मनोवैज्ञार्निक परीक्षण के प्रकार

क्यार् आप जार्नते हैं कि मनोवैज्ञार्निक परीक्षण कितने प्रकार के होते हैं?  मनोवैज्ञार्निक परीक्षण एक मार्नवीकृत यन्त्र होतार् है, जिसमें प्रश्नों अथवार् चित्रों यार् अन्य मार्ध्यमों के द्वार्रार् मनुष्य की विभिन्न मार्नसिक योग्यतार्ओं जैसे कि बुद्धि, समार्योजन क्षमतार्, स्मृति, अभिवृत्ति, अभिरूचि इत्यार्दि क मार्त्रार्त्मक मार्पन कियार् जार्तार् है। कहने क आशय यह है कि मनोवैज्ञार्निक परीक्षण के द्वार्रार् प्रार्णी के व्यक्तित्व के विभिन्न शीलगुणों क मार्पन होतार् है। इन्हीं शीलगुणों को मार्पने के लिये मनोवैज्ञार्निकों ने अनेक विधियों क प्रतिपार्दन कियार् है, जिन्हें मनोवैज्ञार्निक परीक्षण के विभिन्न प्रकार कहार् गयार्। मनोवैज्ञार्निक परीक्षण की विभिन्न विधियार्ँ निम्नार्नुसार्र हैं-

  1. प्रक्षेपी विधियार्ँ (अप्रत्यक्ष विधि) 
  2. वस्तुनिष्ठ विधियार्ँ (प्रत्यक्ष विधि) 

तो आइये, सबसे पहले हम चर्चार् करते हैं- मनोवैज्ञार्निक परीक्षण की प्रक्षेपी विधि क्यार् हैं? इस विधि द्वार्रार् व्यक्ति की किन-किन योग्यतार्ओं क मार्पन होतार् है? इस विधि के अन्तर्गत कौन-कौन से परीक्षण आते हैं तथार् किस प्रकार इनको प्रयुक्त कियार् जार्तार् हैं?

प्रक्षेपी विधियार्ँ- 

प्रक्षेपी विधि को ठीक प्रकार से समझने के लिये सबसे पहले प्रक्षेपण के अर्थ को जार्ननार् जरूरी है।

1. प्रक्षेपण शब्द क अर्थ- 

क्यार् आप जार्नते हैं कि प्रक्षेपण शबद क सर्वप्रथम प्रयोग किसने कियार् थार्? ‘‘सिगमण्ड फ्रार्यड’’ पहले ऐसे मनोवैज्ञार्निक थे जिन्होंने सर्वप्रथम प्रक्षेपण शब्द क प्रयोग एक ‘‘मनोरचनार्’’ के रूप में कियार् थार्। फ्रार्यड क मत थार् कि प्रक्षेपण को व्यक्ति रक्षार्त्मक प्रथम (डिफेंस मैकेनिज्म) के रूप में प्रयुक्त करतार् है अर्थार्त्- प्रक्षेपण द्वार्रार् व्यक्ति अपनी अनैतिक, अवार्ंछित असार्मार्जिक इच्छार्ओं को दूसरे व्यक्तियों पर आरोपित करके अपनी चिन्तार्, द्वन्द्व एवं मार्नसिक संघर्षो क समार्धार्न करतार् है।

फ्रार्यड के बार्द एल.के. फ्रैंक ने प्रक्षेपण शब्द क प्रयोग और भी व्यार्पक अर्थ में कियार्। फ्रैंक के मतार्नुसार्र प्रक्षेपण द्वार्रार् व्यक्ति न केवल अपनी अवार्ंछित वरन् वार्ंछित-अवार्ंछित सभी प्रकार की इच्छार्ओं क आरोपण दूसरों पर करतार् है। ‘‘प्रक्षेपण प्रक्रियार् के द्वार्रार् व्यक्ति अपनी सभी वार्ंछित यार् अवार्ंछित इच्छार्ओं तथार् प्रेरणार्ओं को दूसरों पर आरोपित करतार् है।’’

आजकल ‘‘प्रक्षेपण’’ शब्द क प्रयोग इसी व्यार्पक अर्थ में कियार् जार्तार् है। तो अब आप समझ गये होंगे कि मनोविज्ञार्न में प्रक्षेपण शब्द क प्रयोग किस अर्थ में कियार् जार्तार् है। प्रक्षेपण शब्द क अर्थ स्पष्अ हो जार्ने के बार्द अब हम चर्चार् करते हैं कि ‘‘प्रक्षेपण परीक्षण’’ क्यार् हैं?

2. प्रक्षेपी विधि क अर्थ एवं परिभार्षार्- 

मनोवैज्ञार्निक परीक्षण के क्षेत्र में प्रक्षेपण विधि क अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थार्न है। यह परीक्षण की एक अप्रत्यक्ष विधि है। इसमें व्यक्ति यार् प्रयोच्य के समक्ष कुछ असंगठित तथार् अस्पष्ट उद्दीपक उपस्थित किये जार्ते हैं अथवार् ऐसी कोर्इ परिस्थिति दी जार्ती है। जब प्रयोच्य के सार्मने ऐसे उद्दीपकों एवं परिस्थितियों को लार्यार् जार्तार् है तो, वह इनके प्रति कुछ-न-कुछ प्रतिक्रियार् व्यक्त करतार् है। इन परीक्षणों में व्यक्ति जो अनुक्रियार् करतार् है, वह वस्तुत: उसके अचेतन मन में दबी इच्छार्यें, भार्वनार्यें एवं मार्नसिक संघर्ष होते हैं, जिनको वह दूसरे व्यक्तियों अथवार् वस्तुओं पर आरोपित करतार् है। इस अप्रत्यक्ष विधि से व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं उसकी योग्यतार्ओं को समझने में मद्द मिलती है।

इस प्रकार से हम कह सकते है कि प्रक्षेपण विधि व्यक्तित्व शीलगुणों, मार्नसिक योग्यतार्ओं के मार्पन की एक अप्रत्यक्ष यार् परीक्ष विधि है, जिसके एकांश यार् प्रश्न संगठित एवं स्पष्ट नहीं होते हैं। इन एकांशों के प्रति प्रतिक्रियार् व्यक्त करके व्यक्ति अपनी योग्यतार्ओं, शीलगुणों को परीक्ष रूप से अभिव्यक्त करतार् है। ‘‘प्रक्षेपण विधि’’ को भिन्न-भिन्न मनोवैज्ञार्निकों ने अलग-अलग ढंग से स्पष्ट कियार् है। कुछ प्रमुख मनोवैज्ञार्निकों की परिभार्षार्यें निम्नार्नुसार्र हैं- ‘‘प्रक्षेपण वह विधि है जिसमें अपने समार्ज के प्रति व्यक्ति के प्रत्यक्षीकरण यार् उस समार्ज में उसके व्यवहार्र के विशिष्ट ढंगों को प्रकाशित करने के लिये अस्पष्ट, असंरचित, उद्दीपनों यार् परिस्थितियों क व्यवहार्र कियार् जार्तार् है।’’

‘‘प्रक्षेपी विधि’’ पद क सर्वप्रथम प्रतिपार्दन लार्रेन्स फ्रैंक ने कियार् थार्।

3. प्रक्षेपी विधि क इतिहार्स- 

अब हम चर्चार् करते हैं, प्रक्षेपी विधि के इतिहार्स पर। 1400 ए.डी में में लियोनाडो द विन्सी ने कुछ ऐसे बच्चों क चयन कियार्, जिन्होंने कुछ अस्पष्ट प्रार्रूपों में विशिष्ट आकार तथार् पैटर्न की खोज की। इस खोज से यह स्पष्ट हुआ कि उन बच्चों में रचनार्त्मकतार् क गुण विद्यमार्न थार्। इसके बार्द सन् 1800 के उततराद्ध में बिने ने एक खेल जिसक नार्म उन्होंने स्लोटो बतार्यार्। के मार्ध्यम से बच्चों की निष्क्रिय कल्पनार् को मार्पने क प्रयत्न कियार्। स्लोटो खेल में बच्चों को कुछ स्यार्ही के धब्बे देकर उनसे पूछार् जार्तार् थार् कि इन धब्बों में उन्हें क्यार् आकार यार् प्रार्रूप दिखाइ देतार् है। इसके उपरार्न्त सन् 1879 में गार्ल्टन द्वार्रार् एक परीक्षण क निर्मार्ण कियार् गयार्। जिसक नार्म थार्- ‘‘शब्द सार्हचर्य परीक्षण’’।

केन्ट तथार् रोरोजार्नोफ्फ द्वार्रार् परीक्षण कार्यो में गार्ल्टन द्वार्रार् निर्मित परीक्षण क प्रयोग कियार् गयार्। सन् 1910 में युंग द्वार्रार् नैदार्निक मूल्यार्ंकन के लिये इसी प्रकार के परीक्षण क प्रयोग कियार् गयार्। इविंग होंस ने बुद्धि मार्पने के लिये ‘‘वार्क्यपूर्ति परीक्षण’’ क उपयोग कियार्। धीरे-धीरे इन अनौपचार्रिक प्रक्षेपीय प्रतिधियों ने औपचार्रिक प्रक्षेपी परीक्षणों को जन्म दियार्। जो अपेक्षार्कृत अधिक मार्नकीकृत थे और इनके मार्ध्यम से पहले की तुलनार् में अधिक अच्छे ढंग से मार्नसिक योग्यतार्ओं क मार्पन करनार् संभव हो सका।

4. प्रक्षेपी विधि की विशेषतार्यें- 

  1. अब आपके मन में जिज्ञार्सार् उत्पन्न हो रही होगी कि इन प्रक्षेपी विधियों की प्रमुख विशेषतार्यें क्यार् होती हैं? लिण्डजे, 1961 के अनुसार्र प्रक्षेपी विधियों के स्वरूप क विवेचन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत कियार् जार् सकतार् हैं- प्रक्षेपी परीक्षण में ऐसे एकांश होते हैं, जिनके प्रति बहुत सार्री अनुक्रियार्यें उत्पन्न हो पार्ती है। 
  2. प्रक्षेपी विधि द्वार्रार् व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं क मार्पन कियार् जार्नार् संभव होतार् है। 
  3. प्रक्षेपी विधि व्यक्ति के अचेतन मन में छिपी हुयी इच्छार्ओं, प्रेरणार्ओं को उत्तेजित करती है। 
  4. प्रक्षेपी विधि में एकांशों के प्रति प्रयोज्यों द्वार्रार् जो प्रतिक्रियार्यें व्यक्त की जार्ती है उनक अर्थ प्रयोज्य को मार्लूम नहीं होतार् है। 
  5. प्रक्षेपी विधि में व्यक् िके सार्मने असंगठित एवं अस्पस्ट परिस्थितियों एवं उद्दीपकों को उपस्थित कियार् जार्तार् है। 
  6. इन विधियों के मार्ध्यम से व्यक्तित्व की एक संगठित तथार् सम्पूर्ण तस्वीर सार्मने आती है। 
  7. इन विधियों द्वार्रार् अधिक मार्त्रार् में जटिल मूल्यार्ंकन तथ्य एवं आँकड़ें एकत्रित किये जार्ते हैं। 
  8. इन विधियों द्वार्रार् व्यक्ति में स्वप्न चित्र उत्पन्न होते हैं। 
  9. इन विधियों में किसी भी अनुक्रियार् को सही अथवार् गलत नहीं मार्नार् जार्तार् हैं। 

5. प्रक्षेपी विधि के प्रकार- 

मनोवैज्ञार्निकों ने प्रक्षेपी विधि के अनेक प्रकार बतार्ये हैं। इस वर्र्गीकरण क आधार्र है- परीक्षण में प्रयुक्त किये जार्ने वार्ले उद्दीपक, परीक्षण के निर्मार्ण एवं क्रियार्न्वयन क तरीका, उद्दीपकों के प्रति व्यक्त की गर्इ अनुक्रियार् इत्यार्दि। इन विभिन्न वर्गीकरणों में लिण्डले द्वार्रार् प्रक्षेपी विधियों क जो विभार्जन कियार् गयार्, वह अधिक मार्न्य एवं लोकप्रिय है। इन्होंने प्रक्षेपी विधियों को अनुक्रियार्ओं की कार्यो के आधार्र पर निम्न पार्ँच भार्गों में वर्गीकृत कियार्-

  1. सार्हचर्य परीक्षण 
  2. संरचनार् परीक्षण 
  3. पूर्ति परीक्षण 
  4. चयन यार् क्रम परीक्षण 
  5. अभिव्यंजक परीक्षण 

1. सार्हचर्य परीक्षण- 

जैसार् कि नार्म से ही स्पष्ट है, इस परीक्षण के अन्तर्गत प्रयोज्यों को जो उद्दीपक दिखलार्ये जार्ते है, ये अस्पष्ट होते हैं। इन अस्पष्ट उद्दीपकों को देखकर प्रयोज्य को यह बतार्नार् होतार् है कि उसमें उसे क्यार् चीज दिखाइ दे रही है अथवार् किस वस्तु व्यक्ति, परिस्थिति, घटनार् इत्यार्दि से वह उस उद्दीपक को सार्हचर्चित कर रहार् है। इस श्रेणी में दो परीक्षण आते हैं-

  1. शब्द सार्हचर्य परीक्षण- क्यार् आप जार्नते हैं कि शब्द सार्हचर्य परीक्षण क प्रयोग किस प्रकार से कियार् जार्तार् है? इस परीक्षण कुछ पहले से ही निश्चित उद्दीपक शब्द होते है। इन पूर्व निश्चित शब्द उद्दीपकों को एक-एक करके प्रयोज्य को सुनार्यार् जार्तार् है। इन सभी शब्दों को सुनने के बार्द उस व्यक्ति यार् प्रयोज्य के मन में जो शब्द सर्वप्रथम आतार् है, उस शब्द को उसे प्रयोगकर्तार् को बतार्नार् होतार् है। इस परीक्षण क उपयोग मुख्य रूप से सिगमण्ड फ्रार्यड और उनके शिष्य कार्ल युंग द्वार्रार् कियार् गयार्। शब्द सार्हचर्य परीक्षण के मार्ध्यम से युंग ने व्यक्ति की सार्ंवेगिक समस्यार्ओं क सफलतार्पूर्वक निदार्न कियार्। इस सफलतार् से प्रभार्वित होकर अमेरिक में केन्ट तथार् रोजेन्फ द्वार्रार् सन् 1910 में तथार् रैपपोर्ट द्वार्रार् सन् 1946 में दूसरे शब्द सार्हचर्य परीक्षण क निर्मार्ण कियार् गयार्। इन परीक्षणों क प्रयोग सार्धार्रण मार्नसिक रोग से ग्रसित व्यक्तियों के व्यक्तित्व को मार्पने में मुख्य रूप से कियार् गयार्। 
  2. रोशाक परीक्षण- प्रक्षेपण परीक्षणों में ‘‘रोशाक परीक्षण’’ सर्वार्धिक लोकप्रिय परीक्षण हे। इस परीक्षण क प्रतिपार्दन स्विट्जरलैण्ड के मनोश्चिकित्सक हरमार्न रोशाक द्वार्रार् सन् 1921 में कियार् गयार् थार्। 

2. संरचनार् परीक्षण – 

मनोवैज्ञार्निक परीक्षण की प्रक्षेपी विधियों में दूसरी महत्वपूर्ण विधि ‘‘संरचनार् परीक्षण’’ है। संरचनार् परीक्षण में व्यक्ति को परीक्षण उद्दीपकों के आधार्र पर एक कहार्नी अथवार् अन्य समार्न चीजों की संरचनार् करनी होती है।

क्यार् आज जार्नते हैं कि संरचनार् परीक्षणों में सर्वार्धिक लोकप्रिय परीक्षण कोनजर है? ‘‘विषय आत्मबोध परीक्षण’’ जिसको TAT (Thematic Apperception Test) के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। सबसे अधिक प्रसिद्ध संरचनार् परीक्षण है। TAT क विस्तृत विवेचन निम्नार्नुसार्र है- TAT (The matic Apperception Test) – TAT क निर्मार्ण मर्रे द्वार्रार् सन् 1935 में हार्रवर्ड विश्वविद्यार्लय में कियार् गयार् थार्। इसके बार्द सन् 1938 में मोर्गन के सार्थ मिलकर उन्होंने इस परीक्षण क संशोधन कियार्। TAT परीक्षण से संबंधित मुख्य बार्तें निम्नार्नुसार्र हैं- 

  1. TAT में उद्दीपक यार् परिस्थितियों रोशाक परीक्षण की तुलनार् में अधिक स्पष्ट होती है। अत: यह रोशाक परीक्षण् से थोड़ार् भिन्न है। 
  2. इस परीक्षण में कुल 31 कार्ड होते है, जिनमें से 30 कार्ड पर चित्र बने होते हैं तथार् एक कार्ड सार्द होतार् है।
  3. TAT परीक्षण क प्रयोग करते समय, जिस व्यक्ति के व्यक्तित्व क परीक्षण कियार् जार्तार् है। उसकी आयु तथार् यौन के अनुसार्र 31 में से 20 कार्ड को चुन लियार् जार्तार् है। 
  4. इन 20 कार्ड में 19 कार्ड पर चित्र होते हैं तथार् एक कार्ड सार्दार् होतार् है। 
  5. किसी एक व्यक्ति को 20 कार्ड से अधिक नहीं दिये जार्ते हैं। 
  6. प्रयोज्य को प्रत्येक कार्ड के चित्र को देखकर एक कहार्नी लिखने को कहार् जार्तार् है। इस कहार्नी में चित्र से संबंधित घटनार् के भूत, वर्तमार्न, एवं भविष्य तीनों कालों क वर्णन होतार् है। 
  7. टैट क क्रियार्न्वयन परीक्षणकर्तार् दो सत्रों में करतार् है।
  8. प्रथम सत्र में 10 कार्ड और द्वितीय सत्र में भी 10 कार्ड देकर प्रयोज्य को उन कार्ड के आधार्र पर कहार्नी लिखने को कहार् जार्तार् है।
  9. 19 कार्ड देने के बार्द सबसे अन्त में सार्दार् कार्ड दियार् जार्तार् है और उस कार्ड पर अपने मन से किसी चित्र को मार्नकर उस आधार्र पर कहार्नी लिखने को कहार् जार्तार् है। 
  10. मर्रे क मत है कि TAT के इन दो सत्रों के बीच कम से कम 24 घंटे क अन्तर होनार् चार्हिये। 
  11. जब प्रयोज्य कहार्नी लिखने क कार्य पूरी कर लेतार् है तो परीक्षणकर्तार् एक सार्क्षार्त्कार लेतार् है। इस सार्क्षार्त्कार क उद्देश्य यह जार्ननार् होतार् है कि कहार्नी लिखने में व्यक्ति की कल्पनार् शक्ति क स्रोत क्यार् हैं? कार्ड पर अंकित चित्र अथवार् चित्र के अतिरिक्त अन्य कोर्इ घटनार् अथवार् परिस्थिति। 

कहार्नी लेखन के उपरार्न्त परीक्षणकर्तार् इन कहार्नियों क विश्लेषण करके उस व्यक्ति के व्यक्तित्व क आंकलन करतार् है। मर्रे के मतार्नुसार्र इस परीक्षण क विश्लेषण इन आधार्रों पर कियार् जार्तार् है- 

  1. नार्यक – सर्वप्रथम परीक्षणकर्तार् प्रत्येक कहार्नी में नार्यक यार् नार्यिक कौन है, इस बार्त क पतार् लगार्तार् है। कहार्नी में जिस पार्त्र की मुख्य भूमिक होती है उसको नार्यक यार् नार्यिक कहते हैं। ये भी संभव है कि कभी-कभी एक ही कहार्नी में एक से अधिक नार्यक यार् नार्यिक हो। इस परीक्षण में ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि प्रयोज्य नार्यक अथवार् नार्यिक के सार्थ आत्मीकरण (identification) स्थार्पित कर लेतार् है और अपनी महत्वपूर्ण आवश्यकतार्ओं को अभिव्यक्त करतार् है। 
  2. आवश्यकतार् – नार्यक यार् नार्यिक क पतार् लगार्ने के बार्द यह जार्नने की कोशिश की जार्ती है कि उस नार्यक यार् नार्यिक क प्रमुख आवश्यकतार्यें क्यार्-क्यार् हैं क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से नार्यक-नार्यिक के मार्ध्यम से उस व्यक्ति की आवश्यकतार्यें अभिव्यक्त होती है, जिसमें व्यक्तित्व क मार्पन कियार् जार् रहार् है। मर्रे के अनुसार्र टैट द्वार्रार् 28 प्रकार की आवश्यकतार्ओं क मार्पन संभव है। कुछ प्रमुख आवश्यकतार्यें निम्न हैं- 
    1. उपलब्धि की आवश्यकतार् 
    2. प्रभुत्व की आवश्यकतार् 
    3. संबंधन की आवश्यकतार् 
  3. प्रेस – मर्रे के अनुसार्र प्रेस से यहार्ँ पर आशय वार्तार्वरण संबंधी बलों से है। इनके कारण कहार्नी के नार्यक यार् नार्यिक की आवश्यकतार्यें यार् तो पूरी हो जार्ती हैं अथवार् पूरी होने से वंचित रह जार्ती है। मर्रे के अनुसार्र ऐसे वार्तार्वरण संबंधी बलों की संख्यार् 30 से भी ज्यार्दार् है, जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नार्नुसार्र हैं- 
    1. शार्रीरिक खतरार् 
    2. आक्रमण यार् आक्रार्मकतार्- ये दो महत्वपूर्ण पे्रस हैं। 
  4. थीमार् – पे्रस के निर्धार्रण के बार्द टैअ के अगले चरण में थीमार् क निर्धार्रण कियार् जार्तार् है। थीमार् से क्यार् आशय है? थीमार् क तार्त्पर्य हैं- ‘‘नार्यक यार् नार्यिक की आवश्यकतार् तथार् पे्रस (वार्तार्वरण संबंधी बल) में हुयी अन्त:क्रियार् से उत्पन्न घटनार्। मर्रे के अनुसार्र थीमार् द्वार्रार् व्यक्तित्व में निरन्तरतार् क ज्ञार्न होतार् है। 
  5. परिणार्म – TAT के अगले चरण में कहार्नी के परिणार्म क पतार् लगार्यार् जार्तार् है अर्थार्त्- कहार्नी क समार्पन किस प्रकार से कियार् गयार् है, कहार्नी क निष्कर्ष किस प्रकार क है? निश्चित अथवार् अनिश्चित। कहार्नी क परिणार्म यदि निश्चित एवं स्पष्अ है तो इससे प्रयोज्य के व्यक्तित्व की परिपक्वतार् एवं वार्स्तविकतार् क ज्ञार्न होने की क्षमतार् क बोध होतार् है। आपकी जार्नकारी के लिये बतार् दें कि TAT क हिन्दी अनुकूलन कलकत्तार् के प्रो, उमार् चौधरी ने कियार् है। भार्रतीय संदर्भ में अधिकांशत: उसी क प्रयोग कियार् जार् रहार् है। TAT के अतिरिक्त भी कुछ अन्य संरचनार् परीक्षण है, जो हैं- 
    1. बार्ल आत्मबोधन परीक्षण CAT – इस परीक्षण क निर्मार्ण सन् 1954 में बेल्लार्क द्वार्रार् कियार् गयार्।
      1. CAT द्वार्रार् बच्चों के व्यक्तित्व क मार्पन कियार् जार्तार् है। 
      2. CAT के कार्ड में सभी पार्त्र पशु हैं, मार्नव नहीं। 
      3. TAT के समार्न ही CAT में भी बच्चों के व्यक्तित्व क मार्पन प्रत्येक कार्ड के आधार्र पर लिखी गर्इ कहार्नी क विश्लेषण करके कियार् जार्तार् है।
    2. रोजेनविग तस्वीर-कुंठ अध्ययन – 
      1. इस परीक्षण क निर्मार्ण प्रख्यार्त मनोवैज्ञार्निक रोजेन विग द्वार्रार् कियार् जार्ने के कारण उन्हीं के नार्म इसक नार्म ‘‘रोजेनविग तस्वीर-कुंठार् गध्ययन’’ रखार् गयार् है। 
      2. इस परीक्षण क निर्मार्ण सन् 1949 में हुआ थार्। 
      3. इस परीक्षण में कुल 24 कार्टून होते हैं, जिसके अन्तर्गत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से इस प्रकार क व्यवहार्र करते हुये दिखार्लार्यार् गयार् है कि दूसरे व्यक्ति में उस पहले वार्ले व्यक्ति के व्यवहार्र के कारण निश्चित तौर पर कुंठार् की भार्वनार् उत्पन्न हो। 
      4. इस परीक्षण में प्रयोज्य को प्रत्येक कार्टून को देखकर यह बतार्ने के लिये कहार् जार्तार् है कि ऐसी परिस्थिति में कुंठित व्यक्ति किस प्रकार की प्रतिक्रियार् व्यक्त करेगार्। 
    3. रोबर्टस आत्मबोधन परीक्षण : बच्चों के लिये (RATC) – 
      1. RATC क निर्मार्ण सन् 1982 में मैकअर्थर तथार् रोबर्टस ने कियार् थार्। 
      2. इस परीक्षण में कुल 27 कार्ड होते हैं, जिनमें प्रत्येक कार्ड में कुछ बच्चे, अन्य बच्चों यार् कारकों के सार्थ अन्त:क्रियार् करते हुये दिखार्ये जार्ते हैं। 
      3. प्रयोज्य को प्रत्येक कार्ड को देखकर यह बतार्नार् होतार् है कि उस कार्ड के पार्त्र क्यार् कर रहे हैं अथवार् क्यार् करेंगे। तो उपर्युक्त विवेचन के आधार्र पर आप समझ गये होंगे कि संरचनार् परीक्षण क्यार् है और किस प्रकार से इनको क्रियार्न्वित कियार् जार्तार् है। इसके बार्द अब हम चर्चार् करते हैं। प्रक्षेपी विधियों में दी अगली विधि ‘‘पूर्ति परीक्षण’’ के विषय में। 

3. पूर्ति परीक्षण – 

‘‘पूर्ति परीक्षण’’ क प्रक्षेपी विधियों में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थार्न है। पूर्ति परीक्षण से संबंधित मुख्य बार्तें हैं- 

  1. इस परीक्षण में प्रयोज्य को उद्दीपक अर्थार्त् वार्क्य क एक हिस्सार् दिखार्यार् जार्तार् है और भार्ग खार्ली होतार् है। इस खार्ली भार्ग की पूर्ति प्रयोज्य अपने अनुसार्र वार्क्य बनार्कर करतार् है।
  2. प्रयोज्य अधूरे वार्क्य को जिस ढंग से पूरार् करतार् है, परीक्षणकर्तार् उस आधार्र पर उसके व्यक्तित्व क मार्पन करतार् है।
  3. सन् 1940 में रोहडे तथार् हार्इड्रोथ द्वार्रार् तथार् सन् 1950 में रौट्टर द्वार्रार् पूर्ति परीक्षण क निर्मार्ण कियार् गयार्। 
  4.  भार्रत में भी इस प्रकार के परीक्षणों क अनेक विद्वार्नों द्वार्रार् निर्मार्ण कियार् गयार्। जिनमें ‘‘विश्वनार्थ मुखर्जी’’ क नार्म विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वार्क्यपूर्ति परीक्षण के एकांश के कतिपय उदार्हरण नीचे दिये जार् रहे हैं। जैसे कि- 
  5. मेरे मार्तार्-पितार् मुझसे प्रार्य: ……………………………… 
  6. मेरी इच्छार् है कि …………………………………  
  7. मैं प्रार्य: सोचतार् रहतार् हूँ कि ………………………………… इत्यार्दि। 

4. चयन यार् क्रम परीक्षण – 

प्रक्षेपी परीक्षणों की अन्य विधि चयन यार् क्रम परीक्षण है। इस प्रकार के परीक्षणों में प्रयोज्य को परीक्षण उद्दीपकों को एक विशिष्ट क्रम में सुव्यवस्थित करनार् होतार् है अथवार् दिये गये परीक्षण उद्दीपकों में से कुछ उद्दीपकों को अपनी पसंद, इच्छार् यार् अन्य किसी आधार्र पर चुननार् होतार् है। परीक्षणकर्तार्, प्रयोज्य द्वार्रार् चुने गये उद्दीपकों यार् उन उद्दीपकों को प्रयोज्य द्वार्रार् जिस क्रम में सुव्यवस्थित कियार् जार्तार् है, के आधार्र पर उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों क मार्पन करतार् है। 

उद्दीपकों को एक खार्स क्रम में सुव्यवस्थित करने तथार् बहुत सार्रे उद्दीपकों में से प्रयोज्य द्वार्रार् कुछ उद्दीपकों क चयन करने के कारण ही इस परीक्षण क नार्म क्रम यार् चयन परीक्षण रखार् गयार् है। इस श्रेणी में आने वार्ले कुछ प्रमुख परीक्षण हैं- 

  1. जोन्डी परीक्षण-  इस परीक्षण क निर्मार्ण सन् 1947 में जोन्डी द्वार्रार् कियार् गयार् थार्। 
    1. इसमें प्रयोज्य को अनेक फोटोग्रार्फ के छ: समूह एक-एक करके दिखलार्ये जार्ते हैं। 
    2. इन तस्वीरों में से प्रयोज्य को दो ऐसे तस्वीरें चुनने के लिये कहार् जार्तार् है, जिनको वह सबसे अधिक पसन्द करतार् है तथार् दो तस्वींरें ऐसी चुननी होती हैं, जिन्हें वह सर्वार्धिक नार्पसंद करतार् है। 
    3. प्रयोज्य द्वार्रार् चयनित तस्वीरों के आधार्र पर परीक्षणकर्तार् द्वार्रार् उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों क मार्पन कियार् जार्तार् है। 
  2. काहन टेस्ट ऑफ सिम्बोल अरेन्जमेन्ट (1955)- पार्ठकों, जैसार् कि इसके नार्म से ही स्पष्ट है कि इसक निर्मार्ण महार्न् मनोवैज्ञार्निक काहन द्वार्रार् सन् 1955 में कियार् गयार् थार्। 
    1. इस परीक्षण में प्रयोज्य को 16 प्लार्स्टिक से बनी हुयी वस्तुऐं दिखार्यी जार्ती है। जैसे कि- तार्रार्, पशु, क्रार्स इत्यार्दि और इन्हें कर्इ श्रेणियों में छार्ँटनार् होतार् है, जैसे घृणार्, प्रेम, अच्छार्, बुरार्, जीवित मृत इत्यार्दि। 
    2. इसके बार्द प्रयोज्य से पूछार् जार्तार् है कि उसने जिन-जिन 16 वस्तुओं को देखार् है। उन वस्तुओं से वह किस व्यक्ति, वस्तु यार् घटनार् को सार्हचर्चित कर रहार् है अथवार् वह वस्तु उसे जिसके समार्न दिखाइ दे रही है। 
    3. प्रयोज्य द्वार्रार् जो अनुक्रियार् व्यक्त की जार्ती है, उस आधार्र पर उसके व्यक्तित्व क मार्पन कियार् जार्तार् है। 
  3. अभिव्यंजक परीक्षण- जैसार् कि इस परीक्षण के नार्म से ही आपको स्पष्ट हो रहार् होगार् कि यह एक ऐसार् प्रक्षेपी परीक्षण है, जिसमें प्रयोज्य को स्वयं को अभिव्यक्त करने क मौक दियार् जार्तार् है। अब प्रश्न यह उठतार् है कि व्यक्ति स्वयं को इस परीक्षण में किस प्रकार से अभिव्यक्त करतार् है अर्थार्त् अभिव्यक्ति क आधार्र क्यार् होतार् है? इस परीक्षण में प्रयोज्य एक तस्वीर बनार्तार् है। प्रयोज्य द्वार्रार् जिस प्रकार की तस्वीर यार् चित्र बनार्यार् जार्तार् है, उस आधार्र पर उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों के विषय में अनुमार्न लगार्नार् संभव हो पार्तार् है। अभिव्यंजक परीक्षणों की श्रेणी में आने वार्ले कुछ प्रमुख परीक्षण हैं-ं
    1. डार्-ए-परसन परीक्षण (DAP Test) 
      1. इसक निर्मार्ण मैकोवर ने कियार् थार्। 
      2. इस परीक्षण में प्रयोज्य को एक व्यक्ति क चित्र बनार्ने के लिये कहार् जार्तार् है। 
      3. इसके बार्द कभी-कभी आवश्यकतार्नुसार्र विपरीत लिंग के व्यक्ति, मार्ँ, आत्मन् यार् परिवार्र क चित्र बनार्ने के लिये भी कहार् जार्तार् है। 
      4. मै कोवर क मत है कि व्यक्ति जिस प्रकार से चित्र बनार्तार् है, उसके आधार्र पर उसके अचेतन मन की अनेक प्रक्रियार्ओं के बार्रे में अनुमार्न लगार्नार् संभव हो पार्तार् है। 
    2. घर-पेड-व्यक्ति परीक्षण (H-T-P test)- 
      1. इस परीक्षण क निर्मार्ण प्रसिद्ध विद्वार्न बक द्वार्रार् सन् 1948 में कियार् गयार् थार्।
      2. इसमें व्यक्ति को एक पेड़ तथार् एक व्यक्ति क चित्र बनार्नार् होतार् है।
      3. इसके बार्द इन चित्रों क विवेचन एक सार्क्षार्त्कार में करनार् होतार् है।
      4. व्यक्ति द्वार्रार् जिस ढंग से चित्र क वर्णन कियार् जार्तार् है, उसके आधार्र पर उसके व्यक्तित्व के शीलगुणों क विश्लेषण कियार् जार्तार् है। 
    3. बद्ध वेण्डर-गेस्टार्ल्ट-परीक्षण- इस परीक्षण क निर्मार्ण सन् 1938 में लिऊरेटार् वेण्डर द्वार्रार् कियार् गयार् थार्। 
      1. व्यक्ति के बौद्धिक हृार्स की मार्त्रार् जार्नने के लिए इस परीक्षण क प्रयोग कियार् जार्तार् है।
      2. इसमें 9 अत्यधिक सार्धार्रण चित्र होते हैं। 
      3. इन चित्रों को देखकर पहले व्यक्ति को उनकी नकल उतार्रने के लिये कहार् जार्तार् है।
      4. इसके बार्द उसके सार्मने से चित्र हटार् लिये जार्ते हैं और उसे अपनी स्मृति के आधार्र पर ही उस चित्र को बनार्नार् होतार् है।
      5. चित्र बनार्ते समय प्रयोज्य द्वार्रार् प्रार्य: अनेक गलतियार्ँ होती हैं। जिनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं, जैसे कि- समन्वय में कमी पुनरार्वृत्ति चित्र घूर्णन इत्यार्दि।
      6. वेण्डर क मत है कि चित्र को बनार्ते समय की गर्इ गलतियों के आधार्र पर व्यक्ति के व्यक्तित्व क विश्लेषण कियार् जार्तार् है। 

6. प्रक्षेपी विधि की सीमार्यें – 

 इस बार्त में कोर्इ संदेह नहीं है कि मनोवैज्ञार्निक परीक्षण के क्षेत्र में प्रक्षेपी विधियों क अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थार्न है। और खार्सकर व्यक्तित्व के मार्पन में, फिर भी कुछ विद्वार्नों ने कतिपय आधार्रों पर प्रक्षेपी विधियों की आलोचनार् की है। आइजेन्क ने निम्न आधार्रों पर प्रक्षेपण परीक्षण की आलोचनार् की है- 

  1. अर्थपूर्ण तथार् परीक्षणीय सिद्धार्न्त क अभार्व- आइजेन्क क कहनार् है कि प्रक्षेपी विधियों क कोर्इ परीक्षणीय तथार् अर्थपूर्ण सिद्धार्न्त नहीं है। अत: इनके द्वार्रार् जो व्यक्तित्व क मार्पन कियार् जार्तार् है, उससे व्यक्तित्व के बार्रे में कोइ्र ठोस निष्कर्ष नहीं निकलतार् है।
  2. आत्मनिष्ठ प्रार्प्तार्ंक लेखन- प्रक्षेपण परीक्षण की आलोचनार् इस आधार्र पर भी की गर्इ है कि इन परीक्षणों क प्रार्प्तार्ंक लेखन एवं व्यार्ख्यार् अत्यधिक आत्मनिष्ठ है, जिसके कारण तक ही व्यक्ति के व्यक्तित्व क मार्पन यदि अलग-अलग व्यक्तियों द्वार्रार् कियार् जार्तार् है तो उस व्यक्तित्व के बार्रे में उनके निष्कर्षो में भी भिन्नतार् पाइ जार्ती है, जो किसी भी प्रकार से अर्थपूर्ण नहीं होतार् है।  
  3. उच्च वैधतार् क अभार्व- आलोचकों क यह भी मत है कि प्रक्षेपी विधियों में पर्यार्प्त वैधतार् क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। 
  4. प्रक्षेपीय परीक्षण के सूचकों तथार् शीलगुणों के बीच प्रत्यार्शित संबंध क वैज्ञार्निक आधार्र नहीं- आइजेन्क ने प्रक्षेपण परीक्षण की आलोचनार् इस आधार्र पर भी की है कि प्रक्षेपीय परीक्षण के सूचकों तथार् शीलगुणों के बीच प्रत्यार्शित संबंध क कोर्इ वैज्ञार्निक आधार्र नहीं है। 

इस प्रकार अनेक आधार्रों पर प्रक्षेपी विधियों की आलोचनार् की गर्इ है।

उपर्युक्त विवरण से आप जार्न चुके हैं कि प्रक्षेपी विधि क्यार् है? प्रक्षेपण क्यार् हैं? प्रक्षेपी विधि में कौन-कौन से प्रमुख परीक्षण आते हैं और उनके क्रियार्न्वयन क तरीक क्यार् है। यद्यपि विद्वार्नों ने अनेक तर्क देकर प्रक्षेपी विधि की आलोचनार्यें की है तथार्पि मनोचिकित्सार् की दृष्टि से व्यक्तित्व मार्पन में प्रक्षेपी विधियों की महत्वपूर्ण भूमिक होती है।

वस्तुनिष्ठ विधियार्ँ

1. वस्तुनिष्ठ विधियों क अर्थ- 

वस्तुनिष्ठ विधि से तार्त्पर्य ऐसी विधि से है, जिसमें उद्दीपक के रूप में यार् तो एक शब्द होतार् है अथवार् एक वार्क्य होतार् है। इस उद्दीपक के प्रति अनुक्रियार् व्यक्त करने के लिये व्यक्ति को दिये गये विभिन्न उत्तरों में से किसी एक को चुननार् होतार् है। मनोचिकित्सकों ने नैदार्निक उपयोग की दृष्टि से वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के निर्मार्ण तथार् उनकी उपयोगितार् एवं उत्कृष्टतार् को बनार्ये रखने के लिये कुछ मॉडलों क निर्मार्ण कियार् और इन मॉडलों के आधार्र पर विभिन्न वस्तुनिष्ठ परीक्षणों क प्रतिपार्दन कियार् गयार्। अब आपके मन में यह प्रश्न उठ रहार् होगार् कि वे मॉडल कौन-कौन से हैं? तो आइये, आपके इसी प्रश्न क समार्धार्न करते हुये चर्चार् करते है इन मॉडल के बार्रे में।

2. वस्तुनिष्ठ विधि से संबंधित प्रमुख मॉडल यार् उपार्गम- 

मनोचिकित्सकों ने मुख्य रूप से चार्र मॉडलों क प्रतिपार्दन कियार्-

  1. प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल यार् ताकिक अथवार् युक्तिसंगत उपार्गम (Face volume model or logical or rational approach) 
  2. अनुभवजन्य मॉडल यार् उपार्गम (Empirical model or approach)  
  3. कारक-वैश्लेषिक मॉडल यार् उपार्गम Factor-analytic model or approach) 
  4. सैद्धार्न्तिक मॉडल यार् उपार्गम (Theouritical model or approach) 

1. प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल – 

वस्तुनिष्ठ विधि के प्रथम मॉडल प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल क विकास अमेरिक में प्रथम विश्व युद्ध के दौरार्न हुआ थार्। इस मॉडल को ताकिक यार् युक्तिसंगत उपार्गम के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। इस उपार्गम की प्रमुख विशेषत यह है कि इस पर आधार्रित परीक्षण के एकांशों क स्वरूप एकदम स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होतार् है। जिन्हें पढ़कर रोगी व्यक्ति भी एकांशों के उद्देश्य को भली-भार्ँति जार्न लेतार् है। प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल पर आधार्रित परीक्षण के कुछ एकांशों के उदार्हरण हैं-

  1. क्यार् आपको सिरदर्द की शिकायत रहती हैं? 
  2. क्यार् आप किसी पाटी में जार्ने की बार्त से चिन्तित हो जार्ते हैं इत्यार्दि। इस मॉडल में यह पूर्वकल्पनार् की जार्ती है कि व्यक्ति पूरी र्इमार्नदार्री के सार्थ अनुक्रियार् व्यक्त करेगार् तथार् इसके सार्थ ही यह भी मार्नार् जार्तार् है कि व्यक्ति स्वयं के शीलगुणों एवं विशेषतार्ओं से पूरी तरह परिचित है। 

इस मॉडल पर आधार्रित सर्वप्रथम व्यक्तित्व परीक्षण क निर्मार्ण सन् 1917 में वुडवर्थ द्वार्रार् कियार् गयार्। यह प्रथम समार्योजन आविष्कारिक थी। जिसक नार्म ‘‘वुडवर्थ पर्सनल डार्टार्शीट’’ रखार् गयार्।

क्यार् आप जार्नते हैं कि इस आविष्कारिक क प्रयोजन क्यार् थार्? इसक उद्देश्य थार्, सार्ंवेगिक रूप से क्षुब्ध व्यक्तियों की समार्योजन करने की क्षमतार् को मार्पनार् और ऐसे व्यक्तियों को पहचार्ननार्।

यद्यपि प्रार्रंभ में इस उपार्गम पर आधार्रित अनेक परीक्षणों क निर्मार्ण और उपयोग कियार् गयार्, किन्तु धीरे-धीरे सन् 1930 तक इस उपार्गम में अनेक खार्मियार्ँ नजर आने लगी। परिणार्मस्वरूप इस मॉडल क उपयोग नहीं के बरार्बर कियार् जार्ने लगार् क्योंकि एकांशों की अत्यधिक स्पष्टतार् के कारण व्यक्ति प्रार्य: मनगढंत उत्तर देते थो। इस उपार्गम के विकल्प के रूप में अनुभवजन्य उपार्गम क विकास हुआ।

2. अनुभवजन्य मॉडल यार् उपार्गम – 

 प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से अनुभवजन्य मॉडल क विकास हुआ। इस मॉडल की खार्स बार्त यह है कि इस पर आधार्रित परीक्षणों में केवल उन्हीं एकांशों को रखार् गयार् है जो सार्मार्न्य व्यक्तियों के समूह एवं विशिष्ट नैदार्निक समूह के मध्य स्पष्ट रूप से अन्तर कर सके। इस मॉडल पर आधार्रित कुछ प्रमुख परीक्षणों के नार्म हैं-

  1. मार्इनेसोटार् मल्टीफेजिक व्यक्तित्व आविष्कारिक (MMPI) 
  2. कैलिफोर्नियार् व्यक्तित्व आविष्कारिक (CPI) 

3. कारक-वैश्लेषिक मॉडल – 

इस मॉडल की महत्वपूर्ण विशेषतार् यह है कि इसके अन्तर्गत विभिन्न परीक्षणों से जो निष्कर्ष यार् परिणार्म प्रार्प्त होते हैं, उन्हें परस्पर सहसंबंधित करते है। कारक-विश्लेषण पर आधार्रित होने के कारण ही इसे कारक वैश्लेषिक मॉडल कहार् जार्तार् है। इस उपार्गम पर आधार्रित परीक्षणों के विकास में कैटेल, आइजेन्क तथार् गिलफोर्ड क नार्म विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके द्वार्रार् निर्मित व्यक्ति परीक्षणों को नैदार्निक दृष्टि से अत्यधिक उपयोगी मार्नार् गयार् है। 

4. सैद्धार्न्तिक मॉडल यार् उपार्गम- 

 इस मॉडल पर आधार्रित परीक्षणों में मार्नव व्यक्तित्व के सिद्धार्न्तों को ध्यार्न में रखते हुये एकांशों क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है। कहने क आशय यह है कि व्यक्तित्व के सिद्धार्न्तों को ध्यार्न में रखते हुये एकांशों क चयन कियार् जार्तार् है। 

उदार्हरण- जैसे कि व्यक्तित्व के किसी सिद्धार्न्त के अनुसार्र व्यक्तित्व तीन महत्वपूर्ण आयार्म है- संवेग (Emotion), चिन्तन (Thoughts) और व्यवहार्र (Behaviour)। तो इस स्थिति में सैद्धार्न्तिक मॉडल पर आधार्रित जिस परीक्षण क निर्मार्ण कियार् जार्येगार्, उसेके एकांश ऐसे होंगे, जिससे संवेग, विचार्र एवं व्यवहार्र व्यक्तित्व की तीनों विभओं क मार्पन हो सकें। 

आपकी जार्नकारी के लिये बतार् दें कि सैद्धार्न्तिक मॉडल पर आधार्रित परीक्षणों के एकांशों क स्वरूप भी प्रत्यक्ष मूल्य मॉडल के अनुसार्र बनने वार्ले परीक्षणों के एकांशों के समार्न ही स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होते हैं। इस मॉडल पर आधार्रित सर्वार्धिक लोकप्रिय परीक्षण हैं- ‘‘एडवाड्स पर्सनल प्रेफरेन्स शेड्यूल’’ (Edwards personal preference schedule)। इसक निर्मार्ण एड्वाडस ने कियार् थार्। 

इस प्रकार उपरोक्त विवरण से आप समझ गये होंगे कि वस्तुनिष्ठ विधि क्यार् है तथार् इसके प्रमुख उपार्गम यार् मॉडल कौन-कौन से है तथार् इन उपार्गमों की प्रमुख विशेषतार्यें क्यार् हैं अर्थार्त्- ये किन-किन सिद्धार्न्तों पर आधार्रित हैं। 

प्रमुख वस्तुनिष्ठ विधियार्ँ- 

  1. मार्इनेसोटार् मल्टीफेजिक पर्सनार्लिटी इन्वेंट्री-2 (MMPI-2) 
  2. कैलिफोर्नियार् सार्इकोलोजिकल आविष्कारिका 
  3. बेल समार्योजन आविष्कारिका 
  4. कैटेल सोलह व्यक्तित्व-कारक प्रश्नार्वली 

1. मार्इनेसोटार् मल्टीफेजिक पर्सनार्लिटी इन्वेंट्र-2 (MMPI-2)-

मार्इनेसोटार् मल्टीफेजिक पर्सनार्लिटी इन्वेंट्र-2 (MMPI-2)- क प्रतिपार्दन मूल रूप से हार्थार्वे एवं मैककिनले द्वार्रार् सन् 1940में कियार् गयार् थार्। इसमें 550 एकांश थे और प्रत्येक एकांश के लिये निम्न तीन उत्तर थे।

  1. सत्य 
  2. असत्य 
  3. कहार् नहीं जार् सकतार् 

एम.एम.पी.आर्इ. के मौलिक प्रार्रूप के दो प्रतिरूप उपलब्ध होते हैं- (1) वैयक्तिक कार्ड प्रतिरूप एवं (2) सार्मूहिक पुस्तिक प्रार्रूप। इसके मौलिक प्रार्रूप में नैदार्निक नार्पनियों की संख्यार् दस तथार् वैधतार् मार्पनियों की संख्यार् तीन है। 

एम.एम.पी.आर्इ. क मूल उद्देश्य व्यक्तित्व के रोगार्त्मक शीलगुणों क मार्पन करनार् है। अत: इसकी 10 नैदार्निक मार्पनियों 10 रोगार्त्मक शीलगुणों क मार्पन करती है और वैधतार् मार्पनियों पर हो। के प्रार्प्तार्ंकों द्वार्रार् व्यक्ति द्वार्रार् जो अनुक्रियार् व्यक्त की जार्ती है उसकी विश्वसनीयतार् एवं वैधतार् ज्ञार्त की जार्ती है। 

मौलिक MMPI में समय परिस्थिति एवं आवश्यकतार् के अनुसार्र अनेक संशोधन हुये। इन सभी में जो सर्वार्धिक नवीनतम संशोधन है, उसे MMPI2 नार्म दियार् गयार्। क्यार् आप जार्नते है, यह संशोधन किनके द्वार्रार् कियार् गयार्? इस संशोधन में वुचर, डार्हस्ट्रोम, ग्रार्हम, टेलेमन तथार् केमर द्वार्रार् महत्वपूर्ण भूमिक क निर्वार्ह कियार् गयार्। MMPI2 की मुख्य विशेषतार्यें निम्नार्नुसार्र हैं- 10 नैदार्निक मार्पनी एवं तीन वैधतार् मार्पनी है।  इसमें कुल 567 एकांश है, जिनमें से प्रथम 370 एकांश मौलिक MMPI से ही लिये गये हैं और इनमें केवल सम्पार्दकीय परिवर्तन ही किये गये हैं। इन 370 एकांशों के मार्ध्यम से 10 नैदार्निक विभार्ओं क मार्पन कियार् जार्तार् है और शेष 197 एकांशों द्वार्रार् व्यक्तित्व के अन्य पक्षों क मार्पन कियार् जार्तार् है। 197 एकांशों में से 107 सर्वथार् नये है। एम.एम.पी.आर्इ-2 की नैदार्निक एवं वैधतार् मार्पनियों क वर्णन है- 

1. नैदार्निक मार्पनी (Clinical scale) – 

  1. रोगभ्रम-  इस मार्पनी द्वार्रार् व्यक्ति की उस प्रवृत्ति क मार्पन होतार् है, जिसमें वह शार्रीरिक स्वार्स्थ्य एवं शार्रीरिक कार्यो के प्रति आवश्यकतार् से अधिक चिंतित रहतार् है। इस मार्पनी में कुल 32 एकांश होते हैं। 
      1. विषार्द- इस मार्पनी द्वार्रार् भार्वनार्त्मक विकृतियों जैसे कि उदार्सी, अकेलार्पन, अभिपे्ररण एवं ऊर्जार् में कमी, असमर्यतार् इत्यार्दि क मार्पन कियार् जार्तार् है। इसमें 57 एकांश होते हैं। 
          1. रूपार्न्तर हिस्टीरियार्- इसमें व्यक्ति की ऐसी स्नार्युविकृत प्रवृत्ति क मार्पन कियार् जार्तार् है, जिसके अन्तर्गत रोगी अपनी मार्नसिक चिन्तार्ओं एवं संघर्षो से निजार्त पार्ने के लिये कुछ शार्रीरिक लक्षण विकसित कर लेतार् है। इसमें 60 एकांश पार्ये जार्ते हैं। 
              1. मनोविकृत विचलन- इसमें व्यक्ति की सार्मार्जिक एवं नैतिक नियमों क उल्लंघन करने की प्रवृत्ति तथार् दण्ड मिलने पर भी उससे कुछ भी शिक्षार् न ग्रहण करने की प्रवृत्ति क मार्पन होतार् है। इसमें 50 एकांश होते हैं। 
                  1. पुरूषत्व – नार्रीत्व- इस मार्पनी द्वार्रार् व्यक्ति के सीमार्ंतीय यौन भूमिक करने की प्रवृत्ति क मार्पन कियार् जार्तार् है। इसमें कुल 56 एकांश होते हैं। 
                      1. स्थिर व्यार्मोह- इसके द्वार्रार् व्यक्ति की बिनार् किसी कारण यार् तर्क के शंका-सन्देह करने की प्रवृत्ति एवं दंडार्त्मक एवं उत्कृष्टतार् से संबंधित भ्रार्न्ति क मार्पन कियार् जार्तार् है। इसमें कुल 40 एकांश होते हैं। 
                          1. मनोदौर्बल्यतार्- इसके द्वार्रार् व्यक्ति में अताकिक एवं असार्मार्न्य डर, मनोग्रस्ति, बार्ध्यतार् इत्यार्दि प्रवृत्तियों क मार्पन कियार् जार्तार् है। इसमें 48 एकांश है। 
                              1. मनोविदार्लितार्- व्यक्ति में असार्मार्न्य चिन्तन यार् व्यवहार्र करने की प्रवृत्ति क मार्पन इस मार्पनी द्वार्रार् कियार् जार्तार् है।इस मार्पनी में कुल 78 एकांश हैं। 
                                  1. अल्पोन्मार्द-इस मार्पनी द्वार्रार् व्यक्ति के विचार्रों में बिखरार्व, सार्ंवेगिक उत्तेजनार्, अतिक्रियार् इत्यार्दि क मार्पन होतार् है। इसमें कुल 46 एकांश हैं। 
                                      1. सार्मार्जिक अन्र्मुखतार्- इस मार्पनी द्वार्रार् व्यक्ति की अन्र्मुखी प्रवृत्ति जैसे- सार्मार्जिक अवसरों यार् समार्रोहों में शार्मिल न होने की प्रवृत्ति, लज्जार्शीलतार्, स्वयं में खोये रहने यार् अकेले रहने की प्रवृत्ति असुरक्षार् इत्यार्दि क मार्पन होतार् है। इसमें 69 एकांश होते हैं। 

                                          2. वैधतार् मार्पनी- 

                       नैदार्निक मार्पनी के बार्द अब वैधतार् मार्पनी क विवेचन निम्नार्नुसार्र है-

                      1. (Cannot say) –इस मार्पनी में वे एकांश आते हैं, जिनक उत्तर व्यक्ति नहीं दे पार्तार् है। जब इस मार्पनी में एकांशों की संख्यार् अधिक हो जार्ती है तो इससे निम्न बार्तों क पतार् चलतार् है- 
                        1. यार् तो व्यक्ति एकांशों को ठीक ढंग से नहीं समझ पार् रहार् है। 
                        2. व्यक्ति परीक्षक के सार्थ सहयोग की प्रवृत्ति नहीं अपनार् रहार् है अथवार् 
                        3. व्यक्ति ने रक्षार्त्मक मनोवृत्ति (Defensive attitude) अपनार् लियार् है। 
                      2. “Cannot say” वैधतार् मार्पनी के संबंध में मनोवैज्ञार्निकों द्वार्रार् कहार् गयार् है कि- ‘‘इन तीन वैधतार् मार्पनियों के अतिरिक्त एक और वैधतार् मार्पनी है, जिसे? यार् से संकेतिक कियार् जार्तार् है तथार् इसमें उन एकांशों को रखते हैं। जिनक उत्तर व्यक्ति नहीं दे पार्तार् है।’’ 
                      3.  L (Lie) – इस मार्पनी में कुल 15 एकांश है। इसके द्वार्रार् व्यक्ति की झूठ बोलने यार् अपने आपको गलत ढंग से प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति क मार्पन कियार् जार्तार् है। 
                          1.  F (Frequency or infrequency) – यदि प्रयोज्य द्वार्रार् इस मार्पनी पर उच्च अंक प्रार्प्त किये गये हैं तो इससे उस व्यक्ति की निम्न प्रवृत्तियों क पतार् चलतार् है- 
                            1. व्यक्ति ने एकांशों के प्रति अनुक्रियार् व्यक्त करने में लार्परवार्ही की है। यार् 
                            2. अपने रोगार्त्मक लक्षणों को जार्न बूझकर अधिक बढ़ार्-चढ़ार्कर पेश कियार् है। 
                            3. इसमें कुल 60 एकांश है। 
                          2. K (Correction) – इस मार्पनी द्वार्रार् व्यक्ति के अपनी समस्यार् के बार्रे में आवश्यकतार् से अधिक कहने अथवार् अपनी परेशार्नी यार् समस्यार् के विषय में अत्यधिक सुरक्षार्त्मक दृष्टिकोण अपनार्ने की प्रवृत्ति क मार्पन कियार् जार्तार् है। इसमें कुल 30 एकांश है। उपर्युक्त विशेषतार्ओं के अतिरिक्त एम.एम.पी.आर्इ-2 की कुछ अन्य विशेषतार्यें भी है, जो हैं- 
                            1. MMPI-2.2 में एकांशों क समूहन करके कुल अन्तर्वस्तु मार्पनियार्ँ बनार्यी गयी हैं, जिनकी संख्यार् 15 है। इन मार्नियों द्वार्रार् व्यक्तित्व के 15 ऐसे कारकों क मार्पन करनार् संभव हो पार्यार् है, जिनक मार्पन 10 नैदार्निक मार्पनियों द्वार्रार् नहीं कियार् जार्तार् है। इन कारकों में डर, दुश्चिन्तार्, क्रोध, पार्रिवार्रिक समस्यार्यें इत्यार्दि प्रमुख है। 
                            2.  MMPI-2 में 4 वर्धतार् मार्पनियों के अतिरिक्त दो और नयी वैधतार् मार्पनियों को शार्मिल कियार् गयार् है। इनक उपयोग उन चार्र वैधतार् मार्पनियों के सार्थ ही करनार् होतार् है। ये दो वैधतार् मार्पनियार्ँ हैं- 
                              1. VRIN – The variable Response Inconsitency
                              2. TRIN – The True Resonse Inconsistency

                              उपर्युक्त दोनों मार्पनियों के मार्ध्यम से व्यक्ति के एकांशों के प्रति असंगत ढंग से प्रतिक्रियार् व्यक्त करने की प्रवृत्ति क मार्पन होतार् है। इस प्रकार आप जार्न चुके है कि एम.एम.पी.आर्इ.-2 परीक्षण क्यार् है? यद्यपि अनेक मनोवैज्ञार्निकों ने कुछ आधार्रों पर इस परीक्षण की आलोचनार् की है। लेकिन फिर भी व्यक्तित्व के मार्पन में एम.एम.पी.आर्इ क जो महत्व है उसे हम नकार नहीं सकते।

                              2. कैलिफोर्नियार् सार्इकोलॉजिकल आविष्कारिका- 

                              1. इस परीक्षण क निर्मार्ण सन् 1957 में हुआ और सन् 1987 में गफ ने इसमें कर्इ संशोधन किये। 
                              2. इस परीक्षण द्वार्रार् व्यक्तित्व के सार्मार्न्य शीलगुणों को मार्पार् जार्तार् है। 
                              3. इसमें कुल 462 एकांश है। जिनमें से आधे एकांश एम.एम.पी.-1 से ही लिये गये है। 
                              4. इन एकांशों के प्रति व्यक्ति को सही-गलत के रूप में अनुक्रियार् व्यक्त करनी होती है। 
                              5. इस परीक्षण में भी तीन वैधतार् मार्पनियार्ँ है। 
                              6. इस परीक्षण की वैधतार् एवं विश्वसनीयतार् अत्यधिक है।

                               3. बेल समार्योजन आविष्कारिका- 

                            इस परीक्षण क उद्देश्य यह जार्ननार् होतार् है कि एक व्यक्ति को समार्योजन करने में किन-किन समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़ रहार् है अर्थार्त् उसकी समयोजार्न संबंधी परेशार्नियार्ँ क्यार्-क्यार् है?  जैसार् कि नार्म से ही स्पष्ट है महार्न् मनोवैज्ञार्निक बेल द्वार्रार् इसक निर्मार्ण किये जार्ने के कारण ही इसक नार्म ‘‘बेल समार्योजार्न आविष्कारिक है। इसक प्रतिपार्दन सन् 1934 में कियार् गयार् थार्।  इस परीक्षण के दो रूप यार् फाम हैं-

                            1. विद्यार्थ्र्ार्ी फाम- इसमें कुल 140 एकांश होते हैं। ये एकांश चार्र क्षेत्रों – 1. घर 2. स्वार्स्थ्य  3. सार्मार्जिक अवस्थार् 4. सार्ंवेगिक अवस्थार्-से संबंधित समार्योजन समस्यार्ओं को जार्नने में समार्यक होते हैं। 
                                1. व्यार्वसार्यिक फाम-  इसमें कुल 160 एकांश होते हैं। 140 एकांश विद्यार्थ्र्ार्ी फाम के तथार् इनमें 20 एकांश और जोड़ दिये जार्ते हैं। इसमें कुल 5 क्षेत्र आते है।  इससे व्यस्कों की समार्योजन क्षमतार् क मार्पन होतार् है। 

                                    4. कैटेल सोलह व्यक्तित्व – कारक प्रश्नार्वली- 

                                यह परीक्षण वस्तुनिष्ठ विधि के ‘‘कारक वैश्लेषिक मॉडल’’ पर आधार्रित है। इसक निर्मार्ण कैटेल द्वार्रार् कियार् गयार्। इसके द्वार्रार् ऐसे व्यक्तियों के 16 शीलगुणों क मार्पन कियार् जार्तार् है, जिनकी आयु 17 सार्ल से ज्यार्दार् हो। इस परीक्षण के कर्इ फाम हैं। उपर्युक्त वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के अतिरिक्त भी अनेक दूसरे वस्तुनिष्ठ परीक्षण है। जैसे कि-

                                1.  Eysenck personality questionnaire (EPQ) 
                                2. Personality research form (PRF)
                                3. Basic personality inventory इत्यार्दि 
                                  1. वस्तुनिष्ठ विधि के गुण एवं दोष- 

                                   गुण- 

                                  1. शीघ्रगार्मी मार्प- मनोवैज्ञार्निकों क मार्ननार् है कि वस्तुनिष्ठ विधियों क क्रियार्न्वयन करनार् अपेक्षार्कृत अधिक सरल एवं सुविधार्जनक है। इनके द्वार्रार् एक सार्थ अर्थार्त् एक समय में ही अनेक व्यक्तियों के व्यक्तित्व क मार्पन आसार्नी से कियार् जार् सकतार् है। 
                                  2. नैदार्निक एवं सार्मार्न्य दोनों ही परिस्थितियों में प्रयोग- इन परीक्षणों क प्रयोग नैदार्निक एवं सार्मार्न्य दोनों ही परिस्थितियों में समार्न रूप से कियार् जार् सकतार् है। 

                                  दोष- 

                                  1. उच्च वैधतार् क अभार्व- आलोचकों क मत है कि वस्तुनिष्ठ विधियों में पर्यार्प्त वैधतार् क अभार्व होतार् है। 
                                  2. एकांशों क अत्यधिक प्रत्यक्ष एवं स्पष्ट होनार्- वस्तुनिष्ठ विधियों में एकांश इतने अधिक स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होते हैं कि व्यक्ति को बहुत आसार्नी से पतार् चल जार्तार् है कि उससे क्यार् पूछार् जार् रहार् है। इसक परिणार्म यह होतार् है कि वह पूरी र्इमार्नदार्री के सार्थ अनुक्रियार् व्यक्त नहीं करतार् है। इन परीक्षणों में बहुत बार्र ऐसी संभार्वनार् होती है कि व्यक्ति एकांश क सही उत्तर न देकर अपने मन से उसक कोर्इ दूसरार् उत्तर दे दें। तो ऐसी स्थिति में परीक्षण के परिणार्मों की वैधतार् एवं विश्वसनीयतार् संदिग्ध हो जार्तार् है। 
                                  3. अनपढ़ छोटे बच्चों पर क्रियार्न्वयन संभव नहीं- वस्तुनिष्ठ परीक्षणों के एकांशों में भार्षार् क प्रयोग कियार् जार्तार् है अर्थार्त् इनक स्वरूप शार्ब्दिक होतार् है। अत: इनक प्रयोग केवल उन्हीं व्यक्तियों पर कियार् जार्तार् है। जो शिक्षित हो। अनपढ़, छोटे बच्चों जिनको भार्षार् की समझ नहीं है। उन पर इनक क्रियार्न्वयन नहीं कियार् जार् सकतार्। अत: इन परीक्षणों की उपयोगितार् यहार्ँ पर सीमित हो जार्ती है। 
                                  4. व्यक्तित्व क मार्पन अलग-अलग शीलगुणों द्वार्रार्- आलोचकों के अनुसार्र वस्तुनिष्ठ विधियों में व्यक्तित्व क मार्पन अलग-अलग शीलगुणों के रूप में होतार् है। किन्तु इस प्रकार से व्यक्तित्व की ठीक-ठीक व्यार्ख्यार् नहीं हो पार्ती है। ‘‘चूँकि व्यक्तित्व आविष्कारिक में व्यक्तित्व क मार्पन सम्पूर्ण रूप से नहीं होतार् है। अत: इस विधि को बहुत वैज्ञार्निक नहीं मार्नार् जार् सकतार् है।’’ 

                                  उपरोक्त विवरण से आप समझ गये होंगे कि मनोवैज्ञार्निक परीक्षण की वस्तुनिष्ठ विधियार्ँ क्यार् हैं? ये किस प्रकार से प्रक्षेपी विधियों से भिन्न हैं? प्रमुख वस्तुनिष्ठ परीक्षण कौन-कौन से हैं और किस प्रकार से इनक उपयोग कियार् जार्तार् है। इत्यार्दि। 

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