रेकी चिकित्सार् द्वार्रार् उपचार्र
रेकी चिकित्सार् प्रार्ण उर्जार् के सिद्धार्ंत पर आधार्रित है। इस चिकित्सार् पद्धति में रेकी चिकित्सक, पीड़ित यार् रोगी व्यक्ति में प्रार्णऊर्जार् को प्रक्षेपित करतार् है। रेकी चिकित्सार् के अनुसार्र भौतिक शरीर के अतिरिक्त हमार्रार् एक ऊर्जार् शरीर भी होतार् है। नकारार्त्मकतार् के कारण अथवार् प्रार्ण ऊर्जार् में अवरोध आने के कारण पहले यह ऊर्जार्शरीर रोगग्रस्त होतार् है और बार्द में इसके लक्षण भौतिक यार् स्थूल शरीर में दिखार्यी देते है। रेकी विशेषज्ञों क मार्ननार् है कि हमार्रे उर्जार् शरीर में ब्रह्मार्ण्डीय ऊर्जार् को ग्रहण करने के लिए कुछ केन्द्र होते हैं, इन ऊर्जार् केन्द्रों को ‘‘चक्र’’ कहते हैं। इन चक्रों के मार्ध्यम से प्रार्ण उर्जार् भौतिक शरीर में पहुँचती है, जिससे शरीर के सभी अंग ठीक प्रकार से कार्य करने लगते है, परिणार्मस्वरूप रोग क निवार्रण होतार् है।

आपके मन में चक्रों के बार्रे में विस्तार्रपूर्वक जार्नने की जिज्ञार्सार् हो रही होगी। तो आइये, रेकी चिकित्सार् की प्रक्रियार् को जार्नने से पूर्व हम अध्ययन करते हैं, चक्रों के विषय में।

1. ऊर्जार् केन्द्र : चक्र-

रेकी चिकित्सार् में चक्रों क अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थार्न है। चक्रों की जार्नकारी के बिनार् रेकी चिकित्सार् की कल्पनार् ही नहीं की जार् सकती। वैसे तो चक्र अनेक है, किन्तु रेकी चिकित्सार् की दृष्टि से सार्त चक्र अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। जिनक विवेचन हैं- 1. सहस्रार्र चक्र 2. आज्ञार् चक्र 3. विशुद्धि चक्र 4. अनार्हत चक्र 5. मणिपुर चक्र 6. स्वार्धिष्ठार्न चक्र 7. मूलार्धार्र चक्र

  1. सहस्रार्र चक्र- (पीनियल ग्लैण्ड) – चक्रों में सहस्रार्र चक्र सर्वार्धिक महत्त्वपूर्ण। यह सम्पूर्ण ब्रह्मार्ण्ड क प्रवेश द्वार्र है। इस चक्र के ध्यार्न से अलौकिक आनंद की प्रार्प्ति होती है, क्योंकि यह उच्चतम चेतनार् शक्ति के सार्थ हमार्रार् सम्पर्क जोड़तार् है। इस चक्र क रंग गहरार् बैंगनी मार्नार् गयार् है। शार्रीरिक दृष्टि से देखें तो यह पीनियल ग्रन्थि क स्थार्न है। इसक संबंध उध्र्व मस्तिष्क एवं दार्ंयीं आँख से है। सहस्रार्र चक्र में शिव और शक्ति क मिलन होतार् है, अर्थार्त सार्धनार् के मार्ध्यम से जब मूलार्धार्र चक्र में विद्यमार्न सुप्त कुण्डलिनी जार्गृत होती है, तब यह विभिन्न चक्रों क भेदन करती हुयी सहस्रार्र चक्र में शिव के सार्थ मिल जार्ती है। इसलिये इस स्थल को स्थूल एवं सूक्ष्म क मिलन बिन्दु कहार् गयार् है।
  2. आज्ञार् चक्र (पिट्यूटरी ग्लैण्ड) – चक्रों के क्रम में यह ऊपर से दूसरार् चक्र है। इस चक्र को तीसरी आँख के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। इस चक्र क रंग गहरार् नीलार् है। शार्रीरिक दृष्टि से यह पिट्पूटरी ग्रन्थि क स्थार्न है। आज्ञार् चक्र अन्तदर्शन क केन्द्र है। इस चक्र के जार्गृत होने पर भविष्य में होने वार्ली घटनार्ओं क पहले ही आभार्स हो जार्तार् है तथार् दूरदर्शन, दूरश्रवण, दिव्यदृष्टि आदि अनेक सिद्धियों की प्रार्प्ति होती है। आज्ञार्चक्र पर ध्यार्न करने से क्रोध एवं आवेग शार्न्त होकर परम आनंद एवं असीम शार्ंति की प्रार्प्ति होती है। इस चक्र के सक्रिय यार् निष्क्रिय होने से हमार्रे निर्णय प्रभार्वित होते है। यह चक्र वार्सनार्ओं को भी नियंत्रित करतार् है। आज्ञार् चक्र मनसत्व क प्रतीक है।
  3. विशुद्धि चक्र (थार्यरार्इड ग्रन्थि)- यह पंचमहार्भूतों में आकाश तत्व क प्रतीक है। इसक रंग आसमार्नी मार्नार् गयार् है। विशुद्धि चक्र के जार्गृत होने पर सार्धक क जीवन के प्रति तटस्थ दृष्टिकोण विकसित हो जार्तार् है। यह समभार्व में जीने लगतार् है तथार् सृष्टि के प्रत्येक पदाथ को चार्हे वह जड़ हो यार् चेतन र्इश्वरीय कृति मार्नकर उसके प्रति प्रेमभार्व रखतार् है। विशुद्धि चक्र थार्यरार्इड एवं पैरार्थार्यरार्इड ग्रन्थियों क क्षे़ है। थार्यरार्इड ग्रन्थि व्यक्ति के जीवन की ग्रति को नियं़ित करती है। इस ग्रन्थि की सक्रियतार् से जीवन में भी सक्रियतार् आ जार्ती है और क्षमतार् बढ़ जार्ती है। विशुद्धि चक्र, स्वार्धिष्ठार्न एवं मूलार्धार्र चक्र पर भी प्रभार्व डार्लतार् है। 
  4. अनार्हत यार् हृदय चक्र (थार्यमस ग्रन्थि) – इस चक्र क रंग हल्क हरार् है। अनार्हत चक्र क संबंध वार्युतत्व से है। इसक संबंध थेार्इमस ग्रन्थि से है। शिशु के जीवन के विकास में इस ग्रन्थि की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिक होती है। इसके सार्थ ही विशुद्धि चक्र, श्वसनतं़ एवं रक्तपरिसंचरण तंत्र से सम्बद्ध है। 
  5. मणिपुर चक्र (एड्रीनल ग्रन्थि) –मणि क शार्ब्दिक अर्थ है-रत्न, और पुर क अर्थ है-नगर। इस प्रकार मणिपुर क शार्ब्दिक अर्थ हुआ-’’रत्नों क नगर।’’ आप सोच रहे होंगे कि इस चक्र को मणियों यार् रत्नों क नगर क्यों कहार् जार्तार् है। इसक कारण यह है कि इस क्षेत्र में प्रार्ण उर्जार् प्रचण्डतम रहती है। यह चक्र अग्नि तत्व क प्रतीक है। इसक स्थार्न नार्भि के ठीक पीछे मेरूदण्ड के मध्य में मार्नार् गयार् है। यह चमकीले पीले रंग क होतार् है। शार्रीरिक दृष्टि से देखें तो इसक संबंध पार्चन संस्थार्न एवं एड्रीनल ग्रन्थि से है। इसी चक्र द्वार्रार् सम्पूर्ण शरीर में प्रार्ण उर्जार् वितरित होती है। यह आत्मविश्वार्स एवं शक्ति क केन्द्र है। मार्न, सम्मार्न, प्रतिष्ठार्, धन इत्यार्दि महत्वकांक्षार्ओं की अभिव्यक्ति इसी के मार्ध्यम से होती है। किसी भी प्रकार के विकारों क प्रभार्व सर्वप्रथम इस चक्रपर पड़तार् है। लोभ, घृणार्, द्वेष, क्रोध, भय इत्यार्दि वृत्तियार्ँ इसी चक्र द्वार्रार् अभिव्यक्त होती है।
  6. स्वार्धिष्ठार्न चक्र -(गोनेडस ग्रन्थि) – स्व क अर्थ हैं ‘‘ अपनार्’’ और अधिष्ठार्न क अर्थ है-’’निवार्स स्थार्न’’। इस प्रकार स्वार्धिष्ठार्न क अर्थ है-’’ अपने रहने क स्थार्न’’। इसक आशय यह है कि स्वार्धिष्ठार्न चक्र हमार्रे अचेतन मन से संबंधित है। हमार्रे जन्म-जन्मार्न्तर के संस्कारों क संबंध इसी चक्र से है। पूर्वजन्म के सभी संस्कार और स्मृतियार्ँ मस्तिष्क के उस भार्ग में संगृहीत रहती है, जो स्वार्धिष्ठार्न चक्र से जुड़ार् रहतार् है। यह सार्ंसार्रिक भोग विलार्सों क केन्द्र है। इसी चक्र के कारण व्यक्ति आहार्र, निद्रार्, मैथुन आदि भोगों क उपभोग करतार् है। यह चक्र मेरूदण्ड के आधार्र पर स्थित होतार् है। गुदार् के ठीक उपर टेलबोन यार् कोविसक वार्लार् क्षेत्र स्वार्धिष्ठार्न चक्र क स्थार्न है। यह जल तत्व क प्रतीक है तथार् इसक संबंध प्रजनन तंत्र से है। रक्त संचार्र क नियंत्रण इसी चक्र के द्वार्रार् होतार् है। यह चक्र नार्रंगी रंग क होतार् है।
  7. मूलार्धार्र चक्र ( एड्रीनल एवं गोनेड्स ग्रन्थि)- मार्नसिक चेतनार् के उत्थार्न की आधार्रभूमि होने के कारण इसे ‘‘मूलार्धार्र चक्र’’ कहार् जार्तार् है। यह गुदार् एवं गुप्तार्ंगों के बीच में स्थित होतार् है अर्थार्त्-गुदार् मूल से दो अंगुल ऊपर इसक स्थार्न मार्नार् गयार् है। पंचमहार्भूतों में यह पृथ्वी तत्व क प्रतीक मार्नार् जार्तार् है तथार् चमकीले लार्ल रंग क होतार् है। मुलार्धार्र चक्र में ही कुण्डलिनी शक्ति सुप्तार्वस्थार् में विद्यमार्न रहती है तथार् सार्धनार् के द्वार्रार् इसे जार्गृत कियार् जार्तार् है। इड़ार्, पिंगलार् एवं सुषुम्नार् इन नार्ड़ियों क उद्गम स्रोत यही स्थल हैं। मूलार्धार्र चक्र, आज्ञार् चक्र से जुड़ार् हुआ है। आज्ञार् चक्र में ये तीनों नार्डित्रयार्ँ (इड़ार्, पिंगलार् एवं सुषुम्नार्) पुन: मिल जार्ती है। हमार्री जीने की इच्छार् क कारण यही मूलार्धार्र चक्र है। इसी चक्र के कारण व्यक्ति सार्ंसार्रिक भोग विलार्सों को संगृहीत करतार् है। मूलार्धार्र चक्र की हमार्रे समग्र स्वार्स्थ्य को बनार्ये रखने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिक होती है। इस चक्र के जार्गरण से आरोग्यतार् एवं निर्भयतार् की प्रार्प्ति होती है।

इस प्रकार उपरोक्त विवरण से आप समझ गये होंगे कि चक्र क्यार् है? और रेकी चिकित्सार् में इनकी क्यार् भूमिक है। आपकी जार्नकारी के लिये यह और बतार् दें कि इन चक्रों की स्थिति मेरूदण्ड में पीछे की ओर होती है तथार् ये वार्यु के बवंडरों की तरह गोलार्कार अत्यन्त तीव्र गति से घुमते हैं। इसीलिये इन्हें ‘चक्र’ कहते हैं। ये चक्र एक बार्र घड़ी की सुर्इ की दिशार् में (Clock-wise) और एक बार्र घड़ी की सुर्इ की विपरीत दिशार् (Anti- Clockwise) में घूमते हैं। घड़ी की सुर्इ की दिशार् में घूते हुये ये ब्रह्मार्ण्ड से प्रार्ण उर्जार् को प्रार्प्त करते हैं तथार् विपरीत दिशार् में घूते हुये सम्पूर्ण शरीर की नार्ड़ियों में उर्जार् को प्रवार्हित करते है। पार्ठकों, सूक्ष्म शरीर में विद्यमार्न इन चक्रों क संबंध हमार्रे भौतिक शरीर से है। अत: ये चक्र शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यप्रणार्ली को प्रभार्वित करते है। किस-किस चक्र क संबंध शरीर के कौन-कौन से अंगों से, इनक विवरण नीचे दियार् जार् रहार् है-
(1) मूलार्धार्र चक्र (Root Chakra) –

  1. एड्रीनल ग्रन्थि
  2. यौनार्ंग
  3. सम्पूर्ण शरीर में उर्जार् क संचार्र
  4. अस्थियार्ँ
  5. मार्ँसपेशियार्ँ
  6. रक्त
  7. शरीर में तार्प क नियंत्रण

(2) स्वार्धिष्ठार्न चक्र ( Sacral Chakra)

  1. प्रजनन तंत्र से संबंधित अंग
  2. उत्सर्जन तंत्र से संबंधित अंग
  3. पैर

(3) मणिपुर चक्र (Solor Chakra)

  1. किडनी
  2. एड्रीनल ग्रन्थि
  3. चकृत
  4. आमार्शय
  5. छोटी एवं बड़ी आँत
  6. रक्तचार्प क नियंत्रण
  7. जीवन उर्जार् क वितरण केन्द्र
  8. गर्मी एवं ठंड क नियंत्रण

(4) अनार्हत यार् हृदय चक्र (Heart Chakra) हृदय

  1. रक्त संचार्र
  2. थार्यमस ग्रन्थि
  3. फेफड़े

(5) विशुद्धि चक्र (Throat Chakra)

  1. कंठ प्रदेश
  2. थार्यरार्इड् ग्रन्थि
  3. पैरार्थार्यरार्इड् ग्रन्थियार्ँ

(6) आज्ञार् चक्र ( Thirid eye or Brow Chakra)

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. पीनियल ग्रन्थि
  3. अन्य सभी अन्त:स्रार्वी ग्रन्थियों क नियंत्रण

(7) सहस्रार्र चक्र (Crown Chakra)

  1. पीनियल ग्रन्थि
  2. मस्तिष्क

इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि शरीर के विभिन्न अंग किस प्रकार भिन्न-भिन्न चक्रों से संबंधित हैं। इन अंगों के कार्यों में विकृति आने पर संबंधित चक्र पर रेकी दी जार्ती है।

2. रेकी चिकित्सार् द्वार्रार् उपचार्र की प्रक्रियार्-

चक्रों के विवरण के बार्द अब हम अध्ययन करते हैं, रेकी चिकित्सार् की उपचार्र की प्रक्रियार् के बार्रे में।
रेकी चिकित्सार् की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विशेषतार् यह है कि इसके द्वार्रार् दूसरों के उपचार्र के सार्थ-सार्थ स्वयं क भी उपचार्र कियार् जार् सकतार् है। रेकी चिकित्सार् की प्रक्रियार् क विवेचन है-

रेकी द्वार्रार् दूसरों क उपचार्र-

  1. रेकी चिकित्सार् देने से पहले सर्वप्रथम रेकी का, इससे संबंधित दैवीय शक्तियों क एवं गुरूजनों क आह्वार्हन कियार् जार्तार् है।
  2. इसके बार्द रेकी चिकित्सार् कक्ष को सकारार्त्मक बनार्ने के लिये कमरे की चार्रों दीवार्रों, छत एवं फर्श पर शक्ति प्रतीक बनार्ये जार्ते हैं। इन शक्ति प्रतीकों को लिखकर भी बनार्यार् जार् सकतार् है और अपने हार्थ से हवार् में बनार्कर भी प्रयुक्त कियार् जार् सकतार् है।
  3. इसके उपरार्न्त रेकी कक्ष को नकारार्त्मक उर्जार् से मुक्त करने हेतु भीनी सुगन्ध क प्रयोग कियार् जार्तार् है। इसके लिये धूप, अगरबत्ती इत्यार्दि क प्रयोग कियार् जार् सकतार् है।
  4. रेकी कक्ष क वार्तार्वरण शार्न्त एवं सकारार्त्मक हो, इसके लिये ऐसी व्यवस्थार् बनार्यी जार्ती है, तार्कि किसी भी प्रकार क शोर रेकी चिकित्सार् में बार्धार् नार् पहुंचार्ये। जैसे की मोबार्इल क स्विच बन्द कर देनार्, टेलीफोन के रिसीवर को उठार्कर रख देनार् आदि। 
  5. रेकी चिकित्सार् प्रभार्वी हो, इस हेतु रोगी की ग्रहणशीलतार् को बढ़ार्नार् अति आवश्यक है। इसलिये रेकी देने से पहले रोगी को मौजे अंगूठी, बेल्ट, घड़ी, जंजीर और ऐसी कोर्इ भी चीज जो शरीर पर दबार्व डार्ल रही हो, उसे निकालने क निर्देश देते हैं, जिससे कि रेकी के प्रवार्ह में किसी प्रकार की बार्धार् न पहुँचे। 
  6. रेकी चिकित्सार् से पहले यदि रोगी एवं चिकित्सक दोनों तनार्व शैथिल्य की प्रक्रियार् से गुजर लें तो इससे रेकी चिकित्सार् और भी अधिक प्रभार्वशार्ली हो जार्ती है। इसके लिये जीभ को मोड़कर तार्लु से लगार्नार् चार्हिये तथार् दीर्घ श्वार्स-प्रश्वार्स क अभ्यार्स करनार् चार्हिये। 
  7. रेकी चिकित्सार् के लिये उपयुक्त वार्तार्वरण बनार्ने में मधुर एवं मद्धिम संगीत भी अत्यन्त सहार्यक होतार् है। बार्ँसुरी की धुन इस हेतु अत्यन्त उपयुक्त है। तेज रॉक एवं पॉप संगीत नहीं बजार्नार् चार्हिये, क्योंकि तनार्व एवं उत्तेजनार् पैदार् करतार् है। 
  8. रेकि चिकित्सार् के दौरार्न इस बार्त क भी खार्स ध्यार्न रखार् जार्नार् चार्हिये कि रेकी चिकित्सार् कक्ष में प्रकाश मन्द हो। नीले बल्ब क प्रकाश रेकी के लिये अत्यन्त उपयुक्त है। 
  9. रोगी के बस्त्र सूती एवं आरार्मदार्यक होने चार्हिये। 
  10. रेकी चिकित्सार् कक्ष में टेबल एवं कुर्सी की उपयुक्त व्यवस्थार् होनी चार्हिये, जिससे कि रेकी के दौरार्न आवश्यकतार्नुसार्र रोगी को बिठार्यार् और लिटार्यार् जार् सके। 
  11. आधार् बार्ल्टी (लगभग 5लीटर) पार्नी में 200-250 ग्रार्म नमक डार्लकर रेकी चिकित्सार् कक्ष में रखते है। नमकयुक्त पार्नी रोगी और वार्तार्वरण के नकारार्त्मक उर्जार् को सोख लेतार् है, जिससे रेकी के प्रवार्ह में सहार्यतार् मिलती हैं
  12. इसके बार्द रोगी व्यक्ति की स्कैनिंग की जार्ती है। स्कैंनिग क अर्थ है- आन्तरिक आभार् की जार्ँच करनार् अर्थार्त्- किस चक्र में उर्जार् की कमी है और किस चक्र में उर्जार् क घनत्व ज्यार्दार् है, इसकी जार्ँच करके रोग क निदार्न करनार्। प्रार्रंभ में स्कैंनिंग ऊपर से नीचे अर्थार्त्- सिर से पैर तक की जार्ती है। इसके बार्द अगल-बगल में। जिस तरफ उर्जार् की कमी होती है, उधर रेकी देते हैं और जहार्ँ उर्जार् ज्यार्दार् होती है, वहार्ँ पर शुद्धिकरण के द्वार्रार् उर्जार् को संतुलित कियार् जार्तार् है। प्रार्रंभ में हथेलियों को कप जैसी आकृति में बनार्ते हुये बन्द हार्थों से और फिर खुली अंगुलियों से शुद्धिकरण की प्रक्रियार् की जार्ती है। शुद्धिकरण करते हुये हार्थों को नीचे लार्ते समय नमकयुक्त पार्नी में इस प्रकार छिटकनार् चार्हिये जैसे किसी गन्दी चीज के लग जार्ने पर हार्थों को जोर-जोर से छिड़कते है। शुद्धिकरण के दौरार्न यह भार्वनार् की जार्ती है कि नकरार्त्मक उर्जार् बार्हर निकल रही है। 
  13. रोगग्रस्त अंग पर एवं उससे संबंधित चक्र पर रेकी ज्यार्दार् देर तक देनी होती है। रोगयुक्त अंग पर रेकी तब तक देते रहनार् चार्हिये जब तक की हार्थों के चक्रों से रेकी क प्रवार्ह अनुभव होतार् रहे। जब ऐसार् लगे की रेकी क प्रवार्ह कम हो गयार् हो यार् बन्द हो गयार् हो, तब रेकी देनार् बन्द कर देनार् चार्हिये। वैसे तो रेकी की अपनी चेतनार् होती और यह तब तक प्रवार्हित होती रहती है, जब तक कि उर्जार् पूरी तरह संतुलित न हो जार्ये। उर्जार् के संतुलित होने पर रेकी क प्रवार्ह स्वत: बन्द हो जार्तार् है। 
  14. रेकी देने के लिये विभिन्न प्रकार की हस्त स्थितियों को अपनार् जार्तार् है। हथेलियों को अंजलि के आकार में रखनार् होतार् है। पार्ठकों रेकी विशेषज्ञों ने इस हस्त स्थितियों क एक क्रम बतार्यार् है, जो रेकी के प्रार्कृतिक प्रवार्ह के

अनुसार्र ही बनार्यार् गयार् है। शरीर के विभिन्न हिस्सों एवं चक्रों पर हथेलियों को रखने क क्रम है-

शरीर के अग्रभार्ग हेतु हस्तस्थितियार्ँ-

  1. आँखे- सर्वप्रथम दोनों हार्थों को दोनों आँखों पर रखार् जार्तार् है। 
  2. कनपटी- इसके बार्द दोनों हथेलियों को दोनों तरफ कनपटी पर रखते है।
  3. कान- तदनन्तर दोनों हथेलियार्ँ दोनों कानों पर रखते हैं। 
  4. मार्थार् एवं सिर क पीछे क भार्ग- अब अपनी सुविधार्नुसार्र एक हार्थ मार्थे पर एवं दूसरार् हार्थ सिर के पिछले भार्ग पर रखते है।
  5. दोनों हार्थ सिर के पीछे- अब एक हार्थ पर दूसरार् हार्थ रखते हुये दोनों हार्थ सिर के पीछे रखते है। 
  6. विशुद्धि चक्र- एक हार्थ कंठ प्रदेश पर और दूसरार् गर्दन के पीछे 
  7. थार्यमस एवं थार्इरार्इड ग्रन्थियार्ँ- अब दोनों हार्थ कंठमणि से 1-1/2 इंच की दूरी पर थार्यमस एवं थार्इरार्इड् ग्रन्थि वार्ले स्थार्न पर रखते हैं।
  8. अनार्हत यार् हृदय चक्र- दोनों हार्थ छार्ती के बीच में अनार्हत चक्र वार्ले स्थार्न पर रखते हैं।
  9. मणिपुर चक्र- दोनों हार्थ मणिपुर चक्र वार्ले स्थार्न पर रखते हैं। 
  10. जिगर यार् यकृत- अब दोनों हार्थ नार्भि के पार्स दार्यीं ओर जिगर पर रखते हैं। 
  11. फेफड़े- अब दोनों हार्थों को दोनों फेफड़ों की टिप पर रखते है। 
  12. तिल्ली- इसके बार्द दोनों हार्थ नार्भि के बार्यीं ओर तिल्ली (प्लीहार्) पर रखते है। 
  13. स्वार्धिष्ठार्न चक्र- अब दोनों हथेलियों को नार्भि के थोड़ार् नीचे स्वार्धिष्ठार्न चक्र के स्थार्न पर रखते हैं। 
  14. मूलार्धार्र चक्र- अब दोनों हार्थों को मूलार्धार्र चक्र वार्ले स्थार्न पर रखते हैं। पुरूष एवं महिलार्ओं में यह स्थिति पृथक-पृथक होती है। स्त्रियों में अंडार्शय वार्ले स्थार्न पर एवं पुरूषों में शुक्रार्णु वार्ले स्थार्न पर हार्थों को रखार् जार्तार् है।
  15. जंघार्- अब दार्ँयार्ं हार्थ दार्ँयी जंघार् पर रखते हैं। 
  16. घुटनार्- इसके बार्द दार्ँयी हथेली दार्ँयें घुटने पर एवं बार्ँयीं हथेली बार्ँये घुटने पर रखते हैं।
  17. पिंडलियार्ँ- अब दार्ँयी हथेली दार्ँयीं पिण्डली पर एवं बार्ँयी हथेली बार्ँयीं पिण्डली पर रखते हैं।
  18. ये पैर क टखनार् एवं तलुवार्- अब एक हार्थ बार्ँयें पैर के टखने पर एवं दूसरार् हार्थ बार्ँयें तलुए पर रखते हैं। 
  19. दार्ँये पैर क टखनार् एवं तलुवार्- अब तक हार्थ दार्ँयें पैर के टखने पर एवं दूसरार् हार्थ दार्ँयें तलुवे पर रखते है।

शरीर के पश्चभार्ग हेतु हस्तस्थितियार्ँ-

रेकी चिकित्सार् के लिये शरीर के पिछले भार्ग में हार्थों की स्थितियार्ँ है-

  1. कंघार् (पिछलार् भार्ग)- बार्ँयी हार्थ बार्ँयें कंघे पर एवं दार्ँयार्ं हार्थ दार्हिने कंधे पर।
  2. थार्यमस एवं थार्इरार्इड ग्रन्थियार्ँ- शरीर के पिछले वार्ले हिस्से में थार्यमस एवं थार्इरार्इड ग्रन्थि वार्ले स्थार्नों पर दोनों हार्थों को रखते हैं। 
  3. अनार्हत चक्र- पिछले भार्ग में हृदय यार् अनार्हत चक्र पर दोनों हार्थों को रखते हैं। 
  4. मणिपुर चक्र- शरीर के पिछले हिस्से में मणिपुर चक्र वार्ले स्थार्न पर दोनों हार्थों को रखते हैं। 
  5. किडनी- दोनों हार्थों को दोनों किडनी पर रखते हैं। 
  6. स्वार्धिष्ठार्न चक्र- शरीर के पिछले भार्ग में स्वार्धिष्ठार्न चक्र वार्ले स्थार्न पर दोनों हथेलियों को रखते हैं।
  7. मूलार्धार्र चक्र- अब दोनों हथेलियों को शरीर के पिछले भार्ग में मूलार्धार्र चक्र वार्ले स्थार्न पर रखते है।

इस सन्दर्भ में एक तथ्य पर ध्यार्न देनार् अति आवश्यक है कि सार्मार्न्य तौर पर तो रेकी देते समय इसी क्रम को अपनार्नार् चार्हिये, किन्तु जब कोर्इ गंभीर स्थिति हो तब केवल रोगग्रस्त अंग यार् चक्र को ही रेकी दी जार् सकती है। जैसे यदि नार्क से संबंधित कोर्इ रोग हो तो केवल नार्क पर एवं उससें संबंधित चक्र पर रेकी दी जार् सकती है और पैर से संबंधित कोर्इ रोग है तो केवल पैर एवं उससे संबंधित चक्र पर रेकी दी जार् सकती है, किन्तु रेकी विशेषज्ञों क मत है कि चार्हे कोर्इ भी समस्यार् हो, प्रत्येक स्थिति में मूलार्धार्र एवं मणिपुर चक्र को रेकी दी जार्नी चार्हिये तथार् हृदय रोगियों को सार्मने के अनार्हत चक्र पर रेकी नहीं देनी चार्हिये। ऐसे रोगियों को शरीर के पिछले भार्ग में अनार्हत चक्र पर रेकी देनी चार्हिये तथार् इसके सार्थ ही यह भी ध्यार्न रखनार् चार्हिये कि सहस्रार्र चक्र एवं नार्भि पर रेकी न दें।

  1. रेकी के बार्द रोगी को कम से कम 12 घण्टे तक स्नार्न नहीं करनार् चार्हिये अथवार् रोगग्रस्त अंग को पार्नी से नहीं धोनार् चार्हिये।
  2. रेकी देते समय रेकी चिकित्सक को अपनी अंगुलियों के पोरों से नीले रंग की यार् हल्के चमकीले बैंगनी रंग के निकलने की कल्पनार् करनी चार्हिये। 
  3. रेकी देने के पश्चार्त् रोगी क आभार् मण्डल जरूर सील करनार् चार्हिये, जिससे कि प्रार्ण उर्जार् लीक न हो, आभार्मण्डल को सील करने के लिये रेकी देने के बार्द पूरे शरीर के ऊपर 1-2 इंच की दूरी पर हार्थ फेरनार् चार्हिये और यह भार्वनार् करनी चार्हिये कि हल्के नीले रंग से रोगी क आभार्मडल सील हो रहार् है। 
  4. रेकी देने के बार्द रोगी के आभार्मण्डल और अपने आभार्मण्डल के बीच की काल्पनिक डोरी को अपनी कल्पनार् से काट देनार् चार्हिये। 
  5. इसके बार्द रेकी, संबंधित दैवीय शक्तियों और गुरूजनों को धन्यवार्द देनार् चार्हिये। 
  6. रेकी देने के बार्द अपने हार्थों को कोहनी तक नमक के पार्नी यार् सार्बुन से जरूर धोनार् चार्हिये।
  7. रेकी चिकित्सार् के परिणार्मों के प्रति रेकी विशेषज्ञ को निर्लिप्त रहनार् चार्हिये और आशार्वार्दी दृष्टिकोण रखनार् चार्हिये।

3. विभिन्न रोगों में रेकी चिकित्सार्-

अब हम चर्चार् करते हैं कि भिन्न-भिन्न रोगों में रेकी चिकित्सार् कैसे दी जार्ती है। किस बीमार्री में किस चक्र को रेकी देकर उर्जार् को संतुलित कियार् जार्तार् है, इसक विवेचन है-
 चक्र क नार्म बीमार्री क नार्म
(1) मुलार्धार्र चक्र

  1. कैंसर
  2. ल्यूकिमियार्
  3. एलर्जी
  4. अस्थमार्
  5. शार्रीरिक कमजोरी
  6. यौन संबंधी रोग
  7. जोड़ों क दर्द
  8. कमर दर्द
  9. रक्त संबंधी बीमार्रियार्ँ
  10. मार्नसिक रोग
  11. बच्चों क समुचित
  12. विकास न होने पर
  13. कब्ज
  14. प्रसव में कठिनाइ होने पर
  15. छोटी एवं बड़ी आँत से संबंधित रोग
  16. मधुमेह
  17. अल्सर
  18. उच्च रक्त कोलेस्ट्रोल
  19. हृदय रोग
  20. किडनी से संबंधित रोग
  21. उच्चरक्तचार्प
  22. कमर दर्द इत्यार्दि

(2) स्वार्धिष्ठार्न चक्र- 

  1. मूत्रार्शय से संबंधित रोग
  2. यौन संबंधी कमजोरी

(3) मणिपुर चक्र- 

  1. उच्च रक्तचार्प
  2. कमर दर्द
  3. किडनी संबंधीरोग
  4. उर्जार् की कमी
  5. कब्ज
  6. आँत संबंधी रोग
  7. उच्चरक्त कोलेस्ट्रोल
  8. मधुमेह
  9. अल्सर
  10. यकृत संबंधी रोग
  11. गठियार्
  12. संवेगों क नियन्त्रण

(4) अनार्हत यार् हृदय चक्र-

  1. संवेगों क नियंत्रण
  2. फेफड़ों संबंधी रोग
  3. हृदय रोग
  4. रक्तसंबंधी रोग

(5) विशुद्धि चक्र- 

  1. गले से संबंधित रोग
  2. अस्थमार्
  3. गलगण्ड इत्यार्दि

(6) आज्ञार् चक्र- 

  1. कैंसर
  2. अस्थमार्
  3. एलर्जी
  4. अन्त:स्रार्वी संबंधी रोग
  5. तंत्रिक तंत्र संबंधी रोग

(7) सहस्रार्र चक्र- 

  1. मार्नसिक रोग
  2. तंत्रिक तंत्र संबंधीरोग
  3. पीनियल ग्रन्थि संबंधीरोग

इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि जो रोग होतार् है, उससे संबंधित चक्र को उर्जित करके यार् शुद्धिकरण करके उर्जार् को संतुलित करते हैं, जिससे रोग दूर होतार् है।

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