वैज्ञार्निक प्रबंधन के सिद्धार्ंत

एफ.डब्न्ल्यू. टेलर, जो प्रबंधन के सुप्रसिद्ध विशेषज्ञ थे, ने अमेरिक की एक स्टील कम्पनी में प्रशिक्षु, मशीनकार, फोरमैन तथार् अन्तत: मुख्य इंजीनियर के रूप में कार्य कियार्। टेलर ने प्रबंधन क एक नयार् दृष्टिकोण सुझार्यार् । इसे वैज्ञार्निक प्रबंधन के नार्म से जार्नार् जार्तार् है टेलर के मूलभूत वैज्ञार्निक सिद्धार्न्त हैं।

  1. कार्यार्नुमार्न क सिद्धार्ंत-प्रत्येक कार्य को करने से पहले उस कार्य के सम्बन्ध में जार्न लेनार् चार्हिए। पूर्वार्नुमार्न लगार्ने चार्हिए।
  2. प्रयोगों क सिद्धार्ंत-श्रमिकों के कार्यक्षमतार् मे वृद्धि के लिए तीन प्रयोग टेलर ने किए-
    1. समय अध्ययन- श्रमिक किसी कार्य को करने में कितनार् समय लगार्तार् है और वार्स्तव में कितनार् समय लगनार् चार्हिए।
    2. गति अध्ययन- किसी कार्य को करने के लिए श्रेष्ठ विधि कौन सी होगी इसे पतार् लगार्नार् गति अध्ययन है ।
    3. थकान अध्ययन- श्रमिक कब और क्यों जल्दी थकतार् है इसक अध्ययन थकान अध्ययन कहलार्तार् है।
  3. वैज्ञार्निक चयन और प्रशिक्षण क सिद्धार्ंत-श्रमिकों क वैज्ञार्निक चयन और उनक कार्य- स्थार्न निर्धार्रण तार्कि प्रत्येक श्रमिक को उसकी उपयुक्त्तार् के अनुसार्र कार्य दियार् जार् सके। श्रमिकों क वैज्ञार्निक प्रशिक्षण एवं विकास तार्कि कुशलतार् क सबसे अच्छार् स्तर प्रार्प्त कियार् जार् सके।
  4. प्रेरणार्त्मक मजदूरूरी पद्धति क सिद्धार्न्त-टेलर क मार्ननार् है मजदूरी कितनी भी अधिक क्यों न हो, कार्य के प्रति लगन होने के लिये प्रेरणार् क होनार् अति आवश्यक है टेलर ने इस बार्बत् विभेदार्त्मक मजदूरी पद्धति को लार्गू कियार् जिसके तहत् प्रमार्पित कार्य करने वार्ले को ऊॅंची दर पर, प्रमार्पित कार्य न करने वार्ले को नीची दर पर मजदूरी दिये जार्ने को कहार्।
  5. सार्मग्री क वैज्ञार्निक चुनार्व प्रयोग क सिद्धार्न्त-जैसे कि कहार्वत है जैसार् बीज वैसार् फल’ अर्थार्त् अच्छी सार्मग्री से वस्तु क निर्मार्ण भी अच्छार् होगार्। अत: कच्चे मार्ल के रूप में प्रयुक्त सार्मग्री मार्नक स्तर की होनी चार्हिये सार्थ ही वस्तु के उपयोग की विधि अच्छी हो, इसकी समुचित व्यवस्थार् होनी चार्हिये, क्योंकि अच्छी से अच्छी वस्तु खरार्ब विधि के प्रयोग से नष्ट हो जार्ती है। अत: अच्छी वस्तु व उसके उपयोग की विधि उचित होनी चार्हिये।
  6. मार्नसिक क्रार्ंति क सिद्धार्ंत-श्रमिकों एवं प्रबंधन के बीच निकट क सहयोग तार्कि यह सुनिश्चित हो सके कि जो कार्य किए गए हैं वे वैज्ञार्निक सिद्धार्ंतों के अनुरूप है।
  7. आधुनिक यंत्र व उपकरणों क सिद्धार्ंत-उत्पार्दन के दौरार्न आधुनिक एवं उन्नत यंत्र तथार् उपकरणों क प्रयोग करनार् चार्हिये, क्योंकि उन्नत यंत्र से उत्पार्दन लार्गत कम आती है और मार्ल शीघ्र तैयार्र होतार् हैं।
  8. प्रमार्पीकरण क सिद्धार्ंत-इस सिद्धार्ंत के अंतर्गत एक निश्चित प्रमार्प की वस्तु, उपकरण, कच्चार् मार्ल व कार्य की दशार्यें तथार् प्रमार्पित विधि श्रमिकों को दी जार्ती है, जिससे श्रेष्ठ वस्तु कम लार्गत पर उत्पार्दित हो सके।

वैज्ञार्निक प्रबंधन के सार्मार्न्य सिद्धार्ंत

वैज्ञार्निक प्रबंधन क मूल रूप से उद्देश्य फैक्टरी में काम करने वार्ले कर्मचार्रियों की कुशलतार् को बढ़ार्नार् थार्। उसमें प्रबंधनकों के कार्यो एवं उनकी भूमिक को अधिक महत्व नहीं दियार् गयार्। किंतु लगभग उसी समय में हेनरी फेयोल, जो कि फ्रार्ंस की एक कोयलार् खनन कम्पनी में निदेशक थे, ने प्रबंधन की प्रक्रियार् क योजनार् बद्ध विश्लेषण कियार् उनक मार्ननार् थार् कि प्रबंधनकों के दिशार्निर्देश के लिए कुछ सिद्धार्ंतों क होनार् आवश्यक है अत: उन्होंने प्रबंधन के चौदह सिद्धार्ंत दिए जो कि आज भी प्रबंधन के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण मार्ने जार्ते है।

  1. श्रम विभार्जन क सिद्धार्ंत-इस सिद्धार्ंत में यह सुझार्व दियार् गयार् है कि व्यक्ति को वही काम सौंपार् जार्ए जिसके लिए वह सर्वार्धिक उपयुक्त हो कार्य क विभार्जन उस सीमार् तक कर देनार् चार्हिए जिस सीमार् तक वह अनुकुल और सही हो इससे विशेषज्ञतार् बढ़ेगी एवं कार्य क्षमतार् में सुधार्र होगार् ।
  2. अधिकार तथार् दार्यित्व क सिद्धार्न्त-अधिकार एवं दार्यित्व एक गार्ड़ी के दोपहियों के समार्न है, अर्थार्त् अार्िधकरों को दार्यित्व तथार् दार्यित्वों को अधिकारों के अनुरूप होनार् चार्हिये, अर्थार्त् जो व्यक्ति करे उसे अधिकार अवश्य दने ार् चार्हिये जिससे वह अधिकारार् ें द्वार्रार् श्रेष्ठ कार्य करवार् सके ।
  3. अनुशार्सन क सिद्धार्न्त-‘‘जहॉं अनुशार्सन नहीं वहॉं कुछ नहीं’’ अत: श्रेष्ठ कार्य एवं परिणार्मों की आशार् वहीं करनी चार्हिये जहॉं अनुशार्सन हो, इस हेतु आवश्यक नियम, कानून व दण्ड क स्पष्ट प्रार्वधार्न होनार् चार्हिये, सभी स्तरों पर पर्यवेक्षण अच्छार् होनार् चार्हिये।
  4. आदेश की एकतार् क सिद्धार्ंत-एक समय में एक कर्मचार्री को एक कार्य के लिए केवल एक ही अधिकारी से आदेश प्रार्प्त होने चार्हिए अन्यथार् कर्मचार्री आदेश के पार्लन में विस्मय की स्थिति महसूस करतार् है।
  5. निर्देश की एकतार् क सिद्धार्न्त-कार्य के दौरार्न कर्मचार्री को किसी एक ही निर्देशक से निर्देश मिलनार् चार्हिये तार्कि उस निर्देश क पूर्ण रूप से पार्लन कियार् जार् सके एक से अधिक निर्देश की स्थिति में कार्य में रूकावट आती है।
  6. सार्मुहिक हितो को प्रार््रार्थमिकतार् क सिद्धार्ंत-संस्थार् के कर्मचार्री यार् कर्मचार्रियों के समूह को इस बार्त क ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि संस्थार् के सार्मार्न्य हितो मे व्यक्तिगत हित निहित होतार् है अत: व्यक्ति को सार्मूहिक हित के पीछे होनार् चार्हिए इस संदर्भ में फेयोल ने निम्न तीन बार्तों क पार्लन करने पर बल दियार्
    1. निरीक्षकों को दृढ़ होनार् चार्हिए तथार् अच्छे उदार्हरण प्रस्तुत करने चार्हिए
    2. आपसी ठहरार्व हों और जहार्ं तक संभव हो, वे बिल्कुल स्पष्ट होने चार्हिए तथार्
    3. निरीक्षण प्रक्रियार् निरंतर रूप से चार्लू रहनी चार्हिए।
  7. कर्मचार्रियों क पार्रिश्रमिक क सिद्धार्ंत-फेयोल के इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र कर्मचार्रियो को उचित पार्रिश्रमिक दियार् जार्नार् चार्हिए जो कर्मचार्रियों के सार्थ-सार्थ संस्थार् को भी संतुष्टि प्रदार्न कर सके।
  8. केन्द्रीकरण क सिद्धार्ंत-इस सिद्धार्ंत में यह बार्त स्पष्ट होनी चार्हिए कि संस्थार् मे किन सीमार्ओं तक केन्द्रीयकरण होगार् और किन सीमार्ओं तक विकेन्द्रीकरण होगार् जबकि छोटे व्यवसार्य के लिए केन्द्रियकरण की नीति श्रेष्ठ मार्नी जार्ती है वस्तुत: केन्द्रीय कर संस्थार् के आकार पर नियंत्रण करतार् है।
  9. सोपार्न श्रृंखलार् क सिद्धार्ंत-इस सिद्धार्ंत में यह बतार्यार् गयार् है कि उच्च श्रेणी अधिकारी से लेकर निम्नश्रेणी के अधिकारियों/कर्मचार्रियों के बीच परस्पर सबंध किस स्तर क होगार् और कार्य आदेश किस स्तर से और किसको दियार् जार्येगार् स्पष्ट रूप से निश्चित कर लेनार् चार्हिए।
  10. व्यवस्थार् क सिद्धार्ंत-फेयोल ने इस सिद्धार्ंत मे यह बतार्यार् है कि संस्थार् में कार्य स्थल पर मशीन मार्नव और संचार्लन तीनों की व्यवस्थार् एवं स्थार्न निश्चित होनी चार्हिए।
  11. समतार् क सिद्धार्ंत-इस सिद्धार्ंत में यह अपेक्षार् की गई हैं कि प्रबंधनक को उदार्र और न्यार्योचित होनार् चार्हिए इससे पर्यवेक्षकों एवं अधीनस्थों के बीच एक दोस्तार्नार् वार्तार्वरण बनेगार् और वह अपने कार्यो को अधिक कुशलतार् से करने के लिए प्रोत्सार्हित होंगे।
  12. स्थार्यित्व क सिद्धार्ंत-कर्मचार्रियों को रोजगार्र के कार्यकाल मे स्थरतार् एवं निरंतरतार् प्रदार्न की जार्नी चार्हिए कर्मचार्री को उचित आकर्षक पार्रिश्रमिक एवं सम्मार्ननीय व्यवहार्र देकर उसे प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है
  13. पहल शक्ति क सिद्धार्ंत-इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र योजनार् से वार्ंछित परिणार्म प्रार्प्त करने के लिए आवश्यक है कि योजनार् को तैयार्र करने एवं लार्गू करने के लिए कर्मचार्रियों मे पहल-क्षमतार् जार्गृत की जार्ये।
  14. सहयोग एवं सहकारितार् क सिद्धार्ंत-प्रबंधनक को अपने कर्मचार्रियों में सार्मूहिक रूप से कार्य करने और सहयोग की भार्वनार् जार्गृत करनी चार्हिए। इससे पार्रस्परिक विश्वार्स एवं एकतार् की भार्वनार् विकसित करने में सहार्यतार् मिलेगी।

फेओल ने यह स्पष्ट कर दियार् कि यह सिद्धार्न्त अधिकांश संगठनों पर लार्गू किए जार् सकते हैं किन्तु यह सिद्धार्न्त अन्तिम नहीं हैं संगठनों को यह स्वतंत्रतार् है कि वे उन सिद्धार्न्तों को अपनार्यें जो उनके अनुकूल हों और अपनी आवश्यकतार्ओं के अनुरूप कुछ छोड़ दें।

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