शैक्षिक मार्पन एवं मूल्यार्ंकन

मार्पन क अर्थ शैक्षिक मार्पन की विशेषतार्एँ

हम अपने जीवन के प्रत्येक क्षण अपने चार्रों ओर हो रहे परिवर्तनों के प्रति सजग रहते हैं तथार् उन प्रत्येक परिवर्तनों क मार्त्रार्त्मक आंकलन करते हैं जो हमें किसी न किसी प्रकार प्रभार्वित करते हैं। शिक्षार् सतत् गत्यार्त्मक प्रक्रियार् में इससे जुडे़ प्रत्येक व्यक्ति, छार्त्र, अभिभार्वक, अध्यार्पक, प्रशार्सक तथार् नीति निर्मार्तार् सदैव किसी न किसी रुप में शिक्षार् की चुनौतियार्ं, समस्यार्एँ तथार् समार्धार्न के प्रति चिंतित रहते हैं। किसी भी समस्यार् के सम्बन्ध में तत्थ्यार्त्मक जार्नकारी के अभार्व में कोर्इ भी निर्णय त्रुटिपूर्ण हो सकतार् है। अत: समस्यार् के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित सूचनार् की पर्यार्प्ततार्, सन्दर्भ तथार् उपयुक्ततार् उस समस्यार् के समार्धार्न हेतु प्रथम तथार् अपरिहाय आवश्यकतार् है। सूचनार्ओं को वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय तथार् वैध तरीके से प्रार्प्त करने के लिये हमें मार्पन क सहार्रार् लेनार् पड़तार् है।

  1. एस.एस. स्टीवेन्स के अनुसार्र- ‘मार्पन किन्ही स्वीकृत नियमों के अनुसार्र वस्तुओं को अंक प्रदार्न करने की प्रक्रियार् है अर्थार्त मार्पन क स्वरूप आंकिक है। 
  2. जी.सी. हेल्मस्टडेटर के अनुसार्र- ‘मार्पन को किसी व्यक्ति यार् वस्तु में निहित किसी विशेषतार् की मार्त्रार् क आंकिक वर्णन प्रार्प्त करने की प्रक्रियार् के रूप में परिभार्षित कियार् गयार् हैं’ अर्थार्त् मार्पन क स्वरूप मार्त्रार्त्मक हैं तथार् यह एक प्रक्रियार् है। 
  3. ब्रेड फील्ड तथार् मोरडोक के अनुसार्र- ‘‘मार्पन किसी घटनार् के विभिन्न आयार्मों को प्रतीक आवंटित करने की प्रक्रियार् है जिससे उस घटनार् की स्थिति क यथाथ निर्धार्रण कियार् जार् सके’’ अर्थार्त् मार्पन यथाथ है।

किसी वस्तु के गुणों तथार् विशेषतार्ओं क विवरण गुणार्त्मक तथार् मार्त्रार्त्मक दोनों हो सकतार् है। अत: मार्पन भी दो प्रकार के होते हैं- गुणार्त्मक मार्पन तथार् मार्त्रार्त्मक मार्पन। गुणार्त्मक मार्पन में गुण यार् विशेषतार् की उपस्थिति/अनुपस्थिति दर्शार्यी जार्ती है अथवार् गुण यार् विशेषतार् क प्रकार बतार्यार् जार्तार् है जबकि मार्त्रार्त्मक मार्पन में कोर्इ भी गुण यार् विशेषतार् कितनी मार्त्रार् में उपस्थित है इसक यथाथ विवरण प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। वस्तुत: मार्पन में व्यक्ति, वस्तु अथवार् घटनार् के ऐसे शब्द, अंक, अक्षर अथवार् प्रतीक प्रदार्न किये जार्ते हैं जो उन संदर्भ गुणों के प्रकार अथवार् उसकी मार्त्रार् को व्यक्त करते हैं। अत: मार्पन प्रक्रियार् में मूलत: तीन तत्व होते हैं-

  1. विषयी : जिसके गुणों क मार्पन होनार् है।
  2. प्रतीक : जिसमें गुणों की मार्त्रार् अभिव्यक्त होती है।
  3. नियम यार् मार्न्यतार् : जिसके आधार्र पर मार्त्रार् व्यक्त होनी है।

    प्रार्य: भौतिक गुणों जैसे- लम्बाइ, चौड़ाइ, क्षेत्रफल, आयतन आदि के मार्पन में गुण दिखाइ देते रहते हैं तथार् उनमें स्थार्यित्व रहतार् है। अत: मार्पन परोक्ष होतार् है। जबकि शैक्षिक तथार् मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में गुणों जैसे- बुद्धि, व्यक्तित्व, रूचि, सम्प्रार्प्ति आदि में गुण दिखाइ नहीं पड़ते तथार् इनमें स्थार्यित्व क भी अभार्व रहतार् है। अत: मार्पन अपरोक्ष होतार् है। शैक्षिक मार्पन बहुत ही चुनौतीपूर्ण तथार् अस्थाइ होतार् है क्योंकि लक्षण दिखाइ नहीं देते। विषयी द्वार्रार् दिये गये उद्दीपन की प्रतिक्रियार् स्वरूप प्रार्प्त अनुक्रियार् क विश्लेषण करके गुणों की मार्त्रार् क अनुमार्न लगार्यार् जार्तार् है। यह अनुमार्न सही भी हो सकतार् हैं तथार् त्रुटिपूर्ण भी। विषयी यदि अनुक्रियार् न करनार् चार्हे यार् उसकी मनोवैज्ञार्निक दशार् अनुकूल न हो तो गुण होते हुए भी उसकी मार्त्रार् क ठीक ठीक पतार् लगार्नार् कठिन हो जार्तार् है। अत: विषयी की मनोदशार् पर पर्यार्प्त नियंत्रण करके ही और स्वार्भार्विक मनोवैज्ञार्निक पर्यार्वरण प्रदार्न करने के उपरार्न्त ही शैक्षिक मार्पन सम्भव हो सकतार् है। शैक्षिक मार्पन में मार्पक उपकरण क स्थार्न तो महत्वपूर्ण रहतार् है सार्थ ही विषयी क स्थार्न सर्वार्धिक महत्वपूर्ण होतार् है।

    चरों की प्रकृति

    मार्पन द्वार्रार् व्यक्ति, वस्तु अथवार् घटनार् की विशेषतार्ओं की मार्त्रार् क अध्ययन कियार् जार्तार् है। इन विशेषतार्ओं अथवार् गुणों को जिससे कोर्इ घटनार् अपने आप में विशेष हो जार्ती है चर (Variable) कहते हैं। चर (Variable) क शब्दिक अर्थ है जो बदलती रहे अर्थार्त स्थिर न रहे, भिन्न-भिन्न लोगों में भिन्न-भिन्न मार्त्रार् में पार्यी जार्य। जैसे- भार्र, लम्बाइ, बुद्धि, अभिवृत्ति आदि। चर के आधार्र पर समूह के सदस्यों को कुछ उप-समूहों में बार्ँटार् जार् सकतार् है। यदि समूह क एक सदस्य भी किसी गुण के प्रकार अथवार् मार्त्रार् में शेष से भिन्न है तब उसे चर कहार् जार् सकतार् है। कोर्इ गुण किसी एक समूह के लिये चर रार्शि हो सकतार् है जबकि दूसरे समूह के लिए स्थिर हो। चर दो प्रकार से वर्गीकृत किये जार् सकते हैं-

    1. गुणार्त्मक चर
    2. मार्त्रार्त्मक चर : (1) सतत्  (2) असतत्

      गुणार्त्मक चर गुणों के विभिन्न प्रकारों को व्यक्त करते हैं जिनके आधार्र पर समूह को उपश्रेणियों में बार्ँटार् जार् सकतार् है। जैसे- धर्म के आधार्र पर हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख तथार् र्इसाइ यार् लिंग के आधार्र पर महिलार्, पुरुष। जबकि मार्त्रार्त्मक चर वे हैं जो गुणों की मार्त्रार् को व्यक्त करते हैं। समूह के प्रत्येक व्यक्ति में इनक परिमार्प भिन्न-भिन्न होतार् है। जैसे- प्रार्प्तार्ंक, बुद्धिलब्धि, आय आदि। इनमें लम्बाइ तथार् भार्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु के बीच कोर्इ भी मार्न सम्भव है, अत: ये सतत् चर कहलार्ते हैं। जबकि परिवार्र में सदस्यों की संख्यार् 3 यार् 4 ही सम्भव है बीच क मार्न 3.5, 3.8 नहीं। अत: ऐसे चर असतत् चर (Discrete Variable) कहलार्ते हैं। असतत् चर में प्रयुक्त संख्यार्एं यथाथ संख्यार्एं होती हैं जबकि सतत् चर में प्रयुक्त संख्यार्एं निकटस्थ प्रकृति की होती हैं।

      मार्पन के स्तर- 

      एस.एस. स्टीवेन्स ने मार्पन की यथाथतार् के आधार्र पर मार्पन के चार्र स्तर बतार्ये हैं:-

      1. नार्मित मार्पन (Nominal Measurement)- इनमें व्यक्तियों अथवार् घटनार्ओं को किसी गुण यार् विशेषतार् के आधार्र पर कोर्इ नार्म, शब्द, अंक यार् संकेत प्रदार्न कियार् जार्तार् हैं। इनमें कोर्इ क्रम यार् सम्बन्ध अंतर्निहित नहीं रहतार् हैं। यह एक गुणार्त्मक मार्पन है, तथार् प्रार्प्त मार्नों यार् संकेतों से कोर्इ भी गशितीय संक्रियार् जैसे- जोड़, घटार्नार्, गुणार्, भार्ग आदि सम्भव नहीं हैं। गुणों के आधार्र पर मार्त्र विभिé समूहों यार् उप समूहों की रचनार् की जार् सकती हैं। जैसे- णहरी, ग्रार्मीण यार् कलार्, विज्ञार्न, वार्णिज्य आदि।
      2. क्रमित मार्पन (Ordinal Measurement)- यह मार्पन गुणों की मार्त्रार् के आकार पर आधार्रित होतार् है जिस कारण विभिé श्रेणियों यार् उप समूहों में एक निश्चित क्रम होतार् है। वर्गों को कोर्इ नार्म यार् प्रतीक प्रदार्न करते हैं। जैसे- योग्यतार् के आधार्र पर श्रेण्ठ, औसत, कमजोर यार् प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथार् फेल आदि। क्रमित मार्पन भी नार्मित मार्पन के भार्ँति गुणार्त्मक मार्पन हैं। इसमें प्रत्येक समूह में सदस्यों की संख्यार् ज्ञार्त की जार् सकती है किन्तु गशितीय संक्रियार्एं सम्भव नहीं है।
      3. अन्तरित मार्पन- (Interval Measurement) यह मार्पन गुणों की मार्त्रार् पर आधार्रित होतार् है गुणों की मार्त्रार् क इस प्रकार श्रेणीबद्ध कियार् जार्तार् है कि प्रत्येक उप श्रेणी में अन्तर समार्न रहतार् है। शैक्षिक, सार्मार्जिक तथार् मनोवैज्ञार्निक चरों क मार्पन अन्तरित पैमार्ने पर ही कियार् जार्तार् है। इन इकाइयों में शून्य क अर्थ परम शून्य यार् पूर्ण गुण विहीनतार् नहीं होतार् हैं अंतरित मार्पन में प्रार्प्त अंकों के सार्थ जोड़ तथार् घटार्नार् तो सम्भव है किन्तु गुणार् यार् भार्ग सम्भव नहीं है।

      जैसे- ग्रेडिंग में श्रेणी A,B,C,D,E

      100-80 80-60 60-40 40-20 20-10
      A B C D E

      1. अनपुार्तिक मार्पन- (Ratio Measurement) यह सर्वार्धिक परिमार्जिर्त मार्पन है जिसमें अन्तरित मार्पन के लक्षणों के सार्थ परम शून्य भी निहित होतार् है। शून्य क अर्थ अस्तित्व विहीनतार् होतार् है। अनुपार्तिक मार्पन में प्रार्प्त मार्पों की अनुपार्तिक तुलनीयतार् है। यह मार्पन परिणार्मों क अनुपार्त के रूप में व्यक्त करतार् हैं। अधिकांश भौतिक चरों क मार्पन अनुपार्तिक स्तर क होतार् है। अनुपार्तिक मार्पन कल्पित शून्य न हो कर वार्स्तविक तथार् परम शून्य होतार् है तथार् प्रार्प्त परिणार्मों से जोड़, घटार्नार्, गुणार्, भार्ग सभी गशितीय संक्रियार्एं सम्भव हैं।

      मूल्यार्कंन 

      मूल्यार्ंकन क अर्थ है मूल्य क अंकन करनार्। यह मूल्य निर्धार्रण की प्रक्रियार् है जो मार्पन की अपेक्षार् अधिक व्यार्पक है। मूल्यार्ंकन गुणों यार् विशेषतार्ओं की वार्ंछनीयतार् स्पष्ट करतार् है। किसी व्यक्ति में उपस्थित गुणों की मार्त्रार् क विश्लेषणार्त्मक अथवार् गुणार्त्मक विवरण मूल्यार्ंकन प्रस्तुत करतार् है और यह बतार्तार् है कि किसी निश्चित उद्देश्य हेतु वह कितनार् उपयुक्त यार् संतोषप्रद है। बेड फील्ड तथार् मोरडोक के अनुसार्र- ‘‘मूल्यार्कं न किसी सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक अथवार् वैज्ञार्निक मार्नदण्ड के सन्दर्भ में किसी घटनार् को प्रतीक आवंटित करनार् हैं जिससे उस घटनार् क महत्व अथवार् मूल्य ज्ञार्त कियार् जार् सके।’’ एन.एम. डार्डंकेर ने मूल्यार्कंन को छार्त्रों के द्वार्रार् शैक्षिक उद्देश्यों के प्रार्प्त करने की क्रमबद्ध प्रक्रियार् के रूप में परिभार्षित कियार् है। एन.सी.र्इ.आर.टी. ने मूल्यार्ंकन को ऐसी सतत् व व्यवस्थित प्रक्रियार् कहार् है जो शैक्षिक उद्देश्यों की प्रप्ति की सीमार्, अधिगम अनुभवों की प्रभार्वशीलतार् क आंकलन करती है। मूल्यार्ंकन एक अत्यन्त ही व्यार्पक तथार् बहुआयार्मी प्रत्यय है जो पार्ठ्यवस्तु के ज्ञार्न के आंकलन के अतिरिक्त विद्यार्लयी पार्ठ्यक्रम से सम्बन्धित समस्त उद्देश्यों की एक विशार्ल तथार् व्यार्पक श्रृंखलार् है जो बार्लक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास से सम्बन्धित है। मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् के तीन प्रमुख अंग हैं-

      1. शिक्षण उद्देश्य 
      2. अधिगम क्रियार्एं 
      3. व्यवहार्र परिवर्तन 

        शिक्षण उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिए विद्यार्लय में अधिगम क्रियार्एं आयोजित की जार्ती हैं जिनसे छार्त्रों के व्यवहार्र में परिवर्तन होतार् है तथार् इन व्यवहार्र परिवर्तनों की तुलनार् शैक्षिक उद्देश्यों से करके मूल्यार्ंकन कियार् जार्तार् हैं। अत: मूल्यार्ंकन एक अत्यन्त व्यार्पक तथार् बहुआयार्मी प्रत्यय हैं जिसक सम्बन्ध मार्त्र छार्त्रों की शैक्षिक उपलब्धि से न होकर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास से होतार् है।

        मार्पन, मूल्यार्ंकन, परीक्षार् तथार् मूल्यकरण 

        किसी वस्तु में निहित किसी गुण की मार्त्रार् को सूक्ष्मतार् से ज्ञार्त करनार् मार्पन है। मार्पन प्रार्य: एक विमीय व स्थार्यी होतार् है और यह मूल्यार्ंकन यार् मूल्यकरण को आधार्र प्रदार्न करतार् है। मूल्यार्कंन एक व्यार्पक प्रत्यय है जो किसी वस्तु में निहित गुणों की मार्त्रार् के आधार्र पर उसकी वार्ंछनीयतार् की श्रेणी क निर्धार्रण करतार् है जो समय परिस्थिति तथार् आवश्यकतार् के अनुसार्र परिवर्तित होती रहती है। परीक्षार् क अर्थ है परि तथार् इक्ष अर्थार्त चार्रों ओर से देखनार्। इसमें किसी क्षेत्र विशेष में छार्त्रों के ज्ञार्न के स्तर क पतार् लगार्नार्। परीक्षार्एं विषय वस्तु के सन्दर्भ में छार्त्रों के ज्ञार्न क स्तर मार्पती हैं। जबकि मूल्यार्ंकन इसके अतिरिक्त ज्ञार्न की साथकतार् क निर्धार्रण करतार् है और इसक सम्बन्ध छार्त्रों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से होतार् है। परीक्षार्एं अल्पकालिक होती हैं जबकि मूल्यार्ंकन एक सतत् प्रक्रियार् है। परीक्षार् के आधार्र पर छार्त्रों को विभिé विषयों में अंक प्रदार्न करनार् मार्पन है जबकि अंकों के आधार्र पर प्रथम, द्वितीय, तश्तीय यार् सम्मार्नजनक श्रेणी प्रदार्न करनार् मूल्यार्ंकन है। मूल्यकरण तथार् मूल्यार्ंकन दोनों ही मूल्य निर्धार्रण से सम्बन्धित हैं। मूल्यार्ंकन क दृष्टिकोण आन्तरिक होतार् है जबकि मूल्यकरण बार्ºय होतार् है। मूल्यार्ंकन वार्ंछनीयतार् पर बल देतार् है जबकि मूल्यकरण उपयोगितार् दर्शार्तार् है। दोनों क आधार्र मार्पन ही है।

        मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन क महत्व 

        शिक्षार् एक सोद्देश्य मार्नव निर्मार्ण की प्रक्रियार् है। इसके विभिé पक्षों पर सतत् निगरार्नी आवश्यक होती है। किसी भी स्तर पर एक छोटी सी चूक भयार्वह परिणार्म प्रस्तुत कर सकती है। अत: इससे परोक्ष यार् अपरोक्ष रूप से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति-छार्त्र, अध्यार्पक, अभिभार्वक, समार्ज तथार् प्रशार्सक की दृष्टि से मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन क महत्व रहतार् है। यह छार्त्रों को अपनी प्रगति की जार्नकारी तो देतार् ही है सार्थ ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणार् तथार् आत्मविश्वार्स जार्गश्त भी करतार् है। अध्यार्पकों को शिक्षण हेतु उपयुक्त प्रविष्टिार् के चुनार्व में, शिक्षण विधि की सफलतार् जार्नने में, उपयुक्त परीक्षार् प्रणार्ली विकसित करने में मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन क विशेष महत्व होतार् है। अभिभार्वक अपने बार्लकों हेतु विद्यार्लय, पार्ठ्यक्रम, भार्वी दिशार् तय करने में मार्पन व मूल्यार्ंकन क सहार्रार् लेते हैं। शैक्षिक नीतियों में संशोधन, शैक्षिक वित्त एवं प्रशार्सनिक व्यवस्थार् के निर्धार्रण में शैक्षिक प्रशार्सक मार्पन व मूल्यार्ंकन क सहार्रार् लेते हैं। समार्ज तथार् रार्ष्ट्र क तो निर्मार्ण ही शिक्षार् की गुणवत्तार् पर निर्भर करतार् है। अत: कोर्इ भी रार्ष्ट्र अपनी शिक्षार् व्यवस्थार् से किसी भी प्रकार समझौतार् नहीं कर सकतार् है। सदैव सजग रूप से इस पर नियंत्रण रखतार् है। अत: मार्पन व मूल्यार्ंकन क महत्व शिक्षार् व्यवस्थार् से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए है जिसे निम्नवत् बिन्दुवार्र व्यक्त कियार् जार् सकतार् है-

        1. शैक्षिक नीतियों के निर्धार्रण में मार्पन व मूल्यार्ंकन की महत्वपूर्ण भूमिक होती है।
        2. शिक्षार् के उद्देश्य निर्धार्रित करने में तथार् उद्देश्य प्रार्प्ति की सीमार् ज्ञार्त करने में यह स्पष्ट योगदार्न करतार् है। 
        3. मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन शिक्षक की प्रभार्वशीलतार् इंगित करतार् है। 
        4. यह छार्त्रों को अध्ययन हेतु प्रोत्सार्हित करतार् है। 
        5. यह पार्ठ्यक्रम, शिक्षण विधि, सहार्यक सार्मग्री तथार् मूल्यार्ंकन विधि में सुधार्र हेतु आधार्र स्पष्ट करतार् है। 
        6. कक्षार् शिक्षण को प्रभार्वशार्ली तथार् जीवन्त बनार्ने हेतु यह अध्यार्पकों को निर्देशित करतार् है। 
        7. यह छार्त्रों को उनकी रूचियों तथार् अभिक्षमतार्ओं की पहचार्न करार्कर शैक्षिक तथार् व्यार्वसार्यिक निर्देशन प्रदार्न करतार् है। 
        8. शिक्षार् में चल रहे विभिन्न नवार्चार्रों की उपयोगितार् ज्ञार्त करने में तथार् नवीन प्रविधियों की खोज में यह महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है।

        मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन के उद्देश्य 

        शिक्षार् क क्षेत्र अत्यन्त व्यार्पक है तथार् इसकी प्रक्रियार् अत्यधिक जटिल व विकासार्त्मक है जो देश, काल, परिस्थिति एवं आवश्यकतार् के अनुरूप परिवर्तित होती रहती है। मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन इस प्रक्रियार् में लिटमस परीक्षण की भार्ँति कार्य करती हैं। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न है-

        1. छार्त्रों को अर्जित ज्ञार्न क स्तर बतार्नार्। 
        2. छार्त्रों के सर्वार्ंगीण विकास में सहार्यतार् करनार्। 
        3. विकास में बार्धक तत्वों की पहचार्न करनार्। 
        4. छार्त्रों को वैयक्तिक आवश्यकतार्ओं के अनुरूप शिक्षार् सुविधार्एं उपलब्ध करार्नार्। 
        5. छार्त्रों में स्वस्थ प्रतियोगितार् की भार्वनार् विकसित करनार्। 
        6. अधिगम को सहज बनार्कर शिक्षण को आनन्ददार्यी बनार्नार्। 
        7. पार्ठ्यक्रम में परिवर्तन क आधार्र प्रस्तुत करनार्। 
        8. शिक्षण विधियों में विकास क आधार्र तथार् नवीन अधिगम सार्मग्रियों के चयन को प्रोत्सार्हित करनार्। 
        9. योग्यतार् आधार्रित वर्गीकरण करनार् तथार् आवश्यकतार् अनुरूप गुणार्त्मक शैक्षिक अनुभव हेतु प्रोत्सार्हित करनार्। 
        10. छार्त्रों को उपयुक्त शैक्षिक तथार् व्यार्वसार्यिक निर्देशन क आधार्र स्पष्ट करनार्। 
        11. परीक्षार् प्रणार्ली में सुधार्र क आधार्र प्रस्तुत करनार् तथार् रार्ष्ट्रीय व अन्तर्रार्ष्ट्रीय शैक्षिक मार्नकों को निर्धार्रित करनार्।

        मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन के कार्य  

        शिक्षार् प्रक्रियार् में मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन छार्त्रों द्वार्रार् अर्जित ज्ञार्न के स्तर को ज्ञार्त करने हेतु कियार् जार्तार् है जिससे शिक्षण प्रक्रियार् में यथोचित सुध् ार्ार्र क आधार्र प्रस्तुत कियार् जार् सके। मार्पन छार्त्रों की कमजोरियों तथार् कठिनाइ के क्षेत्रों की पहचार्न हेतु कियार् जार्तार् है। सार्थ ही छार्त्रों की वर्तमार्न क्षमतार्ओं को ज्ञार्त कर उनकी भविष्य को कार्य क्षमतार् के सम्बन्ध में पूर्वार्नुमार्न लगार्ने में भी कियार् जार्तार् है। अत: मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन के तीन प्रमुख कार्य हैं- सार्फल्य निर्धार्रण (Prognostic Function), निदार्नार्त्मक कार्य (Diagnostic Function) तथार् पूर्वकथन (Prediction)। इनके अतिरिक्त मार्पन तुलनार् करने में, वर्गीकरण तथार् चयन करने में तथार् अनुसंधार्न कार्यों में भी प्रयुक्त होतार् है। फिन्डले (1963) ने मार्पन के तीन कार्य स्पष्ट किये हैं-

        शैक्षिक कार्य, प्रशार्सनिक कार्य तथार् निर्देशनार्त्मक कार्य। शैक्षिक कार्य के अन्तर्गत शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् को रोचक, सजग तथार् उत्पार्दक बनार्ने हेतु मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन द्वार्रार् प्रार्प्त परिणार्मों क उपयोग कियार् जार्तार् है। मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन छार्त्रों, अध्यार्पकों तथार् अभिभार्वकों सभी हेतु पृष्ठपोषण क कार्य करते हैं। ये सभी स्वमूल्यार्ंकन, सहयोगी मूल्यार्ंकन तथार् बार्ºय मूल्यार्ंकन के परिणार्मों क प्रयोग अपनी स्थिति एवं कार्य प्रणार्ली को सुधार्रने हेतु करते हैं।

        प्रशार्सनिक कार्य के अन्तर्गत चयन, प्रमार्पीकरण, वित्तीय नियंत्रण, सार्मार्न्य प्रशार्सन, गुणवत्तार् निर्धार्रण, वर्गीकरण आदि सम्मिलित हैं। रार्ष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथार् सार्मार्जिक स्तर पर शैक्षिक आवश्यकतार्ओं की पहचार्न तथार् मार्ँग के अनुरूप गुणार्त्मक शैक्षिक सेवार्ओं की उपलब्धतार् सुनिश्चित कर रार्ष्ट्रीय तथार् अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर के मार्नकों के निर्धार्रण में मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन महत्वपूर्ण भूमिक निभार्तार् है। शैक्षिक लार्गत क निर्धार्रण तथार् समयबद्ध कार्यक्रम के अनुसार्र शैक्षिक उपलब्धि सुनिश्चित करने हेतु शैक्षिक प्रशार्सन को निर्देशित करनार् मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन क कार्य है। कक्षार् कक्ष गतिविक्षिार्यों के नियमन से लेकर सम्पूर्ण शैक्षिक प्रार्ंगण की गतिविधियों की निगरार्नी तथार् गुणार्त्मक सुधार्र बिनार् मार्पन व मूल्यार्ंकन सम्भव नहीं हो सकतार्। निर्देशन कार्य में छार्त्रों की क्षमतार्, रूचि, योग्यतार् तथार् अभिक्षमतार् के पहचार्न तथार् उनके अनुरूप शैक्षिक व व्यार्वसार्यिक निर्देशन प्रदार्न करने में मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन क उपयोग होतार् है। निर्देशन सेवार्ओं की उपयुक्ततार् तथार् उसमें संशोधन भी मार्पन तथार् मूल्यार्ंकन के बिनार् सम्भव नहीं है। पार्ठ्यक्रम तथार् शैक्षिक गतिविधयों में परिवर्तन तथार् मार्ँग के अनुरूप शैक्षिक अनुभव को मार्पन द्वार्रार् ही सुनिश्चित कियार् जार् सकतार् है।

        मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् 

        शिक्षार् एक सतत् अन्त: क्रियार्त्मक प्रक्रियार् है जिसक अभिé अंग मूल्यार्ंकन है। मूल्यार्ंकन कार्यक्रम एक प्रक्रियार् के रूप में शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् से सम्बन्धित रहतार् हैं। उद्देश्य निर्धार्रण के उपरार्न्त शिक्षण बिन्दुओं क निर्धार्रण तथार् शिक्षण क्रियार्ओं के आयोजन के उपरार्न्त छार्त्रों के व्यवहार्र परिवर्तन की स्थिति क आकलन कर कमजोरी के बिन्दुओं को पहचार्न कर यथोचित पृष्ठपोषण आधार्र तैयार्र करनार् मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् के अन्तर्गत आतार् है। कहार्ँ पहुँचार्नार् थार्? कैसे पहुँचार्नार् थार्? किस प्रकार पहुँचार्यार् गयार्? क्यार् वार्स्तव में पहुँचार् पार्ये? क्यार् कारण हैं कि वहार्ँ तक नहीं पहुँच पार्ये? अब कैसे लक्ष्य प्रार्प्ति की जार्य? आदि मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् के अंग हैं। इन्हें उद्देश्य निर्धार्रण, अधिगम क्रियार्ओं क संचार्लन तथार् मूल्यार्ंकन में क्रमबद्ध कर सकते हैं। उद्देश्य निर्धार्रण मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् क प्रथम चरण है जिसक लक्ष्य यह ज्ञार्त करनार् है कि मूल्यार्ंकन किसक करनार् है? अर्थार्त् शैक्षिक उद्देश्य क्यार् हैं? दूरगार्मी तथार् तार्त्कालिक उद्देश्य छार्त्र की शार्रीरिक, मार्नसिक स्थिति, विषय वस्तु की प्रकृति, सार्ंस्कृतिक आधार्र, तथार् शिक्षार् के स्तर पर आधार्रित होते हैं। विशिष्ट उद्देश्य प्रत्यक्ष तथार् कार्यपरक होते हैं। बिनार् सार्मार्न्य तथार् विशिष्ट उद्देश्यों के निर्धार्रण के शिक्षण प्रक्रियार् की वार्न्छनीयतार् निध्र्धार्रित नहीं की जार् सकती है। उद्देश्य निर्धार्रण के उपरार्न्त उन शिक्षण बिन्दुओं क निर्धार्रण कियार् जार्तार् है जिनके द्वार्रार् विशिष्ट शैक्षिक उद्देश्यों की प्रार्प्ति सुनिण्चित की जार्ती है। विषय वस्तु के वे संक्षिप्त पूर्ण इकाइयार्ँ जो एक क्रम में लक्ष्य प्रार्प्ति में सहार्यक होते हैं शिक्षण बिन्दु कहलार्ते हैं। शिक्षण बिन्दुओं के निर्धार्रण के उपरार्न्त वार्स्तविक शिक्षण अधिगम क्रियार्ओं क आयोजन होतार् है जिससे शिक्षण उद्देश्यों की प्रार्प्ति सुनिण्चित की जार् सके। शिक्षण उद्देश्यों की प्रार्प्ति हुर्इ यार् नहीं यह निर्धार्रित करने हेतु छार्त्रों में व्यवहार्र परिर्वतन की वस्तु स्थिति जार्नने क प्रयार्स होतार् है जिसमें परीक्षण, समार्जमिति, प्रश्नार्वली, सार्क्षार्त्कार, अवलोकन, संचित अभिलेख आदि क प्रयोग कियार् जार्तार् है। इनके प्रार्प्तार्ंको के आधार्र पर परिवर्तित व्यवहार्र की अपेक्षित व्यवहार्र परिवर्तन के संदर्भ में वार्ंछनीयतार् के सार्पेक्ष व्यार्ख्यार् की जार्ती है जिसे मूल्यार्ंकन कहते हैं। यदि परिवर्तित व्यवहार्र की स्थिति अपेक्षित व्यवहार्र परिवर्तनों के निकट होती है तो शिक्षण प्रक्रियार् सन्तोषप्रद आँकी जार्ती है। चूँकि शतप्रतिशत छार्त्रों में शत-प्रतिशत वार्न्छित परिवर्तन लार्नार् असम्भव होतार् है अत: व्यवहार्र परिवर्तनों के सन्दर्भ में न्यूनतम अधिगम स्तर (MLL) निध्र्धार्रित कियार् जार्तार् है। यदि 80: छार्त्र 80: व्यवहार्र परिवर्तन दर्शार्ते हैं तो इसे मार्स्टरी लर्निंग की श्रेणी में रखते हैं। मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् क अन्तिम और महत्वपूर्ण चरण पृष्ठपोषण (Feed Back) है। मूल्यार्ंकन से शिक्षण के अप्रार्प्त विशिष्ट उद्देश्यों की स्थिति स्पष्ट होने के उपरार्न्त शिक्षण उद्देश्यों क पुन: निर्धार्रण कियार् जार्तार् है। शिक्षण बिन्दुओं क चयन कर शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् क आयोजन कियार् जार्तार् हैं। छार्त्रों की स्थिति को देखते हुए वैकल्पिक स्ट्रेटजीज अपनार्यी जार्ती हैं जिससे छार्त्रों को निर्धार्रित उद्देश्यों के समीप पहँुचार्यार् जार् सके। व्यवहार्र परिवर्तन की जार्नकारी हेतु मूल्यार्ंकन कियार् जार्तार् है। यह क्रियार् चक्रिय रूप में तब तक अपनयी जार्ती है। जब तक निर्धार्रित उद्देश्य प्रार्प्त नहीं कर लिए जार्ते हैं।

        मार्पन की त्रुटियार्ँ 

        चूँकि शैक्षिक मार्पन एक अप्रत्यक्ष मार्पन है, अत: इसमें त्रुटियों क होनार् स्वार्भार्विक है। मार्पन की त्रुटियों में वे सभी त्रुटियार्ँ सम्मिलित होती हैं जो वार्स्तविक मार्पन अंको को किसी भी प्रकार प्रभार्वित करती हैं। ये मुख्यतयार्- व्यक्तिगत त्रुटि, चर त्रुटि, स्थिर त्रुटि तथार् व्यार्ख्यार्त्मक त्रुटि होती हैं।

        प्रार्य: मार्पन में परीक्षक अपने विवेक से परीक्षार्थ्र्ार्ी द्वार्रार् दिये उत्तर पर अंक प्रदार्न करते समय व्यक्तिनिष्ठ मार्पन कर बैठते हैं जिसमें परीक्षक की पसन्द, दृष्टिकोण, मन: स्थिति, थकान, पूर्वार्ग्रह आदि क प्रभार्व अंको पर पड़तार् है जिसे व्यक्तिगत त्रुटि कहार् जार्तार् है। परीक्षण को वस्तुनिष्ठ बनार्कर, केन्द्रीय मूल्यार्ंकन द्वार्रार्, बहुपरीक्षक मूल्यार्ंकन तथार् मार्डल उत्तर प्रार्रूप प्रदार्न कर व्यक्तिगत त्रुटि को कम कियार् जार् सकतार् है।

        परीक्षण के प्रशार्सन के दौरार्न निर्देशों की अस्पष्टतार्, परीक्षण स्थिति में अन्तर, संयोग द्वार्रार् उत्तर, थकान, प्रश्नों की अस्पष्टतार्, प्रोत्सार्हन, चिन्तार् आदि के कारण चर त्रुटियार्ँ आ जार्ती हैं। परीक्षण की विश्वसनीयतार् में वृद्धि करके चर त्रुटियार्ँ कम की जार् सकती हैं।

        मार्पन में कुछ त्रुटियार्ँ ऐसी होती हैं जो सभी परीक्षाथियों को समार्न रूप से प्रभार्वित करती हैं, स्थिर त्रुटि कहलार्ती हैं। जब कोर्इ परीक्षण इच्छित योग्यतार् क ठीक-ठीक मार्पन न कर किसी अन्य योग्यतार् क पूर्ण यार् आंशिक मार्पन करतार् है, तब प्रार्प्त अंक त्रुटिपूर्ण हो जार्ने हैं। चूंकि ये त्रुटियार्ँ सभी परीक्षाथियों में समार्न रूप से होती हैं अत: इन्हें स्थिर त्रुटि कहते हैं। परीक्षण की वैधतार् को बढ़ार्कर स्थिर त्रुटियों को कम कियार् जार् सकतार् है। मार्नकों यार् संदर्भ बिन्दुओं के अभार्व में यार् दोषपूर्ण होने पर प्रार्प्तार्ंको की व्यार्ख्यार् त्रुटिपूर्ण हो जार्ती है। जिसके कारण व्यार्ख्यार्त्मक त्रुटि बढ़ जार्ती है। व्यार्पक आधार्र पर मार्नक तैयार्र कर व्यार्ख्यार्त्मक त्रुटियों को कम कियार् जार् सकतार् है।

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