महिलार् सशक्तिकरण के उपार्य

महिलार् सशक्तीकरण के उपार्य 

1. विशेष विवार्ह अधिनियम, 1954

विशेष विवार्ह अधिनियम, 1954 बिनार् किसी धामिक महत्व के विवार्ह के संबंध में उपबन्ध करतार् है। अधिनियम की धार्रार् 4 के अनुसार्र किसी भी धर्म के दो वयस्क व्यक्ति विवार्ह कर सकते हैं बशर्ते कि पक्षकार प्रतिषिद्ध नार्तेदार्री की डिग्रियों के भीतर नहीं है यार् किसी दूसरे धामिक संस्कारों के भीतर किसी अन्य व्यक्ति के सार्थ उनक विवार्ह न हुआ हो यार् जीवित पति/पत्नी विवार्ह के समय न हो।

अधिनियम की धार्रार् 5 के अनुसार्र पक्षकारों को विवार्ह करने के लिए उस जिले के विवार्ह अधिकारी (Marriage Officer) को लिखित रूप से सूचनार् देनी होगी जिसमें कम से कम एक पक्षकार 30 दिन अथवार् अधिक अवधि से रह रहार् हो। उक्त नोटिस विवार्ह पंजीकरण कार्यार्लय (Marriage Registry Office) में प्रमुख स्थार्न पर चस्पार् कर दी जार्ती है। चस्पार् करने की तिथि के बार्द 30 दिन से पहले विवार्ह तथार् उसक पंजीकरण नहीं होगार् परन्तु 3 मार्ह के अन्दर हो जार्नार् चार्हिए। विवार्ह अधिकारी द्वार्रार् विवार्ह क पंजीकरण 3 (तीन) गवार्हों की उपस्थिति में कियार् जार्तार् है तथार् विवार्ह प्रमार्ण पत्र संबंधित पति-पत्नी को निर्गत कर दियार् जार्तार् है। अधिनियम की धार्रार् 7 के अनुसार्र सूचनार् के 30 दिवस के दौरार्न कोर्इ व्यक्ति विवार्ह होने के संबंध में आपत्ति कर सकतार् है यदि अधिनियम में उल्लिखित आधार्रों पर विवार्ह अवैध हो। ऐसी आपत्ति के सत्य पार्ये जार्ने पर विवार्ह अधिकारी विवार्ह सम्पार्दन के लिए इन्कार कर सकतार् है।

2. विदेशी विवार्ह अधिनियम, 1969

अधिनियम की उद्देशिक से ज्ञार्त होतार् है कि भार्रतीय नार्गरिकों के भार्रत के बार्हर होने वार्ले विवार्हों के संबंध में यह अधिनियम उपबन्ध करतार् है। इस अधिनियम के प्रख्यार्पन (Promulgation) के पूर्व ऐसे विवार्ह विशेष विवार्ह अधिनियम 1954 (Special Marriage Act, 1954) के उपबन्धों के अधीन होते थे। उस समय भी ऐसे विवार्ह के सभी पहलुओं के संबंध में अधिनियम में प्रार्वधार्न नहीं थार् अत: उस समय भी कुछ अनिश्चिततार्यें थीं। अनिश्चिततार्ओं को दूर करने के लिए एक व्यार्पक कानून की आवश्यकतार् थी, अत: अधिनियम पार्रित कियार् गयार्। यह अधिनियम भार्रत से बार्हर होने वार्ले ऐसे विवार्ह जिनमें दोनों पक्षकार भार्रतीय हों यार् कम से कम एक पक्षकार भार्रतीय हो, से संबंधित विधि को अधिक्रार्न्त न करके बल्कि अनुपूर्ति (Supplement) करतार् है।

3. विवार्ह विधि (संशोधन) अधिनियम,  1976 

यह संशोधन अधिनियम हिन्दू विवार्ह अधिनियम 1955 तथार् विशेष विवार्ह अधिनियम 1954 के उपबन्धों में और अधिक सुधार्र लार्ने के आशय से पार्रित कियार् गयार् थार्।

हिन्दू विवार्ह अधिनियम 1955 के बहुत से उपबन्ध पूरी तरह से संशोधित कर दिये गये हैं जिससे कि हिन्दुओं के विवार्ह एवं विवार्ह विच्छेद संबंधी समस्यार्ओं के निरार्करण में सुविधार् मिलेगी। संशोधन हो जार्ने से विवार्ह विच्छेद संबंधी कार्यवार्ही में कम समय लगतार् है। निम्नलिखित संशोधन स्त्रियों के सशक्तीकरण को केन्द्र में रखकर किए गए हैं।

  1. न्यार्यिक पृथक्करण के लिए उपलब्ध सभी आधार्र अब विवार्ह विच्छेद के लिए भी उपलब्ध हैं। अब एक हिन्दू अभित्यजन यार् क्रूरतार् के आधार्र पर विवार्ह विच्छेद की डिक्री के लिए दार्वार् कर सकतार् है। 
  2. पति यार् पत्नी में से किसी ने भी यदि किसी अन्य व्यक्ति (स्त्री यार् पुरुष) के सार्थ केवल एक बार्र भी स्वेच्छयार् मैथुन कियार् है तो यह विवार्ह विच्छेद क आधार्र होगार्। 
  3. अब वह पत्नी जिसको कि किसी अन्य विधि के अन्तर्गत भरण-पोषण प्रार्प्त करने क आदेश प्रार्प्त हो गयार् है, भी विवार्ह-विच्छेद की डिक्री प्रार्प्त कर सकती है। 
  4. पार्रस्परिक सहमति के आधार्र पर विवार्ह विच्छेद क उपबन्ध कियार् गयार् है, इस आधार्र पर विवार्ह विच्छेद की डिक्री प्रार्प्त करने के लिए पक्षकारों को यार्चिक दार्यर करने के उपरार्न्त केवल छ: मार्ह प्रतीक्षार् करनी है। यद्यपि 18 मार्ह व्यतीत होने के पहले विवार्ह विच्छेद की डिक्री प्रार्प्त हो जार्नी चार्हिये। 
  5. तार्त्विक तथ्यों (Material Facts) के बार्रे में किसी प्रकार क दुव्र्यपदेशन (Misrepresentation) हिन्दू विवार्ह को शून्य घोषित करार्ने के लिए एक अन्य आधार्र है। 
  6. एक अवयस्क लड़की अपनार् विवार्ह 15 वर्ष की आयु प्रार्प्त करने के उपरार्न्त लेकिन 18 वर्ष की आयु प्रार्प्त करने से पहले निरार्कृत (Repudiate) कर सकती है 
  7. यदि दूसरार् पक्षकार यार् तो भार्रत के बार्हर रहतार् है यार् सार्त वर्ष यार् उससे अधिक समय तक उसके बार्रे में पतार् नहीं चलतार् है तो ऐसे मार्मलों में अधिनियम के अन्तर्गत यार्चिक उस क्षेत्र में न्यार्यार्लय में दार्खिल की जार् सकती है जहार्ँ पर यार्ची निवार्स करतार् है। 
  8. विवार्ह संबंधी यार्चिक के शीघ्र निस्तार्रण हेतु उपबन्ध कियार् गयार् है कि छ: मार्ह की अवधि के अन्दर निस्तार्रण हो जार्नार् चार्हिए तथार् अपील क निस्तार्रण उसके बार्द 3 मार्ह के अन्दर हो जार्नार् चार्हिए। 
  9. अब विवार्ह विच्छेद के बार्द पति यार् पत्नी तुरन्त पुनर्विवार्ह कर सकते हैं।
  10. न्यार्यिक पृथक्करण के उपरार्न्त विवार्ह विच्छेद हेतु यार्चिक दार्यर करने के लिए दो वर्ष से कम करके एक वर्ष की अवधि कर दी गर्इ है।
  11. पति यार् पत्नी अपने विवार्ह से एक वर्ष बार्द ही विवार्ह विच्छेद हेतु यार्चिक दार्यर कर सकते हैं। 
  12. प्रत्येक विवार्ह संबंधी मार्मलों की सुनवाइ बन्द कमरे में होगी। ख्धार्रार् 22,

4. दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961

 इस अधिनियम के अन्तर्गत दहेज लेनार् और देनार् दोनों ही प्रतिषेधित है। अधिनियम की धार्रार् 2 के अनुसार्र ‘दहेज’ क अभिप्रार्य विवार्ह के एक पक्ष द्वार्रार् दूसरे पक्ष के लिए यार् विवार्ह के किसी पक्ष के मार्तार्-पितार् यार् अन्य व्यक्ति द्वार्रार् विवार्ह के दूसरे पक्ष यार् किसी अन्य व्यक्ति के लिए विवार्ह करने के संबंध में दी जार्ने वार्ली किसी सम्पत्ति यार् मूल्यवार्न प्रतिभूति से है। चार्हे यह सम्पत्ति यार् मूल्यवार्न प्रतिभूति विवार्ह के समय यार् उसके पूर्व यार् पश्चार्त् किसी भी समय दी गर्इ हो, परन्तु दहेज की परिधि में आन के लिए आवश्यक है कि यह विवार्ह के संबंध में दी गर्इ हो। इसमें तीसरार् अवसर ‘विवार्ह के बार्द किसी समय’ कभी न समार्प्त होने वार्ली अवधि प्रतीत होती है परन्तु यहार्ँ पर शब्द ‘कथित पक्षों के विवार्ह के संबंध में’ निर्णार्यक हैं। अत: पार्रम्परिक भुगतार्न जैसे बच्चे के जन्म यार् दूसरे समार्रोहों में जो कि विभिन्न समार्जों में दिये जार्ते हैं, ‘दहेज’ की परिधि में नहीं आते।

अधिनियम की धार्रार् 3(1) के अनुसार्र जो कोर्इ भी दहेज देतार् है यार् लेतार् है अथवार् लेने यार् देने के लिए दुष्पे्ररित करतार् है, तो वह ऐसी अवधि के कारार्वार्स से जो पार्ँच वर्ष की होगी और 15,000 रुपयों यार् ऐसे दहेज के मूल्य की रकम के जो भी अधिक हों, हो सकने वार्ले जुर्मार्ने से दण्डित कियार् जार्येगार्। अधिनियम की धार्रार् 3(1) के अनुसार्र न्यार्यार्लय यथोचित और विशेष कारणों से पार्ँच वर्ष से कम की अवधि के कारार्वार्स क दण्ड दे सकतार् है। धार्रार् 4 के अनुसार्र यदि कोर्इ व्यक्ति प्रत्यक्षत: यार् परोक्षत: वर यार् वधू के मार्तार्-पितार् यार् अन्य रिश्तेदार्रों से दहेज मार्ँगतार् है तो वह छह मार्स से दो वर्षों तक के कारार्वार्स और 10,000 रुपयों के जुर्मार्ने से दण्डित कियार् जार् सकतार् है।

क्योंकि धार्रार् 3(1) के अनुसार्र दहेज लेने और देने वार्ले दोनों ही पक्षों को सजार् दी सकती है अत: दहेज के संबंध में प्रार्य: शिकायत नहीं की जार्ती।

धार्रार् 5 के अनुसार्र दहेज देने यार् लेने के लिए किये गये सभी करार्र व्यर्थ होंगे।

धार्रार् 6 के अनुसार्र जब कोर्इ दहेज उस स्त्री के अतिरिक्त, जिसके संबंध में वह प्रार्प्त कियार् गयार् हो, अन्य व्यक्ति द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार्तार् है, तो वह व्यक्ति दहेज उस स्त्री को विवार्ह से तीन मार्स के भीतर हस्तार्न्तरित कर देगार्, यदि दहेज विवार्ह के पूर्व प्रार्प्त कियार् गयार् हो। यदि दहेज विवार्ह के समय यार् विवार्ह के पश्चार्त् अन्य व्यक्ति द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् गयार् हो, तो ऐसी प्रार्प्ति के दिनार्ंक से तीन मार्स के भीतर उस स्त्री को हस्तार्न्तरित कर देगार्। यदि स्त्री अवयस्क हो तो उसके द्वार्रार् 18 वर्ष की आयु पूरी कर लेने के तीन मार्स के भीतर वह अन्य व्यक्ति जिसने दहेज प्रार्प्त कियार् हो, उस स्त्री को हस्तार्न्तरित कर देगार्। इसक उल्लंघन करने पर 6 मार्ह से 2 वर्ष तक के कारार्वार्स यार् 10,000 रुपये तक के जुर्मार्ने यार् दोनों से दण्डित कियार् जार् सकतार् है। न्यार्यार्लय ऐसे मार्मलों में 6 मार्ह के कारार्वार्स के दण्ड को कम नहीं कर सकतार् है।

यदि दहेज प्रार्प्त करने के पूर्व स्त्री की मृत्यु हो जार्ती है, तो उस स्त्री के वार्रिस उस सम्पत्ति को तत्समय धार्रण करने वार्ले व्यक्ति से पार्ने के लिए दार्वार् कर सकते हैं।

धार्रार् 4-क के अनुसार्र यदि कोर्इ व्यक्ति विवार्ह के उपलक्ष्य में अपनी सम्पत्ति में किसी अंश यार् धन यार् दोनों देने हेतु विज्ञार्पन देतार् है तो यह दण्डनीय अपरार्ध है। ऐसे अपरार्ध 6 मार्स से 5 वर्ष तक के कारार्वार्स यार् 15,000 रुपये तक के जुर्मार्ने से दण्डनीय है। परन्तु यथोचित एवं विशेष कारणों से 6 मार्ह से कम कारार्वार्स क दण्ड दियार् जार् सकतार् है। इस अधिनियम के अन्तर्गत अपरार्ध असंज्ञेय तथार् गैर जमनतीय होते हैं। (धार्रार् 8) अधिनियम की धार्रार् 7 के अनुसार्र इस अधिनियम के अन्तर्गत घटित होने वार्ले अपरार्धों को न्यार्यार्लय स्वयं के ज्ञार्न यार् पुलिस रिपोर्ट पर यार् पीड़ित पक्षकार यार् पीड़ित पक्षकार के मार्तार्-पितार् अथवार् अन्य रिश्तेदार्र यार् किसी मार्न्यतार् प्रार्प्त कल्यार्ण संस्थार् यार् संगठन द्वार्रार् किये गये परिवार्द पर संज्ञार्न में ले सकतार् है।

अधिनियम की धार्रार् 6(3) के अनुसार्र विवार्ह के बार्द सार्त वर्ष की अवधि के भीतर यदि अप्रार्कृतिक कारणों से किसी महिलार् की मृत्यु हो जार्ती है तो पति एवं उसके परिवार्र के लोगों को यह सार्बित करनार् पड़ेगार् कि दहेज की मार्ंग के कारण महिलार् की मृत्यु नहीं हुर्इ है। भार्रतीय सार्क्ष्य अधिनियम में भी धार्रार् 114-ए जोड़कर तदनुसार्र परिवर्तन कर दियार् गयार् है। ऐसे मार्मलों में महिलार् की पूरी सम्पत्ति-

  1. यदि वह नि:सन्तार्न है, तो उसके मार्तार्-पितार् को अन्तरित हो जार्येगी; 
  2. यदि उसके सन्तार्न हैं, तो उसकी सन्तार्नों को अन्तरित हो जार्येगी और ऐसे अन्तरण के लम्बित रहने के दौरार्न, सन्तार्नों के लिए न्यार्स में धार्रित की जार्येगी। 

दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धार्रार् 8ख के अन्तर्गत अधिनियम को प्रभार्वी ढंग से लार्गू करने के लिए रार्ज्य सरकार दहेज प्रतिषेध अधिकारी (Dowry Prohibition Officer) नियुक्त कर सकती है, परन्तु कर्इ रार्ज्यों द्वार्रार् उनकी नियुक्ति नहीं की गर्इ है। धार्रार् 8ख(4) के अनुसार्र रार्ज्य सरकार दहेज प्रतिषेध अधिकारियों को उनके कार्यों के प्रभार्वी सम्पार्दन में सलार्ह देने और सहार्यतार् करने के लिए संबंधित क्षेत्र से, अधिक से अधिक पार्ँच सार्मार्जिक कल्यार्ण कार्यकर्तार्ओं (जिसमें कम से कम दो महिलार्यें, होंगी) के सलार्हकार बोर्ड की नियुक्ति करेगी।

5. प्रसूति प्रसुविधार् अधिनियम, 1961 

भार्रतीय संविधार्न द्वार्रार् महिलार्ओं के लिए न केवल लोक नियोजन के विषय में समार्न अवसर, समार्न कार्य के लिये समार्न वेतन आदि क उपबन्ध कियार् गयार् है, बल्कि उनके हित में विशेष उपबन्ध भी किये जार् सकते हैं।

प्रसूति प्रसुविधार् अधिनियम, 1961 की धार्रार् 5(2) के अनुसार्र कोर्इ भी स्त्री प्रसूति प्रसुविधार् की तब तक हकदार्र न होगी, जब तक उसने अपने प्रत्यार्शित प्रसव की तरीख के पूर्ववर्ती बार्रह मार्सों में कम से कम अस्सी दिवस तक किसी स्थार्पन (Organization) में कार्य न कियार् हो।

अधिनियम की धार्रार् 4(1) के अनुसार्र कोर्इ भी नियोजक किसी स्त्री को उसके प्रसव यार् गर्भपार्त यार् गर्भ के चिकित्सीय समार्पन के दिन के ठीक पश्चार्त् (Immediately following) छह सप्तार्ह के दौरार्न किसी स्थार्पन (Establishment) में जार्नते हुए नियोजित नहीं करेगार्। धार्रार् 4(2) के अनुसार्र कोर्इ भी स्त्री अपने प्रसव यार् गर्भपार्त यार् गर्भ के चिकित्सीय समार्पन के दिन के ठीक पश्चार्त् (Immediately following) छह सप्तार्ह के दौरार्न किसी स्थार्पन (Establishment) में काम नहीं करेगी।

धार्रार् 4(3) के अनुसार्र धार्रार् 6 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभार्व डार्ले बिनार् किसी भी गर्भवती स्त्री से उसके द्वार्रार् प्राथनार् किये जार्ने पर, उपधार्रार् (4) में उल्लिखित कालार्वधि के दौरार्न उसके नियोजक द्वार्रार् कोर्इ ऐसार् काम करने की अपेक्षार् नहीं की जार्येगी जो कठिन प्रकृति क हो यार् जिसमें लम्बे समय तक खड़ार् रहनार् पड़े यार् जिससे उसके गर्भवार्तित्व (Pregnancy) यार् भ्रूण (foetus) के प्रसार्मार्न्य विकास (Normal development) में किसी भी प्रकार विघ्न की सम्भार्वनार् हो यार् जिससे उसक गर्भपार्त होने यार् उसके स्वार्स्थ्य पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़ने की सम्भार्वनार् हो।

प्रसूति प्रसुविधार् अधिनियम, 1961 की धार्रार् 5(1) के अनुसार्र, इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, हर स्त्री वार्स्तविक अनुपस्थिति की कालार्वधि के लिए औसत दैनिक मजदूरी (Average dailywage) की दर से प्रसूति प्रसुविधार् की हकदार्र होगी तथार् नियोजक इसके लिए उत्तरदार्यी होगार्। यार्नि कि हर स्त्री अपने प्रसव के दिन के ठीक पूर्व की कालार्वधि, प्रसव के वार्स्तविक दिन तथार् प्रसव के दिन के ठीक वार्द की किसी कालार्वधि के लिए प्रसूति प्रसुविधार् की हकदार्र होगी तथार् नियोजक इसके लिए उत्तरदार्यी होगार्।

धार्रार् 5(3) के अनुसार्र कोर्इ स्त्री अधिकतम बार्रह सप्तार्ह की कालार्वधि के लिए प्रसूति लार्भ की हकदार्र होगी जिसमें से, उसकी अपेक्षित प्रसव (expected delivery) की तिथि के पूर्व की अधिकतम कालार्वधि छह सप्तार्ह होगी। लेकिन यदि कोर्इ स्त्री इस कालार्वधि के दौरार्न मर जार्ये, वहार्ँ प्रसूति प्रसुविधार् उसकी मृत्यु के दिन तक के लिए ही, (जिसके अन्तर्गत मृत्यु क दिन भी सम्मिलित होगार्) संदेय (Payable) होगी। धार्रार् 11 के अनुसार्र हर प्रसूतार् स्त्री को जो प्रसव के पश्चार्त् काम पर वार्पस आती है उस विश्रार्माथ अन्तरार्ल (Interval for rest) के अतिरिक्त जो उसे अनुज्ञार्त (Allow) है, अपने दैनिक काम की चर्यार् में (in the course of her daily work) विहित कालार्वधि (Prescribed duration) के दो विरार्म (Breaks) शिशु के पोषण (Nursing) के लिए तब तक अनुज्ञार्त होंगे, जब तक वह शिशु पन्द्रह मार्स की आयु पूरी न कर लें।

6. महिलार्ओं क अशिष्ट रूपण (निषेध) अधिनियम, 1986

महिलार्ओं क रूपण दो प्रकार से प्रदर्शित कियार् जार्तार् है। एक तरफ उसे सच्चरित्र, सरल एवं आज्ञार्कारी महिलार् के रूप में दिखार्यार् जार्तार् है तथार् दूसरी ओर अशिष्ट एवं सेक्स से संबंधित रूपण कियार् जार्तार् है उसे आज व्यार्वसार्यिक प्रचार्र-प्रसार्र क मार्ध्यम बनार् दियार् गयार् है। मॉडलिंग के नार्म पर अंग प्रदर्शन एक सार्मार्न्य बार्त हो गर्इ है। सौन्दर्य प्रतियोगितार्ओं में नार्रियों को अर्द्धनग्न अवस्थार् में प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। इसके निवार्रण हेतु संसद द्वार्रार् वर्ष 1986 में महिलार्ओं क अशिष्ट रूपण (निषेध) अधिनियम पार्रित कियार् गयार् है। इस अधिनियम के अन्तर्गत महिलार्ओं क किसी भी प्रकार से अशिष्ट रूपण निषेध कियार् गयार् है।

अधिनियम की धार्रार् 2(ग) के अनुसार्र महिलार्ओं क अशिष्ट रूपण (Indecent representation of women) क अर्थ है, स्त्री की आकृति, उसके रूप यार् शरीर अथवार् उसके किसी भार्ग क ऐसी रीति से वर्णन जो उसके शिष्ट होने यार् अल्पीकृत करने पर यार् महिलार्ओं के चरित्र को कलंकित करने के प्रभार्व के रूप में हो यार् जिससे दुरार्चार्र, भ्रष्टार्चार्र यार् लोक दूषण, अथवार् नैतिकतार् को हार्नि पहुँचने की, सम्भार्वनार् हो।

अधिनियम की धार्रार् 4 में दिखाइ देने वार्ले सभी प्रकार के अशिष्ट रूपण को सम्मिलित कियार् गयार् है। जैसे लेखन, पुस्तक, पेपर, स्लाइड, फिल्म आदि। परन्तु ऐसार् रूपण जो धामिक महत्व क हो यार् कलार् अथवार् विज्ञार्न के उद्देश्य से हो ‘अशिष्ट रूपण’ में सम्मिलित नहीं कियार् गयार् है। ऐसार् रूपण जो जन कल्यार्ण के लिए हो यार् शिक्षार् के लिए हो यार् शार्रीरिक चिकित्सार् के लिए हो, ‘अशिष्ट रूपण’ की श्रेणी में नहीं रखार् गयार् है।

अधिनियम की धार्रार् 6 के अनुसार्र, धार्रार् 3 यार् 4 क प्रभम बार्र उल्लंघन करने पर दो वर्ष तक के कारार्वार्स तथार् दो हजार्र रुपये तक के जुर्मार्ने से दण्डित कियार् जार् सकतार् है। धार्रार् 3 यार् 4 क पुन: उल्लंघन करने पर कम से कम छ: मार्स तथार् अधिकतम पार्ँच वर्ष तक के कारार्वार्स से कम से कम दस हजार्र रुपये व अधिकतम एक लार्ख रुपये तक के जुर्मार्ने से दण्डित कियार् जार् सकतार् है।

अधिनियम की धार्रार् 5 के अनुसार्र कोर्इ प्रार्धिकृत रार्जपत्रित अधिकारी उचित समय में ऐसे स्थार्न की तलार्शी ले सकतार् है जहार्ँ पर महिलार्ओं के अशिष्ट रूपण से संबंधित पदाथ मौजूद है। लेकिन वह बिनार् वार्रण्ट के किसी व्यक्तिगत निवार्स गृह में प्रवेश नहीं कर सकतार्। यदि पार्यार् गयार् ऐसार् कोर्इ रिकार्ड, रजिस्टर, दस्तार्वेज यार् अन्य कोर्इ मौलिक पदाथ सार्क्ष्य हो सकतार् है तो वह उसे अभिगृहीत कर सकतार् है और रख सकतार् है जब तक कि इस संबंध में मजिस्ट्रेट से अन्यथार् आदेश प्रार्प्त न हो जार्ये।

इस प्रकार की सार्मग्री के उत्पार्दन, प्रयोग यार् प्रसार्र में संलग्न कोर्इ व्यक्ति यार् कम्पनी अभियोजन हेतु उत्तरदार्यी है। अधिनियम की धार्रार् 8 के अनुसार्र इस प्रकार के अपरार्ध संज्ञेय तथार् जमार्नतीय होंगे।

7. सती (निवार्रण) अधिनियम, 1987

वित्तीय यार् रार्जनीतिक उद्देश्यों के लिए इस प्रकार के आपरार्धिक शोषण के विरुद्ध कार्यवार्ही करने हेतु अधिनियम में उपबन्ध किये गये हैं।

अधिनियम की धार्रार् 4(1) के अनुसार्र यदि कोर्इ स्त्री सती होती है, तब जो कोर्इ ऐसे सती होने क प्रत्यक्षत: यार् अप्रत्यक्ष रूप से दुष्प्रेरण (Abetment) करतार् है, वह मृत्युदण्ड से यार् आजीवन कारार्वार्स से दण्डित कियार् जार्येगार् तथार् जुर्मार्ने से भी दण्डनीय होगार्।

धार्रार् 4(2) के अनुसार्र यदि कोर्इ स्त्री सती होने क प्रयार्स करती है तब जो कोर्इ प्रत्यक्ष यार् अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे प्रयार्स क दुष्पे्ररण करेगार्, वह आजीवन कारार्वार्स से दण्डित कियार् जार्येगार् तथार् जुर्मार्ने से भी दण्डनीय होगार्।

अधिनियम की धार्रार् 2(1)(स) के अनुसार्र ‘‘सती’’ क अर्थ-

  1. विधवार् को उसके मृत पति के शव यार् किसी रिश्तेदार्र के शव यार् किसी वस्तु, पदाथ यार् सार्मग्री, जो उसके पति यार् रिश्तेदार्र से संबंधित हो, के सार्थ जीवित जलार्नार्, यार् गार्ड़नार् है, यार् 
  2. इस तथ्य को बिनार् विचार्र किये कि, ऐसार् गार्ड़नार् यार् जलार्नार्, उस विधवार् यार् स्त्री द्वार्रार् उसकी ओर से स्वैच्छिक है यार् अन्यथार् है, किसी स्त्री को उसके किसी संबंधी के शव के सार्थ गार्ड़नार् यार् जलार्नार् है। 

धार्रार् 2(1)(ब) के अनुसार्र ‘‘गौरवार्न्वित करनार्’’ (गौरव बढ़ार्नार्) क तार्त्पर्य-

  1. सती के संबंध में कोर्इ जुलूस निकालनार् यार् उत्सव मनार्नार्, यार् 
  2. सती प्रथार् को न्यार्योचित ठहरार्नार्, समर्थन करनार् यार् प्रचार्र करनार्, यार् 
  3. जिसने सती की हो, उस व्यक्ति की स्तुति करने हेतु किसी कार्यक्रम क आयोजन करनार्, यार् 
  4. जिसने सती कियार् हो, उसकी स्मृति सुरक्षित रखने यार् उसके सम्मार्न को स्थार्यी बनार्ने के लिए किसी न्यार्स क निर्मार्ण करनार् यार् रार्शि एकत्रित करनार्, यार् किसी मन्दिर क निर्मार्ण करनार् है।

अधिनियम की धार्रार् 7 के अनुसार्र ऐसे सभी मन्दिर हटार्ये जार्ने हैं। धार्रार् 5 के अनुसार्र जो कोर्इ सती क गौरव बढ़ार्ने हेतु कोर्इ कार्य करेगार्, वह एक वर्ष से सार्त वर्ष तक के कारार्वार्स और 5,000 से 30,000 रुपये तक के जुर्मार्ने से दण्डनीय होगार्। सती के नार्म पर एकत्र की गर्इ सभी सम्पत्ति जब्त कर ली जार्येगी।

7. घरेलू हिंसार् अधिनियम, 2005

महिलार्ओं के प्रति उनके कुटुम्ब के भीतर ही होने वार्ली हिंसार् से संरक्षण के लिए घरेलू हिंसार् से महिलार्ओं क संरक्षण अधिनियम, 2005 को पार्रित कियार् गयार् है। अधिनियम की धार्रार् 2 के अन्तर्गत पीड़ित व्यक्ति से तार्त्पर्य किसी ऐसी महिलार् से है जो प्रत्युत्तरदार्तार् की घरेलू रिश्ते में है यार् रही है और जिसक अभिकथन है कि वह प्रत्युत्तरदार्तार् द्वार्रार् किसी घरेलू हिंसार् के अधीन रही है। अधिनियम की धार्रार् 3 के अनुसार्र प्रत्युत्तरदार्तार् क कोर्इ कार्य यार् लोप घरेलू हिंसार् गठित करेगार् यदि वह-

  1. पीड़ित व्यक्ति के स्वार्स्थ्य, सुरक्षार् जीवन अंग की यार् चार्हे उसकी मार्नसिक यार् शार्रीरिक भलाइ की क्षति करतार् है, यार् उसे कोर्इ हार्नि पहँुचार्तार् है यार् उसे संकटयुक्त करतार् है यार् उसकी ऐसार् करने की प्रवृत्ति है और जिसके अन्तर्गत शार्रीरिक दुरुपयोग, लैंगिक दुरुपयोग, मौखिक और भार्वनार्त्मक दुरुपयोग और आर्थिक दुरुपयोग कारित करनार् भी शार्मिल है। 
  2. किसी दहेज यार् अन्य संपत्ति यार् मूल्यवार्न प्रतिभूति के लिए किसी विधि विरुद्ध मार्ंग की पूर्ति के लिए उसे यार् उससे संबंधित किसी अन्य व्यक्ति को प्रपीडित करने की दृष्टि से पीड़ित व्यक्ति क उत्पीड़न करतार् है यार् उसकी अपहार्नि करतार् है यार् उसे क्षति पहँुचार्तार् है यार् संकट में डार्ल देतार् है। यदि कोर्इ महिलार् घरेलू हिंसार् की शिकार है तो उसके निम्न अधिकार होंगे-
    1. धार्रार् 5 के अन्तर्गत उन अधिकारों तथार् उन अनुतोषों के विषय में जार्नकारी के बार्रे में संरक्षणकर्तार् एवं सेवार् प्रदार्तार् की सहार्यतार् कियार् जार्नार् जिसे आप कर सकती हैं। 
    2. सरंक्षण अधिकारी की सहार्यतार् और सेवार् प्रदार्तार् यार् निकटतम पुलिस थार्ने के भार्रसार्धक अधिकारी की शिकायत दर्ज करने सहार्यतार् और धार्रार् 9 और 10 के अनुतोश हेतु आवेदन।
    3. धार्रार् 18 के अन्तर्गत घरेलू हिंसार् के कार्यों से स्वयं यार् स्वयं के बच्चों के लिये सरंक्षण प्रार्प्त करनार्। 
    4. उन खतरों और असुरक्षार्ओं से जिससे आप क बच्चार् सार्मनार् कर रहार् है सरंक्षण, उपार्य और आदेश पार्ने क अधिकार।
    5. धार्रार् 10 के अन्तर्गत उस घर में रहने वार्ली घरेलू हिंसार् क शिकार हुर्इ और उक्त आवार्स में रहने वार्ले व्यक्तियों के हस्तक्षेप में बार्धार् उत्पन्न करने तथार् घर तथार् उसमें निहित सुविधार्ओं व शार्ंतिपूर्ण उपभोग एवं बच्चों के अधिकार के विषय में। 
    6. धार्रार् 18 के अधीन आपके स्त्रीधन, आभूषण कपड़ों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं और अन्य घरेलू चीजों को वार्पस कब्जे में लेनार्। 
    7. धार्रार् 6, 7 धार्रार् 9 और धार्रार् 14 के अन्तर्गत चिकित्सीय सहार्यतार्, आश्रय परार्मर्श और विधिक सहार्यतार् लेनार्।
    8. धार्रार् 18 के अन्तर्गत घरेलू हिंसार् कर्तार् को आप से सम्पर्क और पत्रार्चार्र रोकने हेतु।
    9. धार्रार् 22 के अधीन घरेलू हिंसार् के कारण शार्रीरिक पीड़ार् यार् मार्नसिक क्षति यार् किसी धन संबंधी क्षति हेतु क्षतिपूर्ति।
    10. अधिनियम की धार्रार् 12, धार्रार् 18, और 19, धार्रार् 20, धार्रार् 21, धार्रार् 22 और धार्रार् 23 के अधीन शिकायत करने यार् अनुतोष प्रार्प्त करने हेतु किसी न्यार्यार्लय के सम्मुख कार्यवार्ही। 
    11. की गर्इ शिकायतों, आवेदनों किसी चिकित्सीय रिपोर्ट यार् अन्य रिपोर्ट को जो आप के द्वार्रार् दर्ज करार्यी जार्ती है यार् आपके बच्चे द्वार्रार् उसकी प्रतियार्ँ प्रार्प्त करनार्। 
    12. घरेलू हिंसार् के विषय में किसी प्रार्धिकारी के द्वार्रार् अभिलिखित किसी कथन की प्रतियार्ँ प्रार्प्त करनार्। 
    13. किसी खतरे से बचार्व हेतु पुलिस यार् संरक्षण अधिकार से सहार्यतार् प्रार्प्त करनार्।

8. रार्ष्ट्रीय महिलार् आयोग अधिनियम , 1990

वर्ष 1990 में, रार्ष्ट्रीय महिलार् आयोग अधिनियम पार्रित हुआ। रार्ष्ट्रीय महिलार् आयोग महिलार्ओं के सशक्तीकरण क एक अन्य महत्वपूर्ण उपकरण है।

अधिनियम की धार्रार् 3(1) के अनुसार्र केन्द्रीय सरकार रार्ष्ट्रीय महिलार् आयोग क गठन करेगी जो अधिनियम के अन्तर्गत दिये गये कार्यों क सम्पार्दन करेगार्। आयोग अधिनियम की धार्रार् 10 के अन्तर्गत उल्लिखित कार्यों क सम्पार्दन करेगार्। जिनमें से मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. महिलार्ओं के लिए संविधार्न और अन्य विधियों के अधीन उपबन्धित रक्षोपार्यों (Safeguards) से संबंधित सभी विषयों क अन्वेषण (Investigation) और परीक्षार् (Examine) करनार् 
  2. संविधार्न और अन्य विधियों के महिलार्ओं को प्रभार्वित करने वार्ले विद्यमार्न (Existing) उपबन्धों क समय-समय पर पुनर्विलोकन (Review) करनार् और उनके यथोचित संशोधनों की सिफार्रिश करनार्;
  3. संविधार्न और अन्य विधियों के महिलार्ओं से संबंधित उपबन्धों के उल्लंघन के मार्मलों को समुचित प्रार्धिकारियों के समक्ष उठार्नार्; 
  4. निम्नलिखित से संबंधित विषयों पर शिकायतों (Complaints) की जार्ँच करनार् और स्वप्रेरणार् (Suo Motu) से ध्यार्न देनार्। 
    • महिलार्ओं के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मार्मले; 
    • महिलार्ओं को संरक्षण प्रदार्न करने वार्ली अधिनियमित (Enacted) विधियों के अक्रियार्न्वयन (Non-implementation) से संबंधित मार्मले 
    • संघ और किसी रार्ज्य के अधीन महिलार्ओं के विकास की प्रगति क मूल्यार्ंकन (Evaluation) करनार्, आदि। 

परन्तु आयोग कानून क उल्लंघन करने वार्लों के विरुद्ध कार्यवार्ही करने के लिए अक्षम है। इसके द्वार्रार् की गर्इ सिफार्रिशों पर समुचित ध्यार्न नहीं दियार् जार्तार् है। इसके द्वार्रार् जार्री किये गये सम्मन को गम्भीरतार् से नहीं लियार् जार्तार्। महिलार् आयोग अपने सम्मन असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस के कार्यार्लय के मार्ध्यम से भेज सकतार् है, समार्चार्र पत्रों में प्रकाशित करवार् सकतार् है यार् पोस्टर के रूप में चिपकवार् सकतार् है। परन्तु महिलार् आयोग शार्यद ही कभी ऐसार् करतार् है। जब कभी भी कार्य करने के स्थार्न पर महिलार्ओं के यौन शोषण के मार्मले सार्मने आये हैं तो आयोग ने केवल शुरू में शोर ही मचार्यार् है और ज्यार्दार् कुछ नहीं कियार् है। आयोग बिनार् पोशार्क के पुलिस नहीं है। इसके पार्स मजिस्ट्रेट की विधिक शक्तियार्ँ भी नहीं हैं। इसके सदस्य स्वयं स्वीकार करते हैं कि इसने अपेक्षार्ओं की पूर्ति नहीं की है। उनक कहनार् है कि क्योंकि वे सरकार पर निर्भर हैं अत: उनकी बहुत कम शक्तियार्ँ हैं। कोर्इ भी संस्थार् दूसरे पर निर्भर होते हुए शक्तिशार्ली नहीं हो सकती।

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