यूरोप में वैज्ञार्निक क्रार्ंति
आधुनिक युग के प्रार्रंभ के नवोत्थार्न-जनित प्रार्चीन सभ्यतार् एवं संस्कृति क पुन: विकास, सुदूरस्थ भौगोलिक खोजों, लोकभार्षार्ओं एवं रार्ष्ट्रीय सार्हित्य के सृजन की भार्ंति ही समार्नरूप से महत्वपूर्ण एवं युगार्ंतरकारी विशेशतार् वैज्ञार्निक अन्वेशण तथार् वैज्ञार्निक उन्नति मार्नी जार्ती है। वस्तुत: सोलहवीं सदी क यूरोप न केवल, अपने महार्न कलार्कारों, विद्वार्नों एवं मार्नववार्दियों के कारण ही, वरन् सार्थ ही सार्थ अपने महार्न् वैज्ञार्निकों के कारण भी बड़ार् महत्वपूर्ण मार्नार् जार्तार् है। इन वैज्ञार्निकों ने समस्त विज्ञार्नजगत में अपने महार्न अन्वेषणों द्वार्रार् अपूर्व एवं महार्न् क्रार्ंति उत्पन्न कर दी। मध्ययुगीन यूरोपीय समार्ज की रूढ़िवार्दितार्, प्रगतिशीलतार्, धामिक कÍरतार्, अंधविशवार्स तथार् विज्ञार्न के प्रति व्यार्पक उदार्सीनतार् के कारण मध्ययुग में वैज्ञार्निक अन्वेषण एवं प्रगति संभव न थी। इन दिनों मनुश्य के विचार्र-स्वार्तंत्रय यार् मार्नसिक विकास क द्वार्र अवरूद्ध थार्। समार्ज सर्वथार् प्रतिक्रियार्वार्दी एवं अप्रगतिशील थार्, परंतु आधुनिक युग के प्रार्रंभ एवं सार्ंस्कृतिक पुनर्जार्गरण के उदय के सार्थ ही मध्ययुगीन संस्थार्ओं परम्परार्ओ, रूढ़िवार्दितार्, धर्मन्धतार्, अंधविशवार्सों एवं अप्रतिशीलतार् क निरंतर हृार्स होने लगार्। परिणार्मस्वरूप, मध्यकाल के उत्तराद्ध एवं आधुनिक युग के प्रार्रंभ में विज्ञार्न के क्षेत्र में अनेक अनुसंधार्न, अन्वेशण तथार् परिवर्तन हुए। अत: वैज्ञार्निक उन्नति होने लगी, समार्ज क स्वस्थ विकास होने लगार्, मनुश्यों में स्वतंत्र चिंतन-प्रवृित्त, वैज्ञार्निक दृष्टिकोण  एवं वैज्ञार्निक आलार्चे नार्एँ आरंभ हुर्इ। अत: सर्वत्र क्रियार्शीलतार्, गतिशीलतार् एवं प्रगति आरंभ हुर्इ।

प्रार्चीन यूनार्नी सभ्यतार् व संस्कृति के पुनरुत्थार्न के प्रयार्सों के परिणार्मस्वरूप विस्तृत पार्इथार्गोरस के गणित संबंधी ‘सिद्धार्ंतों’ क पुन: अध्ययन होने लगार्। खगोल विद्यार् के क्षेत्र में कोपरनिकस, टार्इको, ब्रार्चे, केप्लर एवं गैलीलियो इत्यार्दि वैज्ञार्निकों द्वार्रार् प्रतिपार्दित सिद्धार्ंतो, निश्कर्शों, अन्वेषणों व प्रयार्गे ों क पुन: अध्ययन होने लगार्। सोलहवीं सदी में ‘खगोल विद्यार्’ ने ‘प्रार्चीन सभ्यतार् एवं संस्कृति के पुनरुत्थार्न’ से प्ररेणार् प्रार्प्त की एवं अपने विकास के माग को प्रशस्त कर दियार्। विज्ञार्न, गणित, यंत्र-विद्यार् एवं पदाथ-शार्स्त्र इत्यार्दि से बड़ी क्रार्ंतिकारी एवं जन उपयोग प्रगति आरंभ हो गयी। समकालीन पूँजीवार्द के विकास के परिणार्मस्वरूप बड़े पैमार्ने पर खनिज-विज्ञार्न क प्रयोग कियार् जार्ने लगार्, अत: कालार्तं र में धार्तु-विज्ञार्न क भी विकास होने लगार्। सोलहवीं सदी में चिकित्सार्शार्स्त्र क विकास अपेक्षार्कृत कम हुआ। इस क्षत्रे में पैरार्सेनसस, वार्सार्लस एवं हावे इत्यार्दि चिकित्सार्-शार्स्त्रियों ने बड़े महत्वपूर्ण कार्य किए। वनस्पति-विज्ञार्न एवं प्रार्णि विज्ञार्न के क्षेत्रों में भी नवीन अन्वेशण एवं अनुसंधार्न आरंभ हो गय।े चौदहवीं सदी में यूरोप में बार्रूद के आविष्कार एवं तत्जनित बार्रूद के प्रयार्गे सार्धनों के संबंधों में ज्ञार्न-वृद्धि के परिणार्मस्वरूप तोपें और बंदूकें बनने लगी। इन्हार्ंने े युद्ध-प्रणार्ली में आमूल परिवर्तन उत्पन्न कर दिए, सार्ंमतों की शक्ति को क्षीण बनार् दियार् तथार् दुर्गों एवं ॉार्स्त्रार्स्त्र-सज्जित सैनिकों की उपयार्ेि गतार् को व्यर्थ कर दियार्। अब रार्जार्ओं की सेनार्एँ बड़ी शक्तिशार्ली बन गर्इं। रार्जार्ओं ने अपनी सैनिक शक्ति एवं मध्यम वर्ग के सहयार्गे के बल पर सुदृढ़ केन्द्रित तथार् सावभौम सरकारें कायम कर लीं। अत: यूरोप में सार्मंतवार्द की अवनति एवं रार्जतंत्रवार्द तथार् निरंकुश रार्जसत्त्ार्ार् की उन्नति होने लगी। आधुनिक काल के प्रार्रंभ में गतिशील अक्षरों एवं छार्पेखार्ने के आविष्कार के परिणार्मरूवरूप स्वतंत्र चिंतन एवं ज्ञार्न-प्रसार्र में अभतू पूर्व वृद्धि हुर्इ। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में प्रमुख अन्वेषणों में छार्पेखार्ने क आविष्कार अत्यंत महत्वपूर्ण समझार् जार्तार् है, क्योंि क आधुनिक यूरोपीय इतिहार्स पर इसक अत्यंत गहरार् प्रभार्व पड़ार्। गतिशील अक्षरों एवं छार्पेखार्ने के सहयोग से ही 1454 इर्. में सर्वप्रथम ‘बाइबिल’ क लैटिन संस्करण पक्र ार्शित हुआ। अब अधिकाधिक संस्थार् में एवं सुलभ पुस्तकें छार्पी जार्ने लगी। अत: ज्ञार्न व विद्यार् की परिधि अब सीमित न रही, वरन् सर्वसार्धार्रण के लिए विस्तृत हो गयी। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में शिक्षित मध्यम-वर्ग के लार्गे ों ने छार्पेखार्ने के मार्ध्यम से ही अपनी शक्ति, सार्धन ओर स्थिति को समुन्नत बनार् लियार्। अब सर्वसार्धार्रण लोगों की रुचि व आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के उद्देशय से बोधगम्य लार्के भार्षार्ओं में लोकप्रिय सार्हित्यार्ं े क सृजन आरंभ हो गयार्।

सार्ंस्कृतिक पनु र्जार्गरण के प्रार्रभ्ं ार्काल में विज्ञार्न की प्रगति अत्यंत मदं थी, क्योंि क मार्नववार्दी विद्वार्नों ने विज्ञार्न के प्रति बड़ी उदार्सीनतार् प्रगट की। मध्ययुगीन अंधविशवार्स, धर्मार्न्धतार् एवं चर्च के प्रति विस्तृत अधिकारों के कारण विज्ञार्न के क्षत्रे में अनुसंधार्न, अन्वेशण एवं प्रयोग असंभव हो गये थे। इस प्रतिकूल वार्तार्वरण के बीच में रहकर भी अनेक अन्वेशणकर्तार्ओं ने विज्ञार्न के क्षेत्र में कर्इ महत्वपूर्ण एवं युगार्तं कारी प्रयार्गे किए तथार् सर्वथार् नवीन सिद्धार्ंतों क प्रतिपार्दन कियार्। इनमें सर्वप्रथम, तेरहवी सदी क अंगे्रज सार्धु रोजर बेकन थार्। यह ‘प्रार्योगिक विज्ञार्न के जन्मदार्तार्’ के नार्म से प्रख्यार्त है। उसने मध्ययुगीन प्रचलित अंधविशवार्स, धर्मार्ंधतार्, मूर्खतार्, अज्ञार्न एवं श्रद्धार्-समन्वित व विशवार्स-प्रधार्न धर्म के विरूद्ध अनेक पुस्तकें लिखीं। उसने तत्कालीन मनुश्यों को अज्ञार्न व मख्ूर् ार्तार्-जनित दुर्बलतार्ओं से मुक्त होकर विचार्र-स्वार्तंत्र्य तथार् वैज्ञार्निक प्रवृित्त्ार् को अपनार्ने की शिक्षार् दी, परंतु व्यार्वहार्रिक दृष्टि से उसकी शिक्षार्ओं एवं रचनार्ओं क प्रभार्व आगार्मी तीन ॉार्तार्ब्दियों तक प्रार्य: नगण्य थार्।

मध्ययुगीन यूरोप के आगे यूनार्नी विद्वार्न टलेमी के खगोल विद्यार् संबंधी सिद्धार्ंतों में अडिग विशवार्स रखते थे। मध्ययुगीन लोग टलेमी द्वार्रार् प्रतिपार्दित सिद्धार्ंतों को ही सर्वथार् सत्य मार्नते थे एवं टलेमी के विरूद्ध सिद्धार्ंतों क प्रतिपार्दन नार्स्तिकतार् क प्रतीक एवं धर्म व रार्ज्य द्वार्रार् दण्डनीय समझार् जार्तार् थार्। टलेमी क यह सिद्धार्ंत थार् कि समस्त विशव क केन्द्र पृथ्वी है एवं सूर्य तथार् अन्य गृह उसके चार्रों ओर परिक्रमार् करते हैं, परंतु आधुनिक युग के आरंभ में पोलैण्ड-निवार्सी कोपरनिकस टलेमी द्वार्रार् प्रतिपार्दित एवं सर्वमार्न्य सिद्धार्ंत को असत्य घोशित कियार्। कोपरनिकस के अनुसार्र विशव के अन्य ग्रहों की भार्ँति पृथ्वी भी एक ग्रह है, पृथ्वी सूर्य के चार्रों ओर चक्कर काटती है, इसके अतिरिक्त चौबीस घंटों में वह अपनी धुरी पर पूरार् चक्कर कर लेती है, जिससे रार्त-दिन होते हैं। इसके अतिरिक्त उसने यह बतार्यार् कि सार्ल भर में पृथ्वी सूर्य के चार्रों ओर पूरार् चक्कर लगार्ती है, अत: सार्ल में विभिन्न ऋतुएँ होती है। कोपरनिकस ने कन्सर्निग द रेवुलुशन ऑफ द हेवन्ली बॉडीज नार्मक क्रार्ंतिकारी गं्रथ की रचनार् की थी, परंतु चर्च व रार्जार् के दण्ड के भय से वह अपने गं्रथ क पक्र ार्शन न करार् सका। अंतत: 1543 इर्. में इस गं्रथ क प्रकाशन हुआ। विज्ञार्न के क्षेत्र में कोपरनिकस ने बड़ार् महत्वपूर्ण एवं क्रार्ंतिकारी योगदार्न दियार् है। उसने आधुनिक युग के वैज्ञार्निकों के लिए पथ-प्रदशर्न कियार् है। रूढ़िवार्दी कैथलिक चर्च के भय के कारण कापे रनिकस के सिद्धार्तं ों क प्रचार्र बड़ी धीमी गति से हुआ। सोहलवीं सदी के प्रार्रंभ में केपलर नार्मक जर्मन विद्वार्न ने यह सिद्ध कर दियार् कि पृथ्वी के चार्रों ओर प्रार्य: निश्चित दिशार् में तार्रे घूमते हैं। इससे नार्विकों को अपनी समुद्री यार्त्रार्ओं में बड़ी सुविधार् हो गयी। इसके अतिरिक्त मैरिनर के कम्पार्स के अविष्कार से भी उन्हें बड़ी सहार्यतार् प्रार्प्त हुर्इ। अत: अब सफलतार्पूवर्क भौगोलिक खार्जे ें की जार्ने लगीं। गैलीलियो नार्मक विद्वार्न ने कोपरनिकस द्वार्रार् प्रतिपार्दित सिद्धार्ंत क प्रबल समर्थन कियार्, परंतु रूढ़िवार्दी कैथलिक चर्च एवं रार्जार् के डर से उसने अपने सिद्धार्ंतों को असत्य एवं मध्ययुगीन सिद्धार्ंतों को सत्य मार्न लियार्। गैलीलियो ने दूरबीन क भी आविष्कार कियार्। उसने यह सिद्ध करके दिखार्यार् कि गिरने वार्ली वस्तु की गति उसके बोझ पर निर्भर नहीं होती, वरन् उस दूरी पर निर्भर होती है, जिससे वह वस्तु गिरार्यी जार्ती है। इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध विद्वार्न सर आइजेक न्यूटन ने पृथ्वी की आकर्शक-शक्ति के सिद्धार्ंत क ज्ञार्न दियार्। वैद्यक-शार्स्त्र, रसार्यन-शार्स्त्र, गणित, विज्ञार्न तथार् पदाथ-विज्ञार्न आदि में भी पर्यार्प्त प्रगति हुर्इ। तार्त्पर्य यह कि मार्नववार्दियों द्वार्रार् जार्गतृ आलार्चे नार्त्मक प्रवृित्त के परिणार्मस्वरूप ही वैज्ञार्निक दृष्टिकोण की उत्पित्त एवं प्रगति होने लगी। चिकित्सार्-शार्स्त्र के क्षेत्र में यूनार्नी चिकित्सार्-शार्स्त्र में पंडित गेलेन ने आधुनिक चिकित्सार्-प्रणार्ली क पथ प्रदशर्न कियार्। चिकित्सार्-शार्स्त्र के विकास में च्ंतंबमसेनेए टेंंसने एवं भ्ंतअमल इत्यार्दि चिकित्सार्-शार्स्त्रियों ने बड़े महत्वपूर्ण कार्य किए। टेंसने द्वार्रार् रचित स्ट्रक्चर आफॅ द हयुमन बॉडी एवं हावे द्वार्रार् प्रतिपार्दित ‘रक्त-प्रवार्ह क सिद्धार्ंत’ आधुनिक युग के चिकित्सार्-शार्स्त्र के विकास में बड़े महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।

भौगार्लिक खोजें

आधुनिक यूरोप के प्रार्रंभ में सार्ंस्कृतिक पुनरुत्थार्न के विकास के सार्थ ही भौगोलिक खोजें भी बड़ी महत्वपूर्ण विशेशतार् मार्नी जार्ती हैं। मध्ययुग में मुस्लिम आक्रमणकारियों की भार्रतीय विजयों के परिणार्मस्वरूप निकट-पूर्वी एवं मध्य-पूर्वी देशों के सार्थ भार्रत क व्यार्पार्रिक संबध्ं ार् स्थार्पित हो गयार् थार्। प्रार्चीन युग से ही ‘र्इसाइयत’ एवं ‘मुस्लिम सार्म्रार्ज्य’ के बीच व्यार्पार्रिक आदार्न-प्रदार्न यार् संबंध चलार् आ रहार् थार्। मध्ययुगीन केसेडस यार् धर्म-युद्धों के परिणार्मस्वरूप यह संबंध और अधिक पुश्ट हो गयार्। सोलहवीं सदी के प्रार्रभ्ं ार् में विविध देशों के लार्गे अपने में ही सीमित थे एवं इन दिनों ‘विशव-एकतार् की सभ्यतार्’ जैसी कोर्इ धार्रणार् न थी। परंतु सोलहवीं सदी के भौगोलिक अविष्कारों एवं खोजों के परिणार्मस्वरूप संसार्र के विविध क्षेत्र परस्पर एक हो गए। अत: आधुनिक युग में यूरोपीय विस्तार्र के फलस्वरूप ‘विशव-सभ्यतार्’ क सृजन संभव हो सका। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में यूरोपीय रार्जार्ओं द्वार्रार् विशवव्यार्पी भौगार्ेि लक खोजो एवं प्रसार्र के दो मुख्य कारण थे – प्रथम, आर्थिक एवं द्वितीय, धामिक। आर्थिक उद्देशयों की पूर्ति हेतु ही यूरोपवार्सियों ने संसार्र के विविध क्षेत्रों से संबंध स्थार्पित करनार् चार्हार्। कालार्ंतर में तुर्कों की युद्धप्रियतार्, व्यार्पार्रिक मागों की कठिनार्इयार्ँ एवं आपित्त्ार्यार्ँ इत्यार्दि व्यार्पार्र की अभिवृद्धि में बड़ी घार्तक सिद्ध हुर्इं। अत: अब भूमध्यसार्गर क व्यार्पार्रिक महत्व घटने लगार् एवं नयी भौगोलिक खोजों यार् व्यार्पार्रिक मागों के परिणार्मस्वरूप अटलार्ण्टिक महार्सार्गर क महत्व बढ़ने लगार्। मध्ययुगीन व्यार्पार्र-मागों के बंद हो जार्ने से यूरोपीय उपभोक्तार्ओं को पूर्वी देशों से प्रार्प्त दैनिक आवशयतार्ओं की पूर्ति न हो सकी। अत: यूरोपीय सार्हसिकों ने रार्ज्यों द्वार्रार् प्रोत्सार्हित होकर नये मागों की खोज ॉार्ुरू की। सौभार्ग्यवश इस समय तक ‘कम्पार्स’ की खोज हो चुकी थी, अत: दिशार्ओं क सही ज्ञार्न प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् थार्। पंद्रहवीं सदी के उत्त्ार्रार्द्धर् में बड़े उत्सार्ह, लगन एवं अध्यवसार्य के सार्थ नये व्यार्पार्र मागों की खार्जे ें पूर्वी देशों से संबंध-स्थार्पन हेतु आरंभ की गयी। पश्चिमी यूरोप के महत्वार्काक्ष्ं ार्ी रार्श्ट्रों यार् रार्जार्ओं ने अपने आर्थिक तथार् व्यार्पार्रिक स्वाथों एवं उद्दशे यों की पूर्ति हेतु इन नार्विकों एवं सार्हसिकों को पर्यार्प्त प्रोत्सार्हन तथार् सहार्यतार् पद्र ार्न की। इन भौगोलिक खोजो क मुख्य उद्देशय व्यार्पार्र थार्, परंतु इसके परोक्ष उद्देशय उपनिवेश-स्थार्पन, धर्म-प्रचार्र एवं सार्म्रार्ज्य-विस्तार्र व रार्ष्ट्रीय गौरव की वृद्धि इत्यार्दि भी थे।

नये भौगोलिक आविष्कार, व्यार्पार्र-मागों की खोज एवं यूरोपीय विस्तार्र के क्षेत्र में पुर्तगार्ल ही सबसे अग्रगण्य रार्ज्य थार्। यूरोप में पुर्तगार्ल के रार्जार् बड़े महत्वार्काक्ष्ं ार्ी एवं आविष्कारों तथार् खोजो के प्रमुख समर्थक थे। नये भौगोलिक व खोजों की दिशार् में प्रथम महत्वपूर्ण प्रयार्स 1415 र्इ. में अफ्रीक के तटीय प्रदेश सीटार् पर पुर्तगार्ल द्वार्रार् आधिपत्य-स्थार्पन थार्। वस्तुत: इसके परिणार्मस्वरूप पूर्वी दिशार् की ओर आविष्कारों एवं खोजो क माग प्रशस्त हुआ। पतुर् गार्ल के रार्जकुमार्र ‘Prince Henry, the Navigator’ (1394 र्इ.-1460 र्इ.) के सतत् प्रयार्सों, कार्य-तत्परतार् एवं संलग्नतार् के परिणार्मस्वरूप एजोरस एवं मेडेरियार् के द्वीप-समूहों को खोज निकालार् गयार्। तदार्ंतर 1498 र्इ. में वार्स्को-डि-गार्मार् ने उत्त्ार्मार्शार्-अंतरीप क चक्कर काटकर भार्रत के कालीकट बंदरगार्ह में पर्दार्पण कियार्। यह खोज यूरोप के इतिहार्स में बड़ी महत्वपूर्ण, प्रभार्वोत्पार्दक एवं सीमार्-चिन्ह सिद्ध हुर्इ। इसने इटली में नगर-रार्ज्यों (विशेशतयार् वेनिस) एवं अरबों के व्यार्पार्रिक महत्व व एकाधिकार क अंत कर दियार्। अत: भूमध्यसार्गर क गौरव व प्रभुत्व पतनोन्मुख होने लगार्।

पुर्तगार्ल के रार्जतंत्र के प्रोत्सार्हन एवं संरक्षण के फलस्वरूप भार्रत पहुंचने क नयार् तथार् लार्भप्रद माग आविश्कृत हो चुक थार्। इसी प्रकार स्पेनी रार्जार्ओं के संरक्षण एवं प्रोत्सार्हन से एक और नये माग को खोज निकालार् गयार्। स्पेन की सहार्यतार् से प्रोत्सार्हित होकर किस्टोफर कोलम्बस नार्मक एक इटार्लियन सार्हसी नार्विक ने विशार्ल अटलार्ण्टिक महार्सार्गर की लंबी एवं खतरनार्क यार्त्रार् की एवं अंतत: 1492 र्इ. में उसने अमेि रक महार्द्वीप क पतार् लगार्यार्। पुर्तगार्ल एवं स्पने द्वार्रार् इन महार्न् सफलतार्ओं से प्रोत्सार्हित एवं सर्वथार् नवीन आशार्, लगन व प्रेरणार् से अनुप्रार्णित होकर अब यूरोप के अन्य रार्जार्ओं ने भी भौगोलिक खार्जे ें ॉार्ुरू की।ं परिणार्मस्वरूप, 1497 र्इ. में जॉन केबट ने केप ब्रिटन द्वीप क पतार् लगार्यार्; 1499 र्इ. में पिंजोन द्वार्रार् ब्रार्जील को खोज निकालार् गयार्। पेरू, मेक्सिको, फ्लोरिडार् तथार् अन्य अमरीकी प्रदेश खोज निकाले गये। मैगेलन नार्मक व्यक्ति ने यूरोप से पश्चिमी दिशार् की ओर निरंतर यार्त्रार् करने के उपरार्ंत समस्त विशव की परिक्रमार् की। सोलहवीं सदी के पूर्वाद्ध में जहार्ँ एक ओर पूर्वी देशों में पुर्तगार्ल द्वार्रार् व्यार्पार्र-वृद्धि एवं शोषण हो रहार् थार्, वहार्ँ दूसरी ओर अमेरिकी महार्द्वीप में स्पने ी विस्तार्र एवं व्यार्पार्र-प्रसार्र हो रहे थे। पुर्तगार्ल एवं स्पेन अपने-अपने क्षेत्रों में व्यार्पार्रिक एकाधिकारी कायम रखनार् चार्हते थे। यूरार्पे के अन्य देशों को इन नये व्यार्पार्र-मागों से वंचित करनार्, अपने-अपने उपनिवेशार्ं े व सार्म्रार्ज्य क स्थार्पन यार् विस्तार्र करनार् तथार् व्यार्पार्रिक एकाधिकारों को अक्षुण्य बनार्य े रखनार् इत्यार्दि स्पेन एवं पुर्तगार्ल के मुख्य उद्देशय थे। इन उद्देशयों की पूर्ति हेतु उन्होंने रोम के पोप की मध्यस्थतार् एवं मार्न्यतार् प्रार्प्त कर 1493 र्इ. में समस्त दुनियार् क आपस में बँटवार्रार् कर लियार्। पुर्तगार्ल एवं स्पेन के बार्द यूरोप के अन्य रार्ज्य भी भौगोलिक आविष्कार, नये व्यार्पार्र-मागों की खोज, उपनिवेश-स्थार्पनार् एवं सार्म्रार्ज्यवार्द के कार्यों में जुट गए। यद्यपि कुछ समय तक अपनी आंतरिक एवं रार्ष्ट्रीय कठिनार्इयार्ं े व समस्यार्ओं के कारण अन्य रार्ज्यों के प्रयार्स विलम्ब से आरंभ हुए, परन्तु अंततार्गे त्वार् सोलहवीं सदी के अंत एवं सत्रहवीं सदी के पूर्वाद्ध में फ्रार्सं , इग्लैण्ड, इटली इत्यार्दि रार्ज्य भी इस क्षेत्र में आ गये। फ्रार्ंस के हेनरी चतुर्थ के काल में न केवल शार्न्ति, व्यवस्थार्, आर्थिक उन्नति तथार् सुरक्षार् स्थार्पित की गयी, वरन् सार्थ ही कनार्डार् तथार् लुसियार्नार् में फ्रार्ंसीसी उपनिवेश स्थार्पत किये गये। लुर्इ चतुर्दश के काल में फ्रार्ंस के औपनिवेशिक सार्म्रार्ज्य क काफी विस्तार्र हुआ। इसी प्रकार इंग्लैण्ड, हॉलेण्ड, इटली इत्यार्दि रार्ज्यों ने भी उपनिवेश-स्थार्पन, व्यार्पार्र-वृद्धि एवं सार्म्रार्ज्य-विस्तार्र के प्रयार्स आरंभ किए।

पंद्रहवीं सदी के अंत से लेकर सत्रहवीं सदी के मध्यार्न्ह तक यूरोपीय रार्ज्यों द्वार्रार् किये गये भौगोलिक आविष्कार, नये व्यार्पार्र-मागों की खोज, उपनिवेशीकरण क सार्म्रार्ज्य-विस्तार्र के अनेक महत्वपूर्ण तथार् क्रार्ंतिकारी परिणार्म हुए। इन भौगोलिक अविष्कारों तथार् खोजो के परिणार्मस्वरूप यूरोपीय लोगों की ज्ञार्न-परिधि विस्तृत हो गयी। मध्ययुगीन रूढ़िवार्दितार्, अंधविशवार्स, अज्ञार्न-जनित विचार्र तथार् कैथलिक चर्च के विस्तृत अधिकार इत्यार्दि क क्रमश: हृार्स होतार् गयार्। इन भौगोलिक खोजों के परिणार्मस्वरूप व्यार्पार्र एवं वार्णिज्य की अपूर्व उन्नति हुर्इ, आयार्त एवं निर्यार्त की उत्तरोत्तर वृद्धि होती गयी, बड़े पैमार्ने पर नयी पद्धति से व्यार्पार्र होने लगार्। संक्षेप में, यूरोप में व्यार्वसार्यिक यार् औद्योगिक क्रार्ंति आरंभ हो गयी। औपनिवेशिक तथार् व्यार्पार्रिक उन्नति के कारण यूरोप में पूँजीवार्द एवं बैंकों की स्थार्पनार् हुर्इ। अब मध्ययुगीन व्यार्पार्र-संस्थार्एँ एवं श्रमिक-संस्थार्एँ पतनोन्मुख हो गयीं। इन भौगोलिक खोजो के परिणार्मस्वरूप यूरोपीय रार्ज्यों को भार्रत एवं अमेि रक से अपार्र धन-रार्शि तथार् प्रार्कृतिक सार्धन प्रार्प्त हुए। स्पेन एवं पुर्तगार्ल द्वार्रार् उपनिवेशीकरण की नीति के परिणार्मस्वरूप घृणित दार्स-व्यार्पार्र क प्रार्रंभ हुआ, क्योंकि उपनिवेशार्ं े की वृद्धि के लिए सस्ते मजदूरों की आवश्यकतार् थी, अत: पश्चिमी द्वीप समूह, मैक्सिको, पूरे एवं ब्रार्जील इत्यार्दि देशों में नीग्रो- दार्स व्यार्पार्र को अत्यार्धिक प्रोत्सार्हन प्रार्प्त हुआ। आधुनिक युग के प्रार्रंभ में पूंजीवार्द के विकास के बड़े महत्वपूर्ण परिणार्म हुए। इसने यूरोप की परम्परार्गत सार्मार्जिक एवं आर्थिक व्यवस्थार्ओं को अत्यार्धिक प्रभार्वित कियार्। इसने मध्ययुगीन कृशि-पद्धति एवं जमींदार्री की समार्प्ति कर दी। आधुनिक पूँजीवार्द के परिणार्मस्वरूप यूरोपीय उद्योगो में भी क्रार्ंतिकारी परिवर्तन हुए। इन नये भौगोलिक आविष्कारों के रार्जनीतिक परिणार्म भी बड़े महत्वपूर्ण थे। नये देशों की अतुल सम्पित्त एवं अपार्र सार्धनों की प्रार्प्ति हेतु अब यूरोप के विभिन्न देशों में औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धार्एँ, सार्मुद्रिक संघर्श, युद्ध एवं सार्म्रार्ज्यवार्दी प्रतिद्विन्द्वतार्एँ आरंभ हो गयी। इन्हीं कारणों से सत्रहवीं एवं अठार्रहवीं सदियों में यूरोप के प्रमुख रार्ज्यों के बीच अनेक युद्ध हुए। इन भौगोलिक खोजो के परिणार्मस्वरूप पूर्वी देशों एवं अमेरिकी गार्ले ाद्ध के रार्जनीतिक, सार्मार्जिक, आर्थिक एवं सार्स्कृतिक जीवन में भी अनेक महत्वपूर्णतथार् क्रार्ंतिकारी परिवर्तन हुए।

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