वुड क घोषणार्-पत्र (1854)

1853 के वर्ष को आधुनिक भार्रतीय शिक्षार् के विकास की ‘किशोरार्वस्थार्’ की संज्ञार् प्रदार्न की जार् सकते है, क्योंकि इस वर्ष में ईस्ट इण्डियार् कम्पनी के आज्ञार्-पत्र के नवीनीकरण (Renewal) के समय ब्रिटिश पालियार्मेन्ट ने भार्रत में कम्पनी द्वार्रार् किये गये शिक्षार् प्रयार्सों को और अधिक व्यार्पक बनार्ने पर जोर दियार्। यद्यपि इसमें भी उनके सार्म्रार्ज्यवार्दी स्वाथी की पूर्ति ही अधिक थी, किन्तु इसने शिक्षार् के चहूमुखी आयार्म में सुधार्र हेतु पर्यार्प्त प्रयार्सों पर बल भी दियार् गयार्।

ब्रिटिश पालियार्मेन्ट के इन सुझार्वों की पूर्ति हेतु कम्पनी ने अपने एक सुयोग्य अधिकारी चार्ल्र्स वुड (Charles Wood) को भार्रतीयों की शिक्षार् हेतु एक नीति-निर्देश तैयार्र करने को कहार्। चार्ल्र्स वुड के प्रयार्सों क ही यह परिणार्म थार् कि 1854 में ‘वुड क घोषणार्-पत्र‘ (Wood Despatch) बनकर तैयार्र हो गयार्।

चार्ल्र्स वुड ने सन् 1853 में ईस्ट इण्डियार् कम्पनी के पुनर्नवीनीकरण आज्ञार्-पत्र के तहत भार्रतीय शिक्षार् की रूपरेखार् की पुनर्समीक्षार् करने क महत्त्वपूर्ण कार्य कियार्। यह सर्वप्रथम प्रयार्स थार् जबकि कम्पनी को प्रार्थमिक शिक्षार् से लेकर विश्वविद्यार्लयी शिक्षार् के सभी पक्षों की विस्तृत समीक्षार् प्रस्तुत की थी। इस घोषणार्-पत्र के प्रकाशित होने के बार्द भार्रत में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षार् के स्वरूप को एक रार्जनैतिक मार्न्यतार् प्रदार्न कर दी गयी। इस अभिप्रार्य से वुड के घोषणार्-पत्र को भार्रत में अंग्रेजी शिक्षार् क मैग्नार् कार्टार् (Magna Carta) भी कहार् जार्तार् है।

वुड घोषणार्-पत्र के उद्देश्य

वुड ने अपने घोषणार्-पत्र में कम्पनी के शिक्षार् सम्बन्धी उद्देश्यों पर टिप्पणी करते हुए लिखार् है- ‘‘अनेक महत्त्वपूर्ण विषयो में से, अन्य कोई भी विषय इतनार् आकर्षण उत्पन्न नहीं करतार्, जितनार् कि ‘शिक्षार्’। यह हमार्रार् पुनीत कर्त्त्व्य है कि हम समस्त उपलब्ध सार्धनों से भार्रतीय प्रजार् को अपने इंग्लैण्ड के सम्पर्क से वह सब ज्ञार्न प्रदार्न करें जिससे कि वे शिक्षार् द्वार्रार् भौतिक एवं नैतिक गुणों से सम्पन्न हो सकें।’’ वुड के घोषणार्-पत्र के प्रमुख उद्देश्य जो उसने अपनी प्रस्तार्वनार् में लिखे हैं- वे इस प्रकार हैं-

  1. भार्रतीयों को अंग्रेजी ज्ञार्न के वरदार्न एवं रोशनी से उन्नत बनार्नार्।
  2. भार्रतीयों में शिक्षार् द्वार्रार् उच्च बौद्धिक क्षमतार्ए ही नहीं, बल्कि उनके नैतिक मूल्यों को भी उच्च बनार्नार्, तार्कि वे अधिक विश्वार्सी सिद्ध हो सकें।
  3. भार्रतीयों में कम्पनी के कार्यलार्यों, कारखार्नों में कार्य करने की निपुणतार्ए विकसित करनार्, तार्कि वे रोजगार्र, श्रम तथार् पूजी आदि शब्दों से परिचित हो सकें। तार्कि श्रमिकों की उचित आपूर्ति जार्री रखी जार् सके।
  4. भार्रतीय सार्हित्य को पार्श्चार्त्य दर्शन एवं विज्ञार्न से सुसज्जित करनार्।
  5. भार्रत में परिमाजित कलार्ओं विज्ञार्न, दर्शन तथार् यूरोपियन सार्हित्य क संचार्र करनार्।

वुड के घोषणार्-पत्र में लिखित संस्तुतियॉं 

वुड ने तार्त्कालिक भार्रतीय शिक्षार् के उद्देश्यों के निर्धार्रण के बार्द भार्वी शिक्षार् नीति सम्बन्धी व्यार्पक विचार्र प्रस्तुत किये थे। इन विचार्रों को यहॉं पर बिन्दुबद्ध कियार् जार् रहार् है-

  1. शिक्षार् क मार्ध्यम: अंग्रेजी एवं क्षेत्रीय भार्षार्ए (Medium of Instruction:English and Vernacular languages)- घोषणार्-पत्र में अंग्रेजी एवं क्षेत्रीय भार्रतीय भार्षार्ओं को शिक्षार् प्रदार्न करने हेतु मार्ध्यम के रूप में स्वीकारार् गयार् है। घोषणार्-पत्र में व्यक्त कियार् गयार् है कि यूरोपीय ज्ञार्न के प्रसार्र के लिए अंग्रेजी भार्षार् तथार् अन्य परिस्थितियों में भार्रतीय भार्षार्ओं को शिक्षार् के रूप में सार्थ-सार्थ देखने की आशार् व्यक्त की जार्ती है।
  2. सहार्यतार् अनुदार्न प्रणार्ली: सरकारी संस्थार्ओं का, स्थार्नीय निकायों क क्रमिक रूप से स्थार्नार्न्तरण (Grant-in-Aid System: Transfer of Government Institution to the Management of Local Bodies) – सहार्यतार् अनुदार्न प्रणार्ली की रूपरेखार् के सम्बन्ध में वुड के घोषणार्-पत्र में निम्नलिखित विचार्र व्यक्त किये गये हैं-

‘‘हम भार्रत में उसी सहार्यतार् अनुदार्न प्रणार्ली को लार्गू रखनार् चार्हते हैं, जो कि इस देश में सफलतार्पूर्वक सम्पार्दित की गयी है। इस प्रकार इसमें हम स्थार्नीय संसार्धनों की सहार्यतार् की भी कामनार् कर सकते हैं। इससे शिक्षार् के प्रसार्र में तीव्र गति लार्यी जार् सकती है जो कि मार्त्र सरकारी धन के व्यय से सम्भव प्रतीत नहीं होती है।’’
वुड ने अपने घोषणार्-पत्र में सरकारी सहार्यतार् प्रदार्न करने हेतु कुछ नीति-निर्देशक नियमों की भी संस्तुति की थी, ये हैं-

  1. सरकारी अनुदार्न प्रदार्न करने क आधार्र प्रदार्न करने हेतु कुछ नीति-निरपेक्ष-लौकिक शिक्षार् की सुव्यवस्थार् क होनार्।
  2. उक्त विद्यार्लय क स्थार्नीय सुयोग्य व्यक्तियों द्वार्रार् प्रबन्धन।
  3. उक्त विद्यार्लयों में छार्त्रों से अल्प शुल्क की व्यवस्थार् होनार्।
  4. प्रदत्त सरकारी अनुदार्न सम्बन्धी नीतियों क अनुपार्लन तथार् सरकारी कर्मचार्रियों द्वार्रार् उपलब्धियों क स्वतन्त्र रूप से मूल्यार्ंकन करने की सुविधार्।

इस प्रकार घोषणार्-पत्र में यह व्यवस्थार् की गयी कि प्रार्न्तीय सरकारें इंग्लैण्ड की सहार्यतार् अनुदार्न प्रणार्ली को आदर्श रूप (Ideal form) में स्वीकार करें, उनकी नीतियों क कठौर अनुसरण करें। इसके सार्थ ही विद्यार्लयों में पुस्तकालय, विज्ञार्न प्रयोगशार्लार्, खेलकूद, व्यार्यार्म सार्मग्री, छार्त्रवृत्तियों, शिक्षकों के वेतन, भवन निर्मार्ण आदि के लिए अतिरिक्त अनुदार्न प्रदार्न करें। इस अनुदार्न प्रणार्ली के फलस्वरूप हम व्यक्तिगत प्रबन्घन (Private Management ) को बल प्रदार्न करनार् चार्हते हैं। फिर धीरे-धीरे सरकारी संस्थार्ओं को भी इन्हीं स्थार्नीय प्रबन्ध कमेटियों को हस्तार्न्तरित कर दिय जार्येगार् यार् आदर्श संस्थार्ओं के रूप में उन्हें जीवित रखार् जार्येगार्।

  1. सरकारी संस्थार्ओं में स्वैच्छिक धामिक शिक्षार् की व्यवस्थार् – समस्त सरकारी संस्थार्ओं में धर्म निरपेक्ष शिक्षार् के स्वरूप की व्यवस्थार् की जार्नी आवश्यक है। अन्य पुस्तकों के सार्थ धर्मग्रन्थ बार्इविल को भी पुस्तकालय में रखवार् दियार् जार्य तथार् छार्त्र जो भी चार्हें स्वतन्त्रतार्पूर्वक उसक अध्ययन कर सकें। स्कूल के अवकाश के उपरार्न्त कोई भी छार्त्र उस धर्मग्रन्थ के सम्बन्ध में अपनी जिज्ञार्सार्ए अपने शिक्षकों से पूछ कर शार्न्त कर सकते हैं।
  2. शिक्षक-प्रशिक्षण– वुड.के.घोषणार्-पत्र में यह संस्तुति की गयी थी कि इंग्लैण्ड के शिक्षक-प्रशिक्षण कॉलेजों के ही अनुरूप भार्रत के प्रत्येक प्रार्न्त में शिक्षक-प्रशिक्षण कॉलेजों की स्थार्पनार् की जार्य। इस कार्य में अच्छे व्यक्तियों को आकृ”ट करने के लिए छार्त्रवृत्ति, उत्तम वेतन एवं सुविधार्ओं की व्यवस्थार् भी की जार्नी चार्हिए, जिससे, जिससे कि शिक्षार् के व्यवसार्य को अन्य सरकारी व्यवसार्यों के समार्न सम्मार्न प्रार्प्त हो सके। इस विश्वविद्यार्लय के अनुरूप कुलपति, उप-कुलपति एवं कार्यकारिणी के सदस्य गण (Members of Executive Council) होंगे। ये सभी सम्मिलित रूप से सीनेट (Senate) क निर्मार्ण करेंगे जो कि विश्वविद्यार्लय के लिए नियम बनार्येगी तथार् प्रबन्ध करेगी।
  3. जन शिक्षार् क प्रसार्र– वुड के घोषणार्-पत्र ने स्वीकार कियार् है कि शिक्षार् में निस्यन्दन सिद्धार्न्त ने जन शिक्षार् के प्रसार्र को बहुत आघार्त पहुचार्यार् है। अत: वुड ने संस्तुति की कि सरकार को प्रार्थमिक शिक्षार् के क्षेत्र में अधिक धन लगार्कर प्रत्येक जिले में इसकी उचित व्यवस्थार् करनी चार्हिए। देशी विद्यार्लयों में सुधार्न करें, निर्धन छार्त्रों हेतु छार्त्रवृत्ति की व्यवस्थार् करें, तार्कि ये उच्च शिक्षार् की ओर अग्रसर हो सकें। वुड ने लिखार् है- ‘‘अब हमार्रार् ध्यार्न इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न की ओर केन्द्रित होनार् चार्हिए जिसकी अभी तक अवहेलनार् की गयी है अर्थार्त् जीवन के सभी अंगों के लिए लार्भदार्यक एवं व्यार्वहार्रिक शिक्षार्, उस विशार्ल जनसमूह को शिक्षार् किस प्रकार दी जार्य? जो किसी सहार्यतार् के बिनार् स्वयं लार्भदार्यक शिक्षार् प्रार्प्त करने में पूर्णत: असमर्थ है।’’ इस शिक्षार् के नियोजित प्रसार्र हेतु वुड ने नियोजित शिक्षार् विभार्ग की रूपरेखार् तैयार्र की। उसके अनुसार्र प्रत्येक जिलार् स्तर पर जन शिक्षार् विभार्ग की स्थार्पनार् की जार्य, जिसक सर्वोच्च अधिकारी ‘जन शिक्षार् डार्यरेक्टर’ (Director of Public Instruction) हो। उसे संहार्यतार् प्रदार्न करने के लिए उप-शिक्षार् डार्येरक्टर, निरीक्षक (Inspector) तथार् सहार्यक निरीक्षक की नियुक्ति की जार्नी चार्हिए।

इन प्रमुख संस्तुतियों के अतिरिक्त वुड महोदय ने क्रमबद्ध शिक्षार् पद्धति (Graded School System), व्यार्वसार्यिक शिक्षार् (Voction Education) तथार् रोजगार्र आदि के सन्दर्भ में भी व्यार्पक विचार्र प्रस्तुत किये हैं।

वुड के घोषणार्-पत्र क मूल्यार्ंकन

वुड क घोषणार्-पत्र आधुनिक भार्रतीय शिक्षार् के विकास यार्त्रार् क अनूठार् पड़ार्व है। यहॉं से वार्स्तविक शिक्षार् के स्वरूप की अभिव्यक्ति होती है। यद्यपि वुड की संस्तुतियों ने शिक्षार् में क्रार्न्तिकारी परिवर्तनों की आधार्रशिलार् रखी थी, किन्तु उसमें कुछ कमियॉं भी निहित थीं। यहॉं इस घोषणार्-पत्र के इन्हीं गुण-दोषो क तुलनार्त्मक चित्र प्रस्तुत कियार् जार् रहार् है।

वुड घोषणार्-पत्र के गुण

वुड क घोषणार्-पत्र के गुणों क उल्लेख इस प्रकार कर सकते हैं-

  1. घोषणार्-पत्र ने भार्रतीय शिक्षार् की प्रार्रम्भिक आधार्रशिलार् को पर्यार्प्त मजबूती प्रदार्न की थी। इसलिए इसे भार्रत में अंग्रेजी शिक्षार् क महार्धिकार-पत्र (Megna carta of English Education in India) के नार्म से पुकारार् जार्तार् है।
  2. घोषणार्-पत्र ने भार्रतीय शिक्षार् के उद्देश्य को सुनिश्चित करके उसकी दिशार् निर्धार्रित की।
  3. घोषणार्-पत्र ने ईस्ट इण्डियार्
  4. घोषणार्-पत्र में शिक्षार् के सभी व्यार्पक आयार्मों क सुव्यवस्थित स्वरूप प्रकट होकर सार्मने आयार्।
  5. घोषणार्-पत्र ने पूर्व कार्यक्रमों, सिद्धार्न्तों जैसे निस्यन्दन सिद्धार्न्त, व्यार्पक शिक्षार् की अवमार्ननार् आदि को अनैतिक सिद्ध कर दियार्।
  6. घोषणार्-पत्र में सर्वप्रथम क्रमबद्ध स्कूलों (Graded Schools) व्यार्वसार्यिक शिक्षार् (Vocational Education), स्त्री शिक्षार् (Women’s Education) तथार् जन प्रसार्र शिक्षार् विश्वविद्यार्लयी शिक्षार् की संगठनार्त्मक रूपरेखार् प्रस्तुत की तथार् इंग्लैण्ड के कॉलेजों एवं विश्वविद्यार्लयों को आदर्श रूप में प्रस्तुत कियार्।
  7. प्रार्च्य विद्यार्, सार्हित्य के मुद्रण, प्रकाशन एवं पठन-पार्ठन हेतु छार्त्रवृत्तियों तथार् अन्य प्रोत्सार्हन धनरार्शियों की व्यवस्थार् की गयी।
  8. घोषणार्-पत्र में योग्य, प्रशिक्षित तथार् उत्तम तथार् सुविधार्ओं से सुसज्जित शिक्षकों हेतु नॉर्मल स्कूलों की स्थार्पनार् पर जोर दियार् गयार्।
  9. घोषणार्-पत्र में सरकारी नीतियों के पार्लन करने वार्ले सभी विद्यार्लयों हेतु सहार्यतार् अनुदार्न रार्शि की भी व्यवस्थार् की गयी।
  10. घोषणार्-पत्र में अंग्रेजी शिक्षार् को सीधे अंग्रेजों की नौकरी से जोड़ दियार्, जिससे शिक्षार् से आजीविक कमार्ने क महत्त्व तथार् प्रतिस्पद्धी को बढ़ार्वार् मिलार्।

जेम्स (James) ने इसकी प्रशसार् में लिखार् है- ‘‘सन् 1854 के घोषणार्-पत्र क भार्रतीय शिक्षार् के इतिहार्स में सर्वोच्च स्थार्न है, जो कुछ इसके पूर्व हुआ, वह इसकी और संकेत करतार् है और जो कुछ इसके बार्द हुआ, वह इसके विकास एवं वृद्धि क परिणार्म है।

लाड डलहौजी के अनुसार्र- ‘‘घोषणार्-पत्र में पूरे हिन्दुस्तार्न के लिए एक योजनार् थी। इस प्रकार की व्यार्पक रूपरेखार् प्रार्न्तीय अथवार् केन्द्रीय सरकार द्वार्रार् कभी भी प्रस्तुत नहीं की जार् सकती थी।’’

वुड घोषणार्-पत्र के दोष

वुड के घोषणार्-पत्र को विशेषतार्ओं के कारण शिक्षार् क महार्धिकार-पत्र कहार् जार्तार् है, लेकिन इसमें कुछ दोष भी नहीं हैं, जो इस प्रकार हैं-

  1. घोषणार्-पत्र क सर्वोच्च दोष यह थार् कि शिक्षार् क क्षेत्र सरकार एवं नोकरशार्ही के आधिपत्य में चलार् गयार्। अत: प्रार्चीन भार्रत की स्वतन्त्र शिक्षार् पद्धति को अन्तिम एवं सबसे गम्भीर आघार्त पहुचार्।
  2. घोषणार्-पत्र ने उच्च एवं मार्ध्यमिक शिक्षार् में अंग्रेजी को मार्ध्यम बनार्कर उसे जन प्रचलित स्वरूप प्रदार्न करने से रोक दियार् गयार्।
  3. घोषणार्-पत्र ने यद्यपि प्रार्च्य सार्हित्य, संस्कृति को अक्षुण्ण बनार्ये रखने की संस्तुति की, परन्तु अंग्रेजी शिक्षार् की व्यार्पक प्रगति के नीचे वह स्वयं ही दम तोड़ रही थी।
  4. घोषणार्-पत्र ने निरपेक्ष संस्कृति की शुरूआत कर शिक्षार् में भार्रतीय धामिक एवं आध्यार्त्मिक मार्न्यतार्ओं को तीव्र आघार्त पहुचार्यार्।
  5. घोषणार्-पत्र ने शिक्षार् के वृहद् स्वरूप को अंग्रेजी सार्म्रार्ज्य में नौकरी प्रार्प्त करने की संकीर्ण मार्नसिकतार् से जोड़ कर रोजगार्र परक शिक्षार् संस्कृति को जन्म दियार्।
  6. घोषणार्-पत्र की जीविकोपाजन हेतु शिक्षार् की नीति ने प्रार्च्य विद्यार्लयों को स्वत: ही मृत प्रार्य: बनार् दियार्।
  7. घोषणार्-पत्र ने भार्रतीयतार् क विनार्श करके पूर्ण विदेशीकरण क बिगुल बजार्यार्।
  8. घोषणार्-पत्रने शिक्षार् के क्रियार्न्वियन हेतु प्रत्येक पद पद इंग्लैण्ड के स्कूलों, कॉलेजों को अपनार् आदर्श बनार् लियार्।
  9. व्यार्वसार्यिक विद्यार्लय केवल रार्जभक्त भार्रतीयों को ही संतुष्ट कर पार्ये थे।
  10. घोषणार्-पत्र ने यद्यपि निष्पक्षतार् क भार्व प्रकट कियार् है, किन्तु मिशनरी विद्यार्लयों के सन्दर्भ में उसक नियम शिथिल हो गयार्।
  11. सहार्यतार् अनुदार्न की शर्ते प्रार्य: अंग्रेजी विद्यार्लयों के ही अनुकूल बनार्यी गयी थीं तथार् वे.ही इसकी अर्हतार्ओं की पूर्ति कर पार्ने में सक्षम थे।
  12. शिक्षार् को अंगे्रजी मार्ध्यम द्वार्रार् छार्त्रों पर लार्दकर अनेक सरल एवं छोटे माग अपनार्ये गये। इनके फलस्वरूप शिक्षार् में सरल टीकाए, कुंजियॉं आदि की बार्ढ़ सी आ गयी। इन्होंने शिक्षार् को सफलतार् क सार्धन बनार् दियार्। अब छार्त्र कम परिश्रमी हो चले थे।
  13. शिक्षार् को लिखित परीक्षार् से जोड़कर, उसमें अनेक प्रकार की बुरार्इयों क प्रवेश हो गयार्।
  14. उक्त समस्त परिस्थितियों ने अंग्रेजी शिक्षार् की जड़ों को तीव्र गति से सींचार्, अब शिक्षार् परीक्षार् उत्तीर्ण करने के लिए तथार् नौकरी पार्ने के लार्लच से ली जार्ने लगी।

वुड क घोषणार्-पत्र तथार् आलोचकों के दृष्टिकोण

आलोचकों में दोनों प्रकार के व्यक्ति विद्यमार्न हैं- कुछ इसकी अतिरंजित प्रशंसार् करते हैं, तो कुछ इसकी कठोर निन्दार्। ऐसे ही चुने गये दृष्टिकोणों को यहॉं प्रस्तुत कियार् जार् रहार् है।

  1. परार्ंजपे के अनुसार्र- (1) ‘‘यद्यपि घोषणार्-पत्र में अनेक अच्छे गुण विद्यमार्न हैं, किन्तु फिर भी इस शैक्षिक घोषणार्-पत्र को शिक्षार् क आज्ञार्-पत्र नहीं कहार् जार् सकतार् जो कि एक सरकारी-पत्र की तरह कुछ अधिकार एवं सुविधार्ए प्रदार्न करतार् हो। घोषणार्-पत्र कभी भी सावभौमिक शिक्षार् की प्रत्यार्शार् नहीं करतार् यद्यपि वह सहार्यतार्, अनुदार्न द्वार्रार् उसके प्रसार्र की संस्तुति करतार् है।’’  (2) ‘‘शार्यद यह तथ्य तो क्षम्य है कि घोषणार्-पत्र के प्रणेतार् को भार्रतीय महत्त्वार्कांक्षार्ओं क एक शतार्ब्दी बार्द क्यार् स्वरूप बनेगार्, इसक उचित ज्ञार्न नहीं थार्। किन्तु अपरोक्ष रूप से यह घोषणार्-पत्र की अपूर्णतार् है। अन्त में 1854 के घोषणार्-पत्र क चार्हे जो कुछ महत्त्व हो पर इस समय उसको शिक्षार् क अधिकार-पत्र (Educational Charter) कहनार् हार्स्यार्पद ही होगार्।’’(3) ‘‘उनक उद्देश्य यह नहीं थार् कि शिक्षार् नेतृत्व के लिए लिए हो, शिक्षार् भार्रत की औद्यौगिक उन्नति के लिए हो, शिक्षार् मार्तृभूमि की रक्षार् के लिए हो। संक्षेप में, ऐसी शिक्षार् हो, जिसकी आवश्यकतार् एक स्वतन्त्र rashtra के नार्गरिकों को हार्।’’
  2. एस.एन.मुखर्जी के अनुसार्र – ‘‘घोषणार्-पत्र ने देश की प्रार्चीन परम्परार्ओं क पतार् नहीं लगार्यार् और इस बार्त पर भी बिल्कुल विचार्र नहीं कियार् कि भार्रत में शिक्षार् एक धामिक संस्कार थी।’’
  3. भगवार्न दयार्ल के अनुसार्र- ‘‘वुड के घोषणार्-पत्र क प्रमुख दोष-शिक्षार् के उद्देश्य क गलत निर्धार्ण थार्। यह उद्देश्य पूर्व और पश्चिम की सर्वोत्त्ार्म बार्तों क समन्वय न होकर, केवल यूरोपीय ज्ञार्न की प्रार्प्ति क थार्।’’
  4. ए.एन.बसु के अनुसार्र- ‘‘इस घोषणार्-पत्र को भार्रतीय शिक्षार् की आधार्रशिलार् कहार् जार्तार् है। यह मार्नार् जार्तार् है। कि आधुनिक भार्रतीय शिक्षार् क शिलार्न्यार्स इसी ने कियार्।’’
  5. नुरूल्लार्ह एवं नार्यक के अनुसार्र – ‘‘वुड के घोषणार्-पत्र को ‘भार्रतीय शिक्षार् क महार्धिकार-पत्र‘ (मैग्नार्कार्टार्) कहनार् तर्कसंगत नहीं है।’’
  6. फिलिप हार्रटॉग के अनुसार्र – ‘‘वुड के घोषणार्-पत्र द्वार्रार् भार्रतीयों के कल्यार्ण के लिए एक बुद्धिमतार् क विकास करने वार्ली नवीन नीति क निर्धार्रण सम्भव हो सक थार्।’’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *