रूसो क शिक्षार् दर्शन
रूसो के अनुसार्र शिक्षार् में तीन महत्वपूर्ण पक्ष हैं- बच्चे की अन्तर्निहित शक्ति, सार्मार्जिक वार्तार्वरण तथार् भौतिक वार्तार्वरण। शिक्षार् प्रकृति, मार्नव यार् वस्तुओं से ली जार् सकती है। तीनों के मध्य सहयोग यार् समन्वय हो तो आदर्श शिक्षार् हो सकती है। पर यह सहयोग सम्भव नहीं है क्योंकि प्रकृति एवं मार्नव संघर्षरत रहतार् है। रूसो के शब्दों में ‘‘हम बार्ध्य हैं मार्नव यार् प्रकृति से संघर्ष करने के लिए। आप मनुष्य यार् नार्गरिक में से एक क चुनार्व कर लें- दोनों को आप सार्थ-सार्थ प्रशिक्षित नहीं कर सकते।’’ रूसो क चुनार्व प्रार्कश्तिक शिक्षार् है न कि सार्मार्जिक शिक्षार्। रूसो दो तरह की शिक्षार् व्यवस्थार् की बार्त करतार् है- पब्लिक यार् सावजनिक, जो बहुतों के लिए समार्न है तथार् दूसरार् प्रार्इवेट यार् घरेलू। पब्लिक शिक्षार् क संचार्लन सरकार करती है क्योंकि यह लोकप्रिय सरकार की मूल आवश्यकतार् है। दि न्यू हेलॉयज् में रूसो प्रार्इवेट यार् निजी शिक्षार् यार् घरेलू शिक्षार् क वर्णन करतार् है। इस घरेलू शिक्षार् में मार्ँ मुख्य अध्यार्पिक है। रूसो क विद्याथी कोई विशेष बार्लक नहीं बल्कि सार्मार्न्य बार्लक है। रूसो ने कहार् ‘‘हमलोगों को सार्मार्न्य को देखनार् चार्हिए न कि विशेष को, अपने विद्याथी को हम अमूर्त मार्नें।’’ इस तरह से रूसो मार्नव के सावकालिक एवं सावदेशिक प्रकृति पर बल देतार् है, अत: एमिल को प्रजार्तार्ंत्रिक शिक्षार् क स्रोत मार्नार् जार्तार् है। रूसो पहलार् शिक्षार्शार्स्त्री है जो सावजनिक शिक्षार् पर जोर देतार् है।

रूसो क शिक्षार्-दर्शन इस सिद्धार्न्त पर आधार्रित है कि बच्चे को इस तरह से तैयार्र कियार् जार्य कि वे अपनी स्वतंत्रतार् क भविष्य में सही उपयोग कर सकें। बड़ों के पूर्वार्ग्रह से मुक्त रहते हुए बच्चे को अपने बचपन क आनन्द उठार्ने क अधिकार है।

रूसो के अनुसार्र बार्लक की शिक्षार् के तीन प्रमुख स्रोत हैं- (i) प्रकृति (ii)  पदाथ (iii)  मनुष्य। रूसो के अनुसार्र बार्लक क विकास प्रकृति तथार् पदाथ के मार्ध्यम से होतार् है। मार्नव यार्नि अध्यार्पक जब अपनी ओर से शिक्षार् देने लगतार् है तो बच्चे की स्वार्भार्विक शिक्षार् प्रभार्वित होती है और कुशिक्षार् प्रार्रम्भ हो जार्ती है। रूसो के अनुसार्र शिक्षक पर समार्ज की बुरार्इयों क इतनार् अधिक प्रभार्व पड़ चुक होतार् है कि वह बच्चों में सद्गुणों क विकास नहीं कर सकतार् क्योंकि उसमें स्वयं सद्गुण बचे नहीं रहते हैं। अत: कम से कम प्रार्रम्भिक स्तर पर बच्चे की शिक्षार् में रूसो अध्यार्पक की कोई भूमिक नहीं देखतार् है। मार्तार्-पितार् ही इस अवस्थार् में बच्चों के सहज शिक्षक होते हैं। उन्हें भी कम से कम हस्तक्षेप करते हुए बच्चे को अपनी प्रकृति के अनुसार्र विकास करने की स्वतंत्रतार् मिलनी चार्हिए।

शिक्षार् क उद्देश्य

रूसो के अनुसार्र शिक्षार् क उद्देश्य मार्नव को प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने के योग्य बनार्नार् है। शिक्षार् द्वार्रार् मार्नव संसर्ग के परिणार्मस्वरूप जो कश्त्रिमतार् उसमें आती है, उससे उसकी रक्षार् करतार् है। रूसो सार्मार्जिक संस्थार्ओं और उनमें विद्यमार्न रूढ़ियों के कटु आलोचक हैं। वे कहते हैं- ‘‘तुम समार्ज सम्मत व्यवहार्र के ठीक विपरीत कार्य करो। और तुम प्रार्य: सही होगे।’’ वे मार्नवीय सार्मार्जिक संस्थार्ओं को ‘मूर्खतार् तथार् विरोधार्भार्स क समूह बतार्ते हैं।’’ रूसो प्रकृति को ईश्वर निर्मित मार्नतार् है और बच्चे को ईश्वरीय कश्ति। वह मार्नतार् है कि जब तक बच्चार् प्रकृति के प्रभार्व में रहतार् है तब तक वह सद्गुणी, शुभ तथार् पवित्र रहतार् है परन्तु मार्नव के हस्तक्षेप से उसमें गिरार्वट आने लगती है। इस प्रकार रूसो के अनुसार्र शिक्षार् क उद्देश्य बार्लकों में अन्तर्निहित प्रकश्त स्वभार्व एवं गुणों को सुरक्षित रखनार् है। रूसो ने शिक्षार् को केवल अभिजार्त्य वर्ग तक ही सीमित न रखकर उसे जनसार्मार्न्य तक पहुँचार्ने क प्रयार्स कियार्। रूसो ने अमीर घर के बच्चों को भी प्रार्कश्तिक शिक्षार् देने की वकालत की। रस्क (2000) के शब्दों में यह अमीर घर के बच्चों को भी गरीबी की शिक्षार् देनार् चार्हते थे तार्कि भार्वी जीवन में जो भी स्थिति बने वह सफलतार् पूर्वक विपत्ति यार् दुर्भार्ग्य क सार्मनार् कर सके। रूसो सार्मार्न्य यार् प्रार्कश्तिक मार्नव के आदर्श पर जोर देतार् है न कि प्लेटो की तरह सुपरमैन के आदर्श पर।

रूसो मजबूत, अच्छे शरीर सौष्ठव क स्वस्थ बच्चार् चार्हतार् है। रूसो कमजोर शरीर एवं कमजोर मस्तिष्क के बच्चे को पसन्द नहीं करतार् है क्योंकि एक स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ मन एवं उच्च नैतिक चरित्र क आधार्र है। रूसो क कहनार् थार् ‘‘ कमजोर शरीर कमजोर मस्तिष्क क निर्मार्ण करतार् है।’’ रूसो शिक्षार् क उद्देश्य नैतिकतार् क विकास मार्नते हैं। पर नैतिकतार् क विकास प्रार्कश्तिक परिणार्मों के द्वार्रार् होनार् चार्हिए न कि व्यार्ख्यार्नों के द्वार्रार्। रूसो कहते हैं ‘‘बच्चे के लम्बे अवकाश काल (प्रथम बार्रह वर्ष) में नैतिक शिक्षार् क कोई प्रत्यक्ष पार्ठ नहीं पढ़ार्यार् जार्नार् चार्हिए। एकमार्त्र नैतिक शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए ‘‘किसी को आघार्त मत पहुँचार्ओं।’’ रूसो लोककथार्ओं द्वार्रार् भी अप्रत्यक्ष रूप से नैतिक शिक्षार् देने के विरूद्ध हैं।

छार्त्र-संकल्पनार्

रूसो बार्लक को ईश्वर की पवित्र कश्ति मार्नतार् है। प्रकृति-निर्मार्तार् के हार्थों से जो भी वस्तु आती है वह पवित्र होती है परन्तु मनुष्य के हार्थों में आकर उसकी पवित्रतार् खत्म होने लगती है। रूसो बार्लक को जन्म से अच्छार् और पवित्र मार्नतार् है और यह सुझार्व देतार् है कि बार्लक के प्रकश्त गुणों को शिक्षार् के द्वार्रार् समार्प्त न कियार् जार्ये। रूसो क यह स्पष्ट मत है कि बच्चे को बच्चार् रहने दियार् जार्ये- शिक्षार् द्वार्रार् कश्त्रिम रूप से उसे अल्पार्वस्थार् में ही व्यस्क बनार्ने क प्रयार्स न कियार् जार्ये। मार्नव-जीवन के क्रम में बचपन क एक स्थार्न है, निश्चय ही प्रौढ़ को प्रौढ़ और बच्चे को बच्चार् मार्नकर व्यवहार्र करनार् चार्हिए।

रूसो बार्लक पर किसी भी तरह के दबार्व डार्ले जार्ने क विरोधी है। वह समार्ज की बुरार्इयों से बच्चे को बचार्नार् चार्हतार् है। वह उसे प्रसन्न देखनार् चार्हतार् है। रूसो परम्परार्गत शिक्षार् के अवगुणों पर ध्यार्न खींचते हुए पूछतार् है ‘‘उस निर्दयी शिक्षार् को क्यार् कहार् जार्ए, जो वर्तमार्न को अनिश्चित भविष्य के लिये बलिदार्न करार् देती है, जो बार्लक को सभी तरह से प्रतिबंधित कर उसके जीवन को भविष्य की ऐसी खुशी के लिए दुखमय बनार् देती है जो शार्यद वह कभी प्रार्प्त न कर सके।’’

रूसो प्रकृति की व्यार्ख्यार् ‘स्वभार्व’ की दश्ष्टि से भी करतार् है। बार्लक की रूचि एवं स्वभार्व के अनुसार्र शिक्षार् देने की बार्त सर्वप्रथम कही जार्ने लगी फलस्वरूप बार्लकेन्द्रित शिक्षार् क आन्दोलन चल पड़ार्। पर इन सबके मूल में रूसो की छार्त्र यार् बार्लक संकल्पनार् ही है।

विद्याथी जीवन के सोपार्न

रूसो ने विद्याथी के जीवन को चार्र भार्गों में बार्ँटार् है-

  1. शैशवार्वस्थार्
  2. बार्ल्यकाल (12 वर्ष की अवस्थार् तक)
  3. पूर्व किशोरार्वस्थार् (12 से 15 वर्ष) तथार् 
  4. किशोरार्वस्थार् (15 वर्ष से आगे)

रूसो कहते हैं ‘‘प्रत्येक शिक्षार् के लिए एक निश्चित समय है और हमें इससे जार्ननार् चार्हिए।’’

(अ) शैशवार्वस्थार् : रूसो क मार्ननार् है कि शिक्षार् जन्म से ही प्रार्रम्भ हो जार्ती है। वे बच्चे की उचित देखभार्ल क नियम बतार्ते हैं। इस काल में उसके शरीर एवं इन्द्रियों के सही विकास पर ध्यार्न देनार् चार्हिए। बच्चे की मार्तश्भार्षार् में वातार्लार्प के द्वार्रार् उनमें भार्षार् की योग्यतार् क विकास कियार् जार् सकतार् है। रूसो बच्चों में आदतों के विकास क विरोध करतार् है। वह कहतार् है ‘‘बच्चे को केवल एक आदत विकसित करने देनार् चार्हिए और वह है किसी भी आदत क नहीं होनार्।’’ इस समय बच्चों को अपनी स्वतंत्रतार् पर नियंत्रण रखने के लिए तैयार्र कियार् जार्तार् है। उसमें आत्म नियंत्रण की भार्वनार् भरी जार्ती है।

(ब) बार्ल्यकाल : इस काल में भी रूसो लड़कों के लिए किसी भी तरह के पार्ठ्य पुस्तक के उपयोग क विरोध करतार् है। वह बार्रह वर्ष तक एमिल को पुस्तकों से दूर रखनार् चार्हतार् थार्। एकमार्त्र पुस्तक ‘रार्बिन्सन क्रूसो’ को छोड़कर। लड़के को निरीक्षण एवं अनुभव के द्वार्रार् सीखने क अवसर मिलनार् चार्हिए। इन्हें अलग से कुछ भी नहीं पढ़ार्नार् चार्हिए। इस तरह से निषेधार्त्मक शिक्षार् के संप्रत्यय क विकास हुआ।

निषेधार्त्मक शिक्षार् रूसो के शिक्षार्-सिद्धार्न्त क एक महत्वपूर्ण आयार्म है। एमिल के प्रशिक्षण क सिद्धार्न्त है ‘‘हर तरह के ज्ञार्न के ग्रहण क एक निश्चित समय होतार् है, और वह समय है जब बच्चार् उसकी आवश्यकतार् अनुभव करतार् है।’’ रूसो के अनुसार्र यह एक प्रार्कश्तिक प्रक्रियार् है। जबकि परम्परार्गत पद्धति में विद्याथी की आवश्यकतार् क अनुमार्न कियार् जार्तार् है। ‘‘प्रौढ़ो के द्वार्रार् दी गई शिक्षार् प्रार्य: समय पूर्व होती है।’’ इस सिद्धार्न्त के आधार्र पर ही रूसो बार्रह वर्ष की आयु तक बच्चे की शिक्षार् रोके रहने की बार्त कहतार् है। इस समय तक उसे शिक्षार् न दी जार्ये और उसे अवसर दियार् जार्य कि वह बिनार् कोई सार्मार्जिक बुरार्ई ग्रहण किये बार्रह वर्ष तक क समय व्यतीत करे। इसे रूसो ने निगेटिव एडुकेशन (निषेधार्त्मक शिक्षार्) कहार्।

रूसो चार्हते हैं कि बच्चे में सही कार्य करने की आदत डार्ली जार्य, जो कि नैतिक जीवन क पहलार् पार्ठ है। सही और गलत की समझ सार्मार्जिक जीवन के बजार्य प्रकृति द्वार्रार् होती है। निर्भरतार् दो तरह की होती है- वस्तुओं पर निर्भर करनार्, जो कि प्रकृति क कार्य है; तथार् मार्नव पर निर्भर करनार् जो कि समार्ज क कार्य है। वस्तु पर निर्भरतार् गैर नैतिक है तथार् स्वतंत्रतार् को आघार्त नहीं पहँुचार्ती है और न ही दुर्गुणों को जन्म देती है। बार्रह वर्ष तक की उम्र तक की शिक्षार् क प्रमुख सिद्धार्न्त है ‘‘बच्चे को वस्तुओं पर निर्भर रहने दो। इससे मार्नव पर निर्भर रहने से स्वतंत्रतार् मिल जार्ती है।’’ यह गैर नैतिक एवं गैर सार्मार्जिक शिक्षार् है। अत: प्रार्रम्भिक वर्षों की शिक्षार् केवल निषेधार्त्मक होनी चार्हिए। इसमें अच्छार्इयों यार् सत्य को पढ़ार्नार् नहीं है वरन् हृदय को बुरार्इयों तथार् गलत होने की भार्वनार् से बचार्नार् है। मुख्य सिद्धार्न्त है समय को बचार्यार् न जार्य वरन् इसे व्यतीत करने दियार् जार्य। इस काल में शरीर, अंगों, इन्द्रियों क व्यार्यार्म होनार् चार्हिए पर मस्तिष्क को निष्क्रिय रहने देनार् चार्हिए।

बच्चे को पुस्तकीय ज्ञार्न देने की जगह उसे खेलने-कूदने, एवं इच्छार्नुसार्र अन्य क्रियार्ओं को करने की स्वतंत्रतार् होनी चार्हिए। इन क्रियार्-कलार्पों एवं अनुभवों से उसक शरीर शक्तिशार्ली होगार् जिससे मार्नसिक क्षमतार् भी बढ़ेगी। रूसो के अनुसार्र नैतिक शिक्षार् देने के स्थार्न पर उसे अपने कार्यों के प्रार्कश्तिक परिणार्म के आधार्र पर उचित-अनुचित के विवेक के विकास क अवसर मिलनार् चार्हिए। अत: इस काल में किसी औपचार्रिक पार्ठ्यक्रम की आवश्यकतार् नहीं है।

(स) पूर्व किशोरार्वस्थार् : बार्रह वर्ष की आयु के उपरार्ंत रूसो बच्चों को तीव्रतार् से शिक्षार् देने की बार्त कहतार् है। यह तीव्रतार् संभव है क्योंकि विद्याथी अधिक परिपक्व होतार् है और ज्ञार्न को अधिक वस्तुगत यार् मूर्त तथार् व्यार्वहार्रिक रीति से दियार् जार्तार् है। रूसो कहते हैं ‘‘मुझे बार्रह वर्ष क एक लड़क दीजिए जो कुछ भी नहीं जार्नतार् हो लेकिन पन्द्रह वर्ष की अवस्थार् में वह उतनार् जार्नतार् होगार् जितनार् उस उम्र क लड़क जो शैशवार्वस्थार् से ही शिक्षार् प्रार्प्त कर रहार् है, पर इस अन्तर के सार्थ कि तुम्हार्रार् छार्त्र रट कर चीजों को जार्नतार् है जबकि मेरार् विद्याथी इन चीजों को कैसे प्रयोग कियार् जार्य जार्नतार् है।’’

रूसो के अनुसार्र इस स्तर पर प्रार्कश्तिक विज्ञार्न, भार्षार्, गणित, काष्ठकलार्, संगीत, चित्रकलार्, सार्मार्जिक जीवन तथार् व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण दियार् जार्नार् चार्हिए। इस स्तर पर भी पुस्तकों से अधिक जोर विद्याथी द्वार्रार् इन्द्रियों के प्रयोग द्वार्रार् अनुभव प्रार्प्त करने पर होनार् चार्हिए। विज्ञार्न क अध्ययन लड़के की जिज्ञार्सार् को बढ़ार्येगार् उसे खोज यार् अविष्कार हेतु प्रेरित करेगार् तथार् वह स्वयं सीखने की प्रक्रियार् को तेज करेगार्। चित्रकलार् आंख और मार्ंसपेशियों को प्रशिक्षित करेगार्। शिल्प यार् हस्त उद्योग लड़के में कार्य करने की क्षमतार् क विकास करेगार्। सार्मार्जिक जीवन में व्यार्वहार्रिक अनुभव से वह समझेगार् कि मार्नव एक दूसरे पर निर्भर करेगार्, जिससे बच्चार् सार्मार्जिक उत्तरदार्यित्व को समझेगार् और उसक निर्वहन करेगार्।

रूसो क कहनार् है कि कितार्बें ज्ञार्न नहीं देती है वरन् बोलने की कलार् सिखार्ती है। अत: पार्ठ्यक्रम पुस्तकों पर आधार्रित न होकर कार्य पर आधार्रित होनार् चार्हिए। इस काल में किशोर को शिक्षार् प्रार्प्त करने एवं कठिन परिश्रम करने के लिए पर्यार्प्त समय और अवसर मिलनार् चार्हिए।

(द) किशोरार्वस्थार् : शिक्षार् के चतुर्थ चरण में रूसो नैतिक तथार् धामिक शिक्षार् पर जोर देतार् है। नैतिक शिक्षार् भी वार्स्तविक अनुभव के द्वार्रार् होनी चार्हिए न कि व्यार्ख्यार्नों के द्वार्रार्। जैसे कि एक नेत्रहीन व्यक्ति को देखने के बार्द किशोर यार् नवयुवक में सहार्नुभूति, प्रेम, स्नेह, दयार् जैसे भार्वों क स्वत: संचार्र होतार् है। धामिक शिक्षार् भी इसी तरह से देने क सुझार्व रूसो ने दियार् पर इसके लिए इतिहार्स, पौरार्णिक एवं धामिक कथार्ओं क भी उपयोग कियार् जार् सकतार् है। धामिक एवं नैतिक शिक्षार् के अतिरिक्त रूसो शार्रीरिक स्वार्स्थ्य, संगीत और यौन शिक्षार् को भी महत्व प्रदार्न करतार् है।

पार्ठ्यक्रम

जैसार् कि हमलोग देख चुके है रूसो प्रथम बार्रह वर्षों तक औपचार्रिक शिक्षार् देने क विरोधी है। सार्थ ही पार्ठ्यक्रम में कई विषयों एवं उनके परम्परार्गत शिक्षण-विधियों क भी विरोध करतार् है। रूसो भार्षार् की शिक्षार् को व्यर्थ मार्नतार् है। भूगोल में विश्व कैसार् है यह पढ़ार्ने की जगह केवल नक्शार् पढ़ार्यार् जार्तार् है। ‘‘उसे शहरों, देशों, नदियों के केवल नार्म पढ़ार्ये जार्ते हैं जिसक उसके लिए कोई अस्तित्व नहीं है केवल उसके सार्मने रखे कागज पर छोड़कर। यह और अधिक हार्स्यार्पद गलती है कि इस स्तर पर इतिहार्स पढ़ार्यार् जार्तार् है जबकि वे उन सम्बन्धों को नहीं समझ पार्ते जिन्हें रार्जनीतिक क्रियार् कहते हैं।’’

जिन विषयों की शिक्षार् देने की रूसो संस्तुति करतार् है वे हैं- शार्रीरिक शिक्षार् : बार्रह वर्ष तक की अवस्थार् तक धनार्त्मक शिक्षार् शार्रीरिक व्यार्यार्म तथार् इन्द्रियों के प्रशिक्षण तक सीमित है। शार्रीरिक शिक्षार् स्पाटार् के मॉडल पर आधार्रित है। अच्छे स्वार्स्थ्य पर प्रकाश डार्लते हुए रूसो कहतार् है: ‘‘अगर आप अपने छार्त्र की बुद्धि विकसित करनार् चार्हते है तो पहले उस शक्ति क विकास करो जिसे बुद्धि नियंत्रित करेगार्। उसके शरीर को लगार्तार्र व्यार्यार्म दो, उसे शक्तिशार्ली एवं स्वस्थ होने दो तार्कि वह अच्छार् एवं बुद्धिमार्न बने। उसे दौड़ने दो, चिल्लार्ने दो, कुछ न कुछ करने दो। इससे वह एक शक्तिशार्ली एवं विवेकशील मार्नव होगार्। उसमें खिलार्ड़ी क बल और दाशनिक की दश्ष्टि होगी।’’

इन्द्रियों क प्रशिक्षण : रूसो इन्द्रियों के प्रशिक्षण पर अत्यधिक जोर देतार् है। वह कहतार् है कि हमार्रार् पहलार् अध्यार्पक हार्थ, पैर, आंख आदि है। इनकी जगह हम पुस्तक रखते हैं तो यह दूसरे के अनुभव यार् तर्कों क प्रयोग करनार् हुआ न कि अपनार्। इन्द्रियों के प्रशिक्षण से रूसो क तार्त्पर्य औपचार्रिक व्यार्यार्म न होकर वार्स्तविक परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमतार् क विकास करनार् है- जैसी परिस्थितियों क वह भविष्य में सार्मनार् करेगार्।

प्रथम इन्द्रिय जिसे रूसो प्रशिक्षित करने क सुझार्व देतार् है वह स्पर्श है। इसक प्रशिक्षण अंधेरे में देनार् चार्हिए। स्पर्श अगर देखते हुए कियार् जार्य तो मस्तिष्क देखने की क्रियार् से वस्तु के बार्रे में निर्णय ले लेतार् है। दूसरी तरफ, स्पर्श के द्वार्रार् विभेदीकरण सुनिश्चित है। यह अन्य इन्द्रियों के जल्दीबार्जी में लिए गये गलत निर्णयों को सही करतार् है।

दश्ष्टि के प्रशिक्षण हेतु रूसो ऐसे कार्यों को बतार्तार् है- यह तय करनार् कि सीढ़ी इतनी लम्बी है यार् नहीं कि वह पेड़ की उच्चतम शार्खार् तक पहुँच जार्य, कोई लकड़ी इतनी लम्बी है कि नहीं वह किसी जलधार्रार् को ढ़ँक दे, मछली पकड़ने हेतु धार्गे की लम्बार्ई पर्यार्प्त है यार् नहीं, दो वश्क्षों के मध्य झूलार् बार्ँधने के लिए रस्सी की लम्बार्ई कम तार् नहीं है। दौड़ में असमार्न दूरी देकर तथार् बच्चे को तय करने देनार् कि कौन सी दूरी सबसे छोटी है तार्कि वह उसे चुन सके। रूसो के अनुसार्र दश्ष्टि सभी इन्द्रियों में से वह है जिसे हमें मस्तिष्क के निर्णय से सबसे कम अलग कर सकते हैं, इसलिए स्पर्श की तुलनार् में देखनार् सीखनार् में अधिक समय लगतार् है। दश्ष्टि को प्रशिक्षित करनार् आवश्यक है जिससे वह दूरी और आकार के बार्रे में सही जार्नकारी दे सके। इसी तरह रूसो अन्य इन्द्रियों- श्रवण, स्वार्द, घ्रार्ण के प्रशिक्षण की आवश्यकतार् बतार्तार् है।

इस पूरे काल में रूसो एमिल को पढ़ार्तार् नहीं है वरन् भार्वी शिक्षार् के लिए तैयार्र करतार् है। इस समय ‘समय को व्यतीत करनार् और उसे बचार्नार्’ मुख्य उद्देश्य है। इस काल की शिक्षार् के संदर्भ में रूसो कहते हैं: ‘‘उसके विचार्र कम है लेकिन स्पष्ट है, वह रट कर कुछ नहीं जार्नतार् पर अनुभव के द्वार्रार् बहुत जार्नतार् है। अगर वह अन्य बच्चों की तुलनार् में कितार्ब खरार्ब ढ़ंग से पढ़तार् है तो वह प्रकृति की पुस्तक को काफी बेहतर पढ़तार् है, उसके विचार्र उसके जिह्वार् नहीं उसके मस्तिष्क में रहतार् है; उसे यार्द कम है और निर्णय अधिक है। वह केवल एक भार्षार् बोल सकतार् है पर वह समझतार् है कि वह क्यार् बोल रहार् है; और अगर उसकी भार्षार् उतनी अच्छी नहीं है जितनार् अन्य बच्चों के तो उसके कार्य दूसरों से बेहतर हैं।’’ ‘‘उसने बचपन क सर्वोत्तम प्रार्प्त कियार् है, उसने बच्चों क जीवन जियार् है; उसकी प्रगति उसकी खुशियों की कीमत पर नहीं खरीदी गई है; उसने दोनों प्रार्प्त कियार् है।’’

बार्रह वर्ष की आयु के उपरार्ंत पार्ठ्यक्रम : यह काल बार्ल्यार्वस्थार् से किशोरार्वस्थार् के मध्य परिवर्तन क काल है। पहलार् काल आवश्यक से सम्बन्धित थार्, यह काल उपयोगी से सम्बन्धित है तथार् आगे क काल क्यार् सही है इससे सम्बन्धित है। रूसो कहते है: ‘‘प्रार्रम्भिक बार्ल्यवस्थार् में लम्बार् समय थार्- हमने केवल अपनार् समय व्यतीत करने क प्रयार्स कियार् तार्कि इसक दुरूपयोग न हो, अब विपरीत स्थिति है- हमलोगों के पार्स उन सभी के लिए जो उपयोगी हैं, पर्यार्प्त समय नहीं है।

जिन ज्ञार्न को प्रार्प्त करनार् है उनक चुनार्व बड़ी सार्वधार्नी से होनार् चार्हिए। यह निश्चित रूप से बच्चे की वर्तमार्न आवश्यकतार् के अनुकूल हो। ‘‘इसक क्यार् उपयोग है? यही पवित्र सूत्र है।’’ विगत काल में जिन विषयों को छोड़ दियार् गयार् थार्- उन पर उपयोगितार् की दश्ष्टि से पुनर्विचार्र होने चार्हिए, तथार् जो विषय उपयोगी होने की परीक्षार् उत्तीर्ण करे उनकी शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। यह अध्यार्पक क काम नहीं है कि छार्त्र को विभिन्न विषय/विज्ञार्न पढ़ार्ये। पर उसे विषयों की जार्नकारी दे और जब छार्त्र में रूचि हो सीखने की विधि बतार्ये।

शिल्प की शिक्षार् : एमिल को एक शिल्प यार् हस्तउद्योग अवश्य सीखनार् चार्हिए, सीखने के लिए कम पर इसे बिनार् प्रार्प्त न करने से उत्पन्न होने वार्ले पूर्वार्ग्रह से मुक्त होने के लिए अधिक। रूसो इसके महत्व को मार्नते हुए कहते हैं ‘‘अगर मैं उक बच्चे को पुस्तक से मुक्त कर एक कार्यशार्लार् में काम करने हेतु भेजतार् हूँ तो यह उसके मस्तिष्क के विकास के लिए। यद्यपि वह कार्य करते हुए एक शिल्पी यार् मजदूर होने की कल्पनार् करतार् है पर वह एक दाशनिक बन रहार् होतार् है।’’ एमिल के लिए जिस कार्य की कल्पनार् रूसो करते हैं वह है काष्ठकार्य। ‘‘यह सार्फ-सुथरार् एवं उपयोगी है: इसे घर में कियार् जार् सकतार् है, यह पर्यार्प्त व्यार्यार्म देतार् है, यह कौशल और परिश्रम चार्हतार् है तथार् प्रतिदिन के प्रयोग के लिए वस्तुओं क निर्मार्ण करते हुए परिष्कार और सुरूचि के विकास की संभार्वनार् बनी रहती है।’’ रूसो के अनुसार्र एमिल को अनिवायत: एक किसार्न की तरह काम करनार् चार्हिए तथार् एक दाशनिक की तरह सोचनार् चार्हिए।’’ रूसो के अनुसार्र शिक्षार् क महार्न रहस्य है शरीर और मस्तिष्क के व्यार्यार्म को एक-दूसरे के आरार्म के लिए प्रयोग करनार्।

औद्योगिक एवं यार्ंत्रिक कलार् : अब तक विद्याथी जहार्ँ तक संभव हो वस्तुओं पर निर्भर करतार् थार्। ‘‘बच्चार् तब तक वस्तुओं पर निर्भर करतार् है जब तक वह मार्नव के अध्ययन के लिए बड़ार् एवं योग्य नहीं हो जार्तार् है।’’ सार्मार्जिक जीवन की आवश्यकतार्ओं की समझ अब आवश्यक है। आदमियों के परस्पर सम्बन्धों एवं कर्तव्यों को सीधे तौर पर सिखार्ने की जगह- अध्यार्पक को विद्याथी क ध्यार्न औद्योगिक एवं यार्ंत्रिक कलार् की ओर खींचनार् चार्हिए जिसमें परस्पर सहयोग की आवश्यकतार् पड़ती है। मार्नव की मार्नव पर आर्थिक र्निभरतार् के आधार्र पर अध्यार्पक अपने विद्याथियों में सार्मार्जिक व्यवस्थार् की आवश्यकतार् को महसूस करार्येगार्। रूसो के अनुसार्र सार्री सम्पत्ति समुदार्य की है तथार् प्रत्येक व्यक्ति समुदार्य के लिए अपनी भूमिक क निर्वहन करतार् है।

पन्द्रह वर्ष तक की शिक्षार् क निचोड़ रूसो के शब्दों में निम्न है- ‘‘अपने ऊपर आधिपत्य पार्कर, हमार्रार् बच्चार् अब बच्चार् रहने के लिए तैयार्र नहीं है। उसके शरीर और मस्तिष्क को क्रियार्शील करार्ने के बार्द आपने उसके मस्तिष्क एवं उसके निर्णय को क्रियार्शील कियार् है। और अंतत: उसके अंगो और बौद्धिक क्षमतार्ओं को जोड़ दियार् है। हमलोगों ने उसे एक मजदूर यार् शार्रीरिक श्रम करने वार्लार् तथार् एक विचार्रक बनार्यार् है। अब उसे हम स्नेहसिक्त और कोमल हृदय क बनार्यें।’’

पन्द्रह वर्ष के उपरार्ंत पार्ठ्यक्रम : छार्त्र अब नैतिक स्तर पर पहुँच जार्तार् है। उसे एक जवार्न व्यक्ति क सार्न्निध्य प्रार्प्त करनार् चार्हिए। रूसो इस आयु की शिक्षार् के संदर्भ में कहतार् है ‘‘उसे यह जार्नने दो कि मार्नव प्रकृति से अच्छार् है, उसे यह महसूस करने दो, उसे अपने पड़ोसियों के संदर्भ में स्वयं निर्णय लेने दो, लेकिन उसे यह भी देखने दो कि समार्ज ने मार्नव को किस तरह से विकश्त कियार् है। उसे महसूस करने दो कि मार्नव के पूर्वनिर्धार्रित विचार्रों यार् पूर्वार्ग्रह ही सार्री बुरार्इयों की जड़ है। उसे व्यक्ति को आदर देने दो पर समूह को नार्पसन्द करने दो, उसे महसूस करने दो कि सभी मार्नव एक ही मुखौटार् लगार्ते हैं लेकिन उसे यह भी जार्नने दो कि कुछ चेहरे उस मुखौटे से बेहतर होते हैं जो उसे छिपार्तार् है।’’

इतिहार्स : रूसो के अनुसार्र अब इतिहार्स की शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए। इतिहार्स के मार्ध्यम से वह बिनार् दर्शन पढ़े मार्नव के हृदय को समझ सकतार् है। वह उन्हें बिनार् किसी भार्वनार् यार् पक्षपार्त के निरपेक्ष दर्शक की तरह देखेगार्- न्यार्यार्धीश की दृष्टि से देख्ेार्गार्। ‘‘इतिहार्स को क्रार्ंति और बर्बार्दी रूचिकर बनार्तार् है। जब तक रार्ष्ट्र शार्ंतिपूर्ण ढंग से विकास करतार् है इतिहार्स उस ओर ध्यार्न नहीं देतार् है- पतन की प्रक्रियार् पर जोर देतार् है। शैतार्न चरित्र सिद्ध हो जार्ते हैं- अच्छे को भूलार् दियार् जार्तार् है। इस तरह से इतिहार्स, दर्शन की तरह मार्नव को गिरार्तार् है।’’ दूसरी कठिनार्ई यह है कि इतिहार्स मार्नव की जगह क्रियार् को दिखार्तार् है। वह मार्नव को कुछ चुने हुए समय में ही दिखार्तार् है। घटनार्ओं के धीमे विकास की प्रक्रियार् को इतिहार्स नहीं देख पार्तार् है। युद्ध उन घटनार्ओं को दिखार्तार् है जो नैतिक कारणों द्वार्रार् सुनिश्चित होतार् है, जिसे कुछ ही इतिहार्सकार समझ पार्ते हैं। इतिहार्स के चरित्र को आदर्श (मॉडल) नहीं मार्नार् जार् सकतार्।

नैतिकतार् : रूसो प्रार्चीन जीवनियों जैसे प्लूटाक की जीवनी पढ़ने क सुझार्व देतार् है वह आधुनिक जीवनियों को महत्व प्रदार्न नहीं करतार् है। विद्याथी के प्रशिक्षण में बरती गई तमार्म सार्वधार्नियों के बार्वजूद गलतियार्ँ हो सकती हैं- इनक सुधार्र अप्रत्यक्ष रूप से होनार् चार्हिए। ‘‘गलतियों क समय (लोककथार्ओं) क समय है।’’ एक कहार्नी की सहार्यतार् से अगर हम गलतियों क एहसार्स करार्ते हैं तो वह अपमार्नित महसूस नहीं करतार् है। लेकिन कहार्नी की शिक्षार् अलग से बतार्ने की जरूरत नहीं है- क्योंकि वह तो कहार्नी में ही स्पष्ट रहतार् है।

धामिक शिक्षार् : पन्द्रह वर्षों तक विद्याथियों को धामिक शिक्षार् देने क रूसो विरोध करतार् है। उसके अनुसार्र अभी तक एमिल ने शार्यद ही ईश्वर क नार्म सुनार् होगार्। पन्द्रहवें वर्ष तक वह शार्यद ही यह जार्न पार्यार् होगार् कि उसके पार्स एक आत्मार् है, अठार्रहवें वर्ष में भी शार्यद इसकी शिक्षार् के लिए तैयार्र न हुआ हो। रूसो एमिल को किसी सम्प्रदार्य से जोड़ने क सुझार्व नहीं देतार् है- वह स्वयं अपनी समझ के अनुसार्र निर्णय लेगार्। यद्यपि रूसो ‘दि क्रीड ऑफ ए सवोयार्ड प्रिस्ट’ के पक्ष में है। रूसो यह नहीं बतार्तार् है कि क्यों कोई सम्प्रदार्य बेहतर है।

रूसो आन्तरिक प्रकाश पर जोर देतार् है। सत्य स्वयं स्पष्ट है। जिस पर ईमार्नदार्री से विश्वार्स करने से इन्कार नहीं कर सकतार् है। रूसो एमिल के लिए प्रार्कश्तिक धर्म दिये जार्ने क प्रस्तार्व रखतार् है।

सौन्दर्यशार्स्त्र : रूसो किशोर के लिए सौन्दर्यशार्स्त्र पढ़ने की अनुशंसार् करतार् है- रूचि के सिद्धार्न्त क दर्शन। रूचि जो हृदय में प्रवेश करतार् है, शार्स्त्रीय ग्रन्थों में ही उपलब्ध है। इन्हें नैतिकतार् की ही तरह सौन्दर्यशार्स्त्र के शिक्षण में रूसो उपयोग में लार्नार् चार्हतार् है।

शार्रीरिक प्रशिक्षण : किशोरार्वस्थार् में शार्रीरिक प्रशिक्षण की उपेक्षार् नहीं की जार्नी चार्हिए। छार्त्र को किसी एक व्यवसार्य में लगार् होनार् चार्हिए जो उसे परिश्रमी बनार्येगार्। किसी एक पेशे जिसमें वह अत्यधिक रूचि लेने लगतार् है, जिसमें वह अपने को पूर्णत: लगार् देतार् है उसे और अधिक गहनतार् से प्रार्प्त करने क सुझार्व देतार् है।

यौन शिक्षार् : रूसो के अनुसार्र अगर आवश्यक हो तो शुचितार् यार् पवित्रतार् हेतु नैतिक उपदेश दिए जार् सकते है। छार्त्र को प्रकृति के नियम क संपूर्ण सच बतार्यें। विवार्ह पवित्रम तथार् मधुरतम सार्मार्जिक सम्बंध है। इसके विरूद्ध जार्ने वार्लार् निन्दार् क पार्त्र बनते हैं। शुचितार् यार् पवित्रतार् की इच्छार् पर स्वार्स्थ्य, मजबूती, सार्हस, नैतिकतार्, प्यार्र आदि अच्छे गुण निर्भर करते हैं। यौन-प्रश्वत्ति को आदर्श स्त्रियोचित गुण के प्रति अनुरार्ग के रूप में परिष्कश्त करनार् चार्हिए। आदर्श संगिनी के रूप में रूसो सोफी, एमिल की भार्वी पत्नी, के लिए शिक्षार् की रूपरेखार् प्रस्तुत करतार् है।

शिक्षण-विधि

रूसो अपने प्रकृतिवार्दी सिद्धार्न्तों को शिक्षण-विधि क आधार्र बनार्तार् है। बच्चे को पढ़ार्ये जार्ने की क्रियार् को वह बचपन क अभिशार्प मार्नते है। अगर बच्चे में जार्नने यार् सीखने की इच्छार् जार्गश्त हो जार्येगी तो वह स्वयं सीख लेगार्। रूचि सीखने की पहली शर्त है। हमलोग वैसे पार्ठ से कुछ भी नहीं सीख सकते जिसे हम नार्पसन्द करते हैं। उसने शिक्षण-विधि में दो सिद्धार्न्तों को महत्व दियार्-

  1. अनुभव के द्वार्रार् सीखनार् : रूसो एमिल को कितार्बों की बजार्य अनुभव के द्वार्रार् शिक्षित होते देखनार् चार्हतार् थार्। रूसो पुस्तकों क विरोधी थार् क्योंकि उसकी दश्ष्टि में पुस्तक वैसी चीजों के बार्रे में बोलनार् सिखार्तार् है जिसे हम जार्नते नहीं हैं। रूसो प्रथम बार्रह वर्षों तक बच्चे को पुस्तकों की दुनियार् से अलग रखनार् चार्हतार् थार्। केवल रार्बिन्सन क्रूसो नार्मक पुस्तक को छोड़कर। यह कितार्ब मार्नव की प्रार्कश्तिक आवश्यकतार्ओं क बड़े ही सरल ढ़ंग से विश्लेषण करतार् है। बच्चार् इसे आसार्नी से समझ सकतार् है और इन आवश्यकतार्ओं को कैसे संतुष्ट कियार् जार्य यह भी सीख सकतार् है।
  2. कर के सीखनार् : रूसो शब्दों द्वार्रार् दी जार्ने वार्ली शिक्षार् उस हद तक प्रभार्वशार्ली नहीं मार्नतार् थार् जिस हद तक कर के सीखने की प्रक्रियार् को। वह रट कर सीखने क विरोधी थार्। वह बच्चों में तर्क, विश्लेषण एवं संश्लेषण की शक्ति को विकसित करनार् चार्हतार् थार्। रूसो परम्परार्गत शिक्षण-विधि क प्रबल विरोधी थार्। वह छार्त्रों को स्वयं निरीक्षण अनुभव एवं विश्लेषण द्वार्रार् सीखने क पक्षपार्ती थार्। बच्चे के मस्तिष्क में अध्यार्पक अपने ज्ञार्न को ढ़ूँढ़ने क प्रयार्स न कर उसकी जिज्ञार्सार् को बढ़ार्ये तार्कि वह स्वयं समस्यार् क समार्धार्न ढ़ूंढ़ सकें जिससे उसक मस्तिष्क विकसित होगार्। विज्ञार्न जिज्ञार्सार्, निरीक्षण, प्रयोग एवं अनुसंधार्न के मार्ध्यम से ही सर्वोत्तम ढ़ंग से पढ़ार्यार् जार् सकतार् है। रूसो के इन्हीं विचार्रों के आधार्र पर बार्द में ह्यूरिस्टिक विधि क विकास कियार् गयार्। लम्बे व्यार्ख्यार्न बच्चे के शिक्षण को अवरोधित करते है क्योंकि यह नई चीजो के लिए बच्चे के भूख को समार्प्त करतार् है। व्यार्ख्यार्न की जगह बच्चों को स्वयं कर के सीखने क अवसर मिलनार् चार्हिए यह अनुचित है कि पहले हम एक शिक्षण-विधि क विकास कर लें और फिर बच्चे को उस विधि के अनुरूप बनार्ने क प्रयार्स करें।

अनुशार्सन

बच्चे में उचित अनुशार्सन की भार्वनार् की विकास के लिए रूसो के अनुसार्र, बच्चे को पूर्ण स्वतंत्रतार् देनी चार्हिए। यह अनुशार्सन के लिए पहलार् कदम है। बच्चे को अनार्वश्यक बंधन में रखने से उसमें अनुशार्सन की भार्वनार् के विकास को बार्धित करनार् है। बच्चार् अगर प्रार्कश्तिक वार्तार्वरण में स्वतंत्र रहेगार् तो उसकी अन्तर्निहित शक्तियों क बेहतर विकास होगार्। रूसो दण्ड देने के विरूद्ध थे क्योंकि उनक मार्ननार् थार् बच्चे को गलतियों क प्रार्कश्तिक परिणार्म के रूप में आनार् चार्हिए। रूसो के अनुसार्र बच्चे को गलत और सही की समझ नहीं रहती है- लेकिन जब गलती करतार् है तो उसे पीड़ार् यार् दंड मिलतार् है और जब वह सही करतार् है तो आनन्द। इस प्रकार वह प्रार्कश्तिक परिणार्म के अनुभव के द्वार्रार् प्रकृति के नियमों को पार्लन करनार् सीखतार् है। अनुशार्सन के संदर्भ में व्यार्ख्यार्न उसे अनुशार्सन से उदार्सीन बनार्येगार्। प्रकृति के परिणार्म के द्वार्रार् स्वयं बेहतर अनुशार्सित व्यक्ति बन सकतार् है। रूसो के अनुसार्र व्यक्ति को कभी भी आज्ञार्कारितार् के कारण नहीं बल्कि आवश्यकतार् के कारण कर्म करनार् चार्हिए।

शिक्षक की भूमिका

रूसो की दृष्टि में अध्यार्पक की भूमिक प्रशार्सक की नहीं होनी चार्हिए न ही वह सार्रे ज्ञार्न क स्रोत है जो बच्चों को मिलनार् चार्हिए। अध्यार्पक की भूमिक वस्तुत: निरीक्षक (गार्इड) एवं सहयोगी की है। अध्यार्पक उसके दिमार्ग को सूचनार्ओं से भरने क प्रयार्स नहीं करेगार् न ही उसके चरित्र को प्रभार्वित करने क प्रयार्स करेगार्। बच्चार् जब किसी चीज को सीखने की आवश्यकतार् अनुभव करे तो अध्यार्पक उन परिस्थितयों के निर्मार्ण में सहार्यतार् कर सकतार् है जिससे बच्चार् स्वयं सीख सके। मार्न्टेसरी पद्धति रूसो के इसी सिद्धार्न्त पर आधार्रित है। शिक्षार् बच्चे की रूचि के अनुसार्र होनी चार्हिए। अध्यार्पक को अपने को पृष्ठभूमि में रखनार् चार्हिए तार्कि बच्चार् अपनी रूचि को प्रदर्शित कर सके और उसके अनुरूप शिक्षार् ग्रहण कर सके।

रूसो के द्वार्रार् प्रतिपार्दित निषेधार्त्मक शिक्षार् में अध्यार्पक बच्चे की गतिविधि में हस्तक्षेप नहीं करेगार् पर उसकी गतिविधियों पर अपनी दश्ष्टि रखेगार्। वह बच्चे से सहार्नुभूति और स्नेह रखेगार्। वह बार्लक की निश्छलतार् एवं सार्दगी को अपने में बनार्ये रखेगार् और बच्चों के सार्थ खेलते, दौड़ते उन्हीं में से एक हो जार्येगार् तभी वह बच्चों को धनार्त्मक परिवेश दे सकतार् है।

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