बिस्माक की नीति

बिस्माक की गृह नीति

1. नवीन संविधार्न क निर्मार्ण

जर्मनी के एकीकरण के पश्चार्त जर्मन सार्म्रार्ज्य के लिए एक संविधार्न क निर्मार्ण कियार् गयार्। इस संविधार्न को संघार्त्मक संविधार्न की संज्ञार् प्रदार्न की जार् सकती है। यह 25 छोटे-बड़े रार्ज्यों तथार् इम्पीरियल प्रदेश आल्सार्स व लॉरेन क सम्मिलित संघ रार्ज्य थार्।

इस नवीन संविधार्न के अनुसार्र –

  1. सार्म्रार्ज्य-सार्म्रार्ज्य क प्रमुख सदैव के लिए प्रशार् क सम्रार्ट होगार्। वह इस संघ क अध्यक्ष रहेगार्। शार्सन की समस्त सत्तार् रार्ज्यों की समष्टि में निहित थी जो उसक पय्र ार्गे विधार्न-सभार् के द्वितीय सदन (सार्म्रार्ज्य-परिषद्) में अपने प्रतिनिधियों द्वार्रार् करते थे। उसके अधिकार निम्न श्रेणियों में विभक्त किये जार्ते हैं- (1) सार्म्रार्ज्य क प्रतिनिधि-वह विदेशी रार्ज्यों तथार् संघ में सम्मिलित रार्ज्यों के सार्म्रार्ज्य क प्रतिनिधि थार्। (2) सार्म्रार्ज्य परिषद-रार्जार् को एक समिति की सलार्ह से कार्य करनार् थार् जिसे सार्म्रार्ज्य-परिषद् कहते हैं। इस समिति की सहार्यतार् से विदेशी संबंधों की स्थार्पनार् करनार्, रार्जदूतों क स्वार्गत करने, उसकी नियुक्त करने, युद्ध तथार् संधि करने के अधिकार प्रार्प्त थे। परन्तु उसको आक्रमणार्त्मक युद्धों के लिये सार्म्रार्ज्य-परिषद् की अनुमति अवश्य प्रार्प्त करनी होती है। (3) व्यवस्थार्पिका-संबंधी अधिकार-उसको विधार्न-सभार् के अधिवेशन आमंत्रित करने, उसको स्थार्पित करने तथार् सार्म्रार्ज्य-परिषद् की अनुमति से प्रथम भवन को भंग करने क अधिकार प्रार्प्त थार्। (4) कार्यपार्लिक संबंधी अधिकार-उसको विधार्न के अनुसार्र कार्य न करने वार्ले रार्ज्य को दण्ड देने तथार् सार्म्रार्ज्य की विधियों की घोषणार् करने तथार् उसको कार्यार्न्वित करने क अधिकार थार्।
  2. चार्ंसलर – इस संविधार्न में जर्मन सार्म्रार्ज्य के लिये एक चार्ंसलर की व्यवस्थार् थी। वह केवल सम्रार्ट के प्रति उत्तरदार्यी थार्, न कि जर्मन सार्म्रार्ज्य की व्यवस्थार्पिक सभार् के। इस प्रकार उसकी नियुक्ति क अधिकार तथार् पदच्युत करने क अधिकार जर्मन सार्म्रार्ज्य के सम्रार्ट में ही निहित थार्। उसकी सहार्यतार् के लिए सचिव थे। वह सार्म्रार्ज्य-परिषद् क सभार्पति होतार् थार्। जर्मन सार्म्रार्ज्य के चार्ंसलर पद को बिस्माक ने लगभग 20 वर्षों तक सुशोभित कियार्।
  3. व्यवस्थार्पिक सभार् – व्यवस्थार्पिक के दो सदन थे जिनमें से प्रथम सदन रीचस्टेग और द्वितीय सदन बन्डरेस्ट कहलार्ते थे- (1) रीचस्टेग – प्रथम सदन के सदस्यों क निर्वार्चन जनतार् करती थी। इसकी संख्यार् 397 थी। जनसंख्यार् के आधार्र पर प्रत्येक रार्ज्य की जनतार् निश्चित सदस्यों क निर्वार्चन करती थी। इनक निर्वार्चन पार्ंच वर्ष के लिये 25 वर्ष यार् इससे अधिक आयु वार्ले पुरूष करते थे। इसक मुख्य कार्य कार्यकारिणी को सलार्ह देनार् तथार् उसके कार्यो की समार्लोचनार् करनार् थार्। सम्रार्ट को इस सभार् के भंग करने क अधिकार थार्। उसको थलसेनार्, नौसेनार्, व्यार्पार्र, आयार्त-निर्यार्त, कर, रेलवे, डार्क-तार्र, दीवार्नी तथार् फौजदार्री विधियार्ं, आदि बनार्ने क अधिकार थार्, किन्तु उसके पार्स अंतिम अधिकार नहीं थार्। उसके द्वार्रार् निर्मित विधियार्ं उस समय तक मार्न्य नहीं की जार्ती थीं जिस समय तक दूसरी सभार् बन्डरेस्ट उसको स्वीकार नहीं करती थी। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि उसके हार्थ में विशेष सत्तार् नहीं थी और वह केवल एक परार्मर्श देने वार्ली संस्थार् क कार्य करती थी। (2) बन्डरेस्ट – द्वितीय सदन बन्डरेस्ट के सदस्यों की नियुक्ति संघ शार्सन में सम्मिलित रार्ज्यों के रार्जार् करते थे। प्रशार् को 17, बवेरियार् को 5, सेक्सनी तथार् बर्टेमबुर्ग को चार्र-चार्र और है।स को तीन और शेष रार्ज्यों को एक-एक प्रतिनिधि की नियुक्ति करने क अधिकार प्रार्प्त थार्। इनको अपनार् स्वतंत्र मत प्रदार्न करने क अधिकार नहीं थार्, वरन् उन्हें अपने रार्ज्य के रार्जार्ओं के आदेशार्नुसार्र मत देनार् होतार् थार्। उसको कुछ विशेष अधिकार प्रार्प्त थे। वह विधियों की स्त्रोत थी। अधिकांश रूप में समस्त विधियों क प्रथम प्रस्तार्व इसी सभार् में प्रस्तार्वित कियार् जार्तार् थार्। वह सम्रार्ट के सार्थ मिलकर किसी देश के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर सकती थी।
  4. केन्द्रीय शक्ति को प्रधार्न बनार्नार् – बिस्माक ने निम्न उपार्यों द्वार्रार् केन्द्रीय शार्सन की शक्ति को प्रधार्नतार् स्थार्पित की- (1) इम्पीरियल संस्थार्ओं की स्थार्पनार् – बिस्माक ने जमर्न -सार्म्रार्ज्य में सम्मिलित समस्त रार्ज्यों की पृथक संस्थार्ओं क अंत करके उनके स्थार्न पर इम्पीरियल संस्थार्ओं क निर्मार्ण करनार् आरंभ कियार्। (2) समार्न विधियों को कार्यार्न्वित करनार् – जर्मनी के विभिन्न रार्ज्यों में विभिन्न प्रकार की विधियार्ं कार्यार्न्वित थीं। बिस्माक ने समस्त जर्मन सार्म्रार्ज्य के लियेएक फौजदार्री विधि क निर्मार्ण कियार्। (3) रार्ष्ट्रीय न्यार्यार्लयों की स्थार्पनार् – बिस्माक ने सम्पूर्ण जमर्न सार्म्रार्ज्य के लिये रार्ष्ट्रीय न्यार्यार्लयों की स्थार्पनार् की। (4) समार्न मुद्रार्-पद्धति की स्थार्पनार् – बिस्माक ने 1873 र्इ. में एक विधि द्वार्रार् समस्त जमर्न सार्म्रार्ज्य में एक समार्न मुद्रार् पद्धति को लार्गू कियार्। उसने माक क प्रचलन कियार्। नए माक के सिक्के पर जर्मन सम्रार्ट विलियम प्रथम की तस्वीर अंकित की गर्इ। (5) इम्पीरियल बैंक की स्थार्पनार् – 1876 र्इ. में उसने एक इम्पीरियल बैंक की स्थार्पनार् की और सार्म्रार्ज्य के अंतर्गत बैंकों क उसने संबंध स्थार्पित कियार्। (6) रेल, तार्र और टेलीफोन पर केन्द्रीय सरकार क नियंत्रण – रेल, तार्र और टेलीफोन केन्द्रीय सरकार के अंतर्गत कर दिए। 
  5. चर्च के प्रति बिस्माक की नीति (कुल्चुरकैम्फ) – जर्मनी में रोमन कैथोलिक धर्म बड़ार् प्रबल थार् और रार्ज्य की ओर से उसको पूर्ण स्वतंत्रतार् प्रार्प्त थी। प्रशार् की जनतार् अधिकतर प्रार्टे ेस्टेंट थी और अन्य रार्ज्यों की अधिकांश जनतार् रार्मे न कैथार्ेि लक धर्म की अनुयार्यी थी। वे बिस्माक की जर्मनी एकीकरण की नीति के विरोधी थे, क्योंकि उनको यह भय थार् कि यदि जर्मनी क एकीकरण सफल हो गयार् तो वे प्रोटेस्टेटार्ंे के नियंत्रण में आ जार्येगें और उनकी धामिक स्वतंत्रतार् क अंत हो जार्यगे ार्। इसके विपरीत बिस्माक भी इनक दमन करनार् चार्हतार् थार्, क्योंकि वे जर्मन सार्म्रार्ज्य के प्रति भक्ति न रखकर पोप के प्रति भक्ति तथार् श्रद्धार् रखते थे। 1870 र्इ. में रोम के पोप ने चर्च के मार्मलों में सरकार के हस्तक्षेप क विरोध कियार् थार्। उसने पार्दरियों को यह आदेश दियार् कि समस्त विद्यार्लयों में धर्म की शिक्षार् दी जार्ए। इसके आदेशार्नुसार्र रोमन कैथार्ेि लक पार्दरियों ने सरकार से यह मार्ंग की। बिस्माक इस बार्त को सहन नहीं कर सका, क्योंकि इस प्रकार की शिक्षार् देने क अर्थ होगार् जर्मन रार्ष्ट्रीयतार् तथार् एकतार् क विनार्श जिसकी प्रार्प्ति बिस्माक ने अकथनीय प्रयत्न द्वार्रार् की थी और जो उसकी नीति क एक भार्ग थार् तथार् उसको विशेष प्रिय थार्। यह संघर्ष कर्इ वर्षों तक चलतार् रहार्। इस संघर्ष को कुल्चुरकैम्फ अर्थार्त् ‘संस्कृति क युद्ध’ भी कहते हैं।

पार्पे के 1870 र्इ. के आदेश क विरोध केवल प्रोटेस्टेटार्ंे ने ही नहीं कियार् वरन् कुछ यार्ग्े य तथार् समझदार्र रोमन कैथोलिक ने भी कियार्। 1871 र्इ. के निर्वार्चन में 63 रोमन कैथोलिकों क निर्वार्चन जर्मन-सार्म्रार्ज्य की व्यवस्थार्पिक सभार् के प्रथम सदन रीचस्टेग के लिये हुआ, जिन्होंने बिस्माक की नीति की कटु आलोचनार् की। उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणार् की कि पोप क आधिपत्य पुन: स्थार्पित कियार् जार्नार् चार्हिये जिस प्रकार वह मध्य युग में थार्। इस परिस्थिति के उत्पन्न होने पर बिस्माक बड़ार् चिंतित हुआ। वह इस समस्यार् को धामिक समस्यार् न समझकर रार्जनीतिक समस्यार् समझतार् थार्। अत: उसने रोमन कैथोलिकों क दमन करने क निश्चय कियार्।

एक ओर तो सरकार की ओर से कठोर दमनकारी विधियार्ं पार्स की गर्इ और दूसरी ओर कैथोलिकों क आंदोलन तीव्र होतार् चलार् गयार्। पोप ने समस्त अधिनियमों को अवैध घोषित कियार् और पार्दरियों को उनक उल्लंघन करने क आदेश दियार्। जितनार् दमन कियार् गयार् उतनार् ही आन्दोलन ने उग्र रूप धार्रण कियार्। 1877 के निर्वार्चन में 92 कैथोलिक लोक सभार् के सदस्य निर्वार्चित हुए। इनक दल सबसे अधिक संख्यार् में थार्। अत: कुछ गैर-कैथोलिकों ने भी सरकार की दमन नीति की आलोचनार् करनार् आरंभ कियार्।

बिस्माक एक उच्च कोटि क रार्जनीतिज्ञ थार्। परिस्थितियों से वह समझ गयार् कि कैथोलिकों क दमन करनार् सरल कार्य नहीं है। इसके सार्थ-सार्थ सार्म्यवार्दी विचार्रधार्रार् क प्रवार्ह तेजी से हो रहार् थार् जिसक सार्मनार् बिस्माक को करनार् थार् और वह दोनों क एक सार्थ सार्मनार् करने में अवश्य असफल हो जार्तार्। वार्स्तव में वह सार्म्यवार्द के दमन करने में कैथोलिकों की सहार्यतार् प्रार्प्त करनार् चार्हतार् थार् जिसके कारण उसने कैथोलिकों के संघर्ष क अंत करने क निश्चय कियार् और 1878 र्इ. में वह पार्पे से संधि करने में सफल हुआ। किन्तु बिस्माक को कैनोसार् जार्नार् पड़ार् और समझौतार् करनार् पड़ार्। इतिहार्स कारों ने इसे बिस्माक की परार्जय कहार् है।

बिस्माक की आर्थिक नीति

बिस्माक ने जर्मनी की आर्थिक दशार् को उन्नत करने क विशेष प्रयत्न कियार् जिसके कारण रार्ज्य की आय में वृद्धि हुर्इ और सरकार दृढ़ तथार् सुसंगठित सेनार् रखने में सफल हुर्इ। उसने मुक्त व्यार्पार्र की नीति के स्थार्न पर संरक्षण की नीति को अपनार्यार्। मुक्त व्यार्पार्र की नीति इंगलैंड में पर्यार्प्त सफलतार् प्रार्प्त कर चुकी थी। बिस्माक स्वयं भी पहले इसी नीति क अनुयार्यी थार्। किन्तु कुछ विशेष कारण्ज्ञों के उत्पन्न होने पर उसने संरक्षण नीति को जर्मन के लिये अधिक श्रेयस्कर तथार् हितकर समझार्। उसके प्रमुख कारण थे-

  1.  कृषि की शोचनीय अवस्थार्
  2. आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करनार् 

    उपरार्क्े त उद्देश्यों कर प्रार्प्ति हेतु बिस्माक ने करों में वृद्धि करने के लिए एक प्रस्तार्व प्रस्तार्वित कियार्। जिस पर कर्इ मार्ह तक पर्यार्प्त वार्द-विवार्द चलतार् रहार्, किन्तु जुलाइ 1876 र्इ. में प्रस्तार्व ने अधिनियम क रूप धार्रण कियार् और उसको शीघ्र ही कार्यार्न्वित कियार् गयार्।

    1. बिस्माक और समार्जवार्द

    1878 र्इ. के उपरार्ंत बिस्माक क ध्यार्न समार्जवार्दियों की ओर आकर्षित हुआ जो व्यार्वसार्यिक क्रार्न्ति के परिणार्मस्वरूप मजदूरों को अपनी और आकर्षित कर अपनार् दृढ़ संगठन कर रहे थ।े जर्मनी में समार्जवार्द क जन्मदार्तार् कार्ल मार्क्र्स थार्, किन्तु जर्मनी में आधुनिक समार्जवार्द तथार् धामिक आन्दोलन क नेतार् फर्डिनेन्ड लार्सार्ल थार्। कार्ल मार्क्र्स और लार्सार्ल में सिद्धार्ंत के प्रति पर्यार्प्त विभिन्नतार्यें विद्यमार्न थीं जिसके कारण आरंभ में जर्मनी में समार्जवार्द को विशेष सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ, किन्तु 1875 र्इ. में दोनों में पार्रस्परिक समझार्तै ार् होने के फलस्वरूप समार्जवार्द को बड़ार् पार््र त्े सार्हन प्रार्प्त हुआ। उन्होंने सार्मार्जिक प्रजार्तार्न्त्रिक दल की स्थार्पनार् की। 1878 र्इ. से पूर्व ही बिस्माक उनके सिद्धार्ंत तथार् नीति क कट्टर विरोधी थार्? क्योंकि वे उन सिद्धार्ंतो क प्रतिपार्दन करते थे जो उसके अपने सिद्धार्ंत से पूर्णतयार् विरूद्ध थे। वे प्रजार्तंत्र के समर्थक और सैनिकवार्द के विरोधी थे, परन्तु बिस्माक प्रजार्तंत्र क शत्रु और सैनिकवार्द क पुजार्री थार्, अत: दोनों में संघर्ष होनार् अनिवाय थार्।

    बिस्माक के समार्जवार्द के अन्त करने के उपार्य – 

    बिस्माक ने समार्जवार्द क जर्मनी से अंत करने के लिये दो उपार्य किये (क) समार्जवार्दियों क कठार्रे तार्पूर्वक दमन तथार् (ख) श्रमिकों की दशार् को उन्नत करनार्। किन्तु समार्जवार्दियों क दमन कोर्इ आसार्न कार्य नहीं थार् इसीलिए इस दिशार् में बिस्माक को आंशिक सफलतार् ही प्रार्प्त हो सकी।

    बिस्माक की  विदेश नीति

    बिस्माक की गणनार् उस महार्न् रार्जनीतिज्ञों तथार् कूटनीतिज्ञों में की जार्ती है जिन्होंने अपने युग को अपने विचार्रों तथार् कार्यों द्वार्रार् प्रभार्वित कियार्, उसक रार्जनीतिक प्रभार्व उसकी विदेश नीति से स्पष्ट होतार् है। 1871 से पूर्व उसकी रार्जनीति क मुख्य उद्देश्य यूरोप में ंजर्मन रार्ज्य क एकीकरण प्रशार् के नेतृत्व में करनार् थार् और इस उद्देश्य की पूर्ति उसने दो महार्न युद्धों द्वार्रार् प्रार्प्त की। किन्तु 1871 र्इ. के उपरार्ंत उसक उद्देश्य जर्मन शक्ति को स्थार्यित्व रूप देनार् तथार् यूरोप में शार्न्ति की स्थार्पनार् करनार् थार्। 1871 र्इ. से 1890 र्इ. तक, वह जर्मन सार्म्रार्ज्य के चार्न्सलर के पद पर आसीन थार्, तब उसने यूरोपीय रार्जनीति को बड़ार् प्रभार्वित कियार्।

    1. विदेश नीति के उद्देश्य

    1. यूरोप में शार्ंति की स्थार्पनार् – बिस्माक की हादिक इच्छार् यह थी कि यूरोप में किसी प्रकार से शार्ंति भंग न हो। यह सत्य है कि जर्मन सार्म्रार्ज्य क निर्मार्ण बिस्माक ने सैनिकवार्द के आधार्र पर कियार् तथार् उसने अपने रक्त और लोहे की नीति के अनुसार्र कियार् थार्, किन्तु उसने सैनिकवार्द को अपने उद्देश्य की पूर्ति क केवल सार्धन बनार्यार् न कि सार्ध्य : उसक लक्ष्य फ्रार्ंस और ऑस्ट्रियार् को परार्स्त कर पूर्ण हो चुक थार् और अब वह जर्मनी की स्थिति से पूर्णतयार् संतुष्ट थार्। अब वह जर्मनी क दृढ़ संगठन करनार् चार्हतार् थार् जिसके लिये शार्ंति की स्थार्पनार् अनिवाय थी।
    2. फ्रार्ंस को अकेलार् रखनार् – बिस्माक जार्नतार् थार् कि फ्रार्ंस अपनी परार्जय क बदलार् जर्मनी से अवश्य लेने क प्रयार्स करेगार्, क्योंकि फ्रार्ंस को आल्सेस और लोरेन के प्रदेश विशेष प्रिय थे, जिन पर जर्मनी ने अधिकार कर लियार् थार्। फ्रार्ंस उनको लेने के लिए अवश्य प्रयत्न करेगार्, किन्तु वह अकेलार् जर्मनी से युद्ध नहीं कर सकेगार् और युद्ध उसी समय संभव होगार् जब वह यूरोप के अन्य देशों में से किसी को अपनार् मित्र बनार्ये। अत: बिस्माक की नीति यह रही कि फ्रार्ंस क कोर्इ भी यूरोपीय देश मित्र नहीं बन सके।
    3. यथार्-स्थिति की स्थार्पनार् – बिस्माक क उद्देश्य थार् कि यूरोप में यथार्-स्थिति की स्थार्पनार् की जार्ये। इसक अभिप्रार्य है कि समस्त रार्ज्यों की जो सीमार्यें 1871 र्इ. में थी वे ही निश्चित रहै।। उनमें किसी प्रकार क परिवर्तन नहीं कियार् जार्ये। अन्यथार् की स्थिति में युद्ध की संभार्वनार् हो सकती थी।

    2. विदेश नीति क क्रियार्न्वयन

    उपरोक्त उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिए बिस्माक ने 20 वर्ष तक अकथनीय प्रयत्न कियार्, यद्यपि इनकी प्रार्प्ति के लिये उसको विशेष आपत्तियों तथार् कठिनाइयों क सार्मनार् करनार् पड़ार्, किन्तु अपनी सैनिक शक्ति और कूटनीति के आधार्र पर बिनार् युद्ध किये वह उनकी प्रार्प्ति में सफल हुआ। बिस्माक भली-भार्ंति समझतार् थार् कि यूरोप की शार्ंति अल्सार्स और लोरेन तथार् बार्लकन के प्रश्न पर भंग हो सकती है। इसी कारण उसने अपने शार्सन-काल में ऐसार् प्रयत्न कियार् कि इन दोनों प्रश्नों पर शार्ंति भंग न हो अपने उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिये उसने कार्य किये –

    1. तीन सम्रार्टों क संघ – अपने उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिये सर्वप्रथम बिस्माक ने ‘‘तीन सम्रार्टों के संघ’’ क निर्मार्ण करने क निश्चय कियार्। बिस्माक ने रार्जतंत्र की दुहाइ देकर आस्ट्रियार् और रूस के सम्रार्टों को अपने पक्ष में कियार्, क्योंकि उसको यह भय थार् कि जर्मनी द्वार्रार् परार्जित दोनों रार्ज्य आस्ट्रियार् और फ्रार्ंस सम्मिलित होकर जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् न कर दे। 1870 र्इ. में बर्लिन में आस्ट्रियार् के सम्रार्ट, रूस के जार्र और जमर्न सम्रार्ट के मध्य तीन सम्रार्टों के संघ क निर्मार्ण हुआ। यह एक निश्चित संधि नहीं थी, क्योंकि इसके द्वार्रार् किसी प्रकार क उत्तरदार्यित्व नहीं थार्। यह केवल एक समझौतार् मार्त्र थार्। इसमें निम्न समस्यार्ओं पर विचार्र विमर्श हुआ –
      1. प्रार्देशिक व्यवस्थार् को स्थाइ रखनार्
      2. बार्लकन समस्यार्
      3. क्रार्ंतिकारी समार्जवार्द क दमन इनके संबंध में निश्चित कियार् गयार् कि इनमें से जो विवार्द समय-समय पर उत्पन्न होंगे, उनक समार्धार्न तीनों के पार्रस्परिक सहयोग द्वार्रार् निकालार् जार्वेगार्।
    2. तीन सम्रार्टों के संघ क अन्त – 1876 र्इ. तक तीन सम्रार्टों क संघ स्थार्यी रहार्, किन्तु इसके उपरार्ंत ऐसी परिस्थिति क उदय हुआ जिसके कारण यह समार्प्त हो गयार्। वह इस प्रकार है –
    3. बर्लिन सम्मेलन – इंगलैंड जर्मनी, रूस और आस्ट्रियार् के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भार्ग लियार्। जर्मनी ने आस्ट्रियार् क पक्ष लियार् और रूस के हितों की अवहेलनार् की। जर्मनी के इस व्यवहार्र से रूस को बड़ी ठेस पहंचु ी और रूस क जार्र जर्मनी से असंतुष्ट हो गयार्। अत: जर्मनी से रूस की मित्रतार् समार्प्ति हो गर्इ। अप्रैल 1879 र्इ. में रूस के जार्र ने जर्मन सम्रार्ट विलियम प्रथम को स्पष्ट चते ार्वनी दी कि परु ार्ने मित्र की अवहेलनार् करने क परिणार्म युद्ध भी हो सकतार् है। इस प्रकार रूस और जर्मनी के संबंध खरार्ब हो गये। तीन सम्रार्टों के संघ क अंत हो गयार्।
    4. द्विगुट क निर्मार्ण – उक्त परिस्थिति उत्पन्न होने पर जर्मनी की स्थिति बड़ी संकटमय हो गर्इ, क्योंकि अब उसके यूरोप में दो शत्रु हो गये और उस पर दो ओर के आक्रमण होने की संभार्वनार् हो गर्इ। उसको किसी एक शक्ति से गुटबंधन करनार् अनिवाय हो गयार्। वह इंगलैंड और इटली को इस कार्य के लिये उपयुक्त नहीं समझतार् थार्, क्योंकि उसको यह विश्वार्स नहीं थार् कि उनके सार्थ मैत्री स्थार्यी रूप धार्रण कर सकेगी। अत: उसक ध्यार्न आस्ट्रियार् की ओर आकर्षित हुआ। इस समय आस्ट्रियार् क विदेश मंत्री ऐन्ड्रीस थार् जो बड़ार् ही योग्य और समझदार्र थार्। जब आस्ट्रियार् से जर्मनी ने संधि की वातार् चलार्यी तो एन्े ड्रीस ने परिस्थिति क लार्भ उठार्कर तुरन्त सहमति प्रदार्न कर दी। अत: दोनों देशों में 7 अक्टूबर 1879 र्इ. में एक रक्षार्त्मक संधि सम्पन्न हुर्इ जिसके अनुसार्र निश्चय हुआ कि (1) यदि जर्मनी यार् आस्ट्रियार् में से किसी पर रूस आक्रमण करे तो दोनों एक दूसरे को अपनी सम्पूर्ण सैनिक सहार्यतार् प्रदार्न करेगें और दोनों सम्मिलित रूप से रूस से संधि करेगें। (2) यदि जर्मनी यार् आस्ट्रियार् में से किसी पर कोर्इ अन्य शक्ति उदार्हरणाथ फ्रार्ंस आक्रमण करतार् है तो दूसरार् मित्र तटस्थतार् की नीति अपनार्एगार्, परन्तु यदि इस शत्रु को रूस की सहार्यतार् प्रार्प्त हुर्इ तो दोनों मित्र अपनी पूरी शक्ति से सार्थ मिलकर युद्ध करेगें और सम्मिलित रूप से ही संधि होगी।
    5. तीन सम्रार्टों के संघ की पुन: स्थार्पनार् – यद्यपि बिस्माक ने आस्ट्रियार् के सार्थ संधि कर ली थी, किन्तु वह रूस से भी संधि करनार् चार्हतार् थार्। वह उसको अप्रसन्न नहीं करनार् चार्हतार् थार्। रूस भी फ्रार्ंस की ओर आकर्षित नहीं हुआ। अब बिस्माक ने 1881 र्इ. में रूस से तीन सम्रार्टों के संघ की पुन: स्थार्पनार् करने क प्रस्तार्व कियार् जिसक रूस ने स्वार्गत कियार्। अत: 1881 र्इ. तीन सम्रार्टों के मध्य तीन वर्ष के लिये एक समझार्तै ार् हुआ कि यदि तीनों में से किसी को एक चतुर्थ शक्ति से युद्ध करनार् होगार् तो शेष मित्र तथस्थ रहै।गे और युद्ध को सीमित करने क प्रयार्स करेगेंं इस प्रकार जर्मनी ने आस्ट्रियार् और रूस दोनों को अपनी ओर मिलार् लियार् और अपनी अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्थिति पूर्ववत् दृढ़ स्थार्पित की।
    6. त्रिदलीय गुट की स्थार्पनार् – 1881 र्इ. में फ्रार्ंस और इटली के संबधं कटु हो गये थे। अत: अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने तथार् अपनी गणनार् यूरोप के बड़े रार्ष्ट्रों में करवार्ने के उद्देश्य से इटली जर्मनी की और आकर्षित हुआ। 20 मर्इ 1882 र्इ. को इटली ने जर्मनी और आस्ट्रियार् से संधि की जिसके फलस्वरूप द्विगुट ने त्रिगुट क रूप धार्रण कियार्। इटली ने यह स्वीकार कर लियार् कि वह आस्ट्रियार् के विरूद्ध किसी प्रकार क प्रचार्र नहीं करेगार्। इस संधि में यह निश्चय हुआ – (1) यदि फ्रार्ंस इटली पर आक्रमण करेगार् तो जर्मनी और आस्ट्रियार् इटली की सहार्यतार् करेगेंं (2) इटली ने भी इसी प्रकार क आश्वार्सन दियार्। (3) यदि दोनों देशों पर कोर्इ भी दो देश आक्रमण करेगें तो तीनों मिलकर उसक सार्मनार् करेगेंं संधि की शर्ते पूर्णतयार् गुप्त रखी गर्इं और य सन्धि 5 वर्षों के लिए की गर्इ।
    7. आस्ट्रियार् और रूमार्नियार् की संधि – 1883 र्इ. में आस्ट्रियार् और रूमार्नियार् के मध्य एक संधि हुर्इ जिसमें यह निश्चय हुआ कि रूस के विरूद्ध दोनों देश एक दूसरे की सहार्यतार् करेगेंं बिस्माक ने इस गुप्त संधि को मार्न्यतार् प्रदार्न की और बार्द में इटली ने भी इस संधि को स्वीकार कियार्।
    8. संधियों क महत्व – इस प्रकार इन संधियों के द्वार्रार्- (1) जर्मन प्रतिष्ठार् की स्थार्पनार् हुर्इ और बिस्माक क मार्न बहुत बढ़ गयार्। वह मध्य यूरोप क भार्ग्य-निर्णार्यक बन गयार् और यूरोप की शक्ति उसके हार्थ में रही। (2) फ्रार्ंस यूरोपीय रार्जनीति में पूर्णतयार् अकेलार् बनार् रहार्। (3) शक्ति संतुलन की समार्प्ति – इसके द्वार्रार् यूरोप क शक्ति संतुलन समार्प्त हो गयार्। (4) रूस और फ्रार्ंस क गठबंधन – इन्हीं सन्धियों के फलस्वरूप बार्द में रूस और फ्रार्ंस क गठबंधन हुआ जिसने त्रिगुट क विरोध करनार् आरंभ कियार्। (5) प्रथम विश्वयुद्ध युद्ध – इनके ही कारण प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। ये समस्त संधियार्ँ बिस्माक की कूटनीति क परिणार्म थीं।
    9. रूस के सार्थ पुनरार्श्वार्सन संधि – 1887 र्इ. में बिस्माक क ध्यार्न पनु : रूस की और आकर्षित हुआ, जो जर्मनी की बार्लकन संबधीं नीति तथार् आस्ट्रियार् के प्रति जर्मन नीति के कारण बिस्माक से असंतुष्ट थार्। 1881 र्इ. में बिस्माक के प्रयत्न से पुन: तीन सम्रार्टों की संधि हुर्इ थी। 1884 र्इ. में इस संधि को पुन: मार्न्यतार् प्रदार्न की गर्इ, किन्तु 1884 तथार् 1885 र्इ. में बार्लकन समस्यार् के कारण आस्ट्रियार् और रूस के पार्रस्परिक संबंध खरार्ब होने आरंभ हो गये और जर्मनी में भय उत्पन्न हो गयार् कि कहीं रूस फ्रार्ंस से मैत्री स्थार्पित नहीं कर ले। अत: 18 जुलाइ 1887 र्इ. में दोनों देशों के मध्य पुनरार्श्वार्सन संधि हुर्इ। यह संधि पूर्णतयार् गुप्त रखी गर्इ। इस संधि के द्वार्रार् निम्न बार्तें निश्चित हुर्इ- (1) एक पर अन्य यूरोपीय रार्ष्ट्र द्वार्रार् आक्रमण होने की दशार् में दूसरे ने तटस्थ नीति क पार्लन करने क आश्वार्सन दियार्। (2) जर्मनी ने दोनों बलगार्रियों में रूस के प्रभार्व को स्वीकार कियार् और यह वचन दियार् कि वह रार्जकुमार्र अलेकजेन्डर को रार्ज्यसिंहार्सन पर आसीन नहीं होने देने के लिये प्रयत्न करेगार्। (3) 1881 र्इ. की संधि के अनुसार्र कुस्तुन्तुनियार् के जल-संयोजक क सार्मार्जिक कार्यवार्हियों के लिये रार्के ने की नीति क भविष्य में भी पार्लन कियार् जार्ये।
    10. संधि की समीक्षार् – यह संधि बिस्माक की कूटनीति क उज्जवल उदार्हरण है। इस संधि द्वार्रार् बिस्माक ने रूस को यह आश्वार्सन दियार् कि वह आस्ट्रियार् के आक्रमण के विरूद्ध तटस्थतार् की नीति क पार्लन करेगार् जबकि आस्ट्रियार् और जर्मनी के संबंध में दोनों देशों की संधि में यह निश्चय हुआ थार् कि वह रूस के आक्रमण के विरूद्ध आस्ट्रियार् की सहार्यतार् करेगार्। इस संधि के संबंध में बिस्माक ने व्यक्त कियार् कि उसने इस संधि द्वार्रार् आस्ट्रियार् की सहार्यतार् की, क्योंकि इससे रूस की महत्वकांक्षार्ओं पर नियंत्रण की स्थार्पनार् हुर्इ। जर्मनी से निरार्श होकर रूस को स्वार्भार्विक रूस से फ्रार्ंस की ओर आकर्षित होनार् चार्हिये थार्, किन्तु जर्मनी ने उसको ऐसार् नहीं करने दियार्। उसने अपनी कूटनीतिज्ञतार् के बल पर 1890 र्इ. में रूस और जर्मनी में पुनरार्श्वार्सन संधि की पुनरार्वृत्ति की।

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