रूसी क्रार्ंति 1917

क्रार्ंति के कारण : 

1917 की रूसी क्रार्ंति के लिए जो परिस्थितियार्ँ उत्तरदार्यी थीं, उनक ब्यौरार् है-

(1) औद्योगिक क्रार्ंति : 

19वीं शदी के उत्तराद्ध में रूस में औद्योगिक क्रार्ंति क श्रीगणेश हुआ । जिसके परिणार्मस्वरूप रूस में कर्इ औद्योगिक केन्द्र स्थार्पित हुए । इन औद्योगिक कारखार्नों में लार्खों की संख्यार् में ग्रार्मीण मजदूर आकर कार्यरत हुए और औद्योगिक केन्द्र के समीपस्त शहरों में निवार्स करने लगे । शहरी वार्तार्वरण के कारण वे पहले की तरह सीधे सार्दे नही रह गये थे। उनमें जार्गृति आने लगी थी और वे रार्जनीतिक मार्मलों में दिलचस्पी भी लेने लगे थे । इस प्रकार जन-जार्गरण के कारण उन्होंने लम्बे समय से हो रहे अपने शोषण के विरूद्ध संगठित होने क प्रयार्स कियार् और अपने अधिकारों की मार्ँग शुरू कर दी । रूस में मजदूरों ने अपने कर्इ क्लब भी स्थार्पित कर लिये थे । जहार्ँ विभिन्न प्रकार के मार्मलों में वातार्लार्प और विचार्रों क आदार्न-प्रदार्न होने लगार् । इसी पृष्ठार्धार्र पर रूस में क्रार्ंति की पृष्ठभूमि निर्मित हुर्इ । अर्थार्त् परोक्ष रूप से औद्योगिक क्रार्ंति के कारण रूस में रार्जनीतिक क्रार्ंति की पृष्ठभूमि निर्मित हुर्इ ।

(2) मार्क्र्सवार्दी विचार्रधार्रार् क प्रभार्व 

1917 की रूसी क्रार्ंति के लिए मार्क्र्सवार्दी विचार्रधार्रार् क अत्यधिक योगदार्न रहार् है। रूस क प्रथम सार्म्यवार्दी नेतार् प्लेखनार्व थार्, जो रूस में निरंकुश जार्रशार्ही को समार्प्त करके सार्म्यवार्दी व्यवस्थार् की स्थार्पनार् करनार् चार्हतार् थार्। लेकिन जार्रशार्ही शार्सन के चलते इसे स्वीट्जरलैण्ड भार्ग जार्नार् पड़ार् । वह जनेवार् में रहते हुए ‘मजदूरों की मुक्ति क आन्दोलन’ चलार्यार् । उसने मार्क्र्स की पुस्तकों क रूसी भार्षार् में अनुवार्द करके गुप्त रूप से रूस के मजदूर वर्ग को प्रदार्न करवार्ने क अथक प्रयार्स कियार् । गुप्तरूप से मजदूरों के बीच मार्क्र्सवार्दी सिद्धार्न्तों क प्रचार्र करवार्यार् । जिससे श्रमिकों पर सार्म्यवार्दी विचार्रों क गहरार् प्रभार्व पड़ार् और वे देश के कल-कारखार्नों में अपने अधिकार क स्वप्न देखने लगे । इस प्रकार मार्क्र्सवार्दी विचार्रधार्रार् से प्रभार्वित श्रमिक संगठन रूसी क्रार्ंति की आधार्रशिलार् सार्बित हुए ।

(3) बौद्धिक विचार्रों की क्रार्ंति : 

किसी भी रार्जनीतिक क्रार्ंति के पूर्व देश में बौद्धिक क्रार्ंति क होनार् नितार्न्त आवश्यक है । इसके बिनार् क्रार्ंति सम्भव नहीं होती है और यदि होती भी है तो प्रार्य: असफल हो जार्ती है । रूसी क्रार्ंति के पूर्व रूस के शिक्षित लोगों के विचार्रों में परिवर्तन आनार् आरम्भ हो गयार्। यें लोग पश्चिमी यूरोपीय ग्रन्थों क गहन अध्ययन कियार् और उनक अनुवार्द रूसी भार्षार् में करके नवीन विचार्रों क रूस में प्रचार्र कियार् । ऐसे लोगों में टार्ल्स्टार्य, दोस्तोयविस्की, तुर्गन आदि क नार्म उल्लेखनीय है । इनके क्रार्ंतिकारी विचार्रों ने रूस में उथल-पुथल मचार् दी । इस प्रकार रूस में रार्जक्रार्ंति होने से पहले रूसी जनमार्नस में जन-जार्गृति हो चुकी थी और उनके दिमार्ग में क्रार्ंतिकारी विचार्रों क समार्वेश करार् दियार् गयार् थार्। इसी कारण 1917 की रूसी क्रार्ंति अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल रही ।

(4) जार्र क निरंकुश एवं स्वेच्छार्चार्री शार्सन 

जार्र क निरंकुश एवं स्वेच्छार्चार्री शार्सन भी इस क्रार्ंति के लिए पर्यार्प्त उत्तरदार्यी थार्। जनतार् करों के बोझ से लदी थी । किसी क जीवन सुरक्षित नहीं थार्। ऐसे शार्सन से हर कोर्इ भयभीत थार्। किसी को किसी भी समय कारार्गार्र में डार्लार् जार् सकतार् थार्, यार् सार्इबेरियार् के ठंडे एवं उजार्ड़ प्रदेश में निर्वार्सित कियार् जार् सकतार् थार् । इसके अतिरिक्त जार्र ने शार्सन में जरार् भी सुधार्र करने के लिए तैयार्र नहीं थार् और न ही जनतार् को शिक्षार् एवं स्वार्स्थ्य सम्बंधी सुविधार्एँ उपलब्ध थीं । अर्थार्त् निरंकुश जार्रशार्ही के कारण देश के विकास के सभी दरवार्जे बन्द थे । ऐसी अवस्थार् में रूस के जो विद्यार्थ्र्ार्ी विदेशों से अध्ययन करके लौटे थे, वे यह अनुभव करने लगे कि उनक देश विकास और उन्नति की दौड़ में काफी पिछड़ार् हुआ है, जिसक मूल कारण जार्र की निरंकुशतार् है । अत: उन्होंने देश की प्रगति के लिए निरंकुश जार्रशार्ही क अन्त करनार् आवश्यक समझार् और इस दिशार् में उन्होंने निरंकुश एवं स्वेच्छार्चार्री शार्सन के विरूद्ध प्रचार्र करके जनतार् को जार्र के विरूद्ध भड़कानार् शुरू कियार्, जिसकी अन्तिम परिणित 1917 में क्रार्ंति के रूप में उभरकर सार्मने आयी ।

(5) 1905 की रूसी क्रार्ंति क प्रभार्व

यद्यपि 1905 की रूसी क्रार्ंति प्रत्यक्ष रूप में असफल हो गयी थी । किन्तु असफल होकर भी इसने रूसी जनतार् को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभार्वित कियार् । इस क्रार्ंति ने जनतार् में रार्जनीतिक जार्गरूकतार् उत्पन्न कर दी । अर्थार्त् इसने जनतार् को रार्जनीतिक अधिकारों से परिचित करार् दियार्। अब उसे जनतार्ंत्रिक शार्सन और मतार्धिकार क ज्ञार्न हो गयार् । अत: उसने रूस मे लोकतंत्रार्त्मक शार्सन स्थार्पित कर सत्तार् अपने हार्थों में लेनार् चार्हार्। जिसके लिए उसने एक बार्र पुन: क्रार्ंति करने क मन बनार्यार् । इसके अलार्वार् 1905 की क्रार्ंति में जो कमी यार् भूल हो गयी थीं, उस अनुभव क पूरार् लार्भ उठार्ते हुए जनतार् ने 1917 में ऐसी सुनियोजित एवं व्यवस्थित क्रार्ंति की, जो अपने लक्ष्य में पूर्णतयार् सफल रही। इस प्रकार 1917 की रूसी क्रार्ंति की सफलतार् के पीछे 1905 की रूसी क्रार्ंति क योगदार्न निश्चित रूप से थार्।

(6) प्रथम विश्वयुद्ध और रूस

1914 में जब प्रथम विश्वयुद्ध प्रार्रंभ हुआ, तब जार्र ने इसे एक पवित्र युद्ध क नार्म देकर जनतार् क ध्यार्न विश्वयुद्ध की ओर आकृष्ट कियार्, तार्कि वह जार्रशार्ही के विरूद्ध अपने असंतोष को भूल जार्य । लेकिन जब विश्वयुद्ध में रूस की परार्जय की खबरें लगार्तार्र आनार् शुरू हुर्इं, तो रूसी जनतार् क असंतोष पुन: उभर आयार् । जब जनतार् को सेनार् की परार्जय क कारण ज्ञार्त हुआ कि रूस की भ्रष्ट नौकरशार्ही एवं रिश्वतखोरी की वजह से रूसी सैनिकों को न तो अच्छे हथियार्र उपलब्ध हो पार् रहे हैं और न ही पर्यार्प्त भोजन………। ऐसी स्थिति में रूसी सैनिक मोर्चे पर बेमौत मार्रे जार् रहे हैं । अत: जनतार् क असंतोष आक्रोश में बदल गयार् । इस प्रकार एक बार्र पुन: रूस के क्षितिज पर क्रार्ंति के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगार् ।

(7) रूस में अकाल की स्थिति 

प्रथम विश्वयुद्ध में रूसी सेनार् की निरन्तर परार्जय से रूसी सेनार् में सैनिकों क नितार्न्त अभार्व हो गयार्। अत: रूसी जार्रशार्ही ने लार्खों कृषकों को कृषि कार्य से पृथक करके युद्ध के मोर्चे पर भेज दियार् । जहार्ँ पर युद्ध की अनुभवहीनतार् के कारण बहुत से किसार्न युद्ध में ढ़ेर हो गये । कृषकों की कमी से रूस की कृषि प्रभार्वित हो गयी। अनार्ज के वाषिक उत्पार्दन में भार्री कमी आ गयी । इससे रूस में अकाल की स्थिति निर्मित हो गयी। इसके अतिरिक्त युद्ध के कारण यार्तार्यार्त के सार्धन भी नष्ट हो गये थे । जिससे गार्ँवों क अनार्ज बड़े-बड़े नगरों में नहीं पहुँच पार् रहार् थार्। ऐसी स्थिति में लोग भूख से मरने लगे । रोजमर्रार् की जिन्दगी में उपयोगी वस्तुओं क सर्वथार् अभार्व हो गयार् । इससे वस्तुओं के मूल्य आसमार्न छूने लगे । निर्धन व्यक्तियों को जीवन निर्वार्ह करनार् दूभर हो गयार्। रूस में सर्वत्र दुर्भिक्ष के लक्षण दिखाइ देने लगे ।

यद्यपि वार्स्तविकतार् यह थी कि बार्जार्र में वस्तुओं क इतनार् अधिक अभार्व नहीं थार्, जितनार् कि दिखाइ दे रहार् थार्। इसके पीछे मूल कारण यह थार् कि मुनार्फार्खोर पूँजीपतियों ने प्रार्थमिक उपयोग की वस्तुओं को बार्जार्र से लोप करवार्कर अधिक कीमतों पर चोरबार्जार्री में वस्तुओं की बिक्री कर रहे थे । यदि जार्रशार्ही की नौकरशार्ही भ्रष्ट न होती तो स्थिति को नियंत्रित कियार् जार् सकतार् थार् । लेकिन जार्रशार्ही की सरकार इस दिशार् में सर्वथार् असफल रही । ऐसी हार्लत में जनतार् क आक्रोशित होनार् स्वार्भार्विक थार् । अत: आक्रोशित जनतार् ने निरंकुश जार्रशार्ही के तख्ते को उखार्ड़ फेंकने के लिए दृढ़ संकल्प हो उठी । लेकिन दूसरी तरफ जार्र और उसके सलार्हकार इस स्थिति के प्रति पूर्णतयार् उदार्सीन थे । वे भोग विलार्स और सत्तार् शक्ति के मद में इतनार् अधिक मस्त थे कि उनके पार्स इन समस्यार्ओं पर विचार्र करने के लिए न तो समय ही थार् और न ही कोर्इ रूचि थी। फलत: रूसी जनतार् ने एक बार्र फिर से 1917 में जार्रशार्ही के विरूद्ध क्रार्ंति क बीड़ार् उठार्ने के लिए तत्पर हो उठी ।

माच की क्रार्ंति क श्रीगणेश और जार्रशार्ही क पतन 

7 माच 1917 को रूसी क्रार्ंति क पहलार् विस्फोट प्रेट्रोग्रेड में हुआ । यहार्ँ के निर्धन किसार्न-मजदूरों ने भूख से व्यार्कुल होकर सड़कों पर जुलूस निकालार् और होटलों एवं दुकानों को लूटने लगे । इससे स्थिति बेकाबू होने लगी । अत: सरकार ने स्थिति पर नियंत्रण स्थार्पित करने के लिए इन पर गोली चलार्ने क आदेश दियार् । किन्तु सैनिकों ने गोली चलार्ने से इन्कार कर दियार् । क्योंकि अब तक सेनार् भी क्रार्ंतिकारी विचार्रों से प्रभार्वित हो चुकी थी। इस कारण परिस्थिति और भी गम्भीर हो गयी । अब तो रूस में जगह-जगह हड़तार्लें और आन्दोलन शुरू हो गये, चार्रों तरफ रूस में क्रार्ंति के चिन्ह दिखाइ देने लगे ।

अगले दिन 8 माच को कपड़ार् मिलों की ‘मजदूर स्त्रियार्ँ’ भी रोटी की मार्ँग करती हुर्इं हड़तार्ल शुरू कर दीं । दूसरे दिन अन्य कर्इ मजदूर भी उनके सार्थ आ मिले । उस दिन पूरे पेट्रोग्रेड में आम हड़तार्ल की गयी । हड़तार्लियों द्वार्रार् ‘रोटी दो’ ‘युद्ध बन्द करो’, ‘निरंकुश जार्रशार्ही क अंत हो’ आदि नार्रे लगार्ये जार्ने लगे । 10 माच को देशव्यार्पी हड़तार्ल की गयी। 11 माच को जार्र ने मजदूरों को काम पर लौटने क आदेश दियार्, किन्तु उन्होंने अपनी हड़तार्ल जार्री रक्खी । तब जार्र ने सैनिकों को उन पर गोलीबार्री करने क आदेश दियार् । लेकिन सैनिकों ने गोली चलार्ने से सिर्फ मनार् ही नहीं कियार्, बल्कि 25000 सैनिक हड़तार्लियों से जार् मिले । इसी दिन 11 माच को जार्र ने प्रतिनिधि सभार् ‘ड्यूमार्’ को भंग करने क आदेश दे दियार् । लेकिन ड्यूमार् ने भंग होने से मनार् कर दियार्। हड़तार्ली मजदूर और सैनिकों ने पेट्रोग्रेड में एक सोवियत की स्थार्पनार् की । अगले दिन पूरे रार्जधार्नी पर सोवियतों क अधिकार हो गयार् । अत: जार्र निकोलस विवश होकर सिंहार्सन क परित्यार्ग कर दियार् ।

इस प्रकार माच 1917 की क्रार्ंति के परिणार्मस्वरूप रूस से निरंकुश जार्रशार्ही के शार्सन क अंत हो गयार् ।

उत्तरदार्यी अस्थार्यी सरकार की स्थार्पनार् एवं उपलब्धियार्ँ 

जिस समय पेट्रोगे्रड में क्रार्ंति हो रही थी, उस समय जार्र निकोलस द्वितीय युद्ध स्थल पर थार् । वह पेट्रोग्रेड की अरार्जकतार् क अन्त करने के उद्देश्य से रार्जधार्नी जार्नार् चार्हार् । लेकिन विप्लवकारी सैनिकों ने उसे रार्जधार्नी के बजार्य विस्सार्व नगर भेज दियार्। जहार्ँ उसे बन्दी बनार् लियार् गयार् । जार्र के बन्दी हो जार्ने पर ड्यूमार् ही एक ऐसी संस्थार् थी, जो देश क शार्सन संचार्लित करती । अत: पेट्रोग्रेड की सोवियत और ड्यूमार् के अध्यक्ष रोजियार्न्को के बीच एक समझौतार् हुआ । जिसके तहत् 18 माच 1917 को एक उदार्रवार्दी नेतार् जॉर्ज ल्वार्व के नेतृत्व में एक उत्तरदार्यी सरकार की स्थार्पनार् की गयी ।

यद्यपि क्रार्ंति मजदूर वर्ग ने की थी, लेकिन शार्सन सत्तार् मध्यम वर्ग के हार्थ में चली गयी। इसक प्रमुख कारण यही थार् कि मजदूर वर्ग देश क शार्सन चार्लने में अभी अपने आपको असमर्थ महसूश कर रहार् थार् । सार्थ ही सेनार् क रूख भी निश्चित नहीं थार् और ड्यूमार् द्वार्रार् स्थार्पित सरकार के शार्सन से दूसरी क्रार्ंति क भय भी नहीं थार् ।

अस्थार्यी सरकार क गठन एवं उसके सुधार्र 

अस्थार्यी सरकार में प्रिन्स ल्वार्व प्रधार्नमंत्री के रूप में नियुक्त हुआ । इस सरकार में अन्य मंत्री बहुत योग्य थे । मिल्यूकॉव को विदेश मंत्री, करेन्सकी को न्यार्य मंत्री और युद्ध मंत्री गुचकॉव को बनार्यार् गयार् । यह मंत्रिमण्डल संवैधार्निकतार् पर विश्वार्स करतार् थार्। अत: इसी आधार्र पर इसने निम्नलिखित सुधार्र किये –

  1. देश के लिए नवीन संविधार्न निर्मित करने हेतु एक संविधार्न सभार् की घोषणार् की गयी। 
  2. रार्जनीतिक बन्दियों को मुक्त कर दियार् गयार् और जिन्हें देश से निर्वार्सित कर दियार् गयार् थार्, उन्हें वार्पस स्वदेश आने की अनुमति प्रदार्न की गयी । 
  3. यहूदी विरोधी समस्त कानूनों को समार्प्त कर दियार् गयार् । 
  4. प्रेसों को स्वतंत्रतार् प्रदार्न कर दी गयी । 
  5. भार्षण और सभार् करने की स्वतंत्रतार् दे दी गयी । 
  6. संघों के गठन की अनुमति प्रदार्न कर दी गयी । 
  7. पुलिस को मनमार्ने ढ़ंग से किसी व्यक्ति को गिरफ्तार्र करने क अधिकार समार्प्त कर दियार् गयार् । 
  8. फिनलैण्ड और पोलैण्ड को स्वार्यत्ततार् प्रदार्न करने क आश्वार्सन दियार् गयार् । 
  9. मृत्यु दण्ड निषिद्ध कर दियार् गयार् । 
  10. सभी को धामिक स्वतंत्रतार् प्रदार्न की गयी और चर्च के विशेषार्धिकारों को समार्प्त कर दियार् गयार् । 
  11. वयस्क मतार्धिकार के आधार्र पर एक विधार्न सभार् के निर्वार्चन की घोषणार् की गयी। 

सरकार की कठिनाइयार्ँ 

इस सरकार क गठन लोकतार्ंत्रिक सिद्धार्न्तों के आधार्र पर हुआ थार् । इसलिए इसकी स्थिति प्रार्रंभ से ही डार्ँवार्डोल रही । इसे कर्इ कठिनाइयों क सार्मनार् करनार् पड़ार्, जिनक बिन्दुवार्र विवरण निम्नलिखित है :-

  1. सरकार युद्ध जार्री रखनार् चार्हती थी, जबकि लगार्तार्र परार्जय के कारण रूसी सैनिक युद्ध नहीं करनार् चार्हते थे । 
  2. मजदूर वर्ग इस सरकार पर विश्वार्स नहीं करतार् थार्। इसलिए ग्रार्मीण स्तर पर मजदूर वर्ग ने कर्इ स्वतंत्र सोवियतें स्थार्पित कर ली थीं । यें सोवियतें सार्म्यवार्दी सिद्धार्न्तों को कार्यार्न्वित करनार् चार्हती थीं । इसलिए सरकार और इन सोंवियतों के मध्य परस्पर मतभेद थार्। जिससे सरकार की स्थिति दुर्बल थी । 
  3. किसार्न और मजदूर चार्हते थे कि जार्गीरदार्रों की भूमि बिनार् मुआवजार् के कृषकों में बार्ँट दी जार्य ।
  4. मजदूर वर्ग देश के महत्वपूर्ण उद्योगों क रार्ष्ट्रीकरण करनार् चार्हतार् थार् । 
  5. मजदूर वर्ग अपनी मार्ँगों को पूरार् करवार्ने के लिए हड़तार्लों क सहार्रार् लियार् और जगह-जगह आतंकवार्दी कार्य शुरू कर दिये । 

इस प्रकार स्पष्ट है कि किसार्न, मजदूर और सैनिक इस सरकार के सुधार्रों से संतुष्ट नहीं हुए । क्योंकि इसने न तो जनतार् की रोटी की समस्यार् क समार्धार्न कर पार्यी और न ही युद्ध विरार्म करके शार्न्ति ही स्थार्पित कर सकी । वार्स्तव में यह सरकार देश की वार्स्तविक समस्यार् को हल कर पार्ने में प्रार्य: असफल रही। इसलिए इसकी भी वही गति हुर्इ जो जार्रशार्ही की हुर्इ थी । फलत: इस सरकार क पतन हो गयार्।

करेन्सकी की सरकार 

ल्वार्व की सरकार के पतन के पश्चार्त् करेन्सकी को प्रधार्नमंत्री के पद पर आसीन कियार् गयार्। करेन्सकी मेन्शेविक दल क नेतार् थार् । वह क्रार्ंति और रक्तपार्त को पसन्द नहीं करतार् थार् । वह वैधार्निक तरीके से सुधार्र करके रूस में समार्जवार्द की स्थार्पनार् करनार् चार्हतार् थार् । वह युद्ध को जार्री रखनार् चार्हतार् थार्, किन्तु प्रतिष्ठार् के सार्थ युद्ध विरार्म की इच्छार् रखतार् थार्। उसने रूसी सेनार् में उत्सार्ह और जोश उत्पन्न करनार् चार्हतार् थार्, परन्तु इस दिशार् में उसे सफलतार् न मिल सकी । दूसरी तरफ बोलशेविक दल करेन्सकी की सरकार क निरन्तर विरोध कर रहार् थार् और शार्ंति, भूमि और रोटी (Peace, Land, Bread) के नार्रे लगार् रहार् थार्। अगस्त 1917 में करेन्सकी ने रार्ष्ट्र की संकटार्पन्न स्थिति पर विचार्र करने के लिए एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलार्यार् । किन्तु इस सम्मेलन में समार्जवार्दियों के आपसी मतभेद के कारण कोर्इ खार्स निर्णय नहीं हो सक । अत: समार्जवार्दियों के परस्पर मतभेद के कारण बोलशेविक दल को अपनार् प्रभार्व बढ़ार्ने क अच्छार् अवसर मिल गयार् । इसी बीच करेन्सकी और रूसी सेनार्पति कार्नीलार्व के बीच मतभेद उत्पन्न हो गयार् । कार्नीलार्व मनमार्ने ढ़ंग से रूसी सेनार् क संचार्लन शुरू कर दियार् । अत: करेन्सकी ने कार्नीलार्व को विद्रोही करार्र दियार् और इस सैनिक विद्रोह क दमन वोलशेविकों की सहार्यतार् से करने में सफल हुआ । इससे वोलशेविकों के प्रभार्व में अत्यधिक वृद्धि हो गयी ।

केडेट दल (क्रार्ंतिकारी समार्जवार्दी दल) और मेन्शेविक दल के मंत्री करेन्सकी की नीतियों से असंतुष्ट होकर मंत्रीमण्डल से त्यार्गपत्र दे दिये । जिससे करेन्सकी को बड़ी कठिनाइ के सार्थ पार्ँच सदस्यीय नयार् मंत्रीमण्डल क गठन करनार् पड़ार् । यद्यपि इस मंत्रीमण्डल में कोर्इ प्रभार्वशार्ली व्यक्ति नहीं थार् । लगभग इसी दरम्यार्न वार्मपन्थी समार्जवार्दी दल भी करेन्सकी क विरोधी हो गयार् । फलत: परिस्थिति क लार्भ उठार्ने के लिए वोलशेविक दल सशस्त्र क्रार्ंति करके सत्तार् हथियार्ने की योजनार् बनार्ने लगार् । इससे स्पष्ट हो गयार् कि करेन्सकी सरकार भी अधिक दिनों तक टिकने वार्ली नहीं है ।

बोल्शेविक क्रार्ंति 

वार्स्तव में माच 1917 की रूसी क्रार्ंति को असंतुष्ट कृषक और मजदूर वर्ग ने ही संभव बनार्यार् थार्। लेकिन उन्हें क्रार्ंति क कोर्इ लार्भ नहीं मिलार् । क्योंकि उस क्रार्ंति से जार्रशार्ही के शार्सन क अंत अवश्य हो गयार्, लेकिन सत्तार् अस्थार्यी सरकार के रूप में मध्यम वर्ग के हार्थों में चली गयी । तार्त्कालिक सरकार ने भी युद्ध बन्द करने के लिए कोर्इ प्रयार्स नहीं कियार् । युद्ध में भार्गीदार्री भी यथार्वत रखी गयी । इसके अतिरिक्त इस सरकार द्वार्रार् न तो सार्मन्ती व्यवस्थार् क अन्त कियार् गयार् और न ही भूमि क समार्न रूप से कृषकों में वितरण कियार् गयार् । बल्कि उसने पूँजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच अन्तर बनार्ये रखने क प्रयार्स कियार् तथार् मजदूरों पर वही पुरार्ने औद्योगिक कानून लार्दनार् चार्हार् । अत: रूस क कृषक और मजदूर वर्ग भड़क गयार् और उसके जमींदार्रों को लूटनार् मार्रनार् शुरू कर दियार् । मजदूर वर्ग ने काम के घण्टे कम करने तथार् वेतन बढ़ार्ने के लिए हड़तार्ल शुरू कर दी । सैनिक विद्रोही रूख अपनार्कर रणक्षेत्र से वार्पस लौटने लगे। 7 नवम्बर को बोल्शेविकों ने पेट्रोग्रेड के समस्त भवनों एवं रेल्वे स्टेशन पर कब्जार् कर लियार् । इस प्रकार सम्पूर्ण रूस में अरार्जकतार् व्यार्प्त हो गयी । लोगों क सरकार पर से भरोसार् उठ गयार् । ऐसे हार्लार्त में करेन्सकी परिस्थिति को सम्भार्लने में असमर्थ रहार् और वह रूस छोड़कर भार्ग गयार् । उसके समस्त सार्थी बन्दी बनार् लिये गये । इस प्रकार रक्त की एक बूँद बिनार् बहार्ये बोल्शेविकों ने पैट्रोग्रेड पर कब्जार् कर लियार् ।

करेन्सकी की सरकार के पतन के पश्चार्त् रूस की सत्तार् वोल्शेविक नेतार् लेनिन तथार् ट्रॉटस्की के हार्थों में आ गयी । इन्होंने एक अस्थार्यी सरकार क गठन कियार् । जिसमें लेनिन चेयरमैन और ट्रॉटस्की विदेश मंत्री बनार् । लेनिन ने रूस में पूर्णतयार् सर्वहार्रार् वर्ग क अस्थिार्नार्यकत्व स्थार्पित कियार् ।

इस प्रकार 1917 की वोल्शेविक क्रार्ंति ने सच्चे अर्थों में रूस में मजदूर सरकार की स्थार्पनार् की । जिसने रूस में एक ऐसी नवीन व्यवस्थार् स्थार्पित की जिसमें न तो कोर्इ शोषक थार् और न कोर्इ शोषित । 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *