्वरोपार्सनार् क उपदेश दियार् गयार् हैं। इस कारण इस अध्यार्य क नार्म भक्ति योग रखार् गयार् है। भगवार्न ने अर्जुन को उपदेश दियार् है कि सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके अनन्य भार्वों से मेरार् ही चिन्तन करों और ऐसार् करने पर भक्तों क उद्धार्र मैं स्वयं करतार् हूँ। इस अध्यार्य के तेरहवें से उन्नीसवें तक भगवार्न ने अपने प्रिय ज्ञार्नी महार्त्मार् भक्तों के लक्षण बतलार्ये है और बीसवें में उन ज्ञार्नी महार्त्मार् भक्तों के लक्षणों को आदर्श मार्नकर श्रद्धार्पूर्वक वैसार् ही सार्धन करने वार्ले भक्तों को अत्यन्त प्रिय बतलार्यार् है।

गीतार् क त्रयोदश अध्यार्य 35 श्लोकों में वर्णित है। इस अध्यार्य क नार्म ‘‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञ’’ अथवार् ‘‘प्रकृतिपुरूष विभार्ग योग’’ है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थार्त शरीर और आत्मार् दोनों अत्यन्त विलक्षण हैं। अज्ञार्न के कारण ही दोनों में एकतार् दिखाइ देती है। क्षेत्र (शरीर) जड़, विकारी, नार्शवार्न और क्षणिक है वहीं क्षे़त्रज्ञ इसके विपरीत चेतन, अविकारी, निर्विकार नित्य और अविनार्शी है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनों के स्वरूप क भेद वर्णन कियार् गयार् है। इसलिये इसक नार्म ‘‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञ विभार्ग योग’’ रखार् गयार् है। इस अध्यार्य के अन्तिम श्लोक के विषय में आचाय शंकर ने लिखार् है कि इस श्लोक से अध्यार्य क सार्रमर्म सूचित हुआ है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थार्त् शरीर और आत्मार् के भेद दर्शन् से ही मुक्ति है। देहार्त्म अभेद ही सार्रे बन्धनों क कारण है और इसक भेद ही आत्मज्ञार्न है। ‘‘जब तक देह बुद्धि है, तभी तक सुख-दुख जन्म-मृत्यु, रोग-शोक है ये सब देह को ही होतार् है आत्मार् को नहीं। ‘‘आत्मज्ञार्न’’ की प्रार्प्ति होने के बार्द सुख-दुख, जन्म-मृत्यु आदि स्वप्न की तरह मिथ्यार् प्रतीत होते है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क यह भेदज्ञार्न ही ‘यथाथज्ञार्न’ है। वही परमेश्वर क ज्ञार्न ब्रह्मज्ञार्न है। योग माग के अवलम्बन से ध्यार्न, धार्रणार् और समार्धि और अनार्त्मार् के विचार्र द्वार्रार् ही आत्मज्ञार्न की प्रार्प्ति होती है और इसी से मोक्ष की प्रार्प्ति हो सकती है।

गीतार् क चतुर्दश अध्यार्य 27 श्लोकों में रचित है। इस अध्यार्य में प्रकृति के त्रिगुण (सत, रज,तम) के स्वरूप और उनके कार्य, कारण और शक्ति क वर्णन हुआ है। सार्ंख्य में भी ‘‘गुणार्नार्ं सार्म्यार्वस्थार् प्रकृति:’’ कहार् गयार् है। जीवार्त्मार् को बन्धन और अज्ञार्न से आवृत्त करने क मुख्य कार्य में त्रिगुण ही करते हैं। इन त्रिगुणों से जब मनुष्य छूट जार्तार् है तभी वह परमपद को प्रार्प्त होतार् है। सत, रज, तम इन तीन गुण और त्रिगुणों से अतीत त्रिगुणार्तीत अवस्थार् ही इस अध्यार्य में विशेष रूप से आलोचित हुये है। इस लिये इस अध्यार्य क नार्म ‘‘गुणत्रय विभार्ग योग’’ है। तीन गुणों से अतीत होकर परमार्त्मार् को प्रार्प्त मनुष्य के क्यार् लक्षण हैं ? इन्हीं त्रिगुण सम्बन्धी बार्तों क विवेचन इस अध्यार्य में कियार् गयार् है। श्री कृष्ण ने कहार् है- ‘‘मेरी एक निश्ठ भार्व से भक्ति योग के द्वार्रार् सेवार् करने से ही त्रिगुणार्तीत होकर ब्रह्मभार्व प्रार्प्ति होती है, क्योंकि मैं ही ब्रह्म की प्रतिश्ठार् हूँ’’। फिर आगे कहते हैं कि परार्भक्ति और ब्रह्मभार्व एक ही है। क्योंकि दोनों से ही मुक्ति प्रार्प्त हो सकती है।

यह सम्पूर्ण दृष्यमार्न- अदृष्यमार्न ब्रह्मार्ण्ड प्रकृति क ही परिणार्म है। प्रकृति और पुरूष के संयोग से ही सृष्टि क विकास होतार् है। परमेश्वर को प्रार्णियों क पितार् और प्रकृति को मार्तार् कहार् जार्तार् है। 11वें से 13वें तक बढ़े हुये सत, रज, तम तीनों गुणों क क्रम से लक्षण बतलार्यार् गयार् है। जिस मनुष्य में जो गुण ज्यार्दार् मार्त्रार् में होतार् है उसी के अनुरूप उसक स्वरूप निर्धार्रित होतार् है। सत्वगुण “वेत रंग क होतार् है। और सुख्यार् उत्पन्न करतार् है। रजोगुण ऋणार्त्मक होतार् है। इसकी बृद्धि से लोभ, काम प्रवृत्ति, विषय-वार्सनार् आदि उत्पन्न होती है। यह लार्ल रंग क होतार् है। त्रयोगुण की वृद्धि होने पर विवेक क नार्श, उद्यम क अभार्व तथार् बुद्धि क विपर्यय होतार् है। जिससे यह गुण ज्यार्दार् होतार् है।

उसे तार्मसिक प्रवृत्ति क मनुष्य कहते हैं। सत्तवगुण से ज्ञार्न क उदय होतार् है रजोगुण से कर्म में प्रवृत्ति और त्रयोगुण से अज्ञार्न और बुद्धि-विषय होतार् है। तीनों गुणों के एकत्र होने पर जो गुण एक दूसरे को दबार्कर प्रबल हो जार्तार् है उसी गुण की प्रबलतार् मार्नी जार्ती है। श्री भगवार्न ने अर्जुन को निस्त्रैगुण्य होने क आदेश देकर नित्यसत्तवस्थ होने के लिये कहते हैं। इसक आशय यह है कि तीनों गुणों क समार्हार्र होने से ही विशुद्ध सत्तार् क उदय होतार् है।

इस अध्यार्य के अन्त में श्री भगवार्न ने जो त्रिगुणार्तीत अवस्थार् के लक्षण बतार्यें हैं वह अति दुर्लभ है। त्रिगुणार्तीत होनार् यार् मार्यार्तीत होनार् यार् ब्रह्मभार्व प्रार्प्ति सब एक ही है इस प्रकार स्थित प्रज्ञ और त्रिगुणतीत एक ही अवस्थार् है। अनन्तर अन्तिम सत्तार्इसवें श्लोक में ब्रह्म, अमृत, अव्यय आदि भगवार्न के स्वरूप होने से अपने को इन सबकी प्रतिश्ठार् बतलार्कर अध्यार्य क उपसंहार्र करते हैं। मनुष्य क स्वधार्म है परमब्रह्म। त्रिगुणार्तीत न होने से ब्रह्मज्ञार्न नहीं होतार् है।

गीतार् क पंचदश अध्यार्य 20 श्लोकों में रचित है। इस अध्यार्य क नार्म ‘‘पुरूषोत्तम योग’’ है। इस अध्यार्य में सम्पूर्ण गीतार् शार्स्त्र क भार्व व्यक्त कियार् गयार् है। सम्पूर्ण जगत के कर्तार्-धर्तार्-हर्तार्, ‘सर्वषार्क्तिमार्न’ सबके नियन्तार्, सर्वव्यार्पी अन्र्तयार्मी, परमदयार्लु शरण लेने योग्य, सगुण परमेश्वर परम पुरूषोंत्तम भगवार्न के गुण -प्रभार्व और स्वरूप क वर्णन कियार् गयार् है। इसी अध्यार्य में क्षर पुरूष (क्षेत्र) अक्षर पुरूष (क्षेत्रज्ञ) और पुरूषोत्तम तीनों क वर्णन कियार् गयार् है। ‘क्षर’ और ‘अक्षर’ से भगवार्न किस प्रकार श्रेष्ठ है और सब में कैसे उत्तम है, क्यों पुरूषोत्तम कहे जार्ते हैं ? पुरूषोत्तम कहने के पीछे क्यार् मार्हार्त्मय है। इस सबक उत्तर इसी अध्यार्य में विस्तृत रूप से मिलतार् है। और इतनार् ही नहीं समस्त वेदों क अर्थ भी इस अध्यार्य में संक्षेप में बतार्यार् गयार् है। ‘‘जो उन्हें जार्नतार् है, वही वेदज्ञ है’’, ‘समस्त वेदों क मैं ही प्रतिपार्द्य अर्थ हूँ। श्री भगवार्न ने स्वयं कहार् है- ‘‘मैं क्षर से परे और अक्षर (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसी कारण इस लोक तथार् वेद में मैं पुरूषोत्तम नार्म से प्रसिद्ध हूँ।अस पुरूषोत्तम को जार्नने से ही मनुष्य सर्वज्ञ हो जार्तार् है। उसको यह ज्ञार्न हो जार्तार् है। कि वह सगुण और निर्गुण भी है। सार्कार और निरार्कार भी है और जब भक्तों पर दु:ख पड़तार् है तब भगवार्न अतवार्र रूप में अवतीर्ण होते हैं। इस अध्यार्य में आगे यह कहार् गयार् है कि यह पुरूषोत्तम तत्व अत्यन्त गोपनीय है और बिनार् र्इश्वर की कृपार् के कोर्इ इसे समझ नहीं सकतार् है।

श्री भगवार्न कहते हैं कि- जीव मेरार् ही सनार्तन अंश है। वह कर्म फल के अनुसार्र सत् यार् असत् योनियों में जन्म ग्रहण करके सुख-दुखार्दि भोगतार् है। जो ब्रह्मवित् है वह जार्नते हैं कि ब्रह्म त्रिगुण से परे है और इन त्रिगुणों से निर्लिप्त है। पुरूषोत्तम को श्रुतियार्ं भी परम ब्रह्म, परम पुरूष और पूर्व भगवार्न मार्नती हैं। इनके दर्शन् से ही मनुष्य चिरमुक्त हो जार्तार् है। मुण्डकोपनिशद् में लिख हैं-

‘‘भिद्यते हृदयग्रन्थिष्छिद्यन्ते सर्व संषय:। 

क्षीयन्ते चार्स्य कर्मार्णि तस्मिन दृश्टे परार्डवरे।। 

अर्थार्त् आत्म स्वरूप भगवार्न क दर्शन् करते ही आत्मज्ञार्नी क अहंकार रूप हृदयग्रार्न्थि छिन्न हो जार्ती है और समस्त संदेह दूर हो जार्ते हैं और जन्म-जन्मार्न्तर के समस्त कर्म क्षय को प्रार्प्त हो जार्ते है। उस पुरूषोत्तम के सम्बन्ध में ऋग्वेद के पुरूषसुक्त क मंत्र है-

‘‘सहस्रषीर्शार् पुरूष: सहस्रार्क्ष: सह स्रपार्त्। 

स भूमिं विश्वतो वृत्वार्त्यतिश्ठ दशार्ंगुलम्।।’’ 

श्रीमदभगवत् में भी इन्हीं पुरूषोत्तम की उपार्सनार् की श्रेष्ठतार् के सम्बन्ध में कहार् गयार् है-

वसुदेव परार् वेदार्, वसुदेव परार् मुखार्:। 

वसुदेव परार् योगार् , वसुदेव पर क्रियार्:।। 

वसुदेव परं ज्ञार्नं , वार्सुदेव परं तप:। 

वसुदेव परो धर्मो वार्सुदेव परार् गति:।। 

इस प्रकार वार्सुदेव ही मनुष्यों की परम गति है। और यही समस्त वेदों क एक मार्त्र प्रतिपार्द्य विषय है।

गीतार् क शोड्ष् अध्यार्य 24 श्लोकों में समार्प्त है। इस अध्यार्य में दैव तथार् आसुरी सम्पत्तियों क विभार्ग कियार् गयार् है। इस कारण इस अध्यार्य क नार्म ‘‘दैवार्सुरसम्पद विभार्ग योग’’ है। श्री भगवार्न ने पहले दैवीय सम्पदार् के अन्तर्गत 26 सार्त्विक गुणों क वर्णन कियार् है जैसे- चिन्तशुद्धि, आत्मज्ञार्न में निश्ठार्, सत्य, अक्रोध, त्यार्ग, शार्ंति, जीवों पर दयार्, लज्जार् चंचलतार् क अभार्व, क्षमार्, धैर्य, शौच, अहिंसार्, अहंकार, शून्यतार् आदि दैवी सम्पदार्एं है। और जो लोग पूर्व जन्म के शुभ कर्मों के फलस्वरूप दैवी सम्पदार् के अधिकारी पार्त्र होकर जन्में है वे ही इन 26 सार्त्विक गुणों के अधिकारी है। उसी प्रकार दर्प, दम्भ, अभिमार्न, क्रोध, निश्ठुरतार्, अज्ञार्न आदि आसुरी सम्पदार् लेकर जो जन्मे है वे ही दु:ख सदैव भोगते रहते है। ये लोग दुर्गुण और दुरार्चार्र ज्यार्दार् करते हैं। जो लोग दैवी सम्पदार् से युक्त होते हैं वे मोक्ष प्रार्प्ति की ओर अग्रसर होते रहते है और जो आसुरी सम्पदार् से युक्त मनुष्य है उसके लिये संसार्र ही बन्धन क कारण है। आसुर प्रकृति वार्ले मनुष्यों को पुण्य-पार्प-धर्म-अधर्म है तथार् कामोपभोग को ही जीवन क परम पुरूषाथ समझते है और प्रार्णियों क अनिश्ट करते हैं। इस प्रकार आसुर स्वभार्व वार्ले लोग अधर्म क आचरण करके भूयष: अधोगति को प्रार्प्त होते है और उनकी मुक्ति क कोर्इ उपार्य नहीं रहतार् है। इस प्रकार अर्जुन को लक्ष्य करके भगवार्न मार्नों सम्पूर्ण सृष्टि को यह बतार् देनार् चार्ह रहें है कि काम, क्रोध, लोभ यह तीनों ही आसुरी स्वभार्व क मूल कारण है। तथार् सभी अनर्थों क यह मूल द्वार्र है। इसलिये काम, क्रोध, लोभ इन तीनों क परित्यार्ग कर श्रेय माग को अपनार्नार् चार्हिये और शार्स्त्र विहित कर्तव्य करके अपने स्वधर्म क पार्लन करनार् चार्हिये। इस प्रकार भगवार्न ने शोड्ष अध्यार्य के पहले नवें अध्यार्य के बार्रहवें श्लोक में भी ‘‘रार्क्षसीमार्सुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनी श्रितार्:’’ से आसुरी सम्पदार् वार्लों क और तेरहवें श्लोक में दैवीं प्रकृतिमार्श्रितार्: मार्ं भजन्ते’’ पदों से दैवी सम्पदार् वार्लों क वर्णन कियार् है।

गीतार् क सप्तदश अध्यार्य मार्त्र 28 श्लोकों में ही रचित है। अर्जुन के प्रश्न करने पर श्री भगवार्न ने यहार्ं विविध श्रद्धार् क विशेष वर्णन कियार् है, इस कारण इस अध्यार्य क नार्म ‘‘श्रद्धार्त्रय विभार्ग योग’ है। त्रिविध श्रद्धार् के अतिरिक्त इसमें त्रिविध आहार्र, त्रिविध यज्ञ, त्रिविध तपस्यार्, त्रिविध दार्न आदि के विषय में विशेष रूप से आलोचनार् हुर्इ है। इस अध्यार्य के आरम्भ में अर्जुन ने श्रद्धार्युक्त पुरूषों की निश्ठार् पूछी है, उसके उत्तर में भगवार्न ने तीन प्रकार की श्रद्धार् बतलार्कर श्रद्धार् के अनुसार्र ही निश्ठार् पूछी है फिर पूजार्, यज्ञ, तप आदि में श्रद्धार् क सम्बन्ध बतार्ते हुये इसके अन्तिम श्लोक में श्रद्धार्रहित पुरूषों के कर्मोें को असत् बतलार्यार् गयार् है। सत्व आदि त्रिगुणों के भेद से मनुष्य की त्रिविध प्रकृति यार् अन्त:करण वृत्ति उत्पन्न होती है। इस कारण प्रकृति भेद से उनकी श्रद्धार् भी सार्त्विक, रार्जार्सिक और तार्मसिक होती है। सार्त्विक श्रद्धार् से युक्त सार्धक देवतार्ओं की पूजार् करते हैं। रार्जसिक प्रकृति वार्ले मनुष्य कामनार् युक्त चित्त से यक्ष, रार्क्षस आदि की पूजार् करते हैं। फिर तार्मसिक मनुष्य रोग मुक्ति आदि की कामनार् करके भूत, प्रेत आदि की उपार्सनार् करते हैं। स्वार्मी विवेकानन्द ने लिखार् है कि इस नियम क व्यतिक्रम कभी नहीं होतार् कि शुभ कर्म क शुभ फल और अशुभ कर्म क अशुभ फल प्रार्प्त होनार् अनिवाय है। कर्म की गति अति दुर्ज्ञेय है। आचाय शंकर ने अपने विवेक चूडार्मणि ग्रन्थ में लिखार् है –

‘‘नार्भुक्तं श्रीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। 

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभार्शुभम्।।’’ 

अर्थार्त् जो शुभार्शुभ कर्म कियार् गयार् है उसक फल अवश्य ही भोगनार् पड़तार् है। भोग किये बिनार् शत् कोटिकल्प में भी कर्म क क्षय नहीं होतार्। इन कर्मों की त्रिविध स्थितियों क वर्णन शार्स्त्रों में भी मिलतार् है-

  1. प्रार्रब्ध जिसक भोग चल रहार् है। 
  2. क्रियमार्ण-जो भोगकाल में कियार् जार् रहार् है। 
  3. संचित- जो अभी फल देने में प्रवृत्त नहीं हुआ है। प्रत्येक जीव को इन तीनों कर्मों क क्षय भोग करके ही करनार् पड़तार् है। श्रुति कहती है- 

पुण्यार् वै पुण्येन कर्मणार् भवति, पार्प: पार्पेन’’ (बृहदार् 3/2/13)। 

अर्थार्त् पुण्य कर्म से ही पुण्य की उत्पत्ति होती है और पार्प कर्म से पार्प की उत्पत्ति होती है। कर्म क्षय क एक उपार्य भी है- श्री भगवार्न कहते हैं-

‘‘ज्ञार्नार्ग्नि: सर्व कर्मार्णि भस्मसार्त् कुरूते तथार्।’’ 

अर्थार्त् ब्रह्मज्ञार्न रूपी अग्नि (प्रार्रब्ध कर्म को छोडकर) समस्त शुभार्शुभ कर्मों को भस्म कर देती है। प्रत्येक मनुष्य को अपने-अपने प्रार्रब्ध कर्मों के भोग के लिये जन्म-ग्रहण करनार् पड़तार् है। इस प्रकार भगवार्न केवल मनुष्य के कर्म फल भोग की व्यवस्थार् कर देते हैं जिससे वे अपने-अपने कर्मों क फल भोग करके मुक्ति के माग में अग्रसर हो सकें।

गीतार् क अष्टार्दश अध्यार्य 78 श्लोको में रचित है यह गीतार् क अन्तिम महत्व पूर्ण अध्यार्य है। समस्त गीतार् में श्लोक संख्यार् की दृष्टि से यह अध्यार्य सबसे बडार् है। इस अध्यार्य के 73 श्लोक तक श्रीमद भगवदगीतार् यार् श्री कृष्ण-अर्जुन संवार्द है। बार्की 5 श्लोक संजय के वार्क्य है। इस प्रकार आलोचित विषय वस्तु की दृष्टि से भी श्रेष्ठ है। इस अध्यार्य में समस्त गीतार् शार्स्त्र की आलोचनार् क उपसंहार्र करके मार्नव जीवन क चरम आदर्श और मोक्ष लार्भ कैसे हो सकतार् है इसक वर्णन कियार् गयार् है। इस कारण इस अध्यार्य क नार्म ‘‘मोक्षयोग’’ है। अर्जुन सन्यार्स और त्यार्ग के तत्व को पृथक-पृथक जार्ननार् चार्ह रहे है। इसके उत्तर में भगवार्न कहते हैं कि काम्य कर्म क त्यार्ग ही सन्यार्स है और सार्रे कर्मों के फल मार्त्र क त्यार्ग ही यथाथ सन्यार्सी है। कर्म फल त्यार्ग करके स्वधर्म क अनुष्ठार्न ही मुख्य विषय है। श्री भगवार्न अपनार् अन्तिम उपदेश देते हुये कहते हैं कि

‘‘मन से समस्त धर्म-कर्म मुझमें सौंप कर सर्वदार् मुझमें मन रखों और अपने अधिकार के अनुसार्र स्वधर्म क पार्लन करो, उसी से मेरी प्रसन्नतार् पार्कर मुक्त हो सकोगे। क्योंकि बिनार् र्इश्वर की कृपार् के मनुष्य मार्यार् मुक्त हो ही नही सकतार् है। भक्त अर्जुन को श्री भगवार्न गीतार् क गुह्ययतम् उपदेश देकर कहते हैं- ‘‘तुम एक मार्त्र मेरी ही चिन्तार् करो मेरी ही भक्ति करो, पूजार् करो, मुझे ही नमस्कार करों। मैं प्रतिज्ञार् करके कहतार् हूँ कि तुम मुझे ही पार्ओगे। सब धर्मों क परित्यार्ग कर तुम मेरी ही शरण लो, मैं मार्यार्-बन्धन से तुम्हें चिरकाल के लिये मुक्त करूंगार्।’’ श्री भगवार्न ने एक छोटी बार्त से सार्रे उपदेशों क उपसंहार्र कर दियार्- अहं त्वार्म्सर्व पार्पेभ्यो मोक्षयिश्यार्मि मार् शुच:। यही शरणार्गति योग है। ‘‘तुम केवल मेरी शरण लो, मैं तुम्हें सभी पार्पों से मुक्त करूंगार्।’’ इस प्रकार श्री कृष्ण की करूणार्मय मूर्ति को देखकर अर्जुन क संदेह दूर हो गयार् है और उन्होने विनम्रतार् एवं कृतज्ञतार् के सार्थ कहार् है- हे भगवार्न- ‘‘ मेरे अन्तर के सार्रे संदेह दूर हो गये हैं, मैं तुम्हार्रे आदेश क पार्लन करूंगार्, तुम्हार्री कृपार् से मैं धन्य हो गयार् हूँ’’। ब्रह्मज्ञार्न के बार्द जो अवस्थार् प्रार्प्त होती है अर्जुन को सहज ही प्रार्प्त हो गयी हैं।

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