भूमि सुधार्र क्यार् है?
भूमि सुधार्र एक विस्तृत धार्रणार् है जिसमें सार्मार्जिक न्यार्य की दृष्टि से जोतों के स्वार्मित्व क पुनर्वितरण तथार् भूमि के इष्टतम प्रयोग की दृष्टि से खेती किए जार्ने वार्ले जोतों क पुनगर्ठन सम्मिलित है। नोबल पुरस्कार प्रार्प्त महार्न अर्थशार्स्त्री प्रो0 गुन्नार्र मिर्डल के अनुसार्र-’’भूमि सुधार्र व्यक्ति और भूमि के सम्बन्धों में नियोजन तथार् संस्थार्गत पुनर्गठन है।’’

स्वतंत्रतार्-प्रार्प्ति के समय देश के अधिकांश कृषि क्षेत्र में वार्स्तविक काश्तकार तथार् भूमि के स्वार्मी के बीच मध्यस्थों की एक बड़ी सेनार् विद्यमार्न थी। इनके कारण जहार्ँ एक ओर काश्तकार को भूमि की उपज क बड़ार् भार्ग मध्यस्थों को देनार् पड़तार् थार्, वही दूसरी ओर वह इन पर पूरी तरह आश्रित थार्। भू-धार्रण की उसे कोई गार्ंरटी नही दी जार्ती थी और लगार्न की दरों में भी निश्चिततार् नहीं थी। स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के बार्द ‘‘जोतने वार्ले को भूमि’’ के नार्रे को वार्स्तविकतार् में बदलने के लिए भूमि-सुधार्र किए गयें। सबसे पहले उत्तर प्रदेश लिए कानून बनार्यार् गयार्।

भूमि सुधार्र के उद्देश्य

भूमि व्यवस्थार् सम्बन्धी सुधार्र हेतु स्वतंत्रतार्-प्रार्प्ति के बार्द सरकार द्वार्रार् निर्णय लियार् गयार् जिससे मूलत: निम्न उद्वेश्यों की पूर्ति की आशार् थी।

  1. कृषि क्षेत्र में विद्यमार्न संस्थार्गत विसंगतियों को दूर करनार् तथार् इसे तर्क संगत और आधुनिक बनार्नार्। जैसे- जोत क आकार, भूमि स्वार्मित्व, भूमि उत्तरार्धिकार ,काश्तकार की सुरक्षार्, आधुनिक संस्थार्गत सहार्यतार् और आधुनिकीकरण आदि पर ध्यार्न दियार् जार्नार् थार्।
  2. आर्थिक असमार्नतार् को समार्प्त करनार् थार्, जिससे सार्मार्जिक समार्नतार् को प्रार्प्त कर लोक कल्यार्णकारी रार्ज्य की स्थार्पनार् हो सके।
  3. कृषि उत्पार्दन में वृद्धि कर आत्म निर्भरतार् प्रार्प्त करनार्।
  4. गरीबी उन्मूलन एंव लोगो में सार्मार्न्य मार्न्यतार्एँ प्रदार्न करनार्।

भूमि सुधार्र की आवश्यकतार्

भार्रत में भूमि सुधार्रों की आवश्यकतार् इन  कारणों से महसूस की गई थी।

  1. स्वतंत्रतार् के समय देश में कृषि पदाथो की भार्री कमी थी। अत: कृषि उत्पार्दन बढ़ार्ने के लिए भूमि सुधार्र कार्यक्रम आवश्यक है।
  2. सार्मार्जिक न्यार्य और समार्नतार् के विकास हेतु सुधार्र कार्यक्रम द्वार्रार् एकत्रित भूमि को भूमिहीनों में वितरित करनार्।
  3. औद्योगिक क्षेत्र में अनेक उद्योग के लिए कच्चार् मार्ल भूमि से ही प्रार्प्त होतार् है। भूमि सुधार्रों की आवश्यकतार् पर बल देते हुए डॉ0 रार्धार्कमल मुखर्जी ने अपनी पुस्तक इकनॉमिक प्रॉबलम्स ऑफ इड़ियार् में लिखार् थार् कि ‘‘वैज्ञार्निक कृषि अथवार् सहकारितार् को हम कितनार् ही अपनार् ले, पूर्ण सफलतार् हमें तब तक नहीं मिलेगी जब तक कि हम भूमि व्यवस्थार् में वार्ंछित सुधार्र नहीं कर देते।’’प्रो0 सैग्युलसन के अनुसार्र- ‘‘सफल भूमि सुधार्र के कार्यक्रमों ने अनेक देशों में मिटृी को सोने में बदल दियार् है।’’

भूमि सुधार्रों क स्वरूप

हम सुविधार् के अनुसार्र भूमि सुधार्रों को इन  शीर्षकों के अंतर्गत समीक्षार् कर सकते है-

  1. मध्यस्थों वर्गों क उन्मूलन
  2. जोतो की उच्चतम सीमार् क निर्धार्रण 
  3. काश्तकारी सुधार्र
    1. लगार्न क नियमन
    2. भू-धार्रण की सुरक्षार्
    3. काश्तकारों क पुनग्रहण
    4. भूमिहीन कामकारों को भूमि प्रदार्न करनार्
  4. कृषि क पुनर्गठन
    1. चकबंदी
    2. भूमि के प्रबंधन में सुधार्र
    3. सहकारी कृषि

जंमीदार्री तथार् मध्यस्थों क उन्मूलन

भूमि सुधार्र व्यवस्थार् क सर्वप्रमुख कार्य जंमीदार्री यार् मध्यस्थों क उन्मूलन थार्। उत्तर प्रदेश जंमीदार्री उन्मूलन कानून क पार्लन करने में अग्रणी रार्ज्य थार् जहार्ँ एक विधेयक 7 जूलार्ई 1949को प्रस्तुत कियार् गयार् जो 16 जनवरी 1951 को पार्स हो गयार्। क्रमश बम्बई व हैदरार्बार्द में 1949-50, म0प्र0 व असम में 1951,पंजार्ब, रार्जस्थार्न व उडीसार् में 1952 तथार् हिमार्चल कर्नार्टक व पश्चिमी बंगार्ल में 1954-55 में अधिनियम पार्रित किए गए। देश के लगभग सभी रार्ज्यों में जंमीदार्र ,जार्गीरदार्र एँव नार्मणदार्र जैसे मध्यस्थों के भूमि अधिकारों को समार्प्त कियार् गयार्। इन मध्यस्थों के पार्स देश की लगभग 40 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि पर अधिकार थार्। इनकी समार्प्ति से देश के लगभग दो करोड़ से अधिक किसार्नों को लार्भ पहुँचार् है और उन्हें भूमि में स्थार्ई तथार् पैतृक अधिकार प्रदार्न कियार् गयार्।

जोतो की उच्चतम सीमार् क निर्धार्रण

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों क प्रमुख ध्येय में जोतो की उच्चतम सीमार् क निर्धार्रण थार्। इस कार्य को करने की आवश्यक क कारण प्रथम रूप में भविष्य में जोतों के आकार में वृद्धि को रोकनार् थार् एंव दूसरार् बड़ी जोतों के अतिरिक्त भू-भार्ग को लेकर उनको भूमिहीनों में वितरित कर समार्जिक न्यार्य करनार् थार्।

उच्चतम जोत सीमार् निर्धार्रण के लार्भ

उच्चतम जोत सीमार् निर्धार्रण के लार्भ इंगित है-

  1. उच्चतम जोत की सीमार् निर्धार्रण से भूमि के असमार्न वितरण को एकत्रित कर वंचित लोगों में बार्ंटार् गयार्।
  2. भूमि अधिकार की प्रार्प्ति से रार्जनीतिक जार्गृति एवं समार्जवार्दी अर्थव्यवस्थार् के निर्मार्ण में सबलतार् प्रार्प्त हुई।
  3. मध्य एवं छोटी जोतो की स्थार्पनार् से लोगों में समार्नतार् क वार्तार्वरण बनतार् है जो सहकारी कृषि क आधार्र बनतार् है।
  4. मध्य एवं छोटे जोते श्रम प्रधार्न होते है जो मशीनीकरण पर अंकुश लगार्कर रोजगार्र में वृद्वि की द्योतक है।
  5. उच्चतम जोत की सीमार् व्यक्ति के पार्स भूमि की उपलब्धतार् को कम करतार् है। जिस कारण गहन कृषि को प्रोत्सार्हन मिलतार् है।
  6. उच्चतम जोत की सीमार् केन्द्रीयकरण की प्रवृति को हतोत्सार्हित करती है।
  7. उच्चतम जोत सीमार् क सबसे बड़ार् लार्भ कृषि भूमि के अपव्यय को रोकनार् है बड़ी जोत में कुछ न कुछ भूमि कृषि कार्य से विरत रह जार्ती है, जबकि छोटी जोत की सम्पूर्ण भूमि क उपयोग हो जार्तार् है।

उच्चतम जोत सीमार् निर्धार्रण से हार्नि

उच्चतम जोत सीमार् निर्धार्रण के विपक्ष में जो तर्क दिए जार्ते है, वे ही इसके अवगुण यार् हार्नि है, जो है:-

  1. कृषि क वृहद रूप में उपयोग न हो पार्नार्, जिस कारण मशीनीकरण और उच्च तकनीकी ज्ञार्न क लार्भ नहीं मिल पार्तार् है।
  2. शहरी क्षेत्र में भूमि की उच्चतम सीमार् नहीं होनार् और कृषि में भूमि की उच्चतम सीमार् विषमतार् को पैदार् करतार् है।
  3. भूमि की उर्वरतार् एवं सिंचार्ई की भिन्नतार् के सार्थ उसकी कोटि भी कई प्रकार की है, इस कारण सभी क्षेत्रों में कृषि भूमि की एक सी उच्चतम सीमार् निर्धार्रण व्यार्वहरिक रूप में सही नहीं है। 4. ऐसी आशार् थी कि भूमिहीन लोगो के एकत्रित भूमि क वितरण कर सार्मार्जिक न्यार्य की स्थार्पनार् की जार्एगी, जबकि एकत्रित भूमि की मार्त्र कम एवं अपेक्षित लोगो की अधिक संख्यार् के कारण उनकी समस्यार् क उचित समार्धार्न नहीं कियार् जार् सक है।

काश्तकारी व्यवस्थार् में सुधार्र – 

काश्तकारी व्यवस्थार् में भूमि क स्वार्मी स्वंय कृषि न कर अन्य किसार्नों को पटृे पर देतार् थार्। प्रतिफल में किरार्यार् यार् लगार्न लेतार् थार्। पटृेदार्र किसार्न भी कहीं-कहीं आगे इसे अन्य किसार्नों को पटृे पर दे देते थे। काश्तकारो क निम्न स्वरूप उस समय में दिखार्ई पड़तार् थार्।

  1. स्थार्यी काश्तकार- स्थार्यी काश्तकार वह थे जिन्हें भूमि से बेदखल नहीें कियार् जार् सकतार् थार्। परन्तु जंमीदार्र लार्गन में वृद्वि कर सकतार् थार्।
  2. ऐच्छिक काश्तकार- ये काश्तकार थे जिन्हें जंमीदार्र कभी भी भूमि से बेदखल कर सकतार् थार्।
  3. उपकाश्तकार- काश्तकार किसार्न जिन किसार्नों को पटृे पर भूमि देते थे उन्हे उपकाश्तकार कहते थे। इनकी स्थित अत्यन्त दयनीय थी इन्हे तो कभी-कभी लगार्न उपज क दो तिहार्ई तक देनार् होतार् थार्।

काश्तकारी व्यवस्थार् में सुधार्र क मुख्य उद्देश्यों काश्तकारों को भूमि पर कानूनी रूप में स्थार्यी अधिकार प्रदार्न करनार् थार्, सार्थ ही बीमार्र, अपंग, विधवार् असर्मथ और सैनिक आदि जो स्वंय खेती नहीं कर सकते है पटृे पर प्रदार्न करने की छूट देनार् थार्। शोषणार्त्मक कार्यो पर रोक हेतु जंमीदार्री अधिनियम में काश्तकारी व्यवस्थार् में निम्न सुधार्र किए गए-

लगार्न क नियमन-

 लगार्न नियमन कानून लार्गू होने से पूर्व पटृेदार्र कुल उपज क आधे से अधिक भार्ग भूमि स्वार्मी को लगार्न के रूप में देते थे। प्रथम योजनार् में ही इस सन्दर्भ में नियमन बनार्यार् गयार् जो सार्मार्न्य तथार् 20 से 25 प्रतिशत से अधिक न हो जैसार्कि तलिक में विभिन्न रार्ज्यों के सन्दर्भ में सिंचित और असिंचित एवं शुष्क भूमि के लियार् इंगित है।

भू-धार्रण की सुरक्षार्- 

काश्तकारी व्यवस्थार् में महत्वपूर्ण कार्य पटृेदार्रों को पटृे की सुरक्षार् प्रदार्न करने के सन्दर्भ में उठार्यार् गयार्। बडे़ पैमार्ने पर पटृेदार्रों की बेदखली पर रोक लगार्ई गयी। भूमि की एक न्यूनतम सीमार् पटृेदार्रों के पार्स अवश्य रहने दी गई। कुछ रार्ज्यों में पटृेदार्रों को अन्यत्र भूमि दिलार्ने क उत्तरदार्यित्व दियार् गयार्।

काश्तकारों को भूमि क स्वार्मित्व तीन प्रकार से दियार् गयार्

  1. जो काश्तकार दूसरों की भूमि जोत रहे थे वे स्वंय को भूमि क स्वार्मी घोषित कर दिए गए। इनमें जमीन के मार्लिक को मुआवने देने को कहार् गयार्। न देने पर सरकार ने वसूली क दार्यित्व लियार्। यह व्यवस्थार्- गुजरार्त, महार्रार्ष्ट्र, मध्य प्रदेश और रार्जस्थार्न में की गई।
  2. सरकार ने स्वंय भूमि क मुआवजार् मार्लिकों को प्रदार्न कियार् तथार् काश्तकारों से बार्द में किस्तों में लियार् गयार्। यह व्यवस्थार् दिल्ली में की गई।
  3. सरकार ने काश्तकारों से सीधार् सम्पर्क बनार्यार् गयार् और उन्हें दो विकल्प दिए गये प्रथम वह भूमि क पूरार् मूल्य देकर स्वार्मित्व के अधिकार को प्रार्प्त करे द्वितीय सरकार को लगार्न देते रहें। इस प्रकार की व्यवस्थार् केरल एवं उ0प्र0 में की गई।

काश्तकारों क पुनग्रहण- 

सभी रार्ज्यों में काश्तकारों को भू-धार्रण अधिकार प्रदार्न करने के लिए कानून बनार्ए गए। इसके अन्तर्गत जो काश्तकार 8-से 10 वर्ष से खेती कर रहे थे उन्हें जमीन पर स्वार्मित्व क अधिकार दियार् गयार्। लगभग 1करोड़ 14 लार्ख काश्तकारों को 1.5 करोड़ एकड़ भूमि पर स्वार्मित्व प्रदार्न कियार् गयार्।

भूमिहीन कामगार्रो को भूमि प्रदार्न करनार्- 

उच्चतम सीमार् के कारण प्रार्प्त भूमि एवं ग्रार्म-दार्न आंदोलन के द्वार्रार् बड़े भू-स्वार्मियों से प्रार्प्त भूमि को भूमिहीन श्रमिकों में वितरित कियार् गयार् तार्कि भूमि संबन्धी असमार्नतार् को दूर कियार् जार् सके।

कृषि क पुर्नगठन

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों के अन्र्तगत कृषि क पुर्नगठन कियार् गयार्, इसके लिए निम्नलिखित उपार्य किए गये।

चकबन्दी

चकबन्दी वह प्रक्रियार् है जिसमें किसार्न के इधर-उधर बिखरे हुए छोटी भूमि के बदले उसी किस्म भूमि के लिए एक स्थार्न पर प्रदार्न कर जार्री करनार् है। चकबन्दी दो प्रकार की है-

  1. ऐच्छिक चकबन्दी- यह लोगो की इच्छार् पर है, बड़ौदार् रियार्सत द्वार्रार् 1921में आरम्भ की गई।
  2. अनिवाय चकबन्दी- यह चकबन्दी कानूनी रूप में अनिवाय रूप से लार्गू की जार्ती है, इसकी शुरूआत 1928 में आंशिक चकबन्दी के रूप में म0 प्र0 में हुई थी। नौ रार्ज्य आन्ध्र प्रदेश, अरूणार्चल, मिजोरम, मणिपुर, मेद्यार्लय, त्रिपुरार्, नार्गार्लैण्ड़, तमिलनार्डु, व केरल में चकबन्दी कानून नही है, बार्कि सभी रार्ज्यों में चकबन्दी कानूनों के अन्र्तगत चकबन्दी की जार् रही है। पंजार्ब व हरियार्णार् में चकबन्दी कार्य पूर्ण है, उ0 प्र0 में भी 90 प्रतिशत कार्य पूरार् कियार् जार् चुक है।

भूमि के प्रंबधन में सुधार्र- 

भूमि सुधार्र कार्यक्रम की सफलतार् भूमि रिकार्ड व दस्तार्वेजों के अद्यतन बनार्ने से ही है। इस सन्दर्भ में व्यवस्थार् हो रही है। समस्त भूमि सुधार्र कानूनों को नौंवी अनुसूची में शार्मिल कियार् जार् चुक है। केन्द्रीय आयोजनार् के अन्र्तगत भूमि रिकार्डो क 12 वीं योजनार् के अन्त तक सभी जिलों में पूर्णतयार् कम्प्यूटरीकरण के लिए कार्य कियार् जार् रहार् है। बंजर भूमि क उपयोग, उन्नत पैदार्वार्र वार्ले बीजों क प्रयोग, कीटनार्शक दवार्इयों क प्रयोग आदि के द्वार्रार् भूमि क कुशल प्रबन्ध कियार् जार् रहार् है।

सहकारी कृषि- 

सहकारी कृषि क आशय किसार्नों के द्वार्रार् सहकारितार् के सिद्धार्न्तों के आधार्र पर संयुक्त रूप से कृषि करनार्, जो हमार्रे ग्रार्म स्वरार्ज्य क अवलम्बन थार्। देश में भूमि सुधार्रों क अन्तिम लक्ष्य सहकारी ग्रार्मीण अर्थव्यवस्थार् की स्थार्पनार् करनार् है। इसमें छोटे-छोटे किसार्न आपस में मिलकर बड़ी जोत के सभी लार्भों को प्रार्प्त करते हुए नवीन तकनीकी ज्ञार्न के आधार्र पर गहन कृषि करते है। लार्भ क वितरण भूमि की हिस्सेदार्री एवं परिश्रम को मिलार्कर कियार् जार्तार् है। पंचवर्षीयार् योजनार् में भूमि के छोटे-छोटे टुकडो को देखते हुए सहकारी खेती पर काफी जोर दियार् जार् रहार् है। सहकारी खेती के चार्र रूप हो सकते है-

  1. काश्तकार सहकारी खेती
  2. सार्मूहिक सहकारी खेती
  3. उन्नत सहकारी खेती
  4. संयुक्त सहकारी खेती

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों क आलोचनार्त्मक मूल्यार्ंकन

आजार्दी मिलने के बार्द से भूमि सुधार्र कार्यक्रम जिनके अन्र्तगत जंमीदार्री उन्मूलन, जोतों की उच्चतम सीमार् क निर्धार्रण, काश्तकारी उन्मूलन, लगार्न क नियमन, सहकारी कृषि, चकबन्दी एंव पटृे की सुरक्षार् जैसे कार्य किए गये, जिनके आधार्र पर भूमि सुधार्र कार्यक्रमों की प्रशंसार् भी की जार्ती है। जैसार्कि संयुक्त रार्ष्ट्र संद्य की भूमि सम्बन्धी रिपोर्ट में उल्लेख है कि,’’ भार्रत में भूमि सुधार्र के हार्ल के अधिनियम संख्यार्त्मक दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इतने अधिनियम कहीं भी नहीं बनार्ए गए हैं। अधिनियम लार्खों, करोड़ों कृषको पर प्रभार्व डार्लते हैं और भूमि के विशार्ल क्षेत्रों को अपने दार्यरे में सम्मिलित करते हैं। लेकिन ऐसार् होने पर भी भूमि सुधार्र कार्यक्रमों की प्रगति धीमी रही है।’’प्रो0 दार्न्तवार्लार् क मत है कि,’’ अब तक भार्रत में जो भूमि सुधार्र हुए है यार् निकट भविष्य में होने वार्ले हैं वे सभी सही दिशार् में है, लेकिन क्रियार्न्वयन के अभार्व में इसके परिणार्म सन्तोषजनक नहीं रहे हैं। ‘‘भूमि सुधार्र कार्यक्रमों की कुछ सफलतार् रही तो इसी धीमी गति के रूप में कुछ कमियार्ं भी इंगिंत होती है।

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों क प्रभार्व- 

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों क सकारार्त्मक पक्ष जिसे हम इन कार्यक्रमों क प्रभार्व भी कह सकते है निम्नवत रहे। अब खेती करने वार्ले किसार्न और सरकार में सीधार् सम्बन्ध स्थार्पित हो गयार्। भूमि की मार्लगुजार्री सीधे सरकार के पार्स जमार् करतार् है। किसार्नों को भूमि पर स्थार्ई अधिकार प्रार्प्त हो गये परिणार्म यह हुआ कि उपज वृद्विहेतु किसार्नों द्वार्रार् भूमि पर स्थार्यी सुधार्र कार्यक्रम भी शुरू किए जार्ने लगे। जंमीदार्री प्रथार् के अन्त होने से बेगार्रार् व नौकरी जैसी शोषण गतिविधियों से किसार्नों को मुक्ति मिल गई। किसार्नों को भूमि क स्वार्मित्व मिलार् जिस कारण वह उसमें स्थार्ई सुधार्र लार्गू कर अधिक परिश्रम करने लगें फलस्वरूप कृषि उपज में वृद्वि हुई। काश्तकार एवं जंमीदार्र एक ही स्तर पर आ गये इसे समार्ज में समतार् की भार्वनार् क विकास हुआ। लोग आपस में मिलकर सहकारितार् के सिद्धार्न्तों के अनुरूपसहकारी कृषि को बढार्वार् मिलार्। चकबन्दी के परिणार्म स्वरूप बिखरे खेतों को एकत्रित कियार् गयार् जहार्ं वह कृषि कार्यो हेतु एक सार्थ नवीन तकनीक से गहन कृषि कर सकते है। जोतो की उच्चतम सीमार् निर्धार्रण के कारण भूमि क उचित एवं न्यार्यपूर्ण वितरण हो सका। ग्रार्मीण व्यवस्थार् में एक नवीन परिवर्तन आयार् समार्ज के उस वर्ग को भी जमीन उपलब्ध हुई जिसके पार्स केवल मजदूरी क ही कार्य थार्। लोगों को आवार्स हेतु जमीन प्रदार्न की गई। लगार्न के रूप में सरकारी रार्जस्व में भी वृद्धि हुई। बेकार पड़ी हुई भूमि क समार्ज के वंचित वर्ग में वितरण हुआ। समार्न्तवार्दी व्यवस्थार् क अन्त हुआ। किसार्नों के सार्मार्जिक एवं आर्थिक स्तर में नूतम परिवर्तन आयार्।

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों की कमियार्ँ-

भूमि सुधार्र कार्यक्रम बड़ी ही तत्परतार् से लार्गू हुए परन्तु अवलोककन करने पर इनमें निम्नं कमियार्ँ इंगित होती है- भूमि सुधार्र कार्यक्रमोंं क प्रभार्वी क्रियार्न्वयन नहीं हो सका। प्रो0 गुन्नार्र मिर्डल ने अपनी पुस्तक एशियन ड्रार्मॉ में लिखार् है कि ‘‘भूमि सुधार्र कानून जिस ढंग से क्रियार्न्वित किए गए है उनसे सार्मार्न्यत उन कानूनों की भार्वनार्ओं और अभिप्रार्य को हतार्श होनार् पड़ार् है।’’लोगो (जमीदार्रों) द्वार्रार् काश्तकारों को बेदखल कर खुदकाश्त के लिए भूमि क पुर्नग्रहण कियार् गयार्। उच्चतम जोत की सीमार् से बचार्व हेतु जोतो क अनियमित एवं अवैधार्निक हस्तार्न्तरण हुआ जंमीदार्र, रार्जनेतार् एवं प्रशार्सनिक अधिकारी क गठजोड़ बनार् जो पूर्व में ही तथार्कधित रूप में एक ही थे, इन्होनें कानून की अवहेलनार् के सार्थ ही सार्थ भूमि सम्बन्धी रिकार्डो में भी परिवर्तन कियार्। भूमि सम्बन्धी प्रलेख अपूर्ण थे जिससे स्वार्मित्व निर्धार्रण करने में कठिनार्ई आई। भूमि सुधार्र सम्बन्धी कानून क जंमीदार्रों द्वार्रार् कानून की खार्मियों क लार्भ उठार्यार् गयार्। भूमि सुधार्र कार्यक्रमों में एकरूपतार् क अभार्व थार्। कई कार्यक्रम जैसे चंकबन्दी, उच्चतम जोत सीमार् कानून, सहकारी कृषि आदि को एक सार्थ लार्गू नहीं कियार् गयार्। भूमिहीन किसार्नों यार् छोटे काश्तार्कारों को भूमि के स्वार्मित्व प्रदार्न करने के सार्थ ही सार्ख यार् वित्त की उपलब्धतार् नहीं उपलब्ध करार्ई गई।

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों की सफलतार् के लिए सुझार्व-

भूमि सुधार्र कार्यक्रमों के प्रभार्वी सफलतार् हेतु निम्न कार्य आवश्यक है- भूमि सम्बन्धी रिकार्डो क पूर्णतयार् नवीन करण कियार् जार्यें सार्थ ही सरल सुलभतार् हेतु पूर्णतयार् कम्प्यूटीकरण कियार् जार्ए। एक अच्छी प्रशार्सनिक तत्रं क निर्मार्ण कियार् जार्ए। भूमि सुधार्र कार्यक्रमों से सन्द्रर्भित स्पेशल अदार्लत स्थार्पित की जार्ए जहॉ गरीबी लोगों को नि:शुल्क न्यार्य प्रदार्न कियार् जार्ए सार्थ ही वह त्वरित निर्णय लिए जार्ए। किसार्नों को भूमि में स्थार्ई विकास हेतु सार्ख एवं वित्त की सरलतार् से उपलब्धतार् सुनिश्चित कियार् जार्नार् चार्हिए। खेतिहर मजदूर व बटार्ई वार्लों की भी भूमि सुधार्र कार्यक्रमों के क्रियार्न्वयन में शार्मिल कियार् जार्नार् चार्हिए। भूमि सुधार्र कार्यक्रमों क समयार्बद्ध रूप में क्रियार्न्वयन कियार् जार्नार् चार्हिए। भूमि सुधार्र कार्यक्रमों क प्रचार्र-प्रसार्र के सार्थ इसकी प्रक्रियार् को भी सरल बनार्यार् जार्नार् चार्हिए।

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