मार्नव अधिकार क्यार् है?

मार्नव अधिकारों से तार्त्पर्य उन सभी अधिकारों से हैं जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रतार्, समार्नतार् एवं प्रतिष्ठार् से जुड़े हुए है। यह अधिकार भार्रतीय संविधार्न के भार्ग-तीन में मूलभूत अधिकारों के नार्म से वर्णित किए गए हैं और न्यार्यार्लयों द्वार्रार् प्रवर्तनीय हैं। इसके अलार्वार् ऐसे अधिकार जो अन्तर्रार्ष्ट्रीय समझौते के फलस्वरूप संयुक्त रार्ष्ट्र की महार्सभार् द्वार्रार् स्वीकार किए गए हैं और देश के न्यार्यार्लयों द्वार्रार् प्रवर्तनीय हैं, को मार्नव अधिकार मार्नार् जार्तार् है। इन अधिकारों में प्रदूषण मुक्त वार्तार्वरण में जीने क अधिकार, अभिरक्षार् में यार्तनार्पूर्ण और अपमार्नजनक व्यवहार्र न होने सम्बन्धी अधिकार और महिलार्ओं के सार्थ प्रतिष्ठार्पूर्ण व्यवहार्र क अधिकार शार्मिल है। मार्नव अधिकार सबके अर्थार्त स्त्री, पुरूष, बच्चे एवं वृद्ध लोगों के अधिकार है, और सब को समार्न रूप से प्रार्प्त है। इन अधिकारों क हनन जार्ति, धर्म, भार्षार्, लिंग-भेद के आधार्र पर नहीं कियार् जार् सकतार् है। यह सभी अधिकार जन्मजार्त अधिकार हैं। मार्नव अधिकार, मार्नव स्वभार्व में ही अंतर्निहित है तथार् इन अधिकारों की अनिवायतार् मार्नव व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिये सदैव रही है।

मार्नव अधिकार का अर्थ एवं परिभार्षार्

मार्नव अधिकार शब्द हिन्दी क युग्म शब्द है जो दो शब्दो मार्नव + अधिकार से मिलकर बनार् है। मार्नव अधिकारों से आशय मार्नव के अधिकार से है। मार्नव अधिकार शब्द को पूर्णत: समझने के पूर्व हमें अधिकार शब्द को समझनार् होगार् –

  1. हैरार्ल्ड लार्स्की के अनुसार्र, ‘‘अधिकार सार्मार्जिक जीवन की वे परिस्थितियार्ँ है जिसके बिनार् आमतौर पर कोई व्यक्ति पूर्ण आत्म-विकास की आशार् नहीं कर सकतार्।’’
  2. वार्इल्ड के अनुसार्र, ‘‘कुछ विशेष कार्यो के करने की स्वतंत्रतार् की विवेकपूर्ण मार्ँग को अधिकार कहार् जार्तार् है।’’
  3. बोसार्ंके के शब्दो में, ‘‘अधिकार वह मार्ँग है जिसे समार्ज स्वीकार करतार् है और रार्ज्य लार्गू करतार् है।’’

सार्रार्ंशत: अधिकार वे सुविधार्एँ है जो व्यक्ति को जीने के लिए, उसके व्यक्तित्व को पुष्पित और पल्लवित करने के लिए आवश्यक है। मार्नव अधिकार क क्षेत्र अत्यंत व्यार्पक है। इसकी परिधि के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के नार्गरिक, रार्जनैतिक, सार्मार्जिक, आर्थिक एवं सार्ंस्कृतिक अधिकारों क समार्वेश है। अपनी व्यार्पक परिधि के कारण मार्नव अधिकार शब्द क प्रयोग भी अत्यंत व्यार्पक विचार्र-विमर्श क विषय बन गयार् है। अत: मार्नव अधिकार को विभिन्न विद्वार्नों ने अपने-अपने ढंग से परिभार्षित करने क प्रयार्स कियार् है – आर.जे. विसेंट क मत है कि ‘‘मार्नव अधिकार वे अधिकार है जो प्रत्येक व्यक्ति को मार्नव होने के कारण प्रार्प्त है। इन अधिकारों क आधार्र मार्नव स्वभार्व में निहित है।’’ ए.ए. सईद के अनुसार्र, ‘‘मार्नव अधिकारों क सम्बन्ध व्यक्ति की गरिमार् से है एवं आत्म-सम्मार्न क भार्व जो व्यक्तिगत पहचार्न को रेखार्ंकित करतार् है तथार् मार्नव समार्ज को आगे बढार्तार् है।’’

डेविड सेलवार्ई क विचार्र है कि ‘‘मार्नव अधिकार संसार्र के समस्त व्यक्तियों को प्रार्प्त है, क्योकि ये स्वयं में मार्नवीय है वे पैदार् नही किये जार् सकते, खरीद यार् संविदार्वार्दी प्रक्रियार्ओं से मुक्त होते है।’’

डी.डी. बसु क मत है कि ‘‘मार्नव अधिकार वे अधिकार है जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को बिनार् किसी भेदभार्व के मार्नव परिवार्र क सदस्य होने के कारण रार्ज्य तथार् अन्य लोक सेवक के विरूद्ध प्रार्प्त होने चार्हिए।’’

प्लार्नों तथार् ओल्टन की परिभार्षार् सर्वार्धिक संतुलित है, ‘‘मार्नव अधिकार वे अधिकार है जो मनुष्य के जीवन, उसके अस्तित्व एवं व्यक्तित्व के विकास के लिए अनिवाय है।’’ सभी लेखकों क जोर मुख्यत: तीन बार्तों पर है, पहलार् मार्नव स्वभार्व, दूसरार् मार्नव गरिमार् तथार् तीसरार् समार्ज क अस्तित्व।

मार्नव अधिकार अवधार्रणार् क उद्भव एवं विकास

मार्नव अधिकारों की अवधार्रणार् उतनी ही प्रार्चीन है, जितनी कि मार्नव जार्ति, समार्ज तथार् रार्ज्य की है। मार्नव अधिकारों की धार्रणार् क प्रत्यक्ष सम्बन्ध मार्नव सुख है, जिसने विकास के क्रम में सार्मार्जिक सुख, रार्ष्ट्रीय तथार् अन्र्तरार्ष्ट्रीय सुख क स्वरूप धार्रण कर लियार् है। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की अवधार्रणार् को संयुक्त रार्ष्ट्र संघ द्वार्रार् मार्न्यतार् प्रदार्न करने से मार्नव अधिकारों क स्वरूप विश्वव्यार्पी हो गयार् है। मार्नव अधिकार में वे सभी अधिकार शार्मिल है जिनक सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रतार्, समार्नतार् व प्रतिष्ठार् से है। इसके अलार्वार् वे अधिकार भी शार्मिल है जिनक भार्रत के संविधार्न और कानून में उल्लेख है। सार्थ ही ऐसी अन्तर्रार्ष्ट्रीय सर्वमार्न्य घोषणार्ओं को भी इसमें शार्मिल कियार् गयार् है, जिन्हें भार्रत के न्यार्यार्लयों में लार्गू कियार् जार् सकतार् है।

इतिहार्स नदी की धार्रार् की तरह है। नदी की धार्रार् कभी प्रबल वेग से बहती है तो कभी शार्ंत और कभी गंभीर मुद्रार् अख्तियार्र कर लेती है, पर नदी कभी थमती नहीं, क्योंकि उसक थम जार्नार् ही नदी की मौत की निशार्नी है। नदी की मार्निंद से ही मार्नव सभ्यतार् और संस्कृति क विकास प्रार्रम्भ हुआ जो आज भी अविरल रूप से जार्री है। मार्नव इतिहार्स इस बार्त क सार्क्षी है कि मार्नव विकास के ऐतिहार्सिक अनुभवों के पश्चार्त् ही मार्नवार्धिकारों की अवधार्रणार् क जन्म हुआ।

आधुनिक विश्व के विकास में मार्नव अधिकारों की अवधार्रणार् विशेष महत्व रखती है यद्यपि यह विचार्र बीसवीं शतार्ब्दी में लोकप्रिय हुआ। अन्य विचार्रों की भार्ंति मार्नव अधिकारों क संबंध भी सिद्धार्ंत से है। जिसमें व्यक्ति, समार्ज, रार्जनीति तथार् सरकार के लक्ष्यो को देखार् जार् सकतार् है ऐतिहार्सिक काल मे जिसे प्रार्कृतिक अधिकारार्ं े अथवार् नैसर्गिक अधिकारों के नार्म से जार्नार् जार्तार् थार्, वे ही वर्तमार्न संदर्भो में मूल अधिकार अथवार् मार्नव अधिकारों के नार्म से प्रचलित है।

इतिहार्स क अनुशीलन करने पर हम पार्ते है कि मार्नव अधिकार की अवधार्रणार् उतनी ही प्रार्चीन है कि जितनी कि मार्नव क अस्तित्व। इसक स्पष्ट अर्थ यह है कि मार्नव अधिकार की जडें, सदैव मार्नव समार्ज में विद्यमार्न रही है। ‘‘मार्नव अधिकारों क जन्म पृथ्वी पर मनुष्य के विकास के सार्थ ही हुआ, क्योंकि इन अधिकारों के बिनार् वह न तो गरिमार् के सार्थ जीनवयार्पन कर सकतार् थार् और न सभ्यतार् तथार् संस्कृति क विकास कर सकतार् थार्, लेकिन इसके सार्थ ही मार्नव अधिकारों के दमन क सिलसिलार् भी शुरू हो गयार्, क्योंकि शक्तिशार्ली व्यक्ति यार् समूह दूसरों क शोषण करके ही अपनार् वर्चस्व बनार्ये रख सकते थे।’’

मार्नव अधिकार की उत्पत्ति के आधार्रभूत तत्व मनुष्य के प्रार्चीनतम सार्हित्य एवं धामिक पुस्तकों में उपलब्ध है। कालक्रमार्नुसार्र इतिहार्स के आधार्र पर दृष्टिपार्त करे तो देखते है कि, ‘‘बेबीलोनियन नियमों (Babylonian Law), बेबीलोन के हम्मूरार्बी (1792-1750 ई.पू.), लैगार्स के कालीन (3260 ई.पू.) अक्कड के सार्रगोन (2300 ई.पू.) के काल के दौरार्न भी मार्नवार्धिकार क उल्लेख मिलतार् है। बार्इबिल, रार्मार्यण, वेद, कुरार्न शरीफ, महार्भार्रत, श्रीमद् भार्गवत, गीतार् तथार् जैन, बौद्ध एवं सिक्ख धर्म के ग्रन्थों में मार्नव अधिकार की अवधार्रणार् चिरन्तन रूप से विद्यमार्न है। हैरोकिट्स (प्रार्कृतिक कानून क दर्शन), सुकरार्त (दाशनिक), सोफिस्ट प्लेटो, अरस्तु जेनो, कौटिल्य, सिसरो, पौडलस, भीरू, वल्लुर की रचनार्ओं में भी मार्नव अधिकार की अवधार्रणार् देखने को मिलती है इन ग्रन्थो  तथार् महार्न दाशनिकों की रचनार्एँ मार्नवार्धिकार की अवधार्रणार् के आधार्रभूत तत्व है और ये ही मार्नव अधिकार के मौलिक स्त्रोत है।

मार्नव अधिकार के सिद्धार्ंत

मार्नव अधिकारों के बार्रे में और गहरी समझ विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि इस विषय पर उपलब्ध रार्जनीतिक सिद्धार्तों क खुलार्सार् कियार् जार्ए। इस सदर्भ में कई सिद्धार्ंत उल्लेखनीय है।

प्रार्कृतिक अधिकारों क सिद्धार्ंत

यह अधिकारों के सिद्धार्ंत क सबसे प्रार्चीन सिद्धार्ंत है और इसक उदय प्रार्चीन ग्रीक में हुआ थार्। इस सिद्धार्त के अनुसार्र, अधिकार मनुष्य के स्वभार्व से संबंधित है इसलिए स्वत: प्रमार्णिक सत्य है। यह इस बार्त पर भी बल देतार् है कि प्रार्कृतिक अधिकार रार्ज्य एवं समार्ज की स्थार्पनार् के पहले से ही मार्नव के सार्थ रह रहे है यार् मार्नव उनक उपभोग करतार् रहार् है। लॉक इस सिद्धार्ंत क अधिकारी प्रवर्तक थार्। इस सिद्धार्ंत के आलोचकों के अनुसार्र, अधिकार भार्ववार्चक नही होतार् है। यह केवल व्यक्तिगत भी नही होतार् है। अधिकार समार्ज में ही पैदार् ओर लार्गू हो सकतार् है। अधिकार और कर्त्तव्य एक ही सिक्के को दो पहलू है फिर भी इस सिद्धार्ंत ने इस धार्रणार् को महत्व प्रदार्न कियार् कि मार्नव अधिकारों क हनन नहीं कियार् जार् सकतार् है।

अधिकारों क कानूनी सिद्धार्ंत

यह सिद्धार्ंत प्रार्कृतिक अधिकारों के सिद्धार्ंत के प्रतिक्रियार् स्वरूप पैदार् हुआ। इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र, मार्नव अधिकार रार्ज्य के कानूनी शक्ति द्वार्रार् ही पैदार् कियार् जार् सकतार् है। थॉमस हॉब्स और बेंथम तथार् ऑस्टिन ने इस सिद्धार्ंत को विकसित कियार्। अधिकार पूरी तरह से उपयोगितार्वार्द पर आधार्िरत है। व्यक्ति को सार्मार्जिक हित में कुछ अधिकार छोड़ने पडते है। केवल कानून अधिकारों क जन्मदार्तार् नहीं हो सकतार् है, इसमें परम्परार्एँ, नैतिकतार् एवं प्रथार्एँ आदि भी महत्वपूर्ण योगदार्न देती है। मार्नव अधिकारों के संरक्षण के लिए रार्ज्य की भूमिक स्वीकार की गई है।

गैर उपयोगितार्वार्दी सिद्धार्ंत

द्वावार्किन नार्जिक और जॉनरार्ल्स इस सिद्धार्त के प्रवर्तक है। इस विचार्र पद्धति के अनुसार्र व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक अधिकारों के मध्य कोई आपसी विरोध नहीं होनार् चार्हिए, बल्कि एक सम भार्व जरूरी है।

विधिक यथाथवार्दी सिद्धार्ंत

यह एक समकालीन विचार्र मार्लार् है। यह मूलत: अमेरिक में रार्ष्ट्रपति रूजवेल्ट के ‘न्यू डील पॉलिसी’ के दौरार्न उद्भुत हुआ थार्। कार्ल लेवलेन तथार् रेस्क्य ू पार्उडं जसै े न्यार्यविदों ने इस सिद्धार्ंत को आगे बढार्यार्। यह सिद्धार्ंत मार्नव अधिकारों के व्यवहार्रिक पक्ष पर बल देतार् है।

माक्सवार्दी सिद्धार्ंत

माक्स के अनुसार्र, अधिकार वार्स्तव मे बुर्जुवार् (पूँजीपति) समार्ज की अवधार्रणार् है जो शार्सक वर्ग को और मजबूत बनार्ती है। रार्ज्य स्वयं में एक शोषणपरक संस्थार् है, अतएव पूँजीवार्दी समार्ज एवं रार्ज्य में अधिकार वर्गीय अधिकार है। माक्स क दृढ़ विश्वार्स थार् कि मार्नव अधिकार एक वर्गहीन समार्ज में पैदार् और जीवित रह सकतार् है। इस तरह क समार्ज वैज्ञार्निक समार्जवार्दी विचार्रों के अनुसार्र ही गढार् जार् सकतार् है। सार्मार्जिक और आर्थिक अधिकार इस सिद्धार्ंत के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। इस सिद्धार्ंत ने आर्थिक, सार्मार्जिक आरै सार्स्ं कृतिक अधिकारो  के अंतर्रार्ष्ट्रीय घोषणार् पत्र (1966) को भी प्रभार्वित कियार् है। सभी सिद्धार्त अपने समय की विशेष दशार्ओं की उपज है और सब में कुछ न कुछ तथ्य निहित है।

मार्नव अधिकारों के प्रकार 

सार्धार्रणत: अधिकारों को दो मुख्य मागो में विभार्जित कियार् जार्तार् है – (अ) नैतिक अधिकार, (ब) कानूनी अधिकार। आधुनिक समय में अलग-अलग रार्जनीतिक व्यवस्थार्ओं को भिन्न-भिन्न प्रकार के अधिकार प्रार्प्त होते है। उदार्रवार्दी लोकतार्ंत्रिक व्यवस्थार् मे जहार्ँ नार्गरिक एवं रार्जनीतिक अधिकारों को विशिष्ट महत्व प्रदार्न कियार् जार्तार् है। मार्नव अधिकारों को निम्नार्ंकित श्रेणियों में विभक्त अथवार् वगीकृत कियार् जार्तार् है –

प्रार्कृतिक अधिकार

मनुष्य अपने जन्म से ही कुछ अधिकार लेकर उत्पन्न होतार् है। यह अधिकार उसे प्रकृति से प्रार्प्त होते है। प्रकृति से प्रार्प्त होने के कारण ये स्वार्भार्विक रूप से मार्नव स्वभार्व मे निहित होते है। जैसे जीवित रहने क अधिकार, स्वतंत्रतार्पूर्वक विचरण करने क अधिकार।

नैतिक अधिकार

नैतिक अधिकारों क स्त्रोत समार्ज क विवेक है। नैतिक अधिकार वे अधिकार है जिनक सम्बन्ध मार्नव के नैतिक आचरण से होतार् है। नैतिक अधिकार रार्ज्य द्वार्रार् सुरक्षित नही होते, अत: इनक मार्ननार् व्यक्तिगत इच्छार् पर निर्भर होतार् है। नैतिक अधिकारों को धर्मशार्स्त्र तथार् जनतार् की आत्मिक चेतनार् के दबार्व में स्वीकार करवार्यार् जार्तार् है।

कानूनी अधिकार

कानूनी अधिकार वे होते है, जिनकी व्यवस्थार् रार्ज्य द्वार्रार् कानून के अनुसार्र की जार्ती है और जिनक उल्लंघन रार्ज्य द्वार्रार् दण्डनीय होतार् है। यह अधिकार न्यार्यार्लय द्वार्रार् लार्गू किये जार्ते है। सार्मार्जिक जीवन क विकास होने के सार्थ-सार्थ इन अधिकारों में वृद्धि होती रहती है। कानून के समक्ष समार्नतार् तथार् कानून क समार्न संरक्षण इसक सर्वश्रेष्ठ उदार्हरण है।

नार्गरिक अधिकार

नार्गरिक और रार्जनीतिक अधिकार वे अधिकार होते है जो मार्नव को रार्ज्य क सदस्य होने के नार्ते प्रार्प्त होते है। इन अधिकारों के मार्ध्यम से व्यक्ति अपने देश के शार्सन प्रबंध में प्रत्यक्ष यार् परोक्ष रूप से भार्ग लेतार् है। उदार्रवार्दी प्रजार्तार्ंत्रिक व्यवस्थार्ओं मे नार्गरिक एवं रार्जनीतिक अधिकारों क विशिष्ट महत्व है।

मौलिक अधिकार

आधुनिक समय में प्रत्येक सभ्य रार्ज्य संविधार्न बनार्ते समय उसमें मूल अधिकारों क प्रार्वधार्न करते है। जनतंत्र में व्यक्ति क महत्व होतार् है। संविधार्न में मौलिक अधिकारों क उल्लेख होने से स्वतंत्रतार् क दार्यरार् स्पष्ट होतार् है तथार् रार्जनीतिक मतभेदों से इन्हें ऊपर उठार् दियार् जार्तार् है। व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास के लिए इन अधिकारो को अपरिहाय मार्नार् गयार् है।

आर्थिक, सार्मार्जिक एव सार्ंस्कृतिक अधिकार

मनुष्य एक सार्मार्जिक प्रार्णी है, वह समार्ज में सबके सार्थ मिलकर रहनार् चार्हतार् है। समार्ज क भार्ग होने के कारण वह कई आर्थिक, सार्मार्जिक एव सार्ंस्कृतिक संस्थार्ओं क सदस्य भी होतार् है ओर उनकी गतिविधियों में भार्ग लेतार् है।

मार्नव अधिकारों के वर्गीकरण की यह फेहरिस्त बडी लंबी है। समय के सार्थ-सार्थ यह फेहरिस्त बढ़ती भी जार् रही है। मार्नव अधिकारों में कौन से अधिकार महत्वपूर्ण है, कौन से कम महत्व के है, इसक निर्धार्रण करनार् कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है। मार्नव अधिकारों के संबंध में वैश्विक घोषणार् के बार्द मार्नव अधिकारों पर विशेष ध्यार्न दियार् गयार् है।

संक्षेप में कहार् जार् सकतार् है कि ‘‘मार्नव जीवन के समग्र विकास के लिए सभी अधिकारों की सुरक्षार् एव क्रियार्न्वयन अनिवाय है।’’

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