रार्ष्ट्रकूट वंश इतिहार्स
रार्ष्ट्रकूट वंश वार्ले बार्दार्मी के चार्लुक्यों के सार्मन्त थे । रार्ष्ट्रकूट वंश क प्रथम प्रसिद्ध शार्सक दंतिदुर्ग थार्। उसने अपने अधिरार्ज विक्रमार्दित्य प्रथम की सहार्यतार् उस समय की थी जब वह पल्लवों से युद्ध कर रहार् थार् । रार्ष्ट्रकूट वंशों ने र्इस्वी की आठवी शतार्ब्दी के मध्य में चार्लुक्यों की अधीनतार् क जुआ उतार्र फेंक और वे दक्षिण में एक नर्इ शक्ति के रूप में उभरे । रार्ष्ट्रकूटों ने मार्लखेड से शार्सन शुरू कियार् और धीरे-धीरे वे उत्तरी महार्रार्ष्ट्र और कर्नार्टक तक फैल गए । इनक संघर्ष पूर्वी चार्लुक्यों, पल्लवों और पार्ण्डयों से थार् । उन्होंने मार्लवार्, कौशल और कलिंग से अपनार् आधिपत्य स्वीकार करार्यार् । गोविन्द तृतीय रार्ष्ट्रकूटों के महार्न शार्सकों में से थार् । वह एक योग्य सेनार् नार्यक थार् । उसकी सेनार् गंगार्-यमुनार् दोआब तक पहुंची । उसने उत्तर के प्रतीहार्र रार्जार् नार्गभट्ट द्वितीय को परार्जित कियार् । उसने कन्नौज और बंगार्ल के शार्सकों से अपनार् अधिपत्य स्वीकार करार्यार् । पश्चिम में भड़ौच के शार्सक ने उसक स्वार्गत कियार्। दक्षिण मे उसने मार्ण्डय, चोल, पल्लव, गंग वंश के रार्जार्ओं को परार्जित कियार् । श्रीलंक ने सदभार्व बनार्ए रखने के लिए अपनार् रार्जदूत उसके दरबार्र में भेजार् ।

गोविन्द तृतीय के बार्द रार्ष्ट्रकूटों की शक्ति कम होने लगी । उसक उत्तरार्धिकारी अमोष वर्ष एक योग्य सेनार् नार्यक नहीं थार् परन्तु वह धर्म और सार्हित्य क पोषक थार् । इन्द्र तृतीय (915-927) और कृष्ण तृतीय (929-965) के अधीन रार्ष्ट्रकूटों की शक्ति क पुनरूत्थार्न हुआ । इन्द्र तृतीय ने प्रतीहार्र रार्जार् को परार्जित कर कन्नौज लूटार् । कृष्ण तृतीय की सेनार्एं बढ़ते-बढ़ते कन्यार् कुमार्री तक पहुंची । उसने चोल रार्जार् से युद्ध कियार् । उसकी मृत्यु के बार्द रार्ष्ट्रकूटों की सैनिक शक्ति घट गर्इ । परमार्र रार्जार् सीमक ने भार्लखेड को लूटार् (972) । रार्ष्ट्रकूटों के आन्तरिक विवार्दों के कारण रार्ष्ट्रकूट रार्ज्य क अन्त हो गयार् ।

रार्ष्ट्रकूूटोंं क योगदार्न

रार्ष्ट्रकूटों के एक रार्जनैतिक शक्ति के रूप में उभरने के बार्द प्रत्येक क्षेत्र में उल्लेखनिय प्रगति हुर्इ । वे केवल योग्य सेनार् नार्यक होने के सार्थ-सार्थ योग्य प्रशार्सक भी थे । रार्ष्ट्रकूटों की रार्जनीति में रार्जार् समस्त शक्ति क स्त्रोत थार् । उन्होंने महार्रार्जार्धिरार्ज, परमभट्टार्रक जैसी उपार्धियार्ं धार्रण की । उसकी सहार्यतार् के लिए एक मंत्री परिषद थी । उनकी शार्सन व्यवस्थार् में लगार्न, न्यार्य, वित्त आदि के अलग-अलग विभार्ग थे । प्रत्येक विभार्ग क अध् यक्ष मंत्री थार् । समस्त रार्ज्य रार्ष्ट्र (प्रार्न्त) और विषय (जिलार्) में बंटार् हुआ थार् । प्रशार्सन की मूल इकार्इ गार्ंव थार् । इसके अतिरिक्त ऐसे सार्मन्ती प्रदेश भी थे जिनके शार्सकेार्ं ने रार्ष्ट्रकूट रार्जार् को अपनार् अविरार्ल स्वीकार कर लियार् थार् और उसे भेंट देते थे । इससे आय में वृद्धि हुर्इ । रार्जार् को भूमि, वन और खार्नों से भी आय होती थी ।

रार्ष्ट्रकूटों क सार्ंस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदार्न है । रार्ष्ट्रकूट दरबार्र में संस्कृत के विद्वार्नों के सार्थ-सार्थ कवि भी थे जिन्होंने प्रार्कृत और अपभ्रशं भार्षार् में लिखार्, अपभ्रश भार्षार् से ही आद्य भार्षार्ओं की उत्पत्ति हुर्इ है । रार्ष्ट्रकूट रार्जार् अमोधवर्ष ने स्वयं एक कवितार् ग्रंथ लिखार् थार् कविरार्ज माग के नार्म से प्रसिद्ध है । कन्नड़ सार्हित्य में इसे उत्कृष्ट कृति मार्नार् जार्तार् है । रार्ष्ट्रकूट शार्सक सहनशील थे । उन्होंने जैन, बौद्ध और शेैव धर्म को संरक्षण प्रदार्न कियार्। उनके द्वार्रार् बनवार्ए गए मन्दिर उनकी भक्ति भार्वनार् क प्रतीक है । दन्तिदुर्ग के उत्तरार्धिकारी कृष्ण प्रथम ने ऐलोरार् में चट्टार्नों को काटकर कैलार्श मन्दिर बनवार्यार् थार् । यह रार्ष्ट्रकूटों के समस्त स्मार्रकों में सर्वार्धिक प्रसिद्ध है । पर्वत की चट्टार्नों को काटकर बनार्ए गए इस विशार्ल मन्दिर में दक्षिण और सुदूर दक्षिण की वार्स्तुकलार् क समन्वय देखने को मिलतार् है । यह समन्वय शार्यद इस क्षेत्र में होने वार्ले निरन्तर युद्धों क ही फल थार् । ऐलीफेंटार् और मार्लखेड के मन्दिर भी रार्ष्ट्रकूट वार्स्तुकलार् के सुन्दर उदार्हरण प्रस्तुत करते हैं । विश्वार्स कियार् जार्तार् है कि अमोध वर्ष एक सच्चार् जैन थार् और उसने अनेक मन्दिर बनवार्ए थे । रार्ष्ट्रकूट रार्जार्ओं ने इस्लार्म धर्म को छूट दे रखी थी । तटीय नगरों में मस्जिदें बनवाइ गर्इ है । सहिष्णुतार् की नीति के फलस्वरूप ही रार्ष्ट्रकूट संस्कृति को सम्पन्नतार् प्रार्प्त हुर्इ ।

चार्लुक्यों की सत्तार् को उखार्ड़ कर रार्ष्ट्रकुट वंश सत्तार् में आयार् । उन्होंने दन्ति दुर्ग, गोविन्द तृतीय, इन्द्र तृतीय और कृष्ण तृतीय जैये योग्य सेनार्नार्यक और शार्सकों के नेतृत्व में एक विशार्ल सार्म्रार्ज्य स्थार्पित कियार् वे अच्छे प्रशार्सक थे जिसके फलस्वरूप उन्होंने सार्म्रार्ज्य को सुदृढ़ कियार्। उन्होंने धामिक सहिष्णुतार् की नीति अपनाइ और अनेक मंदिर बनवार्ए । उनक वस्तुकलार् क सुन्दर नमूनार् ऐलोरार् क कैलार्श मन्दिर है ।

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