रूसी क्रार्ंति 1905

क्रार्ंति क तार्त्पर्य – 

क्रार्ंति क अर्थ मार्त्र रक्तपार्त नहीं है, बल्कि अत्यन्त शीघ्रतार् के सार्थ होने वार्ले आमूल परिवर्तन को क्रार्ंति कहार् जार्तार् है । एक रूसी विद्वार्न ने कहार् है कि क्रार्ंति उस समय होती है, जब उसके पीछे कोर्इ सार्मार्जिक मार्ँग होती है । क्रार्ंति के सम्बंध में लाड मैकाले क कथन है कि “क्रार्ंति और विप्लव क मुख्य कारण देश की जनतार् क आगे बढ़ जार्नार् और देश के संविधार्न क वहीं डटे रहनार् है।” विक्टर ह्यूगो के अनुसार्र “क्रार्ंति ऐसी बिजली है, जो एकाएक छूट पड़ती है, कौंध जार्ती है, ऐसी चिंगार्री है जो अचार्नक प्रज्ज्वलित हो जार्ती है।” रूसी क्रार्ंति के समय रूस में उक्त सभी परिस्थितियार्ँ दृष्टिगोचर होती हैं । यह क्रार्ंति कोर्इ आकस्मिक घटनार् नहीं थी अपितु इसकी पृष्ठभूमि शतार्ब्दियों से क्रमश: निर्मित हो रही थी, जिनक विस्तृत विवरण अग्रलिखित है :-

क्रार्ंति के कारण :-

1905 की रूसी क्रार्ंति के लिए जो परिस्थितियार्ँ उत्तरदार्यी थीं, उनक विवरण निम्नार्नुसार्र प्रस्तुत है –

(1) रूस क औद्योगिक विकास – 

रूसी जार्र अलेक्जेण्डर तृतीय (1881-94 र्इ.) क शार्सन निरंकुश एवं स्वेच्छार्चार्री होते हुए भी उसके शार्सनकाल में रूस क औद्योगिक विकास पर्यार्प्त हुआ । जिसके फलस्वरूप रूस में कर्इ कल-कारखार्ने स्थार्पित किये गये । इन कल-कारखार्नों में कार्य करने के लिए गार्ँव-गार्ँव से मजदूर काफी तार्दार्त में जार् पहुँचे । अभी तक यें मजदूर गार्ँव में पृथक-पृथक कृषि कार्य में संलगन रहते थे और दूर-दूर अपनी-अपनी झोपड़ियार्ँ बनार् कर रहते थे । लेकिन अब वे कारखार्नों में सार्थ-सार्थ कार्य करने लगे और एक सार्थ मजदूर कालोनियों में निवार्स करने लगे । जिसके परिणार्मस्वरूप उनमें परस्पर एकतार् की भार्वनार् क प्रार्दुर्भार्व हुआ ।

औद्योगीकरण क एक परिणार्म यह भी सार्मने आयार् कि रूस में नगरों एवं शहरों की संख्यार् में वृद्धि हुर्इ । शहरी वार्तार्वरण क सीधार् प्रभार्व मजदूर कालोनियों पर पड़ार्, जिससे मजदूर वर्ग में जार्गरूकतार् आ गयी और वे अपने अधिकारों को समझने लगे । इसलिए वे अपने शोषण के विरूद्ध और अपने अधिकारों को पार्ने के लिए सोचने लगे । जब इन मजदूर कालोनियों में समार्जवार्दी नेतार्ओं द्वार्रार् समार्जवार्दी सिद्धार्ंतों क प्रचार्र कियार् गयार्, तब वे रार्जनीतिक अधिकारों की मार्ँग शुरू कर दी । लेकिन जब जार्र द्वार्रार् इनकी मार्ँगों को पूरार् नहीं कियार् गयार्, तो रूस में क्रार्ंति की स्थिति निर्मित हो गयी ।

इस प्रकार जैसार् कि इतिहार्सकार हेजेन लिखते हैं कि “अलेक्जेण्डर तृतीय ने परोक्ष रूप से अपने सुधार्रों द्वार्रार् रूस में उन शक्तियों को जन्म दियार्, जो अन्तत: तत्कालीन रार्जनीतिक, आर्थिक एवं सार्मार्जिक व्यवस्थार् के लिए घार्तक सिद्ध हुर्इं।”

(2) निरंकुश जार्रशार्ही –

रूस में रार्जतंत्रीय शार्सन व्यवस्थार् थी । यहार्ँ के जार्र निरंकुशतार् के उपार्सक थे। वे दैवी अधिकार के सिद्धार्न्त पर विश्वार्स करते थे । अलेक्जेण्डर तृतीय घोर निरंकुश थार् । उसकी मृत्यु के पश्चार्त् उसक पुत्र निकोलस द्वितीय सिंहार्सनार्रूढ़ हुआ। तब रूसी जनतार् ने नये जार्र से शार्सन में सुधार्र की आशार् की । लेकिन उसकी आशार्ओं में शीघ्र ही तुषार्रार्पार्त हो गयार् । क्योंकि निकोलस द्वितीय ने रार्ज्यार्भिषेक के दिन घोषित कियार् कि “मैं एकतन्त्र स्वेच्छार्चार्री शार्सन के सिद्धार्न्तों क उसी दृढ़तार् के सार्थ अनुसरण करूँगार्, जैसे कि मेरे पूर्वज करते आये हैं ।”

निकोलस निरंकुश होने के सार्थ-सार्थ दुर्बल प्रकृति और अनिश्चित स्वभार्व क भी थार्। उस पर उसकी पत्नी जरीनार् क अत्यधिक प्रभार्व थार् । इसके अतिरिक्त रार्सपुटिन नार्मक पार्दरी, प्रतिक्रियार्वार्दी पोबीदोनोस्टेव तथार् प्लेहव क भी प्रभार्व थार् । ऐसे लोगों की सलार्ह पर शार्सन चलार्ने क परिणार्म यह हुआ कि पूरे रूसी प्रशार्सन में प्रतिक्रियार् के बार्दल छार् गये । निकोलस प्रतिनिधि सभार्ओं के सुझार्वों को मूर्खतार्पूर्ण स्वप्न कहार् करतार् थार्। उसने जनतार् पर असहनीय करों क बोझ लार्द दियार्। प्रेसों में सेंसर लगार् दियार्। शिक्षण संस्थार्ओं को गुप्तचरों से भर दियार्। किसी क जीवन सुरक्षित नहीं थार्। किसी को कभी भी जेल में डार्लार् जार् सकतार् थार् यार् सार्इबेरियार् के ठंडे उजार्ड़ प्रदेश में निर्वार्सित कियार् जार् सकतार् थार्। इन परिस्थितियों में जनतार् क असंतोष तीव्र होने लगार्, जो आगे चलकर क्रार्ंति के रूप में प्रस्फुटित हुआ ।

(3) रूसी जार्तियों पर अत्यार्चार्र –

इस समय रूस में अ-रूसी जार्तियों जैसे पोल, फिन, यहूदी आदि निवार्स करती थीं। यें जार्तियार्ँ अपनी सभ्यतार्-संस्कृति के प्रति अत्यधिक कट्टर थीं और स्वतंत्र होने के लिए प्रयत्नशील थीं । जबकि जार्र इनक रूसीकरण करनार् चार्हतार् थार् । इन अ-रूसी जार्तियों ने जार्र के इस मनसूबे के विरूद्ध विरोध क झण्डार् खड़ार् कियार्, जिसक जार्र ने बड़ी निरंकुशतार् के सार्थ दमन करनार् शुरू कियार् । इससे रूस में अ-रूसी जार्तियों के कारण जार्रशार्ही के विरूद्ध असंतोष और व्यार्पक हो गयार्, जो रूसी क्रार्ंति की अनिवायतार् को बलवती बनार्यार् ।

(4) बौद्धिक क्रार्ंति –

किसी भी क्रार्ंति के लिए देश में बौद्धिक जार्गरण क होनार् नितार्न्त आवश्यक है। इसके बिनार् रार्जनितिक क्रार्ंति संभव नहीं हो सकती और यदि होती भी है तो वह प्रार्य: असफल हो जार्ती है ।

रूस में क्रार्ंति के पूर्व विद्वार्नों एवं लेखकों ने जार्र के विरूद्ध अनेंक पुस्तकें लिखकर प्रचार्र कियार् तथार् जनतार् में जार्गरूकतार् पैदार् की । ऐसे लेखकों में टार्ल्स्टार्य, मेक्सिम गोर्की, एवं दार्स्तार्वेस्की क नार्म विशेष उल्लेखनीय है । इन्होंने अपने क्रार्ंतिकारी विचार्रों से जनतार् को निरंकुश जार्रशार्ही के विरूद्ध प्रेरित कियार् । इसी समय बहुत से रूसी नवयुवक भी विदेशों से शिक्षार् प्रार्प्त कर वार्पस अपने देश लौटे, जो जार्र के दैवी सिद्धार्ंत को मार्नने के लिए तैयार्र न थे और इन्होंने अपने देश में उदार्र सरकार स्थार्पित करने क प्रयत्न कियार्। अपने “लिबरेशन” नार्मक समार्चार्र पत्र के मार्ध्यम से निरंकुश जार्रशार्ही के विरूद्ध पुरजोर प्रचार्र कियार् । 1904 र्इ. में इन्होंने ‘यूनियन आफ लिबरेटर्स’ नार्मक संस्थार् की स्थार्पनार् करके अपने कार्य को और गति प्रदार्न की । जिससे रूस में सर्वत्र निरंकुश जार्रशार्ही के विरूद्ध वार्तार्वरण निर्मित होतार् चलार् गयार्, जो अन्तत: क्रार्ंति के रूप में उदीयमार्न हुआ ।

(5) रूस में विभिन्न रार्जनीतिक दलो क अभ्यूदय –

इस समय रूस में रार्जनीतिक परिस्थितियार्ँ काफी तेजी से परिवर्तित हो रहीं थी। उसी समय कार्ल मार्क्र्स के सिद्धार्ंतों क प्रचार्र भी तीव्र गति से हो रहार् थार्। निहिलिस्ट पाटी पुन: अपनी शक्ति को संगठित करने में संलग्न थी । अरार्जकतार्वार्दी पाटी और सोसल डमोक्रेटिक पाटी की भी स्थार्पनार् हो गयी । अरार्जकतार्वार्दी पाटी ने नार्रार् दियार् कि “देश को सरकार की आवश्यकतार् नहीं है, क्योंकि वह जनतार् क दमन करती है ।” सोसल डमोक्रेटिक पाटी के सदस्य मुख्यत: किसार्न और मजदूर थे । कालार्न्तर में यह पाटी बोल्शेविक एवं मेन्शेविक पाटियों में विभार्जित हो गयी । यद्यपि इन सभी रार्जनीतिक पाटियों के सिद्धार्ंत परस्पर भिन्न-भिन्न थे, लेकिन इन सभी क एक ही उद्देश्य थार् कि जार्र के शार्सन क अंत करके रूस में जनतंत्रार्त्मक सरकार की स्थार्पनार् की जार्य । अत: यें सभी रार्जनीतिक पाटियार्ँ सार्मूहिक रूप से मजदूरों को जार्रशार्ही शार्सन के विरूद्ध भड़कानार् शुरू कियार्, जिसके परिणार्मस्वरूप रूस में क्रार्ंति की स्थिति निर्मित हो सकी।

(6) रूस-जार्पार्न युद्ध (1904-05 र्इ.) :

इस युद्ध में जार्पार्न जैसे छोटे देश से रूस बुरी तरह परार्जित हो गयार् । इससे रूसी शार्सन की अयोग्यतार् और भ्रष्टार्चार्र क भार्ंडार् फूट गयार् । अत: रूस में निरंकुश जार्रशार्ही के विरूद्ध व्यार्प्त असंतोष आक्रोश में परणित हो गयार् । आक्रोशित जनतार् ने 1904 र्इ. में घोर प्रतिक्रियार्वार्दी मंत्री प्लेहव की हत्यार् कर दी । अत: जार्र ने प्लेहव के स्थार्न पर एक उदार्र व्यक्ति प्रिंस मिस्र्की को अपनार् मंत्री बनार्यार् । जिसने कुछ सुधार्र करने क प्रयार्स भी कियार्। लेकिन जार्र सुधार्र के लिए रार्जी न हुआ । जिससे मजदूर संघ द्वार्रार् कारखार्नों में हड़तार्ल कर दी गयीं । मजदूर बार्जार्रों में जुलूस निकालने लगे । फिर भी जार्र क रवैयार् नहीं बदलार् और उसक दमन चक्र जार्री रहार् । फलत: रूस में व्यार्प्त आक्रोश क्रमश: क्रार्ंति क स्वरूप धार्रण करने लगार्।

(7) तार्त्कालिक कारण (खूनी रविवार्र) :

22 जनवरी 1905, रविवार्र को सेण्ट पीटर्सवर्ग के मजदूर हजार्रों की तार्दार्त में फार्दर गेपन नार्मक पार्दरी के नेतृत्व में जार्र को अपनी कठिनाइयार्ँ सुनार्ने के लिए एक शार्न्त जुलूस में जार् रहे थे । उनके पार्स कोर्इ हथियार्र भी नहीं थार् । फिर भी ज्यों ही जुलूस रार्ज प्रसार्द के समीप पहुँचार्, तो जार्र के इशार्रे पर सैनिकों ने उन्हें गोलियों से भून दियार्। जिसमें अनेंक मजदूर मार्रे गये । रार्ज महल के सार्मने लार्शों क ढ़ेर लग गयार् । इतिहार्स में यह घटनार् खूनी रविवार्र के नार्म से प्रसिद्ध है। इस घटनार् के कारण रूस के क्षितिज पर क्रार्ंति के बार्दल छार् गये और शीघ्र ही पूरार् रूस क्रार्ंति के आगोश में समार् गयार् ।

क्रार्ंति की घटनार्एँ 

खूनी रविवार्र की घटनार् ने रूसी जनतार् को भड़क दियार् । इससे रूस में सर्वत्र क्रार्ंति के चिन्ह प्रकट होने लगे । जगह-जगह पुलिस तथार् सरकारी अधिकारियों क वध कियार् जार्ने लगार्। सर्वत्र अग्निकाण्ड क तार्ण्डव शुरू हुआ । देहार्तों में किसार्नों की भीड़ जमीदार्रों को लूटने लगी और उनक वध करने लगी । उनके घर-सम्पत्ति को आग के हवार्ले कर दियार् । चार्रो तरफ अरार्जकतार् छार् गयी । जार्र के चार्चार् सर्जियस की हत्यार् कर दी गयी । हर तरफ से सुधार्र की मार्ंग होने लगी । अत: जोसटोप के वैधार्निक शार्सन की मार्ँग करने वार्ले सदस्यों के सार्थ श्रमिक आन्दोलन के संचार्लकों ने मिलकर अगस्त 1905 में जार्र को प्रतिनिधि सभार् की स्थार्पनार् करके शार्सन में सुधार्र करने की घोषणार् करने के लिए विवश कियार् । जार्र ने अपने प्रतिक्रियार्वार्दी मंत्री थोबीडोनो स्टैफ को पदच्युत करके उसके स्थार्न पर काउण्ट विटे को मंत्री नियुक्त कियार् और घोषणार् की कि ड्यूमार् की बिनार् अनुमति के कोर्इ भी कानून लार्गू नहीं होगार्। लेकिन जार्र ने अपनी दूसरी घोषणार् के द्वार्रार् प्रथम घोषणार् के प्रभार्व को सीमित कर दियार् । जिससे सुधार्रवार्दियों के मन्सूबे पर पार्नी फिर गयार्। यद्यपि ड्यूमार् क निर्वार्चन भी हुआ, उसक अधिवेशन भी बुलार्यार् गयार्, लेकिन सुधार्र की मार्ँगे पूरी न हो सकीं। बल्कि जार्र द्वार्रार् सुधार्रवार्दी क्रार्ंतिकारियों क बड़ी कठोरतार् के सार्थ दमन कर दियार् गयार् और रूस में पुन: जार्रशार्ही की निरंकुशतार् स्थार्पित हो गयी। इस क्रार्ंति की स्मृति के बतौर एक मार्त्र निर्बल ड्यूमार् ही अवशेष रही । इस प्रकार 1905 में हुर्इ रूसी क्रार्ंति अपने इच्छित लक्ष्य को प्रार्प्त करने में असफल हो गयी ।

क्रार्ंति की असफलतार् के कारण 

1905 की रूसी क्रार्ंति कर्इ कारणोवश असफल हो गयी, जिनमें कुछ प्रमुख कारणों क विवरण निम्नार्नुसार्र प्रस्तुत है –

(1) रार्जनीतिक दलों में परस्पर एकतार् क अभार्व 

क्रार्ंति क संचार्लन विभिन्न रार्जनीतिक दलों द्वार्रार् कियार् जार् रहार् थार्। इन दलों क उद्देश्य तो एक थार्, लेकिन इनके सिद्धार्ंत भिन्न-भिन्न थे । जिससे इनमें परस्पर समंजस्य स्थार्पित नहीं हो पार्यार् और उनके बीच एकतार् क अभार्व बनार् रहार् । इससे क्रार्ंति की गति धीमी हो गयी और वह अपने उद्देश्य को पार्ये बगैर ही असफल हो गयी ।

(2) क्रार्ंति में नेतृत्व की कमी 

रूस की निरंकुश जार्रशार्ही क अंत करने के लिए और रूसी शार्सन व्यवस्थार् में सुधार्र लार्ने के लिए यह क्रार्ंति की गयी थी, किन्तु इस क्रार्ंति में विभिन्न सिद्धार्ंत वार्ले व्यक्तियों एवं रार्जनीतिक दलों ने भार्ग लियार् थार् । जो अपनी-अपनी योजनार्नुसार्र क्रार्ंति को संचार्लित कियार्, जिससे क्रार्ंति के संचार्लन में एकरूपतार् नहीं आ पार्यी । अर्थार्त् क्रार्ंति में नेतृत्व विहीनतार् की स्थिति निर्मित हो गयी । जिसके कारण क्रार्ंति व्यवस्थित एवं सुनियोजित तरीके से संचार्लित नहीं हो सकी और अन्तत: असफल हो गयी ।

(3) क्रार्ंतिकारियों के पार्स धन क अभार्व 

1905 की रूसी क्रार्ंति की असफलतार् क कारण क्रार्ंतिकारियों के पार्स धन की कमी भी थी। जिसके अभार्व में क्रार्ंतिकारी हथियार्र सार्मग्री नहीं जुटार् पार्ये । हथियार्रों के अभार्व में निहत्थे क्रार्ंतिकारियों क जार्र की सेनार् द्वार्रार् दमन कर दियार् गयार् । इसके अतिरिक्त धन की कमी क्रार्ंति को व्यवस्थित ढ़ंग से संचार्लित करने में भी आड़े आयी ।

(4) रूसी सेनार् क जार्र के प्रति वफार्दार्र होनार् 

इस क्रार्ंति की असफलतार् क एक मुख्य कारण यह भी थार् कि रूसी सेनार् जार्र क भरपूर सहयोग दियार् और उसके आदेश क अक्षरश: पार्लन करते हुए उसने क्रार्ंतिकारियों पर आक्रमण कियार् । जिससे क्रार्ंति की गति कमजोर पड़ गयी और वह असफल हो गयी ।

(5) क्रार्ंतिकारियों को विदेशों से सहयोग न मिलनार् :

1905 की क्रार्ंति इसलिए भी असफल हो गयी, क्योंकि विदेशों की जनतार्ंत्रिक सरकारों द्वार्रार् रूसी क्रार्ंतिकारियों क कोर्इ सहयोग नहीं कियार् गयार् । अगर क्रार्ंतिकारियों को विदेशी सहयोग मिलतार् तो रूसी क्रार्ंति क परिणार्म कुछ और ही होतार् ।

क्रार्ंति क प्रभार्व 

1905 की रूसी क्रार्ंति के मार्ध्यम से सुधार्रवार्दियों द्वार्रार् कियार् गयार् प्रयार्स निष्फल हो गयार् और रूस में एक बार्र पुन: जार्रशार्ही की निरंकुशतार् स्थार्पित हो गयी । जार्र निकोलस द्वितीय ने स्टार्लिपिन नार्मक एक प्रतिक्रियार्वार्दी को अपनार् प्रधार्नमंत्री नियुक्त कियार्। उसने पुलिस को विशेषार्धिकार प्रदार्न करके क्रार्ंतिकारियों क बड़ी कठोरतार् से दमन कियार्। हजार्रों की संख्यार् में लोग फार्ँसी पर चढ़ार् दिये गये और अनेंक लोगों को सार्इबेरियार् निर्वार्सित कर दियार् गयार् । उसने मतार्धिकार को सीमित करके ड्यूमार् को निर्बल बनार् दियार् और उसके क्रार्ंतिकारी स्वरूप क अंत कर दियार्। किसार्न वर्ग को क्रार्ंति से पृथक करने के लिए उन्हें मीर के अधिकार से मुक्त करके उनको भूमि स्वार्मी बनार् दियार् गयार् । इन कार्यों से स्टार्लिपिन के प्रति विरोध बहुत बढ़ गयार् और सितम्बर 1911 में उसकी हत्यार् कर दी गयी। लेकिन उसकी हत्यार् के बार्द भी रूस में प्रतिक्रियार्वार्द क अंत नहीं हुआ और देश तब भी सभी जुल्मों को सहन कर रहार् थार् । ऐसार् प्रतीत हो रहार् थार् कि क्रार्ंति क अंत हो गयार् है, जबकि वार्स्तव में क्रार्ंति क अंत नहीं हुआ थार्, बल्कि वह भूमिगत होकर अन्दर ही अन्दर सुलगती रही, जिसक भयंकर विस्फोट 1917 की क्रार्ंति के रूप में हुआ, जिसने निरंकुश जार्रशार्ही के तख्ते को उखार्ड़ फेंक और उसके स्थार्न पर समार्जवार्दी शार्सन व्यवस्थार् की स्थार्पनार् संभव हुर्इ । इस क्रार्ंति के सम्बंध में लिप्सन महोदय ने ठीक ही कहार् है कि “जार्र की अन्धी सरकार ने समय को नहीं पहचार्नार् । उसने अवसर को हार्थ से खो दियार्। फलत: सुधार्र आन्दोलन क्रार्ंतिकारी हो गयार्, जिसने आगे चलकर जार्र के अस्तित्व को ही समार्प्त कर दियार्। सार्थ ही उसने रूसी सार्मार्जिक व्यवस्थार् को भी एक नयी दिशार् में परिवर्तित कर दियार्।”

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