वार्क्य विचार्र क्यार् है?
भार्षार् की सबसे छोटी इकाई है वर्ण। वर्णों के साथक समूह को शब्द कहते हैं तथार् शब्दों के साथक समूह को वार्क्य। अर्थार्त् वार्क्य शब्द-समूह क वह साथक विन्यार्स होतार् है, जिससे उसके अर्थ एवं भार्व की पूर्ण एवं सुस्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। अत: वार्क्य में आकांक्षार्, योग्यतार्, आसक्ति एवं क्रम क होनार् आवश्यक है।

वार्क्य के अंग 

सार्मार्न्य: वार्क्य के दो अंग मार्ने गये हैं –

  1. उद्देश्य और 
  2. विधेय

उद्देश्य 

जिसके सम्बन्ध में वार्क्य में कहार् जार्तार् है, उसे उद्देश्य कहते हैं। अत: कर्त्तार् ही वार्क्य में ‘उद्देश्य’ होतार् है, किन्तु यदि कर्त्तार् कारक के सार्थ उसक कोई विशेषण हो, जिसे कर्त्तार् क विस्तार्रक कहते हैं, उद्देश्य के ही अन्तर्गत आतार् है। यथार्: मेरार् भार्ई प्रशार्न्त धामिक पुस्तकें अधिक पढ़तार् है।’

इस वार्क्य में ‘मेरार् भार्ई प्रशार्न्त’ उद्देश्य है, जिसमें ‘प्रशार्न्त’ कर्त्तार् है तो ‘मेरार् भार्ई’ प्रशार्न्त कर्त्तार् क विशेषण अर्थार्त् इसे कर्त्तार् क विस्तार्रक कहेंगे।

विधेय 

उद्देश्य अर्थार्त् कर्त्तार् के सम्बन्ध में वार्क्य में जो कुछ कहार् जार्तार् है, उसे ‘विधेय’ कहते हैं। अत: विधेय के अन्तर्गत वार्क्य में प्रयुक्त क्रियार्, क्रियार् क विस्तार्रक, कर्म, कर्म क विस्तार्रक, पूरक तथार् पूरक क विस्तार्रक आदि आते हैं उक्त वार्क्य में ‘धामिक पुस्तकें अधिक पढ़तार् है’ वार्क्यार्ंश विधेय हैं जिसमें ‘पढ़तार् है’ शब्द क्रियार् है तो ‘अधिक’ शब्द क्रियार् क विस्तार्रक (जो शब्द क्रियार् की विशेषतार् बतलार्तार् है उसे क्रियार् क विस्तार्रक कहते हैं), ‘पुस्तकें’ शब्द कर्म है तो ‘धामिक’ शब्द पुस्तकों की विशेषतार् बतलार्ने के कारण पुस्तकें ‘कर्म क विस्तार्रक’ है। इनके अतिरिक्त यदि कोई शब्द प्रयुक्त होतार् है यार् जब वार्क्य में क्रियार् अपूर्ण होती है तो उसे ‘पूरक’ कहते हैं तथार् ‘पूरक’ की विशेषतार् बतलार्ने वार्ले शब्द को ‘पूरक क विस्तार्रक’ कहते हैं।

वार्क्य के भेद 

क्रियार्, अर्थ तथार् रचनार् के आधार्र पर वार्क्यों के भेद प्रभेद किये जार्ते हैं-

क्रियार् की दृृिष्टि से – 

  1. कर्तव्यवार्च्य प्रधार्न : जब वार्क्य में प्रयुक्त क्रियार् क सीधार् व प्रधार्न सम्बन्ध कर्त्तार् से होतार् है अर्थार्त् क्रियार् के लिंग, वचन कर्त्तार् कारक के अनुसार्र प्रयुक्त होते हैं उसे कर्तव्यवार्च्य प्रधार्न वार्क्य कहते हैं। जैसे :धर्मेन्द्र पुस्तक पढ़तार् है। पिंकी पुस्तक पढ़ती है।
  2. कर्मवार्च्य प्रधार्न : जब वार्क्य में प्रयुक्त क्रियार् क सीधार् सम्बन्ध वार्क्य में प्रयुक्त त कर्म से होतार् है अर्थार्त् क्रियार् के लिंग, वचन कर्त्तार् कारक के अनुसार्र न होकर कर्म के अनुसार्र प्रयुक्त होते हैं, उसे कर्मवार्च्य प्रधार्न वार्क्य कहते हैं। यथार् महेन्द्र ने गार्नार् गार्यार्। वर्षार् ने गार्नार् गार्यार्।
  3. भार्व वार्च्य प्रधार्न : जब वार्क्य में प्रयुक्त क्रियार् न तो कर्त्तार् के अनुसार्र प्रयुक्त होती है न ही कर्म के अनुसार्र बल्कि भार्व के अनुसार्र, तो उसे भार्ववार्च्य प्रधार्न वार्क्य कहते है यथार् :- हेमरार्ज से पढ़ार् नहीं जार्तार्। जयार् से पढ़ार् नहीं जार्तार्।

अर्थ के आधार्र पर –

  1. विधार्नाथक वार्क्य : जिस वार्क्य में किसी बार्त क होनार् पार्यार् जार्तार् है उसे विधार्नाथक वार्क्य कहते हैं। जैसे- भूपेन्द्र खेलतार् है।
  2. निषेधार्त्मक वार्क्य : जिस वार्क्य में किसी बार्त के न हार्ने े यार् किसी विषय के अभार्व क बोध हो उसे निषेधाथक वार्क्य कहते हैं। जैसे- नीतार् घर पर नहीं है।
  3. आज्ञाथक वार्क्य : जिस वार्क्य में किसी अन्य के द्वार्रार् आज्ञार्, उपदेश यार् आदेश देने क बोध हो, उसे आज्ञाथक वार्क्य कहते हैं यथार् वर्षार्, तुम गार्नार् गार्ओ।
  4. प्रश्नाथक वार्क्य : जिस वार्क्य में प्रश्नार्त्मक भार्व प्रकट हो अर्थार्त् किसी कार्य यार् विषय के सम्बन्ध में प्रश्न पूछने क बोध हो, उसे प्रश्नाथक वार्क्य कहते हैं। जैसे- कौन गार्नार् गार् रही हैं ?
  5. इच्छाथक वार्क्य : जिस वार्क्य में इच्छार् यार् आशीर्वार्द के भार्व क बोध हो, उसे इच्छाथक वार्क्य कहते हैं। यथार्- भगवार्न करे, तुम्हार्रार् भलार् हो।
  6. सदेहाथक वार्क्य : जिस वार्क्य में सम्भार्वनार् यार् सन्दहे क बोध हो उसे संदेहाथक वार्क्य कहते हैं जैसे – उन दोनों में जार्ने, कौन खेलेगार्।
  7. संकेताथक वार्क्य : जिस वार्क्य में सकं ते यार् शर्त क बोध हो, उसे संकेतार्थर्क वार्क्य कहते हैं। जैसे- यदि तुम पैसे दो तो मैं चलूँ। दूसरों क भलार् करोगे तो तुम्हार्रार् भी भलार् होगार्।
  8. विस्मय बोधक वार्क्य : जिस वार्क्य से विस्मय, आश्चर्य आदि क भार्व प्रकट हो, उसे विस्मयबोधक वार्क्य कहते हैं यथार्- वार्ह ! कैसार् नयनार्भिरार्म दृश्य है।

रचनार् के आधार्र पर – 

  1. सार्धार्रण वार्क्य : जिस वार्क्य में एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय हो, उसे सार्धार्रण वार्क्य कहते हैं। जैसे- नीतार् खार्नार् बनार् रही है।
  2. मिश्र यार् मिश्रित वार्क्य : जिस वार्क्य में एक प्रधार्न उपवार्क्य तथार् एक यार् एक से अधिक आश्रित उपवार्क्य हों, उसे मिश्र यार् मिश्रित वार्क्य कहते हैं। जैसे- गार्ँधी जी ने कहार् कि सदार् सत्य बोलो। इस वार्क्य में प्रधार्न उप वार्क्य तथार् आश्रित उपवार्क्य क निर्णय करने से पूर्व प्रधार्न उपवार्क्य एवं आश्रित उपवार्क्यों के विषय में जार्नकारी कर लेनी चार्हिए।
  3. प्रधार्न उपवार्क्य : जो उपवार्क्य प्रधार्न यार् मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय से बनार् हो उसे ‘प्रधार्न उपवार्क्य’ कहते हैं। उपर्युक्त वार्क्य में ‘गार्ँधी जी ने कहार्’ प्रधार्न उपवार्क्य है जिसमें ‘गार्ँधी जी मुख्य उद्देश्य है तो ‘कहार्’ मुख्य विधेय।
  4. आश्रित उपवार्क्य : जो उपवार्क्य प्रधार्न उपवार्क्य के आश्रित रहतार् है, उसे आश्रित उपवार्क्य कहते हैं। उपर्युक्त वार्क्य में ‘कि सदार् सत्य बोलो।’ आश्रित उपवार्क्य है।  आश्रित उपवार्क्य तीन प्रकार के होते हैं :
  5. संज्ञार् उपवार्क्य : जब किसी आश्रित उपवार्क्य क प्रयोग प्रधार्न उपवार्क्य की किसी संज्ञार् के स्थार्न पर होतार् है तो उसे संज्ञार् उपवार्क्य कहते हैं। ‘संज्ञार् उपवार्क्य’ क प्रार्रम्भ प्रार्य: ‘कि’ से होतार् है। उक्त वार्क्य में ‘कि सदार् सत्य बोलो’ ‘कि’ से प्रार्रम्भ होने के कारण संज्ञार् उपवार्क्य कहलार्येगार्।
  6. विशेषण उपवार्क्य : जब काइेर् आश्रित उपवार्क्य प्रधार्न उपवार्क्य के किसी संज्ञार् यार् सर्वनार्म शब्द की विशेषतार् बतलार्ये तो उस उपवार्क्य को ‘विशेषण उपवार्क्य’ कहते हैं। विशेषण उपवार्क्य क प्रार्रम्भ प्रार्य: जो, जिसका, जिसकी, जिसके आदि में से किसी शब्द से होतार् है। जैसे- जो विद्वार्न होते हैं, उनक सभी आदर करते हैं।
  7. क्रियार् विशेषण उपवार्क्य : जब कोi आश्रित उपवार्क्य प्रधार्न उपवार्क्य की क्रियार् की विशेषतार् बतलार्ये यार् सूचनार् दे, उस आश्रित उपवार्क्य को ‘क्रियार् विशेषण उपवार्क्य’ कहते हैं। क्रियार् विशेषण उपवार्क्य प्रार्य: यदि, जहार्ँ, जैसे, यद्यपि, क्योंकि, जब, तब आदि में से किसी शब्द से शुरू होतार् है यथार् – यदि रार्म परिश्रम करतार्, तो अवश्य उत्तीर्ण होतार्।
  8. संयुक्त वार्क्य : जिस वार्क्य में दो यार् दो से अधिक सार्धार्रण वार्क्य यार् प्रधार्न उपवार्क्य यार् समार्नार्धिकरण उपवार्क्य, किसी संयोजक शब्द (तथार्, एवं, यार्, अथवार्, और, परन्तु, लेकिन, किन्तु, बल्कि, अत: आदि) से जुड़े हों, उसे संयुक्त वार्क्य कहते हैं। यथार्- भरत आयार् किन्तु भूपेन्द्र चलार् गयार्।

(समार्नार्धिकरण उपवार्क्य – ऐसे उपवार्क्य जो प्रधार्न उपवार्क्य यार् आश्रित उपवार्क्य के समार्न अधिकार वार्लार् हो उसे समार्नार्धिकरण उपवार्क्य कहते हैं।)

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