लोक व्यय क प्रभार्व

इसमें आप लोक व्यय के अर्थव्यवस्थार् के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों से परिचित हो सकेंगे। जिससे उत्पार्दन, बृद्धि, वितरण और स्थिरीकरण पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों को शार्मिल कियार् गयार् है। लोक व्यय क उत्पार्दन पर अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभार्व डार्लतार् है। प्रत्यक्ष प्रभार्वों के सार्थ परोक्ष रूप से भी प्रभार्वित करतार् है। बृद्धि को तीव्र बनार्ने में लोक व्यय अत्यधिक उपयोगी है। आय क समार्न वितरण तथार् स्थिरीकरण की दशार् में लोक व्यय को सरकारों द्वार्रार् एक उपकरण के रूप में अपनार्यार् जार्तार् है। अत: इन पक्षों पर लोक व्यय के प्रभार्वों की उपेक्षार् नहीं की जार् सकती।उत्पार्दन, वृद्धि, वितरण तथार् स्थिरीकरण पर पड़ने वार्ले लोक व्यय के प्रभार्वों क विश्लेषण से आप लोक व्यय की अर्थव्यवस्थार् के लिए उपयोगितार् क अनुमार्न लगार् सकते है। लोक व्यय से प्रभार्वित ये सभी पक्ष आपस में गहरार् अन्तसम्बन्ध रखते है, जिसे इसके मार्ध्यम से आप भंली भार्ंति समझ सकेंगे।

लार्क व्यय के प्रभार्व

प्रार्चीन काल में लोक व्यय रार्ज्य के क्रियार् कलार्पों को संचार्लित करने क एक उपकरण थार् लेकिन वर्तमार्न में लोक व्यय न केवल रार्ज्य के क्रियार् कलार्पों को चलार्ने के सार्थ-सार्थ सरकारों को चलार्ने क भी एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गयार् है। रार्ष्ट्रों की अर्थव्यवस्थार्ओं की प्रकृति के अनुसार्र लोक व्यय क प्रभार्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग स्तर पर पार्यार् जार्तार् है। इसीलिए लोक व्यय वर्तमार्न में महत्वपूर्ण स्थार्न बनार्ये हुए है। सरकारों क मुख्य ध्यार्न लोक आगम की अपेक्षार् लोक व्यय पर केन्द्रित कियार् जार् रहार् है। अर्थव्यवस्थार् क कोई भी क्षेत्र ऐसार् नहीं है जो लोक व्यय के प्रभार्व से अछूतार् रहतार् हो।

आपको यहार्ं पर ध्यार्न देने की अत्यन्त आवश्यकतार् है कि लोक व्यय के प्रभार्व दो रूपों में पड़ते है प्रथमत: प्रभार्व आपको स्पष्ट रूप से दिखार्ई देते है तथार् द्वितीयत: प्रभार्वों पर आम जनतार् की नजर पहुॅचनार् अधिक आसार्न नहीं है लेकिन इसक अर्थ यह नहीं है कि द्वितीयत: प्रभार्व प्रथमत: प्रभार्वों से कमजोर है। लोक व्यय क कोई भी प्रभार्व एक दूसरे से कितनार् प्रबल व निर्वल है यह इस बार्त पर निर्भर करतार् है कि प्रभार्वित होने वार्लार् क्षेत्र कितनार् संवेदनार्ील क्षेत्र है? लोक व्यय के प्रभार्वों की विवेचनार् आगे के शीर्षकों के अन्तर्गत भंली भार्ंति रूप से स्पष्ट की जार् सकती हैं।

लोक व्यय क उत्पार्दन पर प्रभार्व

आपको यहार्ं पर लोक व्यय के उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों की प्रवृत्ति से परिचित कियार् जार्येगार्। लोक व्यय क उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों क प्रार्चीन काल में भी महत्वपूर्ण स्थार्न रहार् तथार् वर्तमार्न में भी लोक व्यय अपनी महत्वपूर्ण भूमिक निभार् रहार् है। अर्थव्यवस्थार् की प्रकृति किसी भी प्रकार की हो यार् उसक आकार कैसार् भी क्यों न हो? लोक व्यय के बिनार् उत्पार्दन सम्बन्धी अनेक निर्णयों को ले पार्नार् सम्भव नहीं है।

लोक व्यय के उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्व से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार्र करनार् आपके लिए अत्यन्त उपयोगी होगार् कि अर्थव्यवस्थार् के संसार्धनों पर स्वार्मित्व अधिकार की स्थिति क्यार् है? संसार्धनों पर निजी स्वार्मित्व तथार् अधिकार है तो लोक व्यय क प्रभार्व उत्पार्दन पर अलग दिशार् में होगार् और यदि संसार्धनो पर सरकार क स्वार्मित्व तथार् अधिकार है तव लोक व्यय क उत्पार्दन पर प्रभार्व अत्यन्त तीव्र तथार् गहन होतार् है। इसके सार्थ आर्थिक नियमों की भार्ंति उत्पार्दन केवल आर्थिक संसार्धनों पर ही निर्भर नहीं करतार् बल्कि सार्मार्जिक, धामिक तथार् रार्जनैतिक पर एक बड़ी सीमार् तक निर्भर रहतार् है। उत्पार्दन से जुड़ार् एक अन्य अहम तत्व मार्नवीय व्यवहार्र है जो लोक व्यय से काफी प्रभार्वित होतार् है।सरकारों क दार्यित्व है कि वह अपनी जनतार् की मूल भूत आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए हरदम प्रयार्स करें। इस मूल भूत आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए सरकार को ऐसे आवश्यक उत्पार्दन को अपने हार्थों में लेनार् होतार् है। ऐसी स्थिति में उत्पार्दन के सभी सार्धनों को एकत्रित एवं समार्योजित करने के लिए लोक व्यय को एक उपकरण के रूप में अपनार्नार् होतार् है। सार्मार्जिक आर्थिक सेवार्ओं के उत्पार्दन पर भी सरकार को भार्री मार्त्रार् में व्यय करनार् होतार् है जैसे स्वार्स्थ सुविधार्ऐं, शिक्षार् व्यवस्थार्, परिवहन सेवार्एं, सुरक्षार् व्यवस्थार्, सिचार्ंई योजनार्एं, न्यार्यार्लय व्यवस्थार्, जलकल व्यवस्थार् आदि पर भार्री मार्त्रार् में लोक व्यय क सहार्रार् लियार् जार्तार् है।

आपको सार्मार्न्य रूप से समझार्यार् जार् सकतार् है कि इन उत्पार्दनों पर लोक व्यय क प्रत्यक्ष प्रभार्व पड़तार् है। लोक व्यय जितनार् अधिक होगार् उत्पार्दन क स्तर भी उतनार् ही ऊंचार् होगार्। सरकार कुछ उत्पार्दन कार्य को स्वयं अपने हार्थ में नहीं लेती है लेकिन उत्पार्दन में वृद्धि करने के लिए निजी व्यक्तियों को प्रोत्सार्हन हेतु लोक व्यय क सहार्रार् लेती है। यह लोक व्यय जनतार् में उत्पार्दन बढ़ार्ने हेतु प्रेरणार् पैदार् करतार् है।लोक व्यय क उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्व को प्रो0 डार्ल्टन के इस कथन से भंली भार्ंति समझार्ार् जार् सकतार् है- ‘‘जब सरकार स्वार्स्थ्य, मकानों और सार्मार्जिक सुरक्षार् पर व्यय करती है यार् बच्चों को नि:शुल्क शिक्षार् प्रदार्न करती है तो यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विनियोग होतार् है जो भौतिक पूंजी के स्थार्न पर मार्नवीय पूंजी क निर्मार्ण करतार् है।’’प्रार्चीन काल की अपेक्षार् वर्तमार्न सरकारों द्वार्रार् लोक व्यय क उत्पार्दन पर प्रभार्व इस दिशार् में बढ़तार् जार् रहार् है।

लोक व्यय उत्पार्दन पर कार्य निवेश तथार् बचत के मार्ध्यम से भी प्रभार्व डार्लतार् है। आपको शार्यद यह ज्ञार्त हो कार्य करने की क्षमतार् निवेश क स्तर तथार् बचत करने की क्षमतार् एवं स्तर उत्पार्दन के स्तर तथार् गुण्वत्तार् दोनों पर ही प्रभार्व डार्लतार् है। लोक व्यय कार्य, निवेश तथार् बचत की क्षमतार्ओं एवं स्तर को सीधे तौर पर प्रभार्वित करतार् है। इस सम्बन्ध में यह ध्यार्न रखनार् होतार् है कि सरकार द्धार्रार् किये जार्ने वार्लार् लोक व्यय कही लोगों के मध्य कार्य निवेश तथार् बचत को विपरीत रूप से प्रभार्वित नहीं कर रहार् है, ऐसी स्थिति में उत्पार्दन भी बढ़ने के स्थार्न पर घटनार् प्रार्रम्भ होतार् है। लोक व्यय में वृद्धि होने पर आर्थिक क्रियार्ओं क विस्तार्र होतार् है जिससे उत्पार्दन में बृद्धि होनार् स्वार्भार्विक है।सरकार को चार्हिए कि लोक व्यय को उत्पार्दन कार्यों पर ही करनार् चार्हिए। अपव्यय तथार् अनुत्पार्दक कार्यों पर किये जार्ने वार्ले लोक व्यय क उत्पार्दन पर प्रभार्व वार्ंछित दिशार् में नहीं पड़ सकतार् है। लोक व्यय क उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्व को एक अन्य दिशार् में भी देखार् गयार् है यदि लोक व्यय वर्तमार्न उत्पार्दन क्रियार् के लिए कियार् गयार् है यार् भविष्य की उत्पार्दन योजनार्ओं के लिए। दोनों ही दिशार्ओं में लोक व्यय क उत्पार्दन पर अलग-अलग स्तर पर प्रभार्व पड़तार् है।लोक व्यय से उत्पार्दन के सार्धन वर्तमार्न से भविष्य की ओर हस्तार्न्तरित होते हैं। जब सरकार द्वार्रार् पूंजीगत वस्तुओं के उत्पार्दन के लिये किसी कार्य योजनार् पर बल देती है तब संसार्धनों क हस्तार्तरण भविष्य की ओर होतार् है और विकास की प्रक्रियार् आगे बढ़ती जार्ती है परिणार्म स्वरूप अर्थव्यवस्थार् में उत्पार्दन शक्ति क विकास होतार् है। सार्धनों के इस हस्तार्न्तरण के लिये भार्री उद्योग एवं बहुउद्देशीय नदी घार्टी परियोजनार्ओं को प्रार्थमिकतार् दी जार्ती हैं। इन भार्री उद्योग एवं परियोजनार्ओं पर निजी क्षेत्र की अपेक्षार् लोक सत्तार्ओं द्वार्रार् सही ढंग से कुशलतार्पूर्ण कार्य कियार् जार् सकतार् है क्योंकि इस क सम्बन्ध सार्मूहिक लोक कल्यार्ण एवं रार्ष्ट्र निमाण से होतार् है।

विकासशील देशों में रार्ज्य आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने के लिये व्यक्तियों , निजी संस्थार्ओं को ऋण व अनुदार्न आदि देतार् है तार्कि ये सब मिलकर अपने – अपने क्षेत्र में सार्धनों क सदुपयोग कर उत्पार्दन के स्तर को बढ़ार् सके ।सार्धनों के हस्तार्न्तरण के सम्बन्ध में इस बार्त को स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है कि जब सार्धनों को मार्नवीय संसार्धनों के विकास की ओर हस्तार्न्तरित कियार् जार्तार् है तब उत्पार्दन के स्तर में अनुकूल असर दिखार्ई देने लगतार् है इस सन्दर्भ में डार्ल्टन क कहनार् है कि “जब सरकार स्वस्थ्य, मकानों और सार्मार्जिक सुरक्षार् पर व्यय करती है यार् बच्चों को निशुल्क शिक्षार् प्रदार्न करती है तो यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विनियोग होतार् है जो भौतिक पूंजी के स्थार्न पर मार्नवीय पूंजी क निर्मार्ण करतार् है।”

प्रार्चीन अर्थशार्स्त्रीयों क विचार्र थार् कि सार्धनों के हस्तार्न्तरण से आर्थिक विकास नहीं कियार् जार् सकतार् है उनक विश्वार्स थार् कि आर्थिक क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप कम से कम होनार् चार्हिए।यहार्ं यह प्रश्न उठार्यार् जार् सकतार् है कि रार्ज्य द्वार्रार् सार्धनों क हस्तार्न्तरण लार्भप्रद हो यार् हार्निप्रद ? इस प्रश्न क उत्तर देश की परििस्थ्तियों पर निर्भर करतार् है । उदार्हरण के लिये सुरक्षार् व्यय को ही लें। आज प्रत्येक देश बार्ह्म आक्रमण से अपने को सुरक्षित रखनार् चार्हतार् है। शीत – युद्ध की आशंक से भी देश अपनी स्थिति को सुदृढ़ करनार् चार्हते है कुछ लोग यहार्ं यह भी कह सकते हैं कि यदि सुरक्षार् – व्यय में कमी करके इसे विकास कार्यों में लगार्यार् जार्तार् तो देश प्रगति कर सकतार् थार्, परन्तु हमेशार् यह कथन सत्य नहीं है । यदि देश में हमेशार् शार्न्ति व सुरक्षार् बनी रहे, तो इससे देश क निरन्तर विकास होगार् देश उत्तरोत्तर आर्थिक प्रगति करतार् रहेगार्। इस प्रकार सुरक्षार् सम्बन्धी व्यय पूर्ण रूप से आवश्यक एवं उत्पार्दक है। परन्तु यहार्ं इस बार्त को भी ध्यार्न में रखनार् होगार् कि सुरक्षार्- व्यय एक सीमार् से आगे न बढ़े। यदि विश्व के सभी रार्ष्ट्र इस बार्त के लिये सहमत हो जार्ते हैं कि ‘सुरक्षार् परिषद‘ के ही ‘समार्न विश्व‘ सेनार् क गठन कर दियार् जार्ये, जो सब देशों की सुरक्षार् के लिये उत्तरदार्यी होगार्, यदि इसके बार्द भी कोई रार्ष्ट्र अपनी सुरक्षार् के लिये व्यय करतार् है, तो ऐसार् सुरक्षार्त्मक व्यय अनुत्पार्दक होगार् । संक्षेप में, कहार् जार् सकतार् है कि यदि सरकार सावजनिक व्यय के सिद्धार्न्तों को ध्यार्न में रखते हुए रार्जनीतिक स्वाथों से अलग होकर सावजनिक व्यय करे तो प्रत्येक प्रकार क सावजनिक व्यय उत्पार्दक हो सकतार् है।

लोक व्यय क वृद्धि पर प्रभार्व

आपको यहॉ पर गम्भीरतार् से विचार्र करनार् होगार् कि लोक व्यय क वृद्धि पर पड़ने वार्ले प्रभार्व क सवार्ल विकासशील यार् पिछड़े देशों से मुख्य रूप से जुड़ार् हुआ है। विकासशील तथार् पिछड़े देश पूंजी की कमी के कारण बेरोजगार्री तथार् गरीबी की समस्यार् क सार्मनार् कर रहे है। लोक व्यय तथार् वृद्धि के सम्बन्ध में लेविस के इस कथन पर ध्यार्न देनार् अत्यन्त आवश्यक है- ‘‘अर्द्धविकसित देशों में विकास कार्यक्रमों को इस प्रकार लार्गू करनार् चार्हिए कि अर्थव्यवस्थार् के सभी क्षेत्रों क विकास समार्न रूप से एक सार्थ हो, तार्कि उद्योग और कृषि, उत्पार्दन और उपभोग तथार् उत्पार्दन और निर्यार्त में उचित सन्तुलन बनार् रहे।’’

उक्त कथन के आधार्र पर आप समझ सकते है कि लोक व्यय क वृद्धि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रभार्व पार्यार् जार्तार् है। केवल उत्पार्दन बढ़ार्ने से वृद्धि की कल्पनार् नहीं की जार् सकती इसके लिए अर्थव्यवस्थार् के विभिन्न क्षेत्रों के महज सन्तुलन स्थार्पित करनार् अत्यन्त आवश्यक है।सभी अर्थशार्स्त्री इस मत से सहमत है कि लोक व्यय आर्थिक बृद्धि पर महत्वपूर्ण प्रभार्व डार्लतार् है। वृद्धि को बनार्ये रखने के लिए बजट में लोक व्यय की वृद्धि बनार्ये रखने के सार्थ नयी नयी विकास मदों पर उसक आवंटन करके आर्थिक बृद्धि को तेज कियार् जार् सकतार् है। वर्तमार्न में लोक व्यय आर्थिक वृद्धि के लिए एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कारगर उपार्य है।

लोक व्यय क वितरण पर प्रभार्व

लोक व्यय के उत्पार्दन तथार् वृद्धि पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों क अध्ययन करने के बार्द अब आप लोक व्यय क वितरण पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों को भंली भार्ंति समझ सकेंगे। सार्मार्न्य रूप से कर व्यवस्थार् में आवश्यक परिवर्तन एवं सुधार्र करके ही आय तथार् धन के असमार्न वितरण को कम करने क प्रभार्व सरकारों द्वार्रार् कियार् जार्तार् रहार् है। वर्तमार्न में ऐसार् लगतार् है कि पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार्ओं में असमार्न वितरण की समस्यार् को दूर करने क सरकारी प्रयार्स सरकारी कार्यो के संचार्लन क एक उपकरण बनतार् जार् रहार् है। किसी भी अर्थव्यवस्थार् में धन के समार्न वितरण की कल्पनार् करनार् अर्थव्यवस्थार् तथार् सरकार दोनों के लिए ही एक टेढ़ी खीर सिद्ध होगार्।

विकसित देशों में असमार्न वितरण की समस्यार् को कम करने के लिए प्रगतिशील करों के प्रयोग को वरीयतार् दी जार्ती है। लेकिन यदि निर्धनों पर से कर के भार्र को हटार् लियार् जार्य तो इसे केवल एक अनुदार्न के ही रूप में समझ लियार् जार्य क्योंकि करों को हटार्ने से किसी भी देश में गरीबी एवं बेरोजगार्री को दूर नही कियार् जार् सकतार् है।यहार्ं पर लोक व्यय के प्रभार्वों पर ध्यार्न केन्द्रित कियार् जार्य तो विकासशील देशों में प्रगतिशील कर प्रणार्ली के समार्न यार् कही अधिक लोक व्यय, आय के असमार्न वितरण को कम करने में सहार्यक होतार् है। प्रगतिशील सरकारें लोक व्ययों को गरीबी दूर करने के एक उपार्य के रूप में अत्यधिक ओर से अपनार् रही है।

यहार्ं एक तथ्य यह भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि लोक व्यय किसी भी वर्ग यार् मद पर कियार् जार्य लेकिन उसक अन्तिम प्रभार्व गरीब तथार् बेरोजगार्रों पर अनुकूल रूप से अवश्य पड़तार् है। अर्थव्यवस्थार् में उत्पार्दन एवं बार्जार्र व्यवस्थार् में गरीबों क योगदार्न कम नहीं आंक जार् सकतार् है। लेकिन लोक व्यय को अमीरों पर व्यय करने से उसक प्रभार्व गरीबों तक पहुॅचने में काफी समय लगतार् है। वही दूसरी ओर सरकार द्धार्रार् लोक व्यय को गरीब वर्ग पर सीधे करके असमार्न वितरण पर अनूकूल प्रभार्व डार्लार् जार्तार् है। प्रार्य: सभी प्रगतीशील सरकारें इस उपार्य क प्रयोग करती रही है। सावजनिक निर्मार्ण कार्यो एवं नवीन विकासार्त्मक कार्यों पर लोक व्यय द्धार्रार् वितरण व्यवस्थार् में वार्ंछनीय सुधार्र लार्ने क प्रयार्स सरकारों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है।

लोकतार्ंत्रिक सरकारों द्वार्रार् गरीबों के कल्यार्ण के चलार्यी जार्ने वार्ली विभिन्न विकासार्त्मक तथार् गैर-विकासार्त्मक योजनार्ऐं पर भार्री मार्त्रार् में लोक व्यय कियार् जार्तार् है जिससे गरीबों की क्रय शक्ति में वृद्धि होती है जिससे उनकी आय में सुधार्र के सार्थ-सार्थ अर्थव्यवस्थार् में मार्ंग व पूर्ति शक्तियों के मध्य सार्मन्जस्य स्थार्पित करने में सहार्यतार् मिलती है। लोक व्यय क वितरण पर कई तरह से प्रभार्व डार्लार् जार्तार् है। अत: लोक व्यय के वितरण पर एक तरफार् पड़ने वार्ले प्रभार्वों क मार्पन करनार् इतनार् सरल कार्य नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण आवश्यक है।

लोक व्यय क वितरण पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों के सम्बन्ध में प्रो0 पीगू क मत है कि कोई भी कार्य जो गरीबों की वार्स्तविक आय के कुल भार्ग में वृद्धि करतार् हो सार्मार्न्यतयार् आर्थिक कल्यार्ण में वृद्धि करतार् है।लोक सत्तार्यें अपने रार्ज्य के नार्गरिकों को एक आवश्यक न्यूनतम जीवन स्तर क आश्वार्सन देती हैं तथार् इसके लिये रार्जकोशीय निति के अन्तर्गत लोक व्यय क इस प्रकार से प्रयोग करती है कि रार्ज्य में व्यार्प्त बढ़ती आय तथार् सम्पत्ति की अवार्ंछनीय विसमतार् को दूर कियार् जार् सके । लोक व्यय की वह पद्धति अधिक उत्तम मार्नी जार्ती है जो आय की असमार्नतार् को कम करने की क्षमतार् रखती हो लोक व्यय के द्वार्रार् वितरण को प्रभार्वित करने के लिये इस विधि क प्रयोग कियार् जार्तार् है जो वितरण को अलग-अलग रूपों में प्रभार्वित करती है ।

  1. आनुपार्तिक लोक व्यय के द्वार्रार् वितरण को प्रभार्वित कियार् जार्तार् है । इस प्रणार्ली के अन्तर्गत समार्ज के व्यक्तियों को उनकी आय के अनुपार्त में ही लोक व्यय से सम्बन्धित लार्भ यार् सुविधार्ऐं उपलब्ध करार्ई जार्ती है। जैसे मकान भत्तार् में तीन प्रतिशत की वृद्धि कर दी जार्ये।
  2. प्रतिगार्मी व्यय के द्वार्रार् समार्ज के लोगों को प्रार्प्त आय की तुलनार् में कम अनुपार्त में लोक व्यय के द्वार्रार् सुविधार्यें उपलब्ध करार्यी जार्ती है। विकासशील तथार् पिछड़े देशों में गरीवो के लिये आवश्यक सुविधार्यें उपलब्ध करार्ने के लिये अमीर वर्ग के लिये इस प्रतिगार्मी लोक व्यय की रीत को अपनार्यार् जार्तार् है क्योंकि अमीर वर्ग को उनसे प्रार्प्त आय की अपेक्षार् उन्हें कम अनुपार्त में लोक व्यय की सुविधार्यें प्रार्प्त हो पार्ती हैं।
  3. प्रगतिशील लोक व्यय समार्ज में आय की अपेक्षार् अधिक माऱ्त्रार् में सुविधार्यें उपलब्ध करार्तार् है। निर्धनों को उपलब्ध होने वार्ली सावजनिक सेवार्यें उनकी आय से अधिक मार्त्रार् में उपलब्ध करार्यी जार्ती है। विकासशील तथार् पिछड़े देशों में व्यार्प्त गरीबी, अशिक्षार्, बेरार्जगार्री जेसी समस्यार्ओं के समार्धार्न हेतु प्रगतिशील लोक व्यय अत्यन्त ही साथक सिद्ध होतार् है। लोक व्यय क वितरण पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों के सम्बन्ध में निम्न तथ्य भी अत्यन्त उपयोगी है निर्धन वर्ग के लिए नि:शुल्क व्यवस्थार्- सावजनिक व्यय की नीति में यह व्यवस्थार् की जार्नी चार्हिए कि निर्धन वर्ग के लिए शिक्षार्, चिकित्सार् एवं बच्चों के लिए पौश्टिक भोजन की नि:शुल्क व्यवस्थार् होनी चार्हिए।

उपार्दार्न- सरकार उत्पार्दकों और वितरकों को उपार्दार्न प्रदार्न करके यह व्यवस्थार् कर सकती है कि निर्धन और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए खार्द्यार्न्न, वस्त्र एवं मकानों की उचित रियार्यती दरों पर उपलब्ध करार्यार् जार्ये।

नकद अनुदार्न- कुछ विशिष्ट वर्गो को दिये जार्ने वार्ले नकद, अनुदार्न धन की वितरण व्यवस्थार् को सन्तुलित बनार्ने में योगदार्न देते है। इनमें वृद्धार्वस्थार् के लिए पेंशन, बीमार्री भत्तार्, बेरोजगार्री भत्तार्, मार्तृत्व भत्तार्, विधवार्ओं के लिए पेंशन अपंगों के लिए सहार्यतार् इत्यार्दि क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है। पिछड़े क्षेत्रों पर अधिक व्यय- देश में धन के वितरण की असमार्नतार् को कम करने के लिए यह भी आवश्यक है कि सरकार द्वार्रार् अविकसित एवं पिछडे क्षेत्रों के विकास पर पर्यार्प्त ध्यार्न देनार् चार्हिए। इससे वहार्ं के लोगों के जीवन स्तर में सुधार्र होतार् है और आर्थिक क्रियार्ओं में वृद्धि को प्रोत्सार्हन मिलतार् है।

लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्सार्हन- यदि सरकार विभिन्न वित्तीय सहार्यतार् एवं प्रेरणार्ओं द्वार्रार् लघु और कुटीर उद्योगों को प्रोत्सार्हित करती है, तो उससे भी सम्पत्ति के वितरण में सुधार्र होतार् है। उचित वेतन, मजदूरी एवं भत्ते- सरकार को यह देखनार् चार्हिए कि वेतन भोगी वर्ग को उचित वेतन, मजदूरी एवं भत्ते मिलें। इसके लिए सरकार को निश्चित रूप से व्ययों में वृद्धि करनी होगी। दूसरी ओर निजी उपक्रमों में इस प्रभार्व से उद्योगपतियों से कर्मचार्री वर्ग के आय क उचित प्रवार्ह होतार् रहतार् है। लोक व्यय क वितरण पर प्रभार्व के सम्बन्ध में लुट्ज क यह कथन अत्यन्त ही उपयार्गी है। “सावजनिक धन के वितरण की स्थार्यी नीति अपनार्ने से देश को हार्नि होगी और यदि इसी उद्देश्य से व्यय कियार् जार्ये तो सरकार क अधिकांश व्यय अनुत्पार्दक मार्नार् जार्एगार्।” इस सम्बन्ध में ब्यूहलर ने स्पष्ट कियार् कि धन के वितरण की असमार्नतार्ओं को कम करने के लिये सरकार को गरीबों पर अधिक व्यय करके तथार् धनी वर्ग पर अधिक करार्रोपण की रीति को कुछ समय तक लार्गू करनार् होगार् । आपको यहार्ं पर लोक व्यय तथार् वितरण के समबन्ध में कीन्स के विचार्र को ही ध्यार्न में रखनार् होगार्। कीन्स के अनुसार्र निर्धनों में धनी व्यक्तियों की अपेक्षार् उपभोग पर व्यय करने की अधिक प्रव्रत्ति पार्यी जार्ती है और इसी कारण जब धनी वर्ग से धन ले कर गरीबों पर व्यय कियार् जार्येगार् तो देश में व्यय के धन की मार्त्रार् बढ़ेगी जिससे उत्पार्दन तथार् रोजगार्र में वृद्धि होगी।

लोक व्यय तथार् स्थिरीकरण

अब आप अर्थव्यवस्थार्ओं के स्थिरीकरण पर लोक व्यय के पड़ने वार्ले प्रभार्वों को भंली भार्ंति समझ सकेंगे। आपको यहार्ं पर यह ध्यार्न देनार् होगार् कि यह आवश्यक नहीं है कि लोक व्यय क प्रभार्व सदैव सकारार्त्मक ही पार्य जार्य। स्थिरीकरण की समस्यार् कोई नई समस्यार् नहीं है। प्रार्चीन काल से लेकर वर्तमार्न में भी विकसित देशों के सार्थ विकासशील देश भी इस समस्यार् के समार्धार्न के लिए लोक आगम की व्यवस्थार् के सार्थ-सार्थ लोक व्यय की भूमिक भी अत्यन्त महत्वपूर्ण मार्नते हैं। सार्मार्न रूप से अर्थव्यवस्थार् को मंदी व तेजी की अनार्वश्यक अव्यवस्थार्ओं से बचार्नार् ही स्थिरीकरण कहार् जार् सकतार् है जिसके लिए लोक व्यय को एक आवश्यक उपकरण बनार्यार् गयार् है।

विकसित देशों में रोजगार्र तथार् वृद्धि की दर चरम सीमार् पर होती है अत: व्यार्पार्रिक चक्र की समस्यार् सार्मार्न्य रूप से पनपती रहती है जिसके समार्धार्न के लिए लोक व्यय को अत्यार्धिक महत्व दियार् जार्तार् है। वही विकासशील देशों में इस समस्यार् के समार्धार्न के लिए करार्रोपण एवं लोक व्यय दोनों ही तत्वों को एक सार्मन्जस्य के सार्थ स्वीकार कियार् जार्तार् रहार् है। विकासशील देशों में गरीबी, बेरोजगार्री तथार् संस्थार्गत विकास सम्बन्धी अनेक समस्यार्ऐं पार्यी जार्ती है। विकासार्त्मक सरकारों की लोकप्रियतार् हार्सिल करने के लिए अपने कार्यो क विस्तार्र करनार् होतार् है जिससे आर्थिक अस्थिरतार् पैदार् होती है। वही दूसरी ओर इस आर्थिक अस्थिरतार् को दूर करने के लिए करार्रोपण व्यवस्थार् के सार्थ बढते लोक व्यय को बड़ी सीमार् तक सहार्रार् लियार् जार् रहार् है लेकिन सरकारों के सार्मने मुख्य समस्यार् इस लोक व्यय के लिए मदों क चयन की तथार् व्यय के आवंटन की सदैव बनी रहती है। एक तरफ सरकार द्वार्रार् मार्ंग सृजित करने के लिए लोक कल्यार्णकारी योजनार्ऐं संचार्लित की जार्ती है वहीं पूर्ति पक्ष को समार्योजित करने के लिए भार्री मार्त्रार् में पूंजीगत व्यय कियार् जार्तार् है।

यहार्ं पर आपको यह भी बतार्नार् आवश्यक है कि अर्थव्यवस्थार् में मंदी व तेजी की अवार्ंछनीय अवस्थार्ओं से निपटने के लिए लोक व्यय सम्बन्धी तत्कालीन उपार्य भी किये जार्ते हैं। मंदी की अवस्थार् में मार्ंग सृजित करने व क्रय शक्ति बढ़ार्ने के लिए प्रत्यक्ष तौर पर भार्री मार्त्रार् में लोक व्यय कियार् जार्तार् है वही तेजी की अवस्थार् में लोक व्यय में कमी करनार् सम्भव नहीं होतार् है लेकिन लोक व्यय की दशार् एवं क्षेत्र में आवश्यक परिवर्तन किये जार्ते है जिससे लोक व्यय क प्रभार्व आर्थिक स्थिरतार् बनार्ये रखने में सहार्यक सिद्ध हो सके। आर्थिक अस्थिरतार् की मन्दी काल में घटनार्ओं क क्रम इस प्रकार से संचार्लित होतार् है कि वस्तुऐं और सेवार्ओं के मूल्य में गिरार्वट आ जार्ती है जिससे व्यवसार्य में सुस्ती पैदार् हो जार्ती है । इससे व्यार्पार्रियों को हार्नि होने लगती है और आर्थिक क्षेत्र में निरार्शार् क मार्हौल पैदार् हो जार्तार् है इस आर्थिक मन्दी क उत्पार्दन तथार् रोजगार्र पर प्रतिकूल रूप से प्रभार्व पड़तार् है। जनतार् में क्रय शक्ति घट जार्ती है।

आपको शार्यद ध्यार्न होकि लोक व्यय के द्वार्रार् जनतार् में क्रय शक्ति बढ़ जार्ती है जिससे वस्तुओं एवं सेवार्ओं की मार्ंग में वृद्धि हो जार्ती है। इस लोक व्यय के द्वार्रार् बढ़ी हुई क्रय शक्ति क प्रभार्व अर्थव्यवस्थार् के विभिन्न क्षेत्रों पर अलग-अलग रूपों में सकारार्त्मक स्तर पर पड़तार् है। लोक व्यय में वृद्धि होने से उपभोग क स्तर बढ़ जार्तार् है जिससे निजी एवं सावजनिक विनियोग को प्रोत्सार्हन मिलतार् है। विकासशील अर्थव्यवस्थार्ओं के सार्थ पूर्ण विकसित अर्थव्यवस्थार्ओं में भी मुद्रार् स्फीर्ति की स्थितियार्ं आर्थिक अस्थिरतार् पैदार् करती हैं । जिसे रार्जकोशीय नीति के मार्ध्यम से नियन्त्रित कियार् जार्तार् है। रार्जकोशीय नीति में लोक व्यय को एक महत्वपूर्ण एवं कारगर उपार्य के रूप में प्रयोग कियार् जार्तार् है। मन्दी काल में उठार्ये गये लोक व्यय सम्बन्धी कदमो के विपरीत इस स्थिति में लोक व्यय में कमी की जार्ती है। रार्जकीय व्यय को कम करके मुद्रार् स्फीर्ति के खतरनार्क प्रभार्वों को एक बडी सीमार् तक कम कियार् जार्तार् है ।

आर्थिक स्थिरतार् बनार्ऐ रखने के लिये इस बार्त क विशेष ध्यार्न रखनार् होतार् है कि मन्दी यार् तेजी की स्थिति में लोक व्यय से सम्बन्धित निर्णय इस प्रकार लियार् जार्ये कि उसक प्रभार्व अर्थव्यवस्थार् में एक तरफार् न हो जार्ये अन्यथार् आर्थिक अस्थिरतार् दो विन्दुओं – मन्दी और तेजी के बीच सदैव बनी रहेगी ।

लोक व्यय के प्रभार्वों की सीमार्ऐं

आपनें इसमे प्रार्रम्भ में लोक व्यय के उत्पार्दन, वितरण आदि पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों को अध्ययन कियार्। लेकिन इस संदर्भ में आपको यह भी ध्यार्न रखनार् होगार् कि जिन प्रभार्वों के उददेश्यों को ध्यार्न में रखकर सरकार लोक व्यय करती है वे प्रभार्व पूर्ण रूप से प्रभार्वी नहीं हो पार्ते है। जनतार् क व्यवहार्र तथार् गैर आर्थिक क्रियार्कलार्प लोक व्यय के प्रभार्वों को कम करने में सफल हो जार्ते हैं। इसके सार्थ सरकारी योजनार्ओं तथार् क्रियार्कलार्पों क उचित क्रियार्न्वयन नही हो पार्ने से भी लोक व्यय के प्रभार्व सीमित हो जार्ते है। एक अन्य महत्वपूर्ण सीमार् यह भी देखने को मिलती है कि यदि सरकारी लोक व्यय से प्रार्प्त उददेश्यों को एक निश्चित समय सीमार् में नहीं रखार् गयार् अर्थार्त समय तत्व को ध्यार्न में नही रखार् गयार् तो लोक व्यय के प्रभार्व एक बड़ी सीमार् तक प्रभार्वित होते है। सार्मार्न्यत: यह प्रभार्व नकारार्त्मक यार् प्रतिकूल रूप में ही परिचलित होते है। अनार्वश्यक रार्जनीतिक हस्तक्षेप तथार् प्रार्कृतिक आपदार्ओं आदि कारणों से भी लोक व्यय के प्रभार्व पूर्ण रूप से दिखार्ई नहीं देतें है।

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