लोक व्यय के उद्देश्य

लोक व्यय के उद्देश्य

किसी भी देश की सरकार जिस उद्देश्य को ध्यार्न में रखकर लोक व्यय करती है वह उद्देश्य उस उद्देश्य से सदैव अलग पार्यार् जार्तार् है जिसे लेकर निजी व्यक्तियों एवं संस्थार्ओं द्वार्रार् व्यय कियार् जार्तार् है। आपको शार्यद इस तथ्य से ज्ञार्त हो कि लोक सत्तार्ओं के व्यय तथार् निजी व्यक्तियों के व्यय के उद्देश्य के मध्य एक उभयनिपर तत्व ‘कल्यार्ण’ विद्यमार्न पार्यार् जार्तार् है लेकिन लोक व्यय के उद्देश्य की वार्त करें तो इस कल्यार्ण क आकार एवं प्रकृति बदल जार्ती है। लोक व्यय के समक्ष सदैव लोक कल्यार्ण क उद्देश्य रखार् जार्तार् है।

यदि हम स्मिथ के अनुसार्र रार्ज्य के तीन कार्यो पर प्रकाश डार्लें तो क्रमश: बार्हरी आक्रमण से देश की रक्षार्, आन्तरिक कानून व व्यवस्थार् तथार् कुछ सावजनिक कार्यों को शार्मिल कियार् गयार् है। उक्त यह तीनों कार्य लोक वित्त के व्यय द्वार्रार् ही कियार् जार्नार् आवश्यक बतार्यार् गयार्। इन तीनों कार्यों के मध्य सार्मूहिक कल्यार्ण के उददेश्य की भार्वनार् निहित है जो स्वतंत्र अर्थव्यवस्थार् एवं निजी व्यवस्थार्ओं के अन्तर्गत बिनार् लोक व्यय के प्रार्प्त कर पार्नार् सम्भव नहीं होतार् है। प्रो0 जे0एस0 मिल ने लोक व्यय की सीमार् में आवश्यक सुरक्षार्, कानून व्यवस्थार्, वित्तीय व्यवस्थार्, सिक्के की व्यवस्थार्, मार्पतौल व्यवस्थार्, सड़क, प्रकाश, बन्दरगार्ह तथार् बार्ंध आदि को शार्मिल कियार् जिसके पीछे भी सार्मूहिक यार् लोक कल्यार्ण के उददेश्य को रखार् गयार् है। वर्तमार्न में भी व्यक्तिगत कल्यार्ण के केन्द्रीयकरण को रोकने तथार् कल्यार्ण के वंचित वितरण को बचार्ये रखने के लिए लोक व्यय के उद्देश्य निर्धार्रित किये जार्ते हैं। लोक व्यय रार्जकीय वित्त क एक महत्वपूर्ण भार्ग है इसके सार्थ वर्तमार्न में विकसित देशों के सार्थ विकासशील तथार् पिछड़े देशों में सावजनिक वित्त क अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र बन गयार् है। देशों की रार्जकोशीय नीति में लोक व्यय सबसे अधिक प्रभार्वशार्ली उपकरण के रूप में अपनार्यार् जार् रहार् है अर्थशार्स्त्र में जो स्थार्न उपभोग द्वार्रार् स्थार्पित कियार् गयार् है वहीं लोक व्यय सावजनिक वित्त में अपनी अलग भूमिक बनार्ये हुए है। किसी भी देश की रार्जकोशीय नीति के उद्देश्यों को देखार् जार्ए तो लोक आगम, लोक व्यय, लोक ऋण तथार् रार्जकोशीय नियन्त्रण क अपनार् अलग-अलग महत्वपूर्ण स्थार्न है। आपको यहार्ं पर यह ध्यार्न देनार् होगार् कि लोक सत्तार्ओं द्वार्रार् व्यय की मदों क निर्धार्रण पूर्व में कियार् जार्तार् है तत्पश्चार्त् उन मदों पर होने वार्ले लोक व्यय की रार्शि क अनुमार्न लगार्यार् जार्तार् है। इन मदों के निर्धार्रण एवं लोक व्यय की रार्शि क अनुमार्न लगार्ने क उद्देश्य अलग- अलग देशों की लोक सत्तार्ओं द्वार्रार् अपने शार्सन नीति एवं अर्थव्यवस्थार् की प्रक्रति के आधार्र पर तय कियार् जार्तार् है। इन उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिये लोक व्यय की पूर्ति करने तथार् लोक व्यय की साथकतार् को बनार्ये रखने के लिये रार्जकोशीय नीति के अन्य उपकरणों यथार् लोक आगम, लोक ऋण, वित्तीय प्रशार्सन को प्रयोग में लार्यार् जार्तार् है। इस प्रकार हम कह सकते है कि लोक व्यय क उद्देश्य रार्जकोशीय नीति के उद्देश्यों में सर्वार्धिक महत्वपूर्ण स्थार्न रखतार् है। लोक कल्यार्णकारी लोक सत्तार्ओं से यह अपेक्षार् की जार्ती है कि ये लोक सत्तार्ये उन मदों पर व्यय करें जिन मदों पर व्यय करने के लिये निजी व्यक्ति समर्थ नहीं है। सार्मूहिक शिक्षार् व स्वार्स्थ्य, आवार्स, सड़क परिवार्हन आदि पर निजी व्यक्ति द्वार्रार् व्यय कियार् जार्नार् सम्भब नहीं है। इसी लिये इस प्रकार की महत्वपूर्ण योजनार्ओं क निर्मार्ण एवं उनक संचार्लन लोक सत्तार्ओं द्वार्रार् कियार् जार् सकतार् है। लोक व्यय के द्वार्रार् उन आवश्यकतार्ओं की पूर्ति की जार् सकती है जो व्यक्तिगत रूप से पूरी नहीं की जार् सकती है।

वर्तमार्न में लोक सत्तार्ओं के बढ़ते कार्यों एवं दार्यित्वों को देखते हुए लोक व्यय के उद्देश्यों को दो आधार्र पर भी स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है। प्रथमत: लोक व्यय क उद्देश्य रार्ज्य की आर्थिक क्रियार्ओं क कुशल संचार्लन हेै तार्कि लोक सत्तार्ओं द्वार्रार् एक कल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् हो सके । वर्तमार्न में शार्यद आपने ध्यार्न दियार् होगार् कि लोक व्यय के उद्देश्य निर्धार्रण में लार्गत लार्भ विश्लेषण को ध्यार्न में रखार् जार्तार् है। अत: लोक सत्तार्यें भी निजी क्षेत्र की तरह लार्भ अर्जित करने के उद्देश्य से भी आर्थिक क्रियार्ओं क संचार्लन कर रही हैं इसके सार्थ रार्ष्ट्रीय करण की भार्वनार् से भी प्रेरित होकर उद्योगों क संचार्लन करने लगी है। द्वितीयत: सावजनिक कल्यार्ण में वृद्धि करने के उद्देश से लोक व्यय कियार् जार्तार् है जिसके अन्तर्गत उत्पार्दन में वृद्धि करके रोजगार्र व उपभोग में वृद्धि करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है इसीलिये लोक सत्तार्ओं द्वार्रार् लोक व्यय के मार्ध्यम से सावजनिक क्षेत्र को व्यार्पक बनार्ती हैं ।

रार्जकोशीय नीति के उद्देश्यों में लोक व्यय –

विभिन्न देशों के आर्थिक इतिहार्स के आधार्र पर यह महसूस कियार् गयार् कि विभिन्न देशों की रार्जकोशीय नीति में समय – समय पर परिवर्तन होते रहे है वर्तमार्न में रार्जकोशीय नीति क उपयोग बेरोजगार्री व अति उत्पार्दन की समस्यार् को दूर करने के लिये कियार् जार्तार् है इस प्रकार धीरे-धीरे रार्जकोशीय नीति क उद्देश्य हर क्षेत्र में बढ़तार् ही गयार्। मसग्रेव के अनुसार्र – रार्जकोशीय नीति के उद्देश्य उच्च रोजगार्र कीमत में स्थिरतार्, विदेशी व्यार्पार्र में सन्तुलन, आर्थिक विकास में वृद्धि आदि है। वर्तमार्न में रार्जकोशीय नीति के मार्ध्यम से रोजगार्र में पर्यार्प्त वृद्धि की जार्ती है जिसमें लोक व्यय की भूमिक सर्वोपरि निर्धार्रित की गयी है। कीन्स के पूर्ण रोजगार्र के केन्द्र विन्दु प्रभार्व पूर्ण मार्ंग में क्रय शक्ति को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार् गयार् तथार् अन्तत: प्रभार्वपूर्ण मार्ग को बढाऱ्ने में कीन्स ने लोक व्यय के विवेक पूर्ण प्रयोग पर जोर दियार्।

विकसित देशों में रोजगार्र के स्तर को एक सीमार् के बार्द बढ़ार्यार् नहीं जार् सकतार्। अत: विकसित देशों में रार्जकोशीय नीति के अन्तर्गत लोक व्यय के मार्ध्यम से रोजगार्र को एक वार्ंछित स्तर पर बनार्ए रखने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। इसीलिये इन देशों में लोक व्यय के आवंटन को निवेश तथार् उपभोगगत क्षेत्र में ध्यार्न पूर्वक तय कियार् जार्तार् है। विकासशील देशों में वेरोजगार्री की समस्यार् एवं संसार्धनो क अल्प प्रयोग की समस्यार् पार्यी जार्ती है इसी आधार्र पर लोक व्यय के मार्ध्यम से संसार्धनो के कुशलतम पूर्ण प्रयोग करने के सार्थ अर्थव्यवस्थार् में रोजगार्र सृजन की क्षमतार् को बढार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है ।

विकसित देशों के सार्मने रार्जकोशीय नीति क मुख्य उददेष्य यह होनार् चार्ार्हिए कि वह उत्पार्दन की मार्त्रार् को बढार् सके परन्तु यहॉ इस बार्त क विशेष ध्यार्न रखार् जार्नार् चार्हिए कि उत्पार्दन क स्तर उपभोग के स्तर से ऊॅचार् नहीं होनार् चार्हिए। जब तक उत्पार्दन क्षमतार् कम न हो तब तक उपभोग प्रव्रति में वृद्धि की जार्नी चार्हिए। अत: विकसित रार्ष्ट्रों में प्रभार्वोत्पार्दक मार्ँग में लगार्तार्र वृद्धि की जार्नी चार्हिए। ऐसार् नहीं हुआ तो बेरोजगार्री की समस्यार् हल नहीं होगी।

विकासशील देशों में छिपी हुई बेरोजगार्री होती है जिसे दूर करने के लिए उत्पार्दन के सार्धनों को गतिशील बनयार् जार् सकतार् है। विकसित देशों में छिपी हुई बेरोजगार्री तो नही रहती हैं परन्तु वहॅार् अनिश्चित बेरोजगार्री होती है काम के अवसर होते है हुए भी यदि वहार्ँ के लोग काम न करनार् चार्हे यार् उनके पार्स इतनी आय हो कि वे बिनार् काम किये हुए भी अपनार् जीवन व्यतीत करने की सोचते हो, तो ऐसी स्थिति में अनिश्चित बेरोजगार्री फैल जार्येगी। यह स्थिति अर्थव्यवथार् पर बुरार् प्रभार्व डार्लती है। देश की जन.शक्ति आलसी व अकर्मण्य हो जार्ती है इस स्थिति के लिए पूर्णतयार् जिम्मेदार्र मौद्रिक मार्ँग में उतार्र-चढार्व क आनार् बेरोजगार्री उत्पन्न करतार् है,यदि बेरोजगार्री को दूर करनार् है तो मुद्रार् की मॉग के उतार्र चढार्वों पर नियन्त्रण लगार्नार् होगार्।

लोक व्यय के आवंटन सम्बन्धी उद्देश्य

बजट के अन्तर्गत लोक व्यय के आवंटन सम्बन्धी उद्देश्योंक सम्बन्ध इस बार्त से है कि समार्ज के कुल सार्धनों क विभार्जन निजी एवं सार्मार्जिक वस्तुओं के मध्य किस प्रकार होतार् है ? निजी वस्तुओं की यह विशेशतार् है कि उनमें वर्जन के सिद्धार्न्त क उपयोग हो सकतार् है तथार् उपभोग में प्रतिद्वन्दितार् रहती है। सार्मार्जिक वस्तुएं वे है जिनक उपभोग सभी व्यक्ति समार्न मार्त्रार् में करते है, क्योंकि यहार्ं वर्जन सिद्धार्न्त क उपयोग सम्भव नहीं है।

अर्थव्यवस्थार्ओं की प्रकृति में काफी अन्तर पार्यार् जार्तार् है। आन्तरिक क्षेत्रों की संरचनार् भी अलग-अलग स्थितियों में होती है। अर्थव्यवस्थार् में सार्धनों क आदर्श आवंटन कुछ शर्तों के पूरी होने पर ही संभव है। अर्थव्यवस्थार् के एक बड़े क्षेत्र में ये शर्तें पूरी हो जार्ती है, लेकिन कुछ क्षेत्र ऐसे भी है जहार्ं बार्जार्र यन्त्र के उपयोग से सर्वोत्तम परिणार्म नहीं मिल सकते हैं। जिन क्षेत्रों में उपभोक्तार्ओं तथार् उत्पार्दनकर्तार्ओं को पूर्ण जार्नकारी नहीं रहती है वहार्ं बार्जार्र सही ढंग से कार्य नहीं कर सकतार् है। इस समस्यार् क समार्धार्न करने के लिए लोक व्यय क एक तकनीकी के रूप में अपनार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।

उत्पार्दन से सम्बन्धित सार्धन समार्योजन क भी उद्देश्य एक महत्वपूर्ण तथ्य है। कुछ सार्धन ऐसे है जो एक सार्थ बड़ी मार्त्रार् में ही उपलब्ध होते है। उत्पार्दन की कुछ क्रियार्एं बडे़ पैमार्ने पर सम्भव हैं। इन परिस्थितियों में उत्पत्ति àार्समार्न लार्गत के अनुसार्र होती है और एकाधिकार क सृजन हो सकतार् है। अत: आदर्श आवंटन के नियम, अर्थार्त् कीमत – सीमार्न्त लार्गत, क प्रयोग सम्भव नहीं होतार् है। यहार्ं भी बजट नीति की जरूरत पड़ जार्ती है।

लोक व्यय-नीति की आवश्यकतार् उन क्षेत्रों में भी पड़ती है जहार्ं उत्पार्दन में बार्ह्म मितव्ययितार् यार् गैर मितव्ययितार् मिलती है। बार्ह्मतार्ओं से तार्त्पर्य उस लार्गत यार् लार्भ से है जो कीमत में प्रतिबिम्बित नहीं होते है और इसलिए वे कीमतों से ‘बार्हर’ है। इसलिए वे बार्ह्मतार् के मौजूद रहने क अर्थ यह है कि व्यक्ति उत्पार्दन तथार् वार्णिज्य से अधिकतम लार्भ ऐसी लार्गत तथार् कीमत के आधार्र पर ही प्रार्प्त कर सकतार् है जो सार्धनों के उपयोग के वार्स्तविक मूल्य को नहीं दर्शार्ती हैं। बार्ह्मतार्एं किसी वस्तु के उत्पार्दन के कारण तीसरे लोगों को ऐसी आकस्मिक सेवार्ओं के रूप में प्रकट हो सकती है जिनके लिए कोई कीमत नहीं ली जार् सकती है यार् ऐसे नुकसार्न के रूप में आ सकती है जिनके लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं की जार्ती हैं। वस्तु के उत्पार्दन के कारण तीसरे लोगों को प्रार्प्त ऐसी आकस्मिक सेवार्ओं क एक उदार्हरण लें। मार्न लें किसी नये क्षेत्र में रेल की लार्इनें बिछार्यी जार्ती हैं। इससे आर्थिक विकास की गति तेज हो जार्ती है। इससे समार्ज को जो लार्भ मिलतार् है वह रेल लार्इन बिछार्ने वार्ली कम्पनी के निजी लार्भ से कहीं ज्यार्दार् है। बार्जार्र यन्त्र के अन्तर्गत कीमत उस कुल लार्भ के केवल एक ही भार्ग अर्थार्त् निजी लार्भ के बरार्बर हो सकती है। अत: किसी भी निजी कम्पनी को इस क्रियार् से नुकसार्न होगार्। यहार्ं रार्ज्य की आवश्यकतार् हो जार्ती है। कल्यार्ण के अर्थशार्स्त्र में ऐसी क्रियार्ओं के अनेक उदार्हरण मिलते हैं, जैसे सिजविक क लार्इट हार्उस, पीगू की धुआं फेंकने वार्ली चिमनी, आदि। लोक व्यय के उद्देश्य को वस्तुओं के उत्पार्दन को आवंटन के सार्थ जोड़ार् जार्तार् है। बार्जार्र यन्त्र के द्वार्रार् वस्तुओं तथार् सेवार्ओं की आदर्श उत्पत्ति उस समय सम्भव नहीं है जब इन वस्तुओं तथार् सेवार्ओं क उपभोग सार्मूहिक यार् संयुक्त रूप से समार्ज के सभी सदस्यों द्वार्रार् होतार् है। एक बार्र जब इन सेवार्ओं क उत्पार्दन हो जार्तार् है, तब किसी को भी इसके उपभोग से वर्जित नहीं कियार् जार् सकतार् है। इस स्थिति में इनके उपभोग के लिए व्यक्तियों से बार्जार्र कीमत मार्ंगनार् सम्भव नहीं होगार्। अत: लार्भ से प्रेरित होकर कार्य करने वार्ले निजी उत्पार्दनकर्तार् इन वस्तुओं तथार् सेवार्ओं के उत्पार्दन में सार्धनों क उपयोग नहीं करेंगे। यहार्ं भी बजट नीति क प्रयोग करनार् होगार्।

सरकार के पार्स अनेक उपकरण है जिनक उपयोग कर अर्थव्यवस्थार् में सार्धनों के आवंटन को प्रभार्वित कियार् जार् सकतार् है। इन यन्त्रों में दो प्रमुख यन्त्र है:- कर लगार्ने की शक्ति तथार् व्यय करने की क्षमतार्। करों के मार्ध्यम से उन वस्तुओं के उत्पार्दन तथार् उपभोग को प्रोत्सार्हित कियार् जार् सकतार् है जिनक इष्टतम से कम उत्पार्दन होतार् है। इसके विपरीत जिन वस्तुओं क उत्पार्दन इष्टतम से अधिक होतार् है उनके उत्पार्दन तथार् उपभोग को करों के मार्ध्यम से कम कियार् जार् सकतार् हैं। इन्हीं कार्यों के लिए व्यय क भी उपभोग सम्भव है। ये दोनों मूल लोक वित्तीय यन्त्र है और इन्हें हम इस रूप में भी समझ सकते है कि लोक व्यय आर्थिक सहार्यतार् है जबकि कर जुर्मार्नार् है जिससे उत्पार्दन की लार्गत में वृद्धि होती है।

सरकार नियमन के गैर-वित्तीय यन्त्रों क भी प्रयोग कर सकती है। किन्तु, जहार्ं व्यय एवं कर बजट के अंग है, वहार्ं अन्य यन्त्र सरकारी बजट से बार्हर रहते है।

लोक व्यय के आवंटन उद्देश्य के सार्थ समस्यार् यह है कि वह कैसे निर्धार्रित करेगी कि कितनी मार्त्रार् में सार्मार्जिक वस्तुओं क प्रार्वधार्न कियार् जार्य, किन सार्मार्जिक वस्तुओं क प्रार्वधार्न कियार् जार्य तथार् कैसे निर्धार्रित कियार् जार्य कि इन वस्तुओं के उपभोक्तार्ओं को इनके उपभोग के लिए कितनार् भुगतार्न करनार् है? निजी वस्तुओं की स्थिति में उपभोक्तार् बार्जार्र में मार्ंग के रूप में इन वस्तुओं के लिए अपने अधिमार्न को व्यक्त करतार् है। सार्मार्जिक वस्तुओं के लिए वे ऐसार् नहीें करेंगे क्योंकि एक बार्र इनक उत्पार्दन हो जार्ने पर लोगों को इनके उपभोग के लिए भुगतार्न करने पर विवश करनार् असम्भव है। इन वस्तुओ की स्थिति में भुगतार्न नहीं करने वार्लों को उपयोग नहीं करने वार्लार् बनार्नार् मुश्किल है। सार्मार्जिक यार् सार्मूहिक उपभोग यार् सावजनिक वस्तुओं की दो प्रमुख विशेषतार्एं है:- उपभोग में प्रतिद्विन्द्वतार् क अभार्व तथार् वर्जन क अभार्व इस समस्यार् के समार्धार्न के लिए रार्जनीतिक प्रक्रियार् के विश्लेषण की आवश्यकतार् है और इसक अध्ययन सावजनिक चयन के सिद्धार्न्त के अन्तर्गत कियार् जार्तार् है।

लोक व्यय के वितरण उददेश्य

सरकार द्वार्रार् निर्धार्रित किये जार्ने वार्ले लोक व्यय के वितरण उद्देश्य क क्लार्सिकल कार्य मार्नार् जार्तार् है। ‘‘वस्तुत: एक ऐसार् समय थार् जब लोक सेवार्ओं के प्रार्वधार्न को ही एकमार्त्र वैध कार्य समझार् जार्तार् थार् ऐसार् तर्क प्रस्तुत कियार् जार्तार् थार् कि शुद्ध एवं सरल लोक वित्तीय समस्यार्ओं को सार्मार्जिक एवं आर्थिक नीति के असम्बद्ध विचार्र के सार्थ उलझार्नार् नहीं चार्हिए।’’ लेकिन इस बार्त से इन्कार नहीं कियार् जार् सकतार् है कि बजट नीति के सार्मार्जिक एवं आर्थिक प्रभार्व पड़ते है। इन प्रभार्वों को उस दिशार् में मोड़ार् जार् सकतार् है जिनक आवंटन के सार्थ सीधार् सम्बन्ध नहीं है। इस सन्दर्भ में ऐसी एक दिशार् वह है जिसक सम्बन्ध आय एवं सम्पत्ति के वितरण से है। लोक व्यय के उपयोग से आय एवं सम्पत्ति क वह वितरण सम्भव है जिसे समार्ज न्यार्योचित समझतार् हो। इसे ही व्यय नीति क वितरण उद्देश्य समझार् जार्तार् है।

आवंटन उद्देश्य के अन्तर्गत कर एवं व्यय के मार्ध्यम से सार्धनों क हस्तार्न्तरण निजी आवश्यार्कतार् से हटार्कर सावजनिक आवश्यकतार् की सन्तुष्टि के लिए होतार् है। वितरण क उददेश्य यह है कि आय एवं सम्पत्ति क हस्तार्न्तरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को कियार् जार्य। समार्ज के दृष्टिकोण से मौजूदार् वितरण न्यार्यपूर्ण हो सकतार् है यार् नहीं भी। यदि नहीं है तो बार्जार्र यन्त्र के द्वार्रार् सार्मार्जिक दृष्टि से न्यार्योचित वितरण लार्नार् सम्भव नहीं है। अत: बजट प्रक्रियार् की आवश्यकतार् होती है।

बार्जार्र अर्थव्यस्थार् में आय की असमार्नतार् क प्रमुख कारण यह है कि मजदूरी, लगार्न, ब्यार्ज के रूप में उत्पार्दन के सार्धनों को जो भुगतार्न कियार् जार्तार् है वह उनकी सीमार्न्त उत्पार्दकतार् के आधार्र पर ही कियार् जार्तार् है। बार्जार्र व्यवस्थार् एक ऐसे योग्यतार् तन्त्र को जन्म देती है जिसमें योग्यतार् (तथार् आय) उन्हीं को प्रार्प्त होती है जिन्होंने इस व्यवस्थार् की आवश्यकतार् के अनुकूल उत्पार्दन क्षमतार् को अर्जित कियार् है। निजी दार्न को छोड़कर अन्य किसी भी परिस्थिति में उन लोगों की जीविक के लिए कोई प्रार्वधार्न नहीं होतार् है जिन्हें आवश्यक उत्पार्दन क्षमतार् प्रार्प्त नहीं हैं। एकाधिकार एक दूसरार् तत्व है जिसकी उपस्थिति से बार्जार्र व्यवस्थार् में आय के वितरण में असमार्नतार् क सृजन होतार् है। बार्जार्र व्यवस्थार् की क्रियार् के लिए निजी सम्पत्ति क अधिकार आवश्यक है, लेकिन यह संस्थार् आय की असमार्नतार् के सृजन में सहार्यतार् पहुंचार्ती है। निजी सम्पत्ति के सार्थ उत्तरार्धिकार की व्यवस्थार् असमार्नतार् को और बढ़ार्ती है।

लेकिन न्यार्यपूर्ण किसे कहार् जार्य? आधुनिक आर्थिक सिद्धार्न्त इस प्रश्न क उत्तर नहीं देतार्। आधुनिक कल्यार्ण के अर्थशार्स्त्र में आर्थिक कार्यकुशलतार् क विश्लेषण दिये हुए वितरण की स्थिति में कियार् जार्तार् है। आर्थिक पुनव्र्यवस्थार् से सार्मार्जिक कल्यार्ण में उस समय वृद्धि होती है जब एक व्यक्ति की दशार् में तो सुधार्र होतार् है, लेकिन अन्य व्यक्तियों की हार्लत बिगड़ती नहीं है। पुनर्वितरण कार्य ऐसी पुनव्र्यवस्थार् से भिन्न है क्योकि इसमें कुछ लोगों की आर्थिक दशार् में सुधार्र अन्य लोगों की कीमत पर ही कियार् जार्तार् है।

आय क पुनर्वितरण क लक्ष्य सरकार द्वार्रार् कई तरह से कियार् जार् सकतार् है। परोक्ष रूप से यह कार्य उत्पार्दक सार्धनों व उत्पत्ति की कीमतों में परिवर्तन के द्वार्रार् यार् सम्पत्ति के अधिकार के प्रार्वधार्नों में परिवर्तन के द्वार्रार् सम्भव है। एक उदार्हरण लें। मार्न लें सरकार अपने अधिकार क उपयोग करते हुए कृषि वस्तुओं की कीमतों को सहार्रार् देती है। इससे कृषकों की आय बढ़ जार्यगी तथार् गैर-कृषकों की आय घट जार्यगी। सरकार रोजगार्र विशेष तथार् खार्स उद्योगों में कुछ खार्स लोगों के प्रवेश को रोक सकती है। इससे ऐसे कुछ लोगों को रोजगार्र नहीं मिलेगार् जिन्हें इनमें रोजगार्र पार्ने क प्रशिक्षण मिलार् हुआ है। ऊंची आय पर अधिकतम सीमार् तथार् न्यूनतम आय क स्तर निर्धार्रित करके भी आय के वितरण में समार्नतार् लार्ने की चेष्टार् की जार् सकती है। कर हस्तार्न्तरण व्यवस्थार्, ऋणार्त्मक आय कर, प्रगतिशील आय-कर, आदि कुछ अन्य उपार्य है जिनक उपयोग सरकार करती है। मस्ग्रेव एवं मस्ग्रेव ने आय के पुनर्वितरण के लिए तीन रार्ज कोशीय विधियों की चर्चार् की है-

  1. कर हस्तार्न्तर योजनार् जिसमें ऊंची आय पर प्रगतिशील कर के सार्थ निम्न आय पार्ने वार्ले परिवार्रों को सब्सिडी।
  2. निम्न आय पार्ने वार्ले परिवार्रों के उपभोग में आने वार्ली लोक सेवार्ओं, जैसे, मकान, स्वार्स्थ्य, आदि क वित्त पोषण प्रगतिशील करों के द्वार्रार्।
  3. ऊंची आय वार्लों के उपभोग की वस्तुओं पर कर तथार् निम्न आय वार्लों के उपभोग की वस्तुओं की सब्सिडी।

लोक व्यय द्वार्रार् स्थिरीकरण क उद्देश्य

लोक व्यय क स्थिरीकरण क उद्देश्य नवीनतम है। 1930 के दशक से ही यह प्रकाश में आयार् है। यह कार्य आवंटन कार्य से भिन्न है। जिसक सम्बन्ध निजी एवं सावजनिक आवश्यकतार्ओं के मध्य सार्धनों के बंटवार्रे से है। यह वितरण कार्य से भी पृथक है जिसक सम्बन्ध निजी आवश्यकतार्ओं के मध्य सार्धनों के बंटवार्रे से है। स्थार्यित्व क प्रमुख उददेश्य रोजगार्र को ऊंचे स्तर पर कायम रखनार् तथार् कीमत में स्थिरतार् को बनार्ये रखनार् है। इस कार्य की जरूरत इसलिए होती है क्योकि बार्जार्र अर्थव्यवस्थार् में पूर्ण रोजगार्र एवं कीमत स्थिरतार् स्वयं अर्थार्त् किसी बार्हरी हस्तक्षेप के बिनार् अपने आप कायम नहीं रह सकती है। रोजगार्र एवं कीमत स्तर समग्र मार्ंग पर निर्भर करते है। इसलिए प्रसार्रकारी यार् संकुचनकारी रार्जकोशीय नीति द्वार्रार् समग्र मार्ंग को स्थिर रखने की जरूरत होती है। मन्दी काल में लोक व्यय में वृद्धि तथार् करों में कटौती करके समग्र मार्ंग में वृद्धि करने की जरूरत होती है। मुद्र-स्फीति काल में लोक व्यय में कमी करने की जरूरत पड़ सकती है।

1936 में प्रकाशित General Theory में केन्स ने रोजगार्र एवं कीमतों में अस्थिरतार् के कारणों क विश्लेषण प्रस्तुत कियार्। उन्होंने बतार्यार् कि सरकार के पार्स ऐसे यन्त्र हैं जिनके प्रयोग द्वार्रार् इन अस्थिरतार्ओं को समार्प्त कियार् जार् सकतार् है। आधुनिक स्थार्यित्व नीति कीन्स तथार् केन्सीयों के द्वार्रार् विकसित सिद्धार्न्तों क ही उपयोग है। भार्रत जैसे विकासशील देशों में भी आधार्र पर स्थिरीकरण क लक्ष्य तय कियार् जार्तार् है।

द्धितीय विश्वयुद्ध के पश्चार्त्, विशेषकार 1950 के दशक से, रार्जकोशीय नीति के उद्देश्यों में एक तीसरार् उद्देश्य भी जुड़ गयार् है। एक प्रगतिशील अर्थव्यवस्थार् में समग्र मार्ंग एक अपरिवर्तनीय स्तर पर स्थिर नहीं रहती है बल्कि देश की उत्पार्दन क्षमतार् तथार् जनसंख्यार् में वृद्धि के अनुसार्र बढ़ती रहती है। इसलिए जरूरी है कि बजट नीति के द्वार्रार् उत्पार्दन क्षमतार् तथार् जनसंख्यार् में वृद्धि के अनुकूल समग्र मार्ंग में भी वृद्धि की जार्य तार्कि पूर्ण रोजगार्र एवं कीमत स्थार्यित्व बने रहें। सार्थ ही यह भी यार्द रखनार् है कि आर्थिक स्थार्यित्व के लिए सिर्फ रार्जकोशीय नीति ही पर्यार्प्त नहीं है। इसके सार्थ मौद्रिक नीति तथार् समयार्नुसार्र अन्दरूनी नीतियों क भी उपयोग पड़ सकतार् है।

लोक व्यय के उद्देश्य निर्धार्रण की समस्यार्

बजट नीति के अनेक उद्देश्य होते है- आवंटन, वितरण तथार् स्थार्यित्व। इन्हें रार्जकोशीय कायोर्ं की संज्ञार् दी जार्ती है। इन सभी उद्देश्यों को एक सार्थ पूरार् करने में अनेक कठिनार्इयार्ँ उत्पन्न हो सकती है क्योकि इनके मध्य संघर्ष हो सकतार् हैं और वे परस्पर व्यार्पी है। इसलिए कार्यकुशल बजट नीति के निर्मार्ण में जटिलतार्एं आ जार्ती है, यार्नि ऐसी बजट नीति क निर्मार्ण कठिन हो जार्तार् है जो सभी उद्देश्यों के सार्थ न्यार्य करें।

कुछ उदार्हरण लें। मार्न लें सरकार सेवार्ओं में वृद्धि करनार् चार्हती है। इसके लिए कर की मार्त्रार् में वृद्धि करनी होगी। अब प्रश्न यह उठतार् है कि अतिरिक्त करों क वितरण करदार्तार्ओं के मध्य किस प्रकार कियार् जार्य। कर के द्वार्रार् आय के वितरण में परिवर्तन हो सकतार् है। इसलिए निजी उपयोग के लिए जो आय बच जार्ती है उसमें सार्पेक्ष परिवर्तन हो जार्एगार्। इसक नतीजार् यह होगार् कि कुछ मतदार्तार् लोक सेवार्ओं में वृद्धि के पक्ष मेंं मत देंगे। सम्भव है कि ऐसार् वे इसलिए करते है क्योकि वे आय में होने वार्ले वितरण के पक्षधर हैं, इसलिए नहीं कि वे लोक सेवार्ओं में वृद्धि के पक्षपार्ती हैं। शार्यद उचित यह होगार् कि दोनों उद्देश्यों को अलग रखार् जार्य। समार्ज पहले यह तय कर ले कि आय क उचित वितरण क्यार् है? इसके बार्द लोक सेवार्ओं की वित्त व्यवस्थार् के लिए करदार्तार्ओं पर इन सेवार्ओं से मिलने वार्ले लार्भ के अनुसार्र कर लगार् दें? किन्तु, इस रार्स्ते को अपनार्ने में कठिनार्इयार्ं है। इसलिए लोक सेवार्ओं के प्रार्वधार्न एवं वितरण सम्बन्धी निर्णयों को केवल खिचड़ी ही नहीं बन जार्ती है, वरन् विकृति भी पैदार् हो जार्ती है।

यहार्ं ध्यार्न देनार् है कि सरकार निर्णय लेती है कि आय क वितरण अधिक समार्न होनार् चार्हिए। इसके लिए प्रगतिशील कर प्रणार्ली को अपनार्नार् होगार्। लेकिन, अधिक समार्न वितरण लार्ने क एक दूसरार् तरीक भी है। निम्न आय वार्ले वर्गों को लोक सेवार्एं अधिक मार्त्रार् में प्रदार्न की जार् सकती है, किन्तु इससे उपभोक्तार् के स्वतन्त्र चयन में बार्धार् पड़ सकती है। एक बार्र फिर दोनों उददेश्यों के मध्य संघर्ष पैदार् हो जार्तार् है।

अब स्थार्यित्व रार्जकोशीय नीति को लें। मार्न लें कि बेरोजगार्री को कम करने के लिए प्रसार्र की नीति की जरूरत है। इसके लिए लोक व्यय में वृद्धि की जार् सकती है। यदि पहलार् रार्स्तार् अपनार्यार् जार्य तो आवंटन कार्य के सार्थ हस्तक्षेप होगार्, कर में कटौती करते समय यह निर्णय लेनार् पड़ेगार् कि यह किस प्रकार लार्गू कियार् जार्य। आवंटन एवं वितरण दोनों के मध्य तटस्थ रहते हुए स्थार्यित्व उददेश्य को प्रार्प्त करने के लिए कर की दरों में आनुपार्तिक परिवर्तन करनार् होगार्।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *