यथाथवार्द क्यार् है ?

यथाथवार्द के लिए अंग्रेजी क शब्द ‘रियलिज्म’ है। ‘रियल’ शब्द ग्रीक भार्षार् के रीस शब्द से बनार् है जिसक अर्थ है वस्तु। अत: रियल क अर्थ होतार् है वस्तु सम्बन्ध् ार्ी। यही कारण है ‘‘रियलिज्म’ (यथाथवार्द) वस्तु के अस्तित्व से सम्बन्धित यह एक दृष्टिकोण है जिसके अनुसार्र संसार्र की प्रत्येक वस्तु सत्य है और प्रत्यक्ष है। प्रत्यक्ष क अनुभव हमें इन्द्रियों से होतार् है। वार्स्तव में यथाथवार्द एक भौतिकवार्दी दर्शन है। वस्तु को वार्स्तविक अथवार् यथाथ मार्नने के कारण ही इस विचार्रधार्रार् को वार्स्तववार्द अथवार् यथाथवार्द की संज्ञार् दी जार्ती है। यथाथवार्द जगत को मिथ्यार् कहने वार्ली भार्वनार् क विरोधी स्वर है।

  1. कार्टर वी0 गुड महोदय के अनुसार्र – ‘‘वह सिद्धार्न्त जिसके अनुसार्र वस्तुगत यथाथतार् यार् भौतिक जगत चेतन मन से स्वतन्त्र रूप में अस्तित्व रखतार् है, उसकी प्रकृति और गुण उसके ज्ञार्न से मार्लूम होते हैं।’’
  2. रार्स महोदय के अनुसार्र – ‘‘यथाथवार्द यह मार्नतार् है कि जो कछु हम प्रत्यक्ष में अनुभव करते हैं, उनके पीछे तथार् उनसे मिलतार् जुलतार् वस्तुओं क एक यथाथ जगत है।’’
  3. स्वार्मी रार्मतीर्थ के शब्दों में –’’यथार्थर्वार्द क अर्थ उस विश्वार्स अथवार् सिद्धार्न्त से है जो संसार्र को वैसार् ही मार्नतार् है जैसार् वह हमें दिखाइ पड़तार् है – अर्थार्त संसार्र केलव एक प्रपंच मार्त्र है।’’
  4. नेफ के अनुसार्र – ‘‘यथाथ्वार्द आत्मगत आदर्शवार्द क प्रतिकार है, जो सत्य क निवार्स मार्नव मस्तिष्क में मार्नतार् है। सब यथाथवार्दी इस बार्त से सहमत हैं कि सत्य और वार्स्तविकतार् क अस्तित्व है और रहेगार्, भले ही किसी व्यक्ति को उनके अस्तित्व क ज्ञार्न न हों।’’
  5. ब्रार्उन के अनुसार्र-’’यथाथवार्द क मखु य विचार्र यह है कि सब भौतिक वस्तएु तथार् बार्ह्य जगत के पदाथ वार्स्तविक हैं और उनक अस्तित्व देखने वार्ले से पश्थक है। यदि उनको देखने वार्ले व्यक्ति न हों, तो भी उनक अस्तित्व होगार् और वे वार्स्तविक होंगे।’’

यथाथवार्द सार्धार्रण व्यक्तियों की विचार्रार्धार्रार् मार्नार् जार्ये तो कुछ अनुचित नहीं है। सरल यथाथवार्द वस्तु जगत के प्रति हमार्रे दैनिक जीवन अनुभव एवं विश्वार्स ही है। सार्धार्रणतयार् हम यह कह सकते हैं कि भौतिक सत्य को ही यथाथवार्दी सब कुछ मार्नतार् ह। यथाथवार्दी भौतिक जगत की सत्यतार् एवं सत्तार् दोनों में विश्वार्स रखतार् है। यथाथवार्द प्रयोगवार्द में विश्वार्स रखतार् है। डॉ0 चौबे ने स्पष्ट तौर पर यथाथवार्दी दर्शन के विषय में कहार् -’’यथाथवार्द अनुभव में भौतिक यथाथतार् के जगत को वार्स्तविक एवं आधार्रभूत वस्तु मार्नतार् है। इसक विचार्र है कि भौतिक जगत ही वस्तुगत है और तथ्यगत जगत की कोर्इ ऐसी वस्तु है जिसे जैसे वह है उसी तरह सरलतार् से स्वीकार कर लेतार् है।’’

यथाथवार्द क ऐतिहार्सिक पृष्ठभूमि

यथाथवार्द विचार्रधार्रार् नहीं है। ऐतिहार्सिक दृष्टि से यह वार्द भी कर्इ शतार्ब्दियों से चलार् आ रहार् है। अरस्तु ने अपनी पुस्तक ‘फिजिक्स’ में लिखार् है – ‘‘इस प्रकार की बहुत सी वस्तुयेंहैं जिन्हें हमसे संकेत कियार् है। जैसे कि पशु, पौघे, हवार्, अग्नि और जल और जो अधिक स्पष्ट ढंग से प्रदर्शित करने क प्रयत्न करेगार् तो उसे मार्लूम होगार् कि अन्य कम प्रकट वस्तुओं की अपेक्षार् उसे ज्ञार्त होगार् कि उसमें विभेद करनार् कठिन नहीं है कि किनक अस्तित्व है किनक नहीं।’’ इसक अभिप्रार्य है कि जगत यथाथ है। अरस्तु के बार्द सन्त अक्विनार्स के विचार्रों में भी पदाथ की यथाथतार् क आभार्स मिलतार् है। सन्त अक्विनार्स ने मार्नार् कि र्इश्वर ने वस्तु जगत क निर्मार्ण कियार् है। इसके पश्चार्त दर्शन जगत में कमेनियस नार्मक शिक्षार्शार्स्त्री ने यथाथवार्द की भार्वनार् क प्रचार्र कियार्। कमेनियस ने मन को एक वस्तु रूप दियार्। उनके अनुसार्र मनुष्य क मन ‘‘एक गोल आकार क दर्पण है जो कमरे में टंगार् है और जिसमें उसके चार्रों ओर की सभी वस्तुओं की प्रतिच्छार्यार् पड़ती है।’’

कमेनियस के पश्चार्त यथाथवार्द क विकास वस्तुत: मार्नार् जार्तार् है। इसके बार्द सोलहवीं सत्रहवीं शतार्ब्दी से यथाथवार्द ने एक नयार् रूप लेकर आगे की ओर विकसित हुआ। डेकोर्ट ने यथाथवार्द को एक नयार् रूप दियार् और आदर्णवार्दी विचार्रों के सार्थ यथाथवार्दी विश्वार्स को बढ़ार्वार् दियार्। डेकोर्ट ने अपने िद्वेतत्ववार्द ने यथाथवार्द की स्पष्ट झलक दियार् और स्पष्ट कियार् कि र्इश्वर एवं प्रकृति अलग-अलग तत्व हैं। इसके पश्चार्त् स्पिनोजार् ने भौतिक पदाथ एवं वस्तुओं के प्रसार्र में र्इश्वर के गुण को देखकर यथाथवार्दी विचार्रधार्रार् को हवार् दी। स्पिनोजार् के पश्चार्त लॉक ने अपने विचार्र प्रस्तुत किये कि अनुभव से ही ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है और अनुभव प्रार्प्त करने में प्रकृति सहयोग देती है। प्रथम प्रकार अनुभव बार्ह्य जगत के प्रभार्व से इन्द्रियों के द्वार्रार् मन को ज्ञार्न मिलतार् है। लॉक के पश्चार्त कान्ट के विचार्रधार्रार् में भी यथाथवार्दी झलक मिलती है। कान्ट के अनुसार्र हमार्रे इन्द्रियार्नुभव और प्रत्यक्षीकरण बार्ह्य जगत की पुन:उपस्थिति हैं। यदि ये हमार्री चेतनार् में उपस्थित हैं तो कांट क यह विचार्र नवयथाथवार्द से मिलतार् है। शिक्षार्शार्स्त्री हरबाट के विचार्र में भी यथाथवार्दी पुट मिलतार् है क्योंकि हरबाट मन पर बार्ह्य जगत पर प्रभार्व मार्नते हैं।

बीसवीं शतार्ब्दी से यथाथवार्द की नयी विचार्रधार्रार् ने जन्म लियार् और यह नवयथाथवार्द कहलार्यी। रार्ल्फ, बार्टन, पैरो, एडविन, वी0होल्ट, वार्ल्टर टी0, मार्रार्वन, एडवर्ड, ग्लीसन, स्फार्लडिंग तथार् वार्ल्टर वी0 पिटकिन आदि नवयथाथवार्दी कहलार्ये। यूरोप में यथाथवार्द क विकास क श्रेय ब्रेटेनो तथार् मार्ीरार्ंग तथार् जेम्स और मोच को है। बार्द में मूर तथार् रसेल ने आदर्शवार्द के विरोध में यथाथवार्द को बढ़ार्यार्। अमेरिक में इंग्लैण्ड के दाशनिक नन, रसेल आदि के प्रयार्सों से आगे बढ़ार्। इसके पश्चार्त् एलेक्जेन्डर, लार्यड मागन, मार्यड, मूर, केम्प, स्मिथ, जोड आदि अन्य दाशनिकों ने यथाथवार्दी प्रवृत्ति प्रकट की है। इसके पश्चार्त् आलोचनार्त्मक यथाथवार्द ने जन्म लियार्। इनमें यथाथवार्द ड्यूरट डे्रक, आथर ओ0 लवज्वार्य, जेम्स विसेट प्रैट, जाज सथ्यार्नार्, आर्थर के0 रार्जर्स तथार् सार्0ए0 स्ट्रार्ंग आदि प्रमुख हैं। नवयथाथवार्द एवं आलोचनार्त्मक यथाथवार्द में भेद केवल ज्ञार्न के सिद्धार्न्त में से हैं। आलोचनार्त्मक यथाथवार्द के अनुसार्र हमार्री चेतनार् में वस्तु की उपस्थित नहीं हो तो बल्कि उसकी पुनरूपस्थिति होती है और चेतनार् में हम जिस वस्तु क अनुभव करते हैं वह बार्ह्य वस्तु से अलग होती है। नवयथाथवार्दी ऐडमसन तथार् एंडू्रसेट नार्मक नवयथाथवार्दी के अनुसार्र वस्तु हमार्रे जगत ने यथाथ होती हैं और प्रत्यक्षीकरण के तीन अंश होते हैं- प्रत्यक्षीकरण क कार्य, प्रत्यक्ष, प्रत्यक्षीकृत वस्तु। बार्द में सेलास ने भौतिक यथाथवार्द की विचार्रधार्रार् निकालार् जिनके अनुसार्र संसार्र की वस्तुओं क स्थार्न तथार् भौतिक गुण होतार् है और वे भौतिक प्रणार्ली में अविच्छेद रूप से बंधी हुयी है।

भार्रतीय दाशनिक परम्परार् में यथाथवार्दी विचार्रधार्रार् भी मिलती है। वेदों में प्रकृति के तत्वों क वर्णन मिलतार् है, जिन्हें देवरूप स्वीकार कियार् गयार् और तत्सम्बन्ध् ार्ी उपार्सनार् हुयी। मार्नव शरीर को पंचतत्व क मेल मार्नार् और शरीर को धर्म क सार्ध् ार्न मार्नार्। सार्धन को यथाथ व अस्तित्ववार्न मार्नार् गयार्।

यथाथवार्दी के तत्वमीमार्ंसार् के तत्व भार्रतीय दर्शन में मिलतार् है जिसमें संसार्र के पदाथ भौतिक तथार् मार्नसिक पदाथ में बंटे मार्ने गये। चरम यथाथवार्दी चावार्कवार्दी मार्ने गये और इन्होंने संसार्र को यथाथ मार्नार्। इन चावार्कवार्दियों में इन्द्रियसुख को महत्व दियार्। सार्ंख्य दर्शन में भी यथाथवार्दी तत्व पार्ये जार्ते हैं क्योंकि प्रकृति एवं पुरूष दो तत्व मार्ने गये हैं। प्रकृति को सत्य, रजस और तमस् से युक्त मार्नार् गयार् और प्रकृति के परिवर्तन पुरूष के लिए उपभोग क आधार्र प्रदार्न करती है।

बौद्ध दर्शन में यथाथवार्दी तथ्य प्रकट होते हैं, बौद्ध विषय वार्दियों की एक प्रणार्खार् मार्नतार् है कि बार्ह्य जगत है तथार् उनक अपरोक्ष तथार् सार्क्षार्त् प्रत्यक्ष होतार् है। बौद्ध धर्म क दूसरार् सम्प्रदार्य यह मार्नतार् है कि पदाथों क उनके प्रत्ययों से अनुमार्न लगार्यार् जतार् है जो उनकी प्रतिच्छार्यार् तथार् प्रतिरूप है। इस प्रकार से स्पष्ट है कि भार्रतीय दर्शन की विभिन्न शार्खार्ओं में भी यथाथवार्दी भार्वनार् पार्यी जार्ती है।

यथाथवार्द के दाशनिक आधार्र

1. तत्व दर्शन में यथाथवार्द – 

यर्थार्थवार्द यह मार्नते हैं कि ब्रह्मार्ण्ड गतिणील पदाथ क बनार् है? हम अपने अनुभवों के आधार्र पर जगत के नियमित क्रियार्कलार्पों को पहचार्न सकते हैं। पदाथ गतिशील हैं और वह अस्तित्व में हैं इसलिए सत्य है।

2. ज्ञार्न शार्स्त्र मे यथाथवार्द –

यथाथवार्दियों क विचार्र है कि वार्स्तविक जगत क अस्तित्व है। हम वार्स्तविक वस्तु को जार्नते हैं क्योंकि इसक अस्तित्व है। हम यह कह सकते हैं कि वस्तु क वार्स्तविक जगत में अस्तित्व है तो वह सत्य है। कोर्इ भी कथन विश्लेषण के पश्चार्त ही स्वीकार्य है। ज्ञार्न क अस्तित्व मस्तिष्क ही स्वीकार करतार् है।

3. मूल्य मीमार्ंसार् मे यथाथवार्द – 

यथाथवार्दी प्रार्कश्तिक नियमों मे विश्वार्स करते हैं उनक कहनार् है कि मनुष्य इन नियमों क पार्लन करके सद्जीवन व्यतीत कर सकतार् है। प्रकृति सौन्दर्य से परिपूर्ण है। सौन्दर्य पूर्ण कलार्-कार्य, ब्रह्मार्ण यार् प्रकृति की व्यवस्थार् तथार् तर्क की प्रतिछार्यार् है। कलार् की सरार्हनार् की जार्नी चार्हिए।

4. यथाथवार्द के सिद्धार्न्त – 

यथाथवार्द प्रत्यक्ष जगत में ही विश्वार्स करते हैं उनके अनुसार्र अस्तित्व प्रत्यक्ष में हैं। उनके कुछ निश्चित सिद्धार्न्त हैं जिस पर नीचे विचार्र कियार् जार् रहार् है।

5. दृश्य जगत ही सत्य-

यथाथवार्दी यह मार्नते है कि जो कुछ हम दखेते सुनते व अनुभव करते हैं वही सत्य है। प्रत्यक्ष ही सत्य है। इस जगत क सत्यतार् विचार्रों के कारण नहीं है अस्तित्व स्वयं में हैं।

6. इन्द्रियार्ँ अनुभव व ज्ञार्न क आधार्र –

सच्चे ज्ञार्न की पार््र प्ति ने हमार्री बार्ह्य इन्द्रियार्ं सहार्यक होती हैं क्योंकि यह हमें अनुभव प्रदार्न कर पूर्ण एवं वार्स्तविक ज्ञार्न लेने क आधार्र बनार्ती हैं। रसेल व हार्इटहैड ने संवेदनार् को ज्ञार्न क आधार्र मार्नार्। रसेल के अनुसार्र – ‘‘पदाथ के अन्तिम निर्णार्यक तत्व अणु नहीं है, वरन संवेदन हैं’। मेरार् विश्वार्स है कि हमार्रे मार्नसिक जीवन के रचनार्त्मक तत्व संवेदनार् तत्व संवेदनार्ओं औति प्रतिभार्ओं में निहित होते हैं।’’

7. वस्तु जगत की निरन्तरतार् – 

यथाथवार्दी वस्तु जगत मे नियमिततार् को स्वीकार करते हैं। वे मन को भी यार्ंत्रिक ढंग से क्रियार्शील मार्नते हैं। यथाथवार्दियों क विचार्र है कि अनुभव और ज्ञार्न के लिए नियमितार् क होनार् आवश्यक है।

8. यथाथवार्द पार्रलौकिकतार् को अस्वीकार करतार् है – 

यथाथवार्द प्रत्यक्ष को ही मार्नतार् है क्योंकि उसक अस्तित्व है और यह वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क आधार्र है।

9. वर्तमार्न व व्यार्वहार्रिक जीवन को महत्व – 

यथाथवार्दी उन आदर्शों, नियमों एवं मूल्यों क कोर्इ महत्व नहीं देते हैं। जिनक सम्बन्ध वर्तमार्न एवं व्यवहार्रिकतार् से नहीं है। बौद्धिकतार् व आदर्शवार्दितार् जीवन को सुखी नहीं कर सकते उनक मार्ननार् है कि-

    1. जीवन क लक्ष्य समार्ज क कल्यार्ण होनार् चार्हिए। 
    2. समार्ज के लोगों क दृष्टि कोण वैज्ञार्निक हो। 
    3. सार्मार्जिक सक्रियतार् पर बल दियार् जार्नार् चार्हिए। 
    4. जीवन में वे क्रियार्यें अपनार्यी जार्यें जो लार्भप्रद हों। 
    5. वर्तमार्न जीवन ही विश्वसनीय हैं और भौतिकतार् से परिपूर्ण होनार् चार्हिए।

    यथाथवार्द के सम्प्रदार्य

    अब आप यर्थार्वार्द के दाशनिक आधार्र एवं सिद्धार्न्तों की जार्नकारी प्रार्प्त कर चुके हैं। अब हम यह जार्नेंगे कि यथाथवार्द के कौन-कौन से सम्प्रदार्य हैं इनके विषय में नीचे वर्णन कियार् गयार् है।

    1. मार्नववार्दी यथाथवार्द – 

इसे एेितहार्सिक यथाथवार्द कहार् गयार्। इसक जार्नार् सार्ंस्कृतिक पुनरूत्थार्न के युग में हुआ। इस युग में मनुण्य को सर्वोच्च स्थार्न प्रदार्न कियार् गयार्। इस दर्शन में मुख्य रूप जीवन एवं प्रकृति को महत्व दियार् और प्रार्चीन सार्हित्य अध्ययन को महत्व दियार्। इस विचार्रधार्रार् को मार्नने वार्ले इरैसमस, रैबेले एवं मिल्टन थे।

2. समार्जिकतार्वार्दी यथाथवार्द – 

इस विचार्रधार्रार् ने पुस्तकीय अध्ययन क विरोध कियार्। बार्लक में सार्मार्जिक कुशलतार् को उत्पत्ति को शिक्षार् क प्रमुख उद्देश्य मार्नार् एवं व्यवहार्रिक अनुभव आधार्रित शिक्षार् पर बल दियार्। लॉड मोटैन एवं जॉन लॉक प्रमुख विचार्रक थे।

3. ज्ञार्नेन्द्रिय यथाथवार्द – 

इस विचार्रधार्रार् क सबसे अधिक प्रभार्व शिक्षार् पर पड़ार्। इसके दृष्टिकोण में प्रकृतिवार्द एवं प्रयोज्यवार्द के सभी अनुभववार्दी सिद्धार्न्तों की झलक मिलती है।

    इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध शिक्षार्शार्स्त्री बेकन, जर्मनी के रॉटके व चेकोस्लोबार्कियार् क कामेनियस इस विचार्रधार्रार् के विचार्रक मार्ने गये ज्ञार्नेन्द्रिय यथाथ ने ज्ञार्नेन्द्रियों को ज्ञार्न क मुख्य आधार्र मार्नार् इस विचार्रधार्रार् ने वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क प्रतिपार्दन कियार्।

    यथाथवार्द एवं शिक्षार् 

    यथाथवार्दी शिक्षार् क क्रमबद्ध विवेचन हैरी ब्रार्उडी की पुस्तक ‘‘बिल्डिंग अ फिलार्सफी ऑफ एजुकेणन’’ (1954) में प्रार्प्त होतार् है। यथाथवार्दी शिक्षार् की कुछ विशेषतार्एं नीचे वर्णित है-

    1. उदार्र शिक्षार् –

यथाथवार्दी उदार्र शिक्षार् पर बल देते थे। उन्हार्नें पुस्तकीय एवं अव्यवहार्रिक ज्ञार्न क विरोध कियार्। मिल्टन ने स्पष्ट कहार् है कि – ‘‘मैं उस शिक्षार् को पूर्ण एवं उदार्र शिक्षार् कहतार् हूँ जो एक व्यक्ति को न्यार्योचित ढंग से कुणलतार्पूर्वक तथार् उदार्रतार् के सार्थ निजी एवं सावजनिक- दोनों प्रकार के सभी कार्यों को णार्न्ति तथार् युद्ध के समय पूर्ण करने के योग्य बनार्ती है।’’

2. विस्तृतृत एवं व्यवहार्रिक पार्ठ्यक्रम – 

रार्स ने स्पष्ट कियार् है कि यथाथवार्द पुस्तकीय एवं अवार्स्तविक ज्ञार्न के विरोध में आयार् है। यथाथवार्द ने पार्ठ्यक्रम को विस्तृत बनार्यार्। कार्टर वी गुड ने लिखार् है – ‘‘विस्तृत पार्ठ्यक्रम यथाथवार्द की एक प्रमुख विशेषत थी। 17 वीं शतार्ब्दी के यथाथवार्दियों के लिए यह स्वार्भार्विक नहीं थी कि वे 25 यार् 80 विषयों को अध्ययन हेतु प्रस्तुत करें। जिसमें लैटिन, फ्रैंच और वर्नार्क्यूलर जैसी दो यार् तीन भार्षार्ये, गणित की दो यार् तीन शार्खार्यें, कर्इ सार्मार्जिक अध्ययन के विषय, बहुत से विज्ञार्न, दाशनिक, सैन्य सम्बन्धी और व्यार्वसार्यिक तथार् णिण्टार्चार्र सम्बन्धी विभिन्न विषय हो।’’ यथाथवार्दियों ने पार्ठ्यक्रम को वार्स्तविक जीवन से जोड़ार्।

3. विज्ञार्न शिक्षार् पर बल – 

यथाथवार्द के अनुसार्र व्यार्पक कोण और अन्य सच्ू य एवं निरर्थक विषयों के स्थार्न पर विज्ञार्नों क अध्ययन क क्षेत्र में होनार् चार्हिए। हरबर्ट स्पेन्सर ने अपने लेख ‘‘एजूकेशन’’ में स्पष्ट कियार् और आवश्यकतार्नुसार्र विभिन्न विज्ञार्नों के अध्ययन पर बल दियार् एवं आगमन विधि के प्रयोग पर जोर दियार्।

4. व्यार्वसार्यिक शिक्षार् पर बल – 

यथाथवार्दी शिक्षार् के सार्थ सार्थ व्यार्वसार्यिक शिक्षार् पर भी बल देतार् है। डेविनपोर क कथन है – ‘‘कोर्इ भी व्यक्ति किसी व्यवसार्य के बिनार् शिक्षार् क चयन न करें और न बिनार् शिक्षार् के व्यवसार्य क चयन करे।’’

5. समार्जिक संस्थार्ओं को महत्व – 

यथाथवार्दी शिक्षार् में विषयों की अपेक्षार् प्रार्कृतिक तत्वों एवं सार्मार्जिक संस्थार्ओं को महत्व दियार्। पॉल मुनरो ने लिखार् है – ‘‘शिक्षार् में यथाथवार्द उस प्रकार की शिक्षार् के लिए प्रयुक्त कियार् जार्तार् है जिसमें भार्षार्ओं और सार्हित्य की अपेक्षार् प्रार्कृतिक घटनार्ओं और सार्मार्जिक संस्थार्ओं क अध्ययन को मुख्य विषय बनार्यार् जार्तार् है।’’

6. वार्स्तविक शिक्षण पर बल – 

यथाथवार्द अध्यार्पक की शिक्षण विधि तथार् मूल्यों से भी सम्बन्ध रखतार् है और इस बार्त पर बल देतार् है कि अध्यार्पक वार्स्तविक शिक्षण करे। रॉस ने लिखार् है – ‘‘शिक्षार् में यथाथवार्दी विचार्रधार्रार् को शिक्षण विधि के सम्बन्ध में ही नहीं वरन् उसकी पार्ठ्य वस्तु की महत्तार् एवं उसके मूल्य हेतु सतत् चिन्तनशील रहने के लिए चुनौती देती रहती है।’’

7. शिक्षार् जीवन की पूर्णतार् – 

यथाथवार्दी मार्नते हैं कि शिक्षार् को मार्नव को जीवन के सुख व उपभोग के लिए तैयार्र करनार् चार्हिए।और शिक्षार् मार्नव की रूचि, योग्यतार् एवं आवश्यकतार् के अनुसार्र नियोजित की जार्नी चार्हिए।

    यथाथवार्दी शिक्षार् के उद्देश्य 

    मूल्यों के विषय में यथाथवार्दी दृष्टिकोण व्यक्तिनिष्ठ न होकर वस्तुनिष्ठ है। अत: उद्देश्य में वस्तुनिष्ठतार् की स्पष्ट झलक मिलती है।

    1. जीवन जीने की कलार् प्र्रदार्न करनार् – यथाथवार्दी बच्चों को विद्धार्न बनार्ने के बजार्य जीवन को सुचार्रू रूप से जीने की कलार् सिखार्ने की वकालत करते हैं। उनके अनुसार्र बार्लक को व्यार्वहार्रिक जीवन को सुख पूर्वक जीने के लिए सार्मार्जिक एवं प्रार्कृतिक परिवेश क पूर्ण तथार् समग्र ज्ञार्न आवश्यक है जिससे कि व्यक्ति समार्योजित हो सके।
    2. सार्मार्जिक दार्यित्व के निर्वहन की योग्यतार् क विकास – रॉस ने आग्रह कर लिखार् है कि ‘‘शिक्षार् क उद्देश्य व्यक्तियों क इस प्रकार निर्मार्ण करनार् है कि वे सार्मार्जिक संस्थार्ओं में अपनार् दार्यित्व निभार् सकें। वे सार्मार्जिक संस्थार्यें हैं – परिवार्र, उद्योग, स्वार्स्थ्य संरक्षण रार्ज्य इत्यार्दि।
    3. वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क विकास – यथाथवार्दी शिक्षार् क प्रमुख उद्देश्य वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क विकास करनार् भी है। वैज्ञार्निक दृष्टिकोण के लिए तर्कनार्परक विवके आवश्यक है। इससे बार्लक तथ्यों को खोजबीन करके सोच-समझकर वार्स्तविकतार् को समझ सकेगार्।
    4. जीवन को सुखी व सफल बनार्नार् – यथाथवार्दी वह मार्नते है कि शिक्षार् ऐसी होनी चार्हिए जो कि बार्लक को सुखी व सफल बनार्ये।
    5. बार्लक क सर्वार्गीण विकास – यथाथवार्दी यह मार्नते हैं कि शिक्षार् को बार्लक के शार्रीरिक, मार्नसिक, बौद्धिक व सार्मार्जिक विकास करनार् चार्हिये। इस सम्वेत् विकास से सर्वार्ंगीण विकास हो पार्येगार्। रैवेले के अनुसार्र-’’शिक्षार् क उद्देश्य – बार्लक क सर्वार्ंगीण विकास करनार् है।’’
    6. व्यार्वसार्यिक आत्मनिर्भरतार् – यथाथवार्दी मार्नते हैं कि जीवन को सभ्य, सुन्दर एवं उपयोगी बनार्नार् है तो आत्मनिर्भरतार् अति आवश्यक है। विवेकानन्द जी के दर्शन में भी यथाथवार्दी क पुट मिलतार् है उन्होंने स्पष्ट कियार् है -’मैं सच्ची शिक्षार् उसे कहतार् हूँ जो बार्लक को इस योग्य बनार् दे कि वह अपने पैरों पर खड़ार् हो जार्ये।’’
    7. विवेकशील एवं सदार्चार्री बनार्नार् – मार्न्टेसरी के अनुसार्र ‘‘व्यक्ति को बुद्धिमार्न एवं विवकेशील बनार्नार् जिससे व्यक्ति जीवन को सफल एवं उपयोगी बनार् सके तथार् समार्ज की उन्नति में सहयोग दे यही शिक्षार् क उद्देश्य है।’’ लॉक के अनुसार्र-’’शिक्षार् क उद्देश्य – बार्लक में सद्गुण, बुद्धिमतार्, सदार्चरण तथार् सीखने की शक्ति क विकास करनार् होनार् चार्हिए।’’

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