बैंकिंग क्यार् है ?

बैकिंग विनिमय अधिनियम की धार्रार् 5 (b) के अनुसार्र बैकिंग क अर्थ उधार्र यार् निवेश के उद्देश्य के लिये जनतार् से ली गयी धनरार्शि है जो कि मार्ंग पर प्रतिदेय यार् अन्यथार् चेक, ड्रार्फ्ट, आदेश यार् अन्यथार् द्वार्रार् निकाली जार् सके। अधिनियम, 1881 के अनुसार्र, बैंकर के अन्तर्गत बैकिंग क काम करने वार्लार् प्रत्येक व्यक्ति तथार् डार्कघर बचत बैंक सम्मिलित है। विनिमय पत्र अधिनियम 1882 की धार्रार् 2 के अनुसार्र बैंकर क अर्थ उन व्यक्तियों की एक संस्थार् से हैं जो बैंकिंग कारोबार्र करते हैं चार्हे निगमित हो यार् न हो। बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धार्रार् 5(e) के अनुसार्र, बैंकिंग कम्पनी वह कम्पनी है जो भार्रत में बैकिंग क कार्य करती हो। बैंकर यार् बैकिंग कम्पनी ही बैकिंग सम्बन्धी गतिविधियार्ं चलार्ती हैं। बैंकर यार् बैकिंग कम्पनी क अर्थ धार्रार् 5 (b) से समझ सकते हैं जिसके अनुसार्र- यह एक निगमित निकाय के रूप में,

जनतार् से स्वीकार की हुर्इ जमार् रार्शि से मतलब है कि बैंक किसी से भी जमार् स्वीकार करतार् है जो किसी उद्देश्य के लिये धन प्रस्तार्वित करतार् है। जब तक व्यक्ति क बैंक के पार्स खार्तार् खुलार् हुआ न हो, तब तक वह जमार् रार्शि स्वीकार नहीं कर सकतार्। बैंक में जमार् करने के लिये आवश्यक है बैंक से खार्तार् सम्बन्ध होनार्। बैंक अवार्ंछनीय व्यक्तियों के खार्तार् खोलने से मनार् कर सकती है। खार्तार् खोलने क अधिकार बैंक के पार्स है। भार्रतीय रिजर्व बैंक ने खार्तार् खोलने के लिये कुछ मार्नदण्ड बनार्ये हैं ‘‘अपने ग्रार्हक को जार्निये’’ (KYC) दिशार्निर्देश तथार् बैंकों को कठोरतार् से इसक पार्लन करनार् है। बी आर अधिनियम की धार्रार् 5 (ख) में उल्लिखित गतिविधियों के अलार्वार् अधिनियम की धार्रार् 6 में वर्णित गतिविधियों क भी बैंक संचार्लन करतार् है।

बैंक विश्वार्स आधार्रित रिश्तार् है। बैंक और ग्रार्हक के बीच रिश्ते कर्इ तरह के होते हैं। बैंक और ग्रार्हक के बीच के सम्बन्ध कर्इ प्रकार के लेन-देन पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार इनके रिश्ते, अनुबन्ध और निश्चित अवधि व शर्तों पर आधार्रित होते हैं। इन सम्बन्धों में कुछ अधिकार और दार्यित्व बैंकर व ग्रार्हकों को प्रदार्न होते हैं। हार्लार्ंकि बैंक और उसके ग्रार्हकों के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध लम्बे समय तक चलने वार्ले रिश्ते होते हैं। कुछ बैंकों क यह कहनार् है कि उनक ग्रार्हकों के सार्थ पीढ़ी दर पीढ़ी बैकिंग रिश्तार् है। बैंकर ग्रार्हक क सम्बन्ध विश्वार्स पर आधार्रित है। बैंकर द्वार्रार् सम्बन्धित नियम व शर्ते तीसरी पाटी को बतार्यी नहीं जार् सकती।

बैंक व उसके ग्रार्हकों के बीच के सम्बन्धों को मोटे तौर पर सार्मार्न्य सम्बन्ध व विशेष सम्बन्ध में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है। बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धार्रार् 5 (ख) को देखे तो हम नोटिस करेंगे कि बैंक व्यार्पार्र उधार्र के उद्देश्य को पूरार् करने के लिये जमार् रार्शि स्वीकारतार् है। अर्थार्त दो मुख्य गतिविधियों से उत्पन्न सम्बन्ध, सार्मार्न्य सम्बन्ध कहलार्ते हैं। इन दो गतिविधियों के अलार्लार् भी अन्य कार्यों क आयोजन करतार् है जो कि बैकिंग विनियमन अधिनियम की धार्रार् 6 में वर्णित है।

जब ग्रार्हक को खार्तार् खोलनार् होतार् है तो वह खार्तार् खोलने क फाम भरकर व हस्तार्क्षर करके बैंक को देतार् है। फाम पर हस्तार्क्षर करके वह बैंक के सार्थ एक समझौते/अनुबन्ध में प्रवेश करतार् है। जब ग्रार्हक बैंक में अपने खार्ते में पैसे जमार् करतार् है तो बैंक ग्रार्हक क ऋणी हो जार्तार् है और ग्रार्हक लेनदार्र (creditor) हो जार्तार् है। ग्रार्हक द्वार्रार् जमार् कियार् हुआ पैसार् बैंक की सम्पत्ति बन जार्ती है और बैंक को अधिकार है कि वह अपनी पसन्द से धन क इस्तेमार्ल करे। बैंक बार्ध्य नहीं है जमार्कर्तार् को सूचित करने के लिये कि वह धनरार्शि क उपयोग किस तरीके से कर रहार् है। बैंक पैसे उधार्र लेतार् है और जब जमार्कर्तार् की मार्ंग हो तब बैंकर को भुगतार्न करनार् होतार् है। बैंक की स्थिति सार्मार्न्य देनदार्रों से काफी अलग है। बैंकर अपने आप से भुगतार्न नहीं करतार् क्योंकि बैंकर को स्वेच्छार् से कर्ज चुकानार् आवश्यक नहीं है। मार्ंग उसी शार्खार् में जार्कर की जार् सकती है जहार्ं उनक खार्तार् खुलार् हुआ है यार् मौजूद हो व सही तरीके से कार्य दिवसों व कार्य के घण्टों (working hours) में ही कियार् जार् सकतार् है।

खार्तार् खोलने के समय फाम पर नियम व शर्तें उल्लिखित होती है जिसक पार्लन ऋणी (debtor) को करनार् होतार् है। यद्यपि नियम व शर्तें खार्तार् खोलने वार्ले फाम पर नहीं होती, लेकिन खार्तार् खोलने वार्ले फाम पर घोषणार् की जार्ती है कि नियम व शर्तें पढ़ व समझ ली गयी हैं। हार्लार्ंकि नियम व शर्तों क उल्लेख पार्सबुक में कियार् गयार् है जो केवल खार्तार् खोलने के पश्चार्त ग्रार्हक को प्रार्प्त होती है। कुछ समय पहले, कुछ बैंकों में खार्तार् खोलने समय हस्तलिखित पत्र होतार् थार् जिसमें खार्तार् खोलने के फाम के सार्थ नियम व शर्तें भी सार्थ में मिलती थीं। लेकिन कुछ समय बार्द इस प्रथार् को बंद कर दियार्। सुविधार् के लिये, कुछ बैंकों ने बेबसार्इट के जरिये खार्तार् खोलने क फाम, नियम और शर्तें और विभिन्न सेवार्ओं से जुड़ी जार्नकारी अपलोड कर रखी हैं।डिमार्ंड ड्रार्फ्ट, मेल/टेलीग्रार्फिक ट्रार्न्सफर जार्री करते समय, बैंक अपने ही पैसे क ऋणी बन जार्तार् है, भुगतार्नकर्तार्/लार्भार्थ्र्ार्ी के लिये।

ऋणदार्तार् (lender) के रूप में

देनदार्र पैसे उधार्र देनार् बैंक की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधियों में से एक है। बैंक द्वार्रार् जुटार्ये गये संसार्धन ऋण देने के लिये उपयोग किये जार्ते हैं। जो ग्रार्हक बैंक से उधार्र लेतार् है वह बैंक के पैसे क मार्लिक होतार् है। किसी भी ऋण/अग्रिम खार्ते के मार्मले में, बैंकर लेनदार्र होतार् है और ग्रार्हक ऋणी। व्यक्ति बैंक से जमार् किये हुये पैसे को ही उधार्र के रूप में बैंक से मार्ंगतार् है। ऋण लेने के लिये दस्तार्वेजों को कार्यार्न्वित करनार् और बैंक को प्रतिभूति के रूप में कुछ रखवार्नार्, ऋण लेने से पहले जरूरी है। जमार्/ऋण खार्तार् खोलने के सार्थ ही बैंक विविध सेवार्यें उपलब्ध करार्तार् है जो रिश्तों को और अधिक व्यार्पक व जटिल बनार्तार् है। उपलब्ध करार्यी गयी सेवार्ओं और लेन-देन की प्रकृति पर निर्भर करतार् है कि बैंक निक्षेपग्रहीतार् (bailee), ट्रस्टी, एजेंट, पट्टेदार्र, संरक्षक आदि में से किस रूप में कार्य करें।

बैंक न्यार्य (Trustee) के रूप में

भार्रतीय न्यार्य अधिनियम, 1882 की धार्रार् 3 के अनुसार्र, “’न्यार्स’ एक दार्यित्व होतार् है जो सम्पत्ति के स्वार्मित्व के सार्थ ही जुड़ार् होतार् है। यह उस विश्वार्स से उत्पन्न होतार् है, जो सम्पत्ति के स्वार्मी में रखार् जार् जार्तार् है और सम्पत्ति के स्वार्मी द्वार्रार् ग्रहण कियार् जार्तार् है यार् उसके द्वार्रार् घोषित यार् ग्रहण कियार् जार्तार् है और उसक उद्देश्य किसी अन्य व्यक्ति को यार् किसी अन्य व्यक्ति तथार् सम्पत्ति के स्वार्मी को लार्भ पहुँचार्नार् होतार् है।’’ अर्थार्त् लार्भार्थ्र्ार्ी की ओर से न्यार्सी सम्पत्ति क धार्रक होतार् है।भार्रतीय न्यार्स अधिनियम, 1882 की धार्रार् 15 के अनुसार्र, न्यार्सी बार्ध्य है कि वह न्यार्स- सम्पत्ति क सौदार् करते समय ध्यार्न रखे कि व्यक्ति अपनी सार्मार्न्य समझ से इस तरह सम्पत्ति क सौदार् करे जैसे कि वह स्वयं की है और इसके विपरीत अनुबन्ध के अभार्व में, न्यार्सी जिम्मेदार्र नहीं होगार्, न्यार्स-सम्पत्ति में हुये किसी भी प्रकार की हार्नि, विनार्ष (destruction) यार् तबार्ही (deterioration) के लिये। न्यार्सी को अधिकार है कि वह व्यय की प्रतिपूर्ति करे (भार्रतीय न्यार्स अधिनियम की धार्रार् 32)। विश्वार्स की नजर से देखें तो बैंक ग्रार्हक सम्बन्ध एक विशेष अनुबन्ध है। जब कोर्इ व्यक्ति विश्वार्स रखते हुये अपनी मूल्यवार्न वस्तुयें किसी दूसरे व्यक्ति को सौंपतार् है इस इरार्दे से कि मार्ंगने पर वस्तुयें उसे लौटार् दी जार्येंगी और इस तरह उन दोनों के बीच क सम्बन्ध न्यार्सी और न्यार्सकर्तार् (trustier) क हो जार्तार् है। ग्रार्हक कुछ कीमती चीजें यार् प्रतिभूतियार्ं बैंक के पार्स सुरक्षित रखवार्ते हैं यार् किसी विशिष्ट उद्देश्य से बैंक में पैसे जमार् करार्ते हैं तब ऐसे मार्मलों में बैंक न्यार्सी के रूप में कार्य करतार् है। बैंक सार्मार्न को सुरक्षित रखने के लिये शुल्क वसूल करतार् है।

उपनिहिती -उपनिधार्तार् 

भार्रतीय संविदार् अधिनियम, 1872 की धार्रार् 148 ‘उपनिधार्न’, ‘उपनिहिती’ और ‘उपनिधार्तार्’ को परिभार्षित करतार् है। उपनिधार्न से तार्त्पर्य, किसी उद्देश्य को पूरार् करने के लिये मार्ल क परिदार्न (delivery of goods) एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को, अनुबन्ध के द्वार्रार् जिसक उद्देश्य पूरार् होने पर यार् तो वार्पिस कर दियार् जार्येगार् अन्यथार् देने वार्ले व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार्र निपटार् दियार् जार्ये। मार्ल पहुँचार्ने वार्ले व्यक्ति को ‘उपनिधार्तार्’ (baitor) कहते हैं। जिस व्यक्ति के सुपुर्द कियार् जार्तार् है, उसे ‘उपनिहिती’ (bailee) कहते हैं। बैंक अपने द्वार्रार् दी गयी अग्रिम को सुरक्षित करने के लिये मूर्त प्रतिभूतियार्ं रखते हैं। कुछ मार्मलों में प्रतिभूति मार्ल क भौतिक कब्जार् (गिरवी), कीमती सार्मार्न, बार्ंड आदि रखे जार्ते हैं। प्रतिभूतियों क भौतिक कब्जार् करते समय बैंक उपनिहिती हो जार्तार् है और ग्रार्हक ‘उपनिधार्तार्’। बैंक ग्रार्हकों की वस्तु, कीमती सार्मार्न, प्रतिभूतियार्ं इत्यार्दि सुरक्षित धरोहर में रखते हैं और उपनिहिती के रूप में कार्य करते हैं। एक उपनिहिती के रूप में बैंक को जमार्नती मार्ल की सुरक्षार् करनी चार्हिये।

पट्टार्दार्तार् – पट्टेदार्र 

सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धार्रार् 105 के द्वार्रार् पट्टार्दार्तार्, पट्टेदार्र, प्रीमियम और किरार्ये को परिभार्षित कियार् गयार् है। धार्रार् के अनुसार्र ‘अचल सम्पत्ति क पट्टार् अंतरण अधिकार है जिसके द्वार्रार् ऐसी सम्पत्तियों क आनन्द लेने क जो कि कुछ समय के लिये बनार्यी गयी हो, व्यक्त यार् अव्यक्त यार् शार्श्वत मूल्य क भुगतार्न यार् वार्दार् के प्रतिफल में, यार् धन, फसलों में हिस्सार्, सेवार् यार् मूल्य की कोर्इ वस्तु, आविधिक प्रदार्न की जार्ने वार्ली यार् निर्दिष्ट अवसरों पर अंतरिती द्वार्रार् अंतरणकर्तार् को हस्तार्ंतरित कियार् गयार् हो, जो कि दी गयी शर्तों पर उसे स्वीकार्य हो।

पट्टार्दार्तार्, पट्टेदार्र, प्रीमियम और किरार्ये की परिभार्षार् 

  1. अंतरणकर्तार् को पट्टार्दार्तार् कहार् जार्तार् है। 
  2. अंतरिती को पट्टार्दार्तार् कहार् जार्तार् है। 
  3. कीमत को प्रीमियम कहार् जार्तार् है। 
  4. धन, हिस्सार्, सेवार् यार् अन्य वस्तुएं जो कि प्रदार्न की गयीं को किरार्यार् कहार् जार्तार् है।

ग्रार्हकों को बैंकों द्वार्रार् सुरक्षित जमार् लॉकर उपलब्ध करार्नार् सहार्यक सेवार् (ancillary service) है। अपने ग्रार्हकों को सुरक्षित जमार् प्रदार्न करने के सार्थ वार्ल्ट लॉकर सुविधार् उपलब्ध करार्ने के लिये बैंक को सुरक्षित जमार् प्रदार्न करने के सार्थ वार्ल्ट लॉकर सुविधार् उपलब्ध करार्ने के लिये बैंक को अपने ग्रार्हकों के सार्थ अनुबंध (agreement) करनार् होतार् है। अनुबन्ध को ‘बतार्ने क ज्ञार्पन’ (memorandum of letting) कहार् जार्तार् है और स्टार्म्प शुल्क के सार्थ है। बैंक और ग्रार्हक के बीच सम्बन्ध पट्टार्दार्तार् और पट्टेदार्र क होतार् है। बैंक अपनी अचल सम्पत्ति पट्टे पर (अपने ग्रार्हकों के लिये लॉकर किरार्ये पर देनार्) ग्रार्हकों को देती है और उन्हें अधिकार देती है कि वह कुछ समय सीमार् तक उसक उपयोग कर सकें जैसे- कार्यार्लय/बैंकिंग कार्यों के समय पर और इस सुविधार् के लिये बैंक किरार्यार् चाज करती हैं। बैंक के पार्स अधिकार है लॉकर को तोड़ने व खोलने का, अगर लॉकर धार्रक किरार्ये क भुगतार्न नहीं करतार् है। अगर लॉकर में रखी हुर्इ सार्मग्री क कोर्इ नुकसार्न होतार् है तब बैंक किसी प्रकार की देनदार्री यार् जिम्मेदार्री ग्रहण नहीं करतार् है। ग्रार्हकों द्वार्रार् लॉकर में रखे गये सार्मार्न को बैंक बीमार् नहीं करवार्तार् है।

अभिकर्तार् (Agent) एवं मार्लिक

भार्रतीय संविदार् अधिनियम, 1872 की धार्रार् 182 ‘अभिकर्तार्’ को परिभार्षित करते हुए कहती है जो किसी दूसरे के लिए कार्य करतार् है यार् तीसरे के सार्थ व्यवहार्र करते हुए दूसरे क प्रतिनिधित्व करतार् है। जिनके लिये व्यक्ति इस तरह क कृत्य यार् प्रतिनिधित्व करतार् है, उन्हें मार्लिक कहार् जार्तार् है। अर्थार्त अभिकर्तार् वह व्यक्ति है जो मार्लिक की ओर से कार्य करतार् है और उत्तराद्ध के व्यक्त यार् अव्यक्त अधिकार के अन्तर्गत और ऐसे प्रार्धिकार के अन्तर्गत किये गये कार्यों के लिये मार्लिक बार्ध्य होगार्। किसी पक्ष के लिये अभिकर्तार् द्वार्रार् किये गये कृत्य के लिये मार्लिक उत्तरदार्यी होतार् है। बैंक धनार्देश बिल इत्यार्दि एकत्र करतार् है और ग्रार्हकों की ओर से विभिन्न प्रार्धिकारियों को भुगतार्न करतार् है जैसे किरार्यार्, टेलीफोन बिल, बीमार् प्रीमियम इत्यार्दि। अपने ग्रार्हकों द्वार्रार् दिये गये निर्देशों क पार्लन बैंक को भी करनार् होतार् है। ऐसे सभी मार्मलों में बैंक अभिकर्तार् के रूप में कार्य करतार् है अपने ग्रार्हकों के लिये और सेवार्ओं के लिये शुल्क भी लेतार् है। भार्रतीय संविदार् अधिनियम के अनुसार्र, अभिकर्तार् शुल्क प्रार्प्त करने क अधिकार रखतार् है। किसी प्रकार क शुल्क स्थार्नीय धनार्देशों की वसूली पर नहीं लगार्यार् जार्येगार्। शुल्क तभी लगार्यार् जार्येगार् जब समार्शोधन गृह से धनार्देश वार्पिस लौट आये।

अभिरक्षक के रूप में 

अभिरक्षक वह व्यक्ति होतार् है जो किसी वस्तु के कार्यवार्हक के रूप में कार्य करतार् है। बैंक कानूनी तौर पर ग्रार्हक की प्रतिभूतियों की जिम्मेदार्री लेतार् है। डीमैट खार्तार् खोलते समय बैंक संरक्षक बन जार्तार् है।

गार्रन्टर के रूप में 

बैंक अपने ग्रार्हकों की ओर से गार्रन्टी देते हैं। गार्रंटी एक आकस्मिक अनुबंध है। भार्रतीय संविदार् अधिनियम की धार्रार् 31 के अनुसार्र, गार्रन्टी एक ‘आकस्मिक अनुबन्ध’ है। आकस्मिक अनुबंध एक अनुबन्ध है, कुछ करने यार् न करने के लिये, अगर कोर्इ घटनार्, इस तरह के अनुबन्ध के लिये संपार्िश्र्वक, होती यार् नहीं होती है। इस प्रकार यह देखार् गयार् है कि बैंकर – ग्रार्हक सम्बन्ध एक लेनदेन क सम्बन्ध है।

बैंकर और ग्रार्हक के बीच रिश्तों क समार्पन 

बैंकर और ग्रार्हक के बीच रिश्तों क समार्पन होतार् है-

  1. ग्रार्हक की अगर मौत यार् वह दिवार्लियार् यार् पार्गल हो गयार् हो, 
  2. ग्रार्हक सवेच्छार् से खार्तार् बंद कर रहार् हो (यार्नी स्वैच्छिक समार्प्ति) 
  3. कंपनी क परिसमार्पन 
  4. बैंक द्वार्रार् खार्ते क समार्पन, नोटिस देने के पश्चार्त 
  5. विशिष्ट लेन-देन यार् अनुबन्ध क पूरार् होनार् बैंकर और ग्रार्हक के बीच सम्बन्धों को विकसित करने के लिये दोनों को कुछ कर्तव्य निभार्नार् होतार् है। 

बैंकर के कर्तव्य 

ग्रार्हक के लिये बैंकर के कुछ कर्तव्य होते हैं –

  1. ग्रार्हक के खार्ते की गोपनीयतार् बनार्ये रखनार्। 
  2. ग्रार्हकों द्वार्रार् अपने खार्तों से भुगतार्न हेतु चेक क आदर करने क कर्तव्य एवं उनके लिए चेक, बिल आदि एकत्र करनार्। 
  3. बिलों क भुगतार्न करनार् इत्यार्दि क कर्तव्य, ग्रार्हकों के निर्देशार्नुसार्र। घ.उचित सेवार्यें प्रदार्न करने क कर्तव्य। 
  4. ग्रार्हक द्वार्रार् दिये गये निर्देशार्नुसार्र कार्य करने क कर्तव्य। अगर निर्देश नहीं दिये जार्ते तो बैंकर उसी तरह कार्य करें जिस तरह के कार्य की उम्मीद रखी जार्ती है। 
  5. आवधिक कथन (periodical statements) प्रस्तुत करने क कर्तव्य अर्थार्त ग्रार्हकों को उनके खार्तों की स्थिति की जार्नकारी देनार्। 
  6. रखी गयी वस्तुओं को तीसरी पाटी को जार्री नहीं करनार् बिनार् ग्रार्हक की अनुमति से।

गोनीयतार् बनार्ये रखने क कर्तव्य

बैंक क कर्तव्य है कि वह ग्रार्हकों के खार्तों की गोपनीयतार् बनार्ये रखें। गोपनीयतार् बनार्ये रखनार् मार्त्र नैतिक कर्तव्य ही नहीं है बल्कि बैंक कानूनी तौर पर बार्ध्य है ग्रार्हकों के मार्मलों को गुप्त रखने के लिये। इस कर्तव्य के पीछे यह सिद्धार्न्त है कि अगर ग्रार्हक के लेन-देन के बार्रे में किसी अनार्धिकृत व्यक्ति को पतार् चलतार् है तो ग्रार्हक की प्रतिष्ठार् को नुकसार्न हो सकतार् है और बैंक को इसके लिये जिम्मेदार्र ठहरार्यार् जार् सकतार् है। गोपनीयतार् को बनार्ये रखने क कर्तव्य सिर्फ खार्ते को बन्द करार्नार् यार् खार्ते धार्रक की मृत्यु पर समार्प्त नहीं हो जार्तार्।

बैंकिंग कम्पनियार्ँ (उपक्रमों क अर्जन तथार् अन्तरण) अधिनियम, 1970 की धार्रार् 13 के अनुसार्र हर नयार् बैंक निरीक्षण करेगार् कानून, प्रथार्ओं और प्रथार्गत प्रयोगों जो कि बैंकरों के बीच हो, अन्यथार् विधि द्वार्रार् आवश्यक को छोड़कर और विशेष रूप से, किसी भी सम्बन्धित जार्नकारी क खुलार्सार् नहीं करेगार् यार् उसके घटकों के मार्मलों को छोड़कर व ऐसी परिस्थितियों को छोड़कर जो कि कानून के अनुसार्र यार् बैंकरों में प्रचलित व्यवहार्र और रीति के अनुरूप हो आवश्यक यार् संगत हो नये बैंकों की जार्नकारी प्रकट करने के लिये।ग्रार्हक की गोपनीयतार् बनार्ये रखनार् अनुबन्ध की शर्तों में निहित है जिसके लिये खार्तार् खोलते समय बैंक ग्रार्हक के सार्थ एक रिश्तार् बनार्तार् है। बैंक सिर्फ लेन-देन की गोपनीयतार् नहीं बनार्तार्, बल्कि एटीएम/डेबिट कार्ड द्वार्रार् संचार्लन के सम्बन्ध में भी गोपनीयतार् बनार्ये रखतार् है। बैंक को 10 पिन की भी देखभार्ल करनी होती है तार्कि वह किसी गलत हार्थों में न चलार् जार्ये, यह भी गोपनीय रखनार् जरूरी है।

गोपनीय बनार्ये रखने में विफलतार्- धन और प्रतिष्ठार् की रक्षार् में विफल होने पर बैंक उत्तरदार्यी है, नुकसार्न क भुगतार्न करने के लिये। गोपनीयतार् बनार्ये रखने के कर्तव्य को पूरार् करने में असफल हो जार्ये और ग्रार्हक से सम्बन्धित जार्नकारी क खुलार्सार् हो जार्ये यार् खार्ते क संचार्लन किसी अनार्धिकृत व्यक्ति द्वार्रार् कियार् जार्ये तो बैंक पूर्णरूप से नुकसार्न की भरपार्यी करने के लिये उत्तरदार्यी है।

बैंक तीसरे पक्ष के लिये भी जिम्मेदार्र हो सकतार् है अगर गलत तरीके से प्रकटीकरण कियार् गयार् हो जिससे तीसरे पक्ष के हित को हार्नि हो। अगर बैंक जार्नबूझकर गलत जार्नकारी देतार् है तो इसक मतलब गलत प्रस्तुतीकरण से होगार्। वह परिस्थितियार्ं जब बैंकर ग्रार्हक के खार्ते की जार्नकारी क खुलार्सार् कर सकतार् है, वह निम्न प्रकार से है-

  1. कानून की बार्ध्यतार् के तहत 
  2. बैंकिंग प्रथार्ओं के तहत 
  3. रार्ष्ट्रीय हितों की रक्षार् के लिये 
  4. बैंक के खुद के हितों की रक्षार् के लिये 
  5. ग्रार्हक की व्यक्त यार् अव्यक्त सहमति पर 

कानून की बार्ध्यतार् के तहत प्रकटीकरण 

बैंक विभिन्न अधिकारियों को जार्नकारी क खुलार्सार् कर सकतार् है जिन्हें शक्तियार्ं प्रार्प्त है अधिनियम के विभिन्न प्रार्वधार्नों के अन्तर्गत और बैंक जरूरत पड़ने पर ग्रार्हक के खार्ते की जार्नकारी उपलब्ध करार् सकतार् है, जो कि  है-

  1. बैंकर्स बुक आफ एडवीडेन्स अधिनियम, 1891 की धार्रार् 4 
  2. दिवार्नी प्रक्रियार् संहितार् अधिनियम, 1908 की धार्रार् 94(3) 
  3. भार्रतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धार्रार् 45 (ब) 
  4. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धार्रार् 26 
  5. उपहार्र कर अधिनियम 1958 की धार्रार् 36 
  6. आयकर अधिनियम 1961 की धार्रार् 131, 133 7.भार्रतीय उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1964 की धार्रार् 29 
  7. विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम, 1999 की धार्रार् 120f 
  8. प्रिवेन्शन ऑफ मनी लार्िन्ड्रंग एक्ट, 2002 की धार्रार् 12 

बैंक उतनी ही जार्नकारी दे सकतार् है जितनी (अतिरिक्त जार्नकारी उपलब्ध नहीं करार्यी जार्ती) किसी व्यक्ति के लिखित अनुरोध पर मार्ंगी जार्ये जिसको ऊपर लिखे गये अधिनियमों के अनुसार्र शक्ति प्रार्प्त हो। ग्रार्हक को सूचित कर दियार् जार्तार् है कि उसके खार्ते की जार्नकारी किसी को दी जार् रही है।

बैंकिग प्रथार्ओं के तहत प्रकटीकरण 

व्यक्ति की वित्तीय स्थिति और ऋण पार्त्रतार् को जार्नने के लिये बैंक किसी, दूसरे बैंक से, जहार्ं उसने खार्तार् खोल रखार् है, से जार्नकारी प्रार्प्त कर सकतार् है। यह बैंकों के बीच की प्रथार् और मौजूदार् ग्रार्हकों की प्रकल्पित सहमति है। क्रेडिट जार्नकारी कोडिड संदर्भ में दूसरे बैंकों को प्रस्तुत की जार्ती है, IBA प्रार्रूप में व बिनार् हस्तार्क्षर के।

समुचित खार्तों को प्रदार्न करने क कर्तव्य: बैंकों क कर्तव्य है कि वह ग्रार्हकों को उनके द्वार्रार् खार्तों से किये गये लेन-देन की पूर्ण जार्नकारी दे। बैंक के लिये आवश्यक है कि वह खार्ते /पार्सबुक के कथनों की जार्नकारी ग्रार्हक को उपलब्ध करार्ये जिसमें खार्ते में किये गये डेबिट और क्रेडिट (लेनदेन) स्पष्ट किये गये हों।

चैक भुगतार्न करने क दार्यित्व

बैंकर ग्रार्हकों द्वार्रार् दिये गये चैक भुगतार्न करने के लिये बार्ध्य है। अधनियम, 1881 की धार्रार् 31 के अनुसार्र- ‘‘किसी चैक के आहार्थ्र्ार्ी (drawee) को जिसके पार्स आहरणकर्तार् (drawer) की पर्यार्प्त निधि जमार् है, उस समय चैक क भुगतार्न करनार् होगार्, जब उससे ऐसार् करने के लिये विधिवत कहार् जार्ये और यदि वह भुगतार्न करने में चूक करे तो उसे ऐसी चूक के कारण आहरणकर्तार् को हुर्इ किसी हार्नि अथवार् क्षति के लिये क्षतिपूर्ति करनी होगी।”

इसलिये बैंक क कर्तव्य है कि वह खार्तार् धार्रक के दिये हुये चैैकों क भुगतार्न करे यदि  बतार्यी गयी बार्तें पूर्ण हों-
चैक ठीक तरीके से तैयार्र कियार् गयार् हो यार्नी तार्रीख, शब्दों व अंकों में लिखी गयी रार्शि ठीक तरह से लिखी हो और न ही पुरार्नार् हो, कटार्-फटार् न हो व उत्तर दिनार्ंकित (Post docted) भी न हो और सार्थ ही सार्थ खार्तार्धार्रक के हस्तार्क्षर बैंक में दर्ज नमूने जैसे हों। चैक क भुगतार्न वहीं से होगार् जहार्ं पर खार्तार् खुलार् हुआ है। (प्रौद्योगिकी और कोर बैंकिग समार्धार्न के कार्यार्न्वयन की वजह से ग्रार्हक बैंक की दूसरी शार्खार्ओं में चैक प्रस्तुत कर सकते हैं। आरबीआर्इ ने बैंकों को सलार्ह देते हुये कहार् कि खार्तार् धार्रकों को मल्टीसिटी चैक जार्री किये जार्यें)।

  1. खार्ते में पर्यार्प्त शेष रार्शि/धन (balance) हो और शेष रार्शि/धन इतनार् हो कि चैक के भुगतार्न ठीक से किये जार् सकें। 
  2. भुगतार्न के लिये चैक को कार्य दिवस व शार्खार् के कार्य समय में प्रस्तुत कियार् जार्ये। 
  3. चेक पर पृष्ठार्ंकन नियमित और समुचित हो। 
  4. आहरणकर्तार् के द्वार्रार् भुगतार्न क चेक रद्द/प्रत्यार्देशित (countermanded) न हो। 

चैक भुगतार्न इन परिस्थितियों में समार्प्त हो जार्तार् है-

  1. जब खार्तार् धार्रक ने चैक क भुगतार्न न करने के लिये बैंक को निर्देश दियार् हो, 
  2. आहरणकर्तार् की मृत्यु की सूचनार् पार्ने पर, स.(गानिशी) अनुऋणी आदेश खार्ते में धन के सार्थ संलग्न हो यार् बैंकर के द्वार्रार् आयकर संलग्न आदेश प्रार्प्त हुआ हो, 
  3. चैक के भुगतार्न के समय आहरणकर्तार् पार्गल यार् दिवार्लियार् हो गयार् हो। 

बैंक इन परिस्थितियों में चैक क भुगतार्न करने को मनार् कर सकतार् है-

  1. जब खार्ते में पर्यार्प्त धन न हो, 
  2. जब सम्बन्धित पक्ष की दार्वेदार्री में त्रुटि हो, 
  3. जब चैक में कुछ कमी हो (भुगतार्न से आगे की तार्रीख, चुरार्यार्, शब्दों और अंकों में अलग-अलग लिखार् होनार्, इत्यार्दि) 
  4. जब खार्ते में शेष रार्शि किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिये निर्धार्रित हो और बार्की शेष रार्शि धनार्देश क भुगतार्न करने के लिये पर्यार्प्त नहीं हो।

बैंकर के अधिकार

ऐसार् नहीं है कि बैंक के अपने ग्रार्हकों की तरफ सिर्फ कर्तव्य है बल्कि उसके पार्स कुछ अधिकार भी हैं जो कि हैं-

  1. सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार 
  2. समार्योजन क अधिकार
  3. विनियोजन क अधिकार
  4. ग्रार्हक के आदेश के अनुसार्र कार्य करने क अधिकार 
  5. ब्यार्ज लगार्नार्, कमीशन, प्रार्संगिक प्रभार्र यार् शुल्क इत्यार्दि क अधिकार

1. धार्रणार्धिकार

धार्रणार्धिकार लेनदार्र (Creditor) को यह अधिकार प्रदार्न करतार् है कि वह ऋण के पुर्नभुगतार्न के बदले संरक्षार् में रखी वस्तुएं, प्रतिभूतियार्ं आदि रोक ले जब तक इसके विपरीत कोर्इ व्यक्त यार् अव्यक्त अनुबन्ध न हो। यह अधिकार है, विशेष वस्तुओं यार् प्रतिभूतियों यार् अन्य चल सम्पत्ति जिनक स्वार्मित्व किसी दूसरे व्यक्ति में निहित है, को अपने कब्जे में रखने क एवं कब्जार् तब तक बनार्यार् जार् सकतार् है जब तक कि स्वार्मी ऋण उन्मुक्त न हो जार्ये यार् कब्जार् करने वार्ले को दार्यित्व मुक्त न कर दे। लेनदार्र (बैंक) देनदार्र की प्रतिभूतियों को रख सकतार् है, पर उन्हें बेच नहीं कर सकतार्। धार्रणार्धिकार दो प्रकार के होते हैं- 1. विशेष धार्रणार्धिकार 2. सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार

(i) विशेष धार्रणार्धिकार

विशेष धार्रणार्धिकार अधिकार देतार् है कि केवल उन वस्तुओं पर तब तक अपनार् कब्जार् बनार्ए जार् सकतार् है जब तक उनसे संबंधित रार्शि बकायार् है। अगर बैंक ने किसी विशेष उधार्री के लिए कोर्इ विशेष प्रतिभूति प्रार्प्त की है तो बैंकर क अधिकार विशेष धार्रणार्धिकार में बदल जार्तार् है।

(ii) सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार 

बैंक के पार्स सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार क अधिकार उधार्र लेने वार्ले के लिये हैं। बैंक के सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार में निहित सभी देय रार्शि आती है न कि कोर्इ विशेष देय रार्शि। यह बैंक क वैधार्निक अधिकार है और संविदार् (agreement) के अभार्व में भी यह उपलब्ध है लेकिन गिरवी क अधिकार इसमें निहित नहीं है। सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार के अनुसार्र एक व्यक्ति अपने कब्जे में आयी हुर्इ दूसरे की सम्पत्ति को तब तक रोक सकतार् है जब तक दूसरे व्यक्ति के ऊपर उसके सभी दार्वे सन्तुष्ट नहीं हो जार्ते। भार्रतीय संविदार् अधिनियम, 1872 की धार्रार् 171 के द्वार्रार् बैंक को सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार क अधिकार प्रार्प्त है। धार्रार् के अनुसार्र ‘‘ बेंकर, फैक्टर, घार्टवार्ले, उच्च न्यार्यार्लय के अटर्नी और बीमार् दलार्ल अपने को उपनिहित किसी मार्ल को, तत्प्रतिकूल संविदार् के अभार्व में, समस्त लेखार्ओं की बार्की के लिये, प्रतिभूति के रूप में रोके रख सकेंगे, किन्तु अन्य किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वे अपने को उपनिहित मार्ल ऐसी बकायार् के लिये प्रतिभूति के रूप में रोके रख सके, जब तक कि कोर्इ अभिव्यक्त संविदार् उसे प्रभार्वित न करती हो’’। बैंक को धार्रणार्धिकार क अधिकार तभी है, जब उसने लेनदार्र के रूप में वस्तुयें व प्रतिभूतियों को प्रार्प्त कियार् है। अग्रिम देते समय बैंक अपने पार्स दस्तार्वेजों को रख लेतार् है। यह दस्तार्वेज सार्धार्रण धार्रणार्धिकार को विवक्षित गिरवी में परिवर्तित कर देते हैं। बैंकर धार्रणार्धिकार सार्मार्न्य धार्रणार्धिकार से अधिक है क्योंकि यह विवक्षित गिरवी है और उसे किसी व्यार्तिक्रम की स्थिति में (default) मार्ल को बेचने क अधिकार भी है। धार्रणार्धिकार के अन्तर्गत बैंक को मार्ल की बिक्री क अधिकार है। सीमार् की विधि से बैंकरों के धार्रणार्धिकार के अधिकार वर्जित नहीं है (Law of Limitation)।

धार्रणार्धिकार के अधिकार क क्रियार्न्वयन

  1. बैंक को कानूनी रूप सौंपे गये मार्ल व प्रतिभूतियों पर धार्रणार्धिकार क अधिकार है एवं वह ऋण लेने वार्ले के नार्म पर स्थार्यी है।
  2. विशेष प्रतिभूति के विरूद्ध लिये गये ऋण के भुगतार्न कर देने के बार्द भी बैंक को धार्रणार्धिकार क अधिकार है कि उसी उधार्रकर्तार् की बकायार् रार्शि बैंक पर देय है। 
  3. धार्रणार्धिकार क अधिकार वचन पत्र, धनार्देश, शेयर साटिफिकेट, बार्ंड डिबेचंर आदि पर प्रयोग कर सकतार् है। 

जहार्ँ धार्रणार्धिकार के अधिकार क क्रियार्न्वयन नहीं हो सकतार् 
धार्रणार्धिकार के अधिकार क क्रियार्न्वयन नहीं हो सकतार् अगर वस्तुयें सुरक्षित अभिरक्षार् के लिये प्रार्प्त की गर्इ हों, न्यार्सी के रूप में प्रार्प्त सम्पत्तियार्ं यार् ग्रार्हक के अभिकर्तार् के रूप में प्रार्प्ति यार् भूलवश बैंक के पार्स रह गयी हो।

2. समार्योजन क अधिकार 

बैंकर के पार्स अधिकार है कि वह अपने ग्रार्हकों के खार्तों को समार्योजित कर सके। बैंक को प्रार्प्त यह एक वैधार्निक अधिकार है कि यदि एक ही ग्रार्हक के कुुछ खार्तों में ऋणार्त्मक अवशेष हो (यार्नी उतने धन के लिये बैंक क ऋणी हो) और कुछ अन्य खार्तों में ग्रार्हक क धनार्त्मक अवशेष हो (यार्नी उतने धन के लिये बैंक ग्रार्हक क ऋणी हो), तो बैंक को यह अधिकार होतार् है कि वह उन सब खार्तों की धनरार्शियों को समार्योजित कर ले और अन्तिम रूप से पार्ये गये ऋणार्त्मक यार् धनार्त्मक (जैसी स्थिति हो) अवशेषों को तदनुसार्र निपटार्ये अर्थार्त अन्तिम ऋणार्त्मक अवशेष को ग्रार्हक से वसूल कर ले यार् अन्तिम धनार्त्मक अवशेष को ग्रार्हक को वार्पस कर दें। यह अधिकार एक ही बैंक की अन्य शार्खार्ओं में जमार् रार्शियों पर भी उपलब्ध है। इस अधिकार क प्रयोग मृत्यु के बार्द, कंपनी के दिवार्लियार् और विघटित होने पर अनुऋणी/कुर्की आदेश पर प्रयोग कियार् जार् सकतार् है। समय बार्धित ऋण के लिये भी यह अधिकार उपलब्ध है। समार्योजन के अधिकार क उपयोग तभी कियार् जार् सकतार् है जब इसके विपरीत कोर्इ व्यक्त यार् अव्यक्त अनुबंध न हो। इस अधिकार क प्रयोग उन देयों के सम्बन्ध में कियार् जार्तार् है जो देय है यार् देय होने वार्ले हैं अर्थार्त् विशेष एवं अनिश्चित नहीं है। यह भविष्य के ऋणों पर उपलब्ध नहीं है। गार्रन्टर के नार्म पर जमार्ओं को ऋणी के ऋण बैलेन्स से समार्योजित नहीं कियार् जार् सकतार्, जब तक गार्रन्टर से मार्ंग न की हो एवं उसक दार्यित्व निश्चित हो गयार् हो।

समार्योजन क स्वत: अधिकार 

कुछ परिस्थितियों में यह अधिकार स्वत: रूप से लार्गू हो जार्तार् है और इसमें ग्रार्हक की पूर्व आज्ञार् की आवश्यकतार् नहीं होती। निम्न स्थितियार्ं में समार्योजन स्वत: ही हो जार्तार् है यार्नि ग्रार्हक की आज्ञार् के बिनार्-

  1. ग्रार्हक की मृत्यु होने पर, 
  2. ग्रार्हक के दिवार्लियार् हो जार्ने पर, 
  3. न्यार्यार्लय द्वार्रार् ग्रार्हक के खार्ते के कुर्की के आदेश हो जार्ने पर, 
  4. ग्रार्हक के धनार्त्मक अवशेष के बार्रे में उसके समार्नुदेशन क नोटिस प्रार्प्त होने पर। 
  5. प्रतिभूतियों जिन्हें पहले ही बैंक द्वार्रार् शुल्क लियार् जार् चुक है उस पर द्वितीय शुल्क के नोटिस की प्रार्प्ति पर। 

समार्योजन के अधिकार को लार्गू करने हेतु आवश्यक शर्तें 

  1. खार्ते के धार्रक क स्वार्मित्व एक के ही नार्म होनार् चार्हिये।
  2. ऋण की रार्शि निश्चित व मार्पी यार् गणनार् योग्य (measurebale) हो। 
  3. इसके प्रतिकूल कोर्इ समझौतार् नहीं होनार् चार्हिये। 
  4. न्यार्स खार्तों में धनरार्शि (funds) नहीं होनी चार्हिये। 
  5. भविष्य यार् अनिश्चित ऋणों के आधार्र पर अधिकार लार्गू नहीं कियार् जार् सकतार्। 
  6. बैंकर को अधिकार है कि कुर्की के आदेश प्रार्प्त करने से पहले वह अपने इस अधिकार क प्रयोग करे।

3. विनियोजन क अधिकार

यह ग्रार्हक क अधिकार है कि वह बैंकर को निर्देशित करे कि उस ऋण (जब एक से अधिक ऋण बकायार् हों) के विरूद्ध जो भुगतार्न उसके द्वार्रार् कियार् गयार् है, विनियोजित करार्नार् चार्हिए अगर ऐसे कोर्इ दिशार् निर्देश नहीं दिये गये हैं, तो बैंक अपने विनियोजन के अधिकार को किसी भी ऋण के भुगतार्न के लिये प्रयोग कर सकतार् है। भार्रतीय संविदार् अधिनियम, 1872 की धार्रार्यें 59, 60 और 61 विनियोजन के नियमों के बार्रे में बतार्ती है।

धार्रार् 59 : ऋणी द्वार्रार् विनियोजन 

यदि ऋणी यह स्पष्ट रूप से यार् निहित रूप से बैंक को यह सूचित करतार् है कि उसके द्वार्रार् जमार् धनरार्शि किस ऋण खार्ते में जमार् की जार्ये। (जब एक से अधिक ऋण बकायार् है)

धार्रार् 60 : बैंक द्वार्रार् विनियोजन 

यदि ऋणी धन जमार् करते समय यह न बतार्ये कि वह धन किस ऋण खार्ते में जमार् होनार् है और परिस्थितियों से भी उसक कोर्इ आशय स्पष्ट न होतार् हो, तो भार्रतीय संविदार् अधिनियम, 1872 की धार्रार् 60 के अनुसार्र ऋणदार्तार् अपने विवेकानुसार्र ऋणी के किसी भी ऋण खार्ते में उस धन को जमार् कर सकतार् है। एक बार्र ऋणदार्तार् द्वार्रार् ऋणी को यह सूचित किये जार्ने पर, कि उसके द्वार्रार् जमार् धन क विनियोजन किस प्रकार कर दियार् गयार् है, के बार्द ऋणदार्तार् उस प्रकार को बदल नहीं सकतार् है।

धार्रार् 61 : कानून द्वार्रार् विनियोजन 

यदि ऋणी अथवार् ऋणदार्तार् जमार् किये गये धन को किसी ऋण खार्ते में विनियोजित करने के लिये सुनिश्चित नहीं हो पार्तार्, तो उस धन को सबसे पहले उस ऋण की अदार्यगी में विनियोजित कियार् जार्येगार्, जो सबसे पहले लियार् गयार् थार्।जब तक कोर्इ प्रतिकूल समझौतार् न हो, ऋणदार्तार् के द्वार्रार् किसी भुुगतार्न को पहले ब्यार्ज फिर मूलश् रार्शि पर लार्गू कियार् जार्येगार्। अगर ग्रार्हक के पार्स एक ही खार्तार् है और वह रार्शि जमार् व निकालनार् उसी से नियमित तौर पर करतार् है। तो जिस क्रम में लेनदार्र प्रविष्टि (Credit entry) समार्योजित की जार्एगी। ऋण प्रविष्टि (debit entry) से वह कालार्नुक्रमिक होगी, इसे क्लार्इटन के नियम (clagton’srule) से जार्नार् जार्तार् है।

क्लार्इटन वार्द में नियम- यह व्यवस्थार् देवार्यनिस बनार्म नोबिल एण्ड कं0 के मार्मले में सार्मने आर्इ। यकद किसी ग्रार्हक क चार्लू खार्तार् हो और उसी में ऋणार्त्मक अवषेश हो जार्ने पर ग्रार्हक की स्थिति ऋणी की हो जार्ती हो और उसमें धन जमार् करते और निकालते रहने पर ऋणार्त्मक अवषेश बदलतार् रहतार् हो, तो यह स्थिति होती है कि उस खार्ते में से धन निकालने पर नयार् ऋण उत्पन्न होतार् है और जमार् करने पर इस तरह से उत्पन्न हुए ऋणों में कालार्नुसार्र विनियोजन होतार् है।बैंकर को अधिकार है ब्यार्ज, कमीषन, आनुशार्ंगिक प्रभार्र इत्यार्दि प्रभार्र लेने का।बैंकर क यह गर्भित अधिकार है कि अपने द्वार्रार् दी गर्इ सेवार्ओं को चाज करे व ग्रार्हक को बेचे। बैंक प्रभार्री है अग्रिम रार्षि पर ब्यार्ज वसूलने, अग्रिम पर प्रभार्र लगार्नार्, पार्रित की गर्इ सार्ख सुविधार्ओं के अनुपयोग पर प्रभार्र, कमीशन प्रभार्र इत्यार्दि को वसूलने के लिए जो कि अग्रिम बैंक द्वार्रार् मार्सिक/चर्तुमार्सिक/अर्धवाशिक यार् वाषिक दी गर्इ शर्तो पर निर्भर हो। बैंक चाज तब भी लेतार् है जब निर्देषित की हुर्इ रार्शि क तुलन (balance) कम हो। अधिकतर बैंक विभिन्न तरीकों से इन प्रभार्रों के बार्रे में अपने ग्रार्हकों को सूचित करते हैं।

नार्मार्ंकन सुविधार् 

व्यक्ति द्वार्रार् की गयी इच्छार् की अभिव्यक्ति नार्मार्ंकन है कि उसकी मृत्यु के बार्द नार्मार्ंकित व्यक्ति को उसकी सम्पतित हस्तार्ंतरित कर दी जार्ये। नार्मार्ंकन वसीयत नहीं है लेकिन वसीयत जैसार् कार्य करती है। बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949, बैकिंग कम्पनियों (नार्मार्ंकन) नियम 1985 की धार्रार् 47जेड ए से 45जेड एफ इस संदर्भ में बनार्यी गयी है। नार्मार्ंकन सुविधार् एक सरल प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् मृतक की जमार् रार्शि और लार्कर धार्रक के दार्वों को निपटार्यार् जार् सकतार् है एक दुर्भार्ग्यपूर्ण घटनार् में जमार्कर्तार् की मौैत बेैंक को सक्षम बनार्ती हैै कि वह मृतक द्वार्रार् नार्मार्ंकित व्यक्ति को भुगतार्न कर सके, उस रार्शि क जो जमार्कर्तार् के खार्ते में शेष है एवं उसके द्वार्रार् छोड़ार् गयार् समार्न जो कि बैंक की सुरक्षित अभिरक्षार् में है मृतक व्यक्ति द्वार्रार् नार्मार्ंकित व्यक्ति को दे दियार् जार्ये बिनार् उत्तरार्धिकार प्रमार्णपत्र यार् कानूनी वार्रिस की पुष्टि करे हुये।

नार्मार्ंकन मृतक की सम्पत्ति के कानूनी वार्रिस क अधिकार नहीं लेतार्। नार्मार्ंकित व्यक्ति बैंक से कानूनी वार्रिस के न्यार्सी के रूप में धन प्रार्प्त करतार् है। संयुक्त जमार् खार्ते के मार्मले में नार्मार्ंकन क अधिकार तभी मिलतार् है जब सभी जमार्कर्तार्ओं की मौत हो गयी हो। नार्मार्ंकन सुविधार् व्यक्तियों और एकल मार्लिकानार् संबंधित मार्मलों में ही मिलती है। अगर नार्मार्ंकित व्यक्ति नार्बार्लिग है तो नार्मार्ंकन बनार्ने वार्लार् जमार्कर्तार्, रार्शि को प्रार्प्त करने के लिये किसी व्यक्ति को नियुक्त कर देतार् है, जो उसकी मृत्यु होने की स्थिति में नार्मार्ंकित व्यक्ति के नार्बार्लिग होने के दौरार्न जमार्रार्शि प्रार्प्त करेगार् नार्वार्लिग की ओर से। एक व्यक्ति जो कानूनी तौर पर खार्ते को संचार्लित करने की शक्ति रखतार् है वह नार्बार्लिग की ओर से नार्मार्ंकन दर्ज करार् सकतार् है। नार्मार्ंकन, खार्तार् खोलने के फाम में ही यार् अलग से फाम पर अपने नार्मार्ंकित व्यक्ति क नार्म व पतार् लिखकर भी कियार् जार् सकतार् है। खार्तार्धार्रक नार्मार्ंकन किसी भी समय बदल सकते हैं। जमार् खार्ते के लिये केवल एक ही नार्मार्ंकन होगार् चार्हे वे एकल यार् संयुक्त रूप से आयोजित कियार् गयार् हो। संयुक्त लॉकर के लिये दो नार्मार्ंकन किये जार् सकते हैं।

नार्मार्ंकन सुविधार् की व्यवहायतार् 

नार्मार्ंकन सुविधार् सभी प्रकार की जमार् रार्शि, सुरक्षित जमार् लॉकर और सुरक्षित अभिरक्षार् वस्तुओं के लिये उपलब्ध है। यह उन जमार्रार्शियों के लिये भी लार्गू है जिन पर संचार्लन सम्बन्धी निर्देश हों ‘‘यार् तो यार् उत्तरजीवी’’। नार्मार्ंकन केवल एक व्यक्ति के पक्ष में कियार् जार् सकतार् है। संयुक्त खार्ते के मार्मले में, नार्मार्ंकन सभी जमार्कर्तार्ओं द्वार्रार् संयुक्त रूप से कियार् जार्तार् है। नार्मार्ंकन उन खार्तों पर नहीं कियार् जार् सकतार् जहार्ं जमार् किसी प्रतिनिधित्व क्षमतार् क हो, जैसे न्यार्सी खार्तार्, सार्झेदार्री फर्म, कम्पनी, संगठन, क्लबों इत्यार्दि के खार्तों में। नार्मार्ंकन एक नार्बार्लिग के पक्ष में कियार् जार् सकतार् है। हार्लार्ंकिन नार्मार्ंकन करते समय, नार्मार्ंकित व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को नियुक्त करतार् है जो कि नार्बार्लिग न हो, तार्कि वह नार्मार्ंकित व्यक्ति की ओर से जमार् रार्शि प्रार्पत कर सके, जमार्कर्तार् की मृत्यु की स्थिति में यार् नार्मार्ंकित व्यक्ति के नार्बार्लिग होने के दौरार्न। नार्बार्लिग के जन्म की तार्रीख प्रार्प्त हो व नोट की जार्ये। नार्मार्ंकन जार्री रहेगार् सार्वधि जमार् के नवीनीकरण पर जब तक विशेष रूप से रद्द न कर दियार् जार्ये यार् बदल न दियार् जार्ये। बैंक प्रत्येक सार्वधि जमार् खरीद पर अलग नार्मार्ंकन फाम लेते हैं। अनिवार्सी नार्मार्ंकित व्यक्ति के मार्मले में वह मृतक की रार्शि क हकदार्र होगार्। वह रार्शि उसके एन आर ओ खार्ते में जमार् होगी। वह जमार् रार्शि को भार्रत से बार्हर प्रेषित नहीं कर सकतार्।

बैंक मे जमार् रार्शियों क बीमार् 

भार्रतीय निक्षेप बीमार् ओर प्रत्यय गार्रंटी निगम, एक सावजनिक लिमिटेड कम्पनी है जो कि भार्रतीय रिजर्व बैंक द्वार्रार् प्रवर्तित है और इसक कार्य है बैंक जमार्ओं क बीमार् करनार्। निगम की अधिकृत पूंजी 50 करोड़ रूपये है जो कि भार्रतीय रिजर्व बैंक द्वार्रार् पूर्ण जार्री व समर्थित है। निगम क प्रबन्धन निदेशक मण्डल में निहित है जिसमें भार्रतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर अध्यक्ष के रूप में हैं। निगम जमार्कर्तार्ओं के हितों की रक्षार् करतार् है और बैंक के असफल होने पर जमार् रार्शि पर बीमार् प्रदार्न करतार् है जिससे कि उनक आत्मविश्वार्स बनार् रहे। भार्रत में कार्यरत सभी विदेशी बैंकों की शार्खार्ओं सहित सभी वार्णिज्यिक बैंकों, स्थार्नीय क्षेत्रों के बैंकों, क्षेत्रीय ग्रार्मीण बैंकों, सभी पार्त्र सहकारी बैंक निक्षेप बीमार् योजनार् के अन्तर्गत आते हैं। 1,00,000 रूपये की अधिकतम रार्शि तक जो कि बैंंक की सभी शार्खार्ओं में से किसी की भी जमार् रार्शि क पूर्ण यार् कोर्इ हिस्सार् हो, क बीमार् करती है। यह बीमार् सभी जमार् रार्शियों को शार्मिल करतार् है जैसे बचत, सार्वधि, चार्लू, आवर्ती आदि। लेकिन कुछ इसके अन्तर्गत नहीं आते, जैसे,

  1. विदेशी सरकारों की जमार् रार्शियार्ं
  2. केन्द्र/रार्ज्य सरकारों की जमार्रार्शियार्ं 
  3. अन्तर बैंक जमार् रार्शियार्ं 
  4. रार्ज्य सहकारी बैंक के पार्स रार्ज्य भूमि विकास बैंकों की जमार् रार्शियार्ं 
  5. भार्रत के बार्हर से प्रार्प्त की गयी रार्शि यार् खार्तों पर देय रार्शि 
  6. ऐसी रार्शि जो कि भार्रतीय रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से, निगम द्वार्रार् विशेष रूप से छूट प्रार्प्त हो। 

निगम बैंकों से प्रतिवर्ष प्रति रू0 100 के निर्धार्रणीय पर 10 पैेसे की दर बीमार् प्रीमियम के तौर पर वसूल करतार् है। यह प्रीमियम निर्धार्रणीय जमार् पर सार्ल में दो बार्र वसूलार् जार्तार् है। प्रथमत: 31 माच व द्वितीय 30 सितम्बर को। हार्लार्ंकि प्रीमियम जमार्कर्तार्ओं द्वार्रार् बैंक में जमार् की पूर्ण रार्शि पर वसूलार् जार्तार् है। बीमार् अधिकतम 1,00,000 रूपये (मूल रार्शि व ब्यार्ज दोनों के लिये) क कियार् जार् सकतार् है। 

परिसमार्पक से क्लेम की सूची के प्रार्प्त करने के दो मार्ह के अन्दर परिसमार्पक के मार्ध्यम से, निगम जमार्कर्तार् को उसकी दो लार्ख तक की जमार् रार्शि क भुगतार्न करतार् है, यदि किसी बैंक को पुन: संरचित यार् विलय यार् संलयन किसी अन्य बैंक में कियार् जार्तार् है तब जमार् की गर्इ पूर्ण रार्शि यार् उस समय प्रभार्वी बीमित रार्शि जो भी कम हो एवं वह रार्शि जो पुनसंरचनार् यार् संलयन योजनार् के तहत प्रार्प्त की है, के मध्य अन्तर (रार्शि) को अंतरिती बैंक/बीमित बैंक के मुख्य प्रशार्सनिक अधिकारी, जैसार् कि मार्मले के अनुसार्र हो, से क्लेम सूची प्रार्प्त की तिथि से दो मार्ह के भीतर सम्बन्धित बैंक को भुगतार्न करेगार्। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार्र के लिये बनार्यी गर्इ, नरसिंहमन समिति (अप्रैल 1998) द्वार्रार् दी गर्इ द्वितीय रिपोर्ट के अनुसार्र यह सुझार्व दियार् गयार् है कि निक्षेप बीमार् योजनार् के अन्तर्गत निश्चित दर पर भुगतार्न देने के स्थार्न पर परिवर्तित यार् जोखिम आधार्रित मूल्यार्ंकन पर भुगतार्न करनार् चार्हिये। 

केवाइसी (KYC) के दिशार् निर्देशों क उद्देश्य है कि आपरार्धिक तत्वों द्वार्रार् काले धन की वैध बनार्ने संबंधी गतिविधियों क जार्नबूझकर यार् अनजार्ने में हिस्सार् बनने से बैंकों को रोक जार् सके। केवाइसी प्रक्रियार्ओं से बैंकों को सक्षम बनार्यार् जार्तार् है जिससे कि वह अपने ग्रार्हकों को और उनके वित्तीय लेन-देन को बेहतर समझ सके। इससे जोखिमों को कम करने में सहार्यतार् मिलेगी। एक नयार् खार्तार् खोलने से पहले जार्ंच करवार्नार् आवश्यक है कि ग्रार्हक की पहचार्न किसी आपरार्धिक पृष्ठभूमि वार्ले व्यक्ति से तो नहीं मिलती यार् फिर किसी प्रतिबंधित तत्व जैसे व्यक्तिगत आतंकवार्दी यार् आतंकवार्दी संगठनों से तो जुड़ार् हुआ नहीं है और कोर्इ खार्तार् गुमनार्म यार् फर्जी/ बेनार्मी नार्मों से तो नहीं खोलार् जार् रहार्। बैंकों को खार्तार् खोलते समय केवाइसी मार्नदण्डों को पूर्णरूप से ध्यार्न में रखनार् चार्हिये। केवाइसी क उद्देश्य है कि ग्रार्हक की पहचार्न को सुनिश्चित करे और संदिग्ध प्रकृति के लेनदेन को निगरार्नी में रखें। नयार् खार्तार् खोलते समय बैंक को कुछ महत्वपूर्ण जार्नकारी इकट्ठी कर लेनी चार्हिये जैसे मौजूदार् खार्तेदार्र के मार्ध्यम से परिचय होनार् यार् ग्रार्हक द्वार्रार् प्रदार्न किये गये दस्तार्वेजों के आधार्र पर। यह दस्तार्वेज, पार्सपोर्ट, ड्रार्इविंग लार्इसेंस इत्यार्दि हो सकते हैं। मौजूदार् खार्तेदार्र के सम्बन्ध में बैंक को शीघ्र अतिशीघ्र ग्रार्हक की पहचार्न क कार्य पूरार् कर लेनार् चार्हिये। 

बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धार्रार् 35-ए के तहत जार्री किये गये भार्रतीय रिजर्व बैंक के दिशार् निर्देशों के अनुसार्र- 

भार्रतीय बैंक संघ ने एक कोड तैयार्र कियार् है वो बैंकों के उचित व्यवहार्र के लिये मार्नक प्रस्तुत करतार् है। इस दस्तार्वेज के द्वार्रार् व्यार्पक रूपरेखार् देखने को मिलती है। जिसके तहत आम जमार्कर्तार्ओं के अधिकारों को मार्न्यतार् दी गयी है। यह एक स्वैच्छिक कोड है जो प्रतिस्पर्धार् को बढ़ार्वार् देतार् है और बार्जार्र की तार्कतों को प्रोत्सार्हित करतार् है तार्कि उच्च परिचार्लन मार्नकों से ग्रार्हकों को लार्भ मिल सके। यह कोड लार्गू होतार् है- चार्लू, बचत और अन्य सभी बचत खार्तों, बैंकों द्वार्रार् संग्रह और प्रेषण सेवार्एं, ऋण और ओवरड्रार्फ्ट, विदेशी मुद्रार् सेवार्यें, बैंकों द्वार्रार् कार्ड उत्पार्द व तीसरे पक्ष उत्पार्द इत्यार्दि के लिये।

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