मौर्य युग
नन्द वंश के पतन के पश्चार्त मगध में मौर्य वंश की सत्तार् स्थार्पित हुर्इ । मौर्य वंश क संस्थार्पक चन्द्रगुप्त मौर्य (321 र्इ.पू.) थार् । यूनार्नी लेखकों ने उसे सेन्ड्रोकोट्स यार् एण्ड्रोकोट्स कहार् है । इस रार्जवंश क भार्रतीय इतिहार्स में विशिष्ट महत्व है । मौर्य शार्सकों ने छोटे छोटे रार्ज्यों को समार्प्त करके एक वृहद सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् की और भार्रत को एकतार् के सूत्र में आबद्ध कियार्। मौर्य शार्सकों ने एक सुदृढ़ केन्द्रीय शार्सन प्रणार्ली क विकास कियार् मौर्यो के आगमन के सार्थ-सार्थ भार्रत क क्रमबद्ध इतिहार्स प्रार्रम्भ होतार् है ।

चन्द्रगुप्त मौर्य- 

मौर्यो की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वार्नों में मतभेद है । कुछ विद्वार्न क्षत्रिय कुछ शुद्र मार्नते है । मुद्रार्रार्क्षस जो मौर्यो के समय लिखार् गयार् उसे मुरार् नार्मक नंद रार्जार् की रूद्र पत्नी से हुआ मार्नते है । चन्द्रगुप्त मौर्य क जन्म एक सार्धार्रण परिवार्र में हुआ थार् । चन्द्रगुप्त मौर्य बचपन से प्रतिभार् शार्ली थार् । उस पर जब चार्णक्य की नजर पड़ी वह बहुत प्रभार्वित हुआ और उसे तक्षशिलार् ले गयार् और वहीं उसे सभी विद्यार् में निपुण कियार् ।

इतिहार्सकारों क मार्ननार् है कि चार्णक्य और चन्द्रगुप्त सबसे पहले पश्चिमोत्तर भार्रत और पंजार्ब की तार्त्कालीन रार्जनीतिक परिस्थितियों उनके अनूकूल थी और उसे अपने में कर लियार् । इस समय मगध रार्ज्य पर नंद वंशीय रार्जार्ओं क आधिपत्य थार् । नन्द वंश के रार्जार्ओं से जनतार् त्रस्त थी, नन्दों के अत्यार्चार्र से प्रजार् को मुक्त करने के लिये चार्णक्य ने योजनार् बनाइ और समूल नंद वंश क नार्श कर दियार् । चार्णक्य की कूटनीति तथार् चन्द्रगुप्त मौर्य के शौर्य के कारण शक्तिशार्ली नन्द वंश क विनार्श कर दियार् ।

चन्द्रगुप्त ने उत्तरी भार्रत पर अधिकार करने के पश्चार्त् उसने दक्षिण पर विजय की नीति बनाइ और उसने दक्षिण भार्रत को जीतार् ।

सिकन्दर की मृत्यु के पश्चार्त् पश्चिमी एशियार् में सेल्यूकस ने अपनी शक्ति संगठित कर ली थी एवं भार्रत पर घार्त लगार्ये बैठार् थार् । चन्द्रगुप्त ने उसे परार्जित कियार् और मगध सम्रार्ट को संधि के लिये मजबूर कियार् और वैवार्हिक सम्बन्ध स्थार्पित करके उसे अपनार् रार्जदूत बनार्यार् चन्द्रग्रगुप्ुप्त मौर्य क रार्जनीतिक एवं प्रश््रशार्सनिक संगंगठन- चन्द्रगुप्त एक विजेतार् वरन् एक कुशल प्रशार्सक भी थार् इसने और उसके मन्त्री चार्णक्य ने सम्पूर्ण भार्रतवर्ष के लिये एक सुदृढ़ प्रशार्सनिक तन्त्र क निर्मार्ण कियार् ।

रार्जकीय व्यवस्थार् 

(क) रार्जार् की स्थिति (शक्ति)- 

चन्द्रगुप्त मौर्य की शार्सन व्यवस्थार् बहुत व्यार्पक थी । रार्जार् स्वयं शार्सन व्यवस्थार् क प्रमुख थार् । समस्त शक्तियार्ं उसमें निहित थी । वह स्वयं रार्ज आज्ञार्एं जार्री करतार्, योजनार् बनार्तार्, युद्ध के समय सेनार् क नेतृत्व करतार् थार् । वित्त (रार्जस्व) पर उसक नियंत्रण थार् । वह ही सर्वोच्च न्यार्यार्धीश थार् । वह स्वयं विदेशी रार्जदूतों से मिलतार् थार् । इस प्रकार कहार् जार् सकतार् है कि रार्जार् की सत्तार् असीमित थी । रार्जार् से आशार् की जार्ती थी कि वह निश्चित कर्तव्यों क पार्लन करें । अर्थशार्स्त्र में कहार् गयार् है कि जनकल्यार्ण रार्जार् क परम आवश्यक कर्तव्य है । इसलिए आवश्यक थार् कि रार्जार् हर समय अधिकारियों और जनतार् से मिल सके । रार्जार् से अपेक्षार् की जार्ती थी कि वह समार्ज की सुरक्षार् पर ध्यार्न दे और शार्सन व्यवस्थार् ऐसी बनार्ए कि समार्ज में शार्न्ति और सुरक्षार् बनी रहे ।

(ख) प्रशार्सनिक संरचनार् (रार्ज कर्मचार्री)- 

शार्सन व्यवस्थार् को सुचार्रू रूप से चलार्ने के लिए रार्जार् को रार्जभवन मंत्री परिषद की सहार्यतार् उपलब्ध थी । परार्मर्श देने वार्ली परिषद् के सदस्य उच्च कुल में जन्में, र्इमार्नदार्र और बुद्धिमार्न व्यक्ति होते थे । ये मंत्री कहलार्ते थे । इनके अतिरिक्त आमार्त्य, महार्मार्त्र और अध्यक्ष अन्य उच्च अधिकारी थे । अर्थशार्स्त्र में उच्च अधिकारियों को ‘तीर्थ’ कहार् गयार् है । एक सूची में 18 तीर्थो क उल्लेख कियार् गयार् है । इनमें से महत्वपूर्ण कुछ अधिकारी थे- मंत्री पुरोहित, सेनार्पति, युवरार्ज । इस प्रशार्सनिक ढार्ंचे में दण्डपार्ल (पुलिस अधीक्षक), समार्हर्तार् (जिलार्धिकारी) और सन्निधार्तार् (कोषार्ध्यक्ष) जैसे अधिकारी भी थे । चन्द्रगुप्त मौर्य की शार्सन व्यवस्थार् व्यार्पक थी । समस्त शिक्त्यार्ं रार्जार् में निहित थीं । शार्सन व्यवस्थार् को सुचार्रू रूप से चलार्ने के लिए बहुत से कर्मचार्री थे और सार्म्रार्ज्य की सुरक्षार् के लिए विशार्ल सेनार् थी । सार्म्रार्ज्य में आर्थिक स्थिरतार् थी क्योंकि सभी आर्थिक गतिविधियों पर रार्ज्य क नियंत्रण थार् ।

(ग) प्रार्न्तीय शार्सन प्रबन्ध- 

सार्म्रार्ज्य प्रार्न्तों में बंटार् हुआ थार् । प्रत्येक रार्जवंश के व्यक्ति (कुमार्र) के अधीन होतार् थार् । कहार् जार्तार् है कि अशोक पहले उज्जैन और बार्द में तक्षशिलार् क गर्वनर रहार् । प्रार्न्त जिलो (आहार्रों यार् विषयों) में बंटे हुए थे । गुप्तचर प्रार्न्त यार् जिले में होने वार्ली प्रत्येक घटनार् की सूचनार् रार्जार् तक पहुंचार्ते थे । अर्थशार्स्त्र में गोप और स्थार्निक क उल्लेख कियार् गयार् है । ये गार्ंव के शार्सन प्रबन्ध के लिए उत्तरदार्यी थे ।

(घ) म्यूिनसिपल प्रबन्ध- 

मगै स्थनीज ने पार्टलीपुत्र के स्थार्नीय शार्सन क विवरण दियार् है । सम्भार्वनार् है कि अन्य नगरों में भी इसी प्रकार की शार्सन व्यवस्थार् रही होगी । नगर क प्रबन्ध 30 सदस्यों को एक परिषद् के हार्थ मेंं थार् । यह परिषद 6 समितियों में बंटी हुर्इ थी । प्रत्येक समिति के पार्ंच सदस्य थे । इन समितियों के कार्य क्षेत्र थे –

  1. उद्योग-धन्धों की देख-भार्ल और उन्नति करनार् । 
  2. विदेशियों के लिए सुख-सुविधार् क प्रबन्ध करनार् । 
  3. जन्म-मरण क लेखार् रखनार् । 
  4. व्यार्पार्रियों और बार्जार्र पर नियंत्रण रखनार् । 
  5. उत्पार्दकों के मार्ल पर दृष्टि रखनार् और उसे बेचने क प्रबन्ध करनार् और
  6. कर वसूल करनार् । 

(ड़) सेनार्- 

विशार्ल सेनार् चन्द्रगुप्त मौर्य की शार्सन व्यवस्थार् की सबसे बड़ी विशेषतार् थी। रोमन इतिहार्सकार प्लिनी के अनुसार्र चन्द्र गुप्त की सेनार् में 6,00,000 पैदल सैनिक, 30,000 घुड़सवार्र, 9,000 हार्थी और 8,000 रथ थे । उसके पार्स नौ-सेनार् भी थी । वर्तमार्न मार्पदण्ड के अनुसार्र यह सेनार् बहुत अधिक थी । मैगस्थनीज के अनुसार्र सेनार् क प्रबन्ध 30 सदस्यों के एक परिषद के हार्थ में थार् । यह परिषद् 6 समितियों में बंटी हुर्इ थी प्रत्येक समिति के पार्ंच सदस्य थे ।

(च) रार्जस्व- 

समस्त सार्म्रार्ज्य शार्सन व्यवस्थार् क आधार्र सुदृढ़ रार्जस्व व्यवस्थार् थार् । रार्ज्य की आय क मुख्य स्त्रोत भूमि कर (लगार्न) थार् । यद्यपि लगार्न कुल उत्पार्दन के 1/4 से 1/6 तक थार् तथार्पि युद्ध की आवश्यकतार्एं पूरी करने के लिए किसार्नो को विवश कियार् जार्तार् थार् कि वे अधिक उत्पार्दन करें । रार्ज्य ने भी भूमि के एक बड़े भार्ग पर खेती कराइ । यह भी आय क एक अच्छार् सार्धन बन गयार् । वित्तीय स्थिरतार् क अन्य कारण थार् कि सभी आर्थिक गतिविधियों पर रार्ज्य क नियंत्रण थार् । खार्नों, नमक भण्डार्र, शरार्ब, वन, चुंगी आदि पर रार्ज्य क एकाधिकार थार् । रार्ज्य ने शिल्पों को प्रोत्सार्हन दियार् थार् । वार्स्तव में दण्ड विधार्न ऐसार् थार् कि यदि कार्इ कलार्कार को जख्मी करतार् थार् वस्तु क नार्म बदल कर बेचतार् तो मृत्यु दण्ड दियार् जार्तार् थार् । रार्ज्य को जुर्मार्नों से भी आय होती थी ।

बिन्दुसार्र (297-272 र्इसार् पूर्व)र्वचन्द्रगुप्त के बार्द उसक पुत्र बिन्दुसार्र 298 र्इ. पूर्व में गद्दी पर बैठार् । बिन्दुसार्र के सम्बन्ध में ऐतिहार्सिक स्त्रोत मौन हैं, जिससे इस सम्रार्ट के बार्रे में कोर्इ विशेष जार्नकारी नहीं मिल पार्ती है । पुरार्णों में कही-कहीं पर नन्दसार्र यार् भद्रसार्र नार्म क उल्लेख आतार् है ।

बिन्दुसार्र यद्यपि अपने जीवनकाल में कोर्इ विशेष उल्लेखनीय कार्य न कर सक किन्तु पैतृक सम्पत्ति और सार्म्रार्ज्य को सुरक्षित अवश्य रखार् ।

अशोक (273-232 र्इसार् पूर्व)र्वअशोक न केवल भार्रतवर्ष क वरन् विश्व क एक महार्न् सम्रार्ट थार् । सम्रार्ट बिन्दुसार्र की मृत्यु के पश्चार्त् उसक पुत्र अशोक मगध के सिंहार्सन पर बैठार् । इतिहार्सकारों ने लिखार् है कि अशोक अपने 99 भार्इयों को मार्रकर गद्दी प्रार्प्त कियार् थार् । अपने पितार् बिन्दुसार्र के समय उसने अनेक विद्रोह को दबार्यार् थार् । उसकी निष्ठुरतार् को देखकर उसे ‘कालार्शोक’ अथवार् चण्डार्शोक भी कहार् गयार् है । चीनी यार्त्री युवार्वच्यार्ंग ने लिखार् है कि अशोक अपने प्रार्रिम्भक जीवन में क्रूर थार् । उसक कारार्गार्र अशोक के नरक के नार्म से जार्नार् जार्तार् थार्, किन्तु कलिंग युद्ध से उसके जीवन में एक परिवर्तन आयार् और वह प्रजार्हित चिन्तक सम्रार्ट के रूप में विख्यार्त हुआ ।

कलिंग अभियार्न एवं विजय और उसक प्रभार्व- 

कलिंग युद्ध अशोक के शार्सन की सबसे महत्वपूर्ण घटनार् थी । इस युद्ध में हुए नरसंहार्र तथार् जनतार् के कष्ट से अशोक की अन्तरार्त्मार् को आघार्त पहुंचार् जिससे भार्वी इतिहार्स बदल गयार्। आपको यार्द होगार् कि चन्द्रगुप्त ने एक विशार्ल सार्म्रार्ज्य की स्थार्पवनार् की थी तथार्पि कलिंग उसकी सीमार् से बार्हर थार् । अशोक क शिलार्लेख XIII बतार्तार् है कि कलिंग उसकी एकमार्त्र विजय थी जिसक उसने आठ वर्ष (2652-61 र्इ.पू.) से संकल्प कर थार् । यह बहुत भयंकर युद्ध थार् । डेढ़ लार्ख लोक बन्दी बनार्ए गए और एक लार्ख मार्रे गए तथार् इससे कर्इ गुनार् घार्यल हुए। यह अनुभूति होते ही कि एक छोटे से प्रदेश को विजय करने के लिए इतने निरार्परार्ध व्यक्तियों की हत्यार् पर उसे पश्चार्तार्प होने लगार् । इससे अशोक के जीवन मे एक नयार् मोड़ आयार् । अशोक ने देश-विजय के स्थार्न पर धम्म (धर्म) विजय क प्रण कियार् । भेरी घोष (युद्ध घोष) के स्थार्न पर धर्म घोष होने लगार् ।

अशोक क विचार्र अपनी जनतार् के प्रति बदलार् । अब वह स्वयं को केवल जनतार् पर रार्ज्य करने वार्लार् शार्सक ही नहीं समझतार् वरन् प्रजार् से पुत्रवत व्यवहार्र करने वार्लार् बन गयार् । धोली शिलार् लेख में यह कहतार् है कि ‘‘प्रजार् के सभी व्यक्ति मेरी सन्तार्न है’’ शिलार्लेख के अनुसार्र उसने आखेट के स्थार्न पर धामिक यार्त्रार्एं (धर्म के सिद्धार्न्तों को फैलार्ने के लिए) शुरू की । इन यार्त्रार्ओं क लार्भ यह हुआ कि उसक प्रजार् से सम्पर्क बढ़ार् । प्रजार् की सहार्यतार् के लिए उसने धर्म महार्मार्त्र नार्मक अधिकारी नियुक्त किए ।

अशोक ने अपने सार्म्रार्ज्य के विभिन्न भार्गों में रहने वार्ले लोगों के सम्पर्क बनार्ने की इच्छार् से शिलार्लेख जार्री किए और उन्हें महत्वपूर्ण स्थार्नों पर लगार्यार् गयार् । अशोक ने जन-जार्ति के लोगों और सीमार्न्त रार्ज्यों से अनुरोध कियार् कि वे उसे पितार् के समार्न मार्नें और उसकी आज्ञार् पार्लन करें ।

कुछ विद्वार्नों के अनुसार्र युद्ध के परिणार्मस्वरूप अशोक ने बौद्ध धर्म की दीक्षार् ली और एक भिक्षु बन गयार् तथार्पि ऐसार् कोर्इ प्रमार्ण नहीं है जो सिद्ध करे कि वार्स्तव में उसने एक भिक्षु के वस्त्र धार्रण किए थे । शार्यद बौद्ध धर्म अशोक क व्यक्तिगत धर्म यार् फिर भी उसने इस धर्म को जनतार् को स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कियार् । वार्स्तव में उसने उत्सार्हपूर्वक सहिष्णुतार् क प्रचार्र कियार् । उसक ‘धम्म’ (धर्म) इतनार् उदार्र और व्यार्पक थार् कि इसमें सभी सम्प्रदार्य शार्मिल हो सकते थे । रार्जार् की नीति में आयार् परिवर्तन उसकी विदेश सम्बन्धी नीति में भी प्रकट हुआ । पहले रार्जार् यथार्सम्भव अधिक से अधिक क्षेत्र जीतनार् अपनार् कर्तव्य समझते थे, अशोक ने विदेशों में अपने रार्जदूत धर्मप्रचार्रण भेजे । शिलार्लेख में उल्लेख कियार् गयार् है कि उसने यूनार्नी रार्ज्यों में भी अपने दूत भेजे थे । बौद्ध परम्परार्ओं के अनुसार्र उसने श्रीलंक और मध्य एशियार् में भी दूत भेजे थे ।

अशोक क सार्म्रार्ज्य विस्तार्र- 

अशोक के अभिलेख कालसी (देहरार्दून) और समिनदेर्इ (नेपार्ल की तराइ) से प्रार्प्त हुये है। इससे विदित होतार् है कि उसक रार्ज्य उत्तर में हिमार्लय तक फैलार् थार् । चितल दुर्ग में उसके लघु शिलार्लेखों की तीन प्रतियार्ं और कर्नार्ल से उसके चतुर्दश शिलार्लेख की एक प्रति दक्षिण से मैसूर तक उसके सार्म्रार्ज्य विस्तार्र को प्रमार्णित करती है । शार्हबार्ज गढी और मनसेहरार् के अभिलेखों से विदित होतार् है कि समस्त उत्तर पश्चिमी सीमार्न्त प्रदेश उसके रार्ज्य में सम्मिलित थार्। कल्हण की रार्जतरंगिणी के अनुसार्र काश्मीर पर भी उसक आधिपत्य थार् । जूनार्गढ़ और सोबार्रार् से प्रार्प्त चतुर्दश अभिलेखों की प्रतियों के आधार्र पर निश्चयपूर्वक कहार् जार् सकतार् है कि पश्चिमी और दक्षिण पश्चिमी भार्रत पर भी उसक अधिकार थार् । रूद्रदार्मन के जूनार्गढ़ अभिलेख में उसके यूनार्नी प्रार्न्तपति तुषार्स्प क उल्लेख मिलतार् है । धौली और जूनार्गढ़ के अभिलेख उड़ीसार् पर उसके आधिपत्य को प्रमार्णित करते है । दिव्यार्वदार्न और हेनसार्ंग के विवरण से भी विदित होतार् है कि उसक सार्म्रार्ज्य भार्रत के विशार्ल भू-भार्ग पर विस्तृत थार् ।

कलिंग युद्ध में हुए नर संहार्र के कारण अशोक की नीति बदली । उसने युद्ध द्वार्रार् क्षेत्र जीतने के स्थार्न पर हृदय जीतने की भार्वनार् बनाइ । धम्म (धर्म) प्रचार्र के सार्थ-सार्थ जन कल्यार्ण उसक मुख्य कर्तव्य बन गयार् । अशोक क ‘धम्म’ (धम्म-धर्म)र्मआपको यार्द होगार् कि अशोक को जो सार्म्रार्ज्य उत्तरार्धिकार में मिलार् थार् वह बहुत बड़ार् थार् और उसमें रहने वार्ले लोगों में विविधतार्एं थी । इसमें अनेक छोटी-छोटी क्षेत्रीय और सार्ंस्कृतिक इकाइयार्ं थी जो सदार् अलग होने क प्रयार्स करती थीं । लोगों क विभिन्न धर्मो में विश्वार्स थार् । ऐसी परिस्थितियों में अशोक के लिए आवश्यक थार् कि वह ऐसी शक्तियों क दमन करे जो केन्द्रीय सत्तार् की अवहेलनार् कर सकती थी । उसें एक ऐसी नीति आरम्भ करने की आवश्यकतार् थी जो सार्म्रार्ज्य में रहने वार्ले विभिन्न जार्तियों और धर्मो के लोगों को संगठित कर सके और रार्जनैतिक एकतार् बनार्ए रखने में सहार्यक हो । इस प्रकार बहुत कुछ अंशों में धम्म (धर्म) आरम्भ करने क कारण रार्जनैतिक थार् तथार्पि यह निश्चित है कि अशोक क इसमें पूर्ण रूप से विश्वार्स थार् ।

धम्म-धर्म 

धर्म अशोक क अपनार् आविष्कार थार् । यह एक सार्मार्जिक नियार्मार्वली (विधार्न) थी जो सार्मार्जिक उत्तरदार्यित्वों पर बल देती थी । यह एक व्यार्वहार्रिक, सरल और नैतिक जीवन की ओर संकेत करतार् थार् । इसमें अहिंसार्, सत्यतार्, र्इमार्नदार्री, स्वनियंत्रण पर बल दियार् गयार् थार् । शिलार्लेखों द्वार्रार् रार्जार् ने कहार् कि गुरू, मार्तार्-पितार् और बड़ों की आज्ञार् क पार्लन करनार् एक अच्छी बार्त है । उसने नौकर-चार्कर और दार्सों से दयार् पूर्ण व्यवहार्र करने लिए कहार् । उसने जरूरतमंदों को उदार्रतार् पूर्वक दार्न देने के लिए सलार्ह दी । उसने कहार् कि ऐसार् कार्य करने वार्ले व्यक्ति को इस संसार्र में लार्भ होगार् और परलोक में बहुत लार्भ मिलेगार् । धम्म (धर्म) के द्वार्रार् उसने पार्रिवार्रिक और सार्मुदार्यिक जीवन को सुखी-सम्पन्न बनार्ने क प्रयार्स कियार् ।

धम्म (धर्म) इतनार् व्यार्पक और उदार्र थार् कि सभी सम्प्रदार्य वार्ले इसे स्वीकार कर सकते थे। प्रत्येक व्यक्ति से कहार् गयार् कि वह अपने धर्म के सार्थ-सार्थ दूसरे के धर्म क भी आदर करें । शिलार्लेख III में अशोक कहतार् है कि सभी सम्प्रदार्यों की धार्रण है कि जो व्यक्ति परमार्त्मार् क प्रिय है उसे किसी भी प्रकार के उपहार्र यार् मार्न सम्मार्न की आवश्यकतार् नहीं होती है । वार्स्तव में अशोक क धर्म सभी धर्मो के अच्छे सिद्धार्न्तों क समन्वय थार् । अशोक क धम्म (धर्म) निरपेक्ष थार् । यह अच्छे व्यवहार्र क विधार्न थार् जिससे सार्मार्जिक जीवन सुखी हो । अशोक ने अपने धम्म के मार्ध्यम से अपने सार्म्रार्ज्य में रहने वार्ले विभिन्न धर्म यार् सम्प्रदार्य के लोगों में सार्मिप्य लार्ने क प्रयार्स कियार् ।

1. अशोक के धर्म यार् धम्म की प्रमुख विशेषतार्यें- 

  1.  नैतिक आदर्शो पर विशेष जोर 
  2. सावभौमिकतार् 
  3. अहिंसार् पर विशेष जोर 
  4. धामिक सहिष्णुतार् 
  5. पूर्णत: उदार्र 
  6. आडम्बर अनुष्ठार्नों के स्थार्न पर मूल धामिक स्वभार्व पर बल दियार् गयार् । 

2. धम्म क स्वरूप :- 

विद्वार्नों ने अशोक के धम्म को भिन्न-भिन्न रूपो  में देखार् है। फ्लीट इसे ‘रार्जधर्म’ मार्नते है जिसक विधार्न अशोक ने अपने रार्जकर्मचार्रियों के लिए कियार् थार् परन्तु इस प्रकार क निष्कर्ष तर्कसगं त नहीं लगत क्योंकि अशोक के लेखो  से स्पष्ट हो जार्तार् है कि उसक धम्म केवल रार्जकर्मचार्रियों तक ही सीमित नहीं थार्, अपितु सार्मार्न्य जनतार् के लिए भी थार्। रार्धार्कुमुद कुकर्जी ने इसे ‘सभी धर्मो की सार्झी सम्पत्ति’ बतार्यार् है। उनके अनुसार्र अशोक क व्यक्तिगत धर्म बौद्धार्थार् तथार् उसने सार्धार्रण जनतार् के लिये जिस धर्म क विधार्न कियार् वह सभी धर्मो क सार्र थार्। रमार्शंकर त्रिपार्ठी के अनुसार्र अशोक के धम्म के तत्व विश्वजनीन है और हम उस पर किसी धर्म विशेष को प्रोत्सार्हन एवं संरक्षण प्रदार्न करने क दोषार्रोपण नहीं कर सकते। डी0आर0भण्डार्रकर के विचार्र में अशोक के धम्म क मूल स्रोत बौद्ध धर्मही है। अशोक के समय बौद्ध धर्म के दो रूप थे – (1) भिक्षु बौद्ध धर्म तथार् (2) उपार्सक बौद्ध धर्म। उपार्सक बौद्ध धर्म सार्मार्न्य गृहस्थों के लिए थार्। अशोक गृहस्थ थार्। अत: उसने बौद्ध धर्म के उपार्सक स्वरूप को ही ग्रहण कियार्। भण्डार्रकर महोदय क मत अधिक तर्क संगत लगतार् है। अशोक ने धम्म के जिन गुणों क निर्देश कियार् है वे दीघ निकाय के सिगार्लोवार्दसुत्त में उसी प्रकार देखे जार् सकते हैं। प्रथम लघु शिलार्लेख से भी इसी मत की पुष्टि होती है जिसमें वह कहतार् है कि ‘संघ के सार्थ सम्बन्ध हो जार्ने के बार्द उसने धम्म के प्रति अधिक उत्सार्ह दिखयार्।’

3. धम्म प्रचार्र के उपार्य – 

अशोक द्वार्रार् बौद्ध धर्म के प्रचार्राथ अपनार्ये गये सार्धनों को हम इस प्रकार रख सकते है –

  1. धर्म-यार्त्रार्ओं क प्रार्रम्भ – अशोक ने बौद्ध धर्म क प्रचार्र धर्म यार्त्रार्ओ से प्रार्रम्भ कियार्। वह अपने अभिषेक के दसवें वर्ष बोध गयार् की यार्त्रार् पर गयार्। अपने अभिषेक के बीसवें वर्ष वह लुम्बिनी ग्रार्म गयार्।
  2. रार्जकीय पदार्धिकारियों की नियुक्ति – ज्ञार्त होतार् है कि अशोक ने धम्म के प्रचार्र हेतु रज्जुक, प्रार्देशिक तथार् युक्त नार्मक पदार्धिकारियों की नियुक्ति की। 
  3. धर्मलिपियों क खुदवार्नार् – धर्म के प्रचार्राथ अशोक ने शिलार्ओ एवं स्तंभों पर उसके सिद्धार्न्तो  को उत्कीर्ण कखार्यार्। इनकी भार्षार् सस्कृत न होकर पार्ली थी। 
  4. विदेशों में धर्म-प्रचार्रकों को भेजनार् – अशोक ने धर्म प्रचार्राथ अपने दूत चोल, पार्ंड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त, तार्म्रपर्णि एव पार्ँच भवन रार्जार्ओ के रार्ज्य में भेजं े। अपने पुत्र महेन्द्र को लंक भेजार्।
  5. धर्म महार्मार्त्रों की नियुक्ति – अशोक ने धम्ममहार्मार्त्र नार्मक एक नवीन पदार्धिकारी को नियुक्त कर विभिन्न धामिक सम्प्रदार्यो के बीच के द्वेष भार्व को समार्प्त कर धर्म की एकतार् पर बल दियार्।

4. कलार् एवं स्थार्पत्य –

मौर्य युग में ही सर्वप्रथम कलार् के क्षेत्र में पार्षार्ण क प्रयोग कियार् गयार् जिसके फलस्वरूप कलार्कृतियार्ँ चिरस्थार्यी हो गयी। मौर्य युगीन कलार् के दो भार्ग हैं – (1) रार्जकीय कलार् (2) लोक कलार्। रार्जकीय कलार् के अन्तर्गत रार्जप्रसार्द, स्तम्भ, गुहार्-विहार्र, स्तूप सम्मिलित हैं। लो कलार् में यक्ष-यक्षिणी प्रतिमार्यें, मिट्टी की मूर्तियार्ं आती हैं।

मौर्यकाल के अधिकांश अवशिष्ट स्मार्रक अशोक के समय के हैं। अशोक के पूर्व चन्द्रगुप्त मौर्य की रार्जधार्नी पार्टलिपुत्र तथार् वहार्ँ स्थित उसके भव्य रार्ज प्रसार्द क विवरण यूनीनी-रोमन लेखकों ने कियार् है। स्तम्भ मौय युगीन वार्स्तुकलार् के अच्छे उदार्हरण है। ये दो प्रकार के हैं – (1) वे स्तम्भ जिन पर धम्म लिपियार्ँ खुदी हुर्इ हैं (2) वे जो विल्कुल सार्दे हैं। पहले प्रकार में दिल्ली-टोपरार्, इलार्हार्बार्द, दिल्ली-मेरठ, लौरियार् नन्दनगढ़, लौरियार् अररार्ज आदि आते हैं। दूसरे प्रकार में रमपुरवार् (बैल-शीर्ष), बसार्ढ़, कोसम आदि प्रमुख हैं। अशोक तथार् उसके पौत्र दशरथ के समय में बरार्बर पहार्ड़ी की गुफार्ओ में ‘सुदार्मार् की गुफार्’ तथार् ‘कर्ण चौपड़’ नार्मक मुफार् सर्वप्रसिद्ध है। दशरथ के समय बनी गुफार्ओं में ‘लोमश ऋषि’ नार्म की गुफार् उल्लेखनीय है। स्तूप बौद्ध सम्पधियार्ं हैं। स्तूप चार्र प्रकार के है – शार्रीरिक, पार्रिभौगिक, उद्देशिक तथार् संकल्पित। बौद्ध परम्परार् अशोक को 84 हजार्र स्तूपों के निर्मार्ण क श्रेय प्रदार्न करती है।

लोक कलार् के अन्तर्गत मथुरार्, पद्मार्वती, बेसनगर आदि स्थार्नों से प्रार्प्त यक्ष-यक्षी प्रतिमार्एं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सार्रनार्थ, अहिच्छत्र, मथुरार्, हस्तिनार्पुर, कौशार्म्बी आदि अनेक स्थार्नो से हार्थी, घोड़ार्, बैल, भेंड़, कुत्तार्, हिरण, पक्षियों तथार् नर-नार्रियों की बहुसंख्यक मिट्टी की मूर्तियार्ं मिली हैं।

प्रार्चीन भार्रत में मौर्य प्रशार्सन के ही अनेक तत्वों क अनुसरण अनेक रार्जवंशों के शार्सको ने कियार्। तत्कालीन अर्थव्यवस्थार् में कृषि, पशुपार्लन तथार् व्यार्पार्र-वार्णिज्य की अहम भूमिक थी। प्रजार् के नैतिक उत्थार्न में अशोक ने जिन आचार्रो की संि हतार् प्रस्तुत की उसे उसके अभिलेखो में ‘धम्म’ कहार् गयार् है। अभिलेखो में उल्लिखित धम्म बौद्ध धर्म क उपार्सक स्वरूप है। धम्म के प्रचार्र में अशोक ने अत्यधिक उत्सार्ह दिखार्यार् और उसके प्रयार्स से ही धम्म विदेशों तक फैल गयार्। मौर्यकाल में कलार् के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुर्इ। पार्षार्ण के प्रयोग से कलार्कृतियार्ं चिरस्थार्यी हो गर्इ। स्तम्भ मौर्य युगीन कलार् के उत्कृष्ट उदार्हरण हैं।

    बुद्ध धर्म क प्रचार्र 

    विद्वार्नों के एक वर्ग के अनुसार्र अशोक ने कलिंग युद्ध के तुरन्त बार्द बौद्ध धर्म स्वीकार कर लियार् थार् । परन्तु उसके अभिलेख के अनुसार्र ढाइ वर्ष बार्द बौद्ध धर्म क प्रबल समर्थक बनार् थार्। यद्यपि शिलार्लेखों में अशोक ने धम्म (धर्म) की शिक्षार्एं है तथार्पि उनमें से कुछ निश्चित रूप से बौद्ध धर्म की शिक्षार्एं है । भार्बरार् अभिलेख में अशोक बुद्ध धर्म संघ के प्रति आदर व्यक्त करतार् है । रूम्मिनदेर्इ स्तम्भ अभिलेख बतार्तार् है कि अशोक महार्त्मार् बुद्ध के स्थार्न, लुम्बिनी गयार् थार् । उसने इसे कर मुक्त कर दियार् थार् । अशोक बोध गयार् जैसे अन्य तीर्थो में भी गयार् थार् । इसके अतिरिक्त उसने अनेक नए स्तूप बनवार्ए और पुरार्ने स्तूपों की मरम्मत कराइ । अशोक ने संघ की गतिविधियों यार् क्रियार्कलार्पों में भी भार्ग लियार् । उसके शिलार्लेखों में से एक में कहार् गयार् है कि किसी को भी संघ को हार्नि पहुंचार्ने क अधिकार नहीं है क्योंकि मेरी इच्छार् है कि संघ संगठित रहे और वह दीर्घ काल तक चले ।

    बौद्ध स्त्रोतों के अनुसार्र बौद्धों की तीसरी सभार् क अयोजन अशोक के संरक्षण में हुआ थार्। सभार् की अध्यक्षतार् प्रसिद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्र तिस्स ने की थी । हमें बतार्यार् गयार् है कि सभार् के समार्पन पर बौद्ध भिक्षु कश्मीर, गार्ंधार्र, पर्वतीय क्षेत्र स्वर्णभूमि और लंक भेजे गये थे । इनक कार्य धर्म प्रचार्र करनार् थार् । इस प्रकार बौद्ध धर्म केवल अशोक के सार्म्रार्ज्य में ही नही वरन् विदेशों में भी फैलार् । अशोक ने तीर्थ स्थार्नों क भ्रमण कियार् और स्तूप बनवार्एं । उसने बौद्ध धर्म से सम्बन्धित प्रलेख जार्री किए । उसके शार्सन काल में बौद्धों की तीसरी सभार् हुर्इ और बहुत से धर्म प्रचार्रक विदेशों में भेजे गए ।

    सम्रार्ट अशोक के प्रशार्सनिक सुधार्र-

    यद्यपि मोटे तौर से अशोक ने चन्द्रगुप्त द्वार्रार् स्थार्पित शार्सन व्यवस्थार् को ही चलार्यार् तथार्पि उसने कुछ प्रशार्सनिक परिवर्तन किए । इन परिवर्तनों क कारण थार् कि अशोक अपनी प्रजार् के हित के लिए कार्य करनार् चार्हतार् थार् ।

    उसने विजय नीति क परित्यार्ग कर दियार् और पड़ोसी रार्जार्ओं को आवश्वस्त कियार् कि वह युद्ध नहीं करेगार् और शार्न्ति पूर्ण सह अस्तित्व की नीति क अनुसरण करेगार् । अशोक ने धर्म महार्मार्त्रों की नियुक्ति की इनक कार्य थार् कि ये विभिन्न धर्मो के हितों की रक्षार् करें । अशोक द्वार्रार् किए गए अन्य परिवर्तन के अनुसार्र प्रार्देशिक से कहार् गयार् कि वे रार्जुक और युक्त को सार्थ लेकर नियमित रूप से भ्रमण करें और देखें की क्यार् प्रशार्सन सुचार्रू रूप से चल रहार् है । रार्जुकों को न्यार्यिक अधिकार अधिक दिए गए थे । इस प्रकार अशोक के प्रशार्सनिक सुधार्रों क मुख्य उद्देश्य जनकल्यार्ण और जनहित थार्।

    मौर्य युगीन प्रशार्सन

    मगध सार्म्रार्ज्य के ध्वंशार्वशेषों पर कौटिल्य के सहयोग से चन्द्रगुप्त मौर्य ने जिस नवीन रार्जवंश की स्थार्पनार् की उसे प्रार्चीन भार्रत के इतिहार्स में मौर्य रार्जवंश के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। मौर्य वंश, क्षत्रिय वंश थार्। यदि चन्द्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय न रहार् होतार् तो वर्णार्श्रम व्यवस्थार् क पोषक कौटिल्य उसे नन्दवंश क विनार्श कर एक नवीन रार्जवंश की स्थार्पनार् में अस्त्र नहीं बनार्तार्। प्रार्चीन भार्रत में मौर्य सार्म्रार्ज्य सर्वार्धिक विस्तृत एवं सुदृढ़ प्रशार्सनिक व्यवस्थार् के लिए प्रसिद्ध है। मौर्य युगीन प्रशार्सन क स्वरूप रार्जतंत्रार्त्मक थार्। रार्जतंत्रार्त्मक शार्सन में रार्ज्य की प्रमुख शक्ति रार्जार् के हार्थो में केन्द्रित थी। प्रशार्सन की सुविधार् की दृष्टि से सार्म्रार्ज्य अनेक रार्जनीतिक इकार्इयों में बँटार् हुआ थार् –

    1. सार्म्रार्ज्य 
    2. प्रार्ंत 
    3. मंडल 
    4. आहार्र 
    5. स्थार्नीय 
    6. द्रोणमुख 
    7. खावटिक 
    8. संग्रहण 
    9. ग्रार्म 

    सार्म्रार्ज्य क प्रमुख सम्रार्ट थार्। वह सैनिक, न्यार्यिक, वैधार्निक एवं कार्यकारी मार्मलों में सर्वोच्च अधिकारी थार्। सम्रार्ट को अपने कार्यो में अमार्त्यों, मंत्रियों तथार् अधिकारियों से सहार्यतार् प्रार्प्त थार्। अमार्त्य से रार्ज्य के सभी प्रमुख पदार्धिकारियों क बोध होतार् थार्। ‘मन्त्रिण:’ में कुल तीन यार् चार्र मन्त्री होते थे। आत्ययिक (जिनके बार्रे में तुरन्त निर्णय लेनार् हो) विषयों में ‘मन्त्रिण:’ से परार्मर्श की जार्ती थी। संभवत: इसमें युवरार्ज, प्रधार्न मंत्री, सेनार्पति तथार् सन्निधार्तार् (कोषार्ध्यक्ष) आदि सम्मिलित थे। मंत्रिण: के अतिरिक्त एक नियमित मंत्रिपरिषद भी होती थी। मंत्रिण: के सदस्य मंत्रिपरिषद के सदस्यों की अपेक्षार् अधिक श्रेष्ठ होते थे। मंत्रिपरिषद के सदस्यों को 12,000 पण वाषिक वेतन तथार् मंत्रिण: के सदस्यों को 48,000 पण वाषिक वेतन मिलतार् थार्। सम्रार्ट प्रार्य: मंत्रिण: तथार् मंत्रिपरिषद की ही परार्मर्श से शार्सन कार्य करतार् थार्। शार्सन की सुविधार् के लिए केन्द्रीय शार्सन अनेक विभार्गों में वंटार् हुआ थार्। प्रत्येक विभार्ग को ‘तीर्थ’ कहार् जार्तार् थार्। अर्थशार्स्त्र में 18 तीर्थो और उनके प्रधार्न अधिकारियों क उल्लेख है। विभार्ग (तीर्थ) के अध्यक्षो को 1,000 पण वाषिक वेतन मिलतार् थार्।

    सार्म्रार्ज्य अनेक प्रार्ंतों में विभक्त होते थे। प्रार्ंतों के रार्ज्यपार्ल प्रार्य: रार्जकुल से सम्बन्धित ‘कुमार्र’ होते थे। रार्ज्यपार्ल को 12,000 पण वाषिक वेतन मिलतार् थार्। प्रार्ंत अनेक मण्डलों में विभक्त होतार् थार्। मण्डल क प्रधार्न ‘प्रदेष्टार्’ नार्मक अधिकारी होतार् थार्। मण्डल अनेक जिलों में विभक्त होतार् थार्। जिले क प्रधार्न ‘विषयपति’ होतार् थार्। जिले के नीचे स्थार्नीय होतार् थार् जिसमें 800 ग्रार्म थे। स्थार्नीय के अन्तर्गत दो द्रोणमुख थे। प्रत्येक के चार्र-चार्र सौ ग्रार्म थे। द्रोणमुख के नीचे खावटिक तथार् खावटिक के अन्तर्गत 20 संग्रहण होते थे। प्रत्येक खावटिक में दो सौ ग्रार्म तथार् प्रत्येक संग्रहण में 10 ग्रार्म थे। संग्रहण क प्रधार्न अधिकारी ‘गोप’ कहार् जार्तार् थार्।

    नगरों क प्रशार्सन नगरपार्लिकाओ द्वार्रार् चलार्यार् जार्तार् थार्। मेगस्थनीज ने पार्टलिपुत्र के नगर-परिषद की पार्ँच-पार्ँच सदस्यों वार्ली छ: समितियों क उल्लेख कियार् है। ग्रार्म प्रशार्सन की सबसे छोटी इकार्इ होतार् थार्। ग्रार्म क अध्यक्ष ग्रार्मणी होतार् थार्।

    सम्रार्ट सर्वोच्च न्यार्यार्धीश होतार् थार्। न्यार्यार्लय मुख्यत: दो प्रकार के थे – (1) धर्मस्थीय (2) मण्टकशोधन। दण्ड विधार्न अत्यन्त कठोर थे। सार्मार्न्य अपरार्धों में आर्थिक जुर्मार्ने होते थे।

    गुप्तचरों को अर्थशार्स्त्र में ‘गूढ़ पुरुष’ कहार् गयार् है। अर्थशार्स्त्र में दो प्रकार के गुप्तचरों क उल्लेख मिलतार् है – संस्थार्: (एक स्थार्न पर रहने वार्ले) तथार् (2) संचरार्: (प्रत्येक स्थार्नों पर भ्रमण करने वार्ले)। भूमि पर रार्ज्य तथार् कृषक दोनों क अधिकार होतार् थार्। रार्ज्य की आय क प्रमुख स्रोत भूमि-कर थार्। यह सिद्धार्न्तत: उपज क 1/6 होतार् थार्। भूमिकर को ‘भार्ग’ कहार् जार्तार् थार्। रार्जकीय भूमि से प्रार्प्त आय को ‘सीतार्’ कहार् गयार् है। सेनार् में पैदल, अश्वार्रोही, हार्थी और रथ सम्मिलित होते थे। मौर्यो के पार्स शक्तिशार्ली नौ सेनार् (Navy) भी थी।

    1. मौर्य युगीन अर्थव्यवस्थार् :- 

    मौर्य युगीन अर्थव्यवस्थार् क आधार्र कृषि, पशुपार्लन तथार् व्यार्पार्र-वार्णिज्य थार्। भूमि उर्वरार् थी तथार् प्रतिवर्ष दो फसलें उगाइ जार् सकती थी। गेहूँ, जौ, चनार्, चार्वल, र्इख, तिल, सरसों, मसूर, शार्क आदि प्रमुख फसलें थी। सिंचाइ की उत्तम व्यवस्थार् थी। पशुओ में गार्य-बैल, भेडं -बकरी, मैंस, गधे, सुअर, ऊँट, कुत्ते आदि प्रमुख रूप से पार्ले जार्ते थे। आन्तरिक तथार् वार्हृय दोनों ही व्यार्पार्र प्रगति पर थे। भार्रत क वार्हृय व्यार्पार्र सीरियार्, मिस्र तथार् अन्य पश्चिमी देशों के सार्थ होतार् थार्। यह व्यार्पार्र पश्चिमी भार्रत में भृगुकच्छ तथार् पूर्वी भार्रत में तार्म्रलिप्त के बन्दरगार्हों द्वार्रार् कियार् जार्तार् थार्। अर्थशार्स्त्र में विदेशी ‘साथवार्हो’ (व्यार्पार्रियों के काफिलो)ं क उल्लेख मिलतार् है। एक माग बंगार्ल के समुद्र-तट पर स्थित तार्म्रलिप्त नार्मक बन्दरगार्ह से पश्चिमोत्तर भार्रत में पुष्कलार्वती तक जार्तार् थार्। इसे ‘उत्तरार्पथ’ कहार् जार्तार् थार्। कपड़ार् बुननार् इस युग क एक प्रमुख उद्योग थार्। चर्म उद्योग, बढ़र्इगिरी, धार्तुकारी उद्योग भी अच्छी अवस्थार् में थे।

    ‘धम्म,’ संस्कृत के धर्म क प्रार्कृत रूपार्न्तर है। अपनी प्रजार् के नैतिक उत्थार्न के लिए अशोक ने जिन आचार्रो ं की संि हतार् प्रस्तुत की उसे उसके अभिलेखो ं में ‘धम्म’ कहार् गयार् है। सार्तवें स्तंभलेख में वह धम्म के गुणो क उल्लेख करतार् है जो धम्म क निर्मार्ण करते हैं। इन्हें हम इस प्रकार रख सकते है – ‘अपार्सिनवे बहुकयार्ने दयार् दार्ने सचे सोचये मार्दवे-सार्धवे च।’ अर्थार्त् अल्प पार्प, अत्यधिक कल्यार्ण, दयार्, दार्न, सत्यतार्, पवित्रतार्, मृदुतार् और सार्धुतार् (सज्जनतार्) ही वे गुण है जो धम्म क निर्मार्ण करते हैं। इन गुणो को व्यवहार्र में लार्न े के लिए मनुष्य को निम्नलिखित बार्तें आवश्यक बतार्यी गर्इ हैं –

    1. प्रार्णियों की हत्यार् न करनार्, 
    2. प्रणियो को क्षति न पहुँचार्नार्, 
    3. मार्तार्-पितार् की सेवार् करनार्, 
    4. वृद्धो की सवे ार् करनार्, 
    5. गुरुजनो क सम्मार्न करनार्, 
    6. मित्रो, परिचितो, ब्रार्ह्मणो तथार् श्रमणो के सार्थ अच्छार् व्यवहार्र करनार्, 
    7. दार्सों एवं नौकरों के सार्थ अच्छार् बर्तार्व करनार् 
    8. कम खर्च करनार्
    9. कम संचय करनार्, में धम्म के विधार्यक पक्ष हैं। 

    इसके अतिरिक्त अशोक के धम्म क एक निषेधार्त्मक पक्ष भी है जिसके अन्तर्गत कुछ दुर्गुणो की गणनार् की गयी है। ये दुर्गुण व्यक्ति की आध्यार्त्मिक उन्नति के माग में बार्धक हैं। अशोक तीसरे स्तम्भलेख में इन्हें पार्प (आसिनव) कहतार् है। जिन दुर्गुणों से पार्प हो जार्ते हैं वे इस प्रकार हैं – प्रचण्डतार्, निष्ठुरतार्, क्रोध, धमण्ड और र्इष्र्यार्। अत:, धम्म क पूर्ण परिपार्लन तभी सभ्ं ार्व हो सकतार् है जब मनुष्य उसके गुणो के पार्लन के सार्थ इन विकारो  से भी अपने को मुक्त रखे। इसके लिए आत्मनिरीक्षण करते रहनार् चार्हिए। धम्म के माग क अनुसरण करने वार्लार् व्यक्ति स्वर्ग की प्रार्प्ति करतार् है।

    मौर्य सार्म्रार्ज्य क पतन- 

    मौर्य समार्ज की स्थार्पनार् प्रार्चीन भार्रतीय इतिहार्स की एक महत्वपूर्ण घटनार् थी । इसके अधीन भार्रत के लगभग सभी रार्ज्य थे । चन्द्रगुप्त के उत्तरार्धिकारी के रूप में अशोक ने केवल कलिंग पर आक्रमण कर उसे अपने सार्म्रार्ज्य में मिलार्यार् जो शार्यद चन्द्रगुप्त के पश्चार्त् मौर्य सार्म्रार्ज्य से पृथक हो गयार् थार् । उत्कृष्ट सैन्य संगठन, उदार्र प्रशार्सन और दूरदश्र्ार्ी योजनार्ओं के क्रियार्न्वयन से इस सार्म्रार्ज्य की सुदृढ़तार् और स्थार्यित्व बढ़ार् थार्, किन्तु अशोक की मृत्यु के उपरार्न्त आधी शतार्ब्दी के अन्दर ही मौर्यवंश क पतन हो गयार्, उसके सार्थ-सार्थ पार्टलिपुत्र क वैभव भी समार्प्त हो गयार् । इसके निम्नलिखित कारण थे-

    1. सार्म्रार्ज्य की विशार्लतार् विघटन क कारण बनार् । 
    2. अशोक के उत्तरार्धिकारी कुणार्ल, सम्प्रति और दशरथ, वहृद्रभ में इतनी क्षमतार् नहीं थी कि विशार्ल सार्म्रार्ज्य को संभार्ल सकें । 
    3. मौर्य सार्म्रार्ज्य विशार्ल थार् उसे सम्भार्लने के लिए यार्तार्यार्त के सार्धन क अभार्व थार् यह भी पतन के लिए उत्तरदयी थार् । 
    4. मौर्य सार्म्रार्ज्य की शक्ति क ह्रार्स उत्तरार्धिकार के संघर्ष के कारण भी हुआ । 
    5. प्रार्न्तपतियों क स्वतंत्र होनार् भी पतन क कारण बनार् केन्द्रीय शार्सन की दुर्बलतार् क फार्यदार् उठार्कर प्रार्न्तपतियों ने ऐसार् कियार् । 
    6. मौर्य सार्म्रार्ज्य के पतन में ब्रार्म्हणों क रोष भी थार् क्योंकि अशोक ने यज्ञ अनुष्ठार्न पर प्रतिबंध लगार् दियार् थार् ।

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