भार्रत की प्रार्कृतिक विपदार्एं

पश्चिम प्रार्कृतिक विपदार्ये इतनी विकरार्ल प्रार्कृतिक घटनार्यें हैं जो मार्नव को काल के गार्ल में समार् लेती हैं। मनुष्य  प्रकृति पर अपनार् कब्जार् करतार् जार् रहार् हैं। वह एक से बढ़कर एक वैज्ञार्निक उपलब्धियार्ं प्रार्प्त करतार् जार् रहार् हैं। लेकिन जब प्रार्कृतिक विपदार्यें अपनार् रौद्र रूप धार्रण करती हैं तो पलक झपकते ही विनार्श के बार्दल सर्वत्र परिवर्तन लार् देते हैं। अर्थार्त मार्नव प्रकृति के सार्मने नत मस्तक हो जार्तार् हैं। वह प्रकृति क दार्स बन जार्तार् हैं। संयुक्त रार्ष्ट्र के आंकड़ो के अनुसार्र प्रतिवर्श पूरे संसार्र में औसतन एक लार्ख से अधिक लोग प्रार्कृतिक विपदार्ओं से मर जार्ते हैं और 20,000 करोड़ रूपये से भी ज्यार्दार् संपत्ति नष्ट हो जार्ती हैं।

भार्रत संसार्र के सबसे अधिक प्रार्कृतिक विपदार्ग्रस्त देशों में चीन के बार्द दूसरार् हैं।

    भूकम्प

    भूकम्प सार्धार्रण शब्दों में भूकम्प क अर्थ धरती क कंपन हैं। भूगर्भिक शक्तियों के कारण पृथ्वी के भूपटल में अचार्नक कम्पन पैदार् हो जार्ती हैं तो उसे भूकम्प कहते हैं। भूकम्प स्थल एवं जल दोनो भार्गों में आते हैं। अब भूकम्प लेखन यंत्र (सिस्मोग्रार्फ) के द्वार्रार् भूकम्प की गति क पतार् चलतार् हैं।

    भार्रत में तीव्र भूकम्प की आशंक वार्ले क्षेत्र:- 

    भार्रतीय मार्नक ब्यूरों ने भूकम्प के विभिन्न तीव्रतार्ओं वार्ले क्षेत्रों क मार्नचित्र बनार्यार् हैं। भूकम्पो की तीव्रतार् में भिन्नतार् के आधार्र पर सम्पूर्ण भार्रत को चार्र क्षेत्रों में बार्ंटार् गयार् हैं। क्षेत्र की जार्नकारी चिन्ह द्वार्रार् अंकित हैं।

    1. सभी को अनुभव होतार् हैं लोग पलंग यार् खार्ट से नीचे गिर जार्ते हैं। फर्नीचर खिसक जार्ते हैं। 
    2. प्रत्येक व्यक्ति घबरार्कर भार्गते हैं। भूकंप रोधी मकानो में भी थोड़ी टूट फूट हो जार्ती हैं। 
    3. मजबूत भवनों एंव पूलों में टूट फूट हो जार्ती हैं। खरार्ब निर्मार्ण तत्वों से बने चिमनियार्ं, खंबें स्मार्रक, दीवार्रें जमीन पर गिर जार्ते हैं। 
    4. प्रमार्णित वैज्ञार्निक तक से बने भवनों एवं पुलों आदि को भार्री नुकसार्न, नीवं क खिसकनार्, संपूर्ण शहर बबाद हो जार्तार् हैं। 

    भूकंप क प्रभार्व:- 

    1. संपत्ति की हार्नि:- भवने, बार्ंध, पुल, पार्इप लार्इन, रेल की पटरियार्ं एंव सड़के फट जार्ती हैं, क्षतिग्रस्त हो जार्ती हैं। गुजरार्त के भुज में आये भूकम्प से लार्खो मकान गिर गये, सड़के फट गर्इ एंव रेल की पटरियार् मुड़ गर्इ। 
    2. जन हार्नि:- भूकंप क सबसे अधिक बुरार् प्रभार्व हजार्रों लोगों की प्रार्ण छूट जार्ने के कारण होतार् है। 11 अक्टूबर 1737 में कलकत्तार् में आये भूकंप से 3 लार्ख व्यक्ति मार्रे गय।े 2005 में मुजफ्फार्रार्बार्द (पार्किस्तार्न) में 50,000 से अधिक लोगो की जार्ने चली गर्इ। 
    3. सुनार्मी:-भूकम्प के कारण समुद्र में एक ऊँची तरंग उठती हैं। इसे ही जार्पार्न में सुनार्मी कहते हैं। अभी तक कर्इ सुनार्मी लहरों ने अपनार् तार्ंडव मचार्यार् हैं। 26 दिसम्बर 2004 को (भार्रतीय प्रार्मार्णिक समय 6:28 प्रार्त:) सुमार्त्रार् तट के पार्स सार्गर में सिम्यूल द्वीप पर सुनार्मी लहरे उतपन्न हो गयी थी जिससे प्रभार्वित देशों में 3,00,000 से अधिक व्यक्ति काल के गार्ल मे समार् गये। 
    4. अन्य प्रभार्व:- भूकंप के कारण आग लगनार्, दरार्र पड़नार्, भूस्खलन, बार्ढ़ क प्रकोप आदि हार्नियार्ं होती हैं। 

    भूस्खलन

    पर्वतीय ढ़ार्लों यार् नदी तट पर षिलार्ओं, मिट्टी यार् मलबे क अचार्नक खिसककर नीचे आ जार्नार् भूस्खलन हैं। इसी प्रकार पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े बड़े बर्फ के टूकड़े सरककर नीचे गिरने लगते है। पर्वतीय क्षेत्रों में  भूस्खलन लगार्तार्र बढ़तार् जार् रहार् है। इससे पर्वतो के जीवन पर बूरे प्रभार्व दिखाइ देने लगे है।

    भूस्खलन के क्षेत्र:- 

    हिमार्लय पष्चिमी घार्ट और नदी धार्रार्ओं मे प्रार्य: भूस्खलन होते रहते हैं। भूस्खलनों क प्रभार्व जम्मू कष्मीर, हिमार्चल प्रदेश, उत्तरार्खंड, सिक्किम तथार् सभी सार्त उ. पूर्वी रार्ज्य भूस्खलन से ज्यार्दार् प्रभार्वित हैं। दक्षिण में महार्रार्ष्ट्र, कर्नार्टक में तमिलनार्डु और केरल को भूस्खलन क प्रकोप झेलनार् पड़तार् हैं।

    भूस्खलन के कारण:- 

    1. भार्री वर्षार्- लगार्तार्र भार्री वर्षार् होने पर। 
    2. भूकंप एंव ज्वार्लार्मुखी विस्फोट :-हिमार्लय क्षेत्र में प्रार्य: भूकंप आते रहते हैं। भूकंप के प्रभार्व से हिमार्नी टूट जार्ते हैं। ज्वार्लार्मुखी विस्फोटों से भी पहार्ड़ी क्षेत्रो में भूस्खलन आते हैं। 
    3. अन्य कारण :-पहार्ड़ी क्षेत्रो में सड़क निर्मार्ण, झूमिंग कृषि, एवं भवन आदि निर्मार्ण करने से भी भूस्खलन होतार् हैं। जल स्तर जल्दी ऊपर आ जार्ने के करण बार्ढ़ आ जार्ती हैं। 
    4. चक्रवार्त एवं सुनार्मी लहरें- इन दोनो के कारण समुद्रो में ऊँची ऊँची लहरे उठती हैं और तूफार्नी वेग के कारण भार्री तबार्ही मचार्ती हैं। 
    5. अन्य कारण- वनों के विनार्श के कारण एवं नदियों में परिवर्तन के कारण भी बार्ढ़ आ सकती हैं। 

    भूस्खलन क परिणार्म यार् प्रभार्व :- 

    1. पर्यार्वरण क हूार्स- भूस्खलन से पर्वतीय भार्गों के पर्यार्वरण एवं सौंदर्यतार् पर भी प्रभार्व पड़तार् हैं।
    2. पहार्ड़ों के ऊपर झरने आदि के जल स्त्रोत सूख रहे हैं। 
    3. नदियों में बार्ढ़ की वृद्धि हो रही हैं। जैसे अगस्त 1988 को लार्मार्री नार्मक स्थार्न पर भूस्खलन से काली नदी क प्रवार्ह अवरूद्ध हो जार्ने से लगभग 1.5 वर्ग किमीमें बार्ढ़ क प्रकोप आ गयार् थार्। 
    4. सड़क माग अवरूद्ध हो जार्ने से यार्तार्यार्त प्रभार्वित होतार् हैं। 
    5. अचार्नक भूस्खलन से अपार्र जन-धन की हार्नि होती हैं। 

    भूस्खलन रोकने तथार् इसके दुश्प्रभार्वों को कम करने के उपार्य:- 

    1. वन रोपण- वनरोपण से मृदार् में ढ़ीलार्पन नहीं आ सकतार् हैं झूमिंग कृषि पद्धति बंद कियार् जार्ये।
    2. सड़कों के निर्मार्ण में नर्इ तकनीक क इस्तेमार्ल कर चट्टार्नों को नीचे खिसकने से रोक जार् सकें।
    3. खनिज एवं वनों क शोषण न कियार् जार्ये। 
    4. भूस्खलन वार्ले भार्गों में जल रिसार्व रोकने के लिये उपार्य किये जार्यें। मजबूत दिवार्रों क निर्मार्ण कियार् जार्यें। 
    5. वन विनार्श- हम लगार्तार्र वनों क दोहन करते जार् रहें हैं। वे पेड़ पौधे जो मृदार् कणों को बार्ंधे रखते हैं। ढ़ीले हो जार्ते हैं अत्यार्धिक वर्षार् होने पर भूस्खलन निर्बार्ध गति से प्रार्रंभ हो जार्तार् हैं। 

    सूखार् 

    भार्रत में प्रति वर्ष किसी न किसी क्षेत्र में सूखार् यार् अनार्वृश्टि पड़तार् रहतार् हैं। जिस प्रकार जुलाइ 2009 मार्नसुन की अल्पवृश्टि के कारण बहुत बड़े भार्ग में सूखार् पड़ गयार् हैं। धार्न की फसले सूख गर्इ जिन्हे मवेशियों को चरार् दिये गयार्। अब हमार्रे प्शु को क्यार् खिलार्यें और लोग भोजन की तलार्ष में रोजगार्र पार्ने दूर दूर जार् रहे हैं। 

    सूखार् क तार्त्पर्य:- 

    वर्षार् क न होनार् यार् मार्नसून की अल्पवृष्टि यार् लंबे अवकाश को सूखार् कहते हैं। मौसम वैज्ञार्निकों के संबंध में ‘‘काफी लंबें समय तक एक विस्तृत भार्ग में वर्षण की कमी ही सूखार् हैं।’’ 

    सूखे के कारण- 

    1. वर्षार् की कमी, मार्नसून की अनिश्चिततार्, अल्प वर्षार् से सूखार् पड़ जार्तार् हैं। 
    2. शहरों के बसार्व के कारण बड़े बड़े जलार्शय, झील आदि पार्ट दिये जार्ते हैं। 
    3. पर्यार्वरण के संतुलन बिगड़ने के कारण। 
    4. वनों के विनार्श ने मार्नसुन रोकने की क्षमतार् कम कर दी हैं। 
    5. भूमिगत जल के दोहन के कारण भी भार्री जलसंकट उत्पन्न होतार् हैं। 

    सूखे के दुष्परिणार्म:- 

    1. भोजन एंव पार्नी की कमी के कारण भूख एंव प्यार्स से त्रार्ही-त्रार्ही मच जार्ती हैं। 
    2. भूखमरी, कुपोषण और महार्मार्रियों से अकाल मौते होने लगती हैं। 
    3. अपने घर द्वार्र छोड़कर रोजगार्र की तलार्श में पलार्यन करते हैं। 
    4. मवेशी चार्रे पार्नी के अभार्व में मरने लगते हेैं। सन् 1877, 1899, 1919 तथार् 1943 में भार्रत में भीशण अकाल पड़े हैं। सन् 1973 में भार्रत में 20 करोड़ व्यक्ति सूखे से प्रभार्वित हुये थे तथार् कृषि क्षेत्र में 1,558 करोड़ रूपये की हार्नि हुर्इ थी। 

    भार्रत के सूखार् प्रभार्वित क्षेत्र :- 

    यद्यपि भार्रत के अधिकांश क्षेत्रों में कभी न कभी सूखार् अपनार् रूखार्पन क रौद्रमय रूप दिखार्तार् हैं। भार्रत में सूखे की सर्वार्धिक बार्रम्बार्रतार् दो क्षेत्रों में मिलती हैं। जो दिये गये मार्नचित्र के अवलोकन से स्पश्ट हैं।

    भार्रत – सूखार् प्रवण क्षेत्र। 

    1. भार्रत क पष्चिमी क्षेत्र- इसमें रार्जस्थार्न तथार् उससे संलग्न हरियार्णार्, गुजरार्त तथार् म.प्र. के भार्ग आते हैं।
    2. भार्रत क दक्षिणी क्षेत्र- इसमें मध्य महार्रार्ष्ट्र पूर्वी तथार् मध्य कर्नार्टक, पमध्य कर्नार्टक तमिलनार्डु तथार् आंध्रप्रदेश स्थित हैं। 

    सूखे से निपटने के लिये सूखे क्षेत्रों के अनुकूल कृषि पद्धति, सूखार् सहन करने वार्ली फसलें बोकर, वर्षार् जल संग्रहण, ऊँची मेड़, पेड़ पौधे लगार्कर, नदियों को आपस में जोड़कर इस समस्यार् क हल कियार् जार् सकतार् हैं।

    बार्ढ़

    मार्नसुन की वर्षार् के अति हो जार्ने से नदी बेसिन में जल क स्तर ऊपर फैल जार्नार् बार्ढ़ हैं। दुर्ग जिले में शिवनार्थ नदी की सहार्यक नदी तार्ंदुलार् नदी में बार्ढ़ आ जार्ने से बगमरार् ग्रार्म गुण्डरदेही में आकर बस गयार्। है तब भार्रत की बड़ी नदियों क आलम अपने विकरार्ल रूप धार्रण कर “ार्ोक एंव विनार्श के कारण बनती हैं। भार्रत में 2.42 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को बार्ढ़ की संभार्वनार् वार्लार् क्षेत्र बतलार्यार् गयार् हैं। इसमें से आधे से चौथाइ क्षेत्र में प्रति वर्श बार्ढ़ आयार् करती हैं। गंगार् तथार् ब्रम्हपुत्र नदी तंत्र मिलकर भार्रत की लगभग 60 प्रतिशत बार्ढ़ के लिये उत्तरदार्यी मार्ने जार्ते हैं। 

    बार्ढ़ के कारण:- 

    1. भार्री वर्षार्-जब अधिक वर्षार् होती हैं तो नदियों में बार्ढ़ आ जार्ती हैं। 
    2. नदियों मे अवसार्दों क जमार् होनार् :- नदियों में अवसार्दो के जमार्व होने के कारण उथली हो जार्ती हैं जिससे जल स्तर जल्दी ऊपर आ जार्ने के कारण बार्ढ़ आ जार्ती हैं। 
    3. चक्रवार्त एवं सुनार्मी लहरें-इन दोनो के कारण समुद्रों में ऊॅंची ऊॅंची लहरे उठती है। और तूफार्नी वेग के कारण भार्री तबार्ही मचार्ती हैं 
    4. अन्य कारण- वनों के विनार्श के कारण एवं नदियों में परिवर्तन के कारण भी बार्ढ़ आ जार्ती हैं। 

    बार्ढ़ नियंत्रण के उपार्य:- 

    1. संग्रहण जलार्शय:- नदियों में बड़े बड़े बार्ंध बनार्कर बार्ढ़ नियंत्रित की जार् सकती हैं। 
    2. तटबंध- नदियों के किनार्रों पर कृत्रिम तटबार्ंध बनार्कर बार्ढ़ से फैलने वार्ले जल को रोक जार् सकतार् है। 
    3. वृक्षार्रोपण- नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र में यदि वृक्षार्रोपण कियार् जार्ये तो बार्ढ़ के भयार्वह को काफी कम कियार् जार् सकतार् हैं। पश्चिमी बंगार्ल में दार्मोदर नदी अपनी बार्ढ़ के प्रकोप के लिये तथार् बिहार्र में कोसी नदी बार्ढ़ के प्रकोंप के लिये जार्नी जार्ती हैं। जिन्हें उनके क्षेत्र में शोक की नदी कहार् जार्तार् हैं। रार्ष्ट्रीय बार्ढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के अंतगर्त दार्मोदर घार्टी परियोजनार् एवं कोसी नदी परियोजनार् से बार्ढ़ में काफी नियंत्रण आयार् हैं। 

    चक्रवार्त-

    चक्रवार्त अत्यंत निम्नवार्युदार्ब क लगभग वृत्तार्कार केंद्र हैं। जिसमें चक्कर दार्र पवन प्रचंड वेग से चलती हैं तथार् मूसलार्धार्र वर्षार् करती हैं। एक अनुमार्न के अनुसार्र एक पूर्ण विकसित चक्रवार्त मार्त्र एक घंटे में 3 अरब 50करोड़ टन कोष्ण आर्द्र वार्यु को निम्न अक्षार्ंशों में स्थार्नार्न्तरित कर देतार् हैं। 

    चक्रवार्त आने के महीने- यद्यपि चक्रवार्त आने क कोर्इ निष्चित मार्ह नहीं हैं। लेकिन अधिकांशत: चक्रवार्त अक्टूबर नवम्बर में बंगार्ल की खार्ड़ी में एक वार्तार्ग्र पर उश्ण कटिबंधीय चक्रवार्त बनते है। इस वार्तार्ग्र के उत्तर में स्थार्नीय वार्यु तथार् दक्षिण में समुद्री वार्यु रहती हैं। 

    चक्रवार्त आने के स्थार्न- भार्रत में सबसे अधिक चक्रवार्त पूर्वी तट पर आते हैं। चक्रवार्त के संकट की आशंक वार्ले रार्ज्य हैं, पष्चिम बंगार्ल, उड़ीसार्, आंध्रप्रदेश और तमिलनार्डु सबसे अधिक गुजरार्त में आते हैं। महार्रार्ष्ट्र के तटीय और कुछ अंदरूनी क्षेत्र भी चक्रवार्त के प्रकोप की चपेट में आते हैं। 

    चक्रवार्त आने क कारण- आधुनिक विचार्रों से इन चक्रवार्तो से भार्री वर्षार् इसलिये होती हैें कि ऊपरी वार्युमंडल में पश्चिमी तरंगों के कारण होने वार्लार् अपसरण इन पूर्वी अवदार्बों को अधिक विकसित कर देतार् हैं। चक्रवार्तों द्वार्रार् महार्विनार्श ( हार्नियार्ँ ) चक्रवार्तो के कारण बड़ी बड़ी इमार्रते, पुल, टॉवर आदि धरार्षार्यी हो जार्ते हैं। मूसलार्धार्र वर्षार् से बार्ढ़ क पार्नी चार्रो ओर तबार्ही मचार् देतार् हैं। चक्रवार्त द्वार्रार् उतपन्न उत्तार्ल तरंगे तटीय भार्गों के हरे भरें खेत खलिहार्न, गार्ंव एंव शहर उजार्ड़ देते हैं। इनके कारण भूस्खलन भी होतार् हैं। 

    1991 में जब बार्ंग्लार्देश में चक्रवार्त आयार् तो 139000 लोग मौत के मुँह में समार् गयें थे। अब चक्रवार्त आने के पूर्व भविश्यवार्णी एवं चेतार्वनी भी दी जार्ती हैं। जैसे कि संयुक्त रार्ज्य अमेरीक में सितम्बर 1989 में प्रलयकारी ह्यूगो हरीकेन आयार् सही भविश्यवार्णी एवं सचेत कर देने से केवल 21 लोगो की ही जार्ने गयी थी।

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