मौर्य सार्म्रार्ज्य क इतिहार्स
जिस समय सिकन्दर अपने विश्व विजय के अभियार्न पर भार्रत की ओर आयार् तो यहार्ं मगध में एक शक्तिशार्ली नन्द सार्म्रार्ज्य क रार्ज्य थार् ये नन्द रार्जार् अपनी निम्न उत्पत्ति एवं गलत नीतियें के कारण प्रजार् में काफी अलोकप्रिय हो चुके थे परन्तु फिर भी सिकन्दर की सेनार् ने उनसे मुकाबलार् न करनार् उचित समझार् तथार् उतर पश्चिमी भार्रत के छोटे-छोटे गणरार्जयों को विजित कर वार्पिस युनार्न जार्नार् ही ठीक समझार् कुछ यूनार्नी लेखक मार्नते हैं कि नन्द वंश क उन्मूलन करने के लिए सहार्यतार् मार्ंगने चन्द्रगुप्त सिकन्दर से भी मिलार् थार् इस तथ्य में सच्चार्ई हो य न हो परन्तु उस समय चन्द्रगुप्त ने अपने सार्थी चार्णक्य की सहार्यतार् से एक सेनार् इक्कठी कर उतरपश्चिमी भार्रत में सिकन्दर के आक्रमण के कारण आई रिक्कतार् क लार्भ उठार् कर इस क्षेत्र को जती लियार्। बार्द में उसने मगध पर आक्रमण कर 321 ई0पू0 के आसपार्स मौर्य सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् की ली। उधर सिकन्दर की अकस्मक बैबीलोन में मृत्यु के उपरार्न्त उसक सार्म्रार्ज्य उसके जनरलों ने आपस में बार्ंट लियार्। सैल्युकस के हिस्से बैबीलोन से भार्रत तक क क्षेत्र आयार् तथार् उसने अपने रार्ज्य के खोए हुए हिस्से पुन: प्रार्प्त करते हेतु भार्रत पर आक्रमण कर दियार् युनार्नी लेखक तो इस युद्ध के परिणार्म के बार्रे में मौन है परन्तु इसमें सैल्युकस की हार्र हुई तथार् उसे अपनी बेटी क विवार्ह चन्द्रगुप्त से कर वैवार्हिक सबंध स्थार्पित करने पड़े। उसे अपने रार्जदूत मैगस्थनीज को चन्द्रगुप्त के दरबार्र में भेजनार् पड़ार्।

चन्द्रगुप्त क पुत्र बिन्दुसार्र 297 ई0पू0 में रार्जगद्दी पर बैठार् जिसने अमित्रघार्त तथार् अमित्रखार्त इत्यार्दि उपार्धियार्ं धार्रण की। उसने किन-किन प्रदेशों को जीतार् इसक विवरण तो हमार्रे पार्स नही है परन्तु प्रार्रंभिक तमिल कवियों ने मौर्यो के रथों के गरजते हुए चलने क वर्णन कियार् है। जो शार्यद इसी के काल क ही वर्णन हो, क्योंकि अशोक ने तो केवल कलिंग को ही विजित किय थार् तथार् चन्द्रगुप्त के दक्षिण विजय की हो इसके प्रमार्ण नही है। बिन्दुसार्र के पश्चार्त् रार्ज्य सिहार्सन के लिए उसके पुत्रें की बीच संघर्ष चलतार् रहार् जो 273 ई0पू0 से अशोक के रार्ज्यार्भिषेक 269 ई0पू0 से तक चलतार् रहार्। कुछ विद्ववार्न यह मार्नते है कि अशोक ने रार्ज्य तो 273 ई0पू0 में ही प्रार्रम्भ कियार् परन्तु उसक रार्ज्यभिषेक 269 ई0पू0 में हुआ। कसिंग विजय के पश्चार्त् अशोक ने धम्भ विजय को अपनार् लियार् तथार् यह नीति व्यक्तिगत तथार् रार्जनैतिक दोनों स्तरों पर अपनार्ई इसके कारण रार्जार् और प्रजार् के बीच सम्बन्धों में मूलभूत परिवर्तन आ गए। जिसक असर उस काल के समार्ज, रार्जनीति एवं धर्म पर प्रचूर रूप से पड़ार्।

चन्द्रगुप्त ने चार्णक्य की सलार्ह पर जो केन्द्रिय प्रशार्सन व्यवस्थार् क प्रार्रंभ कियार् उसे अशोक ने न केवल जार्री रखार्। अपितु उसमें कुछ प्रशार्सनिक सुधार्र भी किए। धम्भमहार्मार्त्रों, स्त्रीअध्यक्ष महार्मार्त्रों की नियुक्ति कर धर्म तथार् स्त्रियों की भलार्ई के कार्य किए प्रजार् की भलार्ई के लिए रार्ज्जुकों की नियुक्ति की गई। इसके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त तथार् बिन्दुसार्र की तरह ही विदेशी तार्कतों से मित्रतार् के सम्बन्ध बनार्ए रखे।

मौर्यकाल मे अर्थव्यवस्थार् काफी समृद्ध थी शहरीकरण की प्रक्रियार् जो छटी शतार्ब्दी ई0पू0 प्रार्रंभ हुई थी उसक आगे विकास कियार् गयार् इस काल में कई रार्जमागो जैसे उत्तरार्मथ, दक्षिणार्पथ रार्जमाग इत्यार्दि क निर्मार्ण कर ने केवल केिन्द्रीय प्रशार्सन को बल दियार् अपितु व्यार्पार्र में भी इसके कारण प्रगति हुई। गंगार् घार्टी से पश्चिमी मध्य भार्रत, दक्षिणी भार्रत तक व्यार्पार्र क प्रसार्र हुआ व्यार्पार्र पर रार्ज्य क नियंत्रण थार् इसके सार्थ-2 व्यार्पार्र तथार् वार्णिज्य को अवरूद्ध करने वार्ले को कड़ी सदार् को प्रार्वधार्न कर व्यार्पार्र को बढ़ार्वार् दिय गयार्। इस काल में सार्मार्जिक, आर्थिक परिवर्तनों क प्रार्रंभार् हुआ तथार् बौद्ध धर्म क काफी प्रसार्र हुआ।

मौर्यकाल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी पूरे भार्रत को एक सूत्रार् में बार्धंनार् एवं एक संशक्त केन्द्रिय शार्सन व्यवस्थार् क प्रचलन जिसमें कृषि, व्यार्पार्र एवं उद्योग पर रार्ज्य क पूरार् नियंत्रण थार् यद्यपि व्यार्पार्र एवं वार्णिज्य में इस काल मे बहुत विकास हुआ परन्तु रार्ज्य की आर्थिकतार् क मुख्य आधार्र कृषि ही थार्।

मौर्य कालीन सार्मार्जिक स्थिति

मौर्य कालीन समार्ज एवं सार्मार्जिक व्यवस्थार् को जार्नने के लिए हम कौटिल्य क अर्थशार्स्त्र, अशोक के अभिलेख तथार् यूनार्नी रार्जदूत मैगस्थनीज कृत इंडिक पर आश्रित है। इसके अतिरिक्त बौद्ध सार्हित्य में भी यदार् कदार् इस काल के संदर्भ में लिखी बार्तें मिल जार्ती है। परन्तु इस सार्हित्य में लिखी हुई बार्तों को हम पूर्णत्य सही नही मार्न सकते क्योंकि उस समय लिखने की कलार् क विकास नही हुआ थार् तथार् इन ग्रन्थों क सग्लन बार्द में हुआ। इसलिए इनमें लिकृतियार् होनार् स्वभार्विक ही थार्।

वर्ण व्यवस्थार् :-

मौर्यकाल में समार्ज चार्र वर्गो में बंटार् हुआ थार्। अशोक के अभिलेखों में अनेक वर्णो क जिक्र है। ब्रार्ह्यणों क स्थार्न श्रमणों के सार्थ आदरपूर्ण थार्। तृतीय शिलार्लेख में कहार् गयार् है कि ब्रार्ह्यणों और श्रमणों की सेवार् करने उतम हैं वैश्य यार् गृहपति अधिकाशत: व्यार्पार्र गतिविधियों में सलिप्त थे। क्षित्रार्य वर्ण क अभिलेखों में कही भी उल्लेख नही है। धर्मशार्स्त्रों के अनुसार्र कौटिलय ने भी चार्रों वर्णो के व्यवसार्य निर्धार्रित किए। किन्तु शुद्ध को शिल्पार्कार और सेवार्वृति के अतिरिक्त कृषि, पशुपार्लन और वार्णिज्य से आजिविक चलार्ने की अनुमति थी। इन्हें सम्मिलित रूप में ‘वातार्’ कहार् गयार् है। निश्चित है इस व्यवस्थार् शुद्र के आर्थिक सुधार्र पर प्रभार्व उसकी सार्मार्जिक स्थिति पर ही प्रभार्व पड़ार् होगार्। कौटिल्य द्वार्रार् निर्धार्रित शूद्रों के व्यवसार्य वार्स्तविकतार् के अधिक निकट हैं अर्थशार्स्त्र में कहार् गयार् है कि आर्य अस्थार्ई वितियों के कारण दार्स के रूप में कार्य कर सकतार् है। यार् वह धन कमार्ने के विचार्र से भी ऐसार् कर सकतार् है। इस स्थिति के कारण कुछ विद्वार्नों क मत है कि मौर्यकालीन वर्ण-व्यवस्थार् दार्स प्रथार् पर निर्भर थी। इन संबधों के विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि दार्स प्रथार् यूनार्नी गुलार्म प्रथार् से सर्वदार् भिन्न थी। और इसी कारण मेगस्थनीण ने भार्रत में दार्स प्रथार् न होने की बार्त कही है। समय के ब्रार्ह्यणों क विशिष्ट स्थार्न थार् किंतु मनु तथार् पूर्वगार्मी धर्मसूत्रों की भार्ंति इस तथ्य को बार्र-बार्र दुहरार्ने क प्रयार्स अर्थशार्स्त्र में नही कियार् गयार् है। ब्रार्ह्यणार्दि चार्र वर्णो के अतिरिक्त कौटिल्य ने अनेक वर्णसंकर जार्तियों क भी उल्लेख कियार् है। इनकी उत्पति धर्मशार्स्त्रों की भार्ंति विभिन्न वर्णो के अनुलोम और प्रतिलोम विवार्हों में बतार्ई गई है। जिन वर्णसंकर जार्तियों क उल्लेख है वे है अम्बष्ठ निषार्द, पार्रशव, रथकार, क्षतार्, वेदेहक, मार्गध, सूत, पुतलकस, वेण, चार्ंडार्ल, श्वपार्क इत्यार्दि। इनमें से कुछ आदिवार्सी जार्तियार्ं थी, जो निश्चित व्यवसार्य से आजीविक चलार्ती थी। कौटिल्य ने चार्ंड़ार्लों के अतिरिक्त अन्य सभी वर्णसंकर जार्तियों को शूद्ध मार्नार् है। इनके अतिरिक्त तंतुवार्य (जुलार्हे), रजक (धोबी), दर्जी, सुनार्र, लुहार्र, बढ़ई आदि व्यवसार्य पर आधार्रित वर्ग, जार्ति क रूप धार्रण कर चूके थे। अर्थशार्स्त्र में इन सबक समार्वेश शूद्र वर्ण के अंतर्गत कियार् गयार् है। अशोक के शिलार्लेखों में दार्स और कर्मकर क उल्लेख है। जो शूद्र वर्ग के अंदर ही समविष्ट किए गए है।ं शूद्र वर्ण में दार्सों के प्रति अच्छार् व्यवहार्र नही कियार् जार्तार् थार्। इसलिए अशोक के अपने अभिलेखों में उनके प्रति अच्छार् व्यवहार्र करने के आदेश देने पड़ते थे। अर्थशार्स्त्र में चार्रों वर्णो तथार् उनके वर्णविहित कर्त्तव्यों क वर्णन है। मैगस्थनीण ने मौयकालीन समार्ज को सार्त वर्गो में बार्ंटने क उल्लेख अपनी पुस्तक इंडिक में कियार् है। जिनमें (1) दाशनिक (2) किसार्न (3) अहरी (4) कारीगर यार् शिल्पी (5) सैनिक (6) निरिक्षक (7) सभार्सद तथार् अन्य शार्सक वर्ग। मैगस्थनीज ने लिखार् है कि कोई भी व्यक्ति अपनी जार्ति के बार्हर िवार्ार्ह नही कर सकतार्, न वह अपने व्यवसार्य को दूसरी जार्ति के व्यवसार्य ने बदल सकतार्, न वह अपने व्यवसार्य को दूसरी जार्ति के व्यवसार्य ने बदल सकतार् थार्। केवल ब्रार्ह्यणों को ही अपनी विशेष स्थिति के कारण यह अधिकार प्रार्प्त थार्। इसे देखने से लगतार् है कि वह भार्रतीय वर्ण व्यवस्थार् से भलीभार्ंति परिचित नही थार्। एक और तथ्य मैगस्थनीज की इस गलत बयार्नी पर आधार्रित है कि भार्रत में आकाल कभी नही पड़ार्। सोगौड़ तथार् महार्स्थार्न स्थित मौर्यकालीन शिलार् लेखों द्वार्रार् हम जार्नते है कि यह कथन सत्य नही थार् आकालों से महार्न क्षति हुई थी और रार्ज्यों आम जनतार् को रार्हत देने के कार्य में सक्रिय रूप से संलग्न थार्। मैगस्थनीज ने कहार् है कि भार्रत में कोई दार्स प्रथार् नही थी। और एरियन तथार् स्ट्रबो दोनों ने इसकी पुष्टि की है। इसके विपरीत बौद्ध सार्हित्य में तीन प्रकार के दार्सों क वर्णन मिलतार् है। ऐसे दार्स जो अपने पितार् से उतरार्धिकार में दार्सतार् प्रार्प्त करते थे, ऐसे दार्स जो खरीदे जार्ते थे यार् उपहार्र में प्रार्प्त होते थे तथार् ऐसे दार्स जो दार्सों जो दार्सों के घरों में जन्म लेते थे। अर्थशार्स्त्र में कहार् गयार् है कि एक दार्स को डेढ़ पण प्रति महीनार् दियार् जार्तार् थार्। और उसे तथार् उसके परिवार्र को भोजन दियार् जार्तार् थार्। इस प्रकार मौर्यकाल में घरेलू दार्स प्रथार् प्रचलित थी, किन्तु दार्स प्रथार् निश्चय ही मौर्यकालीन आर्थिक व्यवस्थार् क आधार्र नही थी। प्रथम अवस्थार् में वह सरल जीवन व्यतीत करतार् थार्। उसक जीवन ज्ञार्न उपदेशों के श्रमण एवं लोगों को विधार्दार्न में व्यतीत होतार् थार्। दूसरी अवस्थार् में वह विवार्ह करतार् थार् तथार् सुखमय जीवन में प्रवेश करतार् थार्। इस वर्ग के लोग वनों में तपस्यार् करते थे और सार्धनार् क जीवन व्यतीत करते थे। श्रमणों के एक अन्य वर्ग में चिकित्सक आते थे जो नि:शुल्क लोगों की बिमार्रियों क इलार्ज करते थे। समार्ज इसके बदले इस वर्ग क भरण पोषण करतार् थार्। ऐसार् प्रतित होतार् है। कि मैगस्थनीज ने इस वर्ग क उल्लेख यूनार्नी समार्ज के आधार्र पर कियार् है तथार् वह भार्रतीय संस्कृति से अधिक परिचित नही थार्।

इस काल में विभिन्न जार्तियों के अपने-अपने कार्य अधिकार अलग-अलग थे। अर्थशार्स्त्र के अतिरिक्त धर्मसूत्रों में भी इसक उल्लेख है। अर्थशार्स्त्र के अनुसार्र ब्रार्ह्यण क काम अध्यार्पन, अध्ययन, यज्ञ, भजन, दार्न तथार् प्रतिग्रह इत्यार्दि थार्। श्रित्रार्यों के कार्यो के अध्ययन, भजन, दार्न, शस्त्रार्जीव (शार्स्त्रों के आधार्र पर जीविका), मूल रक्षण अथवार् लोगों की रक्षार् करनार् थार्। वैश्यों के कार्यो में अध्ययन, भजन, दार्न, कृषि, पशुपार्लन, वार्णिज्य इत्यार्दि थे। जबकि शूद्रों के कार्यो में द्धिजार्तिशुश्रुशार् अथवार् द्धिज जार्तियों के कार्य करनार्, वातार् (लोगों के धन की रक्षार् करनार्), कारूकर्म (कलार्ंए) तथार् कुशीलवकर्म इत्यार्दि थे। अर्थशार्स्त्र से पतार् चलतार् है कि मनु के अनुसार्र ब्रार्ह्यण सबसे सर्वोतम थे क्योंकि वे ज्ञार्नी थे। उन्हें ब्रहम ज्ञार्न थार्। उन्हें ही शिक्षक, पुजार्री, न्यार्यधिक्ष, प्रधार्नमंत्री, धर्मपरिषद क सदस्य तथार् न्यार्य सबंधी आयोग क सदस्य रखार् जार् सकतार् थार्। परन्तु आपार्तकाल में ब्रार्ह्यणों को उनसे निचले वर्ग क काम भी करने क अधिकार थार्। ब्रार्ह्यणों को किसी भी अपरार्ध के लिए दण्ड दियार् जार् सकतार् थार् परन्तु मृत्युदंड उनके लिए पूर्णतय् निषेध थार्।

शूद्रों क सरकारों क अधिकार नही थार् तार्िार् न ही वे पवित्रार् ग्रन्थों को पढ़ व सुन सकते थे। शेष सार्मार्जिक अधिकार उन्हें प्रार्प्त थे। कई ग्रन्थों में तो शूद्र शिक्षक एवं विद्यार्थ्र्ार्ी होने क भी वर्णन मिलतार् है। जिससे हमें शूद्रों के पढ़ने लिखने क पतार् चलतार् है। जार्तक कथार्ओं में शूद्रो के सार्थ चार्ण्डार्लों क भी वर्णन है जोकि शहर से बार्हर निवार्स करते थे, जिनके दर्शन मार्त्रार् को ही अपशकुन मार्नार् जार्तार् थार्।

बौद्ध तथार् जैन सार्क्ष्यों में जार्ति प्रथार् क चित्रण काफी भिन्न मिलतार् है। इनमें क्षित्रार्यों क स्थार्न प्रथम है। यद्यपि उन्हें ब्रार्ह्यणों से कम श्रेष्ठ मार्नार् जार्तार् थार्। बौद्ध सार्क्ष्यों के अनुसार्र इन जार्तियों के अतिरिक्त बहुत सी मिक्षित जार्तियार्ं, अलग-अलग काम करने वार्ले लोगों की बन ुकी थी। परन्तु सार्मार्न्य धार्रणार् के अनुसार्र ये जार्तियार्ं अन्तरजार्तिय विवार्हों के कारण पैदार् हुई। बौद्ध सार्हित्य के अनुसार्र इस काल में जार्ति क किसी काम से पूर्णतयार् सम्बन्ध नही थार्। इनमें एक क्षित्रार्य के कुम्हार्र, टोकरी बनार्ने वार्लार्, फूलों के हार्र बनार्ने तथार् खार्नार् बनार्ने वार्ले के रूप में वर्णन मिलतार् है। इसी तरह सेठ्ठी (वैश्य) क ऐक दर्जी तथार् कुम्हार्र क काम करते बतार्यार् गयार् है। परन्तु फिर भी उनकी जार्ति की गरिमार् को कोई नुकसार्न नही हुआ। ब्रार्ह्यण जार्तक में ब्रार्ह्यणों को निम्नलिखित दस कार्य करते दर्शार्यार् गयार् है। (1) चिकित्सक क काम (2) नौकर तथार् कोचवार्न (3) कर इक्त्रार् करनार् (4) भूमि खोदने वार्लार् (5) फल तथार् मिठार्ईयार् बेचनार् (6) कृषक (7) पूजार्री जोकि शार्स्त्रों की व्यार्ख्यार् करतार् थार्। (8) पुलिस क कार्य (9) शिकारी (10) मार्ज्ञिक के रूप में रार्जार् के कार्य करने वार्लार्। इसके अतिरिक्त वार्सेथ्थ सुत्रार् में भी ब्रार्ह्यणों को कृषक, भूमिहार्र, यूत, दस्तकार, बलिहार्री, दस्तकार के रूप में वर्णन कियार् गयार् है। इन सभी कार्यो के बार्द भी एक ब्रार्ह्यण किसार्न क बौद्धसत्व क स्वरूप मार्नार् है। जैन तथार् बौद्ध ग्रन्थों में सार्मार्न्य ब्रार्ह्यण किसार्न को बोद्धिसत्व क स्वरूप मार्नार् है। जैन तथार् बौद्ध ग्रन्थों में सार्मार्न्य ब्रार्ह्यणार् को यार् तो एक सार्धार्रण नार्गरिक के रूप में समार्ज की सेवार् करते यार् वार्पस अथवार् ऋषि के रूप में जंगल के आश्रमों में रहने वार्लार् बतार्य गयार् है।

इन चार्र जार्तियों के अतिरिक्त जार्ति सार्हित्य में बहुत सी हीन जार्तियों क वर्णन कियार् गयार् है। जो हीन कार्य करते थे। जिनमें छकड़े बनार्ने वार्ले, चटार्ई बनार्ने वार्ले, नार्ई, कुम्हार्र, बुनकार, चर्मकार इत्यार्दि थे। इनमें से कुछ को तो मतीभेद बतार्यार् गयार् हैं जोकि आर्यो के सार्मार्जिक व्यवस्थार् से बार्हर थे। विन्यसुत्रार् विमंग में इनमें चार्ण्डार्ल, वेग निषार्द, रथकर तथार् पुक्कुस इत्यार्दि थे।

आश्रम व्यवस्थार् :-

इस काल में मनुष्य के जीवन को चार्र आश्रमों यार् अवस्थार्ओं में बार्ंटार् हुआ थार्। अर्थशार्स्त्र में भी इस प्रकार क वर्णन मिलतार् हैं जिस प्रकार वैदिक सार्हित्य क धर्मसूत्रार् भी इस तथ्य की पुष्टि करते है। प्रथम आश्रम ब्रह्यचाय क है। जिसमें पठन-पार्ठन क कार्य कियार् जार्तार् थार्। ब्रह्यचार्री गुरू के घर यार् आश्रम में रह कर पठतार् थार्। ब्रह्यचार्री दो प्रकार के थे (1) उपकुर्वार्ण, जोकि शिक्षार्पूर्ण होने के उपरार्न्त विवार्ह कर गृहस्थ हो सकतार् थार्। (2) नैष्यिक, जोकि पूरे जीवन विद्यार्थ्र्ार्ी रह कर ब्रह्यचाय क पार्लन करतार् थार्।

दूसरार् आश्रम गृहस्थ आश्रम थार्। जिसमें वैवार्हिक जीवन व्यतीत कियार् जार्तार् थार्। इस आश्रम में देवतार्ओं के ऋण को यज्ञ द्वार्रार् तथार् पितृ ऋण को सन्तार्नोत्पति कर चुकायार् जार्तार् थार्। ऋषि ऋण ज्ञार्न तथार् धामिक उत्सवों (पर्वन के दिनों में), धर्म कर्म के कार्यो एवं दार्न द्वार्रार् चुकायार् जार्तार् थार्।

तीसरार् आश्रम बार्णप्रस्थ आश्रम जिसे बौद्ध सार्हित्य में भिक्षु कहार् गयार् है। इसमें अनिश्चय (कुछ इक्कठार् न करनार्) (2) ऊद्र्दद्यव्रेत (3) बरसार्त के दिनों में एक ही जगह निवार्स करनार् (4) गार्वों में जार्कर भिक्षार् मार्ंगनार् (5) अपने लिए स्वंय वस्त्र बुननार् (6) फूल-पते न तोड़नार् तथार् भोजन के लिए बीजों को खरार्ब न करने के नियम थे। इस आश्रम में भिक्षु अपनार् भरण पोषण केवल भिक्षार् में मिले भोजन पर ही करते थें चौथार् आश्रम सन्यार्स यार् परिव्रजक आश्रम थार्। जिसमें एक भिक्षु सभी ससंकारिक वस्तुओं को त्यार्ग कर जंगल में प्रस्थार्न कर जार्तार् थार् जहार्ं वह जंगल में ही निवार्स कर वही के कंदमूल व फल खार् कर अपनार् गुजार्रार् करतार् थार्। परिव्रजक सत्य, असत्य, दुख-सुख वेदों को छोड़ कर आत्मन क ध्यार्न करतार् थार्। कौटिल्य के अनुसार्र सभी आश्रमों में अहिंसार्, सत्य बोलनार्, शुद्धतार्, ईष्यार् न करनार्, दूसरों क सम्मार्न करनार् इत्यार्दि कार्य सम्मलित थे।

पार्रिवार्रिक जीवन :-

इस काल के समार्ज में संयुक्त परिवार्र प्रणार्ली प्रचलित थी। पितार् घर क मुखियार् होतार् थार् तथार् उसकी आज्ञार् क पार्लन करनार् पुत्र क धर्म थार्। इस काल में हमें बहुत से ऐसे उदार्हरण मिलते है जिससे परिवार्र के भिन्न-2 सदस्यों के बीच सौहदर्य पूर्ण सम्बन्ध थे। बड़ो के प्रति छोटों क आदर भार्व थार्। पति-पत्नी, पत्नी तथार् उसके सार्स-ससुर, भार्ई व बहनों के बीच स्नेहपूर्ण सम्बन्ध थे। इसके विपरीत ऐसे उदार्हरण भी मिलते है कि सार्स यार् बहु एक दूसरे से तंग आ कर सन्यार्सिन बन जार्ती थी। एक स्थार्न पर तो बहु ने अपने आपकों मार्रने के लिए जार्ल बुनार् तथार् एक अन्य स्थार्न पर चार्र बहुओं ने अपने ससुर को घर से निकाल दियार्। एक अन्य स्थार्न पर एक पुत्र इसलिए शार्दी करने से मनार् कर रहार् है कि पत्नियार्ं सार्मार्न्यत् पति-पत्नी के संबध इस काल में सौहदर्य पूर्ण थे। यद्यपि मैगस्थनीज व जार्तक सार्हित्य ने पति-पत्नी के संबधों में सतार्ंन प्रार्प्ति न होने क भी वर्णन कियार् है। सार्मार्न्यत: समार्ज में पुरूष एक ही विवार्ह करते थे। परन्तु बहुपत्नी विवार्ह क वर्णन भी इस काल में मिलतार् है। मैगस्थनीय ने लिखार् है कि भार्रतीय पुरूष बहुत सी स्त्रियों से विवार्ह (बहु विवार्ह प्रथार्) करते थे। ये विवार्ह कभी सध्धर्मीयतार् के लिए, कभी खुशी के लिए यार् संतार्न प्रार्प्ति के लिए विवार्ह किए जार्ते थे। जो पत्नी पति की जार्ति से ही संबध रखती थी उसकी घर में काफी प्रतिष्ठार् होती थी तथार् उसकी संतार्न को ही अपने पितार् की सम्पति क कानूनी उतरार्धिकारी मार्नार् जार्तार् थार्। बार्कि पुत्रों को उनकी मार्तार् की जार्ति के अनुसार्र अधिकार मिलते थे। इस प्रकार हम देखते है कि इससे परिवार्र में शार्न्ति भंग होने तथार् सार्मार्न्य सम्बन्धों में कड़वार्हट होनार् स्वभार्विक थार्। बहुपत्नि विवार्हों से पत्नी पर अत्यार्चार्र होनार् तथार् उसके पार्रिवार्रिक स्थिति में हीनतार् आनार् स्वार्भार्विचक थार्। बहुपत्नी विवार्ह इस काल में थार् यार् नही यह कह पार्नार् कठिन है। विधवार्न बृहस्पति द्वार्रार् उल्लेखित कुले कन्यार्प्रदार्न तथार् महार्भार्रत के दौपद्धि विवार्ह को इस काल क मार्नने से इस प्रथार् के प्रचलन को मार्न्यतार् मिलती है। परन्तु इस बार्त पर संदेह है कि ये सार्क्ष्य इसी काल के है यार् नही।

विवार्ह तथार् स्त्री की स्थिति :-

इस काल में सार्मार्न्यत: विवार्ह अपनी ही जार्त में कियार् जार्तार् थार्। यद्यपि अन्तरजार्तिय विवार्हों के प्रचलन को उल्लेख भी है। एक ही जार्ति में भी विवार्ह पर कुछ प्रतिबंध थे जैसे कि एक ही गोत्रार् यार् प्रवर (सगोत्रार्) थार् सपिण्ड़ विवार्ह इत्यार्दि। धर्मसूत्रों के अनुसार्र इ काल में आठ प्रकार के विवार्हों क प्रचलन थार् :-

  1. ब्रह्यार् विवार्ह, जिसमें एक सुसंस्कृत पुरूष से पितार् अपनी कन्यार् (गहनों, रत्न, मणियार्ं पहने) क विवार्ह करतार् थार्।
  2. द्धैव विवार्ह जिसमें यज्ञ को करने वार्ले पुजार्री से पितार् अपनी कन्यार् क विवार्ह करतार् थार्।
  3. आर्श विवार्ह, जिसमें वर स एक गार्य यार् बैल प्रार्प्त कर पितार् अपनी कन्यार् क विवार्ह वर से करतार् थार्।
  4. प्रार्जार्पत्य विवार्ह, जिसमें पितार् अपनी कन्यार् क विवार्ह मन्त्रोउच्चरण के बार्द वर से करतार् थार्।
  5. असुर विवार्ह, जिसमें वर पक्ष वार्ले वधु को तथार् उसके परिजनो को धन देते थे।
  6. गार्न्धर्व विवार्ह : इसमें पुरूष व स्त्री एक दूसरे की सहमती से प्रेम विवार्ह करते थे।
  7. रार्क्षस विवार्ह : इसमें वर द्वार्रार् कन्यार् क उसके पितार् के घर से अपहरण करके उससे विवार्ह कियार् जार्तार् थार्।
  8. पैशार्च विवार्ह : इसमें पुरूष कन्यार् से मद् अवस्थार् में होते हुए कन्यार् से विवार्ह करतार् थार्।

इनमें से ब्रहम, दैव, आर्श, प्रार्जार्पत्य तथार् गार्न्धर्व इत्यार्दि विवार्हों को विभिन्न सार्क्ष्यों में ठीक मार्नार् गयार् है। जबकि पैशार्च विवार्ह कसे सभी सार्क्ष्यों ने बुरार् मार्नार् है तथार् रार्क्षस विवार्ह केवल क्षित्रार्यों में होनार् स्वीकारार् गयार् है। मैगस्थार्नीय ने भी अपने वितरण में भार्रतीय विवार्ह में एक बैलों की जोड़ी कन्यार् पक्ष को देने की बार्त कही है। जोकि इस काल में आर्श प्रकार के विवार्ह के प्रचलन क द्योतक है। ऊपरलिखित विवार्ह प्रकारों में प्रथम चार्र को अधिकतर सार्क्ष्यों में ठीक मार्नार् है क्योंकि इनमें कन्यार् के मार्तार्-पितार् वर की योग्यतार् के आधार्र पर अपनी पुत्री की शार्दी करते थे।

विवार्ह में दहेज प्रथार् नही थी। यवन विधवार्न नियर्कस ने भी लिखार् है कि भार्रतीय बिनार् दहेज के विवार्ह करते थे तथार् युवती को विवार्ह योग्य होने पर उसक पितार् विभिन्न समार्रोहों में जार्तार् थार् जहार्ं पर मल्ल युद्ध, मुक्केबार्जी, दौड़ यार् अन्य कार्यो में विजयी पुरूष से कन्यार् क विवार्ह कियार् जार्तार् थार्। यह स्वयवंर क ही एक सुधरार् हुआ रूप प्रतीत होतार् है।

विवार्ह के लिए कन्यार् की आयु के बार्रे में भी इस काल में अलग-अलग मत है। सार्मार्न्यत: व्यस्क होने पर ही कन्यार् क विवार्ह कियार् जार्तार् थार्। बौद्ध सार्हित्य इस सार्क्ष्य को प्रमार्णित करते हैें परन्तु सूत्रार् सार्हित्य में लड़कियों को कम उम्र में शार्दी के प्रमार्ण मिलते हैं इस प्रकार हम देखते है कि इस काल में यद्यपि व्यस्क होने पर ही कन्यार् की शार्दी हआ करती थी परन्तु बार्ल-विवार्ह के भी प्रमार्ण मिलते है। यदि कोई पितार् अपनी व्यस्क लड़की की शार्दी नही करतार् थार् तो यह उसके लिए एक पार्प मार्नार् जार्तार् थार्। सार्क्ष्यों के अनुसार्र इस अवस्थार् में कन्यार् स्वंय अपने लिए वर ढूढ़ सकती थी। यह इन्तजार्र तीन महीने से तीन सार्ल हो सकतार् थार्।

यद्यपि बार्ल-विवार्ह एक सार्मार्न्य प्रथार् नही थी। परन्तु फिर भी विवार्ह की आयु कम होने से स्त्रियों की सार्मार्न्य शिक्षार् तथार् संस्कृति पर बुरार् प्रभार्ार्व पड़ार् । दूसरी और उनकी कौमाय पर अधिक जोर दियार् जार्ने लगार् तथार् सार्थ ही अपने पति क बिनार् प्रश्न के आज्ञार् पार्लन करनार् भी स्त्रियों की स्थिति में गिरार्वट के मुख्य कारणों में से एक थे।

स्त्री शिक्षार् :-

इस काल में हमें स्त्री शिक्षार् के प्रमार्ण मिलते है। तथार् वे अच्छी पढ़ी लिखी हुआ करती थी। स्त्रियार्ं घर तथार् समार्ज में प्रतिष्ठित स्थार्न रखती थी। इस काल में दो प्रकार की स्त्री विधाथियों क वर्णन है। एक ब्रह्यवार्दिनी जो कि जीवनपर्यन्त ग्रन्थों क अध्ययन करती थी। दूसरी सध्धोद्धार्हार् (Sadyodvaha) जोकि विवार्ह होने तक शिक्षार् ग्रहण करती थी। पणिवी इस काल में शिक्षक उपध्यार्यार् तथार् उपार्ध्यार्यी क वर्ण करतार् हैं बौद्ध तथार् जैन सार्क्ष्य की ब्रह्यवार्दिनी, से सम्बन्धित शिक्षित बौद्ध भिक्षुणियार्ं जिनकी कृतियार्ं थेरी गार्थार् में संकलित है। इसी प्रकार जैन सार्हित्य में जयंन्ती नार्मक स्त्री क वर्णन है। जिसने स्वंय दर्शनशार्स्त्रार् में भगवार्न महार्वीर से वार्द-विवार्द कियार् थार्।

इस काल में स्त्रियों को पढ़ार्ई के अतिरिक्त, संगीत, नृत्य तथार् चित्रकलार् में भी निपुणतार् प्रदार्न की जार्ती थी। कुछ िस्त्रार्यार्ं सैन्य कलार् की शिक्षार् की प्रार्प्त करती थी। सार्हित्य में शार्क्तीवी क वर्णन इसे सिद्ध करतार् है। मैस्थनीण के अनुसार्र चन्द्रगुप्त् मौर्य के अंगरक्षक िस्त्रार्यार्ं ही थी। जब वह शिकार पर जार्तार् थार् तो कुछ िस्त्रार्ंयार् रथ पर कुछ छोड़ों व हार्थियों पर भी सार्थ जार्ती थी तथार् वे अस्त्रार्शस्त्रों से इस प्रकार लैसं होती थी कि मार्नों वे युद्ध करने जार् रही हो। कौटिल्य भी स्त्री अंगरक्षकों के होने क प्रमार्ण देतार् है।

इस काल में लड़कों की तरह लड़कियों क भी उपनयन संस्कार हुआ करतार् थार्। विवार्ह योग्य कन्यार् की कौमाय पर अधिक बन देने से धीरे-धीेरे विधवार् विवार्ह पर असर पड़ने लगार्। यद्यपि अर्थशार्स्त्र तथार् धर्मसूत्रों में विधवार् यार् स्त्री क पुन: विवार्ह के प्रमार्ण है। पुन: विवार्ह के लिए कुछ नियम स्थार्पित किए गए थे। जैसे पुन: विवार्ह वही स्त्रियार्ं ही कर सकती थी जिसक पति यार् तो मर चुक हो, सार्धु बन गयार् हो, पति विदेश में बस गयार् हो, यार् काफी वर्षो से वार्पिस न आयार् हो। इसके अतिरिक्त स्त्री अपने पति के जीवित रहते भी पुन: विवार्ह कर सकती थी। जैसे कि पति क नंपुसक हो जार्नार् यार् जार्ति से बार्हर निकाल दियार् गयार् हो।

परिवार्र में स्त्रियों की स्थिति स्मृतिकाल की अपेक्षार् अब अधिक सुरक्षित थी। किन्तु फिर भी मौर्यकाल में स्त्रियों की स्थिति को अधिक उन्नत नही कहार् जार् सकतार्। उन्हें बार्हर जार्ने की स्वतंत्रतार् नही थी। संभ्रार्त घर की िस्त्रार्यार्ं प्रार्य: घर के ही अंदर रहती थी। कौटिल्य ने ऐसी स्त्रियों को ‘अनिष्कासिनी’ कहार् है।

विवार्ह विच्छेद : –

इस काल में विवार्ह विच्छेद होने के भी प्रमार्ण है। अर्थशार्स्त्र के अनुसार्र यदि पति दुरार्चार्री हो, विदेश चलार् गयार् हो, रार्जार् से विद्रोह कर दियार् हो, पति से पत्नी को जार्न क खतरार् हो तो पत्नी पति से तलार्क ले सकती थी। पति-पत्नी अपनी अपसी सहमति से भी तलार्क ले सकते थे। इस प्रकार हम देखते है कि इस आधार्र पर स्त्री और पुरूष दोनों को समार्न अधिकार प्रार्प्त थे।

सती प्रथार् :-

कौटिल्य के अर्थशार्स्त्र से सती प्रथार् के प्रचलित होने क कोई प्रमार्ण नही मिलतार्। इस समय के धर्मशार्स्त्रार् इस प्रथार् के विरूद्ध थे। बौद्ध तथार् जैन अनुश्रुतियों में भी इसक उल्लेख नही है किन्तु यूनार्नी लेखकों ने उतर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने क उल्लेख कियार् है। यौद्धार् वर्ग की स्त्रियों में सती की वह प्रथार् प्रचलित रही होगी। जोकि कभी-कभी सवैन्धिक हुआ करती थार् कभी-कभी विधवार् को उसके पति की चितार् के सार्थ जबरदस्ती जलार् दियार् जार्तार् थार्। यूनार्नी इतिहार्सकारों ने लिखार् है कि 316 ई.पूर्व बुद्ध में जब एक भार्रतीय सेनार्पति वीरगति को प्रार्प्त हो गयार् तो उसकी विधवार् उसके सार्थ सती हो गई।

गणिकाएं :-

किसी भी काल में स्त्री दशार् क विवरण जब तक पूरार् नही होतार् जब तक वेश्यार्वृति क वर्णन न करें। इस काल में भी इस प्रकार की स्त्रियों थी। स्वतंत्र रूप से वेश्यार्वृति करने वार्ली स्त्रियार्ं ‘रूपार् जीवार्’ कहलार्ती थी। इनके कार्यो क निरिक्षण गणिकाध्यक्ष तथार् एक रार्जपुरूष करतार् थार्। बौद्ध सार्क्ष्यों से हमें वैशार्ली की नगरवधुवों क वर्णन मिलतार् है। जिनके पार्स रार्जार्, रार्जकुमार्र तथार् अन्य अमीर लोग जार्यार् करते थे। गणिकाओं को प्रमार्ण में प्रतिष्ठित स्थार्न की प्रार्प्ति थी। आम्रपार्ली को तो स्त्री रत्न तक की उपार्धि मिली हुई थी। गणिकाएं अपनी आय क एक भार्ग रार्ज्य को कर के रूप में देती थी। रार्ज्य की और से उनके अधिकर भी सुरक्षित थे तथार् उनेस दूव्र्यवार्हर करने वार्लों को जुर्मार्नार् कियार् जार्तार् थार्। कई वेश्यार्ओं को तो जार्सूस के रूप में रखार् जार्तार् थार्। सुन्दरतार्, आयु, गुणों के आधार्र पर उनकी आय 1000 पण प्रति वर्ष हो सकती थी। वेश्यार्एं रार्जदरबार्र में भी जार्ती थी।

इसके अतिरिक्त स्त्रियों को गणिकाओं के रूप में, चमरधार्री, दार्तार् धार्रण करने के लिए , स्वर्ण कुम्भ उठार्ने के लिए, पंखार् करने के अतिरिक्त रसोई, स्नार्नग्रह तथार् रार्जार् के हरम में भी नियुक्ति की जार्ती थी।

दार्स प्रथार् :-

यह प्रथार् तो भार्रत में वैदिक काल से ही प्रचलित थी तथार् इस काल में भी यह प्रचलन में थी। इसके बार्रे में यूनार्नी लेखक अलग-अलग विवरण देते है। अशोक के अभिलेखों में भी दार्स सेवकों, भृत्यों और अन्य प्रकार के श्रम जीविकों क उल्लेख है अर्थशार्स्त्र में तो दार्स प्रकार क विवरण काफी मार्त्रार् में दियार् है। ये दार्स प्रार्य: अनाय हुआ करते थे। तथार् खरीदे-बचे जार् सकते थे। कभी-कभी तो आर्थिक संकट में कुछ लोग स्वंय को भी दार्स के रूप में बेच सकते थे। परन्तु उनकी संतार्न आर्य ही कहलार्ती थी। दार्सों के सार्थ इस समय अच्छार् व्यवहार्र कियार् जार्तार् थार्। यदि कारण है कि मैस्थनपीण इस प्रथार् के प्रचलन के होने की पहचार्न नही सका। उसके अनुसार्र सभी भार्रतीय स्वतंत्र थे। उसक कहनार् है कि भार्रतीय विदेशीयों को दार्स नहीं बनार्ते थे। इस काल में दार्सों को अपनी व अपने मार्तार्-पितार् की सम्पति पर अधिकार थार्। दार्स अपने मुल्य अदार् कर अपनी स्वतंत्रतार् खरीद भी सकते थे।

खार्न पार्न :-

इस काल में मार्ंस खार्ने की काफी प्रवृति थी। स्वंय अशोक के अभिलेखों से पतार् चलतार् है कि उनक रंघनार्गार्र के लिए प्रतिदिन सैकड़ों पशुओं क वध कियार् जार्तार् थार्। इसके अतिरिक्त अर्थशार्स्त्र में मार्ंस बेचने वार्लों तथार् पक मार्ंस बेचने वार्लों क उल्लेख हें इसके अतिरिक्त पक चार्वल बेचने वार्लों क भी उल्लेख है। जो हमें बतार्तार् है कि लोग भोजन में अन्य चीजों के अतिरिक्त चार्वल भी खार्ते थे। बौद्ध तथार् जैन सार्हित्यों से हमें चार्वल, फलियार्ं, तिल, शहद, फल, मच्छली, मीट, मक्खन, घी, जड़ीबूटी आदि के सार्थ मार्ंस में गोमार्ंस इत्यार्दि क भी लोगों द्वार्रार् खार्ने क वर्णन है। अर्थशार्स्त्र के अनुसार्र सरकार क यह कर्तव्य थार् कि वह जंगलों के पशु-पक्षियों के लिए तथार् बूचड़ खार्नों की भी सुरक्षार् करें।

मैगस्थनीज ने उस समय के खार्न पार्न पर लिखार् है कि जब भार्रतीय खार्ने के लिए बैठते थे तो प्रत्येक के सार्मने एक तिपार्ई रखी जार्ती थी। जिस पर बर्तन में सबसे पहले उसमें चार्वल डार्ले जार्ते थे उसके उपरार्न्त अनेक पकवार्न परोसे जार्ते थे। पेय पदाथो क इस काल में काफी विवरण मिलतार् है। अंगूर क रस, शहद विभिन्न फलो जैसें आम, जार्मून, केले तथार् जड़ी बूटियों के पेय पदाथ बनार्ए जार्ते थे। फूलों वार्ले पेय पदाथ भी बहुत पसन्द किए जार्ते थे।

मदिरार् पार्न :-

इस काल में मदिरार् पार्न क काफी प्रचलन थार्। मैगस्थनीज के अनुसार्र विशेष पदार्धिकारियों के अतिरिक्त सार्धार्रण लोग मदिरार् पार्न नही करते थे। उनक प्रयोग यज्ञ के अवसरों पर अधिक होतार् थार्। रार्जार् तो इसक सेवन करते थे जिसक प्रमार्ण हमें बिन्दुसार्र के यूनार्नी दूत से यूनार्नी दाशनिक एवम् यूनार्नी मदिरार् की मार्ंग करने से लगतार् है। अर्थशार्स्त्र में हमें मदिरार् बनार्ने तथार् उसके नियमों रार्ज्य के इस उद्योग पर नियंत्रण को दर्शार्ते है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति क मदिरार् एक निश्चित मार्त्रार् में ही मिल सकती थी। तथार् रार्ज्य इसे एक दुण्र्यसन मार्नतार् थार्। अर्थशार्स्त्र के अनुसार्र श्रत्रियों में मदिरार् पार्न सार्मार्न्य थार्। ब्रार्ह्यमणों को इसक सेवन निर्षिद थार्।

आमोद प्रमोद :-

इस काल में लोगों के आमोद प्रमोद क विवरण सार्हित्य तथार् अभिलेखों से तथार् विदेशी विवरणों से मिलतार् है। मैगस्थनीज ने विवार्हों क वर्णन करते हुए लिखार् है कि पितार् कन्यार् क विवार्ह उससे करतार् थार् जो मतल युद्ध, मुक्केबार्जी, दौड़ तथार् अन्य क्रिडार्ओं में विजय प्रार्प्त करतार् थार्। यूनार्नी लेखकों ने मनुष्यों, हार्थियों तथार् अन्य पशुओं की लडार्इयों से लोगों के मनोरंजन क वर्णन कियार् है। अर्थशार्स्त्र से पतार् चलतार् है कि सार्धार्रण जनतार् में तमार्शे व प्रेक्षार्एं लोकप्रिय थी। नर नर्तक, गार्यक, वार्दक मदार्री, बार्जीगर अलग-अलग बोलियार्ं निकालने वार्ले लोगों क मनोरंजन करते थे। रार्ज्य से इन्हें अनुमति लेनी पड़ती थी। अशोक के अभिलेखों से विहार्र यार्त्रार्ओं क वर्णन मिलतार् है जहार्ं रार्जार् शिकार करते थे। मैगस्थनीय भी रार्जार् के शिकार पर जार्ने क विस्तार्रपूर्वक वर्णन करतार् है।

वेशभूषार् एवं गहने :-

इस काल के सार्हित्य, मूर्तिकलार् तथार् विदेशियों के विवरण से हमें भार्रतीयों की वेशभूषार् एवं गहनों क पतार् चलतार् है। नियरकस के अनुसार्र भार्रतीय दो सूती वस्त्र पहनते थे। एक नीचे पहनने क जो घूटनों से नीचे तक जार्तार् थार् दूसरार् कन्धों पर यह धोती तथार् चद्दर ओठने क द्योतक है। आम लोग तथार् िस्त्रार्यार्ं भी पगड़ी पहनार् करती थी जबकि रार्जार् मुकुट धार्रण करते थे। सार्धु व सन्यार्सी घार्स-फूस को वस्त्रों के रूप में प्रयोग करते थे। यद्यपि सूती वस्त्रों क प्रचलन थार्। परन्तु रेशमी, ऊनी वस्त्रों क भी प्रयोग अमीर लोग करते थे। भार्रहुत एवं सार्ंची की मूर्तिकलार् से हमें गहनों के प्रयोग क पतार् चलतार् है। दोनों पुरूष और स्त्रियार्ं गहने पहनते थे। जोकि हार्र कुण्डल, अंगूठियार्ं कमरबन्ध इत्यार्दि थे।

यद्यपि मूर्तियों इत्यार्दि से हमें स्त्रियों के पर्दार् करने के कोई प्रभार्व नही है। परन्तु अभिजार्त वर्ग की स्त्रियार्ं सभार्ओं में एक विशेष प्रकार क पर्दार् क प्रयोग करती थी। बौद्ध सार्हित्य में पर्दार् प्रथार् क वर्णन नही मिलतार् है। मैगस्थनीज क कथन है कि भार्रतीय लोगों क सोने से लगार्व थार्। उनके कपड़ों पर सोने से कढार्ई की होती थी।

केश श्रंगार्र, कंघी करने, तेल, सुंगधित चीजों क प्रयोग लोग करते थे। तथार् अन्य सौदंर्य प्रसार्धनों क प्रयोग भी होतार् थार्। ब्रार्ह्यण सिर मुण्डवार्कर चोटी रखते थे तथार् सार्धु लम्बी दार्ड़ी रखते थे नार्खुन रंगने क रिवार्ज इस काल में थार्।

मौर्य कालीन अर्थव्यवस्थार्

कौटिल्य के अर्थशार्स्त्र तथार् मैगस्थनीज की इण्डिक से ज्ञार्त होतार् है कि कृषि, पशुपार्लन तथार् व्यार्पार्र एवम् वार्णिज्य मौयकालीन अर्थव्यवस्थार् क मुख्य आधार्र थे। इस काल में तीव्रगति से आर्थिक विकास हुआ, और एक प्रभार्वशार्ली व्यार्पार्री वर्ग क उदय हुआ जिसने अपनी श्रेणियार्ँ (संगठन) बनार्कर समार्जिक व्यवस्थार् को प्रभार्वित कियार्। यह नयार् समार्जिक वर्ग मुख्य रूप से नए विकसित हो रहे शहरों में रहने लगार्। कृषि अर्थव्यवस्थार्, हस्तशिल्प उत्पार्दन और वार्णिज्यिक गतिविधियों के विकास के कारण इस काल में निम्नलिखित परिवर्तन हुए ‘ तकनीक क विकास, मुद्रार् क चलन और नगरीय केन्द्रो क तेजी से विकास हुआ। इस काल की भौतिक और सार्मार्जिक विशेषतार्ओं को समझने के लिए कृषि, पशुपार्लन, शिल्प-उद्योग और वार्णिज्यिक गतिविधियों के बार्रे में जार्ननार् जरूरी है।

कृषि :-

मौर्यकालिन अर्थव्यवस्थार् की बुनियार्द कृषि पर टिकी थी अर्थशार्स्त्र में स्थार्यी बस्तियार्ँ बसार्ने पर जोर दियार् गयार् है तार्कि कृषि अर्थव्यवस्थार् क विस्तार्र हो सके। इन बस्तियों से भूमि कर की प्रार्प्ति होती थी और ये रार्जकीय आय क स्थार्यी स्त्रोत थार्। रार्म शरण शर्मार् के अनुसार्र इस काल में गंगार् के मैदार्न के अधिकांश इलार्कों में खेती की जार्ने लगी और इसके सार्थ-सार्थ दूरस्थ इलकों में भी कृषीय अर्थव्यवस्थार् स्थार्पित करने क प्रयार्स कियार् जार्ने लगार्। कृषि के विकास से किसार्न क महत्व धीरे-2 बढ़ने लगार्। यूनार्नी लेखक मैगस्थनीज अपने विवरण में लिखतार् है कि मौर्यकालीन समार्ज सार्त भार्गों में विभक्त थार्। इसमें प्रथम दाशनिक और द्वितीय स्थार्न पर किसार्न थार्। हार्ंलार्कि उसक समार्ज क विभार्जन संबधी दृष्टिकोण पूर्ण उचित नही है, लेकिन यह महत्पूर्ण बार्त है कि कृषि में लगे किसार्नों की बड़ी संख्यार् ने उसक ध्यार्न आकृष्ट कियार् उसके अनुसार्र यहार्ँ की भूमि उपजार्ऊ थी और किसार्नों को हार्नि नही पहुँचार्ई जार्ती थी, लेकिन इस कथन पर विश्वार्स करनार् कठिन है। क्योंकि कांलिग युद्ध मरने वार्लो की संख्यार् 1,50,000 बतार्यी गयी है, जिनमें काफी कृषक भी शार्मिल होगें। किसी भी मौर्यकालीन स्त्रोत में किसार्न को भूमि क मार्लिक नही बतार्यार् गयार् है।

कृषि विकास की सफलतार् क महत्वपूर्ण कारण थार् रार्ज्य द्वार्रार् सिंचार्ई सुविधार् प्रदार्न करनार्। कृषकों की भलार्ई के लिए जल-आपूर्ति संबधी कुछ नियम बनार्ए गए थे। मेगस्थनीज के अनुसार्र जमीन मार्पने और खेत में पार्नी पहुँचार्ने वार्ली नार्लियों क निरीक्षण करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की जार्ती थी। रार्ज्य द्वार्रार् कम वर्षार् वार्ले क्षेत्रों में सिचार्ंई सुविधार् के लिए तार्लार्ब, कुएँ और बार्ंध इत्यार्दि क निर्मार्ण कियार् जार्तार् थार्, जिन्हें सेतुबन्ध कहते थे। चन्द्रगुप्त मौर्य के एक रार्ज्यपार्ल पुष्यगुप्त ने गिरनार्र के निकट सौरार्ष्ट्र में एक बार्ंध क निर्मार्ण करवार्यार् थार्, जिससे एक विशार्ल झील क निर्मार्ण हुआ, जो सुदर्शन झील के नार्म से जार्नी जार्ती है। यह झील पार्ँचवी श0ई0 तक सिचार्ंई क सार्धन बनी रही। मौर्य शार्सकों द्वार्रार् लार्गू की गयी सिचार्ंई परियोजनार्ओं से रार्ज्य को एक निश्चित आय प्रार्प्त होने लगी। रार्ज्य की आमदनी क स्थार्यी और अनिवाय स्त्रोत भू-रार्जस्व प्रणार्ली को व्यवस्थित कियार् गयार्।

अर्थशार्स्त्र में ऐसी भूमि की चर्चार् है जिन पर रार्ज्य अथवार् रार्जार् क सीधार् नियंत्रण थार्। इसके अतिरिक्त जमीन की बिक्री क भी जिक्र है जिससे पतार् चलतार् है कि व्यक्ति क जमीन पर पुश्तैनी अधिकार थार् लेकिन किसी भी स्त्रोत में इन्हें भूमि क मार्लिक नही मार्नार् गयार् है। उर्वरतार् की दृष्टि से भूमि क वर्गीकरण कियार् जार्तार् थार्। इसी आधार्र पर रार्जस्व की दर उपज के ( भार्ग से ) भार्ग तक रखी जार्ती थी। भू-रार्जस्व निर्धार्रण और करों क सार्रार् रिकार्ड रखने के लिए अलग विभार्ग थार्, जिसक अध्यक्ष समहर्तार् कहलार्तार् थार्। कोषार्ध्यक्ष सित्रार्धार्तार् के नमार् से जार्नार् जार्तार् थार्। चूंकि रार्जस्व वस्तु के रूप में भी प्रार्प्त कियार् जार्तार् थार्। अत: इस प्रकार की आय को सग्रंहित करनार् सित्रार्घार्तार् क ही कार्य थार्। यूनार्नी विवरणार्ं के अनुसार्र, किसार्न कर के रूप में कुल उपज क ( भार्ग रार्ज्य को देते थे। भूमि कर (भार्ग) रार्जस्व क मुख्य आधार्र थार्, जो कुछ उपज क 1ध्6 भार्ग थार्। लेकिन मौर्यकाल में यह ( थार्। इनके अनुसार्र किसार्न सार्मूहिक रूप में होतार् थार्, जिसमें कई गार्ँव शार्मिल होते थें किसार्नों को इनके अतिरिक्त सिचार्ंई कर और बलि कर भी देनार् पड़तार् थार्। बलि कर वैदिक काल से चलार् आ रहार् थार् लेकिन मौर्यकाल में इसक स्वरूप कैसार् थार् यह स्पष्ट नही है। इसके अतिरिक्त गार्ँव को उनके क्षेत्र से गुजरती हुई रार्जकीय सेनार् के लिए खार्द्य सार्मग्री क प्रबन्ध करनार् पड़तार् थार्। अर्थशार्स्त्र में आपार्त स्थिति के दौरार्न लार्गू किए जार्ने वार्लें करों क भी उल्लेख है जिनमें प्रमुख है युद्ध कर जिसे प्रणय कहार् जार्तार् है। इसक शहिदक अर्थ है प्रेम से दियार् गयार् उपहार्र, यह उपज क 1ध्3 यार् ( भार्ग होतार् थार्। आपार्तकाल में किसार्नों को दो फसल उगार्ने के लिए बार्ध्य कियार् जार् सकतार् थार्। इस बार्त पर जोर दियार् गयार् है कि अकाल के दौनार्न इस प्रकार क कदम उठार्नार् जरूरी होतार् थार्, क्योंकि इस दौनार्न करों की वसूली काफी कम हो जार्ती होगी। कौटिल्य ने अर्थशार्स्त्र में भू-रार्जस्व व्यवस्थार् की विस्तृत विवेचनार् की है, क्योंकि भू-रार्जस्व मौर्यकाल की अर्थव्यवस्थार् क आधार्र थ्ी। अर्थशार्स्त्र में भूमि की उर्वरतार् के आधार्र पर विभिन्न गार्ंवों में अलग-2 रार्जस्व की दरें निर्धार्रित की गयी है। आर्थिक कार्यकलार्पों पर सरकारी नियंत्रण इस व्यवस्थार् की विशेषतार् थी, जैसे रार्जस्व एकित्रार्त करने वार्ले अधिकारियों पर रार्ज्य क नियंत्रण थार्। इससे पूरे रार्ज्य करने वार्ले अधिकारियों पर रार्ज्य क निंयत्रार्ण थार्। इससे पूरे रार्ज्य में एक स्थार्यी कर प्रणार्ली स्थार्पित की जार् सकी। रार्ज्य को जो भू-रार्जस्व प्रार्प्त होतार् थार् उससे सार्म्रार्ज्य की वितिय जरूरते, सरकारी तंत्रार् की नींव रखी जार् सकी।

कृषि अर्थव्यवस्थार् ने मौर्य सार्म्रार्ज्य को एक शक्तिशार्ली आर्थिक आधार्र प्रदार्न कियार्, जिसे व्यार्पार्रिक अर्थव्यवस्थार् ने और दृढ़ बनार् दियार्। इस काल क विकसित व्यार्पार्र लम्बे आर्थिक परिवर्तनों क एक हिस्सार् थार् जिसकी शुरूआत इस काल से पूर्व हो चुकी थी। इस शुरूआत क आधार्र थार्-नई धार्तुओं की खोज, उन्हें गलार्ने और शुद्ध करने की तकनीक तथार् लोहे के औजार्र। मौर्य काल में उतरी भार्रत में अनेक नगरों क विकास हुआ, नई बस्तियों के विस्तार्र से लोगों क आवार्गमन बढ़ार् , जिससे व्यार्पार्र में वृद्धि हुई। व्यार्पार्र के अनेक तरीके प्रचलित थे। जो उत्पार्दन के तरीके और इसके संगठन से जुड़ार् हुआ थार्। हस्तशिल्प उद्योग यार् कारीगर उत्पार्दन उद्योग श्रेणियों के रूप में संगठित हो गए थे। लेकिन इस काल में शिल्पियों की संख्यार् में वृद्धि हुई। प्रत्येक श्रेणी नगर के एक भार्ग में बसी हुई थी जिसके सदस्य परस्पर सार्थ रहकर कार्य करते ोि। हस्तशिल्प उद्योग अधिकाशंतयार् वशंार्नुगत होतार् थार्। श्रेणियार्ं रार्ज्य के नियंत्रण में काम करती थी और इन्हें सरकार से लार्इसेंस लेनार् पड़तार् थार्। श्रेणियार्ं इस काल में काफी शक्तिशार्ली हो गई थी और इनकी सार्मार्जिक प्रतिष्ठार् में भी काफी वृद्धि हुई।

मैगस्थनीज ने भी श्रेणियो की गणनार् सार्त भार्रतीय जार्ति में की है। विभिन्न प्रकार के धार्तुकर्मी, बुनकर, बढ़ई, चर्मकर, कुम्भकार और चित्रकार आदि इस काल की प्रमुख श्रेणियार्ँ थी इस काल में गंगार् घार्टी में पार्ए गए उतरी काली चमकदार्र पार्लिश किए मृदभार्ण्ड विशिष्टीकरण हस्तशिल्प के उतम नमूने है। शिल्पकार यार् दस्तकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही शिल्प से जुड़े होने के कारण अपनी दस्तकारी कार्य में उद्योग क रूप धार्रण कर लियार् थार्। शिल्पियों के समार्न व्यार्पार्री भी श्रेणियों में विभक्त थे। खनन एवम् खनिज पदाथो के व्यार्पार्र पर रार्ज्य क एकाधिकार थार्, यार्नि कच्चार् मार्ल रार्ज्य के नियत्रार्ंण में थार्। इनके समुचित उपयोग से कृषि क विकास और उत्पार्दन में वृद्धि हुई जिससे रार्ज्य सुदृढ़ हुआ। नई खार्नों क पतार् लगार्ने और उनकी व्यवस्थार् करने के लिए एक खार्न अध्यक्ष (आकारार्ध्यक्ष) होतार् थार्। नमक खनन के क्षेत्र पर भी रार्ज्य क एकाधिकार थार्। विभिन्न प्रकार की धार्तुओं क प्रयोग सिक्कें ढ़ार्लने के लिए ही नही बल्कि उनके अस्त्रार्-शस्त्रार् तथार् भी बनार्ए जार्ते थे। लोहे के अस्त्रार्-शस्त्रार् तथार् औजार्र बनार्ने वार्लों पर नियुक्त लोह अधीक्षक (लोहार्ध्यक्ष) कहलार्तार् थार्।

मौर्यकालीन सर्वार्धिक विकसित उद्योग सूती वस्त्र उद्योग थार्। अर्थशार्स्त्र में जिक्र है कि काशी, मगध, वंग (पूर्वी बंगार्ल) पुंडू (पश्चिमी बंगार्ल), कलिंग और मार्लवार् सूती वस्त्रों के विख्यार्त केन्द्र थे। बंगार्ल मलमल के लिए विश्वविख्यार्त केन्द्र थार्। सूती वस्त्र भंडौच बन्दरगार्ह से पश्चिमी देशें को निर्यार्त कियार् जार्तार् थार्। मेगस्थनीज ने भार्रतीय वस्त्रों की काफी प्रशंसार् की है। इस काल में काशी और पुन्डू में रेशमी वस्त्र बनते थे। संभवत: रेशम और रेशमी वस्त्र चीने से आयार्त किए जार्ते थे। वस्त्रों पर सोने की कढ़ार्ई और कशीदार्कारी भी की जार्ती थी। अर्थशार्स्त्र में विभिन्न धार्तुओं के आभूषण बनार्ने वार्ले, बर्तन, अस्त्रार्-शस्त्रार् लकड़ी क कार्य, पत्थर तरार्शने क व्यवसार्य, मणिकारी, शरार्ब बनार्नार् और कृषि उपकरण तैयार्र करने वार्ले विभिन्न व्यवसार्यों क उल्लेख कियार् गयार् है।

मौर्य शार्सकों द्वार्रार् व्यार्पार्रिक मागो पर सुरक्षार् व्यवस्थार् लार्गू किए जार्ने के कारण व्यार्पार्रिक गतिविधियों को विशेष प्रोत्सार्हन मिलार्। व्यार्पार्री वर्ग क सुरक्षार् प्रदार्न करने के लिए विभिन्न नियम भी बनार्ए गए। इस काल के प्रमुख व्यार्पार्रिक केन्द्र नदी के किनार्रे स्थित थे, इनमें मुख्य थे कौशार्ंबी, वार्रार्णसी, वैशार्ली, रार्जगृह और चम्पार् आदि। इनमें से ज्यार्दार्तर नगर स्थल माग द्वार्रार् भी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। रार्जमागो ने व्यार्पार्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार् प्रमुख माग निम्न थे। पहलार् प्रमुख रार्जमाग पार्टलीपुत्र से तक्षशिलार् तक बनार् थार्। यह माग वार्रार्णसी, कोशार्ंबी, और मथुरार् होते हुए तक्षशिलार् पहुँचती थी, जो 1300 मील लम्बार् थार्। पार्टली पुत्र से पूर्व की तरफ यह माग तार्म्रलिप्ति तक जार्तार् थार्। यह माग आजार् ग्रार्ंड ट्रंक रोड के नार्म से जार्नार् जार्तार् थार्। उतरी पथ माग वैशार्ली होतार् हुआ श्रार्वस्ती और कपिलवस्तु तक जार्तार् थार्। कपिलवस्तु से यह पेशार्वर तक जार्तार् थार्। दक्षिणार् पथ माग कोशार्ंबी से मथुरार्, विदिशार् और उज्जैन होते हुए भंडौच बन्दरगार्ह तक जार्तार् थार्। यह माग आगे नर्मदार् के दक्षिण-पश्चिम तक जार्तार् थार्। यह माग दक्षिणी माग के नार्म से जार्नार् जार्तार् थार्। यहार्ँ से भार्रतीय वस्तुएँ पश्चिमी देशों को भेजी जार्ती थी। दक्षिण-पूर्वी माग पार्टलीपुत्र से श्रार्वस्ती से गुजरतार् हुआ गोदार्वरी नदी के तटीय नगर प्रतिष्ठार्न तक जार्तार् थार्। वहार्ं से कलिंग होतार् हुआ दक्षिण की ओर मुड़कर आन्ध्र और कर्नार्टक तक जार्तार् थार्। पश्चिम-एशियार् के देशों की ओर जार्ने वार्लार् माग तक्षशिलार् से गुजरतार् थार्। स्थल माग के अतिरिक्त समुद्री माग से भी व्यार्पार्रिक गतिविधियों होती थी। दक्षिणार्पथ के पूर्वी तट पर तार्म्रलिटित में सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगार्ह थार्। जहार्ं से गंगार् और यमुनार् के मैदार्न की वस्तुएँ पूर्वी देशों को जार्ती थी। जहार्ज श्रीलंक से होते हुए पूर्वी देशों को जार्ते थे। पश्चिमी तट पर भडौंच बन्दरगार्ह से सोपार्रार् होते हुए जहार्ज पश्चिमी देशों को जार्ते थे। रेशमी वस्त्र और रेशम के धार्गे स्थल माग द्वार्रार् चीन से बैक्ट्रियार् और वहार्ं से भंडोच बन्दरगार्ह से कोरोमंडल तट पर लार्ए जार्ते थे।

मौर्य शार्सकों क सभी मागो पर पूर्ण नियंत्रण होने के कारण व्यार्पार्रिक माग सुरक्षित थे। दक्षिणी माग व्यार्पार्रिक गतिविधियों से अधिक लार्भदार्यक थे जबकि उतरीपथ माग को व्यार्पार्री सुरक्षित माग होने के कारण ज्यार्दार् पंसद करते थे। आन्तरिक व्यार्पर उतरी क्षेत्रों से कम्बल, खार्ल और घोडे दक्षिण को निर्यार्त होते थे, दक्षिण से हीरे, मोती, शंख, सोनार् और कीमती पत्थर आते थे। सुगम व्यार्पार्रिक मागो के कारण आन्तरिक व्यार्पार्र भी उन्नत अवस्थार् में थार्। जबकि दूसरे देशों के सार्थ स्थल और समुद्री दोनों माग से व्यार्पार्र होतार् थार्। स्थल माग तक्षशिलार् से गुजरतार् हुए पश्चिमी देशों को जार्तार् थार्, जबकि समुद्री माग तहत पश्चिमी समुद्र तट से जहार्ज फार्रस की खार्ड़ी होते हुए आदेन तट जार्ते थे। मिस्र और चीन से भी भार्रतीय व्यार्परियों के व्यार्परिक संबध थे। भार्रतीय व्यार्परियों द्वार्रार् इन देशों को काली मिर्च, दार्ल चीन, मसार्लों, हीरे, मोती, सूती वस्त्र, हार्थी दार्ंत की वस्तुएं, कीमती पत्थर, मोर और तोते आदि वस्तुएं निर्यार्त की जार्ती थी। चीन से रेशम तथार् रेशमी वस्त्र आयार्त किए जार्ते थे। मिस्र से घोड़े, लोहार् और शिलार्जीत आयार्त किए जार्ते थे। इनके अतिरिक्त शीशे के बर्तन तथार् टीन, तार्ंबार् और सीसार् भी विदेशों से मगवार्ँए जार्ते थे। विदेशी व्यार्पार्र के कारण तक्षशिलार्, मथुरार्, कौशार्म्बी, वार्रार्णसी, पार्टलीपुत्र, वैशार्ली, उज्जयिनी, प्रतिष्ठार्न, काशी और मथुरार् नगरों के व्यार्पार्री बहुत धनी हो गए थे।

मौर्यकालीन शहरी अर्थव्यवस्थार् क अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह थार् कि व्यार्परिक विकास से मुद्रार् क चलार्न बढ़ार् और लेने-देन मुद्रार् में होने लगार्। सम्पूर्ण मुद्रार् प्रणार्ली पर रार्ज्य क पूरार् नियंत्रण थार्। अर्थशार्स्त्र में मुद्रार् के बढ़ते महत्व को दर्शार्यार् गयार् है। संभवत: इस काल में अधिकारियों को वेतन भी नकदी के तौर पर दियार् जार्तार् थार्। अर्थशार्स्त्र में उल्लेख है कि 48000 पण और 60,000 पण के बीच वाषिक वेतन देने क प्रार्वधार्न थार्। अर्थशार्स्त्र से यह भी ज्ञार्त होतार् है सिक्के ढार्लने के लिए सरकारी सार्ल थी और अधिकारी उसक निरिक्षण करते थे। कौटिल्य ने चार्ंदी और तार्ंबे के विभिन्न प्रकार के सिक्कों क उल्लेख कियार् है। चार्ंदी के सिक्के चार्र प्रकार के थे-पण, अर्द्धपण, पार्द और अष्टभार्ग। मार्शक, अर्धमार्शक, काकणी और अर्धकाकणी तार्ंबे के सिक्के थे। इस शक्तिशार्ली नकदी अर्थव्यवस्थार् को सुचार्रू ढंग से चलार्ने के लिए सिक्कों की ढ़लार्ई और चार्ंदी तथार् तार्ंबे जैसी धार्तुओं क महत्व बढ़ गयार् होगार्। इस काल के चार्ंदी के पंच मार्क्र्ड (आहत सिक्के) सिक्के इस बार्त के प्रमार्ण है कि मौर्य शार्सकों में मुद्रार् प्रणार्ली को सुव्यवस्थित रूप से लार्गू कियार्। आहत सिक्के मुख्य रूप से उतरप्रदेश और बिहार्र के क्षत्रार् में पार्ए गए है, जो मौर्य सार्म्रार्ज्य क केन्द्रीय स्थल थार्।

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