मुगल सार्म्रार्ज्य क इतिहार्स

भार्रत पर मुगल शार्सक वंश ने कैसे विजय प्रार्प्त की। मुगलों क नेतृत्व मध्य एशियार् से आए एक सेनार्पति और प्रशार्सक ज़हीरुद्दीन मोहम्मद बार्बर के हार्थों में थार्। उसके उत्तरार्धिकारी धीरे-धीरे सम्पूर्ण भार्रत में एकछत्र रार्ज्य स्थार्पित करने में सफल हो गए थे। आइए भार्रत में बार्बर के आगमन से शुरुआत करते हैं।

बार्बर क आगमन (1526-30 ई.)

सन् 1494 में बार्रह व़र्ष की उम्र में, अपने पितार् की मृत्यु के उपरार्न्त, बार्बर ट्रार्ंसौक्सियार्नार् में एक छोटी सी जार्गीर फ़रगाऱ्नार् की रार्जगद्दी पर बैठार्। मध्य एशियार् में उस समय बहुत अस्थिरतार् थी और बार्बर को अपने ही अभिजार्त वर्ग से विरोध क सार्मनार् करनार् पड़ार्। य़द्यपि वह समरक़न्द को जीतने के लिए समर्थ थार्, परन्तु बहुत जल्द ही उसे पीछे हटनार् पड़ार् क्योंकि उसके अपने ही कुलीनों ने सार्थ छोड़ दियार् थार्। उसे उज़बेगियों के हार्थों फरग़ार्नार् को हार्रनार् पड़ार्। मध्य एशियार् में बार्बर को शार्सन के प्रार्रंभिक काल में बहुत कठिन संघर्ष करनार् पड़ार्। इस पूरी अवधि के दौरार्न वह हिन्दोस्तार्न की तरफ बढ़ने की योजनार्एँ बनार्तार् रहार्। और अंत में 1517 में बार्बर ने भार्रत की ओर बढ़ने क दृढ़ निश्चय कर लियार्। भार्रत में उस दौरार्न हुई कुछ उथल-पुथल ने भी बार्बर को भार्रत पर आक्रमण करने की योजनार्ओं पर अमल करने में मदद की।

सिकंदर लोदी की मृत्यु के उपरार्न्त उभरी भार्रत की रार्जनीतिक अस्थिर परिस्थितियों ने उसे यह सोचने क मौक दियार् कि लोदी सार्म्रार्ज्य में कितनार् रार्जनीतिक असंतोष और अव्यवस्थार् फैली हुई थी। इसी दौरार्न कुछ अफ़गार्नी सूबेदार्रों के सार्थ परस्पर संघर्ष हुआ। उनमें से एक प्रमुख सूबेदार्र थार् दौलतख़ार्न लोदी, जो पंजार्ब के एक विशार्ल भूभार्ग क सूबेदार्र थार्। मेवार्ड़ क रार्जपूत रार्जार् रार्णार् सार्ंगार् भी इब्रार्हिम लोदी के खिलार्फ अधिकार जतार्ने के लिए ज़ोर-अज़मार्इश कर रहार् थार् और उत्तर भार्रत में अपने प्रभार्व क क्षेत्र बढ़ार्ने की कोशिश कर रहार् थार्। उन दोनों ने ही बार्बर को संदेश भेजकर उसे भार्रत पर आक्रमण करने क न्यौतार् दियार्। रार्णार् सार्ंगार् और दौलत खार्न लोदी के आमंत्रण ने शार्यद बार्बर को उत्सार्हित कियार् होगार्।

बार्बर भीरार् (1519.1520), सियार्लकोट (1520) और पंजार्ब में लार्हौर (1524) को जीतने में कामयार्ब हुआ। अन्त में, इब्रार्हिम लोदी और बार्बर की सेनार्ओं क सार्मनार् 1526 में पार्नीपत में हुआ। बार्बर की सेनार् में कम संख्यार् में सैनिकों के बार्वजूद उनकी सैनिक व्यवस्थार् बहुत ही श्रेष्ठ थी। पार्नीपत की लड़ार्ई में बार्बर की जीत उसकी सैनिक पद्धतियों की एक बड़ी जीत थी। बार्बर की सेनार् में 12000 सैनिक थे जबकि इब्रार्हिम के पार्स औसतन 1ए00ए000 सैनिक बल थार्। युद्ध के मैदार्न में आमने सार्मने की लड़ार्ई में बार्बर की युद्ध नीतियार्ँ बहुत ही अद्वितीय थीं। उसने युद्ध लड़ने के लिए रुमी (आटोमैन) युद्ध पद्धति को अपनार्यार्। उसने इब्रार्हिम की सेनार् को दो पंक्तियों से घेर लियार्। बीच में से उसके घुड़सवार्रों ने तीरों से और अनुभवी ओटोमैन तोपचियों ने तोपों से आक्रमण कियार्। खार्इयों और रार्ह में खड़ी की गई बार्धार्ओं से सेनार् को दुश्मन के विरुद्ध आगे बढ़ने में बचार्व क काम कियार्। इब्रार्हिम लोदी की अफ़गार्नी सेनार् के बहुत भार्री संख्यार् में सैनिक मार्रे गए। इब्रार्हिम लोदी की युद्ध के मैदार्न में ही मृत्यु हो गई और इस प्रकार दिल्ली और आगरार् पर बार्बर क नियंत्रण हो गयार् और लोदी की अपार्र सम्पदार् पर भी इसक कब्ज़ार् हो गयार्। इस धन को बार्बर के सेनार्पतियों और सैनिकों में बार्ँट दियार् गयार् थार्।

पार्नीपत की विजय ने बार्बर को अपनी विजयों को संघटित करने के लिए एक दृढ़ आधार्र प्रदार्न कियार्। परन्तु इस समय उसको इन समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़ार् :

  1. उसके कुलीन वर्ग के लोग और सेनार्पति मध्य एशियार् में वार्पस लौटने के लिए उत्सुक थे क्योंकि उन्हें भार्रत क वार्तार्वरण पसंद नहीं थार्। सार्ंस्क तिक द ष्टि से भी वे खुद को अजनबी महसूस करते थे।
  2. रार्जपूत मेवार्ड़ के रार्जार् रार्णार् सार्ंगार् के नेत त्व के अधीन अपनी शक्ति को एकजुट करने में लगे हुए थे और मुगल सेनार्ओं को खदेड़नार् चार्हते थे।
  3. अफ़गार्नियों को यद्य़पि पार्नीपत में हार्र क मुँह देखनार् पड़ार् परन्तु अभी भी उनकी सेनार्एँ उत्तर प्रदेश के पूर्वी भार्गों, बिहार्र और बंगार्ल में शक्तिशार्ली बनी हुई थीं। वे अपनी खोई शक्ति को पुन: संगठित करने में लगे हुए थे।

प्रार्रम्भ में बार्बर ने अपने सार्थियों और कुलीनों को वहीं रुके रहने के लिए और जीते गए प्रदेशों को संगठित करने में उसकी मदद करने के लिए रार्ज़ी कर लियार्। इस कठिन काम में सफलतार् हार्सिल करने के बार्द उसने अपने पुत्र हुमार्यूँ को पूर्व में बसे अफगार्नियों क सार्मनार् करने के लिए भेजार्। मेवार्ड़ के रार्णार् सार्ंगार् बहुत बड़ी संख्यार् में रार्जपूत रार्जार्ओं क समर्थन एकित्रत करने में सफल हो गए थे। इनमें प्रमुख थे जार्लौर, सिरोही, डूंगरपुर, अम्बर, मेड़तार् इत्यार्दि। चन्देरी के मेदिनी रार्य, मेवार्त के हसन खार्न और सिकंदर लोदी के छोटे बेटे महमूद लोदी भी अपनी सेनार्ओं सहित रार्णार् सार्ंगार् के सार्थ आ मिले। शार्यद, रार्णार् सार्ंगार् को आशार् थी कि बार्बर काबुल वार्पस चलार् जार्एगार्। बार्बर के यहीं रुके रहने से रार्णार् सार्ंगार् की महत्त्वार्कांक्षार्ओं को गहरार् झटक लगार्। बार्बर को भी पूरी तरह यह समझ आ गयार् थार् कि जब तक रार्णार् की शक्ति को क्षीण नहीं कियार् जार्एगार् तब तक भार्रत में अपनी स्थिति को संगठित करनार् उसके लिए असंभव होगार्। बार्बर और रार्णार् सार्ंगार् की सेनार्ओं क मुकाबलार्, फतेहपुर सिकरी के पार्स एक स्थार्न, खनवार् में हुआ। सन् 1527 में रार्णार् सार्ंगार् की हार्र हुई और एक बार्र फिर बार्बर की बेहतरीन सैनिक युक्तियों के कारण उसे सफलतार् मिली। रार्णार् की हार्र के सार्थ ही उत्तर भार्रत में उसे सबसे बड़ी चुनौती देने वार्ली तार्कत बिखर गई।

यद्यपि मेवार्ड़ के रार्जपूतों को खनवार् में गहरार् आघार्त लगार्, परन्तु मार्लवार् में मेदिनी रार्य अभी भी बार्बर को चुनौती दे रहार् थार्। जिस बहार्दुरी से रार्जपूतों ने चंदेरी में (1528) युद्ध कियार् बार्बर को मेदिनी रार्य पर विजय प्रार्प्त करने में बहुत कठिनार्ई क सार्मनार् करनार् पड़ार्। इसकी हार्र के बार्द रार्जपूतों की ओर से विरोध क स्वर बिल्कुल समार्प्त हो गयार् थार्। पर अभी भी बार्बर को अफ़गार्नियों को हरार्नार् थार्। अफ़गार्नियों ने दिल्ली पर अपनार् अधिकार छोड़ दियार् थार्। परन्तु पूर्व (बिहार्र और जौनपुर के कुछ भार्ग) में वे अभी भी काफी शक्तिशार्ली थे। अ़फ़गार्नों और रार्जपूतों पर पार्नीपत और खनवार् में जीत बहुत ही महत्त्वपूर्ण थी परन्तु विरोध के स्वर अभी भी मौजूद थे। परन्तु अब हम यह कह सकते हैं कि यह जीत मुगल सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् की दिशार् में आगे बढ़ने के लिए महत्त्वपूर्ण कदम थार्। सन् 1530 में बार्बर की मृत्यु हो गई। अभी भी गुजरार्त, मार्लवार् और बंगार्ल के शार्सकों के पार्स काफी सशक्त सैनिक बल थार् और उनक दमन नहीं हो सक थार्। इन प्रार्देशिक शक्तियों क मुकाबलार् करने क काम हुमार्यूँ के सार्मने अभी बार्की थार्।

हुमार्यूँ क पीछे हटनार् और अफ़गार्नों क पुनर्जार्गरण (1530-1540)

सन् 1530 में बार्बर की मृत्यु के उपरार्न्त उसक पुत्र हुमार्यूँ उत्तरार्धिकारी बनार्। हुमार्यूँ के अधीन परिस्थितियार्ँ काफी निरार्शार्जनक थीं। हुमार्यूँ ने जिन समस्यार्ओं क सार्मनार् कियार् वे थीं –

  1. नए जीए गए प्रदेशों क प्रशार्सन संगठित नहीं थार्। 
  2. बार्बर की तरह हुमार्यूँ को उतनार् सम्मार्न और मुगलों के आभिजार्त्य वर्ग से इतनी इज़्ज़त नहीं मिल पार्ई। 
  3. चुगतई आभिजार्त्य वर्ग उसके पक्ष में नहीं थार् और भार्रतीय कुलीन, जिन्होंने बार्बर की सेवार्एँ ग्रहण की थीं, उन्होंने हुमार्यूँ को रार्जसिंहार्सन मिलने पर मुगलों क सार्थ छोड़ दियार् थार्। 
  4. उसे अफगार्नियों की दुश्मनी क भी सार्मनार् करनार् पड़ार्, मुख्यत: बिहार्र में एक तरफ थे शेर खार्न तो दूसरी तरफ थार् गुजरार्त क शार्सक बहार्दुरशार्ह।
  5. तैमूरी परम्परार्ओं के अनुसार्र उसे अपने सार्थियों के सार्थ बार्ँट कर शक्तियों पर अधिकार पार्नार् थार्। नवस्थार्पित मुगल सार्म्रार्ज्य के दो केन्द्र थे-दिल्ली और आगरार् मध्य भार्रत क नियन्त्रण हुमार्यूँ के हार्थ में थार् तो अफगार्निस्तार्न और पंजार्ब उसके भार्ई कामरार्न के अधीन थार्।

हुमार्यूँ ने महसूस कियार् कि अफगार्नी उसके लिए एक बड़ार् खतरार् थे। वह पूर्व और पश्चिम से अफगार्नियों के संयुक्त विरोध से बचनार् चार्हतार् थार्। उस समय तक बहार्दुरशार्ह ने भीलसार्, रार्यसेन, उज्जैन और जगरौन पर कब्जार् कर लियार् थार् और वह अपनी शक्ति क संयोजन कर रहार् थार्। जबकि हुमार्यूँ पूर्व में चुनार्र में घेरार्बंदी कर रहार् थार्, वहीं बहार्दुरशार्ह मार्लवार् और रार्जपूतार्नार् की तरफ पार्ंव फैलार् रहार् थार्। इन परिस्थितियों में हुमार्यूँ को आगरार् वार्पस आनार् पड़ार् (1532-33)। विस्तार्र की नीति को जार्री रखते हुए बहार्दुरशार्ह ने 1534 में चित्तौड़ पर आक्रमण कर दियार्। युद्ध नीति की दृष्टि से चित्तौड़ एक मज़बूत आधार्र स्थल होने क फार्यदार् उपलब्ध करवार् सकतार् थार्। इससे उसे रार्जस्थार्न, विशेष रुप से अजमेर, नार्गौर और रणथम्भौर की ओर बढ़ने में मदद मिल सकती थी। हुमार्यूँ ने मार्ंडू पर जीत हार्सिल कर ली और यहीं पर शिविर बनार् लियार् क्योंकि उसने सोचार् कि यहार्ँ रहकर वह बहार्दुरशार्ह की गुजरार्त वार्पसी के रार्स्ते में रुकावट बन सकतार् है। आगरार् से लम्बी अवधि तक उसके अनुपस्थित रहने के कारण दोआब और आगरार् में बगार्वत शुरु हो गई और उसे तुरंत वार्पस लौटनार् पड़ार्। मार्ण्डू क नियन्त्रण अब हुमार्यूँ के भार्ई मिर्जाऱ् असकरी की सरपरस्ती में छोड़ार् गयार् थार्। जिस अवधि के दौरार्न हुमार्यूँ गुजरार्त में बहार्दुरशार्ह की गतिविधियों की निगरार्नी रख रहार् थार्, उस अवधि में शेरशार्ह ने बंगार्ल और बिहार्र में अपनी शक्ति क संगठन शुरु कर दियार् थार्।

शेरशार्ह खुद को एक निर्विवार्द अफगार्नी नेतार् के रुप में स्थार्पित करनार् चार्हतार् थार्। उसने बंगार्ली सेनार् पर आक्रमण कियार् और सूरजगढ़ की लड़ार्ई में उनको हरार् दियार्। शेरशार्ह ने बंगार्ल से बहुत बड़ी धन-सम्पदार् हार्सिल की जिसने उसे एक बड़ार् सैन्य बल खड़ार् करने में मदद की। अब उसने बनार्रस और उससे परे के मुगल प्रदेशों पर आक्रमण करनार् शुरु कर दियार्। हुमार्यूँ को शेरशार्ह की महत्त्वार्कांक्षार्ओं पर संदेह तो थार् परन्तु वह उसकी क्षमतार्ओं क अनुमार्न नहीं लगार् पार्यार्। उसने अपने जौनपुर के गवर्नर हिन्दु बेग से कहार् कि वह शेरशार्ह की गतिविधियों पर नजर रखे। इस बीच शेरशार्ह ने (1538 में) बंगार्ल की रार्जधार्नी गौड़ पर जीत हार्सिल कर ली। जब हुमार्यूँ बंगार्ल की तरफ बढ़ रहार् थार् तो शेरशार्ह ने आगरार् के माग पर नियंत्रण कर लियार् और हुमार्यूँ के लिए संचार्र संबंधी कार्यों में बार्धार् उत्पन्न कर दी। दूसरी तरफ हुमार्यूँ के भार्ई हिंदल मिर्जार् ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दियार्। अब हुमार्यूँ ने चुनार्र वार्पस लौटने क फैसलार् कर लियार् जिसने उसकी सेनार् के लिए रसद की पूर्ति करनी थी। जब वह चौसार् पहुँचार् (1539), तो उसने कमनार्सार् नदी के पश्चिमी किनार्रे पर शिविर बनार्यार्। शेरशार्ह ने नदी के किनार्रे जार्कर हुमार्यूँ पर आक्रमण करके उसे हरार् दियार्। शेरशार्ह ने खुद को स्वतन्त्र रार्जार् घोषित कर दियार्। हुमार्यूँ बच सकतार् थार्, परन्तु उसकी अधिकांश सेनार् नष्ट हो चुकी थी, बहुत मुश्किल से वह आगरार् पहुँच पार्यार्। उसक भार्ई कामरार्न आगरार् से निकलकर लार्हौर की तरफ बढ़ गयार् थार् और हुमार्यूँ बहुत थोड़ी-सी सेनार् के सार्थ अकेलार् रह गयार्। अब शेरशार्ह भी आगरार् की तरफ बढ़ने लगार्। हुमार्यूँ भी अपनी सेनार् केार् लेकर आगे बढ़ने लगार् और दोनों सेनार्ओं क कन्नौज में टकरार्व हुआ। कन्नौज की लड़ार्ई में हुमार्यूँ की बुरी तरह हार्र हुई (1540)।

द्वितीय अफ़गार्नी सार्म्रार्ज्य

लोदी वंश के अधीन पहले अफ़गार्नी सार्म्रार्ज्य को बार्बर के नेत त्व में मुगलों द्वार्रार् 1526 में स्थार्पित कियार् गयार् थार्। 14 वर्ष के अंतरार्ल के पश्चार्त 1540 में शेरशार्ह भार्रत में दोबार्रार् अफ़गार्नी शार्सन स्थार्पित करने में सफल हुआ। शेरशार्ह और उसके उत्तरार्धिकारियों ने 15 वर्ष तक रार्ज कियार्। इस अवधि को द्वितीय अफ़गार्नी सार्म्रार्ज्य काल के रुप में जार्नार् जार्तार् है। इस अफ़गार्नी शार्सन क संस्थार्पक शेरखार्न रण-कौशल में कुशल और योग्य सेनार् नार्यक थार्। हुमार्यूँ से उसकी लड़ार्ई के संबंध में हम पहले ही चर्चार् कर चुके हैं। हुमार्यूँ को हरार्ने के बार्द 1540 में शेरशार्ह सर्वप्रभुतार्सम्पन्न शार्सक बन गयार् और उसे शेरशार्ह क खितार्ब दियार् गयार्।

शेरशार्ह ने उत्तर पश्चिम में सिंध तक की चढ़ार्ई में हुमार्यूँ क पीछार् कियार्। हुमार्यूँ को खदेड़ने के बार्द उसने उत्तरी और पूर्वी भार्रत में संघटन क काम शुरु कर दियार् थार्। 1542 में उसने मार्लवार् पर विजय प्रार्प्त की और तत्पश्चार्त चन्देरी को जीतार्। रार्जस्थार्न में उसने मार्रवार्ड़, रणथम्भौर, नार्गौर, अजमेर, मेड़तार्, जोधपुर और बीकानेर के विरुद्ध लड़ार्ई लड़ी। उसने बंगार्ल में बार्गी अफगार्नियों को हरार्यार्। 1545 तक उसने सिंध और पंजार्ब से लेकर पश्चिम में लगभग पूरे रार्जपुतार्नार् पर और पूर्व में बंगार्ल तक के क्षेत्र में, खुद को सर्वोच्च शार्सक के रुप में स्थार्पित कर लियार् थार्। अब वह बुंदेलखंड की ओर मुड़ार्। यहार्ँ कालिंजर के किले की घेरार्बंदी के दौरार्न 1545 में एक बार्रुदी विस्फोट की दुर्घटनार् में उसकी मृत्यु हो गई।

अपने संक्षिप्त शार्सन काल में शेरशार्ह ने बहुत महत्त्वपूर्ण प्रशार्सकीय और लगार्न पद्धतियों में परिवर्तन लार्गू किए। उनमें से कुछ प्रमुख हैं –

  1. सरकारों और परगनार् स्तर पर स्थार्नीय प्रशार्सन को व्यवस्थित करनार्।
  2. मुख्य मागों पर यार्ित्रयों और व्यार्पार्रियों के लिए सड़कों और सरार्यों यार् विशार्ल स्थलों क निर्मार्ण करार्यार् जिनसे संचार्र स्थार्पित करने में भी सहार्यतार् मिली। उसने पेशार्वर से कोलकातार् तक ग्रार्ंड ट्रंक (जी.टी.) रोड क निर्मार्ण करार्यार्।
  3. मुद्रार् प्रणार्ली, भूमि के मार्पन और लगार्न के आकलन के उपार्यों क मार्नकीकरण।
  4. सेनार् क पुनर्गठन और घोड़ों को दार्गने की प्रथार् को पुन: शुरु करनार्, और 
  5. न्यार्यिक प्रणार्ली को व्यवस्थित करनार्।

शेरशार्ह क उत्तरार्धिकारी बनार् उसक पुत्र इस्लार्म शार्ह। इस्लार्म शार्ह को अपने भार्ई आदिल खार्न और कई अन्य अफगार्नी आभिजार्त्यों के सार्थ अनेक लड़ार्इयार्ँ लड़नी पड़ीं। 1553 में उसकी मृत्यु हो गई। धीरे-धीरे अफगार्नी सार्म्रार्ज्य शक्तिहीन होतार् गयार्। इसी मौके क फार्यदार् उठार्कर हुमार्यूँ ने फिर भार्रत की तरफ बढ़नार् शुरु कर दियार्। 1555 तक आते-आते उसने फिर से अपनार् खोयार् सार्म्रार्ज्य वार्पिस छीन लियार् और द्वितीय अफगार्नी सार्म्रार्ज्य को समार्प्त कर दियार्।

1555 में हुमार्यूँ ने आगरार् और दिल्ली पर विजय प्रार्प्त की और भार्रत में खुद को बार्दशार्ह के रुप में स्थार्पित कर लियार्। अपनी स्थिति को वह पूरी तरह संगठित कर पार्तार् उससे पहले ही 1556 में शेर मंडल पुस्तकालय (दिल्ली में) की सीढ़ियों से गिरकर उसकी मृत्यु हो गई।

अकबर से औरंगजेब तक मुगल सार्म्रार्ज्य

अकबर

हुमार्यूँ की मृत्यु के समय अकबर केवल तेरह वर्ष क थार्। जब उसके पितार् की मृत्यु हुई, अकबर पंजार्ब में कलार्नौर में थार् इसलिए 1556 में उसक रार्ज्यभिषेक कलार्नौर में ही हुआ। उसके शिक्षक और हुमार्यूं के प्रिय और विश्वार्सपार्त्र बैरम खार्न ने 1556 से 1560 तक मुगल सार्म्रार्ज्य के दरबार्री प्रशार्सक की तरह काम कियार्। उसने खार्न-ए-खार्नार् की उपार्धि प्रार्प्त कर के रार्ज्य में वकील क पद हार्सिल कियार्। उसकी दरबार्री प्रशार्सन की अवधि के दौरार्न उसकी प्रमुख सफलतार्ओं में से एक थी 1556 में पार्नीपत के दूसरे युद्ध में हेमू और अफ़गार्नी सेनार्ओं की हार्र, जो कि मुगल सार्म्रार्ज्य के लिए एक बहुत गंभीर खतरार् बनी हुई थी।

अपनी प्रार्रंभिक समस्यार्ओं को हल करने और रार्ज्य पर अपनार् पूरार् नियंत्रण स्थार्पित करने के बार्द अकबर ने विस्तार्र की नीति अपनार्ई। उस समय देशों में फैली कुछ मुख्य रार्जनीतिक शक्तियार्ं थीं:

  1. वे रार्जपूत जो पूरे देश में स्वतंत्र सूबेदार्रों और रार्जार्ओं के रुप में फैले हुए थे और मुख्य रुप से रार्जस्थार्न में केंद्रित थे।
  2. अफगार्नियों ने मुख्यत: गुजरार्त, बिहार्र और बंगार्ल पर रार्जनीतिक नियंत्रण कर रखार् थार्।
  3. खार्नदेश, अहमदनगर, बीजार्पुर, गोलकुंडार् और दक्षिण भार्रत के कुछ अन्य सार्म्रार्ज्य और दक्कन बहुत ही शक्तिशार्ली थे।
  4. काबुल और कंधार्र पर यद्यपि मुगल गुटों क शार्सन थार् पर वे अकबर से दुश्मनी रखते थे।

अकबर ने बहुत ही व्यवस्थित नीति से सार्म्रार्ज्य को फैलार्ने क काम शुरु कर दियार्। बैरम खार्न को बर्खार्स्त करने के बार्द अकबर क पहलार् कदम थार् अपने अभिजार्त्य वर्ग से संघर्ष समार्प्त करनार्। इसके नियंत्रण के लिए उसने अत्यंत कूटनीतिक कौशल और संगठनार्त्मक योग्यतार्ओं क प्रदर्शन कियार्। अपनी विस्तार्र की नीति की शुरुआत उसने मध्य भार्रत से की। 1559.60 में अकबर ने, अपने पहले अभियार्न दल को मार्लवार् की तरफ बढ़ने से पूर्व ग्वार्लियर को जीतने के लिए भेजार्। मध्य भार्रत में मार्लवार् पर उस समय बार्ज बहार्दुर क शार्सन थार्। इसके विरुद्ध लड़ार्ई के अभियार्न पर अकबर ने आधम खार्न को तैनार्त कियार्। बार्ज बहार्दुर हार्र गयार् और बुरहार्नपुर की तरफ भार्ग गयार्। गोंडवार्नार्, दलपत शार्ह की विधवार् रार्नी दुर्गार्वती द्वार्रार् शार्सित मध्य भार्रत क स्वतंत्र प्रदेश थार् जिसे जीतने के बार्द अकबर ने 1564 में मुगल सार्म्रार्ज्य में शार्मिल कर लियार्।

रार्जस्थार्न

ऐसार् लगतार् है कि अकबर को रार्जपूत रजवार्ड़ों के महत्त्व की पूरी जार्नकारी थी और वह अपने रार्ज्य क बडे़ क्षेत्र में विस्तार्र करने की अपनी महत्तवार्कांक्षार् को पूरार् करने के लिए उन्हें अपनार् मित्र बनार्नार् चार्हतार् थार्। जहार्ँ भी संभव हुआ उसने रार्जपूतों को जीतने क प्रयार्स कियार् और उन्हें मुगल सेवार् में नियुक्त कियार्। उसने भार्रमल जैसे रार्जपूत रार्ज-परिवार्रों के सार्थ वैवार्हिक संबंध भी स्थार्पित किए। आमेर (अम्बर) क रार्जार् भार्रमल अकबर के सार्थ ऐसे संबंध जोड़ने वार्लार् पहलार् रार्जार् थार्। मेड़तार् और जोधपुर जैसे रार्जपूत सार्म्रार्ज्यों पर भी उसने बहुत आसार्नी से जीत हार्सिल कर ली थी। परन्तु मेवार्ड़ शार्सक महार्रार्णार् प्रतार्प अभी भी मुगलो के लिए गंभीर चुनौती बने हुए थे आरै उन्होनें अकबर केसार्मने हथियार्र नहीं डार्ले थे। बहुत लंबे संघर्ष और चितौड़ के किले की घेरार्बंदी के बार्द अकबर मेवार्ड़ की सेनार्ओं पर जीत हार्सिल करने में कामयार्ब हुआ। बहुत बड़ी संख्यार् में रार्जपूत सैनिक युद्ध में मार्रे गए। परन्तु अभी भी उसे पूरी तरह हरार्यार् नहीं जार् सक थार् और कुछ न कुछ प्रतिरोध लंबे समय तक मेवार्ड़ की ओर से कियार् जार्तार् रहार् थार्। चितौड़ को हरार्ने के बार्द ही रणथम्भौर और कालिंजर को जीतार् जार् सक थार्। मार्रवार्ड़, बीकानेर और जैसलमेर ने भी अकबर के सार्मने हार्र मार्न ली। 1570 तक अकबर ने लगभग पूरे रार्जस्थार्न को जीत लियार् थार्। अकबर की सबसे महत्तवपूर्ण सफलतार् यह थी कि पूरे रार्जस्थार्न को अपने अधीन करने के बार्वजूद रार्जपूतों और मुगलों में कोई शत्रुतार् नहीं थी।

अफगार्न (गुजरार्त, बिहार्र और बंगार्ल)

अफगार्नियों के खिलार्फ जंग अकबर ने 1572 में शुरु की थी। वहार्ं के रार्जकुमार्रों में से एक रार्जकुमार्र इत्तिमार्द ख़ार्न ने अकबर को आमंत्रित कियार् थार् कि वह वहार्ँ आकर इसे जीत ले। अकबर खुद अहमदार्बार्द पहुँचार्ं। किसी विशेष विरोध के बगैर ही अकबर ने नगर को जीत लियार्। सूरत ने मजबूत किलेबंदी करके कुछ विरोध जतार्यार् परन्तु उस पर भी अकबर ने जीत हार्सिल कर ली। बहुत छोटी सी अवधि के दौरार्न अकबर ने गुजरार्त के अधिकांश रजवार्ड़ों पर कब्जार् कर लियार्। अकबर ने गुजरार्त को संगठित करके उसे एक प्रदेश बनार् दियार् और इसे मिर्जार् अजीज कोक के शार्सन के अधीन करके, खुद रार्जधार्नी वार्पस आ गयार्। छह महीने की अवधि में अनेक बार्गी गुटों ने एकतार् कर ली और मिलकर मुगल शार्सन के विरुद्ध विद्रोह कर दियार् और मुगल सूबेदार्र को कई प्रदेशीय क्षेत्रों से अपनार् कब्ज़ार् छोड़नार् पड़ार्। बार्गियों के नेतार् थे, इख्तियार्र-उल-मुल्क और मोहम्मद हुसैन मिर्जार्। अकबर ने आगरार् में विद्रोह की खबर सुनी, तो वह अहमदार्बार्द के लिए निकल पड़ार्। अकबर बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ार् और दस दिन के अंदर अहमदार्बार्द पहुँच गयार्। बार्दशार्ह ने बहुत जल्दी ही विद्रोह को कुचल दियार्। गुजरार्त के अभियार्न के बार्द बंगार्ल और बिहार्र की तरफ रुख कियार् गयार् जो अफ़गार्नियों के नियंत्रण मे थे। 1574 में, अकबर मुनीम खार्न खार्न-ए-खार्नार् के सार्थ बिहार्र की तरफ बढ़ार्। बहुत कम समय में ही हार्जीपुर और पटनार् जीत लिए गए और गौड़ (बंगार्ल) को भी जीत लियार् गयार्। इसके सार्थ ही 1576 तक बंगार्ल में स्वतंत्र शार्सन समार्प्त हो गयार् थार्। 1592 तक मुगल मनसबदार्र रार्जार् मार्न सिंह ने लगभग पूरे उड़ीसार् को मुगल सार्म्रार्ज्य के अधीन कर दियार् थार्।

1581 में मुगल सार्म्रार्ज्य के कुछ क्षेत्रों में सिलसिलेवार्र लड़ार्इयार्ं शुरु हो गई । बंगार्ल, बिहार्र, गुजरार्त और उत्तर-पश्चिम असंतोष के मुख्य केन्द्र थे। इस समस्यार् के मूल में थे अफ़गार्नी, जिन्हें मुगलों ने हर जगह से बार्हर निकाल दियार् थार्। इसके अतिरिक्त, जार्गीरों के कठोर प्रशार्सन की अकबर की नीति भी इसके लिए ज़िम्मेदार्र थी। एक नई नीति अपनार्ई गई जिसके तहत जार्गीरदार्रों को अपनी जार्गीरों क लेखार् प्रस्तुत करने के लिए कहार् गयार्। इससे असंतोष पैदार् हो गयार् और जार्गीरदार्र विरोध में खड़े हो गए। मार्सूम खार्न काबुली, रौशन बेग, मिर्जार् शरार्फुद्दीन और अरब बहार्दुर बार्गियों के मुख्य नेतार् थे। वहार्ं तैनार्त शार्ही अधिकारियों ने इस बगार्वत को दबार्ने की कोशिश की मगर कामयार्ब नहीं हो सके। अकबर ने तत्काल रार्जार् टोडरमल और शेख फरीद बख्शी के अधीन एक बड़ी फौज देकर उन्हें वहार्ँ भेजार्। कुछ समय के बार्द, अज़ीज़ कोक और शार्हबार्ज खार्न को भी टोडरमल की सहार्यतार् के लिए भेजार् गयार्। बार्गियों ने अकबर के भार्ई हकीम मिर्जार् को, जो उस वक्त काबुल में थार्, अपनार् रार्जार् घोषित कर दियार्। परन्तु शीघ्र ही मुगल सेनार्ओं ने बिहार्र, बंगार्ल और उसके आसपार्स के क्षेत्रों में विद्रोह को बहुत सफलतार्पूर्वक दबार् दियार्।

पंजार्ब और उत्तर पश्चिम

पंजार्ब में मिर्जार् हार्किम अकबर के लिए समस्यार् खड़ी कर रहार् थार् और उसने लार्हौर पर हमलार् कर दियार्। हार्किम मिर्जार् को उम्मीद थी कि बहुत से मुगल अफसर उसक सार्थ देंगे परन्तु किसी बड़े समूह ने उसक सार्थ नहीं दियार्। अकबर ने खुद लार्हौर की तरफ बढ़ने क फैसलार् कियार्। हार्किम मिर्जार् तुरंत पीछे हट गयार् और अकबर ने पूरे क्षेत्र पर कब्ज़ार् कर लियार्। उसकी सबसे पहली प्रार्थमिकतार् रही उत्तर-पश्चिमी सीमार्ंत क्षेत्रों की सुरक्षार् व्यवस्थित करनार्। इसके बार्द उसने काबुल की तरफ बढ़नार् शुरु कियार् और उस प्रदेश पर विजय प्रार्प्त की। काबुल क कार्यभार्र उसने अपनी बहन बख्तूनिनसार् बेगम को सौपार्। बार्द में रार्जार् मार्न सिंह को वहार्ं क सूबेदार्र तैनार्त कियार् गयार् और उसे जार्गीर के रुप में इसे दे दियार् गयार्।

उत्तर पश्चिम क्षेत्र में जो अन्य गतिविधि विकसित हुई, वह थी रौशनार्इयों की बगार्वत, जिसने काबुल और हिन्दुस्तार्न के बीच के माग पर कब्जार् कर लियार् थार्। रौशनार्ई एक सैनिक सिपार्ही द्वार्रार् स्थार्पित सम्प्रदार्य थार् जिसे उस प्रदेश में पीर रौशनार्ई कहते थे। उसक पुत्र उस पंथ क सरदार्र थार् जिसके बहुत बड़ी संख्यार् में अनुयार्यी थे। अकबर ने, रौशनार्इयों को दबार्ने और वहार्ं मुगलों क नियंत्रण स्थार्पित करने के लिए बहुत बलशार्ली फौज क सेनार्पति बनार्कर ज़ार्येन ख़ार्न को वहार्ं भेजार्। ज़ार्येन ख़ार्न की मदद करने के लिए सईद ख़ार्न गखड़ और रार्जार् बीरबल को भी अलग-अलग सैनिक टुकड़ियों के सार्थ वहार्ं भेजार् गयार्। एक सैनिक कार्यवार्ही के दौरार्न अपने अधिकतर सैनिकों के सार्थ, बीरबल मार्रार् गयार्। उसने बगार्वत को दबार्ने के लिए रार्जार् टोडरमल और रार्जार् मार्न सिंह को नियुक्त कियार् और वे दोनों रौशनार्इयों को हरार्ने में कामयार्ब रहे।

लंबे समय तक अकबर कश्मीर को जीतने के लिए उस पर आँखे गड़ार्ए रहार्। 1586 में कश्मीर मुगल सार्म्रार्ज्य में शार्मिल कर लियार् गयार् थार्।

सिंध में उत्तर-पश्चिम में, अभी भी कुछ रिहार्यशी क्षेत्र स्वतंत्र थे। 1590 में अकबर ने खार्न-ए-खार्नार् को मुल्तार्न क गवर्नर नियुक्त कियार् और उसे बिलोचियों को हरार्ने के लिए कहार्, जो उस क्षेत्र की एक जनजार्ति थी, और उस पूरे प्रदेशीय क्षेत्र को जीतने क आग्रह कियार्। सबसे पहले थट्टार् पर अधिकार कियार् गयार् और ‘मुल्तार्न’ के सूबे में उसे सरकार के रुप में स्थार्पित कियार् गयार्। आसपार्स के क्षेत्रों में बिलूचियों के सार्थ झड़पें होती रहीं। अन्त में वर्ष 1595 में पूरे उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों पर मुगलों की संपूर्ण सर्वोच्चतार् स्थार्पित कर दी गई।

दक्कन

1590 के पश्चार्त् दक्कन के प्रदेशों को मुगलों के नियंत्रण के अधीन लार्ने के लिए दक्कन नीति को सार्कार रुप दियार्। इस अवधि के दौरार्न दक्कन के प्रदेशों में आंतरिक तनार्व और निरंतर युद्ध चल रहे थे। 1591 में अकबर ने दक्कन प्रदेशों को उपहार्र भेजकर यह संदेश भिजवार्यार् कि वे मुगलों की प्रभुसत्तार् को स्वीकार कर लें, परन्तु इसमें उसे कोई विशेष सफलतार् नहीं मिली। अब अकबर ने आक्रमण की नीति अपनार्ने क निर्णय कियार्। पहलार् अभियार्न अहमदनगर के लिए कूच कियार् जिसके सेनार् नार्यक थे रार्जकुमार्र मुरार्द और अब्दुल रहीम खार्न खार्नार्। 1595 में मुगल सेनार्ओं ने अहमदनगर पर आक्रमण कर दियार्। इसकी शार्सिक चार्ंद बीबी ने मुगलों क मुकाबलार् करने क फैसलार् कियार्। उसने सहार्यतार् के लिए बीजार्पुर के इब्रार्हिम आदिल शार्ह और गोलकुंडार् के कुतुब शार्ह से संपर्क कियार् परन्तु उसे कोई सफलतार् नहीं मिली। घमार्सार्न युद्ध हुआ। दोनों तरफ भार्री नुकसार्न होने के बार्द एक समझौतार् कियार् गयार् जिसके तहत चार्ंदी बीबी ने बरार्र मुगलों के हवार्ले कर दियार्। कुछ समय के बार्द चार्ंद बीबी ने बरार्र को वार्पस लेने के लिए फिर से हमलार् कर दियार्। इस वक्त निज़ार्मशार्ही, कुतुबशार्ही और आदिलशार्ही टुकड़ियों ने मिलकर मोर्चार् संभार्लने क निर्णय कियार्। मुगलों को भार्री नुकसार्न हुआ, इसके बार्वजूद वे अपनी स्थिति बनार्ए रखने में कामयार्ब रहे। इस बीच मुरार्द और खार्न खार्नार् में आपस में गंभीर मतभेद पैदार् होने से मुगलों की तार्कत घटने लगी। इसीलिए अकबर ने खार्न खार्नार् को वार्पिस बुलार् लियार् और दक्कन में अबुल फजल को नियुक्त कर दियार्। 1598 में रार्जकुमार्र मुरार्द की मृत्यु के बार्द, रार्जकुमार्र दार्नियार्ल और खार्न खार्नार् को दक्कन भेजार् गयार्। अहमदनगर जीत लियार् गयार्। जल्दी ही मुगलों ने असीरगढ़ ़और उसके आसपार्स के क्षेत्रों को जीत लियार्। बीजार्पुर के आदिलशार्ह ने भी मित्रतार् दर्शार्ई और रार्जकुमार्र दार्नियार्ल से अपनी पुत्री  के विवार्ह क प्रस्तार्व भेजार्। इस बीच चार्ंद बीबी क भी देहार्ंत हो गयार्। अब दक्कन में मुगलों के प्रदेशों में असीरगढ़, बुरहार्नपुर, अहमदनगर और बरार्र शार्मिल थे।

प्रदेशीय विस्तार्र के सार्थ-सार्थ अकबर ने सेनार् नार्यकों को मुगल अभिजार्त्यों में मिलार्ने की नीति शुरु की। उसकी इस नीति से मुगल सार्म्रार्ज्य को बहुत फार्यदार् हुआ। मुगल शार्सक अपनी नई जीतों के लिए सेनार् नार्यकोंं और उनकी सेनार्ओं की सहार्यतार् हार्सिल करने में कामयार्ब हो गयार्। मुगल आभिजार्त्यों की भूमिका, इतने बड़े सार्म्रार्ज्य के शार्सन कार्यों को चलार्ने के लिए भी मदद के रुप में उपलब्ध थी। इसके अतिरिक्त उनके सार्थ शार्ंतिपूर्ण संबंधों की वजह से सार्म्रार्ज्य में शार्ंति भी सुनिश्चित हुई। सेनार् नार्यकों को भी इस नीति से बहुत फार्यदार् हुआ। अब वे अपने अपने क्षेत्रों को अपने पार्स रखकर अपनी इच्छार्नुसार्र शार्सन कर सकते थे। इसके अतिरिक्त उन्हें जार्गीर और मनसब भी दिए गए । उन्हें जार्गीर में जो प्रदेश दिए जार्ते थे, वे अकसर उनके अपने सार्म्रार्ज्यों से बड़े होते थे। इससे उन्हें दुश्मनों और बार्गियों से भी सुरक्षार् प्रार्प्त हुई। कई मनसबदार्रों को ‘वतन जार्गीर’ के रुप में उन्हें अपनार् प्रार्देशिक क्षेत्र भी दियार् गयार्, जो वंशार्नुगत थार् और उसे किसी को हस्तार्ंतरित नहीं कियार् जार् सकतार् थार्।

अकबर के अधीन हुए प्रार्देशिक विस्तार्र ने मुगल सार्म्रार्ज्य को निश्चित आकार दियार्। प्रार्देशिक विस्तार्र की बार्त करें, तो अकबर के बार्द बहुत कम प्रदेश सार्म्रार्ज्य में शार्मिल हो सके थे। शार्हजहार्ं और औरंगजेब के काल में दक्कन और उत्तर पूर्व भार्रत के कुछ प्रदेश सार्म्रार्ज्य में शार्मिल जरुर हुए थे।

जहार्ँगीर और शार्हजहार्ँ

जहार्ँगीर ने दक्कन में अकबर की विस्तार्र नीति को अपनार्यार्। परन्तु कुछ समस्यार्ओं के कारण उसे इस काम में बहुत कम सफलतार् मिली। खुर्रम की बगार्वत की वजह से पैदार् हुए संकट के कारण वह इस तरफ अधिक ध्यार्न नहीं दे पार्यार्। दक्कन से कुछ फार्यदार् उठार्ने के लिए मुगल आभिजार्त्य वर्ग भी अनेक “ार्ड्यंत्रों और लड़ार्इयों में शार्मिल थार्।

पहले तीन वर्ष के दौरार्न, दक्कन ने बार्लार्घार्ट और अहमदनगर के काफी जिलों को फिर से हार्सिल कर लियार् थार्। मलिक अम्बर इनमें से प्रमुख शार्सक थार् जिसने मुगल सेनार्ओं को हरार्कर बरार्र, बार्लार्घार्ट और अहमदनगर के कुछ भार्गों को वार्पस जीतार्। हार्रे हए प्रदेशों पर मुगल फिर दोबार्रार् कब्ज़़ार् हार्सिल नहीं कर सके। इस दौरार्न शार्हजहार्ँ ने अपने पितार् के खिलार्फ बगार्वत कर दी और मलिक अम्बर से मित्रतार् स्थार्पित कर ली।

मलिक अम्बर ने अहमदनगर पर कब्ज़ार् करने की कोशिश की मगर असफल रहार्; उसने आदिलशार्ह से शोलार्पुर छीन लियार् और शार्हजहार्ँ के सार्थ मिलकर बुरहार्नपुर पर कब्ज़ार् करने की कोशिश की, परन्तु असफल रहार्। एक बार्र तो जहार्ँगीर और शार्हजहार्ँ के बीच शार्ंति स्थार्पित हो गई। मलिक अम्बर भी शार्ंत हो गयार्। सन 1627 में मलिक अम्बर की मृत्यु हो गई और सार्म्रार्ज्य के ‘वकील’ और ‘पेशवार्’ के रुप में उसक उत्तरार्धिकारी बनार् उसक पुत्र फतेह खार्न;। फतेह खार्न बहुत आक्रार्मक प्रकृति क थार् और उसके शार्सन के दौरार्न दक्कनियों और आभिजार्त्यों के बीच परसपर लड़ार्ई शुरु हो गई। जहार्ँगीर के शार्सनकाल के दौरार्न मुगल सार्म्रार्ज्य में दक्कन से कोई भी प्रदेश शार्मिल नहीं हो सका। असल में दक्कनी शार्सकों ने अपने प्रदेशों में मुगल सार्म्रार्ज्य को बहुत कमज़ोर बनार् दियार् थार्। मलिक अम्बर की अति महत्त्वार्कांक्षार् दक्कन प्रदेशों के संयुक्त मोर्चे की रार्ह में एक बड़ी बार्धार् थी।

जहार्ँगीर की मृत्यु होने और शार्हजहार्ँ के रार्जसिंहार्सन पर बैठने की अवधि के दौरार्न, दक्कन के मुगल सूबेदार्र खार्न जहार्न लोदी ने, जरुरत के वक्त मदद लेने के इरार्दे से, बार्लार्घार्ट, निजार्मशार्ह को दे दियार्। सिंहार्सन पर बैठने के बार्द शार्हजहार्ँ ने खार्न जहार्न लोदी को, बार्लार्घार्ट वार्पस लेने क आदेश दियार् परन्तु वह इसमें असफल रहार्, और इसके बार्द शार्हजहार्ँ ने उसे दरबार्र में वार्पस बुलार् लियार्। इस पर ख़ार्न जहार्न उसक दुश्मन बन गयार् और उसने बगार्वत कर दी। उसने निज़ार्मशार्ह के पार्स जार्कर आश्रय ले लियार्। इसने शार्हजहार्ँ को क्रोधित कर दियार् और उसने दक्कन प्रदेशों के विरुद्ध आक्रार्मक रुख अपनार्ने क निर्णय कर लियार्। शार्हजहार्ँ क मुख्य उद्देश्य थार् दक्कन के खोए हुए प्रदेशों को वार्पस हार्सिल करनार्।

उसे विश्वार्स थार् कि दक्कन में अहमदनगर की स्वतंत्रतार् मुगल नियंत्रण के आड़े आ रही थी। उसने अहमदनगर को छोड़कर बीजार्पुर और मरार्ठों को जीतने क निर्णय कियार्। इसमें उसे सफलतार् मिली। मलिक अम्बर के पुत्र फैथ ख़ार्न ने भी मुगलों से सुलह कर ली। अब महार्बत ख़ार्न को दक्कन क सूबेदार्र नियुक्त कियार् गयार्। परन्तु दक्कन के रार्ज्यों के सार्थ लड़ार्ई अभी भी जार्री रही। अंत में सन् 1636 में बीजार्पुर और गोलकुंडार् के बीच एक समझौते पर हस्तार्क्षर किए गए। बीजार्पुर के सार्थ समझौते की कुछ मुख्य शर्तें थीं:

  1. आदिलशार्ह मुगलों की अधीनतार् स्वीकार करेगार्।
  2. उसे 20 लार्ख रुपए क्षतिपूर्ति के रुप में देने होंगे।
  3. वह गोलकुंडार् के मार्मलों में कोई दखलंदार्जी नहीं करेगार्।
  4. बीजार्पुर और गोलकुंडार् के बीच कोई विवार्द होने पर मुगल शार्सक उनक बिचौलियार् होगार्।
  5. शार्हजी भौंसले के खिलार्फ लड़ार्ई में आदिलशार्ह मुगलों की सहार्यतार् करेगार्।

गोलकुंडार् ने भी एक पथक संधि पत्र तैयार्र कियार्। इस संधि पत्र के अनुसार्र –

  1. गोलकुंडार् ने मुगल शार्सक के प्रति वफार्दार्री की शपथ ली। उसने मुगल शार्सक के नार्म को खुतबार् में स्वीकार करने की सहमति दी और ईरार्न के शार्ह क नार्म छोड़ दियार्।
  2. गोलकुंडार् ने मुगलों को 2 लार्ख हूण प्रति वर्ष देने की सहमति दी।

इन समझौतों से दक्कन में लड़ार्इयों क अंत हो गयार्। अब मुगल अपनार् अधिकार क्षेत्र दक्षिण भार्रत के अधिकांश क्षेत्र तक फैलार्ने में कामयार्ब हो सके। 1656.57 में जब इन समझौतों की अनदेखी की गई तो मुगल नीति में एक विशिष्ट तब्दीली आई। अब शार्हजहार्ँं ने औरंगजेब से दक्कन के सार्म्रार्ज्यों के सभी प्रदेशों को जीतकर मुगल सार्म्रार्ज्य के सार्थ जोड़ने क आदेश दियार्। कुछ इतिहार्सकार ने यह तर्क दियार् कि इस नीति के बदलने क कारण थार्, दक्कन के प्रदेशों में उपलब्ध संसार्धनों क दोहन करनार्। परन्तु, इस परिवर्तन से मुगल सार्म्रार्ज्य को कोई खार्स लार्भ नहीं मिलार् बल्कि इससे भविष्य के लिए और अधिक समस्यार्एँ पैदार् हो गई।

औरंगजेब

औरंगज़े़ब दक्कन के प्रति बहुत आक्रार्मक नीति अपनार्ने में विश्वार्स रखतार् थार्। प्रो. सतीश चन्द्र दक्कन प्रदेशों के प्रति उसकी नीति के तीन विभिन्न चरणों को रेखार्ंकित करते हैं:

  1. 1658 से 1668 के दौरार्न मुख्य लक्ष्य थार् बीजार्पुर से कल्यार्णी, बिदर और परेन्डार् प्रदेशों को छीनकर अपने कब्जे में करनार्। इस चरण के दौरार्न मरार्ठों के विरुद्ध दक्कन प्रदेशों से सुरक्षार् सहार्यतार् पार्ने की कोशिशें की गई। दक्कन के सूबेदार्र जय सिंह ने भी बीजार्पुर को जीतने के प्रयार्स किए परन्तु असफल रहार्।
  2. 1668 से 1684 के दौरार्न इस नीति में थोड़ी तब्दीली की गई। आदिलशार्ह की मृत्यु, शिवार्जी की बढ़ती शक्ति और गोलकुंडार् प्रशार्सन के दो भार्इयों अखन्नार् और मदन्नार् ने मुगल नीति को प्रभार्वित कियार्। गोलकुंडार् ने शिवार्जी और बीजार्पुर के सार्थ गुप्त समझौतार् करने की कोशिश की। मरार्ठों को घेरने की औरंगज़ेब की कोशिशों को कोई बहुत ज़्यार्दार् कामयार्बी नहीं मिली। कुछ छोटी-छोटी तब्दीलियों और जल्दी-जल्दी पैदार् होने वार्ले तनार्व किसी न किसी रुप में जार्री रहे।
  3. तीसरे चरण में (1684.87) औरंगज़ेब ने दक्कन के प्रदेशों को खुल्लमखुलार् अपने रार्ज्य में शार्मिल करने की नीति अपनार्ई। औरंगजे़ब ने बीजार्पुर की घेरार्बंदी की खुद निगरार्नी की। 1687 से 1707 तक मरार्ठों के सार्थ लड़ार्ई जार्री रही। औरंगज़ेब ज़्यार्दार्तर वक्त तक दक्कन में रहार् और उसने इस क्षेत्र को मुगल नियंत्रण के अधीन कायम रखार्। परन्तु 1707 में उसकी मृत्यु के बार्द (दक्कन में औरंगार्बार्द में) उन्होंने फिर से स्वतंत्रतार् पार्ने के लिए प्रयार्स कियार् और बहुत कम समय में ही इसमें सफल हो गए। दक्कन के अतिरिक्त औरंगज़ेब उत्तर पूर्व क्षेत्र में असम तक मुगल शक्ति क विस्तार्र करने मे कामयार्ब रहार्। इस क्षेत्र में मुगलों की सबसे बड़ी सफलतार् थी, अहोम सार्म्रार्ज्य (असम) के मीर जुमलार् को बंगार्ल के सूबेदार्र के अधीन लार्कर अपने सार्थ जोड़नार्। एक अन्य महत्वपूर्ण उत्तर पूर्व की विजय थी, बंगार्ल के नए गवर्नर शार्इस्तार् ख़ार्न के अधीन 1664 में चटगार्ंव की जीत। अहोम सार्म्रार्ज्य पर बहुत लंबे समय तक सीधार् नियंत्रण नहीं रखार् जार् सका। वहार्ं तैनार्त मुगल फौजदार्र को विरोध सहनार् पड़ार् और वहार्ं नियमित रुप से लड़ार्इयार्ँ होती रहती थीं। 1680 तक अहोम के शार्सकों ने कामरुप पर जीत हार्सिल कर ली और वहार्ँ मुगल नियंत्रण समार्प्त हो गयार्।

मुगल शार्सन के लिए चुनौतियार्ँ: लड़ार्इयार्ँ और संधि की बार्तचीत

औरंगज़ेब के अधीन मुगल सार्म्रार्ज्य ने अधिकतम प्रार्देशिक सीमार्ओं तक अपनी पहुँच बनार् ली थी और लगभग आधुनिक भार्रत कहे जार्ने वार्ले संपूर्ण क्षेत्र को जीत लियार् थार्। परन्तु उसक शार्सन जार्टों, सतनार्मियार्ँ, अफ़गार्नियों, सिखों और मरार्ठों की आम बगार्वतों से परेशार्न थार्। अकबर के अधीन रार्जपूत मुगलों की सहार्यतार् के एक महत्त्वपूर्ण आधार्र की तरह उभरे और बार्द में जहार्ँगीर और शार्हजहार्ँ के अधीन भी। परन्तु औरंगज़ेब के अधीन उन्होंने खुद को परार्यार् अनुभव करनार् शुरु कर दियार् और धीरे-धीरे प्रशार्सनिक ढार्ंचे में उन्होंने अपनार् स्थार्न भी खो दियार्। औरंगजेब के अधीन मरार्ठों ने मुगलों की सत्तार् को बहुत बड़ी चुनौती दी थी। दक्कन के प्रदेशों ने मुगलों की विस्तार्र योजनार्ओं क कड़ार् विरोध कियार्। उत्तर पश्चिमी सीमार्ंत प्रदेश में भी कुछ समस्यार् वार्ले स्थार्न थे और मुगलों को इन बार्धार्ओं को दबार्नार् पड़ार्। इस प्रकार हम देखते हैं कि मुगल सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् और इसके विस्तार्र की प्रक्रियार् के दौरार्न मुगलों को विरोध क सार्मनार् करनार् पड़ार् और विविध उपार्यों और युद्ध नीतियों को अपनार्कर अपने तरीके से समझौते करने पड़े।

रार्जपूत

रार्जपुतार्नार् में मेवार्ड़ एकमार्त्र ऐसार् क्षेत्र थार् जो अकबर के शार्सन काल के दौरार्न मुगलों के अधीन नहीं आ सका। जहार्ँगीर ने इसे जीतने के लिए लगार्तार्र दबार्व बनार्ए रखार्। लड़ार्इयों के एक लंबे सिलसिले के बार्द रार्णार् अमर सिंह ने अंत में मुगलों के आधिपत्य को मंज़ूर कर लियार्। मेवार्ड़ से जीते गए सभी प्रदेश चितौड़ के किले सहित रार्णार् अमर सिंह को लौटार् दिये गए और इसके सार्थ ही उसके पुत्र कर्ण सिंह को एक बड़ी जार्गीर भी दी गई। जहार्ँगीद और शार्हजहार्ँ के शार्सन के दौरार्न, रार्जपूतों ने आम तौर पर मुगलों के सार्थ मित्रतार् क व्यवहार्र कियार् और बहुत ऊँचे मनसबों तक काबिज़ रहे। शार्हजहार्ँ को दक्कन और उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों की लड़ार्इयों के लिए रार्जपूत सैनिकों पर अत्यधिक विश्वार्स थार्। औरंगजेब के शार्सन के दौरार्न, रार्जपूतों के सार्थ मुगलों के रिश्तों में दरार्र आ गई, खार्स तौर पर मार्रवार्ड़ के रार्जसिंहार्सन के उत्तरार्धिकारी के मार्मले में। उत्तरार्धिकार को समर्थन देने के कारण रार्जपूत नार्रार्ज़ हो गए। जोधपुर पर उसक कब्जार् भी मुगल रार्जपूत संबंधों के लिए एक और झटक सार्बित हुआ और धीरे-धीरे रार्जपूत मुगल शार्सन से अलग हो गए। असल में, आभिजार्त्य में शक्तिशार्ली रार्जपूत क्षेत्र के अभार्व में मुगलों के लिए चार्रों तरफ के क्षेत्रों पर नियंत्रण रखने के काम में अंत में काफी नुकसार्न झेलनार् पड़ार्, खार्स तौर पर तब, जबकि उन्हें मरार्ठों से समझौतार् वातार् करनी पड़ी।

दक्कन

अकबर के अंतिम दिनों में और जहार्ँगीर के प्रार्रंभिक दिनों में मलिक अम्बर के अधीन अहमदनगर ने मुगल तार्कत को चुनौती देनार् शुरु कर दियार् थार्। मलिक अम्बर बीजार्पुर क समर्थन पार्ने में भी कामयार्ब हो गयार् थार्। शार्हजहार्ँ के शार्सन काल में अहमदनगर, बीजार्पुर और गोलकुंडार् के दक्कन सार्म्रार्ज्यों में फिर से मुगलों के सार्थ लड़ार्ई शुरु हो गई थी। सबसे पहले अहमदनगर को हरार्यार् गयार् और इसके अधिकांश प्रदेशों को मुगल सार्म्रार्ज्य के सार्थ जोड़ दियार् गयार् थार्। 1636 तक आते-आते बीजार्पुर और गोलकुंडार् को भी हरार् दियार् गयार् थार्, परन्तु इन सार्म्रार्ज्यों को मुगल सार्म्रार्ज्य के सार्थ नहीं जोड़ार् गयार् थार्। एक संधि पत्र बनार्ने के बार्द यह निर्णय हुआ कि हरार्ए गए शार्सक वाषिक नज़रार्नार् देंगे और मुगलों की सत्तार् को स्वीकार करेंगे। लगभग दस वर्ष के लिए शार्हजहार्ँ ने अपने पुत्र औरंगज़ेब को इस क्षेत्र में नियुक्त कियार्। औरंगजेब के शार्सन काल में दक्कन प्रदेशों और मरार्ठों के सार्थ संघर्ष और भी गंभीर हो गयार्। असल में औरंगज़ेब ने अपने शार्सन के अंतिम 20 वर्ष दक्कन में लगार्तार्र युद्ध करते हुए व्यतीत किए। 1687 तक बीजार्पुर और गोलकुंडार् के दक्कनी सार्म्रार्ज्यों को मुगल सार्म्रार्ज्य के सार्थ जोड़ दियार् गयार् थार्। परन्तु दक्कन में औरंगजेब द्वार्रार् खर्च कियार् गयार् समय और धन, मुगल सार्म्रार्ज्य के लिए एक बहुत बड़ार् अपव्यय सार्बित हुआ।

मरार्ठार्

17वीं सदी के मध्य में शिवार्जी के नेत त्व के अधीन मरार्ठे, दक्कन में बहुत शक्तिशार्ली बल के रुप में उभरे और उन्होंने मुगलों के अधिकार को चुनौती देनार् शुरु कर दियार्। शिवार्जी ने 1656 में अपनी आक्रार्मक कार्रवार्इयार्ँ शुरु कर दी और जार्वली क रार्ज्य अपने आधिपत्य में कर लियार्। कुछ समय के बार्द शिवार्जी ने बीजार्पुर प्रदेश पर आक्रमण कर दियार्, और 1659 में, बीजार्पुर के सुल्तार्न ने अपने जनरल अफजल खार्न को शिवार्जी पर विजय प्रार्प्त करने के लिए भेजार्। परन्तु शिवार्जी उसकी (अफजल खार्ँ) तुलनार् में बहुत चतुर निकले और उन्होंने उसकी हत्यार् कर दी। अन्त में, 1662 में बीजार्पुर के सुल्तार्न ने शिवार्जी के सार्थ एक समझौतार् कियार् जिसके तहत उन्हें जीते गए प्रदेशों क स्वतंत्र शार्सक मार्न लियार् गयार्। अब शिवार्जी ने मुगल प्रदेशों को नुकसार्न पहुँचार्नार् शुरु कर दियार्। औरंगज़ेब ने दक्कन के सूबेदार्र शार्इस्तार् खार्न को एक बहुत बड़ी सेनार् देकर शिवार्जी के पार्स भेजार् और उन दोनों के बीच पुरंदर के (1665 में) संधि पत्र पर हस्तार्क्षर किए गए, जिसके तहत शिवार्जी द्वार्रार् जीते गए 35 किलो में से 23 किले मुगलों को वार्पस करने के लिए वह तैयार्र हो गयार्। शेष बचे 12 किले (जिनकी वाषिक आय एक लार्ख थी) शिवार्जी के पार्स छोड़ दिए गए। शिवार्जी को आगरार् के मुगल दरबार्र में आने क आग्रह कियार् गयार्। परन्तु जब शिवार्जी वहार्ँ पहुँचे तो उनसे दुव्र्यवहार्र कियार् गयार् और उन्हें बन्दी बनार् लियार् गयार्। वे 1666 में बच कर निकल भार्गे और रार्यगढ़ पहुँच गए। तब से लेकर उन्होंने मुगलों के विरुद्ध लगार्तार्र युद्ध जार्री रखार्। बहुत शीघ्र ही उन्होंने उन सभी किलों को वार्पस जीत लियार् जो उन्होंने मुगलों को वार्पस किए थे। 1670 में उन्होंनें सूरत को दूसरी बार्र लूटार्। 1674 में शिवार्जी ने रार्यगढ़ को अपनी रार्जधार्नी बनार् लियार् और रार्ज्यार्भिषेक करवार्ने के बार्द छत्रपति की उपार्धि ग्रहण की। इसके कुछ ही समय बार्द उन्होनें दक्षिण भार्रत में एक बड़ार् अभियार्न चलार्यार् और वेल्लौर में झिंजी और कर्नार्टक में कई जिले जीत लिए। छह वर्ष तक शार्सन करने के बार्द 1680 में उसकी मृत्यु हो गई। इस छोटी सी अवधि में उसने मरार्ठार् सार्म्रार्ज्य की नींव रखी जिसने लगभग डेढ़ शतार्ब्दी तक पश्चिमी भार्रत में शार्सन कियार्। शिवार्जी के उत्तरार्धिकारी थे उनके पुत्र सम्भार्जी। बहुत से मरार्ठार् प्रमुखों ने सम्भार्जी क समर्थन नहीं कियार् और शिवार्जी के दूसरे पुत्र रार्जार्रार्म की सहार्यतार् की। आंतरिक लड़ार्ई ने मरार्ठार् शक्ति को कमज़ोर कर दियार्। अंत में औरंगज़ेब द्वार्रार् सम्भार्जी को पकड़ कर 1689 में मौत के घार्ट उतार्र दियार् गयार्। सम्भार्जी के उत्तरार्धिकारी बने रार्जार्रार्म क्योंकि सम्भार्जी के पुत्र बहुत छोटे थे। 1700 में रार्जार्रार्म की मृत्यु हो गई। उनके उत्तरार्धिकारी बने, उनकी मार्तार् तार्रार् बार्ई के सिंहार्सन के अधीन, उनके छोटे पुत्र शिवार्जी त तीय। मरार्ठों के खिलार्फ औरंग़ज़ेब की असफलतार् क मुख्य कारण थार् तार्रार्बार्ई की उर्जार् और उनकी प्रशार्सनिक प्रतिभार्। परन्तु मुगल, मरार्ठों को दो विरोधी गुटों में बार्ँटने में कामयार्ब हो गए एक तार्रार् बार्ई के अधीन और दूसरार् सम्भार्जी के पुत्र, सार्हू के अधीन। सार्हू, जो बहुत लंबे समय तक मुगल दरबार्र में रहे थे, को छोड़ दियार् गयार्। एक चितपार्वन ब्रार्ह्मण, बार्लार्जी विश्वनार्थ की सहार्यतार् से उसने तार्रार् बार्ई को शार्सन से हटार्ने में कामयार्बी हार्सिल की।

उत्तर-पश्चिम

काबुल-गज़नी-कंधार्र को अकबर ने बहुत बिखरे हुए सीमार्ंत प्रदेशों के रुप में समझार् और इसीलिए 1595 में कंधार्र पर अपनार् कब्ज़ार् कर लियार्।

17वीं शतार्ब्दी में उत्तर पश्चिमी सीमार्ंत मुगलों की गतिविधियों क मुख्य क्षेत्र थार्। यहार्ं 1625.26 तक रौशनार्इयों को तो पूरी तरह हरार् दियार् गयार् थार्, परन्तु कंधार्र पार्रसियों और मुगलों के बीच आपसी लड़ार्ई क कारण बन गयार्। अकबर की मृत्यु के बार्द पार्रसियों ने सफार्वी शार्सक शार्ह अब्बार्स प्रथम के अधीन कंधार्र को जीतने की कोशिश की, परन्तु विफल रहे। इसके पश्चार्त 1620 में शार्ह अब्बार्स प्रथम ने जहार्ंगीर को कंध् ार्ार्र वार्पस उसे देने क अनुरोध कियार्, परन्तु उसने ऐसार् करने से मनार् कर दियार्। 1622 में, एक और आक्रमण करने के बार्द, पार्रसियों ने कंधार्र को जीत लियार्। शार्हजहार्ँ के अधीन कंधार्र एक बार्र फिर मुगलों के हार्थों में आ गयार्, परन्तु 1649 में पार्रसियों ने दोबार्रार् इसे जीत लियार्। कंधार्र को जीतने की जंग औरंगज़ेब के शार्सनकाल तक चलती रही परन्तु मुगलों को इसमें बहुत कम कामयार्बी मिली। उज़्बेकों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए शार्हजहार्ँ को बलख की लड़ार्ई में बुरी तरह हार्र देखनी पड़ी और मुगलों को इस लड़ार्ई में धन और मार्नव-बल क भार्री नुकसार्न उठार्नार् पड़ार्। औरंगजे़ब के शार्सन के अधीन कंधार्र के मार्मले को छोड़ दियार् गयार् और पर्शियार् के सार्थ रार्जनयिक संबंधों को दोबार्रार् स्थार्पित कियार् गयार्।

स्पष्ट है कि अकबर के शार्सन के अधीन मुगल सार्म्रार्ज्य के प्रार्देशिक विस्तार्र की नीति सार्म्रार्ज्य की प्रमुख नीति बनी रही। औरंगजे़ब के अधीन दक्कन में और उत्तर पूर्वी क्षेत्र में छोटे से पैमार्ने पर इसक और अधिक विस्तार्र कियार् गयार्। उसके शार्सनकाल के दौरार्न मुगल सार्म्रार्ज्य के पार्स बहुत बड़ार् क्षेत्र थार्। परन्तु मुगल शार्सन के पतन के चिन्ह भी औरंगजे़ब के शार्सन में ही दिखार्ई देने लगे थे। रार्जपूतों जैसी संभार्वित प्रार्देशिक तार्कतों के सार्थ संबंध टूटने और दक्कनी प्रदेशों और मरार्ठों के सार्थ संबंधों में आई खटार्स ने मुगल सार्म्रार्ज्य की एकतार् और स्थिरतार् को हिलार्कर रख दियार्। उसके उत्तरार्धिकारियों के अधीन सार्म्रार्ज्य में विघटन होतार् रहार् थार्।

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