वैयक्तिक समार्ज कार्य
भार्रतीय समार्ज में आरम्भ में वैयक्तिक आधार्र पर सहार्यतार् करने की परम्परार् रही है। यहार्ँ पर निर्धनों को भिक्षार् देने, असहार्यों की सहार्यतार् करने, निरार्श्रितों की सहार्यतार् करने, वृद्धों की देखभार्ल करने आदि कार्य किये जार्ते रहे हैं, जिन्हें समार्ज सेवार् क नार्म दियार् जार्तार् रहार् है। ऐतिहार्सिक दृष्टि से देखार् जार्ये तो हम निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि भार्रत में भी अमेरिका, इंग्लैण्ड की भार्ँति शोषण क सरलतार्पूर्वक शिकार बनने वार्ले वर्गों की सहार्यतार् क प्रार्वधार्न प्रार्चीन काल से चलार् आ रहार् है। पहले इस सहार्यतार् को समार्ज सेवार् के रूप में देखार् जार्तार् रहार् है, लेकिन धीरे-धीरे इसने अपनार् स्वरूप बदल लियार् और उन्नीसवीं शतार्ब्दी में समार्ज कार्य के रूप में सार्मने आयी। समार्ज कार्य की छ: प्रणार्लियार्ँ है जिनक उपयोग करते हुए लोगों की सहार्यतार् की जार्ती है, इन्हें दो भार्गों में विभार्जित कियार् गयार् है,

  1. पहली-प्रार्थमिक प्रणार्ली एवं 
  2. दूसरी- सहार्यक प्रणार्ली। 

प्रार्थमिक प्रणार्ली में वैयक्तिक समार्ज कार्य, सार्मूहिक समार्ज कार्य तथार् सार्मुदार्यिक संगठन, जबकि सहार्यक प्रणार्ली में समार्ज कल्यार्ण प्रशार्सन, समार्ज कार्य शोध तथार् सार्मार्जिक क्रियार् को रखार् गयार् है।

वैयक्तिक समार्ज कार्य की परिभार्षार्ये 

वैयक्तिक समार्ज कार्य- समार्ज कार्य की प्रार्थमिक प्रणार्ली है, जिसके मार्ध्यम से किसी व्यक्ति विशेष की मनोसार्मार्जिक समस्यार्ओं क समार्धार्न करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। वैयक्तिक समार्ज कार्य सेवार्थ्री की अन्तदर्ृश्टि को उकसार्ने वार्ली एक प्रक्रियार् है, जो सेवार्थ्री के विभिन्न पहलुओं की जार्नकारी करार्ती है। इसके मार्ध्यम से सेवार्थ्री के पर्यार्वरण में परिवर्तन लार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है जिससे सेवार्थ्री की सोंच एवं क्षमतार्ओं क विकास हो सके और वह अपनी समस्यार्ओं क समार्धार्न स्वयं कर सके तथार् परिस्थितियों के सार्थ उचित समार्योजन स्थार्पित कर सके।

  1. मेरी रिचमन्ड (1915) ने वैयक्तिक समार्ज कार्य की परिभार्षार् करते हुए यह कहार् है कि यह “विभिन्न व्यक्तियों के लिये उनके सार्थ मिलकर उनके सहयोग से विभिन्न प्रकार के कार्य करने की एक कलार् है। इसक उद्देश्य एक ही सार्थ व्यक्तियों और समार्ज की उन्नति करनार् हैं।”
  2. टैफ्ट् (1920) के अनुसार्र वैयक्तिक समार्ज कार्य “समार्योजन रहित व्यक्ति की सार्मार्जिक चिकित्सार् है जिसमें इस बार्त क प्रयार्स कियार् जार्तार् है कि उसके व्यक्तित्व, व्यवहार्र, एवं सार्मार्जिक सम्बन्धों को समझार् जार्ए और उसकी सहार्यतार् की जार्ऐ मत एक उच्चतर सार्मार्जिक एवं वैयक्तिक समार्योजन प्रार्प्त कर सके।’’
  3. मेरी रिचमण्ड (1922) के अनुसार्र, वैयक्तिक समार्ज कार्य क अर्थ है “वह प्रक्रियार्यें जो व्यक्तित्व के विकास के लिए एक एक करके व्यक्तियों और उनके सार्मार्जिक पर्यार्वरण के बीच समार्योजन स्ार्िार्पित करती है”।
  4. वार्टसन (1922) के अनुसार्र, वैयक्तिक समार्ज कार्य, “असन्तुलित व्यक्तित्व को इस प्रकार सन्तुलित बनार्ने और उसक पुनर्निर्मार्ण करने की एक कलार् है कि व्यक्ति अपने पर्यार्वरण से समार्योजन प्रार्प्त कर सकें।
  5. क्वीन (1922) ने वैयक्तिक समार्ज कार्य को “वैयक्तिक सम्बन्धों में समार्योजन लार्ने की एक कलार्” के रूप में परिभार्षित कियार्।
  6. ली (1923) ने वैयक्तिक समार्ज कार्य को “मार्नवीय मनोवृत्तियों को परिवर्तित करने की एक कलार् के रूप में परिभार्षित कियार्।”
  7. रिनॉल्ड्स (1932) ने वैयक्तिक समार्ज कार्य की परिभार्षार् इस प्रकार की, “यह एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसमें सेवार्थ्री को एक ऐसी समस्यार् के विषय में परार्मर्श दियार् जार्तार् है जो विशेष प्रकार से उसी की समस्यार् है और जिसक सम्बन्ध सार्मार्जिक सम्बन्धो की उन कठिनार्इयों से है जिनक यह सार्मनार् कर रहार् है।”
  8. डखीनीज़ (1939) ने वैयक्तिक समार्ज कार्य की परिभार्षार् इस प्रकार की : “ऐसी प्रक्रियार्यें जो व्यक्तियों को सार्मार्जिक संस्थार्ओं के प्रतिनिधियों द्वार्रार् निश्चित नीतियों के अनुसार्र और वैयक्तिक आवश्यकतार्ओं को सार्मने रखकर सेवार् प्रदार्न करने, आर्थिक सहार्यतार् देने यार् वैयक्तिक परार्मर्श देने से सम्बद्ध है।
  9. स्वीथन बॉवर्स (1949) ने कहार् : “वैयक्तिक समार्ज कार्य एक कलार् है जिसमें मार्नवीय सम्बन्धों के विज्ञार्न के ज्ञार्न और सम्बन्धों में निपुणतार् क प्रयोग इस दृष्टि से कियार् जार्तार् है कि व्यक्ति में उसकी योग्यतार्ओं और समुदार्य में सार्धनों को गतिमार्न कियार् जार्ए जिससे सेवार्थ्री और उसके पर्यार्वरण के कुछ यार् समस्त भार्गों के बीच उच्चतर समार्योजन स्थार्पित हो सके।’’
  10. सैनफोर्ड सोलेन्डर (1957) ने कहार् “वैयक्तिक समार्ज कार्य एक ऐसी प्रणार्ली है जिसक प्रयोग समार्जकार्यकर्तार् व्यक्तियों की सहार्यतार् करने के लिये करते है मत उन सार्मार्जिक असार्मन्जस्य की समस्यार्ओं क समार्धार्न कर सकें जिनक सार्मनार् वे स्वयं संतोशजनक रूप से नही कर पार् रहें है।”
  11. पर्लमैन (1957) के अनुसार्र, “वैयक्तिक समार्ज कार्य एक प्रक्रियार् है जिसक प्रयोग कुछ मार्नव कल्यार्ण संस्थार्एं करती हैं तार्कि व्यक्तियों की सहार्यतार् की जार्ए मत सार्मार्जिक कार्यार्त्मकतार् की समस्यार्ओं क सार्मनार् उच्चतर प्रकार से कर सकें।”
  12. होलिस के अनुसार्र, ‘‘वैयक्तिक समार्ज कार्य मार्नव व्यक्तित्व, सार्मार्जिक मूल्यों एवं उद्देश्यों के प्रति कुछ मौलिक मार्न्यतार्ओं पर आधार्रित है। वैयक्तिक समार्ज कार्य की यह मार्न्यतार् है कि सार्मार्जिक संरचनार् क उद्देश्य व्यक्ति को इच्छित जीवन स्तर जीने के योग्य बनार्नार् है। व्यक्ति रार्ज्य के लिए नहीं वरन् रार्ज्य व्यक्ति के कल्यार्ण के लिए विनिर्मित हुआ है।

परिभार्षार्ओं क अध्ययन एवं अवलोकन करने से यह स्पष्ट होतार् है कि वैयक्तिक समार्ज कार्य एक सहार्यतार् मूलक कार्य है यह ऐसे व्यक्ति को दी जार्ती है जो मनोसार्मार्जिक समस्यार्ओं से ग्रसित है तथार् जिसके पर्यार्वरण में परिवर्तन की आवश्यकतार् है, जिससे कि उसकी क्षमतार्ओं क विकास हो सके और वह समार्ज में अच्छार् समार्योजन स्थार्पित कर सके।

वैयक्तिक समार्ज कार्य की विशेषतार्एँ 

  1. वैयक्तिक समार्ज कार्य आपस में सहयोगार्त्मक प्रवृत्ति क कार्य करने की एक कलार् है। 
  2. सार्मार्जिक सम्बन्धों में अधिक अच्छे समार्योजन लार्ने की कलार् है। 
  3. वैयक्तिक समार्ज कार्य कुसमार्योजित व्यक्ति क सार्मार्जिक उपचार्र है। 
  4. असन्तुलित व्यक्ति को सन्तुलित करने की कलार् है। 
  5. वैयक्तिक समार्ज कार्य मार्नवीय मनोवृत्तियों में परिवर्तन लार्ने की एक कलार् है। 
  6. वैयक्तिक समार्ज कार्य एक प्रक्रियार् है जिसके मार्ध्यम से समस्यार्ग्रस्त व्यक्ति को परार्मर्श दियार् जार्तार् है। 
  7. वैयक्तिक समार्ज कार्य सेवाथियों के लिए समुदार्य में उपलब्ध सार्धनों को गतिमार्न करने तथार् पर्यार्वरण से बेहतर समार्योजन रखने की कलार् है। 
  8. वैयक्तिक समार्ज कार्य एक सहार्यतार् मूलक कार्य है। 
  9. वैयक्तिक समार्ज कार्य सेवार्थ्री को उसी रूप में स्वीकार करते हुए जिसमें वह है, की सहार्यतार् करने एवं उसके लिए उपयुक्त उपचार्र करने की एक प्रक्रियार् है। 
  10. वैयक्तिक समार्ज कार्य उलझे हुए व्यक्ति को सुलझार्ने की प्रक्रियार् है। 

वैयक्तिक समार्ज कार्य के उद्देश्य 

  1. सेवार्थ्री की मनोसार्मार्जिक समस्यार्ओं क अध्ययन करनार् तथार् समार्धार्न करनार्; 
  2. सेवार्थ्री की मनोवृत्तियों में परिवर्तन लार्नार्। 
  3. सेवार्थ्री में समार्योजन लार्ने की क्षमतार् क विकास करनार्। 
  4. सेवार्थ्री में आत्मनिर्णयार्त्मक मनोवृत्ति क विकास करनार्। 
  5. सेवार्थ्री को स्वयं सहार्यतार् करने के लिए प्रेरित करनार्। 
  6. नेतृत्व की क्षमतार् एवं योग्यतार् क विकास करनार्। 
  7. सेवार्थ्री क वैयक्तिक अध्ययन करनार्। 
  8.  सेवार्थ्री की समस्यार्ओं क सार्मार्जिक निदार्न करनार् तथार् उपचार्र करनार्। 
  9. विभिन्न समार्ज विज्ञार्नों क सहार्रार् लेते हुए सेवार्थ्री में चेतनार् क प्रसार्र करनार्। 
  10. पर्यार्वरण में परिवर्तन लार्ने एवं सेवार्थ्री की सोंच में परिवर्तन लार्ने क प्रयार्स करनार्।

वैयक्तिक समार्ज कार्य की प्रकृति 

 वैयक्तिक समार्ज कार्य मार्नवतार्वार्दी दर्षन पर आधार्रित है। यह समस्यार्ग्रस्त व्यक्ति की इस प्रकार सहार्यतार् करतार् है जिससे वह स्वयं अपनी सहार्यतार् कर सके। यह अपने सेवाथियों की सहार्यतार् करने के लिए वैज्ञार्निक ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं क प्रयोग करतार् है। वैयक्तिक समार्ज कार्य में कार्यकर्तार् वैज्ञार्निक ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं से परिपूर्ण एक व्यार्वसार्यिक सदस्य होतार् है जोकि किसी न किसी संस्थार् से सम्बद्ध होतार् है, वह अपनी सेवार्यें सेवार्थ्री को उपलब्ध करार्ने के लिए संस्थार् के अन्दर यार् संस्थार् के बार्हर सेवार्थ्री से प्रत्यक्ष सम्पर्क करतार् है और उसकी समस्यार्ओं को जार्नने के उपरार्न्त उपयुक्त उपचार्र करने क प्रयार्स करतार् है।

वैयक्तिक समार्ज कार्य के अंगभूत 

 पर्लमैन (1957) के द्वार्रार् दी गर्इ परिभार्षार् यह है कि ‘‘वैयक्तिक समार्ज कार्य एक प्रक्रियार् है जिसक प्रयोग मार्नव कल्यार्ण संस्थार्एं करती है तार्कि व्यक्तियों की सहार्यतार् की जार् सके जिससे वे अपनी समस्यार्ओं क सार्मार्जिक कार्यार्त्मकतार् से सार्मनार् कर सकें।’’परिभार्षार् में वैयक्तिक समार्ज कार्य के चार्र अंगभूतों क उल्लेख कियार् गयार् है जो हैं :

  1. व्यक्ति (Person)
  2. समस्यार् (Problem)
  3. स्थार्न (Place)
  4. प्रक्रियार् (Process)

वैयक्तिक समार्ज कार्य में व्यक्ति से तार्त्पर्य ऐसे सेवार्थ्री से है जो मनोसार्मार्जिक समस्यार्ओं से ग्रसित है, यह व्यक्ति एक पुरूश, स्त्री, बच्चार् अथवार् वृद्ध कोर्इ भी हो सकतार् है। अपनी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए जो भी व्यक्ति स्पश्टतयार् सहार्यतार् चार्हतार् है, वैयक्तिक समार्ज कार्य उसको सहार्यतार् उपलब्ध करार्तार् है। कोर्इ भी समस्यार् व्यक्ति के सार्मार्जिक समार्योजन को प्रभार्वित करती है इसक स्वरूप कैसार् भी क्यों न हो। समस्यार् शार्रीरिक, आर्थिक, सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक, धामिक यार् मनोवैज्ञार्निक इत्यार्दि प्रकृति की हो सकती है। वस्तुत: वैयक्तिक समार्ज कार्य में समस्यार् वही आती है जो व्यक्ति की सार्मार्जिक क्रियार् को गम्भीर रूप से प्रभार्वित करती हैं। उन समस्यार्ओं के कारण व्यक्ति क सार्मार्जिक सन्तुलन बिगड़ जार्तार् है और वह समस्यार् से ग्रसित हो जार्तार् है। वैयक्तिक समार्ज कार्य इसी असन्तुलन को समार्प्त करने क प्रयार्स करतार् है। स्ार्िार्न से तार्त्पर्य ऐसी संस्थार् से है जिसके तत्वार्वधार्न में व्यक्ति की सहार्यतार् की जार्ती है। यह संस्थार् सरकारी यार् गैर-सरकारी हो सकती है। सेवार्थ्री को विशेष सहार्यतार् इन्हीं संस्थार्ओं के तत्वार्वधार्न में अथवार् संस्थार् के बार्हर कार्यकर्तार् द्वार्रार् उपलब्ध करार्यी जार्ती है। वैयक्तिक समार्ज कार्य में संस्थार् ऐसी घटक होती है जो सेवाथियों की सहार्यतार् करने में प्रमुख भूमिक क निर्वहन करती है।

वैयक्तिक समार्ज कार्य में प्रक्रियार् से तार्त्पर्य उस व्यवस्थार् से है जिसके मार्ध्यम से सेवार्थ्री की सहार्यतार् की जार्ती है। इस सहार्यतार् प्रक्रियार् में सर्वप्रथम वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार् सेवार्थ्री से मधुर सम्बन्धों की स्थार्पनार् करतार् है तत्पश्चार्त् उसके पार्रिवार्रिक, व्यक्तिगत इतिहार्स की जार्नकारी करतार् है, उसकी समस्यार्ओं को जार्नने क प्रयार्स करतार् है फिर समस्यार्ओं क सार्मार्जिक निदार्न करने के उपरार्न्त उपयुक्त उपचार्र योजनार् बनार्तार् है तथार् मूल्यार्ंकन करतार् है, यह सब एक प्रक्रियार् के मार्ध्यम से होतार् है।

वैयक्तिक समार्ज कार्य की मौलिक मार्न्यतार्यें 

वैयक्तिक समार्ज कार्य क मूल मार्नवतार्वार्दी दर्शन एवं जन कल्यार्ण की भार्वनार् पर आधार्रित है। यह ऐसी सहार्यतार् है जो व्यक्ति की आन्तरिक एवं वार्ºय समस्यार्ओं क पतार् लगार्कर उसे समार्योजन एवं दृढ़तार् प्रदार्न करती है जिससे कि व्यक्ति स्वयं अपनी समस्यार्ओं क समार्धार्न कर सके। वैयक्तिक समार्ज कार्य की मार्न्यतार्ओं के सन्दर्भ में कुछ प्रमुख विद्वार्नों द्वार्रार् प्रदत्त मार्न्यतार्यें है : – हैमिल्टन के अनुसार्र वैयक्तिक समार्ज कार्य की मार्न्यतार्यें :-

  1. व्यक्ति और समार्ज में पार्रस्परिक निर्भरतार् होती है।
  2. सार्मार्जिक शक्तियों क्रियार्शील रहते हुए व्यक्ति में व्यवहार्र तथार् दृष्टिकोण में अपेक्षित परिवर्तन लार्कर उसे आत्मविकास क अवसर पद्र ार्न करती है 
  3. वैयक्तिक समार्ज कार्य से सम्बन्ध रखने वार्ली अधिकांश समस्यार्यें अन्तवर्ैयक्तिक होती है। 
  4. अपनी समस्यार्ओं को सुलझार्ने के लिए सेवार्थ्री की भूमिक उत्तरदार्यित्वपूर्ण होती है।
  5. वैयक्तिक समार्ज कार्य की प्रक्रियार् के दौरार्न कार्यकर्तार् तथार् सेवार्थ्री के बीच समस्यार्ओं के निरार्करण एवं आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए चेतन तथार् नियन्त्रित सम्बन्ध होतार् है। 

वैयक्तिक समार्ज कार्य क इतिहार्स 

1. अमेरिक में वैयक्तिक समार्ज कार्य क इतिहार्स : –

उन्नीसवीं शतार्ब्दी के अन्तिम समय में अमेरिक में निर्धनतार्, रोग एवं बेरोजगार्री की समस्यार्एं सार्मार्न्य रूप से फैली हुर्इ थीं। विशेष रूप से बड़े-बड़े नगरों में बेरोजगार्री की समस्यार् अधिक थी। उस समय के परोपकारी व्यक्तियों पर यह बार्त स्पष्ट हो गर्इं कि निर्धन विधार्न को चलार्ने वार्ले अधिकारियों द्वार्रार् जो सहार्यतार् दी जार् रही है वह न तो पर्यार्प्त है और न ही रचनार्त्मक। यह बार्त भी स्पष्ट हो गर्इ कि परोपकारी संस्थार्ओं के बीच सहयोग के अभार्व के कारण एक दूसरे के कार्यों एवं कार्यक्षेत्र के विषय में सूचनार् नही मिल पार्ती है और परिणार्मस्वरूप जो कुछ परिश्रम कियार् जार्तार् है और धन व्यय होतार् है वह अधिकतर व्यर्थ हो जार्तार् है। कार्यों में द्वितीयार्वृत्ति के कारण कुछ क्षेत्रों में आवश्यकतार् से अधिक संस्थार्एं कार्य करती है आरै कुछ क्षेत्रों में संस्थार्ओं क अभार्व है। इस परिस्थिति के सुधार्र करने के लिए 1877 में चैरिटी आर्गनार्इजेशन सोसार्इटी आन्दोलन की स्थार्पनार् हुर्इ थीं।

हम पहले ही बतार् चुके हैं कि इस आन्दोलन क आधार्र टॉमस चार्मर्स के विचार्रों पर थार्। इस आन्दोलन क आधार्र इस विचार्र पर थार् कि सावजनिक निर्धन सहार्यतार् अपने उद्देश्य में असफल है और सेवार्थ्री क इस प्रकार पुनर्वार्स होनार् चार्हिए कि वह अपनार् और अपने परिवार्र क भरण पोषण कर सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस आन्दोलन ने इस बार्त की व्यवस्थार् की कि निर्धनों के घर जार्कर उनक निरीक्षण कियार् जार्ये, उन्हें परार्मर्श दियार् जार्ये, अनुचित कायोर्ं से रोक जार्ये और आर्थिक सहार्यतार् दी जार्ये। इस प्रकार निर्धनों के पुनर्वार्स के पूर्व उनकी दशार् क सार्वधार्नी से परीक्षण और उनकी समस्यार् के विषय में स्वयं उनसे और उनके आस-पार्स के लोगों से विचार्र विमर्श आवश्यक समझार् जार्ने लगार्। निर्धनों एवं समस्यार्ग्रस्त व्यक्तियों के विषय में इस प्रकार की वैयक्तिक रूचि समार्ज कार्य की एक नर्इ दिशार् की ओर संकेत करती है। इसी नर्इ दिशार् से वैयक्तिक समार्ज कार्य की उत्पत्ति हुर्इ।

चैरिटी आर्गनार्इजेशन सोसार्इटीज ने सेवाथियों की वैयक्तिक एवं आर्थिक समस्यार्ओं को सुलझार्ने के लिए सार्मार्जिक हल (सुझार्व) क प्रयोग करनार् चार्हार् और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण, उपकरण, छोटे-छोटे कारखार्नों यार् व्यार्पार्र के लिए धन, भोजन, वस्त्र, एवं परिवार्रों के लिए कमरों यार् एक छोटे से घर की सुविधार्एं प्रदार्न कीं। इस अवसर पर एक प्रमुख बार्त यह हुर्इ कि स्वयं सेवकों और सी. ओ. एस. के प्रतिनिधि वैतनिक थे और वे सी.ओ.एस. के कायोर्ं के लिऐ नगर के धनी व्यक्तियों से धन एकत्र करते थे। स्वयंसेवक सेवाथियों से वैयक्तिक सम्पर्क रखते थे और उन्हें आत्म निर्भर बनार्ने के लिए उपदेश एवं निर्देश देते थे। सेवाथियों से यह आशार् की जार्ती थी कि वे उनके सुझार्वों क पार्लन करेंगे। उन्नीसवीं शतार्ब्दी के अन्त तक स्वयं सेवकों को यह अनुभव हुआ कि निर्धनतार् क कारण बहुधार् सेवार्थ्री के व्यवहार्र क दोष ही नहीं है बल्कि उसकी सार्मार्जिक परिस्थिति भी है जिसमे वह रहतार् हैं। बीसवीं शतार्ब्दी के आरम्भ में सार्मार्जिक दशार्ओं के सुधार्र पर बल दियार् जार्ने लगार्। सी.ओ.एस. ने इस बार्त क प्रयार्स करनार् आरम्भ कियार् कि ऐसे सार्मार्जिक विधार्न बनने चार्हिये जिसमें निरार्श्रित, रोग, सार्मार्जिक विघटन क प्रतिबन्ध हो सके।

सार्मार्जिक सुधार्र के उपार्यों से निर्धन व्यक्तियों की दशार् में उन्नति होने लगी परन्तु फिर भी कुछ परिवार्र ऐसे थे जिनकी आवश्यकतार्एं पूरी नहीं हो पार्ती थीं और जिन्हें ऐसे सहार्यकों की आवश्यकतार् थी जो उनकी समस्यार्ओं को सहार्नुभूति के सार्थ समझकर उन्हें उपदेश दें जिससे वे सार्मुदार्यिक सार्धनों क सदुपयोग कर सकें। यह समझार् जार्ने लगार् कि सार्मार्जिक सुधार्र से ही समस्त वैयक्तिक समस्यार्एं नहीं सुलझ जार्तीं। अत: सार्मार्जिक संस्थार्एं वैयक्तिक समार्ज कार्य सेवार्एं प्रदार्न करती रहीं। बीसवी शतार्ब्दी के आरम्भ में समार्ज कार्य के विद्यार्लयों की स्थार्पनार् हुर्इ और व्यवसार्यिक प्रशिक्षण की सुविधार्एं उपलब्ध हुर्इ। सार्मार्जिक संस्थार्ओं ने अब प्रशिक्षण प्रार्प्त कार्यकर्तार्ओं को नियुक्त करनार् आरम्भ कर दियार्। अब सेवार्थ्री की समस्यार् क अध्ययन, निदार्न और चिकित्सार् की योजनार् इन प्रशिक्षण प्रार्प्त कार्यकर्तार्ओं क ही उत्तरदार्यित्व हो गयार्।

इस प्रकार उनक महत्व बढ़ गयार् क्योंकि अब उनकी जार्ंच क प्रतिवेदन किसी समिति के सम्मुख रखने की अपेक्षार् स्वयं उनकी रार्य के अनुसार्र ही सहार्यतार् क कार्य होने लगार्। 1917 में पहली बार्र मेरी रिचमण्ड ने वैयक्तिक समार्ज कार्य की प्रक्रियार्ओं को एक निश्चित रूप में अपनी पुस्तक सोशल डार्इग्नोसिस में प्रस्तुत कियार्। परन्तु यह स्पष्ट हो गयार् कि केवल परार्मर्श से ही पुनर्वार्स नहीं हो सकेगार् और यह कि इसके लिये आर्थिक सार्धनों की भी आवश्यकतार् होगी। अत: निजी एवं सावजनिक आर्थिक सहार्यतार् के कार्यक्रम प्रचलित रहे और अब भी प्रचलित हैं।

2. इंग्लैण्ड में वैयक्तिक समार्ज कार्य क इतिहार्स 

मध्यकाल में इंग्लैण्ड में गरीबों की सहार्यतार् क कार्य चर्च क थार्। धामिक भार्वनार् से पे्िर रत होकर लोग असहार्यों, अंधों, लंगड़ों तथार् रोगियों की सहार्यतार् करते थे। दार्न वितरण के कार्य को अधिक महव देने के कारण चर्च तथार् रार्ज्य में असहमति उत्पन्न हुर्इ उसके फलस्वरूप सोलहवीं शतार्ब्दी में निर्धनों की सहार्यतार् क उत्तरदार्यित्व रार्ज्य पर हो गयार्।

  1. एलिजार्बेथ क धनहीनों के लिए कानून :सन् 1601 में एलिजार्बेथ पुअर लार् बनार् जिसके द्वार्रार् पुरखों तथार् अभार्वग्रस्त मार्तार् पितार्ओं की सहार्यतार् करनार् अनिवाय कर दियार् गयार्। इस कानून ने निर्धनों को तीन श्रेणियों में विभार्जित कियार् : समर्थ निर्धन, असमर्थ निर्धन तथार् आश्रित बार्लक। समर्थ निर्धनों को हार्उसेज आफ करेक्षस यार् वर्क हार्उसेज में रखने की व्यवस्थार् थी तथार् उन्हें दार्न देनार् निशिद्ध थार्। रोगी, विरार्श्रित, बुद्ध, अन्धे, बहरे, गूंगे, लंगड़े, पार्गल और वे मार्तार्यें जिनके पार्स छोटे-छोटे बच्चे थे, असमर्थ निर्धन की श्रेणी में आते थे, उन्हें यार् तो भिक्षार् जिनके पार्स छोटे-छोटे बच्चे थे, असमर्थ निर्धन की श्रेणी में आते थे, उन्हें यार् तो भिक्षार् गृहों में रखार् जार्तार् थार् यार् घर पर ही बार्ºय सहार्यतार् सार्मार्न्य वस्तुओं जैसे खार्नार्, कपड़ार्, इंर्ध् ार्न के रूप में दी जार्ती थी। अनार्थ पितार्हीन, परित्यक्त बार्लक यार् निर्धन मार्तार्-पितार् के बार्लक आश्रित बार्लक कहे जतो थे। ऐसे बच्चे उन नार्गरिकों को दिये जार्ते थे जो रखनार् चार्हते थे। लड़कों को उनके मार्लिक के व्यवसार्य क प्रशिक्षण दियार् जार्तार् थार्। निर्धनों के निरीक्षक निर्धनों के कानून क पार्लन करार्ते थे। उनक कार्य निर्धनों की सहार्यतार् के लिए प्राथनार् पत्र लेनार्, उनकी दषार्ओं की जार्ँच करके पतार् लार्गनार् कि उनको सहार्यतार् दी जार्य यार् नहीं और यदि दी जार्य तो उसक रूप कयार् हो। 
  2. पुअर लार् अमेंडमेंट ऐक्ट : कार्यग्रह निवार्सियों के दुव्र्यवहार्र, उचित स्वच्छतार् क अभार्व, अनैतिकतार् तथार् भ्रश्टार्चार्र के कारण सन् 1982 में पुअर लार् अमेंडमेंट ऐक्ट बनार्। जिससे वैतनिक निरीक्षकों के स्थार्न पर वैतनिक संरक्षक नियुक्त किये गये। आश्रमों की सहार्यतार् समार्प्त कर दी गयी और कार्य न मिलने की अवधि में इच्छुक व्यक्तियों को सहार्यतार् दी जार्ने की व्यवस्थार् की गयी। 
  3. थार्मस चार्ल्मर्स क योगदार्न : थार्मस चार्ल्मर्स ने अपने अनुभव के आधार्र पर दार्न पद्धति को कटु आलोचनार् की क्योंकि यह व्यवस्थार् निर्धनों में आचार्र भ्रश्टार्चार्र को प्रोत्सार्हन देती थी। स्वार्वलम्बन की इच्छार् को निर्बल बनार्ती थी। इस संबंध में थार्मस चार्ल्मर्स ने सुझार्व दियार् कि : –
    1. दुर्गति के प्रत्येक मार्मले की जार्ँच भली भार्ँति की जार्य, कश्ट के सभी कारणों क निश्चय कियार् जार्य और निर्धनों में आत्म-निर्भरतार् की सभी सम्भार्वनार्ओं को विकसित कियार् जार्य। 
    2. यदि आत्मार्वलम्बन सम्भव न हो तो सम्बन्धियों, मित्रों और पड़ोसियों को अनार्थ, बृद्ध, बीमार्र और अपंगों की सहार्यतार् के लिए प्रोत्सार्िहत कियार् जार्य, 
    3. यदि निर्धन परिवार्रों की आवश्यकतार् इस प्रकार भी पूरी न की जार् सके तो कुछ धनार्ड्य नार्गरिकों से उनके निर्वार्ह के लिए सम्बन्ध स्थार्पित कियार् जार्य। 
    4. केवल जब इन प्रस्तार्वित तरीकों में से एक भी सफल न हो तो तभी जिले क डीकन अपनी धामिक परिशद् से सहार्यतार् से प्राथनार् करे।
  4. थार्मस चार्ल्मर्स को दार्न-भिक्षार् कार्यक्रम क व्यार्वहार्रिक अनुभव होने से दार्न की अवधार्रणार् में परिवत्रन लार्ने में काफी योगदार्न रहार्। उन्होंने वैयक्तिक आधार्र पर जार्ँच करने को प्रोत्सार्हन दियार् तथार् दरिद्रतार् के कारणों को ज्ञार्त करने क प्रयत्न करने के सिद्धार्ंत को उत्पन्न करती है। उन्होंने व्यक्तिगत असफलतार्ओं को ही निर्धनतार् क निरार्श्रितों के भार्ग्य निर्धार्रण में वैयक्तिक रूप से ध्यार्न देनार् आवश्यक होतार् है, सहार्यतार् कार्य की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण मार्नी गयी। चार्ल्मर्स के अग्रगार्मी कार्य के 50 वर्ष बार्द लंदन चैरिटी आर्गनार्इजेषन सोसार्इटी ने सहार्यतार् क एक कार्यक्रम संगठित कियार्, जो प्रमुख रूप से थार्मस चार्ल्मर्स के विचरों पर ही आधार्रित थार्। उन्होंने समार्ज कार्य में व्यक्तिगत उपार्गम की प्रथम आधार्रशिलार् रखी जिसे आज हम “वैयक्तिक कार्य” को संबल देते हैं।
  5. जार्न हार्वर्ड तथार् एलिजार्बेथ फ्राइ- सत्रहवीं तथार् अठार्रहवीं “ार्तार्ब्दियों में इंग्लैण्ड के कारार्गार्रों की व्यवस्थार् बहुत अस्त-व्यस्त थी। बन्दियों के सार्थ दुव्र्यवहार्र कियार् जार्तार् थार् तथार् उनके आवार्स एवं भोजन तथार् वस्त्र की उचित व्यस्थार् न थी। जार्न हार्वर्ड जेल सुधार्र के दृढ़ समर्थक थे। उनक विचार्र थार् कि अपरार्धियों को अपरार्ध विशेष के आधार्र पर दण्ड कियार् जार्य तथार् अपरार्ध के कारणों की खोज की जार्य। बन्दियों को आवश्यक आवश्यकतार्एँ प्रदार्न की जार्यें। हार्वर्ड क जेल सुधार्र सम्बन्धी विचार्र अपने युक्तिगत जेल अनुभव पर आधार्रित थार्। वेडफोर्ड के शेरिफ पद पर कार्य करते हुए उन्होंने अपने दुखदार्यी अवलोकनों क अभिलेख तैयार्र कियार्। इन अभिलेखों से उसने यह निष्कर्ष निकालार् कि इस सम्बन्ध में और अधिक खोजपूर्ण अन्वेशणों की आवश्यकतार् है।
  6. श्रीमती एलिजार्बेथ फ्राइ- शार्ंति प्रचार्रक समिति की सदस्य होने के कारण न्यूगेट जेल जिसे धरती पर नरक कहार् जार्तार् थार्, क निरीक्षण कर जेल में ही बच्चों के लिए विद्यार्लय को प्रार्रम्भ करार्ने में सफलतार् प्रार्प्त की। बन्दिनियों में से एक को विद्यार्लय की अध्यार्पिक नियुक्त कियार्। अनेक सुधार्रकों ने जेल व्यवस्थार् में सुधार्र लार्ने क अथक प्रयार्स कियार् परन्तु जब तक 1877 में प्रिजन एक्ट ने दण्ड सम्बन्धी संस्थार्ओं क प्रशार्सन एक केन्द्रीय संस्थार् नेशनल प्रिजन एक्ट ने दण्ड सम्बन्धी संस्थार्ओं क प्रशार्सन एक केन्द्रीय संस्थार् नेशनल प्रिजन कमीशन को सार्ंपै न दियार् तब तक कारार्गार्रों में सन्तोषजनक सुधार्र न हुआ। हेनरी सोली तथार् चार्ल्र्स स्टुअर्ट लोच चैरिटी आर्गनार्इजेशन सोसार्इटी की स्थार्पनार् सन् 1869 में सोसार्इटी फार्र आगर्न ार्इजेशन रिलीफ एण्ड रिपे्िर संग से बदलकर की गयी। इसके संगठन क मूल श्रेय हेनरी सोली को है जिन्होंने सन् 1868 में वैयक्तिक एवं सावजनिक परोपकारी समितियों की कार्य विधियों के बीच समन्वय करने वार्ली परिशद के निर्मार्ण की एक योजनार् प्रस्तुत की। इस दार्न संगठनसोसार्इटी की नींव थार्मस चार्ल्मर्स के सिद्धार्ंतों पर की गयी। दार्न संगठन समितियों क कार्य प्राथियों से सार्क्षार्त्कार करनार्, उनके सार्मार्जिक अमार्मथ्र्य की चिकित्सार् की योजनार् बनार्नार् और जो संस्थार्एँ पहले ही से विद्यमार्न थ्ीार्ं उनसे धन प्रार्प्त करनार् थार्। इस समितियों के कार्यों में सार्मार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य के स्वरूप की झलक मिलती है। समार्ज कार्य ऐतिहार्सकों क विचार्र है कि समार्ज कार्य की संगठित क्रियार्ओं की वर्तमार्न पद्धति की उत्पत्ति चैरिटी आर्गनार्इजेशन सोसार्इटी की इसी योजनार् से हुर्इ। 
  7. कैनन सैमुअल अगस्टस बार्रनेट- बार्रनेट ने यह पार्यार् कि व्हार्इट चनै ेट के निर्धन 8000 पंैिरष निवार्सियों में अधिकांष बेकार अथवार् रोग से पीड़ित थे। आक्सफोर्ड तथार् कैम्ब्रिज स्थित कालेजों ने बार्रनेट से इस बार्त की जार्नकारी चार्ही कि सार्मार्जिक अध्ययनों में रुचि रखने वार्ले विद्यार्थ्री निर्धनों की सहार्यतार् के लिए कुछ कर सकते हैं। उन्होंने छार्त्रों को विशेषार्धिकार हीन व्यक्तियों के जीवन क अध्ययन करने, उन्हें शिक्षार् सम्बन्धी और व्यक्तिगत सहार्यतार् प्रदार्न करने के लिए आमन्त्रित कियार्। बार्रनेट तथार् उनके सार्थियों ने निर्धनतार् की समस्यार् को सुलझार्ने क दो प्रकार से प्रयार्स कियार्। अविवेकपूर्ण दार्न पद्धति बन्द करें ‘पुअर लार्’ के अधीन सहार्यतार् केवल वर्क हार्उस में दी जार्य तथार् दूसरे इस बार्त की कोषिष की कि व्यक्तियों को पुन: आत्म स्वार्वलम्बी बनार्यार् जार्य। इसके लिए उनकी आवश्यकतार्ओं, योग्यतार्ओं एवं कमियों क सार्वधार्नी से अध्ययन कियार् जार्य। उनक विचार्र थार् कि सहार्यतार् क उद्देश्य क उद्देश्य वैयक्तिक कठिनार्इयों को थोड़े समय के लिए कम करनार् नहीं है बल्कि समार्ज के रोग की चिकित्सार् करनार् है। बार्रनेट के विचार्रों ने सार्मार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य की जड़ों को और अधिक सुदृढ़ बनार्यार्।
  8. इडवाड डेनिसन इडवाड- डेनिसन सन् 1887 में मार्इल दण्ड रोड की फिलपार्ट स्ट्रीट में रहने गये। यहार्ँ पर उन्होंने एक स्कूल की स्थार्पनार् की तथार् रार्त्रि में वे इस स्कूल में पढ़ार्ने क कार्य करते थे। दिन के समय रोगियों की देखभार्ल, स्थनीय निकायों क निरीक्षण तथार् गरीबों की आवश्यकतार्ओं को जनतार् व सरकार तक पहुँचार्ने क कार्य करते थे। इससे हम देखते है कि प्रार्रम्भिक सार्मार्जिक वैयक्तिक कार्यकर्तार् नकद यार् भौतिक सहार्यतार् देते हुए भी उनक प्रमुख उददेश्य आर्थिक अथवार् भौतिक आवश्यकतार्ओं से नहीं बल्कि सम्बन्ध स्थार्पन से थार्।

भार्रत में वैयक्तिक समार्ज कार्य क इतिहार्स 

1. प्रार्चीन दृष्टिकोण 

भार्रत में दीन दुखियों, असहार्यों तथार् पीड़ित व्यक्तियों की सहार्यतार् करने की परम्परार् प्रार्चीन काल से ही चली आ रही है। मार्नेचिकित्सार् सम्बन्धी कार्य भी प्रार्चीन युग से ही चले आये हैं। कृष्“ार् क अर्जुन को उपदेष देनार्, वशिष्ठ क रार्म को कर्तव्य बोध करार्नार्, बुद्ध क अंगुलिमार्ल के व्यवहार्र को परिवर्तित करनार् आदि इसके उदार्हरण हैं। भार्रतीय संस्कृति तथार् धर्म क मुख्य उद्देश्य उन व्यक्तियों की सहार्यतार् करनार् है जो उत्पीड़ित हों तथार् दयनीय जीवन व्यतीत करते हैं। प्रार्चीन काल से लेकर आज तक भी भिखार्रियों को दार्न देनार्, निर्धनों तथार् असहार्यों की सहार्यतार् करनार्, धर्मशार्लार्एँ बनवार्नार् रोगियों की सहार्यतार् करनार् आदि पुण्य के कार्य समझे जार्ते रहे हैं। इतिहार्स इस बार्त क सार्क्षी है कि ऐसे सहार्यतार् मूलक कार्य करने के लिए व्यक्तियों में होड़ लगती थी।

2. बौद्ध काल 

बौद्ध काल में समार्ज की भलाइ के लिए अनेक प्रकार के डपदेश देने क प्रबन्ध कियार् गयार् थार्। बोधिसत्त्व में इस बार्त क उल्लेख मिलतार् है कि दार्नी व्यक्तियों के कौन-कौन से कार्य थे। बोधिसत्त्व के अनुसार्र सहार्यतार्कारी कार्यों को पहले अपने सगे सम्बन्धियों तथार् मित्रों की सहार्यतार् उसके पष्चार्त् असहार्य, रोगी, संकटग्रस्त तथार् दरिद्र व्यक्तियों तथार् मित्रों की सहार्यतार् उसके पश्चार्त् असहार्य, रोगी, संकटग्रस्त तथार् दरिद्र व्यक्तियों की सहार्यतार् करनी चार्एिह।

3. मौर्य काल

मौर्य काल में सार्मार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य क क्षेत्र अधिक व्यार्पक हो गयार् थार्। बच्चों, वृद्धों तथार् रोग्रस्त व्यक्तियों की देखभार्ल क कार्य अत्यन्त धामिक समझार् जार्तार् थार्। गार्ँव के वयोवृद्ध तथार् मुखियार् मार्तार्-पितार् विहीन बार्लकों की देख भार्ल क कार्य करतार् थार्। निर्धन बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षार् तथार् भोजन क प्रबन्ध अध्यार्पक करतार् थार्।

4. इस्लार्म काल

13वीं शतार्ब्दी से भार्रतीय लोक जीवन में इस्लार्म क आविर्भार्व हुआ। इस्लार्म धर्म में प्रार्रम्भ से ही भिक्षार् देने की व्यवस्थार् तथार् प्रथार् रही है। यह दार्न उन व्यक्तियों को दिये जार्ने की व्यवस्थार् है जो हज पर जार्ने क व्यय न वहन कर सके, जिनके पार्स भोजन न हो, भिखार्री हों तथार् जिन्होंने अपनार् सम्पूर्ण जीवन र्इश्वर हेतु अर्पित कर दियार् हो। जकात से प्रार्प्त धन क उपयोग समार्ज कल्यार्ण के कार्यों में ही कियार् जार्तार् थार्। कुतुबुद्दीन, इल्तुतमिष, नार्सिरुद्दीन आदि सुल्तार्नों ने इस क्षेत्र में अनेक कार्य किये। फिरोज ने ऐसे व्यक्तियों की सहार्यतार् करने के लिए जिनके पार्स पुत्रियों क विवार्ह करने के लिए पर्यार्प्त धन नहीं थार् एक दीवार्न-र्इ-खरार्त संस्थार् क निर्मार्ण कियार् थार्। मुगल काल में ऐसी अनेक दुकानें खोल दी जार्ती थीं जहार्ँ पर सस्ते मूल्य पर अनार्ज मिलतार् थ। उस समय एक ऐसे विभार्ग क संगठन भी थार् जो आवश्यकतार् वार्ले व्यक्तियों की सूची रखतार् थार्। निरीक्षकों को नियुक्ति भेदभार्व को रोकने के लिए की जार्ती थी। सुल्तार्न गयार्सुद्दीन तुगलक ने व्यक्तियों को रोजगार्र देने तथार् अन्य आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करने क वृहद् कार्यक्रम बनार्यार् थार्। उसक विचार्र थार् कि अपरार्धों क कारण आवश्यकतार्ओं की संतुश्टि क न होनार् है।

5. अंग्रेजी शार्सन काल 

अंग्रेजी शार्सन काल में अनेक समार्ज सुधार्र आन्दोलनों क सूत्रपार्त हुआ। रार्जार्रार्म मोहन रार्य ने बार्ल विवार्ह तथार् सती प्रथार् को रोकने क प्रयत्न कियार्। उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप सन् 1829 र्इ0 में प्रतिबन्ध अधिनियम पार्रित कियार् गयार् जिसने सती प्रथार् को अवैध घोषित कर दियार्। सन् 1856 र्इ0 में हिन्दू विधवार् पुनर्विवार्ह अधिनियम पार्स हुआ। गार्ँधी जी के प्रयत्नों के फलस्वरूप अनेक सुधार्र सम्भव हो सकें। भार्रत में सन् 1936 र्इ0 से पहले सार्मार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य को एक ऐच्छिक कार्य समझार् जार्तार् थार्। सन् 1936 र्इ0 में पहली बार्र समार्ज कार्य की व्यार्वसार्यिक शिक्षार् के लिए एक संस्थार् पर रार्वजी टार्टार् ग्रेजुएट स्कूल आफ सोशल वर्क के नार्म से स्थार्पित हुर्इ। इस समय इस बार्त की आवश्यकतार् महसूस हो चुकी थी कि वैयक्तिक सेवार् कार्य करने के लिए औपचार्रिक शिक्षार् अनिवाय है।

6. स्वतंत्रतार् के बार्द 

 बीसवीं शतार्ब्दी में ऐसी समार्ज सेवी संस्थार्ओं की वृद्धि हुर्इ। अनार्थार्लयों, शिशु सदनों की तथार् अंधों के लिए स्कूलों की स्थार्पनार् की गयी। विकलार्ंग बार्लकों के लिये पहली बार्र सन् 1947 र्इ0 में एक ऐच्छिक संस्थार् स्थार्पित हुर्इ। इस संस्थार् के कार्यों से प्रभार्वित होकर भार्रत के अनेक चिकित्सार्लयों में विकलार्ंग चिकित्सार् विभार्ग स्थार्पित हुए। सन् 1952 र्इ0 में इन्डियन कौंसिल फॅार्र चार्इल्ड वेलफेयर की स्थार्पनार् हुर्इ जिसक उद्देश्य शिशु कल्यार्ण के क्षेत्र में कार्य करने वार्ली संस्थार्ओं के बीच समन्वय स्थार्पित करनार् और दूसरी ओर ऐच्छिक संस्थार्ओं एवं रार्ज्य के बीच सम्पर्क स्थार्पित करनार् है।

समार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य क चिकित्सार् क्षेत्र में उपयोग होनार् “ार्ीघ्र ही प्रार्रम्भ हुआ। जब भार्रतीय चिकित्सक अमेरिक तथार् इग्लैंण्ड गये और उन्होंने रोगियों के सार्थ सेवार् कार्य के महत्त्व को समझार् तो भार्रतीय चिकित्सार्लयों ने भी इसके विकास पर जोर दियार्। दि हेल्थ सर्वे एण्ड डेवलपमेन्ट कमेटी (भोर कमेटी) ने

सन् 1945 र्इ0 में चिकित्सार्लयों में प्रशिक्षित सार्मार्जिक कार्यकर्तार् की नियुक्ति की सिफार्रिश की। चिकित्सीय वैयक्तिक सेवार् कार्य के विकास में यह महत्वपूर्ण कारक थार्। दूसरार् कारण मार्नसिक चिकित्सार्लयों की स्थार्पनार् तथार् इसमें मनोसार्मार्जिक कार्यकर्तार्ओं के महत्त्व को समझ जार्तार् है। सन् 1946 र्इ0 में टार्टार् इन्स्टीट्यूट ने चिकित्सकीय समार्ज कार्य की शिक्षार् क प्रबन्ध कियार्। सन् 1944 र्इ0 में डार्0 जे0एम0 कुमार्रप्पार् इन्स्टीट्यूट के निदेशक, अमेरिक गये तथार् चिकित्सकीय समार्ज कार्य के लिए विजिटिंग प्रोफेसर के लिए समझौतार् कियार्। इसके परिणार्मस्वरूप लूर्इस विले, कंट्री की मिस लुर्इस ब्लैन्की नवम्बर सन् 1946 र्इ0 में भार्रत आयी। कुछ महीनों तक उन्होंने भार्रतीय स्वार्स्थ्य समस्यार्ओं को समझने तथार् चिकित्सार्लयों की समस्यार्ओं से अवगत होने में अपनार् ध्यार्न लगार्यार्। कुछ समय बार्द एक नये विभार्ग चिकित्सकीय तथार् मनोचिकित्सकीय समार्ज कार्य क संगठन कियार्। जिस अवधि में मिस ब्लैन्की भार्रत आयीं थीं उन्हीं दिनों डॉ0 (मिस) जी0आर0 बनर्जी चिकित्सकीय तथार् मनोचिकित्सकीय समार्ज कार्य में प्रषिक्षण हेतु षिकागो गयीं और वार्पस आकर मिस ब्लैन्की से सन् 1948 र्इ0 में कार्यभार्र सँभार्ल लियार्।

सन् 1946 र्इ0 में जे0 जे0 हार्स्पिटल बार्म्बे में प्रथम चिकित्सकीय समार्ज कार्यकर्तार् की नियुक्ति हुर्इ थी। उस समय से उसमें काफी वृद्धि हो रही है। आज चिकित्सकीय सार्मार्जिक कार्यकर्तार् ने केवल सार्मार्न्य चिकित्सार्लयों में बल्कि विशेषीकृत चिकित्सार्लयों, क्लिनिकों तथार् पुनस्र्थार्पन केन्द्रों में कार्य करने लगे हैं।

यद्यपि यह सत्य है कि सार्मार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य क क्षेत्र व्यार्पक हो रहार् है परन्तु कार्यकर्तार् अपनी भूमिकाओं को पूरार् करने में अनेक बार्धार्एँ अनुभव कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रषिक्षित कार्यकर्तार्ओं को चयन में कोर्इ विशेष वरीयतार् नहीं मिलती है। आशार् है समय परिवर्तन के सार्थ-सार्थ इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आयेगार् तथार् सार्मार्जिक वैयक्तिक सेवार् कार्य क सार्मार्न्य विकास सम्भव हो सकेगार्।

बीसवीं शतार्ब्दी में वैयक्तिक समार्ज कार्य की नवीन रूचि 

बीसवीं शतार्ब्दी के पहले दस वर्षों में वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार्ओं ने इस बार्त पर बल देनार् आरम्भ कियार् कि जिस व्यक्ति की सहार्यतार् करनी है उसके जीवन के विषय मे पर्यार्प्त सूचनार् प्रार्प्त की जार्ये। इन सूचनार्ओं के आधार्र पर व्यक्ति की सार्मार्जिक एवं वैयक्तिक समस्यार्ओं क सार्मार्जिक निदार्न बनार्यार् जार्ये जो उन समस्यार्ओं के कारणों को स्पष्ट करतार् है। इसी सार्मार्जिक निदार्न के आधार्र पर चिकित्सार् की योजनार् बनाइ जार्ये। उस समय चिकित्सार् की योजनार्एं अधिकतर पर्यार्वरण के बार्हरी परिवर्तन, जीवन सम्बन्धी दशार्ओं और व्यवसार्य से सम्बन्धित परिवर्तन एवं उन्नति से सम्बन्धित होती थीं।

मनोविज्ञार्न एवं मनोचिकित्सार् विज्ञार्न में जो विकास हुआ उसक प्रभार्व समार्ज कार्य की प्रणार्लियों एवं अभ्यार्स पर पड़ार्। इन विचार्रों के प्रभार्व से समार्ज कार्य की रूचि आर्थिक एवं सार्मार्जिक कारकों से हटकर सेवार्थ्री की मनोवैज्ञार्निक एवं संवेगार्त्मक समस्यार्ओं की ओर केन्द्रित हुर्इ और उसकी प्रतिक्रियार्ओं, सम्पेर्र णार्ओं एवं मनोवृत्तियों को अधिक महत्व दियार् जार्ने लगार्। विशेष प्रकार से सिगमन्ड फ्रार्यड के मनोविश्लेषणार्त्मक सम्बन्धी सिद्धार्ंतों ने सार्मार्जिक वैयक्तिक समार्ज कार्य को प्रभार्वित कियार् और वैयक्तिक समार्ज कार्य में मनोविश्लेषण सम्बन्धी सिद्धार्न्तों क प्रयोग होने लगार्। बीसवीं शतार्ब्दी के दूसरे दस वर्षों में समार्ज कार्यकर्तार्ओं क प्रयोग सार्मार्न्य चिकित्सार्लयों में होने लगार्।

इसके पूर्व केवल मार्नसिक चिकित्सार्लयों में ही समार्ज कार्यकर्तार्ओं क प्रयोग होतार् थार्। सार्मार्न्य चिकित्सार्लयों में जो वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार् नियुक्त किये जार्ते थे वे रोगी के रोग के विषय में जार्नकारी प्रार्प्त करके और उसकी सार्मार्जिक एवं आर्थिक परिस्थिति क पतार् लगार्कर चिकित्सक की निदार्न और चिकित्सार् योजनार् बनार्ने में सहार्यतार् करते थे। इसके अतिरिक्त वे रोगी के परिवार्र के सार्धनों और समुदार्य, सार्मार्जिक संस्थार्ओं, नियोक्तार्ओं एवं मित्रों से सम्बन्धों क भी प्रयोग करते थे जिससे रोगी की चिकित्सार् में सहार्यतार् मिल सके।

जब द्वितीय महार्युद्ध हुआ तो अमेरिकन रेडक्रार्स ने ऐसे परिवार्रों की सहार्यतार् के लिए जिनके पति युद्ध पर गए हुए थे होम सर्विस डिवीजन्स स्थार्पित किये। यहार्ं जो परिवार्र आते थे उन्हें आर्थिक सहार्यतार् की उतनी आवश्यकतार् नहीं होती थी जितनी मनोवैज्ञार्निक और संवेगार्त्मक सहार्यतार् की। अत: सहार्यतार् के दृष्टिकोण में परिवर्तन की आवश्यकतार् थी। इसी कारण और भी अधिक समार्ज कार्यकर्तार्ओं की रूचि पर्यार्वरण सम्बन्धी कारकों से हटकर अधिकतर मनोवैज्ञार्निक कारकों की ओर हुर्इ।

युद्ध के कारण अनेक प्रकार के मनोविकार सार्मने आने लगे। विशेषतयार् ‘‘शेल-शार्क’’ से प्रभार्वित व्यक्ति रोगी बनकर आने लगे। अत: मनोचिकित्सार्त्मक समार्ज कार्यकर्तार्ओं की अधिक आवश्यकतार् क अनुभव कियार् जार्ने लगार् और इस आवश्यकतार् की पूर्ति के लिए पहली बार्र 1918 में स्मिथ कालेज में सार्इकिट्रिक सोशल वर्कर्स प्रशिक्षिण दियार् जार्ने लगार्। इस समय मनोचिकित्सकों क इतनार् अभार्व थार् कि मनोविकार की चिकित्सार् में मनोचिकित्सार्त्मक समार्ज कार्यकर्तार्ओं को पर्यार्प्त उत्तरदार्यित्व दियार् जार्ने लगार् और वे सेनार् के मनोचिकित्सकों से घनिष्ठ सम्पर्क रखते हुए कार्य करने लगे।

फ्रार्यड के सिद्धार्न्तों ने यह सिद्ध कर दियार् थार् कि बहुधार् मनुष्य क व्यवहार्र भार्वनार्ओं पर आधार्रित होतार् है और व्यक्ति को स्वयं अपनी सम्प्रेरणार्ओं क ज्ञार्न नहीं होतार्। इसके अतिरिक्त यह बार्त भी स्पष्ट हो गर्इ थी कि बार्ल्यार्वस्थार् की घटनार्ओं क प्रभार्व व्यक्तित्व पर महत्वपूर्ण रूप से पड़तार् है और बहुत कुछ व्यक्तित्व क विकास प्रार्रम्भिक जीवन की घटनार्ओं एवं परिस्थितियों के अनुसार्र होतार् है। इन सब सिद्धार्न्तों से समार्ज कार्यकर्तार्ओं को जो नवीन ज्ञार्न प्रार्प्त हुआ उसे उन्होंने अपने अभ्यार्स में प्रकट करने क प्रयत्न कियार्।

वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार्ओं ने अनुभव कियार् कि सेवार्थ्री के व्यक्तित्व सम्पेर्र णार्ओं एवं भार्वनार्त्मक आवश्यकतार्ओं को समझने के लिये अधिक विस्तृत सूचनार् प्रार्प्त करने की आवश्यकतार् है। इस प्रकार मार्नवीय व्यवहार्र की मनोवैज्ञार्निक व्यार्ख्यार् उच्चतर प्रकार से की जार्ने लगी और आर्थिक समस्यार्ओं क भी अधिक विषयार्त्मक रूप से मूल्यार्ंकन कियार् जार्ने लगार्। इसके फलस्वरूप वैयक्तिक समार्ज कार्य में एक प्रजार्तार्ंत्रिक दृष्टिकोण क प्रवेश हुआ जिसके अनुसार्र सेवार्थ्री को एक मनुष्य के रूप में देखते हुए उसके वैयक्तिक महत्व एवं मूल्य की प्रतिष्ठार् की जार्ने लगी। वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार् सेवार्थ्री को उसके वार्स्तविक रूप में स्वीकृत करने लगे और इस बार्त क ध्यार्न रखने लगे कि सेवार्थ्री को सूचनार् देने के लिए बार्ध्य न कियार् जार्ये। आरम्भ में वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार्ओं ने कुछ निष्क्रियतार् क दृष्टिकोण ग्रहण कियार् और अधिकतर सेवार्थ्री के वर्णन पर ही विश्वार्स करते रहे परन्तु 1930 के उपरार्न्त वैयक्तिक समार्ज कार्यकर्तार्ओं ने पूर्ण निष्क्रियतार् एवं पूर्ण अधिकार की परस्पर विरोधी सीमार्ओं के बीच एक संतुलित स्थार्न ग्रहण कियार्। अर्थार्त् जहार्ँ आवश्यकतार् समझी वहार्ं अधिकार क प्रयोग करने में कोर्इ संकोच न कियार्।

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