रूस-जार्पार्न युद्ध (1905 र्इ.)

युद्ध के कारण

रूस की विस्तार्रवार्दी नीति

1894-95 र्इ. के चीन-जार्पार्न युद्ध में विजय के फलस्वरूप चीन के मार्मले में जार्पार्न की रूचि अत्यधिक बढ़ गर्इ। उधर चीन की निर्बलतार् क पद्रर्शन हुआ, जिसने पश्चिमी देशों को चीन की लूट-खसोट की और पे्ररित कियार्। इस कार्य में सबसे अधिक अगस्र र रूस थार्, जो किसी-न-किसी बहार्ने तीव्र गति से चीन में प्रसार्र पर तुलार् थार्। रूस की इस लोलुपतार् से जार्पार्न को बड़ी आशंक हुइ्र। ऐसी स्थिति में अपने नए मित्र ब्रिटेन की शक्ति और प्रतिष्ठार् से आश्वस्त होकर उसने रूस को चुनौती दी। रूस-जार्पार्न युद्ध इसी चुनौती क परिणार्म थार्। रूस और जार्पार्न के बीच कर्इ क्षेत्रों पर प्रभुत्व जमार्ने के लिए घोर तनार्तीन चल रही थी। इसमें मंचूरियार् और कोरियार् को लेकर दोनों में घोर मतभेद उत्पé हो गयार् थार् और इन्ही समस्यार्ओं के कारण दोनों के बीच युद्ध छिड़ार्।

मंचूरियार् क प्रश्न

सर्वप्रथम मंचूरियार् की समस्यार् ने रूस तथार् जपार्न में एक-दूसरे के प्रति घृणार् की भार्वनार् को जन्म दियार्, जिसक अंतिम परिणार्म युद्ध के रूप में हुआ। चीन क उत्तरी प्रदेश मंचूरियार् कहलार्तार् है। आर्थिक सार्धनों की दृष्टि से यह क्षत्रे बहुत संपé है। काये लार्, लोहार् और सोनार् यहार्ँ प्रचुर मार्त्रार् में मिलते हैं। ऐसे क्षेत्र पर प्रभुत्व स्थार्पन के लिए रूस और जार्पार्न के बीच संघर्ष होनार् स्वार्भार्विक थार्। रूस इस प्रदेश को अपने प्रभार्वक्षेत्र में लार्नार् चार्हतार् थार् और इसके लिए उसके पार्स कर्इ तरह की योजनार्एँ थीं। 1894 र्इ. के बार्द रूस ने चीन क पक्ष लियार् थार् और जार्पार्न पर प्रभार्व डार्लकर लियार्ओतुंग प्रदेश से जार्पार्नी अधिकार हटार्ने के लिए जार्पार्न को बार्ध्य कियार्। कुछ समय बार्द रूस और चीन में एक संधि हुर्इं इसके अनुसार्र रूस को मंचूरियार् में ब्लार्डीवोस्टोक तक एक हजार्र मील लंबी रेल-लार्इन बिछार्ने क अधिकार प्रार्प्त हुआ। पोर्ट आर्थर और उसके समीप क प्रदेश पच्चीस वर्ष के लिए रूस को पट्टे पर मिलार् और यहार्ँ रूसी सरकार अपने जंगी जहार्ज सुरक्षित रखने के लिए किलार्बंदी शुरू कर चुकी थी। पोर्ट आर्थर प्रशार्ंत महार्सार्गर में रूस क सबसे बड़ार् सैनिक अड्डार् बन चुक थार्, इस कारण इस क्षेत्र में रूस की शक्ति बहुत दृढ़ हो गर्इ थी। मंचूरियार् में रेलवे लार्इन के निर्मार्ण के लिए दो कंपनियों क संगठन कियार् गयार् थार्, जिन पर रूस क नियंत्रण थार्। इन कंपनियों के वित्तीय प्रबन्ध हेतु एक बैंक की स्थार्पनार् की गर्इ थी, उस पर भी रूस क ही नियंत्रण थार्। रेल लार्इनों के निर्मार्ण के लिए बहुत-से रूसी मंचूरियार् में आ रहे थे। इन लार्इनों की रक्षार् के लिए रूस की एक विशार्ल सेनार् भी इस प्रदेश में रहने लगी थी।

मंचूरियार् में रूस के बढ़ते प्रभार्व से जार्पार्न बहुत अधिक चिंतित हो रहार् थार्। वह नहीं चार्हतार् थार् कि इस क्षेत्र पर रूस क नियंत्रण स्थार्पित हो जार्ए। जार्पार्न स्वयं मंचूरियार् पर अपनार् अधिकार कायम करनार् चार्हतार् थार्। जार्पार्नी सार्म्रार्ज्य के विस्तार्र के लिए यह बड़ार् ही उपयुक्त स्थार्न थार्। चीन-जार्पार्न युद्ध के बार्द जार्पार्न के लियार्ओतुंग प्रदेश पर अपनार् जो अधिकार कायम कियार् थार्, उसके पीछे यही स्वाथ छिपार् हुआ थार्। लेकिन, रूस के विरोध के कारण जार्पार्न को शिमोनोसेकी की संधि में संशोधन स्वीकार कर इस क्षेत्र पर से अपनार् आधिपत्य उठार्नार् पड़ार् थार्। अतएव, रूस और जार्पार्न के बीच मंचूरियार् पर प्रभुत्व स्थार्पन की बार्त को लेकर युद्ध अवश्यंभार्वी प्रतीत हो रहार् थार्।

कोरियार् में रूस-जार्पार्न की मुठभेड़

रूस और जार्पार्न के संघर्ष क दूसरार् क्षेत्र कोरियार् थार्। चीन-जार्पार्न युद्ध के बार्द कोरियार् पर जार्पार्न क प्रभुत्व कायम हो सक थार्। लेकिन, रूस के हस्तक्षेप से जार्पार्न की प्रभुतार् बहुत हद तक सीमित हो गर्इ। फिर भी जार्पार्न ने अपने प्रयार्स जार्री रखे और कोरियार् पर अपनार् पूरार् नियंत्रण कायम करने की कोशिश में जुटार् रहार्। कोरियार् क रार्जार् जार्पार्नियों के इन प्रयार्सों क विरोध कर रहार् थार्। ऐसी परिस्थिति में जार्पार्नी सैनिकों ने रार्जमहल पर हमलार् कर दियार् लेकिन, रार्जार् भार्ग निकलार् और रूस की सेनार् ने उसे बचार् लियार्। इस पर जार्पार्न रूस से बड़ार् नार्रार्ज हुआ।

1902-03 इर्. में रूस ने कोरियार् में अपनी कार्यवार्ही और तेज कर दी। उसने यार्लू के मुहार्ने पर एक कोरियाइ बंदरगार्ह पर कब्जार् कर लियार्, उत्तरी कोरियार् के बंदरगार्हों से मचं ूि रयार् के सैनिक अड्डों तक सड़कें बनार् ली तथार् तार्र की लार्इनें डार्ल ली और सीओल से यार्हू तक रेल की पटरी बिछार्ने क ठेक लेने की कोशिश की। जार्पार्न ने इसक विरोध कियार् और जुलाइ, 1903 र्इ. में रूस से दूसरी संधि क प्रस्तार्व कियार्, जिसके अनुसार्र चीन और कोरियार् की प्रार्देशिक अखण्डतार् क आश्वार्सन तथार् रूस से उन्मुक्त द्वार्र की नीति पर चलने क वार्दार् मार्ँगार्। सार्थ ही, वह भी प्रस्तार्व कियार् गयार् कि उक्त संधि द्वार्रार् मंचूरियार् में रूस के हित तथार् कोरियार् में जार्पार्न के विशेष स्वाथों की रखार् की जार्ए। किंतु, रूस ने इन्हें को मार्नने से इनकार कर दियार्। यहबार्तचीत जनवरी, 1904 र्इ. तक चलती रही। 12 जनवरी को जार्पार्नी सम्रार्ट् ने आखिरी शर्ते रखी  कि यदि रूस, चीन की प्रार्देशिक अखण्डतार् मार्न ले और मंचूरियार् में जार्पार्न तथार् अन्य देशों के वैद्य कार्यों में बार्धार् न डार्ले और कोरियार् के जार्पार्नी हितों में हस्तक्षेप न करे तो जार्पार्न मंचूरियार् को अपने प्रभार्व क्षेत्र से बार्हर समझने को तैयार्र है। जब इनक कोर्इ सार्ंतेष्ज्ञजनक उत्तर न आयार् और रूसी फौजें बरार्कर पूर्व की ओर जमार् होती रहीं तो युद्ध अवश्यंभार्वी हो गयार्।

युद्ध की घटनार्एँ

इस युद्ध की विशेषतार् यह थी कि एक पूर्वी शक्ति द्वार्रार् एक महार्न यूरोपीय शक्ति की परार्जय हुर्इ। मर्इ, 1904 र्इ. में दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जार्पार्नियों ने अक्टूबर में दस दिनों तक शार्-हो में भयंकर रक्तपार्त कियार्। पोर्ट आर्थर लंबे समय तक जार्पार्न के घेरे में पड़ार् रहार्। फरवरी, 1905 र्इ. में मुकदेन क कठिन युद्ध हुआ। अंत मे, जार्पार्नी सफल हुए और रूस को मुकदेन छोड़नार् पड़ार्। मंचूरियार् ने भी जार्पार्न क प्रभुत्व स्वीकार कर लियार्। मुकदेन की विजय के पश्चार्त् स्थल पर कोर्इ युद्ध नहीं हुआ, क्योंकि जार्पार्न क सार्धन कम हो गये थे और रूस की हिम्मत पस्त हो चुकी थी। रूस और जार्पार्न के युद्ध क निर्णार्यक मोर्चार् समुद्री युद्ध थार्। इसमें अठार्रह हजार्र रूसी नार्विकों में से बार्रह हजार्र की जार्ने गर्इं। जार्पार्न के केवल एक सौ छत्तीस आदमी मार्रे गए। रूसियों की सैन्यशक्ति चकनार्चूर हो गर्इ। तत्पश्चार्त अमेरिकी रार्श्ट्रपति रूजवेल्ट की मध्यस्थ्तार् से दोनों पक्षों के मध्य संधि हो गर्इ। इसे पोर्ट्समार्उथ की संधि कहते हैं।

पोर्ट्समार्उथ की संधि

5 सितंबर, 1905 ई को पोर्ट्समार्उथ में हुर्इ संधि के अनुसार्र निम्नलिखित बार्तें तय की गई – 1. कोरियार् में जार्पार्न के प्रमुख रार्जनीतिक, सैनिक और आर्थिक हितों को मार्न्यतार् दी गर्इ। 2. मंचूरियार् को रूस और जार्पार्न दोनों ने खार्ली करनार् स्वीकार कर लियार्। 3. रूस ने जार्पार्न को लियार्ओतुंग प्रार्यद्वीप क पट्टार् सौंप दियार् और वहार्ँ की रेलों और खार्नों क अधिकार दे दियार्। 4. रूस ने जार्पार्न को सार्खार्लिन क आधार् दक्षिणी भार्ग दे दियार्। 5. रूस ने जार्पार्न को इन द्वीपों के उत्तर और पश्चिम के समुद में मछली पकड़ने क हक दे दियार्। 6. रूस और जार्पार्न दोनों ने एक-दूसरे को युद्धबंदियों क खर्चार् देनार् मार्न लियार् और इससे जार्पार्न को करीब दो करोड़ डार्लर क लार्भ हुआ। 7. रूस और जार्पार्न दोनों को मंचूरियार् में हथियार्रबंद रेलवे रक्षक रखने क अधिकार मिलार्। 8. रूस और जार्पार्न दोनों ने सार्खार्लिन द्वीप को किलेबंदी न करने पर मंचूरियार् की रेलवे को सैनिक काम में न लार्ने की पार्बंदी स्वीकार कर ली। 9. रूस और जार्पार्न दोनों ने पट्टे की भूमि को छोड़कर मंचूरियार् में चीनी प्रभुत्व क सम्मार्न करने क वचन दियार् और वहार्म के द्वार्र सभी देशों के खुले रहने पर सहमति दी।

रूस-जार्पार्न युद्ध के परिणार्म और महत्व

जार्पार्न के लिए युद्ध क महत्व

रूस की परार्जय से जार्पार्नी सार्म्रार्ज्यवार्द के विकास क माग प्रशस्त हो गयार्। पूर्वी एशियार् की रार्जनीतिक में वह एक कदम और आग े बढ़ गयार्। रूस-जार्पार्न युद्ध में जार्पार्न की विजय से जार्पार्न को चीनी क्षेत्र में घुस जार्ने क अच्छार् अवसर मिल गयार्। जबकि पूर्वी एशियार् में रूस क विस्तार्र रूक गयार्। मंचूरियार् पर उसक नार्म-मार्त्र क अधिकार रहार्। युद्ध में जार्पार्न ने सिद्ध कर दियार् कि वह संसार्र क एक शक्तिशार्ली रार्ष्ट्र है। इसी आधार्र पर उसने ब्रिटेन से अनुरोध कियार् कि आंग्ल-जार्पार्नी संधि में ऐसे संशोधन किए जार्एँ, जिससे जार्पार्न को कुछ अधिक लार्भ हो। इससे भी महत्वपूर्ण बार्त यह थी कि कोरियार् पर से रूस के प्रभार्व क अंत हो गयार्। अब जार्पार्न कोरियार् में अपनी इच्छार्नुसार्र काम कर सकतार् थार्। अवसर पार्कर 1910 र्इ. में उसने कोरियार् को अपने सार्म्रार्ज्य में शार्मिल कर लियार्। इस प्रकार, कोरियार् को जार्पार्नी सार्म्रार्ज्य में सम्मिलित करने के कार्य में रूस-जार्पार्न युद्ध क बड़ार् यार्गे दार्न रहार्। समूचे संसार्र में, विशेषकर पूर्वी एशियार् में, जार्पार्न की ख्यार्ति बढ़ गर्इ। जार्पार्न क उत्सार्ह बहुत बढ़ार् और युद्ध में विजय के उपरार्तं उसने उग्र सार्म्रार्ज्यवार्दी नीति अपनार्यी, जिसके फलस्वरूप उसक विशार्ल सार्म्रार्ज्य कायम हुआ।

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