शिक्षार् और विज्ञार्न
विज्ञार्न की अवधार्रणार् एवं औचित्य विज्ञार्न एक चिन्तन की प्रविधि है, नवीन ज्ञार्न अर्जित करने की विधि है। ‘विज्ञार्न’ शब्द मे मूंल शब्द ज्ञार्न और ‘वि’ उपसर्ग है इसक अभिप्रार्य है विशुद्ध ज्ञार्न, पूर्णतयार् जॉचार्-परखार् ज्ञार्न, तर्कसंगत ज्ञार्न। वर्तमार्न के प्रयोगवार्दी एवं यथाथवार्दी युग में उस ज्ञार्न को प्रश्रय दियार् जार्ने लगार् जो कि वार्स्तविक जीवन के लिये उपयोगी हो। यही विज्ञार्न है जिसने मार्नव जीवन में एक क्रार्ंति उत्पन्न कर दी जिसके फलस्वरूप व्यक्ति क आधुनिक जीवन पूर्णतयार् सार्हित्यिक शिक्षार् के अपेक्षार् व्यार्वहार्रिक जीवन में उपयोगी शिक्षार् की ओर ध्यार्न देनार् प्रार्रम्भ कियार् और पार्ठ्यक्रम में वैज्ञार्निक विषयों केार् महत्वपूर्ण स्थार्न प्रदार्न करने पर बल दियार् जार्ने लगार्। शिक्षार् में वैज्ञार्निक प्रवृत्ति 19वीं शतार्ब्दी के उत्तराद्ध में विशेष रूप में फली फूली। इस शतार्ब्दी से ही विज्ञार्न के अध् ययन एवं अध्यार्पन पर विशेष बल दियार् जार्ने लगार्। इस प्रवृत्ति के उन्नति क प्रमुख कारण है-

  1. यूरोप में अनेक वैज्ञार्निक आविष्कारों ने जन्म लियार्, इससे औद्योगिक क्रार्ंति हुर्इ, और इन आविष्कारों ने वर्षों से सैद्धार्न्तिक तथ्यों को व्यार्वहार्रिक रूप दियार् और इनके सही यार् गलत होने क दियार् इस विचार्र ने विज्ञार्न के प्रति लेार्गों क विश्वार्स बढ़ार्यार्।
  2. सैद्धार्न्तिक और सार्हित्यिक शिक्षार् के तथ्य व्यार्वहार्रिक जीवन के लिये उपयुक्त नहीं रह गये, और ये जीवन की वार्स्तविकतार् तैयार्री करार्ने में असमर्थ रहे।
  3. विश्व के विभिन्न भार्गों में मार्नव ने कार्य कारण को ज्ञार्त करने हेतु प्रयोग करनार् प्रार्रम्भ कर दियार् इसके फलस्वरूप रूढ़िवार्दितार्, अज्ञार्नतार् और अन्धविश्वार्सों की उपेक्षार् होने लगी। इस प्रकार वैज्ञार्निक प्रयोगों ने मनुष्य को आकर्षित कियार्।
  4. विज्ञार्न की विभिन्न शार्खार्ओं भौतिकशार्स्त्र, रसार्यनशार्स्त्र, ज्यार्तिशार्स्त्र, भूगर्भशार्स्त्र, शरीरशार्स्त्र, वनस्पतिशार्स्त्र आदि ने भी अत्यधिक विकास कर सभी क्षेत्रों में लेार्गों को बनार्वटी धार्रणार्ओं को समार्प्त कर वार्स्तविक तथ्यों को उजार्गर कियार् जिससे लोगों की रूचि बढ़ी। 
  5. जीव विज्ञार्न के विकास क सिद्धार्न्त ने मार्नव केार् वैचार्रिक परिवर्तन की कगार्र पर लार्कर खड़ार् कर दियार्।
  6. आदर्शवार्दी दर्शन के विचार्रकों ने भी शिक्षण एवं चिन्तन में वैज्ञार्निक विधियों के समार्वेश पर बल दियार्।

विज्ञार्न की प्रकृति एवं प्रवृत्ति की विशेषतार्

विद्याथियों में विज्ञार्न की प्रकृति को बोध के रूप में रखार् गयार् है, और इस बोध को वैज्ञार्निक सार्क्षरतार् मार्न लियार् गयार् और अब व्यक्ति से यह आशार् की जार्ती है, कि वह विज्ञार्न सम्बंधी समस्यार्ओं पर उचित निर्णय लेने की क्षमतार् रखतार् हो। इसमें शोध के लिये प्रश्न विकसित करनार्, आंकड़े, एकत्र करनार्, आंकड़ों क विश्लेषण करनार् व निश्कर्ष निकालनार् आदि प्रमुख है। विज्ञार्न की मुख्य विशेषतार्ओं कोह म इस रूप में देख सकते हैं कि यह तर्क और प्रमार्ण पर आधार्रित ज्ञार्न क योग है। पार्लमुनरो ने लिखार्-’’शिक्षार् में आधुनिक वैज्ञार्निक पृवत्ति की मुख्य विशेषतार्यें प्रार्य: ठीक वे ही है, जो इन्द्रिय-यथाथवार्दी प्रवृत्ति की है। प्रथम- विषयवस्तु के महत्व पर बल तथार् प्रकृति की घटनार्ओं क ज्ञार्न और द्वितीय-अध्ययन की आगमन विधि के अनुभवार्तीत महत्व को स्वीकार करनार्।’’ वैज्ञार्निक प्रवृत्ति की कुछ विशेषतार्यें और है-

  1. पार्ठ्य्यक्रम में वैज्ञार्निक विषयों को प्रमुखतार्, वैज्ञार्निक प्रवृत्ति के समर्थकों ने यह स्पष्ट कर दियार् कि मार्नव जीवन में विज्ञार्न क महत्व अत्यधिक है। क्योंकि सार्हित्यिक शिक्षार् मार्नव को भार्वी जीवन के लिये तैयार्र नहीं कर सकती है, क्योंकि ये सभी व्यार्वहार्रिक नहीं है। इस दृष्टि से उन्होने वैज्ञार्निक विषयों शरीर विज्ञार्न, स्वार्स्थ्य विज्ञार्न, रसार्यन एवं भौतिक विज्ञार्न, भूगोल, गणित को पार्ठ्यक्रम में प्रमुखतार् से सम्मिलित करने की मार्ंग की है। 
  2. विषय वस्तु पर बल- विज्ञार्न में विषय वस्तु पर बल दियार् जार्तार् है। इस प्रवृत्ति ने विश्व के समक्ष यह प्रश्न रखार् कि जिन विषयों की वार्स्तविक जीवन में उपयोगितार् सिद्ध न हो उन्हें पार्ठ्यक्रम में रखने क क्यार् लार्भ और ज्ञार्न की प्रार्प्ति व्यार्वहार्रिक विषयों से ही हो सकती है वर्तमार्न शिक्षार् में सबसे बड़ार् यक्ष प्रश्न यही है कि इसकी विषय वस्तु व्यार्वहार्रिक नहीं है। 
  3. शिक्षण की आगमन विधि पर बल- विज्ञार्न शिक्षण की आगमन विधि पर बल देतार् है क्योंकि यह विधि पूर्णतयार् मनोवैज्ञार्निक है, जिसमें हम सरल से कठिन और ज्ञार्त से अज्ञार्त और स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जार्ती है, और उसमें आंकड़ों के एकत्रीकरण विश्लेषण, स्वयं कार्यशीलन तथार् सत्यार्न्वेषण पर अप्तिार्क बल दियार् जार्तार् है, और सीखने वार्ले स्वयं निश्कर्ष निकलतार् है और प्रमार्णों के सार्थ सीखतार् है। 
  4. सैैद्धार्न्तिक व अव्यार्वहार्रिक शिक्षार् क विरोध- वैज्ञार्निक प्रवृत्ति में सैद्धार्न्तिक और अव्यार्वहार्रिक शिक्षार् क विरोध प्रार्प्त होतार् है, क्योंकि यह शिक्षार् मार्नव को वार्स्तविक जीवन के लिये तैयार्र नहीं कर पार्ती है। 
  5. विज्ञार्न द्वार्रार् प्रकृति क वार्स्तविक ज्ञार्न- इन प्रवृत्ति ने यह विचार्र प्रतिपार्दित कियार् कि प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिये प्रयोग एवं विश्लेषण ही सर्वोत्तम है विज्ञार्न ने प्रकृति के अनछुये रहस्यों के सन्निकट मनुष्य को पहुॅचार्यार् है और विज्ञार्न ही प्रार्कृतिक तथ्यों को समझने क सर्वोत्तम आधार्र प्रदार्न करतार् है क्योंकि प्रयोग द्वार्रार् सिद्ध प्रमार्णों को बदलार् नहीं जार् सकतार् है। 
  6. उदार्र शिक्षार्- वैज्ञार्निक प्रत्ति उदार्र शिक्षार् पर बल देतार् है। पार्ल मुनरार् ने इस सम्बंध में लिखार् कि-’’उदार्र शिक्षार् वह है जो मनुष्य केार् अपने पेशे के लिये नार्गरिक के रूप में अपने जीवन के लिये और अपने जीवन की समस्त क्रियार्ओं को करने के योग्य बनार्ती है।’’ इसक अभिप्रार्य यह है कि प्रार्चीन काल से चली आ रही उदार्र शिक्षार् की अवधार्रणार् अब बदल गयी है। 
  7. शिक्षण की नवीनतम विचार्रधार्रार्ओं के प्रतिरूचि- वैज्ञार्निक प्रवृत्ति के समर्थक यह मार्नते हैं कि ज्ञार्न की वृद्धि बहुत तेजी से हो रहार् है और विज्ञार्न के क्षेत्र में लगभग 10 वर्ष में ही ज्ञार्न दोगुनार् हो जार्तार् है। ऐसी परिस्थिति में आज की शिक्षण विधियार्ं कल असफल हो सकती हैं। अत: शिक्षक में नवीन ज्ञार्न के विचार्रधार्रार्ओं के प्रतिरूचि बनी रहनी चार्हिये, और यही रूचि वे अपने विद्याथियों में भी जार्ग्रत करें।

विज्ञार्न क दर्शन एवं समार्जशार्स्त्र

विज्ञार्न क दर्शन-विज्ञार्न मूलत: कुछ मार्न्यतार्ओं पूर्व धार्रणार्ओं तथार् व्यवहार्र पर निर्भर करतार् है और यही मार्न्यतार्यें तथार् व्यवहार्र मिलकर विज्ञार्न को दर्शन बनार्ते हैं।

  1. प्रार्कृतिक रहस्यों को जार्नने हेतु प्रकृति के विषय में विज्ञार्न की मार्न्यतार्यें है- प्रकृति वार्स्तविक है, इसके क्रियार्कलार्पों के मध्य कार्य एवं कारण क सिद्धार्न्त है, और प्रकृति को कुछ सीमार् तक समझार् जार् सकतार् है।
  2. इसी प्रकार वैज्ञार्ार्निक खोज हेतु मार्न्यतार्यें है- बार्रम्बार्र दोहरार्ते रहनार्, अच्छे और सही परिणार्म की सम्भार्वनार् बनार्ये रखनार्, अनिश्य की स्थिति बनी रहती हैं।
  3. विज्ञार्न की अपनी नैतिक मार्न्यतार्यें भी है- (i) परिणार्म अनुभवों पर आधार्रित होंगे। (ii) सोच मुक्त होनी चार्हिये और इस सोच के सार्थ प्रयोग किये जार्ये। (iii) परिणार्मों में निष्पक्षतार् होनी चार्हिये। (iv) यह परिणार्म तब प्रार्संगिक थे आज भी है।
  4. विज्ञार्न क दर्शन कुछ प्रश्नों को लेकर चलतार् है- (i) विज्ञार्न ने अन्य प्रकार की खोज से क्यार् अलग खोजार् ? (ii) विज्ञार्न को खोज हेतु कौन सी प्रवृत्ति क प्रयोग करनार् चार्हिये? (iii) वैज्ञार्निक व्यार्ख्यार् कहार्ं तक दी जार् सकेंगी जो कि संतोषप्रद है? (iv) वैज्ञार्निक नियमों एवं सिद्धार्न्तों क संज्ञार्नार्त्मक स्तर क्यार् है?

विज्ञार्न क समार्जशार्स्त्र- विज्ञार्न और समार्ज भी एक-दूसरे से सम्बंधित हैं। विज्ञार्न के हर खोज एवं आविष्कार ने मार्नव समूह को सुख दियार् और जीवन को समृद्धि से परिपूर्ण बनार्यार्। विज्ञार्न, पर्यार्वरण तथार् दैनिक जीवन से जुड़ी हुर्इ अनेक समस्यार्यें एक-दूसरे से जुड़ी है। विज्ञार्न ने कृषि , ऊर्जार्, स्वार्स्थ्य एवं पोषण आदि सभी पक्षों को प्रभार्वित कियार् है। विज्ञार्न क प्रभार्व इक्कीसवीं सदीं के नार्गरिकों को इस कदर प्रभार्वित कियार् है कि इसने वैज्ञार्निक एवं प्रोैद्योगिकी, सार्क्षरतार्, वैज्ञार्निक दृष्टिकोण व वैज्ञार्निक अभिवृत्ति विकसित करनार् आवश्यक बनार् दियार्। विज्ञार्न व समार्ज के सहसम्बंध को इस रूप में देखार् जार् सकतार् है-

  1. समार्ज की अनेक समस्यार्यें विज्ञार्न के प्रचार्र-प्रसार्र क ही परिणार्म है, जैसे- प्रार्कृतिक संसार्धनों क दोहन, पर्यार्वरण प्रदूषण, जनसंख्यार् विस्फोट, शहरीकरण, औद्योगिकरण, विभिन्न भयार्नक संक्रमण, ड्रग्स इत्यार्दि।
  2. सभी समार्ज के विकास के आत्मनिर्भरतार् क मार्नक विज्ञार्न एवं प्रौद्योगिकी है। जिस समार्ज ने विज्ञार्न और प्रौद्योगिकी को अधिक अपनार्यार् और समझार् वह उतनार् ही विकसित हुआ।
  3. विकास करने और विज्ञार्न के कारण उत्पन्न समस्यार्ओं के लिये सम्बंधित समस्यार्ओं के प्रति बोध और उन पर निर्णय के लिये समार्ज में वैज्ञार्निक प्रौद्योगिकी सार्क्षरतार्, वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क निर्मार्ण एवं वैज्ञार्निक अभिवृत्ति क विकास आवश्यक है। विज्ञार्न एवं प्रौद्योगिकी क जन्म व विकास आम समार्ज के लिये ही हुआ अत: आम जनतार् के लिये यह आवश्यक है कि वह वैज्ञार्निक तकनीकी समस्यार्ओं से सम्बधित कारणों क निर्णय ले सके। प्रो0 डेनियल बेल ने स्पष्ट लिखार् है कि ‘‘कोर्इ भी सार्मार्जिक प्रणार्ली अन्तोगोत्वार् उसको लोकाचार्र से परिभार्शित हेार्ती है। ऐसे लोकाचार्र मूल्य उसके चिन्तन संस्कृति में होते हैं, और व्यवहार्र के मार्नक उनके चरित्र में। विज्ञार्न के लोकाचार्र पार्श्च औद्योगिक समार्ज के उदीयमार्न लोकाचार्र है।’’

शिक्षार् में विज्ञार्न के प्रवर्तक

हम पूर्व में विज्ञार्न और समार्ज के सम्बंध को पढ़ चुके हैं, और अब हम यह पढेगें कि शिक्षार् में वैज्ञार्निक प्रवृत्ति के प्रथम प्रवर्तक हरबर्ट स्पेन्सर है, इनक जन्म 1820 में डर्बी नार्मक शहर में लन्दन में हुआ। इनके पितार् एवं चार्चार् शिक्षक थे और पितार् के विज्ञार्न के शिक्षक होने के कारण स्पेन्सर की रूचि विज्ञार्न में बढ़ी और उन्होनें गणित, विज्ञार्न, इंजीनियरिंग, प्रकृति अध्ययन, अर्थशार्स्त्र आदि विषयों क ज्ञार्न प्रार्प्त कियार्। हरबर्ट स्पेन्सर ने 1861 में लेखन कार्य कियार् और उनकी प्रमुख रचनार्यें है-

  1. वार्ट एजुकेशन इज मोस्ट वर्थ 
  2. दि प्रिन्सिपल्स ऑफ एथिक्स 
  3. इन्टलैक्चुअल एजुकेशन 
  4. दि प्रिसिंपल्स ऑफ सोशियार्जार्ली 
  5. मोरल एजुकेशन 
  6. मैने वर्सेज स्टेट 
  7. फिजिकल एजुकेशन 
  8. फैक्ट्स एश्ड कमेश्टस 
  9. फस्र्ट प्रिसिंपल्स 
  10. दि फ़र्स्ट प्रिंसिपल्स आफ बार्योलार्जी 

स्पेन्सर के शैक्षिक विचार्र – स्पेन्सर के अनुसार्र-’’शिक्षार् जीवन की तैयार्री है।’’

  1. शिक्षार् के उद्देश्य के सम्बंध में स्पेन्सर ने लिखार्-’’शिक्षार् को पूर्ण जीवन के नियमों ढंगों से परिचित करार्नार् चार्हिये शिक्षार् क सबसे महत्वपूर्ण कार्य- हमें जीवन के लिये इस प्रकार तैयार्र करनार् है कि हम उचित प्रकार क व्यवहार्र कर सकें और शरीर मन तथार् आत्मार् क सदुपयोग कर सकें। स्पेन्सर ने इस बार्त पर बल दियार् कि हमें शिक्षार् द्वार्रार् पूर्ण जीवन के कार्य- आत्मरक्षार्, जीविकोपाजन, वंशवृद्धि एवं पार्लन-पोषण, सार्मार्जिक, आर्थिक एवं रार्जनीतिक तथार् अवकाश के सदुपयोग सम्बंधित कार्यो कों करने के लिये तैयार्र करनार् चार्हिये जिससे हम जीवन क वार्स्तविक आनन्द ले सकें। 
  2. पार्ठ्य्य्यक्रम- स्पेन्सर ने पूर्ण जीवन की समस्त क्रियार्ओं को पॉच भार्गों में बार्ंटार् है- आत्मरक्षार् की क्रियार् के लिये शरीर विज्ञार्न व स्वार्स्थ्य विज्ञार्न, जीवन रक्षार् के लिये भार्षार् गणित, भूगोल, पदाथ विज्ञार्न, शिशु रक्षार् के लिय गृहशार्स्त्र, शरीर विज्ञार्न व बार्लमनोविज्ञार्न, समार्जरक्षार् के लिये इतिहार्स, नार्गरिक शार्स्त्र व अर्थशार्स्त्र अवकाश सम्बंधी क्रियार्ओं के लिये सार्हित्य, संगीत, कवितार् एवं ललित कलार् रखने क सुझार्व रखार्।

शिक्षण की वैज्ञार्निक विधि-स्पेन्सर ने शिक्षण विधि को रार्चे क बनार्ते हुये मार्नसिक विकास की स्वार्भार्विक प्रक्रियार् को अपनार्ने क सुझार्व दियार् उन्होनें सरल से कठिन की ओर स्थूल से सूक्ष्म की ओर, ज्ञार्त से अज्ञार्त की ओर, अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की ओर, अनिश्चित से निश्चित व स्वशिक्षार् पर बल दियार्। अनुशार्सन के सम्बंध में स्पेन्सर ने वैज्ञार्निक दृष्टिकोण को ही अपनार्यार् है, उनके अनुसार्र- ‘‘ बार्लक को अपने आचरण के अनिवाय परिणार्मों तथार् अवश्यम्भार्वी प्रतिक्रियार्ओं को भोगनार् चार्हिये, जिनसे उसे लार्भप्रद नियंत्रणों क अनुभव होतार् है, जो वस्तुत: उसके शार्रीरिक हित से भिन्न होते हैं।’’

भार्रत सरकार की वैज्ञार्निक नीति

स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के समय लम्बे अर्से से परतंत्र रहे भार्रत की अर्थव्यवस्थार् पूरी तरह से लड़खड़ार् रही थी, तत्कालीन सरकार के समय सबसे बड़ी चुनौती देश को आत्मनिर्भर बनार्ने के सार्थ विकास की श्रेणी में खड़ार् करनार् थार्। तब भार्रत सरकार न इसे सहर्ष स्वीकार कियार् और 4 माच 1958 को संविधार्न द्वार्रार् स्वीकृत विज्ञार्न नीति संकल्प पर आधार्रित है। इसमें वैज्ञार्निक जार्नकारी तथार् अनुसंधार्न के व्यार्वहार्रिक उपयोग से होने वार्ले लार्भ को जनसार्मार्न्य को देने की सरकार की जिम्मेदार्री को मार्नार् गयार्। सरकार की यह नीति है कि ज्ञार्न के प्रसार्र में व्यक्तिगत प्रयार्सों को बढ़ार्वार् दियार् जार्ये और यह तय कियार् गयार् कि विज्ञार्न शिक्षार्, कृषि उद्योग तथार् प्रतिरक्षार् के क्षेत्र में वैज्ञार्निकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलार्ये जार्ने चार्हिये। सन् 1958 की रार्ष्ट्रीय विज्ञार्न शिक्षार् नीति के सुझार्व थे-

  1. व्यार्वहार्रिक और सैद्धार्न्तिक दोनों स्तरों पर हर सम्भव विज्ञार्न की शिक्षार् और वैज्ञार्निक अनुसंधार्नों को विकसित कियार् जार्ये। 
  2. वैज्ञार्निकों के उच्च स्तरीय अनुसंधार्नों की प्रतियार्ं सम्पूर्ण देश में उपलब्ध करार्यी जार्ये, जिससे कि देश समृद्धिशार्ली और शक्तिवार्न बने। 
  3. देश में शिक्षार्, विज्ञार्न, कृषि उद्योग और सुरक्षार् की आवश्यकतार् पूरी करने के लिये वैज्ञार्निक और तकनीकि प्रशिक्षण के कार्यक्रम बनार्ये जार्ये और इन पर द्रूत गति से कार्य कियार् जार्ये।
  4. यह सुनिश्चित करनार् कि रचनार्त्मक अभिवृत्ति रखने वार्ले लोगों को वैज्ञार्निक खोजों के लिये अभिप्रेरित कियार् जार्ये।
  5. वैयक्तिक रूप से अपने ज्ञार्न व वैज्ञार्निक खोजों के लिये लोगों को प्रोत्सार्हित कियार् जार्ये।

व़िद्यार्लयीय स्तर पर विज्ञार्न शिक्षण- स्वतंत्रतार् के सार्थ ही भार्रत ने विज्ञार्न शिक्षण के महत्व को स्वीकार कर लियार् थार्। स्वतंत्रतार् से पूर्व भी रार्जार् रार्ममोहन रार्य और स्वार्मी विवेकानन्द ने शिक्षार् में विज्ञार्न को समार्हित किये जार्ने क प्रबल समर्थन कियार् थार्। प्रार्थमिक एवं मार्ध्यमिक स्तर की शिक्षार् में विज्ञार्न शिक्षण के पुनर्गठन और विस्तार्र के लिये सन् 1967 में भार्रत सरकार और यूनेस्को-यूनीसेफ के मध्य एक करार्र पर हस्तार्क्षर कियार् गयार्। 1971 में रार्ज्य सरकारों को यह निर्देशित कियार् गयार् कि वे नर्इ अनुदेशनार्त्मक प्रशार्ली के परीक्षण हेतु प्रार्योगिक कार्य आरम्भ करें। प्रार्योगिक कार्य के इस योजनार् के अन्तर्गत जो धनरार्शि प्रदार्न की गयी वह प्रत्येक रार्ज्य के 50 चुने हुये प्रार्थमिक तथार् 30 जूनियर हाइस्कूलों को नि:शुल्क पार्ठ्यपुस्तकें तथार् विज्ञार्न किटों की आपूर्ति तथार् प्रार्प्त अनुभवों के आधार्र पर रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् सम्मिलित किये गये स्कूलों के शिक्षणों के लिये सेवार्कालीन प्रशिक्षण पर होने वार्ले व्यय तक ही सीमित थी। सभी रार्ज्यों एवं केन्द्रशार्सित प्रदेशों में विज्ञार्न में प्रार्योगिक कार्य क यह कार्यक्रम प्रार्रम्भ हो गयार्।

  1. इस कार्यक्रम में 100 शिक्षक प्रशिक्षण कालेज व 400 शिक्षक प्रशिक्षण स्कूलों के लिये विज्ञार्न, प्रयोगशार्लार्, उपकरण व पुस्तकालय हेतु पुस्तकें दी गयी। 
  2. 24000 स्कूलो और 31000 जूनियर हाइस्कूलों को विज्ञार्न किटों की आपूर्ति। 
  3. 55000 शिक्षकों अर्थार्त् प्रतिस्कूल एक शिक्षक क प्रशिक्षण की व्यवस्थार्।
  4. प्रति रार्ज्य एक पर्यवेक्षक वार्हन की सुविधार्।
  5. प्रति रार्ज्य एक चलप्रयोगशार्लार् वार्हन की आपूर्ति।
  6. नर्इ शिक्षण सार्मग्री के पुनर्मुद्रण के लिये कागज की आपूर्ति 16.9 विज्ञार्न शिक्षार् की समस्यार्यें विज्ञार्न शिक्षार् की समस्यार्यें जिन्हें हम इस रूप में देखते हैं, 
  7. शिक्षार् संस्थार्ओं में निर्धार्रित विज्ञार्न के पार्ठ्यक्रम बहुत पुरार्ने हैं, इनमें उपयोगितार् क अभार्व है। नवीन आविष्कारों एवं खोजों को समार्हित किये जार्ने की आवश्यकतार् है।
  8. हमार्रे देश में प्रचार्र-प्रसार्र से विज्ञार्न शिक्षण क कार्य प्रार्रम्भ हुआ, पर मार्ध् यमिक विद्यार्लयों में प्रयोगशार्लार्ओं में भौतिक संसार्धनों एवं वार्तार्वरण की कमी है।
  9. ग्रार्मीण क्षेत्रों में तो सार्क्षरतार् प्रतिशत ही अत्यल्प है, तो वैज्ञार्निक सोच व अभिवृत्ति क उत्पन्न होनार् तो और भी कठिन है। 
  10. विज्ञार्न विषय में सरस रोचक एवं बोधगम्य नवीन ज्ञार्न से परिपूर्ण पुस्तकों क अभार्व है। पुस्तकों में परम्परार्त्मकतार् एवं पुरार्तनतार् है। पार्ठ्यपुस्तकें नवीन ज्ञार्न, जिज्ञार्सार् अन्वेशण एवं कार्यशैली उत्पन्न करने में असमर्थ है। 
  11. शिक्षकों में भी विज्ञार्न शिक्षण को लेकर रूचि व सजगतार् क अभार्व है। अध्ययनों में यह पार्यार् गयार् कि विज्ञार्न एवं गणित में पुनर्बोधार्त्मक प्रशिक्षण प्रार्प्त कर विज्ञार्न किटों को भी प्रार्प्त कर लेने के पश्चार्त् भी कक्षार् शिक्षण में प्रयोग नहीं करते हैं। शिक्षण हेतु व्यार्ख्यार्न की परम्परार्गत विधियों क ही प्रयोग में लार्यार् जार्तार् है। 
  12. विज्ञार्न की शिक्षार् मार्तृभार्षार् में न दिये जार्ने के कारण भी यह विषय आम बच्चों के लिये बोधगम्य कम बन पार् रहार् है। 

विज्ञार्न शिक्षार् हेतु सुझार्व-विज्ञार्न शिक्षार् के प्रचार्र-प्रसार्र हेतु हमें कुछ कदम उठार्ने की आवश्यकतार् होगी-

  1. शिक्षार् के सभी स्तरों पर विज्ञार्न शिक्षार् को अनिवाय कर दियार् जार्ये।
  2. सभी स्तर की शिक्षार् संस्थार्न में विज्ञार्न शिक्षकों को नियुक्त कियार् जार्ये। 
  3. शिक्षण संस्थार्ओं में प्रशिक्षित अध्यार्पकों की नियुक्ति की जार्ये। 
  4. शिक्षकों को समय-समय पर पुनर्बोधार्त्मक प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्नार् चार्हिये।
  5. विज्ञार्न शिक्षार् हेतु शिक्षार् संस्थार्ओं को पर्यार्प्त भौतिक संसार्धन प्रदार्न किये जार्ये। 
  6. विज्ञार्न शिक्षार् हेतु रूचि लेने व अच्छी उपलब्धि वार्ले विद्याथियों को छार्त्रवृत्ति व प्रोत्सार्हन दियार् जार्ये।
  7. विज्ञार्न शिक्षार् क आकादमिक वार्तार्वरण तैयार्र कियार् जार्ये तार्कि वैज्ञार्निकों, तकनीशियनों एवं कुशल कर्मचार्रियों की आवश्यकतार् की पूर्ति के लिये देश की जनशक्ति क सर्वश्रेष्ठ उपयोग कियार् जार् सके।

कोठार्री कमीशन ने विज्ञार्न शिक्षार् की प्रगति हेतु सुझार्व दियार्- 

  1. विज्ञार्न व गणित के अध्ययन हेतु उच्च शिक्षार् केन्द्रों की स्थार्पनार् की जार्ये। 
  2. प्रतिभार्षार्ली शिक्षकों की नियुक्ति की जार्ये। 
  3. अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर भार्रतीय वैज्ञार्निकों को देश में आमंत्रण दियार् जार्यें।
  4.  सभी स्तर के पार्ठ्यक्रम में संशोधन व परिवर्द्धन कियार् जार्नार् चार्हिये। 
  5. सभी संस्थार्ओं की प्रयेार्गशार्लार्ओं एवं वार्तार्वरण में भौतिक संसार्धनों की आपूर्ति करनार् होगार्। 
  6. विज्ञार्न शिक्षार् के लिये ग्रीष्मकालीन संस्थार्न खोले जार्ये। 
  7. प्रौद्योगिकी व विज्ञार्न को शिक्षार् प्रशार्ली क आवश्यक अंग बनार्यार् जार्ये। 
  8. अच्छी विज्ञार्न पुस्तकों की रचनार् व भार्रतीय भार्षार्ओं में अनुवार्द कियार् जार्ये। रार्ष्ट्रीय शिक्ष नीति के सुझार्व- 
  9. विज्ञार्न शिक्षार् क सुदश्ढ़ीकरण करें वैज्ञार्निक सोच अभिवृत्ति व सृजनार्त्मकतार् हेतु प्रयार्स कियार् जार्ये।
  10. विद्याथियों में वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क विकास हर स्तर पर कियार् जार्ये। 
  11. विद्याथियों में विज्ञार्न को दैनिक जीवन में उपयोग हेतु क्षमतार् विकसित कियार् जार्यें।
  12. विद्याथियों में स्वार्स्थ्य, कृषि, उद्योग तथार् जीवन की अन्य पहलुओं के सार्थ विज्ञार्न के सम्बंध को विकसित कियार् जार्य।

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