वृद्धि एवं विकास

अभिवृद्धि

व्यक्ति के स्वार्भार्विक विकास को अभिवृद्धि कहते है। गर्भार्शय में भ्रूण बनने के पश्चार्त जन्म होते समय तक उसमें जो प्रगतिशील परिवर्तन होते है वह अभिवृद्धि है। इसके अतिरिक्त जन्मोपरार्न्त से प्रौढार्वस्थार् तक व्यक्ति में स्वार्भार्विक रूप से होने वार्ले परिवर्तन, जो अधिगम एवं प्रशिक्षण आदि से प्रभार्वित नही है, और ऊध्र्ववर्ती है, भी अभिवृद्धि है। अभिवृद्धि की सीमार् पूर्ण होने के पश्चार्त लम्बार्ई में विकास होने की सम्भार्वनार् नगण्य होगी। अभिवृद्धि एक जैविक प्रक्रियार् है जो सभी जीवों में पार्यी जार्ती है। अभिवृद्धि स्वत: होती है। व्यक्ति में अभिवृद्धि क मार्प कियार् जार् सकतार् है और मार्पन में वही तत्व अथवार् विशेषतार्एॅ आती है जो जन्म के समय विद्यमार्न होगी। विशेषतार्एॅ आती है। अधिगम पर अभिवृद्धि क प्रभार्व देखार् जार् सकतार् है। जब तक बार्लक की मॉसपेशियों की पर्यार्प्त अभिवृद्धि नही हो जार्ती तक वह चलनार् अथवार् लिखनार् नही सीख सकतार् । किन्तु यदि अभिवृद्धि पर अधिगम अथवार् अम्यार्स क प्रभार्व डार्लार् जार्एगार् तो उसे हम विकास कहेंगे न कि अभिवृद्धि, क्योंकि अभिवृद्धि स्वत: घटित होती है। व्यक्ति की अभिवृद्धि में वार्तार्वरण क प्रभार्व पड़ सकतार् है।

विकास

विकास क तार्त्पर्य व्यक्ति में नई-नई विशेषतार्ओं एवं क्षमतार्ओं क विकसित होनार् है जो प्रार्रम्भिक जीवन से आरम्भ होकर परिपक्वतार्वस्थार् तक चलती है। हरलॉक के शब्दों में “विकास अभिवृद्धि तक ही सीमित नही है। इसके बजार्य इसमें प्रौढ़ार्वस्थार् के लक्ष्य की ओर परिवर्तनो क प्रगतिशील क्रम निहित रहतार् है। विकास के परिणार्मस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषतार्एँ और नवीन योग्यतार्एँ प्रकट होती है।” हरलॉक की इस परिभार्षार् से तीन बार्तें स्पष्ट होती है-

  1. विकास परिवर्तन की ओर संकेत करतार् है।
  2. विकास में एक निश्चित क्रम होतार् है।
  3. विकास की एक निश्चित दिशार् एवं लक्ष्य होतार् है।

हरलॉक के कथनार्नुसार्र विकास की प्रक्रियार् जीवनपर्यन्त एक क्रम से चलती रहती है तथार् प्रत्येक अवस्थार् क प्रभार्व विकास की दूसरी अवस्थार् पर पडतार् है।

अभिवृद्धि एवं विकास में अन्तर

अभिवृद्धि विकास
1. अभिवृद्धि विशेष आयु तक चलने वार्ली प्रक्रियार् है
2. वृद्धि, विकास क एक चरण है।
3. अभिवृद्धि में परिवर्तनों को देखार् व मार्पार् जार् सकतार् है।
4. अभिवृद्धि मुख्यत: शार्रीरिक परिवर्तनो को प्रकट करतार् है।
5. अभिवृद्धि केवल उन्ही घटकों की हार्ती है जो बार्लक में जन्म के समय विद्यमार्न होती है।
विकास जन्म से मश्त्यु तक चलने वार्ली प्रक्रियार् है।
विकास में वृद्धि भी सम्मिलित है।
विकास में होने वार्ले परिवर्तनों को अनुभूत कियार् जार् सकतार् है, मार्पार् नही जार् सकतार्।
विकास में सभी पक्षों (शार्रीरिक, मार्नसिक, सार्मजिक, संवेगार्त्मक, नैतिक आदि) के परिवर्तनों को संयुक्त रूप से लियार् जार्तार् है।
विकास के लिए यह आवश्यक नही है।

विकास क्रम में होने वार्ले परिवर्तन-

विकास क्रम में होने वार्ले परिवर्तन चार्र वर्गो मे बार्ँटे जार् सकते है-

  1. आकार परिवर्तन- जन्म के बार्द ज्यो-ज्यों बार्लक की आय ु बढत़ ी जार्ती है, उसके शरीर में परिवर्तन होतार् जार्तार् है। शरीर के ये परिवर्तन-वार्ºय एवं आन्तरिक दोनों अवयवों में होते हैं। शरीर की लम्बार्ई, चौड़ार्ई एवं भार्र में वृद्धि होती है। आन्तरिक अंग जैसे हृदय, मस्तिष्क, उदर, फेफड़ार् आदि क आकार भी बढतार् है। शार्रीरिक परिवर्तनों के सार्थ-सार्थ मार्नसिक परिवर्तन होते हैं।
  2. अगं – प्रत्यगो के अनुपार्त मे परिवर्तन -बार्लक एवं वयस्क के अगं प्रत्यंगो में अन्तर होतार् है। बार्ल्यार्वस्थार् में हार्थ पैर की अपेक्षार् सिर बड़ार् होतार् है, किन्तु किशोरार्वस्थार् में आने पर यह अनुपार्त वयस्कों के समार्न होतार् है। इसी प्रकार क अन्तर मार्नसिक विकास में भी देखने को मिलतार् है।
  3. कुछ चिहनों क लोप – विकास के सार्थ ही थार्इमस ग्िरन्थ, दूध के दार्ंत आदि क लोप हो जार्तार् है। इसके सार्थ ही वह बार्ल-क्रियार्ओं एवं क्रीड़ार्ओं को भी त्यार्ग देतार् है।
  4. नवीन चिहनों क उदय – आयु में वृद्धि के सार्थ-सार्थ बार्लक में अनेक नवीन शार्रीरिक एवं मार्नसिक चिहन प्रकट होते रहते है, उदार्हरण के लिए, स्थार्यी दार्ंतो क उगनार्। इसके सार्थ ही लैगिक चेतनार् क भी विकास होतार् है। किशोरार्वस्थार् में मुँह एवं गुप्तार्ंगो पर बार्ल उगने प्रार्रम्भ हो जार्ते है।

विकास के सिद्धार्न्त

  1. विकास की दिशार् क सिद्धार्न्त- इसके अनुसार्र शिशु के शरीर क विकास सिर से पैर की दिशार् में होतार् है। मनोवैज्ञार्निकों ने इस विकास को ‘मस्तकाधोमुखी’ यार् ‘शिर: पुच्छीय दिशार्’ कहार् है। 
  2. निरन्तर विकास क सिद्धार्न्त- स्किनर के अनसु ार्र विकास प्िर क्रयार्ओं की निरन्तरतार् क सिद्धार्न्त केवल इस तथ्य पर बल देतार् है कि व्यक्ति में कोई आकस्मिक परिवर्तन नही होतार् है। विकास एक समार्न गति से नही होतार् है। विकास की गति कभी तेज कभी धीमी रहती है। 
  3. विकास की गति में व्यक्तिगत भिन्नतार् क सिद्धार्न्त- वज्ञै ार्निक अध् ययनों से यह निश्चित हो गयार् है कि विभिन्न व्यक्तियों के विकास की गति में विभिन्नतार् होती है। एक ही आयु में दो बार्लकों में शार्रीरिक, मार्नसिक, सार्मार्जिक विकास में वैयक्तिक विभिन्नतार्एँ स्पष्ट दिखार्यी देती है। 
  4. विकास क्रम क सिद्धार्न्त- विकास एक निश्चित एव  व्यवस्थित क्रम में होतार् है। उदार्हरणाथ बार्लक क भार्षार् एवं गार्मक सम्बन्धी विकास एक क्रम में होतार् है। 
  5. परस्पर सम्बन्ध क सिद्धार्न्त- बार्लक के शार्रीरिक, मार्नसिक, सवं गे ार्त्मक पक्षके विकास में परस्पर सम्बन्ध होतार् है। शार्रीरिक विकास बौद्धिक विकास को प्रभार्वित करतार् है। गैरीसन तथार् अन्य के अनुसार्र “शरीर सम्बन्धी द्वष्टिकोण व्यक्ति के विभिन्न अंगो के विकास में सार्मज्यस्य और परस्पर सम्बन्ध पर बल देतार् है।”

विकास को प्रभार्वित करने वार्ले कारक

मार्नव विकास तथार् व्यवहार्र क अध्ययन करने के लिए विशेष रूप से दो प्रमुख कारकों पर ध्यार्न दियार् जार्तार् है। प्रथम, जन्मजार्त यार् प्रकृतिदत्त प्रभार्व तथार् दूसरार्, जन्म के उपरार्न्त प्रभार्वित करने वार्ले बार्ºय कारक। व्यक्तित्व में भिन्नतार् प्रकृतिजन्य कारकों तथार् पर्यार्वरण क पोषण सम्बन्धी कारणों से होती है। जन्म से सम्बन्धित बार्तों को वंशार्नुक्रम एवं समार्ज से सम्बन्धित बार्तों को वार्तार्वरण कहते हैं। इसे प्रकृति तथार् पोषण भी कहार् जार्तार् है। वुडवर्थ क कथन है कि एक पौधे क वंशक्रम उसके बीज में निहित है और उसके पोषण क दार्यित्व उसके वार्तार्वरण पर है।

1. वंशार्नुक्रम –

वैज्ञार्निक रूप में वंशार्नुक्रम एक जैवकीय तथ्य है। प्रार्णिशार्स्त्रीय नियमों के अनुसार्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को कुछ गुण हस्तार्न्तरित किए जार्ते हैं। पूर्वजों के इन हस्तार्न्तरित किए गए शार्रीरिक और मार्नसिक लक्षणों के मिश्रित रूप को ही वंशार्नुक्रम, वंश परम्परार्, पैतश्कतार्, आनुवार्ंशिकतार् आदि कहार् जार्तार् है। जीवशार्स्त्र के अनुसार्र – “निषिक्त अण्ड में सम्भार्वित विद्यमार्न विशिष्ट गुणों क योग ही आनुवार्ंशिकतार् है।” मार्तार्-पितार् की शार्रीरिक एवं मार्नसिक विशेषतार्ओं क सन्तार्नों में हस्तार्न्तरण होनार् वंशार्नुक्रम है। उपर्युक्त परिभार्षार्ओं के आधार्र पर स्पष्ट हो जार्तार् है कि वंशार्नुक्रम मार्तार् पितार् एवं अन्य पूर्वजों से सन्तार्न को प्रार्प्त होने वार्लार् गुण है जिसमें शार्रीरिक, मार्नसिक एवं व्यवहार्रिक गुण सम्मिलित होते हैं।

2. वंशार्नुक्रम की प्रक्रियार्-

मार्नव शरीर कोषों क योग होतार् है। शरीर क आरम्भ केवल एक कोष से होतार् है, जिसे ‘संयुक्त कोष’ (Zygote) कहते हैं। यह कोष 2,4,6,8 के क्रम में बढ़तार् चलार् जार्तार् है।
पुरूष और स्त्री दोनों में 23-23 गुण सूत्र (Chromosomes) होते हैं। इस प्रकार संयुक्त कोष में गुण सूत्रों के 23 जोड़े होते हैं। प्रत्येक गुण-सूत्र में 40 से 100 तक पित्र्यैक होते है। प्रत्येक पित्र्यैक एक गुण यार् विशेषतार् को निर्धार्रित करतार् है। इसलिए इन पित्र्यैकों को वंशार्नुक्रम निर्धार्रक (heredity determinants) कहते है।

3. बार्लक पर वंशार्नुक्रम क प्रभार्व-

बार्लक के व्यक्तित्व के प्रत्येक पेहलू पर वंशार्नुक्रम क प्रभार्व पड़तार् है।

  1. मूल शक्तियों पर प्रभार्व- बार्लक की मूल शक्तियों क प्रधार्न कारण उसक वंशार्नुक्रम है। 
  2. शार्रीरिक लक्षणों पर प्रभार्व- कॉल पियरसन के अनुसार्र मार्तार्-पितार् की लम्बाइ कम यार् अधिक होने पर उनके बच्चों की लम्बाइ भी कम यार् अक्तिार्क होती है। 
  3. प्रजार्ति की श्रेष्ठतार् पर प्रभार्व- बुद्धि की श्रेष्ठतार् क कारण प्रजार्ति है। यही कारण है कि अमेरिक की श्वेत प्रजार्ति नीग्रो प्रजार्ति से श्रेष्ठ है। यद्यपि कुछ मनोवैज्ञार्निकों ने इसक खण्डन कियार् है।

4. वंशार्नुक्रम सम्बन्धी कुछ अध्ययन-

पार्श्चार्त्य विद्वार्नों ने वंशार्नुक्रम के प्रभार्व एवं महत्व के सम्बन्ध में जो अध्ययन किए है वो  है-

  1. गार्ल्टन क अध्ययन- बिट्रेन के मनोवैज्ञार्निक सर फ्रार्ंसिस गार्ल्टन ने 977 व्यक्तियों के दो वर्गो की जीवनकथार्ओं क अध्ययन कियार्। पहले में 535 व्यक्ति बुद्धिमार्न थे और दूसरे में केवल 5 बुद्धिमार्न थे। इनकी रिश्तेदार्री भी उन्हीं के समार्न लोगों से थी। इन एकत्रित तथ्यों को उसने “हैरिडिटी जीनियस” (Heredity Genius) नार्मक पुस्तक में दियार् है। इससे स्पष्ट होतार् है कि प्रतिभार्शार्ली प्रतिष्ठत व्यक्तियों के निकट सम्बन्धी भी प्रतिष्ठित होते हैं और सार्मार्न्य स्तर के व्यक्तियों के सम्बन्धी सार्मार्न्य स्तर के पार्ये जार्ते हैं।
  2. ज्यूक वंश क अध्ययन- इस परिवार्र क अध्ययन डगडले आरै स्ट्रार्बकु ने कियार्। ज्यूक ने अपने समय एक दुरार्चार्री स्त्री से सम्बन्ध कियार् थार् जिसके परिवार्र में 1000 स्त्री-पुरूष पार्ंच पीढ़ियों में हुए। इनसे 300 बचपन में मर गये, 440 रोगी हुए और 310 अनार्थार्लय में भेजे गये, 130 अपरार्ध वृत्ति वार्ले हुए और 120 व्यक्ति कुछ कामधार्म करके सार्धार्रण जीविक चलार्ते रहे। जुड़व़ार् बार्लको क अध्ययन- व्यक्ति के विकास में वशंार्नुक्रम क कितनार् प्रभार्व पड़तार् है इस बार्त क पतार् लगार्ने के लिए मनोवैज्ञार्निकों ने कुछ जुड़वार् बच्चों क अध्ययन कियार् फ्रार्ंसिस गार्ल्टन इस अध्ययन के आधार्र पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जुड़वार् बच्चों के जीवन में रूप-रंग, आकार और बुद्धि में बहुत अद्धिार्क समार्नतार् पार्यी जार्ती है।

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