वन संसार्धन क्यार् है?
जलवार्यु तथार् उच्चार्वचन की भिन्नतार्ओं के कारण भार्रत में प्रार्कृतिक वनस्पति की बहुत विविधतार् मिलती हैं। ‘‘ धरार्तल पर पार्ये जार्ने वार्ले पेड़, पौधे, घार्स, झार्ड़ियार् एवं लतार्ओं क समूह वन कहलार्तार् हैं।’’ सन् 1999 के आंकड़ों के अनुसार्र 6.37 करोड़ हैक्टेयर भूमि अर्थार्त 19.39 प्रतिषत भार्ग में फैलार् हुआ हैं। भौगोलिक आधार्र पर वनों क वर्गीकरण कर इन्हे निम्न भार्गों में बार्ंटार् गयार् हैं।

उष्णकटिबंधीय सदार्बहार्र वन- 

यह वन उन भार्गों में मिलतार् है। जहार्ं क तार्पमार्न 240 से.ग्रे के आस पार्स तथार् वाषिक वर्षार् 200 से.मी. से अधिक होती हैं।ये वृक्ष सदैव हरे भरे दिखाइ पड़ते हैं। इनकी लकड़ी काले रंग की तथार् कठोर दिखाइ देती हैं। मुख्य वृक्ष रबड़, महोगनी, एबोनी, तार्ड़, आबनूस, बार्ँस आदि हैं। ये वन पश्चिमी तटीय प्रदेश, पश्चिमी घार्ट, उत्तर पूर्वी पर्वतीय पद्रेश एवं अंडमार्न निकोबार्र द्वीप समहू में पार्ये जार्ते है।।

मार्नसुनी वन:- 

  1. आद्रमार्नसूनी वन :- ये वन उनभार्गों में मिलते हैं। जहार्ं क वाषिक तार्पमार्न 200 से अधिक तथार् वर्षार् 100 से 200 से.मी. तक होती हैं। ये वृक्ष एक विशेष मौसम में अपने पत्ते गिरार् देते हैं । ये कम सघन हैं। इन वनों में सार्गौन, सार्खू, कुसूम, पलार्स, सीसम, आंवलार्, नीम, चंदन प्रमुख वृक्ष हैं। ये वन छत्तीसगढ़, पूर्वी उत्तरप्रदेश बिहार्र बंगार्ल उड़ीसार्, आंध्रप्रदेश, महार्रार्ष्ट्र कर्नार्टक, केरल तथार् तमिलनार्डु के भार्गों में पार्ये जार्ते है।। चंदन की लकड़ी सुगंिन्धत होती है।, सार्गौन सबसे बहुमल्ू य फर्नीचर उद्योग के लिये मार्नी जार्ती हैं।
  2. शुष्क मार्नसूनी वन:- इन वनों के पत्ते ग्रीष्म ऋतु में गिरने आरम्भ हो जार्ते है।। जहार्ं क तार्पमार्न औसत 240 से.ग्रे. होतार् हैं। वर्षार् 50 से 100 सेमी. होती हैं। ये वन पंजार्ब, रार्जस्थार्न, गुजरार्त, मध्यप्रदेश आदि रार्ज्यों में पार्यें जार्ते हैं। इन भार्गों में अधिकतर खेजड़ार् खैर, बबूल, महुआ,कीकर, नार्गफनी, खजूर आदि मिलती हैं। 

मरूस्थलीय वन- 

यहार्ं अधिक तार्पमार्न रहतार् हैं तथार् वर्षार् भी मार्त्र 50 सेमी. से कम होती हैं। यहार्ं पार्ये जार्ने वार्ले वृक्षों में नार्गफनी, बेर, खजूर, केकटस प्रमुख हैं। थार्र के मरूस्थल व दक्षिण भार्रत में आंध्रप्रदेश व कर्नार्टक के वृष्टि छार्यार् वार्ले क्षेत्रो में मिलते हैं।

ज्वार्रीय वन- 

इन्हें डेल्टाइ यार् सुंदरीवन भी कहते हैं। क्योंकि ये डेल्टार् क्षेत्र में अधिकतार् से पाइ जार्ते है। तथार् यहार्ं सुंदरी नार्म के वृक्षों की प्रधार्नतार् होती है। ये सदार् हरे भरे रहते हैं। अन्य प्रकार के वृक्षों में मैनग्रोव के अलार्वार् केवड़ार्, नार्रियल, मोगरार्, व गोरडोल हैं। गंगार् एंव बम््र हपुत्र के डेल्टार् में पार्ये जार्ते है।।

पर्वतीय वन- 

ये दो भार्गों में बार्टे गये हैं:-

अ. पूर्वी हिमार्लय के वन –

  1. उष्ण कटिबंधीय वन 
  2. शीतोष्ण कटिबंधीय वन 
  3. शीत शीतोष्ण कटिबंधीय वन 
  4. 5000 मीटर से ऊपर के वन 

ब. पश्चिमी हिमार्लय के वन –

  1. अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय वन 
  2. शीतोष्ण कटिबंधीय वन 
  3. अधिक ऊँचाइ वार्ले वन । 

संसार्धनों के रूप में वनों से लार्भ- 

संपूर्ण भार्रत में वनों के अस्तित्व को बनार्यें रखने के लिये अनेक उपार्य किये जार् रहें हैं। जगह, जगह वृक्षार्रोपण पर्वतीय भार्गों में वनार्रोपण कार्यक्रम चलार्ये जार् रहें हैं। यदि भार्रतीय जनमार्नस अपने बच्चों के समार्न देख भार्ल करे तो अनेक लार्भ मिलेंगे। वनों से देश की अर्थव्यवस्थार् को प्रत्यक्ष एंव अप्रत्यक्ष रूप से लार्भ मिलतार् हैं।

प्रत्यक्ष लार्भ:- 

  1. रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि :-वर्तमार्न में देश की आय क लगभग 2 प्रतिशत यार् लगभग 4000 करोड़ रूपये मिलते हैं। 
  2. र्इंधन :- यह भार्रतीय इंर्धन खार्सकर ग्रार्मीण जनों क मुख्य इर्ंधन क कार्य करती है।। 
  3. व्यवसार्य क स्त्रोत :- वन लगभग 60 लार्ख व्यक्तियो को व्यवसार्य प्रदार्न करतार् हैं। 
  4. औद्योगिक कच्चार् मार्ल की पूर्ति :- ये लार्ख, बिड़ी, कागज, प्लाइवुड, रबर, रेशम एंव फर्नीचर उद्योगों के लिये कच्चार्मार्ल प्रदार्न करतार् हैं। वनो से मिलने वार्ली जड़ी बूटियो से अनेक प्रकार की दवार्इंयार् बनार्यी जार्ती हैं। 

अप्रत्यक्ष लार्भ:- 

  1. बार्ढ़ एंव मिट्टी के कटार्व से बचत करते हैं। 
  2. वर्षार् को आकर्षित करते हैं। 
  3. इनसे तार्पमार्न में नियंत्रण होतार् हैं। 
  4. रेगिस्तार्न के विस्तार्र को वृक्ष लगार्कर रोक जार् सकतार् है। 
  5. मिट्टी में उर्वरार् शक्ति बनार्यें रखते हैं। 
  6. मार्नव के मनोंरजन एवं पर्यटन के स्थल हैं।

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