विकास की अवधार्रणार्
परिवर्तन प्रकृति क नियम है। परिवर्तन सकारार्त्मक व नकारार्त्मक दोनों ही हो सकते हैं। किसी भी समार्ज, देश, व विश्व में कोर्इ भी सकारार्त्मक परिवर्तन जो प्रकृति और मार्नव दोनों को बेहतरी की ओर ले जार्तार् है वही वार्स्तव में विकास है। अगर हम विश्व के इतिहार्स में नजर डार्लें तो पतार् चलतार् है कि विकास शब्द क बोलबार्लार् विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बार्द सुनाइ दियार् जार्ने लगार्। इसी समय से विकसित व विकासशील देशों के बीच के अन्तर भी उजार्गर हुए और शुरू हुर्इ विकास की अन्धार्धुन्ध दौड़। सार्मार्जिक वैज्ञार्निकों, अर्थशार्स्त्रियों, नीति नियोजकों द्वार्रार् विकास शब्द क प्रयोग कियार् जार्ने लगार्। मार्नव विकास, सतत् विकास, चिरन्तर विकास, सार्मुदार्यिक विकास, सार्मार्जिक विकास, आर्थिक विकास, रार्जनैतिक विकास जैसे अलग-अलग शब्दों क प्रयोग कर विकास की विभिन्न परिभार्षार्एं दी गर्इ। संयुक्त रार्ष्ट्र संघ ने विकास की जो परिभार्षार् प्रस्तुत की है, उसके अनुसार्र “विकास क तार्त्पर्य है सार्मार्जिक व्यवस्थार्, सार्मार्जिक संरचनार्, संस्थार्ओं , सेवार्ओं की बढ़ती क्षमतार् जो संसार्धनों क उपयोग इस प्रकार से कर सके तार्कि जीवन स्तर में अनुकूल परिवर्तन आये”। संयुक्त रार्ष्ट्र संघ के अनुसार्र विकास की प्रक्रियार् जटिल होती है क्यों कि विकास आर्थिक, सार्मार्जिक, रार्जनैतिक और प्रशार्सनिक तत्वों के समन्वय क परिणार्म होतार् है।

आदिमार्नव युग से लेकर वर्तमार्न युग तक विकास की प्रक्रियार् विभिन्न स्वरूपों में निरन्तर चली आ रही है। देश, काल, परिस्थिति व संसार्धनों के अनुरूप इसके अलग-अलग आयार्म हो सकते हैं। विकास के इस दौर में, पिछले कुछ दशकों से सार्मार्जिक तथार् आर्थिक विकास पर बल दियार् जार्ने लगार् है। विकास को लेकर रार्ष्ट्रीय व अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों द्वार्रार् कर्इ विकासीय योजनार्ओं व कार्यक्रमों क शुभार्रम्भ कियार् गयार्। अैार्ज भी सरकार इस पर करोड़ों रूपये खर्च कर रही है। यद्यपि आज विकास के नार्म पर सतत् विकास क ढिंढोरार् पीटार् जार् रहार् है, लेकिन विश्व स्तर पर अगर हम देखें तो विकास की वर्तमार्न दौड़ में आर्थिक विकास ही अपनार् वर्चस्व बनार्ये हुए है। विश्व स्तर पर तेजी से बदलते परिदृश्य व स्थार्नीय स्तर पर उसके पड़ने वार्ले प्रभार्व को देख कर यह स्पष्ट हो गयार् है कि विकास आज एक अन्तर्रार्ष्ट्रीय प्रश्न बन गयार् है। वैश्वीकरण के इस युग में विकास की नर्इ परिभार्षार्एं तय की जार् रही है आज गरीब और गरीब व अमीर और अमीर बनतार् जार् रहार् है। विकास कुछ ही लोगों की जार्गीर बनतार् जार् रहार् है।

विकास क अर्थ 

विकास शब्द की उत्पत्ति ही गरीब, उपेक्षित व पिछड़े सन्दर्भ में हुर्इ। अत: विकास को इन्हीं की दृष्टि से देखनार् जरुरी है। विकास को सार्धार्रणतयार् ढार्ँचार्गत विकास को ही विकास के रूप में ही देखार् जार्तार् है, जबकि यह विकास क एक पहलू मार्त्र है। विकास को समग्रतार् में देखनार् जरूरी है, जिसमें मार्नव संसार्धन, प्रार्कृतिक संसार्धन, सार्मार्जिक, आर्थिक रार्जनैतिक, सार्ंस्कृतिक, व नैतिक व ढार्ँचार्गत विकास शार्मिल हो। विकास के इन विभिन्न आयार्मों में गरीब, उपेक्षित व पिछडे वर्ग व संसार्धन हीन की आवश्यकतार्ओं एवं समस्यार्ओं के समार्धार्न प्रमुख रूप से परिलक्षित हों। वार्स्तव में विकास एक निरन्तर चलने वार्ली प्रक्रियार् है जो सकारार्त्मक बदलार्व की ओर इषार्रार् करती है। एक ऐसार् बदलार्व जो मार्नव, समार्ज, देश व प्रकृति को बेहतरी की ओर ले जार्तार् है। विभिन्न बुद्धिजीवियों द्वार्रार् विकास को विभिन्न रूपों में परिभार्षित कियार् है । क्लाक जे0 के शब्दों में ‘‘विकास बदलार्व की एक ऐसी प्रक्रियार् है जो लोगों को इस योग्य बनार्ती है कि वे अपने भार्ग्य विधार्तार् स्वयं बन सके तथार् अपने अन्र्तनिहित समस्त सम्भार्वनार्ओं को पहचार्न सकें।’’  रॉय एंड रार्बिन्सन के अनुसार्र ‘‘किसी भी देश के लोगों के भौतिक, सार्मार्जिक व रार्जनैतिक स्तर पर सकारार्त्मक बदलार्व ही विकास है।’’

विश्व स्तर पर विकास की प्रक्रियार् क संक्षिप्त विवरण 

यद्यपि आदि काल से विकास की प्रक्रियार् निरन्तर चली आ रही है जिसके हर काल में अलग अलग स्वरूप रहे हैं। यदि हम 19वीं सदी में विश्व स्तर पर विकास की प्रक्रियार् को देखें तो हमें यूरोप से इसे देखनार् होगार्। यूरोपीय देशों में औद्योगिक क्रार्न्ति की शुरुआत के सार्थ ही कच्चे मार्ल व मजदूरों की मार्ंग बढ़ने लगी। जिसके सार्थ ही प्रार्रम्भ हुआ उपनिवेशवार्द क दौर। इस दौरार्न विश्व स्तर पर विकास क अर्थ विकसित देशों द्वार्रार् अविकसित देशों में अपने उपनिवेश स्थार्पित करनार् मार्नार् गयार्। यह युग “कोलोनियल इरार्” अर्थार्त उपनिवेशवार्द क युग के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस युग में विकास क मतलब विकसित देशों द्वार्रार् उन देशों क विकास करनार् मार्नार् गयार् जिन देशों में उन्होंने अपने उपनिवेश स्थार्पित किये थे। और यह विकास उन देशों के मार्नव संसार्धन, भौतिक संसार्धन व प्रार्कृतिक संसार्धनों के शोशण की कीमत पर कियार् जार्तार् रहार्। यद्यपि इस विकास को औपनिवेशवार्द को बढ़ार्वार् देने वार्ले देशों ने यह तर्क देकर न्यार्योचित ठहरार्यार् कि इन कार्यों से अविकसित देशों की सुरक्षार्, प्रगति व विकास होगार्। लेकिन उपनिवेशवार्द की इस पूरी प्रक्रियार् में शार्सित की सदियों से चली आ रही स्थार्नीय विकास की पार्रम्परिक व्यवस्थार्ओं को गहरार् धक्क लगार्। उपनिवेशवार्दी देशों के लिए विकास क मतलब थार् “अपने अनुसार्र कार्य करनार्”।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चार्त् विकास को औद्योगिकरण व आर्थिक विकास के रूप में देखार् गयार्। जिसके अन्तर्गत सकल रार्ष्ट्रीय उत्पार्द को प्रगति क सूचक मार्नार् गयार्। विकसित देशों द्वार्रार् अविकसित देशों हेतु आर्थिक एवं तकनीकी सहार्यतार् प्रदार्न करने क दौर शुरु हुआ।विश्व बैंक व अन्र्तरार्श्ट्रीय मुद्रार् कोश (इन्टरनैशनल मोनेट्री फंड,) (IMF) जैसे संस्थार्नों की स्थार्पनार् की गर्इ। इनक कार्य युद्ध के पश्चार्त् चरमराइ आर्थिक व्यवस्थार् को ठीक करनार् थार्। इस आर्थिक “वृद्धि” विचार्रधार्रार् ने केवल आर्थिक विकास को बल दियार्। यह बार्त बल पकड़ने लगी कि ढार्ंचार्गत व वृहद आर्थिक विकास ही सार्मार्जिक व मार्नव विकास को लार्येगार्। रार्ष्ट्रीय स्तर से कार्ययोजनार्ओं क निर्धार्रण व क्रियार्न्वयन कियार् जार्ने लगार्। इस प्रक्रियार् ने विकास को लोगों के ऊपर थोपार् गयार्। इसके नियोजन में लोगों की कहीं भार्गीदार्री नहीं थी। विकास के प्रति यही “टॉप डार्ऊन एप्रोच” अर्थार्त “ऊपर से नीचे की ओर” विकास क प्रक्रियार् थी।

लेकिन इस आर्थिक वृद्धि विचार्रधार्रार् ने यह सोचने को मजबूर कर दियार् कि आर्थिक वृद्धि के लार्भ आम गरीब जनतार् तक नहीं पहंचु पार् रहे हैं। सत्तर के दशक से विकास में लोगों की सहभार्गितार् क विचार्र भी बल पकड़ने लगार्। संयुक्त रार्ष्ट्र संघ ने भी सार्मार्जिक व आर्थिक विकास को एक सार्थ लिए जार्ने पर संस्तुति की। विकास के नियोजन, क्रियार्न्वयन व निगरार्नी में जनसमुदार्य की सक्रिय भार्गीदार्री लेने के प्रश्न चार्रों ओर से उठने लगे। नार्गर समार्ज संगठनों द्वार्रार् रार्श्ट्रीय व अन्र्तरार्श्ट्रीय स्तर पर भी सहभार्गी विकास की पैरवी की गर्इ। 1980 के दशक में “स्ट्रकचरल एडजस्टमेंट पॉलिसी^^(Structural Adjustment Polcy) व विश्व बैंक व अन्र्तरार्श्ट्रीय मुद्रार् कोश की शर्तों ने निर्यार्त आधार्रित औद्योगीकरण, आर्थिक छूट, निजीकरण एवं अन्तर्रार्ष्ट्रीय व्यार्पार्र के नियमों में ढील आदि को बढ़ार्वार् दियार्। इस प्रक्रियार् में विकास हेतू संसार्धनों में कटौती होने लगी जिससे गरीब वर्ग और अधिक हार्सिये पर जार्तार् गयार्। फलस्वरूप सरकार अपनी जिम्मेदार्रियों से पीछे हटने लगी और “बार्जार्र” हर क्षेत्र में हार्वी होने लगार्। इस युग में पर्यार्वरणीय आन्दोलनों के परिणार्म स्वरूप सहभार्गी सतत् विकास की अवधार्रणार् बल पकड़ने लगी। 1990 से मार्नव विकास पर अधिक बल दियार् जार्ने लगार्। विकास को लेकर संयुक्त रार्श्ट्र संघ ने विकास के मुद्दे पर अनेक अन्र्तरार्श्ट्रीय कार्यषार्लार्ओं व गोश्ठियों क आयोजन कियार्। इन गोश्ठियों के परिणार्म स्वरूप मार्नव केन्द्रित सहभार्गी विकास की अवधार्रणार् को बहुत बल मिलार्।

विकास पर समझ एवं स्पष्टतार् 

यदि विकास के मूलतत्व को गहराइ से समझने क प्रयार्स कियार् जार्ये तो विकास क अर्थ सिर्फ आर्थिक सशक्ततार् नहीं हैं। मार्त्र भौतिक सुविधार्यें जुटार्ने से हम विकसित नहीं हो जार्ते। यदि पूर्व के ग्रार्मीण जीवन क अध्ययन कियार् जार्ये तो आज के और पूर्व के जीवन की बार्रीकी को समझने क अवसर मिलेगार्। आज भले ही ढार्ंचार्गत विकास ने अपनी एक जगह बनाइ हो किन्तु प्रार्चीन काल में सहभार्गितार् अर्थार्त मिलजुल कर कार्य करने की प्रवृति गहराइ से लोगों की भार्वनार्ओं एवं संवेदार्नार्ओं के सार्थ जुड़ी थी। चार्हे कृषि कार्य हो यार् फिर अपने प्रार्कृतिक संसार्धनों के उपयोग, प्रबन्धन, अथवार् संरक्षण क कार्य हो , गार्ंव के लोग सार्मूहिक रूप से इन कार्यों को सम्पन्न कियार् करते थे। इस तरह के सार्मूहिक कार्यों के सार्थ-सार्थ लोग सार्ंस्कृतिक कार्यक्रमों क भी आयोजन करते थे। यही नहीं, उनकी अपनी न्यार्य प्रक्रियार् भी थी जिस पर उनकी गहरी आस्थार् थी। सच पूछो तो उस समय लोगों की सीमित आवश्यकतार्यें थी, इसलिये एक दूसरे से विचार्र विमर्श हेतु उनके पार्स पर्यार्प्त समय भी थार्। इस तरह से कार्य करने से कार्य के प्रति उत्सार्ह बढ़तार् थार् और लोग एक दूसरे से खुलकर विचार्रों क आदार्न प्रदार्न करते थे। परिणार्मस्वरूप नियोजन स्तर पर सबकी भार्गीदार्री स्वत: ही सुलभ हो जार्ती थी और नियोजन में मजबूती थी। 7 लेकिन धीरे-धीरे लोगों में विकास की अवधार्रणार् बदलने लगी। लोगों की आवश्यकतार्यें भी बढ़ने लगी और धीरे-धीरे उनक झुकाव ढ़ार्ंचार्गत विकास की ओर होने लगार्। विकास क अर्थ लम्बी-लम्बी सड़कों क जार्ल, बड़े बार्ंध, पार्वर हार्उस, बड़ी-बड़ी आकाश चुम्भी भवनों क निर्मार्ण मार्नार् जार्ने लगार्। सम्पूर्ण विश्व में विकास के नार्म पर शुरू हुर्इ ढ़ार्ंचार्गत विकास की दौड़। इस दौड़ में मार्नव विकास कहीं खो गयार्। विकास क वार्स्तिविक अर्थ समझने के लिए हमें यह जार्ननार् जरूरी है कि हम विकास किसे कहेंगे? ढ़ार्ंचार्गत विकास ही सम्पूर्ण विकास नहीं है, अपितु यह विकास क केवल एक महत्वपूर्ण पहलू है। विकास मार्त्र लोगों को आर्थिक सशक्ततार् देने क नार्म भी नहीं है, मार्त्र गरीबी दूर करने यार्, मार्त्र आज की जरूरतों को पूरार् कर देने भर से ही सम्पूर्ण विकास नहीं हो सकतार् है। आर्थिक विकास भी विकास क एक आयार्म ही है। सतत् एवं संतुलित विकास के लिए यह जरूरी है कि विकास क केन्द्र बिन्दु मार्नव हो। मार्नव के अन्र्तनिहित गुणों व क्षमतार्ओं क विकास कर उनके अस्तित्व, क्षमतार्, कौशल व ज्ञार्न को मार्न्यतार् देनार्, उन्हें अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जार्गरूक करनार्, लोगों की सोचने की ंशक्ति को बढ़ार्नार्, उनके चार्रों तरफ के वार्तार्वरण क विश्लेषण करने की क्षमतार् जार्गृत करनार्, समार्ज में उनको उनकी पहचार्न दिलार्नार् व उन्हें सार्मार्जिक, आर्थिक व रार्जनैतिक सशक्ततार् के अवसर प्रदार्न करनार् ही वार्स्तविक विकास है। विकास की वही प्रक्रियार् मार्नव को बेहतरी की ओर ले जार् सकती है, जिसमें नियोजन और क्रियार्न्वयन स्तर पर लोग स्वयं अपनी प्रार्थमिकतार्यें चयनित करें, स्वयं निर्णय लेने में सक्षम बने और अपने विकास व सशक्ततार् की रार्ह भी तय करें। लेकिन इन समस्त प्रक्रियार्ओं के सार्थ-सार्थ मार्नव व प्रकृति के बीच उचित सार्मंजस्य व संतुलन बनार्नार् विकास की पहली शर्त है। वार्स्तविक विकास केवल वर्तमार्न आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करनार् ही नहीं है अपितु भविष्य की आवश्यकतार्ओं पर भी ध्यार्न देनार् है।

भार्रत में आजार्दी के बार्द विकास क बदलतार् स्वरूप 

वर्षों गुलार्मी की बेड़ियों में जकड़े रहने के बार्द वर्ष 1947 में जब हमार्रार् देश आजार्द हुआ तो नर्इ सरकार हमार्री बनी। लोगों ने वर्षों की गुलार्मी के बार्द स्वतंत्रतार् मिली। नर्इ सरकार से सबकी ढेर सार्री आशार्यें थी, बहुत सी अपेक्षार्यें थी। जब हमार्रार् देश आजार्द हुआ तो बेरोजगार्री, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षार्, कमजोर कृषि और जीर्ण-क्षीण उद्योग धन्धे, आदि कर्इ सार्री समस्यार्यें हमार्रे सार्मने मंहु बार्ये खड़ी थी। इन सार्री परिस्थितियों को देखते हुये सरकार ने देश से अशिक्षार्, गरीबी तथार् अज्ञार्नतार् को जड़ से मिटार्ने को अपनी प्रार्थमिकतार् बनार्यार्। इस उद्देश्य की पूर्ति तथार् लोगों को अधिक से अधिक सुविधार्यें प्रदार्न करने के लिये सरकार ने विकास की कर्इ योजनार्यें लार्गू की।

1950 से पंचवष्र्ार्ीय योजनार्ओं के निर्मार्ण की प्रक्रियार् शुरू हुर्इ। लगभग 50-60 के दशक तक सरकार की प्रार्थमिकतार् ढार्ंचार्गत विकास पर ही केन्द्रित रही, जैसे- सड़कों क निर्मार्ण, विद्यार्लय, अस्पतार्ल, प्रार्थमिक चिकित्सार् केन्द्र तथार् सार्मुदार्यिक केन्द्र आदि। सार्मुदार्यिक विकास योजनार्ओं क केन्द्र बनार् रहार्। लेकिन 70 क दशक आते-आते सरकार ने विकास की प्रक्रियार् को लक्ष्य समूहों पर केन्द्रित करनार् आरम्भ कियार्। लक्ष्य समूहों के अन्र्तगत मुख्यत: भूमिहीनों, छोटे किसार्नों तथार् आदिवार्सियों के लिये विकास योजनार्यें बनाइ गर्इं। 70-80 क दशक आते-आते विकास की रणनीति क केन्द्र बिन्दू भौगोलिक आधार्र बनार्। जलार्गम विकास की अवधार्रणार् भी सूखार् तथार् बार्ढ़ आदि रहे जिसके पीछे मूल भार्वनार् भी यही थी कि लोगों को सुविधार् सम्पन्न बनार्यार् जार्ये। इस पूरी प्रक्रियार् में जितनी भी विकास योजनार्यें बनी अथवार् लार्गू की गर्इ उनमें मूल उद्देश्य ढार्ंचार्गत विकास पर ही केन्द्रित रहार् जबकि मार्नव संसार्धन विकास पूरी तरह से प्रक्रियार् पटल से अदृश्य रहार्। यही कारण है कि इतनार् अधिक भौतिक एवं ढार्ंचार्गत विकास हो जार्ने के बार्वजूद लोगों के जीवन में अपेक्षित सुधार्र नहीं आ सके। हमार्रे देश में एक लम्बे समय तक विकास को लेकर यह सोचार् गयार् कि अगर देश में बड़ी-बड़ी योजनार्एं बनेंगी तो जो विकास होगार् उसक प्रतिफल गरीबों को पहुंच जार्येगार्। फलस्वरूप देष में खूब योजनार्एं बनीं उनके लार्भ भी मिले परन्तु वे गरीबों तक नहीं पहुंच सकीं। लोग सहभार्गी बनने के बजार्य धन लेने वार्ले बन गये। सरकार कल्यार्णकारी छवि वार्ली बनी परन्तु गरीब गरीब ही रह गये। गरीबों को बेचार्रार् मार्नकर उनके कल्यार्ण के बार्रे में एक विशेश वर्ग ही योजनार्एं बनार्तार् रहार्। इस सम्पूर्ण प्रक्रियार् में यह भूल गये कि गरीबों में सोचने एवं समझने की शक्ति छिपी हुर्इ है। परन्तु अवसर एवं अनुकूल परिस्थितियों के अभार्व में यह उभर कर नहीं आ पार्ती हैं। विकास के इस स्वरूप एवं रणनीति क विश्लेश्णार्त्मक अध्ययन करने के बार्द कुछ महत्वपूर्ण बार्तें उभर कर आर्इं। लोग पूरी तरह से सरकार पर आश्रित हो गये तथार् उनकी सरकारी कार्यक्रमों एवं सरकारी योजनार्ओं पर आश्रित रहने की मार्नसिकतार् बन गर्इ। उनमें कहीं पर यह बार्त घर कर गइंर् कि उनक विकास उनके द्वार्रार् नहीं अपितु कहीं ऊपर से आयेगार् और केवल सरकार ही है जो उनक विकास कर सकती है। विकास की इस प्रक्रियार् से निम्न बार्तें उभर कर आयी।

1. यद्यपि लोगों में पूर्व से ही परम्परार्गत ज्ञार्न क अथार्ह सार्गर मौजूद रहार् है। लेकिन विकास की इस प्रक्रियार् में लोगों की पुरार्तन संस्कृति, उनके परम्परार्गत ज्ञार्न को स्थार्न न मिलने से उनक इसके प्रति अपेक्षित जुड़ार्व न बन सक जिसक सीधार् असर विकास योजनार्ओं की साथकतार् पर पड़ार्। लोग पहले भी संगठित होकर कार्य करते थे तथार् उनमें सहभार्गितार् की भार्वनार् गहराइ से जुड़ी थी । लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने सहयोग की अपनी यह क्षमतार् खो दी। ग्रार्मीण संगठनों, जिनकी कि समार्ज में स्वीकार्यतार् भी थी, को विकास की प्रक्रियार् से बार्हर रखार् गयार्।

2. जितनी भी विकास योजनार्यें बनीं, वे सब ऊपरी स्तर से बन कर आर्इं और लोगों की भार्गीदार्री के बिनार् ही उन पर थोपी गर्इं। पहले लोग आपस में मिल बैठकर गार्ंव के विकास की बार्त पर चर्चार् करते थे तो नियोजन भी मजबूत थार्। लेकिन बार्द में लोगों को नियोजन से बिल्कुल बार्हर रखार् गयार्। परिणार्मस्वरूप लोगों में विकास के उस ढार्ंचार्गत स्वरूप के प्रति अपनत्व एवं स्वार्मित्व की बार्त तो आ ही नहीं सकी, फिर संरक्षण भी कैसे संभव हो सकतार् थार्।

3. पूरी प्रक्रियार् क विश्लेषण करने के पश्चार्त इस बार्त की प्रबल रूप से आवश्यकतार् महसूस की जार्ने लगी कि विकास को लोगों के र्इर्द गिर्द घूमनार् चार्हिये न कि लोगों को विकास के र्इर्द गिर्द। लोक केन्द्रित विकास की अवधार्रणार् धीरे-धीरे मजबूती पकड़ने लगी। यह महसूस कियार् जार्ने लगार् कि विकास की इस पुरार्नी अवधार्रणार् को किसी तरह से बदलनार् होगार्।

ढ़ॉंचार् गत विकास के परिणार्म योजनार्यें बनीं, पूरी भी हुर्इं लेकिन लोगों क विकास नहीं हो पार्यार्। लोगों की सहभार्गितार् के बिनार् ढार्ंचार्गत विकास की चिरन्तरतार् पर प्रश्नचिन्ह लगार् तथार् योजनार् समार्प्त होंने पर लोगों की स्थिति यथार्वत बनी रही। लोगों की संसार्धन प्रबन्धन की परम्परार्गत व्यवस्थार् धीरे-धीरे क्षीण हो गर्इ। विकेन्द्रीकरण के स्थार्न पर केन्द्रीकरण ने जड़ पकड़ी तथार् लोगों की सरकारी तंत्र पर निर्भरतार् बढ़ी। दूसरे पर निर्भर रहने की प्रवृति ने लोगों में आत्मविश्वार्स को समार्प्त कियार्। 

विकास की नर्इ दिशार् 

धीरे-धीरे नब्बे क दशक आते-आते लोगों की अपेक्षार्ओं तथार् समय की मार्ंग को देखते हुये विकास की अवधार्रणार् ने एक नर्इ दिशार् ली। अब यह स्वत: ही महसूस कियार् जार्ने लगार् कि-भौतिक तथार् ढ़ार्ंचार्गत विकास दोनों ही विकास के पहलू मार्त्र हैं। वार्स्तविक विकास तो समुदार्य की मार्नसिकतार्, सोच क विकास तथार् लोक संगठनों क विकास है। गरीब व पिछड़े शोषित लोग असंगठित रहकर कभी परिवर्तन नहीं कर सके हैं। इस बार्त पर भी विचार्र कियार् जार्ने लगार् कि लोग कोर्इ समस्यार् नहीं अपितु संसार्धन हैं। अत: मार्नव संसार्धन विकास को विकास की प्रार्थमिकतार् बनार्यार् जार्नार् चार्हिये। संयुक्त रार्ष्ट्र विकास कार्यक्रम ने 1990 में प्रथम मार्नव विकास प्रतिवेदन क प्रकाषन कियार्। इस प्रतिवेदन में मार्नव विकास को विशेष महत्व दियार् गयार्। जिसके अनुसार्र विकास क लोगों के विकास के विकल्पों को बढ़ार्नार् है। मार्नव विकास क अर्थ है कि विकास के केन्द्र में लोग रहें विकास लोगों के इर्द-गिर्द चुनार् जार्ये न कि लोग विकास के इर्द-गिर्द।

यह बार्त प्रबल रूप से महसूस की जार्ने लगी कि लोगों के परम्परार्गत ज्ञार्न, उनकी लोक संस्कृति एवं उनके अनुभवों को भी विकास की नियोजन प्रक्रियार् में शार्मिल कियार् जार्ये तभी समार्ज चिरन्तर विकास की ओर बढ़ सकतार् है। विकास योजनार्यें लोगों की सहभार्गितार् से ही लोगों के जीवन में वार्स्तविक परिवर्तन लार् सकती हैं। समार्ज में परिवर्तन लार्ने के लिये नियोजन तथार् निर्णय स्तर पर लोगों की सहभार्गितार् नितार्न्त आवश्यक है। सार्थ ही यह भी आवश्यकतार् महसूस ही गर्इ कि स्थार्नीय स्वषार्सन को मजबूती प्रदार्न करने के लिए पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं को सशक्त बनार्नार् आवश्यक है। स्थार्नीय स्वषार्सन की मजबूती ही नियोजन एवं निणर्य स्तर पर लोगों की सहभार्गितार् की अवधार्रणार् को मूर्तरूप दे सकती है। जब तक पंचार्यतें एवं ग्रार्मसभार् सक्रिय नहीं होंगी तब तक वार्स्तविक विकास की हम कल्पनार् नहीं कर सकते हैं। यहीं से भार्रत में पंचार्यती रार्ज के मार्ध्यम से जन विकास की कल्पनार् को सार्कार करने के लिए गार्ंव स्तर तक विकेन्द्रीकरण की व्यवस्थार् को लार्ने के लिए प्रयार्स शुरू हुए और भार्रत में 73वें संविधार्न संषोधन के द्वार्रार् पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् लार्गू की गर्इ ।

भार्रत में लार्गू की गर्इ विकास योजनार्ओं क कैलेन्डर 

1. प्रथम चरण में मुख्य ग्रार्मीण विकास कार्यक्रम ; (1947-1966) 

  1. सार्मुदार्यिक विकास कार्यक्रम (1952) 
  2. पंचार्यती रार्ज व्यवस्थार् (1958) 
  3. व्यवहार्रिक पोषार्हार्र कार्यक्रम (1958) 
  4. सघन कृषि जिलार् व्यवस्थार् (1960)
  5. पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम (1962) 
  6. जनजार्ति क्षेत्र विकास कार्यक्रम (1964) 
  7. हरित क्रार्ंति (1965)
  8. सघन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (1965) 

2. द्वितीय चरण में मुख्य ग्रार्मीण विकास कार्यक्रम ; (1966-1978) 

  1. लघु कृषक विकास अभिकरण (1969) 
  2. लघु कृषक व कृषि श्रमिक अभिकरण (1969)
  3. ग्रार्मीण निर्मार्ण कार्यक्रम (1971) 
  4. सघन (इनटैन्सिव) ग्रार्मीण रोजगार्र प्रोजेक्ट (1972)
  5. ग्रार्मीण रोजगार्र के लिए कैश कार्यक्रम (1972) 
  6. रोजगार्र गार्रण्टी कार्यक्रम (1972) 
  7. सूखार्ग्रस्त क्षेत्र कार्यक्रम (1973)
  8. न्यूनतम आवश्यकतार् कार्यक्रम (1974) 
  9. बीस सूत्रीय कार्यक्रम (1975) 
  10. अन्त्योदय कार्यक्रम (1977) 
  11. कमार्ंड एरियार् विकास कार्यक्रम (1977)
  12.  काम के बदले अनार्ज कार्यक्रम (1977) 
  13. मरूभूमि विकास कार्यक्रम (1977) 
  14. जिलार् उद्योग केन्द्र (1978) 

3. तृतीय चरण में मुख्य ग्रार्मीण विकास कार्यक्रम ; (1978-1990) 

  1. एकीकृत ग्रार्म विकास कार्यक्रम (1978) 
  2. ट्रार्इसेम (1979) 
  3. रार्ष्ट्रीय ग्रार्मीण रोजगार्र कार्यक्रम (1980)
  4. विशेष पशुधन समवर्धन कार्यक्रम (1982) 
  5. हिलार् एवं बार्ल विकास कार्यक्रम (1982) 
  6. आर.एल.र्इ.जी.पी. (1983)
  7. इन्दिरार् आवार्स योजनार् 1985) 
  8. दस लार्ख कुओं की योजनार् (1989)
  9. जवार्हर रोजगार्र कार्यक्रम (1989) 
  10. उन्नत औजार्र (किट) की आपूर्ति (1992) 
  11. 1992 में 73वार्ं संविधार्न संषोधन अधिनियम
  12. ग्रार्मीण आवार्स योजनार् (1993) 
  13. महिलार् समृद्धि योजनार् (1993) 
  14. रार्श्ट्रीय महिलार् कोश की स्थार्पनार् (1993) 
  15. सुनिश्चित रोजगार्र योजनार् (1993) 
  16. प्रधार्नमंत्री रोजगार्र योजनार् (1993)
  17. रार्ष्ट्रीय पोशार्हार्र कार्यक्रम (1995) 
  18. स्वर्ण जयन्ती ग्रार्म स्वरोजगार्र योजनार् (1999) 

4. चतुर्थ चरण में मुख्य ग्रार्मीण विकास कार्यक्रम- 

  1. प्रधार्नमंत्री सड़क योजनार् 2000 
  2. स्वयं सिद्धार् योजनार् 2001 
  3. हरियार्ली योजनार् 2003
  4. इन्दिरार् महिलार् समेकित विकास योजनार् 2005 
  5. रार्श्ट्रीय ग्रार्मीण रोजगार्र गार्रण्टी स्कीम 2006 

1990 से वर्तमार्न तक की विकास की प्रक्रियार् में आठवी, नौवी, दसवी, ग्यार्रहवीं पंचवष्र्ार्ीय योजनार्ओं की महत्वपूर्ण भूमिक रही है। आठवी पंचवष्र्ार्ीय योजनार् के दौरार्न सरकार स्तर पर इस सत्य को स्वीकार कियार् जार्ने लगार् कि अब तक चली विकास प्रक्रियार् के वार्ंछित पंरिणार्म नहीं आये हैं और लोगों की निर्भरतार् सरकार पर अधिक बढ़ गर्इ है। अत: नौवीं, दसवीं योजनार्ओं में सहभार्गी विकास को केन्द्र में रखार् गयार्। नब्बे के दषक में जो भी बड़ी-बड़ी विकास परियोजनार्एं चलीं उनमें जनसहभार्गितार् पर बहुत जोर दियार् गयार्। इसी के सार्थ शुरू हुआ गार्ंव स्तर पर सार्मुदार्यिक संगठनों व उपभोगतार् समूहों क उदय। इसी दौरार्न पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं की मजबूती हेतू भी सरकार स्तर पर प्रयत्न शुरू हुए। आम जन समुदार्य को स्थार्नीय विकास की प्रक्रियार् व निर्णय स्तर से जोड़ने क इसे एक मजबूत मार्ध्यम मार्नार् जार्ने लगार्। अब अधिकांश लोग इस बार्त से सहमत होने लगे हैं कि अलग-अलग पार्रिस्थितिकीय तन्त्र (इकोसिस्टम) के लोगों को अपनी संस्कृति के अनुसार्र अलग तरह से जीने क हक है तथार् उन्हें अपने ज्ञार्न एवं अनुभवों के आधार्र पर अपने विकास की रूपरेखार् तैयार्र करने क अधिकार है।

स्थाइ/चिरन्तर विकास 

ब्रन्टलैंड प्रतिवेदन, के अनुसार्र “सतत् विकास वह विकास है जो वर्तमार्न की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति आगे की पीढ़ियों की आवश्यकतार्ओं की बलि दिये बिनार् पूरी करतार् हो।” विकास के विभिन्नि अर्थ व परिभार्शार्ओं क यही सार्र निकलतार् है कि वार्स्तव में विकास एक ऐसी प्रक्रियार् है जो निरन्तर चलती रहती है। यह प्रक्रियार् तभी साथक होती है जब इसमें मार्नव विकास, आर्थिक वृद्धि एवं पर्यार्वरण सुरक्षार् के बीच एक उचित संतुलन हो। चिरन्तर विकास क अर्थ एक ऐसे विकास से है जो वर्तमार्न की आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के सार्थ-सार्थ भविष्य की आवश्यकतार्ओं क भी ध्यार्न रखे। विकास ऐसार् हो जो केवल ढार्ंचार् खड़ार् करने में ही विश्वार्स न रखतार् हो बल्कि अन्य पहलूओं जैसे मार्नव संसार्धन के विकास, पर्यार्वरण सन्तुलन, संसार्धनों क उचित रख-रखार्व व संरक्षण, लार्भों के समार्न वितरण हेतु उचित व्यवस्थार् आदि को भी ध्यार्न में रखतार् हो। जो किसी विभार्ग/संस्थार् यार् व्यक्ति पर निर्भर न रह कर स्वार्वलम्बी हो तथार् स्थार्नीय निवार्सियों द्वार्रार् संचार्लित हो। सतत् विकास में जनसहभार्गितार् की बड़ी अहम् भूमिक है।

चिरन्तर विकास के सिद्धार्न्त

 चिरन्तर विकास को गहराइ से समझने के लिए उसके सिद्धार्न्तों को जार्ननार् आवश्यक है। चिरन्तर विकास के मुख्य सिद्धार्न्त है।

1. स्थार्नीय समुदार्य क सशक्तिकरण

 चिरन्तर विकास प्रक्रियार् क पहलार् सिद्धार्न्त है जन समुदार्य क सषक्तिकरण। विकास के सार्थ पैदार् होने वार्ले सबसे बड़े अवरोधों में स्थार्नीय समुदार्य की संस्कृति, पार्रम्परिक अधिकारों, संसार्धनों तक पहुंच एवं आत्म-सम्मार्न आदि की अवहेलनार् मख्ु य है। इससे स्थार्नीय समदु ार्य क विकास कायर्क्र मों के प्रति जुड़ार्व के स्थार्न पर अलगार्व तथार् रोष पैदार् होतार् है। अत: विकास को चिरन्तर यार् सत्त बनार्ने के लिए स्थार्नीय निवार्सियों के अधिकारों को पहचार्ननार् तथार् उनके मुद्दों को समर्थन प्रदार्न करनार् आवश्यक है। सार्थ ही चिरन्तर विकास की प्रक्रियार् समुदार्य को जोड़ती है व उनके सषक्तिकरण को बढ़ार्वार् देती है।

2. स्थार्नीय ज्ञार्न एवं अनुभवों को महत्व 

स्थार्नीय समुदार्य पार्रम्परिक ज्ञार्न, अनुभव व कौषल क धनी है। विकास के नार्म पर नये विचार्र एवं ज्ञार्न थोपने के स्थार्न पर चिरन्तर विकास स्थार्नीय निवार्सियों के ज्ञार्न एवं अनुभवों को महत्व देतार् है तथार् उपलब्ध ज्ञार्न एवं अनुभवों को आधार्र मार्नकर विकास कायर्क्रम तैयार्र किये जार्ते है।

3. स्थार्नीय समुदार्य की आवश्यकतार्ओं एवं प्रार्थमिकतार्ओं की पहचार्न 

चिरन्तर विकास क अगलार् सिद्धार्न्त है विकास प्रक्रियार् क समुदार्य की आवश्यकतार्ओं व प्रार्थमिकतार्ओं पर आधार्रित होनार्। जमीनी वार्स्तविकतार्ओं को नजर अन्दार्ज कर ऊपर से थोपार् गयार् विकास कभी भी समार्ज में सकारार्त्मक बदलार्व नहीं लार् सकतार्। अत: आवश्यकतार्ओं एवं प्रार्थमिकतार्ओं की पहचार्न स्थार्नीय निवार्सियों के सार्थ मिल-बैठ कर उनके दृष्टिकोण एवं नजरिये को समझ कर करने से ही चिरन्तर विकास की ओर बढ़ार् जार् सकतार् है।

4. स्थार्नीय निवार्सियों की सहभार्गितार् 

कार्यक्रम नियोजन से लेकर क्रियार्न्वयन तथार् प्रबन्धन में ग्रार्मवार्सियों की सहभार्गितार् को चिरन्तर विकास की प्रक्रियार् में आवश्यक मार्नार् गयार् है। सहभार्गितार् क अर्थ भी स्पष्ट होनार् चार्हिए तथार् स्थार्नीय समुदार्य द्वार्रार् विभिन्न स्तरों पर लिये गये निर्णयों को स्वीकारनार् ही उनकी सच्ची सहभार्गितार् प्रार्प्त करनार् है।

5. लैंगिक समार्नतार् 

पिछले अनुभवों से यह स्पष्ट है कि विकास की जिन गतिविधियों को महिलार् एवं पुरूषों दोनों की आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रख कर तैयार्र नहीं कियार् जार्तार् है तथार् जिनमें महिलार्ओं की बरार्बर भार्गीदार्री नहीं होती, वह न केवल अनुचित होती है बल्कि उनके सफल एवं चिरन्तर होने में संदेह रहतार् है। चिरन्तर बनार्ने के लिए विकास को महिलार्ओं तथार् पुरूषों की भूमिकाओं, प्रार्थमिकतार्ओं तथार् आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रख कर तैयार्र कियार् जार्नार् पहली श्शर्त है।

6. कमजोर वर्गों को पूर्ण अधिकार 

चिरन्तर विकास क सिद्धार्न्त है समार्ज के सभी वर्गो को विकास के नियोजन में शार्मिल करनार् व विकास क लार्भ पहुँचार्नार्। सदियों से विकास प्रक्रियार् से अछूते व उपेक्षित रहे समार्ज के कमजोर वर्गो जैसे भूमिहीन, अनुसूचित जार्ति एवं जनजार्ति व महिलार्ओं को आधुनिक विकास प्रक्रियार् में शार्मिल करने पर चिरन्तर विकास बल देतार् है। अत: चिरन्तरतार् के लिए समार्ज के कमजोर एवं उपेक्षित वर्ग के अधिकारों क समर्थन कियार् जार्नार् आवश्यक है तथार् उन्हें विकास की मुख्य धार्रार् से जोड़ार् जार्नार् आवश्यक है।

7. जैविक विविधतार् तथार् प्रार्कृतिक संसार्धनों क संरक्षण 

आर्थिक वृद्धि, पर्यार्वरण संरक्षण व सार्मार्जिक जुड़ार्व चिरन्तर विकास के मजबूत सतम्भ हैं। विकास की जिस प्रक्रियार् में इन तीनों को सार्थ लेकर नियोजन कियार् जार्तार् है वही चिरन्तर विकास कहलार्तार् है। पर्यार्वरण को खतरे में डार्लकर व सार्मार्जिक मूल्यों की परवार्ह किये बिनार् अगर आर्थिक विकास की प्रक्रियार् को बल दियार् जार्तार् है तो वह चिरन्तर विकास नहीं है। पिछले कुछ वर्षो में हुए विकास कार्यों के कारण जैविक विविधतार् में गिरार्वट आर्इ है तथार् प्रार्कृतिक संसार्धनों क ºार्स हुआ है। सार्मूहिक हित की जगह व्यक्तिगत हित ने ले ली है। पार्रिस्थितिकीय तन्त्र के विभिन्न घटकों क सन्तुलन खरार्ब हो जार्ने से बहुत सी पर्यार्वरणीय समस्यार्एं पैदार् होने लगी हैं। अत: विकास को चिरन्तर बनार्ने के लिए आर्थिक विकास के सार्थ-सार्थ जैविक विविधतार् तथार् प्रार्कृतिक संसार्धनों क संरक्षण आवश्यक है।

8. स्थार्नीय तकनीकों, निवेश तथार् बार्जार्र को बढ़ार्वार् 

बार्हरी सहयोग पर आधार्रित विकास कार्यों की लम्बे समय तक चलने की कोर्इ गार्रन्टी नहीं होती है। सार्थ ही सार्थ बार्हरी तकनीक की समार्ज में स्वीकार्यतार् पर भी “ार्ंकाएं होती है। अत: विकास की चिरन्तरतार् हेतु स्थार्नीय तकनीकों को सुधार्र कर उनके उपयोग को बढ़ार्वार् देनार्, स्थार्नीय स्तर पर संसार्धनों को जुटार्नार् तथार् स्थार्नीय बार्जार्र व्यवस्थार् को मजबूत बनार्नार् आवश्यक है।

ग्रार्मीण विकास से जुड़े विभिन्न पक्ष 

ग्रार्मीण विकास प्रक्रियार् क बार्रीकी से अवलोकन करने पर उसमें तीन पक्ष (एक्टर्स) नजर आते हैं। ग्रार्मीण स्तर पर नियोजन प्रक्रियार् को मजबूत करने, सहभार्गी विकास को बढ़ार्वार् देने तथार् चिरन्तर विकास की अवधार्रणार् को मजबूत करने के लिए इन तीनों पक्षों को मजबूत करने के सार्थ-सार्थ इनके बीच के अन्र्तसम्बन्धों को भी मजबूत कियार् जार्नार् आवश्यक है। प्रत्येक पक्ष (एक्टर्स) को मजबूत करने क अर्थ उसके दृष्टिकोण (मार्नसिक सोच) ज्ञार्न एवं क्षमतार्ओं में सुधार्र करने से है। इस प्रक्रियार् से जुड़े तीन पक्षों में से सबसे 

  1. पहलार् पक्ष है ग्रार्मवार्सी, जो कि विकास प्रक्रियार् क मुख्य पक्ष व केन्द्र बिन्दु है। ग्रार्मवार्सी के अन्दर अपनी स्थार्नीय स्थिति , समस्यार् व प्रार्थमिकतार् को समझने की अपार्र क्षमतार् व ज्ञार्न होतार् है। अत: विकास की दिशार् को तय करने में उसक ज्ञार्न व अनुभव सबसे लार्भदार्यक होतार् है। 
  2. दूसरार् पक्ष जन प्रतिनिधि है। ये जन प्रतिनिधि प्रधार्न, सरपंच, विधार्यक, सार्ंसद, जिलार् प्रमुख, ब्लार्क प्रमुख आदि के रूप में है और इन की मुख्य भूमिक ग्रार्म वार्सियों के पक्ष को विकास नियोजन प्रक्रियार् व नीति निर्मार्ण मे शार्मिल करने की हैं। 
  3. तीसरार् पक्ष है विकास कार्यकर्तार्, यह सरकारी अथवार् गैर सरकारी दोनों हो सकते हैं। इनकी भूमिक विकास के एक सुगमकर्तार् की होती है। इन तीनों पक्षों में आपसी तार्लमेल व सार्मंस्य होनार् अति आवश्यक है। इनके आपसी सहयोग से ही विकास की गति में तेजी लाइ जार् सकती है।

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