बार्बर क इतिहार्स

जहीरूद्दीन मुहम्मद बार्बर पितृकुल में तैमूर से 6ठीं पीढ़ी में उत्पन्न हुआ थार् और उसकी मार्ँ प्रसिद्ध मंगोल चंगेज खार्ँ की चौदहवीं वंशज थी। उसके जीवन पर इन दो महार्न व्यक्तियों के आदेर्शों एवं उद्देश्यों क प्रभार्व पूर्णरूपेण थार्। बार्बर के बार्ल्यकाल के समय मध्य एशियार् की रार्जनीतिक दशार् चित्रित भी थी। 1 बार्बरनार्मार्- पृ. 198-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 30-31, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगलसम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-170.

सभी आपस में एक दूसरे से ईर्ष्यार् करते थे। तैमूरी शार्सक उजबेगों, मंगोलो और ईरार्नियों से घिरे हुए थे। फिर भी वे निरन्तर आपस में लड़ते रहे। इनमें से बार्बर क पितार् उमरशेख मिर्जार् भी महत्वार्कांक्षीं और झगड़ार्लू थार्। अन्य शब्दों में एक ओर तो उमरशेख मिर्जार् और उसके भार्ई, दूसरी ओर मंगोल और अबुल खैर क वंशज शैबार्नी खार्ँ, सभी एक दूसरे के विरुद्ध घार्त लगार्ये बैठे हुये थे। ऐसी विषम परिस्थितियों ने बार्बर को अधिक जार्गरूक, संघर्षशील एवं महत्वार्कांक्षी बनार् दियार्।

बार्बर क संक्षिप्त परिचय

नार्म जहीरूद्दीन मुहम्मद बार्बर
रार्जकाल 1529-30 ई .तक
जन्म स्थार्न फरगनार् में रूसी तुर्किस्तार्न क करीब
80,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र
पितार् उमर शेख मिर्जार्, 1494 ई. में
एक दुर्घटनार् में मृत्यु हो गयी,
नार्नार् यूनस खार्ं
चार्चार् सुल्तार्न मुहम्मद मिर्जार्
भार्ई जहार्ँगीर मिर्जार्, छोटार् भार्ई नार्सिर मिर्जार्
पत्नी चार्चार् सुल्तार्न मुहम्मद मिर्जार्
की पुत्री आयशार् बेगम
मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. (आगरार्)
48 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई।
उत्तरार्धिकारी हुमार्यूं,
युद्ध पार्नीपत’ खार्नवार् और घार्घरार् जैसी विजयों
ने उसे सुरक्षार् और स्थार्यित्व प्रदार्न कियार्।
प्रधार्नमंत्री निजार्मुद्दीन अली खलीफार्

भार्रतवर्ष आगमन के पूर्व बार्बर क काबुल रार्ज्य उत्तर में हिन्दूकुश की पहार्ड़ियों से लेकर पश्चिम में खुरार्सन की सीमार्ओं तक, और पूर्व में आबे-इस्तार्दह के मैदार्नों से लेकर दक्षि१ण में चगन सरार्य तक फैलार् हुआ थार्। काबुल पर अधिकार करने के पूर्व बार्बर कभी भी स्थिर नहीं रह सक थार्, उसे समकन्द, अन्दजार्न, खीजन्द एवं फरगनार् आदि स्थार्नों पर अनेक जार्तियों जैसे हिन्दू तथार् अफगार्नी विद्रोहियों को चुनौती देनी पड़ी थी, सार्थ ही शार्ही परिवार्र के सदस्यों तथार् स्थार्नीय जनतार् के द्वार्रार् किये गये विद्रोहों क भी सार्मनार् करनार् पड़ार् थार्। सन् 1494 ई0 में मुगल रार्जकुमार्र सुल्तार्न महमूद के द्वार्रार् उत्तर की तरफ से और सुल्तार्न अहमद ने पूर्व की तरफ से फरगनार् पर आक्रमण। दुर्भार्ग्यवश उसी समय 1494 ई0 में बार्बर के पितार् उमर शेख मिर्जार् की एक दुर्घटनार् में मृत्यु हो गयी, उस समय उमर शेख मिर्जार् क बड़ार् पुत्र बार्बर जिसने भार्रत में मुगल सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् की थी, बार्रह वर्ष क थार्।

बार्बर क पितार् उमर शेख मिर्जार् फरगनार् के छोटे रार्ज्य क शार्सक थार्, जो आधुनिक समय में रूसी तुर्किस्तार्न क करीब 80,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र क एक छोटार् सूबार् है। इतनी अल्पार्वस्थार् में बार्बर तैमूरियों की गद्दी पर बैठार्, जिसके लिए सम्भवत: भार्ग्यशार्ली परिस्थितियार्ँ ही उत्तरदार्यी थीं क्योंकि फरगनार् क यह अल्पवयस्क शार्सक चार्रों तरफ से प्रबल शत्रुओं से घिरार् हुआ थार्। ये शत्रु उसके प्रिय बन्धु ही थे जो प्रबल महत्वार्कांक्षार्ओं से सशक्त थे और परिस्थितियों क लार्भ उठार्नार् चार्हते थे।1 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 198-227, डॉ0 रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट ‘बार्बर’, पृ.सं. 165-170, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, ‘‘मुगल कालीन भार्रत ‘बार्बर’ ‘‘, पृ.सं. 30-31. 2 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 198-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 30-31, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगलसम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-170. 3 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 198-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 30-31, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगलसम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-170. 4 ‘तुजुके बार्बरी’, 1, पृ.सं. 227, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 8-9, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगलसम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 170.

इसके सार्थ ही उजबेग सरदार्र शैबार्नी खार्ँ से अपने अस्तित्व की रक्षार् के लिए लड़नार् पड़ार्। बार्बर में तैमूर एव चंगेज के वंशजों क रक्त प्रवार्हित थार् जो अत्यधिक महत्वार्कांक्षी और सम्पूर्ण विश्व के केन्द्रीयकरण में विश्वार्स करते थे। अत: सम्पूर्ण समस्यार्ओं से जूझते हुए भी बार्बर ने एक बार्र पुन: अपनी इस इच्छार् को पूर्ण करनार् चार्हतार् थार्। अवस्थार् में बहुत छोटें होते हुए भी बार्बर ने अमीर तैमूर की रार्जधार्नी ‘समरकन्द’ को जीतने तथार् तैमूर की गद्दी पर बैठने क निश्चय कर लियार्।

बार्बर को अनेक समस्यार्ओं क सार्मनार् करने के सार्थ ही अपने परिवार्र तथार् भार्ई बन्धुओं के विद्रोह क भी सार्मनार् करनार् पड़ार्, क्योंकि तत्कालीन विघटित परिस्थितियों क लार्भ उठार्कर सभी अपनी महत्वार्कांक्षार्ओं की पूर्ति करने हेतु तत्पर रहते थे। इस प्रकार समरकन्द की गद्दी मध्य एशियार् के सभी शार्सकों, मंगोल सुल्तार्नों की महत्वार्कांक्षार्ओं और रूचियों की केन्द्र बिन्दु बनी हुयी थी। इनक एक कारण यह थी कि उस समय में समकरन्द रार्जनीतिक, व्यार्पार्रिक, आर्थिक एवं सार्ंस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व रखतार् थार्। समरकन्द मध्यएशियार् क हृदय थार्। इसकी जलवार्यु, उपजार्ऊपन, सुन्दरतार्, यश सम्पन्नतार् और

ऐतिहार्सिक महत्व सभी तैमूरियों को आकर्षित करते थे। बार्बर जो एक महत्वार्कांक्षी, संस्कारयुक्त, वार्दार्पूर्ण करने वार्लार् नवयुवक थार्, वह समरकन्द की गद्दी के लिये प्रयार्सरत लोगों क अधिक विरोध नहीं कर सका। परिणार्म यह हुआ कि समरकन्द सम्पूर्ण मध्य एशियार् विवार्दों क केन्द्र बन गयार् जो अन्ततोगत्वार् तैमूरियों के विघटन के लिए उत्तरदार्यी हुआ।1 तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, पृ.सं. 227, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगलसम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 170. 2 तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, पृ.सं. 227-228, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 8-9. 3 रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 25-30, तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, पृ.सं. 227-28, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगल सम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-170, स्टेनली लेनपूल, बार्बर, पृ. सं. 60.

बार्बर ने अपनी महत्वार्कांक्षार्ओं के पूर्ति के लिए असुरक्षित फरगनार् की दशार्, सार्मन्तों तथार् अमीरों के अकृतज्ञ स्वभार्व के मध्य सर्वप्रथम सन् 1496 ई0 में समरकन्द पर चढ़ार्ई की। उसके चार्चार् हिसार्र के सुल्तार्न मुहम्मद मिर्जार् की मृत्यु एक वर्ष हुई थी, जिसे समरकन्द और बुखार्रार् के सार्मन्तों ने वहार्ँ शार्सन करने हेतु आमन्त्रित कियार् थार्। सुल्तार्न महसूद क पुत्र बार्यसुंगर मिर्जार् गद्दी पर बैठार् लेकिन नगर के सार्मन्तों के असहयोग के कारण वह शीघ्र ही असफल हुआ। तत्कालीन कुछ अमीरों ने हिसार्र पर शार्सन करने हेतु मंगोल रार्जकुमार्र सुल्तार्न महमूद को आमन्त्रित कियार् लेकिन वह अन्तत: बार्यसुंगर मिर्जार् द्वार्रार् परार्जित हुआ। अपनी योजनार् में असफल होने के पश्चार्त् अमीरों ने पुन: सुल्तार्न अली को गद्दी पर बैठने हेतु आमन्त्रित कियार्, जो बार्यसुंगर क छोटार् भार्ई थार्। दो भार्ईयों के मध्य छिड़ार् यह संघर्ष बार्बर के लिये एक चुनौती थार्, उसने उत्कृष्ट परीक्षण से समरकन्द के लिये अभियार्न जार्री कियार् और सन् 1496 ई0 तक कब्जार् कर लियार्। परन्तु वह (बार्बर) वहार्ँ पर किसी प्रकार क प्रभार्व जमार्ने में असफल रहार्, कारण कि मौसम उसके अनुकूल नहीं थार्। ऐसी परिस्थितियों में प्रतीत होतार् है कि बार्बर की शक्ति अपने अन्य सम्बन्धियों की अपेक्षार् सुदृढ़ थी, तथार् अमीर भी उसके पक्ष की ही तरफदार्री करते थे, जिससे वह फरगनार् के प्रथम अभियार्न में सफल हुआ थार्।1 तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, (अंग्रेजी अनुवार्दक ए.एस. बेवरीज) भार्ग 1, पृ.सं. 127-28, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगल कालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 30-32, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगल सम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-170. 2 रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 25-30, तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, पृ.सं. 227-28, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगल सम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-170, स्टेनली लेनपूल, बार्बर, पृ. सं. 60. 3 तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, अंग्रेजी अनुवार्दक (ए.एस. बेवरीज), पृ.सं. 129-29, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 9-10, स्टेनली लेनपूल बार्बर’ पृ.सं. 60-61. 4 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 198-206, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, ‘‘मुगल कालीन भार्रत ‘बार्बर’ ‘‘, पृ. सं. 30-31. 5 स्टेनले लेनपूल, ‘बार्बर’ पृ.सं. 60-61, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगल सम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 165-175.

मई सन् 1497 ई0 में बार्बर और सुल्तार्न अली ने संयुक्त रूप से समरकन्द क घेरार् डार्लार्। यह घेरार् इतने अधिक परिश्रम से डार्लार् गयार् थार् कि बार्यसुंगर ने शार्ह बेग खार्न को अपनी सहार्यतार् हेतु बुलार्यार्। इस युद्ध ने उजबेगों की शक्ति को एक बार्र पुन: संगठित कियार्, यहार्ँ तक कि शैबार्नी खार्न को भी अपनी सहार्यतार् हेतु बुलार्यार्, परन्तु शैलार्नी खार्न भी बार्बर के सैनिकों के विरोध के आगे स्थिर नहीं रह सका, बार्यसुंगर क भी अपने सहयोगियों पर से विश्वार्स उठ गयार् और उसने बार्बर को शार्न्तिपूर्ण ढंग से बार्त करने हेतु आमन्त्रित कियार्। इन कार्यवार्हियों से क्षुब्ध होकर शैबार्नी खार्न ने पुन: अपने क्षेत्र में ही रहनार् उचित समझार्। बार्यसुंगर ने भी अपने क्षेत्र में ही शार्न्तिपूर्वक रहनार् उचित समझार्। नगर की जनतार् और अमीरों ने इस संकटपूर्ण स्थिति मे बार्बर को आमन्त्रित कियार्। इस प्रकार बार्बर ने यह महसूस कियार् कि, अस्थार्यी ही सही लेकिन उसकी महत्वार्कांक्षार्ओं की 1497 ई0 तक, समरकन्द में आंशिक रूप से पूर्ति हुयी, जिसकी वह कामनार् करतार् थार्।

बार्बर ने तिरमिज नार्मक स्थार्न पर यह निश्चय कियार् कि मध्य एशियार् में अपने को स्थिर करनार् अनुपयोगी और अनुचित थार् और जब वह अपने भार्ग्य, दुर्भार्ग्य क फैसलार् करनार् ही चार्हतार् थार् तो उसे इस कार्य हेतु अफगार्निस्तार्न में प्रयार्स करनार् चार्हिये, जहार्ँ की सरकार अस्थिर और अयोग्य तथार् कबीली हो चुकी थी। काबुल की तत्कालीन परिस्थितियार्ं बार्बर के पक्ष में थी एवं वह केन्द्रीकरण में अधिक विश्वार्स करतार् थार्। उलुग बेग मिर्जार् की मृत्यु 1501 ई0 में ही हो चुकी थी। उसक अवव्यस्क पुत्र अब्दुर्रज्जार्क उकसार् उत्तरार्धिकारी नियुक्त हुआ। 1 तुजुके बार्बरी, भार्ग 1, पृ.सं. 100-198, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 11-12. 2 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 100-150, स्टेनली लेनपूल, ‘बार्बर’, पृ.सं. 61, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 11-15. 

मुहम्मद मुकीम जो हज़ार्रार् से आयार् थार्, ने काबुल की शक्ति और सत्तार् पर कब्जार् कर लियार् थार्। उसने उलुग बेक मिर्जार् की पुत्री से शार्दी भी कर ली और अपनी पूर्व की सार्मन्तीय स्थिति को पुन: प्रार्प्त करनार् चार्हतार् थार्। इन कारणों से काबुल क रार्ज्य पूर्णत: अस्थिर तथार् दुर्बल हो चुक थार्। बार्बर ने इस विघटित परिस्थिति क पूरी तरह से लार्भ उठार्ने की कोशिश की।

मुहम्मद मुकीम को परार्जित करके बार्बर काबुल की ओर बढ़ार्, जो उजबेगों के घोर उपद्रव के कारण उस क्षेत्र में एकमार्त्र अमीर तैमूरियों क हिस्सार् रह गयार् थार्। बार्बर ने काबुल पर जब अधिकार कियार् तो कुछ अमीर तथार् अनेक जार्तियों एवं कबीलों के लोग उससे मिल गये, जिनक मुख्य उद्देश्य बार्बर के संरक्षण में अपनी रक्षार् क उपार्य ढूंढनार् थार्। बार्बर ने भी काबुल क प्रशार्सन ठीक करने हेतु अमीरों एवं अपने परिवार्र जनों में उस रार्ज्य क विभार्जन कियार् थार्।

बार्बर ने गजनी व उसके अधीनस्थ प्रदेश, जहार्ँगीर मिर्जार् को दियार्, नार्सिर मिर्जार् को मिन्गनहार्र, मन्द्रार्वार्र, नूरघार्टी, कुनार्र नूरगल और चिगनसरार्य दियार्। अमीरों को उसने गार्ंव जार्गीर में दिये। काबुल तथार् उसके अधीन प्रदेशों को अपने हार्थों में रखार्। ऐसार् प्रतीत होतार् है कि काबुल रार्ज्य को प्रशार्सनिक सुविधार् के लिये बार्ँटते हुए तथार् जार्गीरें प्रदार्न करते हुए और काबुल के सीमित सार्धनों को देखते हुए बार्बर ने किसी सिद्धार्न्त क पार्लन नहीं कियार् थार्। न तो उसने सभी को बरार्बर-बरार्बर बार्ंटने वार्ले सिद्धार्न्त को अपनार्यार् और न ही उसने अमीरों की कार्यकुशलतार्, उनकी सेवार्ओं तथार् एक लम्बी अवधि से उसकी सेवार् में होने क ही ध्यार्न रखार्। वैसे दोनों में से किसी एक सिद्वार्न्त को अपनार्यार् इस समय कठिन थार्। यदि वह पहले सिद्धार्न्त को अपनार्यार् तो केन्द्र शार्सन कमजोर हो जार्तार् और विभिन्न भार्गों में इसके अमीर अपनी स्वतंत्रतार् घोषित करने के पीछे नहीं डटते। दूसरे सिद्धार्न्त को इसलिये नहीं अपनार्यार् जार् सकतार् थार् क्योंकि ऐसे अमीरों की संख्यार्, जिन्होंने बार्बर की सेवार् बहुत दिनों से की, बहुत अधिक थी तथार् उनमें से सभी अमीरों की सेवार् पर विश्वार्स भी नहीं कियार् जार् सकतार् थार्। तीसरे- काबुल के सार्धन सीमित थे और ऐसी स्थिति में प्रत्येक अमीर, चार्हे वह मुगल हो यार् तुर्क अथवार् ईरार्नी यार् तुरार्नी, को संतुष्ट रखनार् दुष्कर कार्य थार्। इस अवसर पर बार्बर से एक भूल अवश्य हुई कि उसने अपने पुरार्ने सेवकों को तथार् अन्दीजन के अमीरों को समृद्धिशार्ली एवं उपजार्ऊ प्रदेश दिये और उनसे निम्न श्रेणी के बेगों को कम आय वार्ले यार् बन्जर प्रदेश तथार् छोटे-छोटे गार्ंव जार्गीर में दिये। इस प्रकार अमीर वर्ग के सार्थ पक्षपार्त करके दूसरे वर्ग को उसने आलोचनार् करने क अवसर दियार्, दूसरे जार्गीरों को बार्ंटते समय उनके तनिक भी सतर्कतार् से काम नहीं लियार्।  1 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 190-198, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 13. 2 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 100-199, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 30-32, डॉ0 त्रिपार्ठी आर.पी. ‘मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न एवं पतन’, पृ.सं. 13-14. 3 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 226, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 32-33.

बार्बर काबुल में आने के बार्द भी स्थिर नहीं रह सका, क्योंकि उसको उस समय हजार्रों अफगार्नों तथार् अपने निकट के व्यक्तियों, सलार्हकारों जैसे बार्की चगिनियार्नी के विश्वार्सघार्ती क्रियार्कलार्पों क सार्मनार् करनार् पड़ार्। उसको इस अभियार्न से यह लार्भ हुआ कि उसने मध्य एशियार् से आयी कबार्यली जार्तियों को अपने सार्थ अभियार्न में शार्मिल रखार् जिससे वे विद्रोही नहीं हुए और उसे यह भी पतार् चलार् कि अफगार्न जार्तियों में एकतार् क अभार्व है। मध्य एशियार् के तैमुरियार् के सभी सदस्य सम्भवत: अत्यधिक महत्वकांक्षी और अवसरवार्दी प्रवृत्ति के थे, अवसर पार्ते ही वे अपनी महत्वार्कांक्षार्ओं को पूर्ण करने में जुट जार्ते थे तथार् उस समय वे अन्य किसी भी बार्धार् क सार्मनार् करने हेतु तत्पर रहने थे जैसार् कि तत्कालीन नार्सिर मिर्जार् और जहार्ँगीर मिर्जार् के विद्रोहों से ज्ञार्त होतार् है। बार्बर को काबुल में न केवल अनेक जार्तियों जैसे अफगार्न, हजार्रार्, बिलोची आदि के विद्रोहों क ही सार्मनार् करनार् पड़ार्, वरन् अनेक बार्र शार्ही परिवार्र एवं सार्मन्तों के व्रिदोहों क भी मुकाबलार् करनार् पड़ार् थार्। बार्बर ने उस शार्ही परिवार्रजनों के विद्रोहों क दमन करने के लिये मित्रतार्, कूटनीति तथार् दमनकारी नीति क सहार्रार् लियार् थार्। बार्बर क छोटार् भार्ई नार्सिर मिर्जार् सम्भवत: बार्बर द्वार्रार् दी गई जार्गीर के रूप में मन्द्रार्वार्र, नूरघार्टी कुनार्र, नूरगल व नीनगनहार्र के क्षेत्र से सन्तुष्ट नहीं थार्, उसकी उस असंतुष्टि ने विद्रोह क रूप धार्रण कर लियार् अत: उसने सन् 1505 ई0 में बार्बर के विरूद्ध विद्रोह कर दियार् और कूटनीति से खुसरो सार्ह से भी समझौतार् कर लियार्, लेकिन जब बदख्शार्ं के लोगों को जो नार्सिर मिर्जार् के समर्थक थे, इस समझौते के विषय में पतार् चलार् तो उन्होंने खुसरो सार्ह से भी समझौतार् कर लियार्, लेकिन जब बदख्शार्ं के लोगों को जो नार्सिर मिर्जार् के समर्थक थे, इस समझौते के विषय में पतार् चलार् तो उन्होंने खुसरो शार्ह क स्वार्गत करने से इन्कार कर दियार्।1 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 100-225, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 32-33. 2 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 100, 227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 41-42, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगल सम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 174-75.

नार्सिर मिर्जार् ने एक चार्ल चली, उसने इश्कमिश में डेरार् डार्लार् तथार् अपनी सेनार् को तैयार्र कियार्। खुसरोशार्ह घबरार्कर अपने कुछ सैनिकों के सार्थ कुन्दुज के दुर्ग को जीतने हेतु चल पड़ार्। खुसरोशार्ह के आने की सूचनार् पार्कर हिसार्र के दुर्ग के सैनार्पति ने हम्ज सुल्तार्न के सार्थ खुसरोशार्ह पर आक्रमण करके उसे बन्दी बनार् लियार् और शीघ्र ही मौत के घार्ट उतार्र दियार्। नार्सिर मिर्जार् ने बदख्शार्ं से उजबेगों को हरार्कर भगार् दियार्। इस प्रकार ऐसार् प्रतीत होतार् है कि अब तक उजबेगों की स्थिति दुर्बल हो गई थी।

इस संघर्ष में यद्यपि नार्सिर मिर्जार् को पूर्ण सफलतार् प्रार्प्त हुई लेकिन फिर भी वह बदख्शार्ं में अपनार् प्रभुत्व नहीं स्थार्पित कर सक थार्, बदख्शार्ं के कुछ अमीरों ने जो बार्बर की आज्ञार् के पार्लक थे, नार्सिर मिर्जार् के विरूद्ध विद्रोह कर दियार्। इसक प्रभार्व यह पड़ार् कि नार्सिर मिर्जार् बदख्शार्ं से बार्बर के अमीरों से भयभीत होकर पलार्यन करके काबुल चलार् गयार्। इस विद्रोह में नार्सिर मिर्जार् को पूर्ण सफलतार् मिलने के उपरार्न्त भी वह इस क्षेत्र में स्थिर नहीं रह सका, इसक एक कारण वहार्ं के अमीरों की बार्बर के प्रतिपूर्ण निष्ठार् थी, जिसक परिणार्म यह हुआ कि इन अमीरों ने नार्सिर मिर्जार् को वहार्ं रुकने नहीं दियार्।1 बार्बरनार्मार्, 1, पृ. 100-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स, मुगलकालीन भार्रत ‘बार्बर’ पृ.सं. 43-44, डॉ0 रार्धेश्यार्म- मुगल सम्रार्ट बार्बर, पृ.सं. 170-175. 2 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 228, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 43-44, डॉ0 रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट, बार्बर, पृ.सं. 170-175. 

इस समय तक एक बार्र पुन: बार्बर को, बार्की चगिनियार्नी जो उसक एक परार्मर्शदार्तार् थार्, के विश्वार्सघार्ती कार्यों क सार्मनार् करनार् पड़ार्। बार्बर 1505 ई0 के अन्त तक उससे तंग आ चुक थार् अत: जब उसने पुन: त्यार्ग पत्र दियार् तो बार्बर ने उसे स्वीकार कर लियार् तथार् उसे परिवार्र सहित हिन्दुस्तार्न जार्ने की अनुमति दे दी। लेकिन माग में वह यार्र हुसैन द्वार्रार् मार्रार् गयार् बार्बर ने तुर्कमार्न हजार्रार् व अफगार्नों को भी 1506 ई0 के प्रार्रम्भ में शार्न्त करनार् चार्हार् जो काबुल से पंजार्ब तक के स्थार्नों पर लूटमार्र कर रहे थे। इस अभियार्न में उसे सफलतार् मिली। इस समय वह थोड़ार् अस्वस्थ भी हो गयार् थार्। अत: उपर्युक्त परिस्थितियों क अवलोकन करने से यह स्पष्ट होतार् है कि बार्बर इस समय अनेक कठिनार्इयों में व्यस्त होने के सार्थ ही अस्वस्थ भी थार्, जिसक पूर्ण फार्यदार् उसके भार्ईयों एवं सगे सम्बन्धियों ने उठार्यार् तथार् बार्बर के विरूद्ध उठ खड़े हुये।

अप्रैल 1506 में जब बार्बर काबुल में थार्, उसी समय जहार्ँगीर मिर्जार् (बार्बर क भार्ई) ने अयूब के पुत्र यूसूफ तथार् बहलोल से मिलकर बार्बर के विरूद्ध षडयंत्र करनार् प्रार्रम्भ कर दियार्। जहार्ँगीर मिर्जार् के विद्रोह करने के कारणों क उल्लेख अस्पष्ट है। सम्भवत: जहार्ँगीर मिर्जार् को जो गजनी प्रदेश जार्गीर के रूप में दियार् गयार् थार्, उससे वह सन्तुष्ट नहीं थार्, और इसी कारण उसने विद्रोह कियार् थार्। अपने सहमित्रों के सार्थ वह काबुल से भार्ग गयार्। नार्नी के दुर्ग पर जहार्ँगीर मिर्जार् ने आक्रमण कियार्, उसे अधिकृत करके उसने आसपार्स के प्रदेशों को लूटनार् प्रार्रम्भ कियार्। अब तक जहार्ँगीर पूर्णत: व्यभिचार्री, शरार्बी और अपव्ययी व्यक्ति हो चुक थार्, अपने अशिष्ट व्यवहार्र की तनिक भी चिन्तार् नहीं करते हुये उसने हजार्रार् अफगार्नों के देश को पार्र कियार् और बमियार्न की ओर मुगल कबीलों से मिलने चल दियार्। वह चार्हतार् थार् कि मुगल उसकी सहार्यतार् करें। जहार्ँगीर मिर्जार् की कार्यवार्हियों को देखकर बार्बर चिन्तित हुआ क्योंकि बार्बर यह भली भार्ंति जार्नतार् थार् कि मुगल उसक सार्थ देकर केवल अपने ही स्वाथ को सिद्ध करने की चेष्टार् करेंगे। अभी वह जहार्ँगीर मिर्जार् के विद्रोह को दबार्ने की बार्त सोच ही रहार् थार् कि मध्य एशियार्ई रार्जनीति तथार् खुरार्सार्न के रार्ज्य में होने वार्ली कुछ घटनार्ओं ने, जिसकी प्रतीक्षार् वह बहुत दिनों से कर रहार् थार्, बार्बर क ध्यार्न आकृष्ट कियार्। इस समय शैबार्नी खार्ँ ने एक बार्र पुन: तैमूरियों को छिन्न-भिन्न करने क निश्चय कियार्। वार्स्तव में तैमूरियों व उजबेगों के मध्य शक्ति के लिये यह अन्तिम संघर्ष थार्। खुरार्सार्न के सुल्तार्न हुसैन मिर्जार् बैकरार् ने बार्बर को इस अभियार्न में शार्मिल करने हेतु आमन्त्रित कियार् क्योंकि वह भी खुरार्सार्न की रक्षार् उजबेगों से करनार् चार्हतार् थार्। बार्बर तो पहले तो उजबेग (मुगलों की उपजार्ति) के नेतार् शैबार्नी खार्ँ से घृणार् करतार् थार्, दूसरे वह खुरार्सार्न जार्ते समय जहार्ँगीर मिर्जार् के विद्रोह को शार्न्त करनार् चार्हतार् थार् यार् उसे किसी भी प्रकार से अपने पक्ष में करके षडयंत्र करने से रोकनार् चार्हतार् थार्, अत: उसने खुरार्सार्न की ओर प्रस्थार्न कियार्।1 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 228, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 43-44. 2 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 250, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 49. 3 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 250, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 49. 4 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 250, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 49. 5 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 254-55, डॉ0 रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट, बार्बर, पृ.सं. 175-176.

बार्बर के आगे बढ़ने की सूचनार् पार्कर जहार्ँगीर मिर्जार् बार्मियार्न से भार्गकर निकटवर्ती पहार्ड़ियों में चलार् गयार्। बार्बर को जहार्ँगीर के प्रति शंक थी कि कहीं वह पीछे से ही आक्रमण न कर दें, अत: उसने कुछ अस्त्र-शस्त्र उश्तुर शहर में छोड़ दिये। उसके जौहक, सैगर तथार् दन्दार्र-ए-शिंकन दर्रार् पार्र करके कहमर्द में रूकने के कारण अमैक जार्ति घबरार् गई और उसने जहार्ँगीर मिर्जार् की सहार्यतार् नहीं की। इसी समय बार्बर को पतार् चलार् कि उजबेग बदख्शार्ं की ओर बढ़ रहे है। अत: शार्हदार्न से मुबार्रक शार्ह तथार् नार्सिर मिर्जार् बढ़े और उन्होंने उजबेगों के एक दल को हरार् दियार्। ऐसार् प्रतीत होतार् है कि उस समय तब उजबेगों की स्थिति दुर्बल हो गयी थी। लेकिन इसी समय मिर्जार् हुसैन बैंकरार् की मृत्यु क समार्चार्र बार्बर को मिलार् जो हिरार्त से शैबार्नी खार्न क दमन करने आ रहार् थार्। फिर भी उसने खुरार्सार्न क अभियार्न जार्री रखार्, इसके कई कारण थे। यदि वह काबुल लौट जार्तार् तो, जहार्ँगीर मिर्जार् के विद्रोह क दमन नहीं कर पार्तार् और ऐसी स्थिति में जहार्ँगीर मिर्जार्, नार्सिर मिर्जार् तथार् अन्य लोगों के सार्थ मिलकर काबुल में गड़बड़ियार्ँ उत्पन्न करतार्, सम्भव यह भी होतार् कि वह काबुल की सत्तार् भी हथियार्ने क प्रयार्स करतार् और उस प्रयार्स में वह काबुल की जनतार् एवं अमीरों को अपने पक्ष में करने क पूरार्-पूरार् प्रयार्स करतार्, क्योंकि तैमूरियों की एक प्रमुख विशेषतार् थी उसकी अटूट महत्वार्कांक्षार्, जिसे वे पूर्ण करने की चेष्टार् कियार् करते थे।1 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 199-206, डॉ0 रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट, बार्बर, पृ.सं. 175-76. 2 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 250-51, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ. सं. 49-50.

अतएव बार्बर अजर घार्टी से होतार् हुआ तूप व मन्दगार्ज की ओर बढ़कर बल्ख नदी को पार्रकर सार्फ नार्मक स्थार्न पर पहुंचार्। इस समय तक भी उजबेग, खार्न और चार्रयक नार्मक स्थार्न पर लूट-पार्ट मचार्ये हुये थे, और खुरार्सार्न को जार्ने वार्ले माग रोक रखे थे। बार्बर ने कासिम बेग के अधीन एक सेनार् भेजी जिसने उजबेगों को परार्जित कियार् और अनेक लोगों को मार्रकर वह मुख्य सेनार् से आकर मिल गयार्। इसी स्थार्न पर अनेक ऐमक जार्तियार्ं उसकी सेवार् में आयीं तथार् जहार्ँगीर मिर्जार् भी उसकी सेवार् में उपस्थित हुआ। इस प्रकार बार्बर को दो प्रकार से लार्भ हुआ- एक तो उसक विद्रोही भार्ई उसके अधीन हो गयार् दूसरे उपबेगों की भी क्षणिक परार्जय हो गयी। तत्कालीन सम्पूर्ण परिस्थितियों को दृष्टिगोचर करने पर यह स्पष्ट होतार् है कि बार्बर की संगठित शक्ति को देखकर जहार्ँगीर मिर्जार् ने स्वयं विद्रोह के विचार्र को त्यार्ग दियार् होगार्, क्योंकि 1506 ई0 में ही बार्बर ने खुरार्सार्न की ओर प्रस्थार्न कियार्। अत: ऐसार् भी हो सकतार् थार् कि जहार्ँगीर मिर्जार् काबुल की गद्दी पर आरूढ़ हो जार्तार्, लेकिन उसने ऐसार् नहीं कियार्।1 खुरार्सार्न जार्ते समय बार्बर काबुल में मोहम्मद हुसैन दोगलार्त् और खार्न मिर्जार् को छोड़ गयार् थार्। लेकिन मोहम्मद हुसैन दोगलार्त् ने काबुल के सभी मुगलों को अपनी तरफ मिलार्कर खार्न मिर्जार् को सुल्तार्न घोषित कर दियार्। उसने यह खबर फैलार् दी कि सुल्तार्न हुसैन मिर्जार् के पुत्र बार्बर के सार्थ विश्वार्सघार्त करने वार्ले हैं। उन्होंने खुरार्सार्न में बार्बर के कैद किये जार्ने की भी खबर फैलार् दी। इस षडयंत्र में बार्बर की सौतेली नार्नी शार्हबेग, जो कि यूनुस खार्न की दूसरी पत्नी थी, क हार्थ थार्। खार्न मिर्जार् उसक सगार् नार्ती थार् और बार्बर सौतेलार्। इस प्रकार काबुल की अस्त-व्यस्त परिस्थितियार्ँ और अनेक अफवार्हों के उड़ने से बार्बर शीघ्र ही खुरार्सार्न से काबुल पहुंचार्। विद्रोहियों ने थोड़े से प्रयार्सों के पश्चार्त् शीघ्र ही आत्मसमर्पण कर दियार्। इस षडयंत्र के अपरार्धियों के प्रति बार्बर क व्यवहार्र बहुत ही अच्छार् रहार्। शार्हबेगम, खार्न मिर्जार् और मोहम्मद हुसैन मिर्जार् से भी बार्बर ने प्रसन्नतार्पूर्ण भेंट की और मोहम्मद हुसैन मिर्जार् को खुरार्सार्न जार्ने की अनुमति दे दी।1 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 296, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 49.

बार्बर क यह व्यवहार्र उसकी स्वार्भार्विक उदार्रतार् के सार्थ-सार्थ कुशल रार्जनीतिज्ञतार् क भी परिचार्यक है। ऐसे समय में जबकि काबुल में बार्बर की स्थिति बहुत ज्यार्दार् दृढ़ नहीं थी और मध्यएशियार् में शैबार्नी खार्न जैसार् प्रबल उजबेग शत्रु शक्तिशार्ली थार्, खार्न मिर्जार्, शार्हबेगम यार् मोहम्मद हुसैन मिर्जार् जैसे अपने निकट सम्बन्धियों को दण्ड देकर मंगोलों से शत्रुतार् मोल लेनार् दूरदर्शितार् नहीं थी।

इस प्रकार बार्बर को प्रार्रम्भ से ही अपनी महत्वार्कांक्षार्ओं की पूर्ति करने हेतु एवं एक बार्र पुन: तैमूरियार् वंश की शक्ति को मध्यएशियार् में स्थार्पित करने के  लिये अनेक कठिनार्ईयों के सार्थ-सार्थ विद्रोहों क भी सार्मनार् करनार् पड़ार् थार्, जिसमें शार्ही परिवार्र के सदस्यगणों ने भी उसके विरूद्ध अभियार्न जार्री रखे। ये लोग सदैव ही ऐसे अवसर की तार्क में रहते थे, कि कब सार्म्रार्ज्य की स्थिति दुर्बल हो, शार्सक की स्थिति कमजोर हो और वे उसक लार्भ उठार्कर अपनी इच्छार् की पूर्ति करें, लेकिन अधिकांश समय में इन शार्ही परिवार्र के सदस्यों को सफलतार् नहीं मिली, इसके पीछे सम्भवत: बार्बर की दृढ़ इच्छार् शक्ति, महत्वार्कांक्षार् और उसके क्रियार् कलार्प थे।1 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 296, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बार्स मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ.सं. 49. 2 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 290-97, वन्दनार् परार्शर, बार्बर-भार्रतीय संदर्भ में, पृ.सं. 8. 3 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 290-97, वन्दनार् परार्शर, बार्बर-भार्रतीय संदर्भ में, पृ.सं. 8. 4 बार्बरनार्मार्, भार्ग-1, पृ.सं. 196-200, वन्दनार् परार्शर, बार्बर-भार्रतीय संदर्भ में, पृ.सं. 8.

बार्बर के आक्रमण के समय भार्रत की स्थिति

सोलहवीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में अर्थार्त् बार्बर के आक्रमण के समय भार्रतवर्ष की रार्जनीतिक अवस्थार् बहुत ही सोचनीय एवं दयनीय थी। कोई भी ऐसार् शक्तिशार्ली केन्द्रीय रार्ज्य नहीं थार् जो समस्त भार्रत पर अपनी प्रभुसत्तार् स्थार्पित कर सके। दिल्ली के शार्सक सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी के शार्सन क प्रभार्व क्षेत्र केवल दिल्ली तथार् उसके आस-पार्स के प्रदेशों तक ही सीमित थार्। देश कई छोटे-छोटे रार्ज्यों में विभार्जित हो चुक थार्; जो प्रार्य: आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे। इन रार्ज्यों के शार्सक परस्पर ईष्र्यार्, रार्ग, द्वेष रखते थे। उनमें रार्ष्ट्रीय एकतार् क सर्वथार् अभार्व थार्। कई शार्सकों के बीच आपसी शत्रुतार् इतनी तीव्र थी कि वे अपने शत्रु क सर्वनार्श करने के लिए विदेशी आक्रमणकारी को आमंत्रित करने में भी नही हिचकिचार्ते थे। इससे भी बढ़कर दुर्भार्ग्य की बार्त यह थी कि दिल्ली के सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी ने उत्तरी-पश्चिमी सीमार् प्रार्न्त की सुरक्षार् की ओर कोई ध्यार्न नहीं दियार् थार्। डॉ. ईश्वरी प्रसार्द महोदय ने भार्रतवर्ष की तत्कालीन दयनीय अवस्थार् क उल्लेख करते हुए कहार् है कि सोलहवीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में भार्रत कई रार्ज्यों क संग्रह बन गयार् थार्। कोई भी विजेतार् जिसमें इच्छार्शक्ति और दृढ़ निश्चय हो, आसार्नी से यह उसके आक्रमण क शिकार हो सकतार् थार् और सफलतार् अर्जित कर सकतार् थार्। 1 डॉ. ईश्वरी प्रसार्द : ए शाट हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डियार्, पृ. 213.

बार्बर के आक्रमण के समय हिन्दुस्तार्न क अधिकांश भार्ग दिल्ली सार्म्रार्ज्य के अधिकार में थार्, परंतु देश में अन्य कई स्वतंत्र और शक्तिशार्ली रार्जार् भी थे। बार्बर ने स्वयं लिखार् है कि उसके आक्रमण के समय भार्रत में पार्ँच प्रमुख मुस्लिम रार्ज्य (दिल्ली, बंगार्ल, मार्लवार्, गुजरार्त तथार् दक्षिण क बहमनी रार्ज्य) तथार् दो काफिर (हिन्दू) शार्सकों (चित्तौड़ तथार् विजयनगर) क रार्ज्य थार्। 1 वैसे तो पहार्ड़ी और जंगली प्रदेशों में अनेक छोटे-छोटे रार्जार् और रईस थे, परन्तु बड़े और प्रधार्न रार्ज्य ये ही थे।

उत्तरी भार्रत के रार्ज्य – 

उत्तरी भार्रत में उस समय दिल्ली, पंजार्ब, सिंध, कश्मीर, मार्लवार्, गुजरार्त, बंगार्ल, बिहार्र, उड़ीसार्, मेवार्ड़ (रार्जस्थार्न) आदि प्रमुख रार्ज्य थे। इन रार्ज्यों की रार्जनीतिक अवस्थार् इस प्रकार थी-

दिल्ली – बार्बर के आक्रमण के समय दिल्ली पर लोदी वंश के शार्सक इब्रार्हीम लोदी क आधिपत्य थार्। वह एक अयोग्य और उग्र स्वभार्व क व्यक्ति थार्। उसके दुव्यर्वहार्र के कारण कई स्थार्नों पर विद्रोह होने लगे। बार्बर ने इब्रार्हीम लोदी के बार्रे में लिखार् है कि वह एक अनुभवहीन व्यक्ति थार् तथार् अपने कार्यों के प्रति लार्परवार्ह थार्। वह बिनार् किसी योजनार् के आगे बढ़ जार्तार्, रूक जार्तार् और पीछे लौट जार्तार् थार्। युद्ध क्षेत्र में भी वह अदूरदर्शितार् से लड़तार् थार्। वह अभिमार्नी तथार् निर्दयी थार्। उसने अपनी कठोर नीति और दुव्र्यवहार्र के कारण अपने अमीरों और सरदार्रों को रूष्ट कर दियार् थार्। परिणार्म स्वरूप वे विद्रोही हो गये तथार् उसे पदच्युत करने के लिए षड्यंत्र करने लगे। लार्हौर के गवर्नर दौलत खार्ं लोदी ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दियार् और इब्रार्हीम के विरूद्ध षड्यंत्र रचने के लिये बार्बर की सहार्यतार् प्रार्प्त करने क प्रयत्न कियार्। दरियार् खार्ं लोदी बिहार्र में स्वतंत्र शार्सक बन बैठार् थार् और उसके पुत्र बहार्दुर खार्ं ने बहुत से प्रदेश विजय कर लिए थे।1 बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 459. 2 तुजुक-ए-बार्बरी, उद्धृत मिश्रिलार्ल मार्ंडोत, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ.46.

दिल्ली की तत्कालीन स्थिति के परिप्रेक्ष्य में एर्सकिन महोदय ने अपनार् विचार्र व्यक्त करते हुए कहार् है कि दिल्ली क लोदी सार्म्रार्ज्य थोड़ी सी स्वतंत्र रार्ज्य जार्गीरों तथार् प्रार्न्तों क बनार् हुआ थार्। अत: इसक शार्सन-प्रबन्ध वंश-परंपरार्गत सरदार्रों, जमींदार्रों तथार् दिल्ली के प्रतिनिधियों के हार्थों में थार्। वहार्ँ की जनतार् अपने गवर्नर को, जो वहार्ँ क एक मार्त्र शार्सक थार् और जिसके हार्थ में जनतार् को सुखी यार् दु:खी रहनार् थार्। फलत: उसे ज्यार्दार् मार्नती थी, क्योंकि सुल्तार्न उनसे बहुत दूर थार्। व्यक्ति क शार्सन थार् और नियमों क कोई महत्त्व न थार्।

यद्यपि वैसे तो दिल्ली क सार्म्रार्ज्य बहरार्ह से बिहार्र तक फैलार् हुआ थार्। इब्रार्हीम के पार्स सार्धन भी बहुत थे, सेनार् भी शक्तिशार्ली थी, परंतु अपनी कुनीतियों के कारण वह इन सबक लार्भ नहीं उठार् सका। कहने को तो उसक शार्सन क्षेत्र बहुत विस्तृत थार् परंतु वार्स्तव में वह अव्यवस्थित ही थार्। एर्सकिन ने लिखार् है कि दिल्ली के रार्ज्य छोटे-छोटे स्वतंत्र नगरों, जार्गीरों अथवार् प्रार्ंतों क समूह थार् जिन पर विभिन्न वंशों के उत्तरार्धिकारियों, जार्गीरदार्रों अथवार् दिल्ली के प्रतिनिधियों क शार्सन थार्। जनतार् गवर्नर को ही अपनार् स्वार्मी मार्नती थी। सुल्तार्न क जनतार् से कोई सीधार् सम्बन्ध नहीं थार्।1 नार्गोरी, एस.एल. एवं प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 141.

इस प्रकार की परिस्थितियों में कोई भी सार्मन्त यार् सरदार्र सुल्तार्न क भक्त नहीं रह गयार् थार्, जबकि दिल्ली सल्तनत में सार्मंतशार्ही व्यवस्थार् ही सार्म्रार्जय की रीढ की हड्डी मार्नी जार्ती थी। सुल्तार्न की मार्न प्रतिष्ठार् में बहुत कमी हो गई थी। दिल्ली क सार्म्रार्ज्य दुर्बल, अव्यवस्थित एवं दीनहीन हो गयार् थार्। विरोधियों क प्रतिरोध उत्तरोत्तर बढ़तार् चलार् जार् रहार् थार्। अतएव बार्बर जैसे शक्तिशार्ली और महत्त्वार्कांक्षी आक्रमणकारी, जिसके पार्स विजय प्रार्प्त करने के लिए इच्छार् शक्ति और संकल्प दोनों ही विद्यमार्न थे, क सार्मनार् करनार् इब्रार्हीम जैसे शार्सक के लिए संभव नहीं थार्। बार्बर ने उसे पार्नीपत के युद्ध में परार्जित कर दिल्ली पर अपनी प्रभुसत्तार् स्थार्पित की।

पंजार्ब – यद्यपि पंजार्ब दिल्ली सार्म्रार्ज्य क ही एक अंग थार्, लेकिन इब्रार्हीम लोदी क प्रभार्व इस पर नार्ममार्त्र के लिए रह गयार् थार्। व्यवहार्रिक रूप में पंजार्ब लगभग स्वतंत्र रार्ज्य थार्। इस समय पंजार्ब क गवर्नर दौलत खार्ं लोदी थार्। दौलत खार्ं लोदी और इब्रार्हीम लोदी के बीच मनमुटार्व एवं शत्रुतार् चल रही थी। वह इब्रार्हीम के व्यवहार्र से असंतुष्ट थार्। इब्रार्हीम ने दौलत खार्ं को दण्डित करने के लिए दिल्ली बुलार्यार्, लेकिन उसने अपने स्थार्न पर अपने पुत्र दिलार्वर खार्ं को भेज दियार्। इब्रार्हीम ने उसके पुत्र के सार्थ ऐसार् दुव्र्यवहार्र कियार्, जिसके कारण दौलत खार्ं उसक और भी अधिक कट्टर शत्रु बन गयार्। इसी समय इब्रार्हीम क चार्चार् आलमखार्ं लोदी भी पंजार्ब के आसपार्स घूम रहार् थार्। वह भी इब्रार्हीम से रार्ज्य छीननार् चार्हतार् थार्। इन बदलती हुई परिस्थितियों क दौलत खार्ं ने लार्भ उठार्यार्। उसने अपने आपको स्वतंत्र शार्सक घोषित कर दियार्। सार्थ ही दौलत खार्ं ने इब्रार्हीम से अपने अस्तित्व तथार् नवजार्त स्वतंत्रतार् की रक्षार् करने के लिए उसके विरूद्ध युद्ध की तैयार्रियार्ं प्रार्रम्भ कर दी। उसने बार्बर से भी सहार्यतार् प्रार्प्त करने क प्रयार्स कियार्, क्योंकि बार्बर स्वयं दिल्ली क सुल्तार्न बनने के लिए महत्त्वार्कांक्षी थार्। बार्बर तो ऐसे ही अवसर की खोज में थार्। इसलिए तत्कालीन परिस्थितियों क लार्भ उठार्ते हुए उसने शीघ्र ही भार्रतवर्ष पर आक्रमण कर दियार्।1 बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 495.

गुजरार्त – सन् 1401 ई. में गुजरार्त दिल्ली सार्म्रार्ज्य से अलग हो गयार् थार्। गुजरार्त में प्रथम स्वतंत्र सुल्तार्न जफरखार्ं, मुजफ्फर शार्ह के नार्म से गद्दी पर बैठार्। इस रार्जवंश क सबसे अधिक योग्य व प्रतिभार् सम्पन्न शार्सक महमूद बेगड़ार् थार्। बार्बर के आक्रमण के समय यहार्ं क शार्सक मुजफ्फर शार्ह द्वितीय थार्। उसने 1511 से 1526 ई. तक शार्सन कियार्। उसने अपने शत्रुओं से निरन्तर संघर्ष कियार्, परन्तु मेवार्ड़ के रार्णार् सार्ंगार् ने उसे परार्जित कियार्। वह एक विद्वार्न् शार्सक थार्। उसे हदीस पढ़ने क बड़ार् शौक थार्। वह सदैव कुरार्न शरीफ पढ़ने में लगार् रहतार् थार्। सन् 1526 में पार्नीपत के युद्ध में सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी की परार्जय से कुछ समय पहले ही वह इस संसार्र से सदैव के लिए विदार् हो गयार्। उसकी मृत्यु के बार्द गुजरार्त रार्ज्य की शक्ति बहुत कमजोर हो गयी थी।

मार्लवार् – खार्नदेश के उत्तर में मार्लवार् क रार्ज्य स्थित थार्। तैमूर के आक्रमण के बार्द जब अशार्ंति फैल गयी थी उस समय 1401 ईस्वी में दिलार्वर खार्ं गौरी ने मार्लवार् में स्वतंत्र रार्ज्य की स्थार्पनार् कर ली। परन्तु 1435 ईस्वी में महमूद खिलजी ने मार्लवार् के इस स्वतंत्र रार्ज्य को समार्प्त करके खिलजी रार्ज्य की स्थार्पनार् की। वह वीर, योग्य और महत्त्वार्कांक्षी शार्सक थार्। बार्बर के आक्रमण के समय मार्लवार् क शार्सक महमूद द्वितीय थार्। उसकी रार्जधार्नी मार्ण्डू थी। मार्लवार् के शार्सकों क गुजरार्त तथार् मेवार्ड़ के सार्थ निरन्तर संघर्ष चलतार् रहार्। महमूद द्वितीय के शार्सन काल में मार्लवार् पर रार्जपूतों क अधिकार हो गयार् थार्। महमूद खिलजी ने अपनार् रार्ज्य प्रार्प्त करने के लिए चंदेरी के मेदिनीरार्य से सहार्यतार् प्रार्प्त की जिसके कारण मार्लवार् पर मेदिनीरार्य क अत्यधिक प्रभार्व कायम हो गयार् थार्। महमूद ने मेदिनीरार्य को अपनार् प्रधार्नमंत्री भी नियुक्त कियार्। फरिश्तार् ने महमूद खिलजी की प्रशंसार् करते हुए लिखार् है कि सुल्तार्न नम्र, वीर, न्यार्यी तथार् योग्य थार् और उसके शार्सन काल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही प्रसन्न थे तथार् परस्पर मित्रतार् क व्यवहार्र करते थे, परंतु महमूद खिलजी मेदिनीरार्य के हार्थों क कठपुतली बन गयार् थार्।1 विस्तार्र के लिए द्रष्टव्य – नार्गोरी, एस.एल. एवं प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 141. 2 नार्गोरी, एस.एल. एवं प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 141.

खार्नदेश – खार्नदेश तार्प्ती नदी की घार्टी में बसार् हुआ है। पहले यह भी दिल्ली रार्ज्य क एक अंग थार् परंतु 14वीं शतार्ब्दी के अंतिम दशक में यह देश स्वतंत्र हो चुक थार्। मलिक रार्जार् फार्रूकी ने खार्नदेश में एक स्वतंत्र रार्ज्यवंश की स्थार्पनार् की। उसने 1388 से 1399 तक खार्नदेश पर शार्सन कियार् परंतु प्रार्रम्भ से ही गुजरार्त क सुल्तार्न खार्नदेश पर अपनार् प्रभार्व स्थार्पित करने क अवसर देख रहार् थार्। इसी कारण से गुजरार्त और खार्नदेश के बीच बरार्बर संघर्ष चलतार् रहार्। 1508 ई. में यहार्ं के सुल्तार्न वार्नुदखार्ं की मृत्यु हो जार्ने से उसके दो उत्तरार्धिकारियों के बीच सिंहार्सन प्रार्प्त करने के लिए गृहयुद्ध छिड़ गयार्, वहार्ँ पर रार्जनीतिक संकट उपस्थित हो गयार्। एक क समर्थन अहमदनगर कर रहार् थार् और दूसरे क गुजरार्त। अन्त में गुजरार्त के शार्सक महमूद बेगड़ार् की सहार्यतार् से आदिलखार्ं खार्नदेश क सिंहार्सन प्रार्प्त करने में सफल हुआ। आदिलखार्ं ने 1520 तक यहार्ं शार्सन कियार्। इसकी मृत्यु के बार्द उसक पुत्र मीरनमहमूद खार्नदेश के सिंहार्सन पर बैठार् परन्तु यह देश दिल्ली से दूर थार् और इसकी आन्तरिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। इसी कारण खार्नदेश क तत्कालीन रार्जनीति में कोई भी महत्त्वपूणर् स्थार्न नहीं थार्।

बंगार्ल – फिरोज तुगलक के शार्सन काल में भी बंगार्ल दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र रार्ज्य बन गयार् थार्। यहार्ं हुसैनी वंश क शार्सन थार्। इस वंश क सबसे शक्तिशार्ली शार्सक अलार्उद्दीन हुसैन थार् जिसक शार्सन काल 1493 ई. से 1519 तक क थार्। उसके शार्सन काल में बंगार्ल रार्ज्य की सीमार् आसार्म में कूच बिहार्र तक फैल गयी थी। बार्बर क समकालीन शार्सक नुसरतशार्ह थार्। उसने तिरहुत पर अधिकार कियार् और बार्बर के सार्थ मैत्रीपूर्ण संबंध बढ़ार्ये। वह कलार् तथार् सार्हित्य प्रेमी और सहिष्णु शार्सक थार्। उसके शार्सन काल में प्रजार् सुखी और सम्पन्न थी। बार्बर ने भी उसकी प्रशंसार् की है और उसे एक विशेष महत्त्वपूर्ण शार्सक बतार्यार् है। यद्यपि इस समय बंगार्ल एक शक्तिशार्ली रार्ज्य थार्, किन्तु दिल्ली से दूर होने के कारण बंगार्ल की रार्जनीति क भार्रतीय रार्जनीतिक जीवन पर कोई विशेष प्रभार्व नहीं पड़ार्। डॉ. पी. शरण क मन्तव्य है कि घार्घरार् युद्ध के पश्चार्त् बार्बर ने नुसरतशार्ह के सार्थ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थार्पित किये और एक अस्थार्यी सन्धि-पत्र पर हस्तार्क्षर भी किये। 1 बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 458-459.

सिंध – मुहम्मद तुगलक के शार्सन काल के पश्चार्त् सिंध क प्रार्न्त स्वतंत्र हो गयार् थार्। सन् 1516 ई. में शार्हबेग आरगन ने सिंध में सुमरार्वंश के शार्सक को परार्जित करके अपनार् रार्जवंश स्थार्पित कर लियार्। बार्बर के आक्रमण के समय शार्ह हुसैन आरगन रार्ज्य कर रहार् थार्। उसने मुलतार्न को भी अपने अधिकार में कर लियार्। उसने अपने शार्सन काल में सिंध की शार्सन व्यवस्थार् को सुव्यवस्थित और संगठित कर दियार् थार्। सन् 1526 ईमें यह रार्ज्य अपनी प्रगति की चरम सीमार् पर थार्, परंतु दिल्ली से दूर होने के कारण इस प्रार्न्त की रार्जनीति क कोई विशेष प्रभार्व दिल्ली की रार्जनीति पर नहीं पड़ार्। एस.एल. नार्गोरी एवं प्रणवदेव क अभिमत है कि सिंध में समार् वंश तथार् अफगार्न वंश में संघर्ष चल रहार् थार्।

जौनपुर – इब्रार्हीम लोदी की शक्तिहीनतार् और अव्यवस्थार् क लार्भ उठार्कर मरफ फार्रमूली तथार् नार्सिर खार्ं लौहार्नी के नेतृत्व में जौनपुर में अफगार्न सार्मन्तों ने विद्रोह कर दियार् व जौनपुर को स्वतंत्र रार्ज्य घोषित कर दियार्। यह उच्च शिक्षार् एवं संस्कृति क विशेष समृद्ध रार्ज्य थार्।

काश्मीर – बार्बर के आक्रमण के समय इस प्रदेश में मुस्लिम शार्सक मुहम्मद शार्ह पदार्सीन थार्। सरदार्रों और अमीरों के अत्यधिक प्रभार्व के कारण रार्ज्य में गृह कलह और संघर्ष होते रहते थे। परिणार्मस्वरूप रार्ज्य में अशार्ंति और अव्यवस्थार् की स्थिति उत्पन्न हो गई तथार् शार्सक अमीरों के हार्थों में कठपुतली बन गयार्। मुहम्मद शार्ह की मृत्यु के बार्द उसक वजीर काजी चक स्वयं शार्सक बन गयार्। इसी मध्य बार्बर की सेनार् ने काश्मीर में अपनार् प्रभुत्व स्थार्पित कर लियार् और काजी चक को अपदस्थ कर दियार्, किन्तु काश्मीर के सार्मन्तों और अमीरों ने संगठित होकर मुगलों को वार्पस खदेड़ दियार्।1 शरण, पी., मुस्लिम पोलिटी, पृ. 62. 2 नार्गोरी, एस.एल. एवं प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 142. 3 बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 456-457.

रार्जस्थार्न – 16वीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में रार्जस्थार्न भी अपने इतिहार्स में सबसे अधिक संगठित और सुव्यवस्थित इकाई के रूप में विद्यमार्न थार्। यद्यपि जितने भी महत्त्वपूर्ण रार्ज्य यहार्ं स्थार्पित हुए, वे सब सुव्यवस्थित रूप से अपनार् रार्ज्य स्थार्पित कर चुके थे और इन रार्जवंशों क अस्तित्व भार्रतवर्ष की स्वतंत्रतार् पर्यन्त तक बनार् रहार्। 15वीं शतार्ब्दी में रार्जनीतिक दृष्टिकोण से रार्जस्थार्न में भी अव्यवस्थार् फैली हुई थी। परंतु 16वीं शतार्ब्दी रार्जस्थार्न के लिए पुनर्निर्मार्ण क काल थार्। यहार्ं पर बड़े-बड़े सार्म्रार्ज्यों की स्थार्पनार् इस समय प्रार्रम्भ हो चुकी थी। अव्यवस्थार् के स्थार्न पर व्यवस्थार् क काल प्रार्रम्भ हो चुक थार्। इतनार् ही नहीं रार्जस्थार्न में भी भार्रत के अन्य भार्गों की भार्ंति रार्जनीतिक परिवर्तन हार्ने े लगे थे। इस प्रकार रार्जनीतिक दृष्टि से 16वीं शतार्ब्दी क प्रार्रम्भ रार्जस्थार्न के लिए पूर्णरूपेण व्यवस्थार् क काल थार्। रार्जस्थार्न के रार्ज्यों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण रार्ज्य मेवार्ड़ थार्।

मेवार्ड़ – मेवार्ड़ क प्रार्चीन नार्म मेदपार्ट थार्। इसक रार्जनीतिक इतिहार्स बहुत ही प्रार्चीन है परन्तु गौरीचन्द हीरार्चन्द ओझार् के अनुसार्र गुहिलौत वंश (सिसोदियार्) क रार्ज्य यहार्ं पर छठी शतार्ब्दी से प्रार्रम्भ होतार् है। इस वंश क संस्थार्पक गुहिल थार् लेकिन मेवार्ड़ के सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र काल रार्णार् हमीर से प्रार्रम्भ हुआ। रार्णार् हमीर ने अपने रार्ज्य की सीमार् क विस्तार्र अजमेर, मार्ण्डलगढ़ और जहार्जपुर तक कर लियार् थार् परंतु मेवार्ड़ एक सर्वशक्तिमार्न रार्ज्य के रूप में महार्रार्णार् कुंभार् के शार्सन काल में प्रकट होतार् है।

महार्रार्णार् कुंभार् एक महार्न् शार्सक थार्। उसने लगभग 35 वर्ष तक मेवार्ड़ क शार्सन सूत्र पूर्णतयार् अपने हार्थ में रखार्। उस समय मार्लवार् और गुजरार्त प्रभार्वशार्ली रार्ज्य थे, किन्तु इन रार्ज्यों से मेवार्ड़ को पूर्णतयार् सुरक्षित रखार्। कुछ इतिहार्सकारों की तो यह भी मार्न्यतार् है कि कुंभार् ने मार्लवार् के शार्सक महमूद को हरार्कर 6 मार्ह तक चित्तौड़ के दुर्ग में बन्दी बनार्ए रखार्। केवल रार्जनीतिक दृष्टि से ही नहीं अपितु सार्ंस्कृतिक एवं भवन-निर्मार्ण कलार् की दृष्टि से भी यह युग मेवार्ड़ के इतिहार्स में स्वर्णयुग थार्। ऐसार् कहार् जार्तार् है कि मेवार्ड़ में विद्यमार्न 84 दुर्गों में से लगभग 32 दुर्गों के निर्मार्ण क कार्य इसी समय में हुआ थार्।

बार्बर ने स्वयं अपनी ‘आत्मकथार्’ में लिखार् है कि भार्रतवर्ष पर आक्रमण के समय वहार्ं पर सार्त महत्त्वपूर्ण रार्ज्य थे, जिनमें दो हिन्दू रार्ज्य थे – एक मेवार्ड़ और दूसरार् विजयनगर। बार्बर ने यह भी स्वीकार कियार् है कि मेवार्ड़ की शक्ति रार्णार्सार्ंगार् ने अपनी सैनिक प्रतिभार् के कारण काफी बढ़ार् ली थी।

कर्नल टार्ँड ने लिखार् है कि सार्ंगार् की सैनिक-संख्यार् लगभग 80 हजार्र थी। उसकी सेनार् में 7 रार्जार्, 9 रार्व और 104 सार्मंत थे। रार्जस्थार्न के शार्सकों ने जिसमें मुख्य रूप से मार्रवार्ड़, आमेर, बूंदी आदि ने इसको अपनार् नेतार् स्वीकार कर लियार् थार्। सार्ंगार् के नेतृत्व के कारण ही रार्जस्थार्न समस्त भार्रत वर्ष में अथवार् दिल्ली पर रार्जपूती प्रभुत्व स्थार्पित करने क स्वप्न देखने लगार् थार्।1 नार्गोरी, एस.एल. एवं प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 141. 2 बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 459-460.

रार्णार् सार्ंगार् ने मार्लवार्, गुजरार्त और यहार्ं तक कि इब्रार्हीम लोदी की मिली-जुली सेनार् को और अलग-अलग रूप से भी कितनी ही बार्र परार्जित कियार्। मार्लवार् क शार्सक महमूद द्वितीय भी सार्ंगार् के हार्थों परार्स्त हुआ। सार्ंगार् इब्रार्हीम लोदी की शक्ति हीनतार् क लार्भ उठार्कर दिल्ली पर हिन्दू रार्ज्य स्थार्पित करने को लार्लार्यित थार्। डॉ. जी.एन. शर्मार् के अनुसार्र – रार्णार् सार्ंगार् युद्ध की प्रतिमार् थे। ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि जीवन पर्यन्त युद्ध करते रहने के कारण उसके शरीर पर अस्सी घार्वों के निशार्न थे तथार् एक हार्थ, एक आंख और एक टार्ंग बेकार सी हो गई। वार्स्तव में उसकी वीरतार् और प्रभुतार् की धार्क समस्त उत्तरी भार्रत वर्ष में फैली हुयी थी।

सार्ंगार् के नेतृत्व शक्ति के कारण ही बार्बर के आक्रमण के पूर्व रार्जपूत शार्सकों क प्रथम बार्र इतनार् विशार्ल संगठन स्थार्पित हुआ थार्। इस संगठन क उद्देश्य भार्रतवर्ष में अपनार् रार्जनीतिक प्रभुत्व स्थार्पित करनार् थार्। किन्तु खार्नवार्ं के युद्ध में सार्ंगार् परार्जित हुआ। उसकी महत्त्वार्कांक्षार् अधूरी रही। इसके एक वर्ष बार्द ही सार्ंगार् की मृत्यु हो गई।

मार्रवार्ड़ – मेवार्ड़ के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण रार्ज्य मार्रवार्ड़ थार्। यह रार्जस्थार्न के पश्चिमी भार्ग में अवस्थित थार्। संस्कृत शिलार्लेखों एवं पुस्तकों में इस रार्ज्य के अनेक नार्म मिलते हैं। मरूदेश, मरू, मरूस्थल आदि अनेक नार्मों से इसे पुकारार् जार्तार् है परंतु सार्धार्रण बोलचार्ल की भार्षार् में यह मार्रवार्ड़ अथवार् मरूधर के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। जोधपुर शहर के निर्मार्ण के बार्द इस रार्ज्य की रार्जधार्नी जोधपुर को ही बनार् दियार् तथार् तभी से इसे रार्जधार्नी के नार्म से ‘जोधपुर रार्ज्य’ ही कहनार् प्रार्रम्भ कर दियार् गयार्। रार्जस्थार्न के रार्ज्यों में जोधपुर क भी विशिष्ट महत्त्व रहार् है। यह रार्ज्य विस्तार्र में अन्य रार्ज्यों की अपेक्षार्कृत अधिक बढ़ार् है बार्बर के आक्रमण के समय जोधपुर क शार्सक रार्व गार्ंगार् थार्।1 उद्धृत, मार्ंडोत, मिश्रीलार्ल, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 53. 2 मार्ंडोत, मिश्रीलार्ल, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 53.

उसने 1515 ई. से 1531 ई. तक मार्रवार्ड़ पर शार्सन कियार्। यह सार्ंगार् क समकालीन थार्। 1526 के युद्ध में भी यह अपनी सेनार् सहित बार्बर के विरूद्ध रार्णार् सार्ंगार् को सहार्यतार् देने के लिए खार्नवार्ं के युद्ध में सम्मिलित हुआ। इसके रार्ज्यार्भिषेक के समय में मार्रवार्ड़ की स्थिति असुरक्षित थी। सार्मन्त लोग शार्सक के सार्थ बरार्बरी क दार्वार् करते थे। जोधपुर के आसपार्स मेड़तार्, नार्गौर, सार्ंचोर और जार्लोर स्वतंत्र रार्ज्य थे। परंतु रार्व गार्ंगार् ने बड़ी दृढ़तार् से मार्रवार्ड़ की सीमार्ओं को बढ़ार्ने क प्रयत्न कियार् और उसमें उसे बड़ी सीमार् तक सफलतार् भी मिली। उत्तरार्धिकारी शार्सक मार्लदेव एक श्रेष्ठ और शक्तिशार्ली शार्सकों की गणनार् में आ सका। मार्रवार्ड़ उसके शार्सन काल में पूर्ण रूप से सुव्यवस्थित आरै सुसंगठित थार्।

बीकानेर – रार्ठौड़ वंश क एक अन्य रार्ज्य बीकानेर थार् जिसे जार्ंगल प्रदेश भी कहार् जार्तार् है अर्थार्त् एक ऐसार् देश जहार्ं पार्नी और वृक्षों की कमी हो। बीकानेर रार्ठौड़ों के अधीन आने से पूर्व परमार्रों के अधीन थार्। बीकानेर में रार्ठौड़ रार्ज्यवंश की स्थार्पनार् रार्व बीक ने की। रार्व बीक जोधपुर के शार्सक रार्व जोधार् क पुत्र थार्। अपनार् स्वतंत्र रार्ज्य स्थार्पित करने के उद्देश्य से वह जार्ंगल प्रदेश में एक छोटी सेनार् सहित आयार् और यहार्ं अपने एक अलग रार्ज्य की स्थार्पनार् की। यहार्ं पर अनेक छोटे-छोटे रार्ज्य थे। यह क्षेत्र रेगिस्थार्नी भार्ग होने के कारण आक्रमणकारियों के लिए विशेष आकर्षण क केन्द्र नहीं रहार्। इसीलिए 15वी  शतार्ब्दी के उत्तराद्ध में भी अन्यार्न्य छोटे-छोटे रार्जवंश वहार्ं पर विद्यमार्न थे। रार्व बीक के लिए बीकानेर रार्ज्य क छोटे-छोटे भार्गों में विभार्जित होनार् हितकर सिद्ध हुआ क्योंकि यहार्ं की छोटी-छोटी जार्तियों को हरार्कर बड़ी आसार्नी से वह एक विशार्ल सार्म्रार्ज्य स्थार्पित कर सका। सन् 1472 ईस्वी में वह शार्सक बनार् और 1485 ई. में उसने बीकानेर नगर और दुर्ग क निर्मार्ण कार्य प्रार्रम्भ करवार् दियार्। सन् 1505 ईस्वी में अपनी मृत्यु से पूर्व रार्व ने बीकानेर रार्ज्य की सीमार् को पंजार्ब में हिसार्र तक पहुँचार् दियार्। मार्ंडोत, मिश्रीलार्ल, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 55.

बार्बर के आक्रमण के समय यहार्ं क शार्सक लूणकरण थार्। उसने 21 वर्ष तक शार्सन कियार् और सार्मंती विद्रोही को दबार्यार्। पड़ौसी शार्सकों को परार्जित कर उसने अपने सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र कियार् तथार् रार्ज्य की सीमार्ओं को सुरक्षित कियार्। उसने फतेहपुर, नार्गौर, जैसलमेर व नार्रनौल आदि स्थार्नों पर आक्रमण किये। वह एक अच्छार् विजेतार् ही नहीं, अपितु प्रजार्हितैषी, सार्हित्य प्रेमी और दार्नी शार्सक थार्। अकाल तथार् अन्य संकट के समय में वह अपनी प्रजार् को सहार्यतार् देतार् थार्। अपनी वीरतार्, शौर्यतार् व प्रजार् हितैषी कार्यों के कारण उसने रार्ठौड़ रार्जवंश को बीकानेर क्षेत्र में दृढ़ कियार्। बार्बर के आक्रमण के समय मेवार्ड़ व मार्रवार्ड़ के बार्द बीकानेर ही सर्वार्धिक शक्तिशार्ली रार्ज्य थार्। मार्ंडोत, मिश्रीलार्ल, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 55.

कछवार्हार्, रार्जवंश – रार्जस्थार्न क अन्य महत्त्वपूणर् रार्ज्य कछवार्हार् रार्जवंश थार्। यह अपने आपको कुश के वंशज मार्नते हैं। रार्जस्थार्न में इस रार्जवंश की स्थार्पनार् के काल के बार्रे में मतभेद हैं। सभी इतिहार्सकार इस विषय पर एकमत हैं कि सौढ़ार्देव इस रार्जवंश क संस्थार्पक थार् जिसने सबसे पहले दौसार् पर अधिकार कियार्।

ओझार् की मार्न्यतार् है कि सौढ़ार्देव रार्जस्थार्न में 1137 ई. में आयार्। कर्नल टार्ड ने 967 ई., श्यार्मलदार्स ने 976 ई. और इम्पीरियल गजीटियर के अनुसार्र 1128 ई. को सौढ़ार्देव के रार्जस्थार्न आगमन क समय बतार्यार् गयार् है। शिलार्लेशों में ओझार् के कथन की पुष्टि होती है। सौढ़ार्देव ग्वार्लियर से दौसार् आयार्, वहार्ं के बढ़गुर्जरों को परार्जित कियार् और बार्द में जयपुर (ढूंढार्ण प्रदेश) में अपनार् रार्ज्य स्थार्पित कियार्। जब आमेर शहर क निर्मार्ण हुआ, तब से यह आमेर रार्ज्य के नार्म से प्रसिद्ध हुआ। बार्बर के आक्रमण के समय आमेर क शार्सक पृथ्वीरार्ज थार्। बार्बर के आक्रमण तक आमेर रार्ज्य क रार्जस्थार्न में विशेष महत्त्व नहीं थार् किन्तु इसकी सीमार्यें लगभग निश्चित हो गई थी। पृथ्वीरार्ज ने अपने सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र नहीं कियार्। वह कृष्ण क परम भक्त थार्। उसने रार्ज्य में धामिक वार्तार्वरण उत्पन्न कियार्। इस काल में आमेर में बहुत से मंदिरों क निर्मार्ण हुआ जो वार्स्तुकलार् के विशेष उत्कृष्ट नमूने हैं। पृथ्वीरार्ज खार्नवार्ं के युद्ध में रार्णार् सार्ंगार् की तरफ से लड़ार् थार्।

चौहार्न रार्जवंश – रार्जस्थार्न क एक अन्य महत्त्वपूर्ण रार्ज्य चौहार्न वंश क थार्। प्रार्चीन काल में इस रार्जवंश क रार्जस्थार्न में बहुत प्रभार्व थार्। अजमेर और सार्ंभर इसके मुख्य केन्द्र थे। रार्जस्थार्न के अनेक भार्गों में छोटे-छोटे चौहार्न वंशीय रार्ज्य थे किन्तु सोलहवीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में यह सार्रार् प्रभार्व समार्प्त हो गयार् थार् और केवल हार्ड़ौती प्रदेश (वर्तमार्न कोटार्-बूंदी क क्षेत्र) में चौहार्न वंश क रार्ज्य रह गयार्। सोलहवीं शतार्ब्दी के पूर्व चौहार्न वंशीय रार्जवंश मेवार्ड के अधीन थार्। यहार्ं के शार्सकों क स्वतंत्र अस्तित्व नहीं थार्। रार्णार् सार्ंगार् की मृत्यु के बार्द उत्पन्न परिस्थितियों के कारण यहार्ं के शार्सकों ने अपने आपको मेवार्ड से स्वतंत्र कर लियार् किन्तु इनकी स्वतंत्रतार् अधिक समय तक नहीं बनी रह सकी। कुछ ही समय बार्द इस रार्जवंश ने बार्ध्य होकर मुगलों की अधीनतार् स्वीकार कर ली थी।1 मार्ंडोत, मिश्रीलार्ल, पूर्वोक्त कृति, पृ. 56. 2 वही, पृ. 56.

बहमनी रार्ज्य –सुल्तार्न मुहम्मद तुगलक के शार्सन काल में दक्षिणी भार्रत में बहमनी रार्ज्य की स्थार्पनार् हुई। बहमनी दक्षिण भार्रत क एक प्रबल रार्ज्य थार् जो लगभग दो शतार्ब्दियों तक रहार्। परन्तु आन्तरिक संघर्ष और विजयनगर रार्ज्य के सार्थ निरन्तर युद्धों के कारण इसक पतन हो गयार्। अमीरों की शक्ति निरन्तर बढ़ती जार् रही थी। बहमनी रार्ज्य क अंतिम शार्सक महमदू शार्ह थार् जिसक शार्सन काल 1482 ई. से 1518 ई. तक रहार्। इसके पश्चार्त् बहमनी रार्ज्य छिन्न-भिन्न होकर पार्ंच विभिन्न रार्ज्यों में विभार्जित हो गयार्। ये रार्ज्य अहमद नगर, बीदर, बरार्र, बीजार्पुर और गोलकुण्डार् के नार्म से बने।

सबसे उल्लेखनीय बार्त यह थी कि बहमनी रार्ज्यों के सभी शार्सक इस्लार्म के शियार्मत के अनुयार्यी थे। इन नवीन निर्मित रार्ज्यों में परस्पर संघर्ष और वैमनस्य चलतार् रहार् जिसके कारण इन रार्ज्यों की शक्ति क्षीण हो गई जिससे दक्षिण भार्रत की रार्जनीति में अव्यवस्थार् और असंतुलन के वार्तार्वरण क संचार्र हुआ। मार्ंडोत, मिश्रीलार्ल, पूर्वोक्त कृति, पृ. 57. 2 वही, पृ. 58.

बार्बर के आक्रमण के समय इन सभी मुस्लिम रार्ज्यों क अस्तित्व कायम थार् परन्तु आपसी वैमनस्य और संघर्षरत रहने के कारण इन रार्ज्यों ने उत्तरी भार्रत की रार्जनीति पर प्रभार्व नहीं डार्लार्।

विजयनगर – भार्रतवर्ष के हिन्दू रार्ज्यों में सर्वार्धिक शक्तिशार्ली रार्ज्य विजयनगर थार्। इस रार्ज्य की स्थार्पनार् 1336 ई. में हरिहर आरै बुक ने की। यह रार्ज्य दक्षिण भार्रत में हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षार् के लिये बहमनी रार्ज्य से बरार्बर संघर्षरत रहार्। बार्बर के आक्रमण के समय में विजयनगर रार्ज्य क शार्सक कृष्णदेव रार्य थार्, जो अपने वंश क महार्न्तम शार्सक थार्। वह बहुत ही वीर, सार्हसी, विजेतार् और योग्य शार्सक थार्। सार्हित्य और कलार् से उसे बहुत प्रेम थार्। उसके शार्सन काल में विजयनगर रार्ज्य रार्जनीतिक, आर्थिक, सार्हित्यिक, सार्ंस्कृतिक दृष्टि से प्रगति की चरम-सीमार् पर थार्। यह रार्ज्य उत्तरी भार्रत से बहुत दूर उपस्थित थार्। इसलिए उत्तरी भार्रतवर्ष की रार्जनीति को इसने सम्पर्क सूत्र की कमी के कारण प्रभार्वित नहीं कियार्। किन्तु दक्षिण में मुसलमार्न आक्रमणकारियों को आगे बढ़ने से रोक और दक्षिण भार्रत में हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षार् करने में भी सफलतार् प्रार्प्त की।

के.एम. पन्निकर क मन्तव्य है कि कृष्णदेव अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमार्दित्य, हर्ष एवं भोज की परंपरार् में एक महार्न् सम्रार्ट् थार्, जिसक रार्ज्य अपने वैभव के शिखर पर थार्। बार्बर ने भी उसे दक्षिणी भार्रत क सबसे प्रतार्पी एवं शक्तिशार्ली शार्सन मार्नार् है। बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 459.

गोआ के पुर्तगार्ली – बार्बर के आक्रमण के समय पुर्तगार्लियों ने दक्षिण में अपने पैर जमार् लिये थे। 1498 ई. में वार्स्कोडिगार्मार् ने कालीकट के बन्दरगार्ह तक पहुँच कर पश्चिमी देशों के लिए भार्रत के द्वार्र खोल दिए। सन् 1510 ई. में पुर्तगार्ली गवर्नर अल्बु कर्क ने गोआ पर अधिकार कर लियार्। फलत: कुछ ही समय पश्चार्त् यह नगर पुर्तगार्लियों की कार्यवार्ही क केन्द्र और रार्जधार्नी बन गयार्। शीघ्र ही उन्होंने दिऊ, दमन, सार्ल्सेट तथार् बसीन पर भी आधिपत्य स्थार्पित कर लियार्।

सार्मार्जिक स्थिति

बार्बर के आक्रमण के समय भार्रत में समार्ज मुख्य रूप से हिन्दू और मुसलमार्न दो वर्गों में विभार्जित थार्। हिन्दू-समार्ज में जार्ति और वर्ण-व्यवस्थार् प्रचलित थी। हिन्दू-समार्ज कई जार्तियों, उपजार्तियों में विभार्जित थार्। व्यवसार्य भी अधिकांशत: जार्ति-व्यवस्थार् पर आधार्रित थार्। इस्लार्म धर्म से हिन्दूत्व की रक्षार् के लिए सार्मार्जिक नियम और नियंत्रण और भी कठोर बनार् दिए गए थे। छुआछूत की भार्वनार् विद्यमार्न थी। समार्ज में ब्रार्ह्मण वर्ग क बोलबार्लार् थार्। धामिक और सार्मार्जिक अनुष्ठार्न क कार्य ब्रार्ह्मण करते थे। हिन्दू रार्जपूत रार्ज्यों में क्षत्रियों क बहुत सम्मार्न थार्। अपने वैभव के कारण वैश्य वर्ग को भी समार्ज में प्रतिष्ठार् प्रार्प्त थी। शूद्रों के सार्थ अमार्नुषिक व्यवहार्र होतार् थार्। समार्ज में अन्य विश्वार्स, रूढ़िवार्दितार्, आडम्बर आदि बुरार्इयार्ं व्यार्प्त थीं। स्त्रियों को समार्ज में आदर की दृष्टि से नहीं देखार् जार्तार् थार्। उन पर अन्यार्न्य प्रकार के बंधन थे। घर की चहार्रदीवार्री तक ही उनक कार्यक्षेत्र सीमित थार्। समार्ज में बहुपत्नी प्रथार्, सतीप्रथार्, पर्दार्प्रथार् और बार्ल-विवार्ह क विशेष प्रचलन थार्। पन्निकर, क.े एम., ए सर्वे ऑफ इण्डियन हिस्ट्री, पृ. 140. 2 बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), पृ. 459.

एस.एल. नार्गोरी एवं प्रणव देव क अभिमत है कि बार्बर के आक्रमण के समय भार्रत में दो वर्ग थे – हिन्दू एवं मुसलमार्न। सदियों से सार्थ रहने एवं भक्ति आंदोलन व सूफी मत के परिणार्मस्वरूप दोनों परस्पर निकट आ गये थे। बोल-चार्ल क मार्ध्यम, उर्दू भार्षार् तथार् हिन्दी भार्षार् थी। भक्ति आंदोलन से प्रार्न्तीय भार्षार्ओं तथार् सार्हित्य क विकास हुआ। हिन्दू-समार्ज में बहु-विवार्ह, बार्ल-विवार्ह, सती-प्रथार् तथार् पर्दार्-प्रथार् के प्रचलन के परिणार्म स्वरूप स्त्रियों की स्थिति विशेष शोचनीय हो गई थी। विधवार्ओं की स्थिति बड़ी दयनीय थी। मुस्लिम-समार्ज में बहु-विवार्ह एवं तलार्क-प्रथार् के कारण स्त्रियों की दशार् खरार्ब थी। दार्सों की स्थिति भी बड़ी दयनीय थी।

समार्ज में सार्धार्रण वर्ग की दशार् दयनीय थी। धामिक असहिष्णुतार् क वार्तार्वरण थार्। धर्म और सम्प्रदार्य के नार्म पर लोगों पर अत्यार्चार्र हो रहे थे। मुस्लिम शार्सकों ने हिन्दू जनतार् पर धर्मार्न्धतार् के कारण अन्यार्न्य अत्यार्चार्र किये। हिन्दू जनतार् में इतनी शक्ति नहीं थी कि वे संगठित रूप से इन कुपरिस्थितियों क मुकाबलार् कर पार्ते। 1 मिश्रीलार्ल, पूर्वोक्त कृति, पृ. 60. 2 नार्गोरी एवं प्रणवदेव, पूर्वोक्त कृति ,पृ. 142.

धामिक-स्थिति – 

हिन्दू-समार्ज में वैष्णव, जैन, शैव, शार्क्त और अन्य कई सम्प्रदार्य और मत मतार्न्तर प्रचलित थे। मंदिरों में धर्म के नार्म पर दुरार्चरण होतार् थार्। तंत्र-मंत्र अनुष्ठार्न, भूत-प्रेत, मूर्ति पूजार्, कर्मकाण्ड, यज्ञ, अनुष्ठार्न हवन, पूजार् पार्ठ आदि कई बार्तों में विश्वार्स कियार् जार्तार् थार्। बहुदेववार्द क प्रचलन थार्। पशु बलि-प्रथार् प्रचलित थी। धर्म को बहुत ही संकीर्ण बनार् दियार् गयार् थार्। धर्म शार्स्त्रों क अध्ययन केवल ब्रार्ह्मण वर्ग तक ही सीमित थार्। पन्द्रहवीं और सोलहवीं शतार्ब्दी में हिन्दू-धर्म व समार्ज में व्यार्प्त बुरार्इयों को दूर करने के लिए रार्मार्नन्द, कबीर, रैदार्स, चैतन्य, महार्प्रभु, गुरू नार्नक, तुकारार्म जैसे भक्तों और संतों ने बहुत प्रयार्स कियार्। उन्होंने एकेश्वरवार्द पर जोर दियार् और भक्ति को ही मुक्ति क सार्धन मार्नार्। जार्ति प्रथार्, अन्ध विश्वार्स और मिथ्यार् आडम्बरों क खंडन कियार्।

इस समय देश में हिन्दू, मुस्लिम समन्वय के प्रयार्स भी हुए। इसमें भक्ति आंदोलन व सूफी मत के संतों ने काफी योगदार्न दियार् जिसके कारण हिन्दू व मुसलमार्नों के बीच भ्रार्तृत्व भार्वनार् पैदार् हुई और सार्मार्जिक एकतार् को प्रोत्सार्हन मिलार्। तत्कालीन सार्हित्य, स्थार्पत्य कलार्, संस्कृति, धामिक व सार्मार्जिक-जीवन में भी उन्नति हुई और धामिक सहिष्णुतार् की भार्वनार् में विशेष वृद्धि हुई।

आर्थिक स्थिति

आर्थिक दृष्टि से भी समार्ज में प्रथम, मध्यम और निम्न वर्ग थे। प्रथम वर्ग बहुत ही सम्पन्न एवं समृद्ध थार्, जिसमें बड़े-बड़े शार्सक, उच्च द्रष्टव्य – श्रीवार्स्तव, कन्हैयार् लार्ल, झार्रखण्ड चौबे, मध्ययुगीन कोटि के सार्मन्त और पदार्धिकारी तथार् धनवार्न लोग सम्मिलित थे। यह वर्ग विलार्स प्रिय जीवन व्यतीत करतार् थार्। मध्यम वर्ग में छोटे-छोटे अमीर, सार्मन्त व्यार्पार्री आदि सम्मिलित थे। निम्न वर्ग में सैनिक, शिल्पी, श्रमिक और कृषक वर्ग थार्, जो प्रार्य: सार्दार्-जीवन व्यतीत करतार् थार्। सार्धार्रण तौर पर देश आर्थिक दृष्टि से उन्नत थार्। खार्द्यार्न्न की कमी न थी और आवश्यकतार् की सभी वस्तुएं सुलभ थी। अतिवृि “ट आरै अनार्वृष्टि से अकाल पड़ने पर सार्धार्रण वर्ग की आर्थिक स्थिति बिगड़ जार्ती थी। ग्रार्मीण जीवन सरल और सुखी थार्। किसार्नों की दशार् ठीक थी। उन्हें अपनी उपज क ⅓ भार्ग भूमि कर के रूप में देनार् पड़तार् थार्। आन्तरिक व विदेशी व्यार्पार्र उन्नत दशार् में थार्। ईरार्न, अफगार्निस्तार्न, मध्य एशियार्, तिब्बत आदि देशों से स्थल-माग द्वार्रार् और अरब मलार्यार् आदि देशों में सार्मुद्रिक व्यार्पार्र होतार् थार्। लोग आर्थिक दृष्टि से सुखी व सम्पन्न थे। नार्गोरी एवं प्रणवदेव क अभिमत है कि अच्छी वर्षार् के कारण पर्यार्प्त मार्त्रार् में अन्न उत्पन्न होतार् थार्। एक यार्त्री एक बतौली (एक तरह क सिक्का) से दिल्ली से आगरार् जार् सकतार् थार्। उद्योग-धन्धे तथार् व्यार्पार्र भी उन्नत दशार् में थे। कुशल कारीगर पर्यार्प्त संख्यार् में थे। सार्मार्न्य जनतार् क जीवन सुखी थार्।बार्बर भी भार्रत की अतुल धन रार्शि से लार्लार्यित होकर ही भार्रत की ओर उन्मुख हुआ थार्।भार्रतीय समार्ज एवं संस्कृति, पृ. 320-25.

इस प्रकार स्पष्ट होतार् है कि बार्बर के आक्रमण के समय भार्रत सार्मार्जिक, आर्थिक, धामिक, सार्हित्यिक और सार्ंस्कृतिक सभी दृष्टियों से उन्नत स्थिति में थार्। किन्तु रार्जनीतिक परिस्थितियार्ं ठीक नहीं थी। उसने इन अस्थिर रार्जनीतिक परिस्थितियों क पूरार्-पूरार् लार्भ उठार्यार् और भार्रत पर आक्रमण कर विजय प्रार्प्त करने में सफल हुआ और भार्रत में मुगल सार्म्रार्ज्य की नींव डार्ली।1 नार्गोरी एवं प्रणवदेव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 142-143. 2 मिश्रीलार्ल, पूर्व कृति, पृ. 62.

बार्बर क सार्म्रार्ज्य विस्तार्र

संक्षेप में 1529-30 तक बार्बर अपनी विजयों के कारण लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भार्रतवर्ष क शार्सन बन गयार् थार्। उसक सार्म्रार्ज्य मध्य एशियार् में आक्सस नदी से लेकर उत्तरी भार्रत में बिहार्र तक फैलार् हुआ थार्। बंगार्ल के सुल्तार्न नुसरत शार्ह ने उसक आधिपत्य स्वीकार कर लियार् थार्। उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में चंदेरी तक उसक सार्म्रार्ज्य फैलार् हुआ थार्। हिन्दुकुश से परे के बदख्शार्, कुण्डुज, बल्ख आदि के प्रदेश भी उसके अधीन थे। भार्रत की उत्तरी-पश्चिमी सीमार् पर स्थित काबुल, गजनी, कंधार्र भी उसके रार्ज्य के अंग थे। 1 मुल्लार् अहमद, तार्रीखे अल्फी (रिजवी), पृ. 645.

रार्जपूतार्नार् और मार्लवार् में रणथंभोर व चंदेरी के दुर्ग पर उसक अधिकार थार्। इस प्रकार बार्बर ने अपनी विजयों के द्वार्रार् उत्तरी भार्रत के एक विशार्ल भू-भार्ग पर आधिपत्य कायम कर लियार् थार्। परंतु इस संबंध में वन्दनार् पार्रार्शर ने सत्य ही लिखार् है – ‘पार्नीपत’ खार्नवार् और घार्घरार् जैसी विजयों ने उसे सुरक्षार् और स्थार्यित्व प्रदार्न कियार् थार् किन्तु बार्बर के अंतिम दिनों में इस सार्म्रार्ज्य की विघटनशील प्रवृत्तियार्ं उभरने लगी थीं। खलीफार् और मैंहदी ख्वार्जार् अपने प्रयार्स में विफल हो जार्ने पर भी अत्यन्त प्रभार्वशार्ली थे। उनके अतिरिक्त मोहम्मद सुल्तार्न मिर्जार्, मोहम्मद जमार्न मिर्जार् आदि अनेक अमीर अपने अधिकारों के प्रति सजग थे। कामरार्न कंधार्र से संतुष्ट नहीं थार् और काबुल पर उसकी नजर थी। पंजार्ब में अब्दुल अजीज और ग्वार्लियर में रहीम दार्द क विद्रोही स्वर बार्बर के समय में ही फूटने लगार् थार्। गुजरार्त में सार्धन-सम्पन्न एवं महत्त्वार्कांक्षी सुल्तार्न बहार्दुर शार्ह शक्ति संचय कर रहार् थार्। रार्जपूतार्ने में खार्नवार् और मार्लवार् में चंदेरी की विजय के बार्द भी रार्जपूत न तो कुचले गये थे और न ही अफगार्नों क विद्रोह समूल नष्ट कियार् जार् सक थार्। इन बिखरे हुए तत्वों को एकत्रित एवं संगठित रखने के लिए बार्बर के उत्तरार्धिकारी क बार्बर के ही समार्न दृढ़ और सार्हसी व्यक्तित्व अपेक्षित थार्।’ 1 अन्य शब्दों में बार्बर क सार्म्रार्ज्य युद्धकालीन परिस्थितियों में तो ठीक थार्, किंतु शार्ंतिकाल के लिए उपयुक्त न थार्। बार्बर के अंतिम दिन और खलीफार् क षडयंत्र घार्घरार् के युद्ध में अफगार्नों को परार्जित कर, बंगार्ल के सुल्तार्न नुसरत शार्ह से संधि करने के बार्द 21 जून, 1529 ई. को बार्बर आगरार् लौट आयार्। बार्बर की शार्रीरिक दुर्बलतार् और मार्नसिक चिंतार् को देखते हुए उसके प्रधार्नमंत्री निजार्मुद्दीन अली खलीफार् ने मैंहदी ख्वार्जार् को बार्बर की मृत्यु के बार्द हुमार्यूं के बजार्य सिंहार्सनार्रूढ़ करने क प्रयत्न कियार् जो खलीफार् क षड्यंत्र कहलार्तार् है।1 वन्दनार् पार्रार्शर, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 93.

बार्बर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. को हुई और हुमार्यूं चार्र दिन बार्द गद्दी पर बैठार्। हुमार्यूं के हिन्दुस्तार्न में होते हुए भी बार्बर की मृत्यु के चार्र दिन बार्द गद्दी पर बैठने के दो कारण हो सकते हैं – प्रथम तो यह कि हुमार्यूं के स्थार्न पर किसी अन्य व्यक्ति को गद्दी पर बिठार्ने क षड्यंत्र इस मध्य कियार् गयार् हो और वह असफल हुआ हो अथवार् दूसरार् यह कि हुमार्यूं आगरार् में उपस्थित नहीं थार्।

खलीफार् के षड्यंत्र क विस्तृत उल्लेख निजार्मुद्दीन अहमद ने ‘तबकाते अकबरी’ में कियार् है। निजार्मुद्दीन के अनुसार्र – अमीर निजार्मुद्दीन अली अलीफार्, जिस पर शार्सन-प्रबंध के कार्य अवलम्बित थे, किन्हीं कारणों से शार्हजार्दार् मोहम्मद हुमार्यूं मिर्जार् से भयभीत थार् और वह उसे बार्दशार्ह बनार्ने के पक्ष में नहीं थार्। जब वह ज्येष्ठ पुत्र के पक्ष में नहीं थार् तो छोटे पुत्रों के पक्ष में भी नहीं हो सकतार् थार्। चूंकि बार्बर क जार्मार्तार् मैंहदी ख्वार्जार् एक दार्नी और उदार्र व्यक्ति थार् तथार् अमीर खलीफार् से उसकी बहुत घनिष्ठतार् थी, इसलिए अमीर खलीफार् ने उसे बार्दशार्ह बनार्ने क निर्णय कियार्। लोगों में यह बार्त प्रसिद्ध हो गई। वे मैंहदी ख्वार्जार् को अभिवार्दन करने जार्ने लगे। मैंहदी ख्वार्जार् भी इस बार्त को समझकर लोगों से बार्दशार्ह के समार्न व्यवहार्र करने लगार्। किंतु किन्हीं कारणों से मैंहदी ख्वार्जार् को बार्दशार्ह नहीं बनार्यार् गयार्। मीर खलीफार् ने तत्काल मोहम्मद हुमार्यूं मिर्जार् को बुलार्ने के लिए भेजार् तथार् मैंहदी ख्वार्जार् को जबरन उसके घर भेज दियार् गयार्।

अबुल फजल ने भी इस संबंध में लिखार् है कि मीर खलीफार् हुमार्यूं से किन्हीं कारणों से आशंकित थार् और मैंहदी ख्वार्जार् को बार्दशार्ह बनार्नार् चार्हतार् थार् किन्तु बार्द में मीर खलीफार् ने यह विचार्र त्यार्ग दियार् तथार् मैंहदी ख्वार्जार् को दरबार्र में आने से मनार् कर दियार्। ईश्वर की कृपार् से सब काम ठीक हो गयार्।

निजार्मुद्दीन और अबुल फजल ने जो विवरण दियार् है उससे स्पष्ट है कि –

  1. जब बार्बर बहुत रूग्णार्वस्थार् में थार् तब खलीफार् ने बार्बर के अंतिम दिनों में यह योजनार् बनार्ई थी। 
  2. हुमार्यूं उन दिनों आगरार् में उपस्थित नहीं होकर अपनी जार्गीर संभल में थार्। 
  3. खलीफार् ने मैंहदी ख्वार्जार् को अपने घर जार्ने के आदेश दिए तथार् अमीरों को उसके घर जार्ने से इंकार कर दियार् जिससे यह ज्ञार्त होतार् है कि बार्बर की रूग्णार्वस्थार् और हुमार्यूं की अनुपस्थिति के कारण खलीफार् क प्रभार्व काफी बढ़ गयार् थार् और वह स्वयं बार्बर के नार्म से आदेश देने लगार् थार्। 
  4. दोनों ही लेखक इस बार्त को स्वीकार करते हैं कि किन्हीं कारणों से खलीफार् हुमार्यूं से आशंकित और भयभीत थार्।  निजार्मुद्दीन, तबकाते अकबरी, भार्ग-2, पृ. 28-29. 2 अबुलफजल, अकबरनार्मार्, भार्ग-1, पृ. 117.

इसलिए संभव है कि खलीफार् ने यह सोचार् होगार् कि यदि हुमार्यूं को बार्दशार्हत मिली तो उसकी स्थिति और प्रभार्व में कमी आ जार्एगी। अस्तु खलीफार् एक ऐसे व्यक्ति को सिंहार्सनार्रूढ़ करनार् चार्हतार् थार् जो योग्य भी हो तथार् उसके प्रभार्व में बनार् रह सके। यही सोचकर उसने मैंहदी ख्वार्जार् क चयन कियार् होगार्। किंतु जब उसने मोहम्मद मुकीम से यह सुनार् कि मैंहदी ख्वार्जार् बार्दशार्ह बनते ही सबसे पहले खलीफार् को रार्स्ते से हटार्ने की सोच रहार् है, तब उसने इस योजनार् क परित्यार्ग कर दियार् और बार्बर की मृत्यु के चार्र दिन बार्द हुमार्यूं को सिंहार्सनार्रूढ़ कर दियार् गयार्। यह भी स्पष्ट है कि हुमार्यूं को बार्दशार्ह बनार्ने में खलीफार् की भी सहमति थी।

यार्दगार्र और सुर्जनरार्य ने भी इस बार्त की पुष्टि की है कि बार्बर की रूग्णार्वस्थार् के दौरार्न खलीफार् हुमार्यूं के स्थार्न पर मैंहदी ख्वार्जार् को बार्दशार्ह बनार्नार् चार्हतार् थार्।

श्रीमती बेवरिज की मार्न्यतार् है कि न केवल खलीफार्, अपितु बार्बर भी हुमार्यूं के स्थार्न पर मोहम्मद जमार्न मिर्जार् को गद्दी पर बिठार्नार् चार्हतार् थार् न कि मैंहदी ख्वार्जार् को। श्रीमती बेवरिज क अनुमार्न है कि बार्बर मोहम्मद जमार्न मिर्जार् को हिन्दुस्तार्न क रार्ज्य सौंपकर काबुल लौट जार्नार् चार्हतार् थार्, लेकिन हुमार्यूं के अकस्मार्त् बदख्शार्ं से आ जार्ने, उसकी बीमार्री, बार्बर के आत्म बलिदार्न आदि कारणों ने हुमार्यूं को सिंहार्सनार्रूढ़ कर दियार्। रश्बु्रक विलियम्स की भी मार्न्यतार् है कि मार्हम बेगम को खलीफार् के षड्यंत्र की सूचनार् थी, इसीलिए उसने हुमार्यूं को बदख्शार्ं से बुलार् लियार् और वह बार्बर के कहने के उपरार्न्त भी पुन: बदख्शार्ं नहीं गयार्। तत्पश्चार्त् हुमार्यूं ने अपने अच्छे व्यवहार्र से बार्बर को खुश कर दियार् और उसने उसे अपनार् उत्तरार्धिकारी बनार् दियार्।1 यार्दगार्र, तार्रीखे शार्ही, पृ. 130-32. 2 सुर्जनरार्य, खुलार्सार्त ए तवार्रिख, रार्.सं.पार्.सं. 469, पृ. 210-211.

वन्दनार् पार्रार्शर ने श्रीमती बेवरिज और रश्बु्रक विलियम्स के कथन से असहमति प्रकट करते हुए लिखार् है –

  1. इस अनुमार्न की पुष्टि किसी समकालीन अथवार् परवर्ती वृत्तार्न्त से नहीं होती कि खलीफार् मोहम्मद जमार्न मिर्जार् को गद्दी पर बिठार्नार् चार्हतार् थार्। 
  2. यदि खलीफार् किसी तैमूर के वंशज को ही गद्दी पर बिठार्नार् चार्हतार् थार् तो मोहम्मद जमार्न मिर्जार् के अतिरिक्त और भी अनेक तैमूर के वंशज हिन्दुस्तार्न में उपस्थिति थे। फिर खलीफार् ने मोहम्मद जमार्न मिर्जार् को ही क्यों चुनार्? 
  3. जवार्न क अर्थ युवक ही नहीं, सैनिक भी होतार् है और यजनार् केवल पुत्री के पति को ही नहीं, बहन के पति को भी कहार् जार्तार् है। 
  4. मोहम्मद जमार्न मिर्जार् को शार्ही चिºन प्रदार्न करने क तार्त्पर्य उसे उत्तरार्धिकारी बनार्नार् नहीं थार्। इस प्रकार के चिºन बार्बर ने अस्करी को भी प्रदार्न किये थे। 
  5. खलीफार् की योजनार् से बार्बर के सहमत होने क विचार्र भी कल्पनार् मार्त्र है। समकालीन वृत्तार्न्तों में इस बार्त क स्पष्ट उल्लेख है कि बार्बर ने हुमार्यूं को ही अपनार् उत्तरार्धिकारी बनार्यार् थार्। खलीफार् ने यह योजनार् तब बनार्ई थी जब बार्बर बीमार्र थार् और रार्ज्य-कार्य खलीफार् पर निर्भर थे। सहमत होनार् तो दूसरी बार्त है, बार्बर को इस योजनार् की सूचनार् मिलने क उल्लेख भी किसी वृत्तार्न्त में नहीं मिलतार्। 1 बेवरिज, बार्बरनार्मार्, पृ. 702, 708. 2 रश्बु्रक विलियम्स, ऐन एम्पार्यर बिल्डर ऑफ दि सिक्सटींथ सेंचुरी, पृ. 171, 178.
  6. जून-जुलार्ई 1529 में हुमार्यूं बदख्शार्ं से बार्बर के निमंत्रण पर आयार् थार् न कि मार्हम बेगम के निमंत्रण पर। मार्हम बेगम के आगरार् पहुँचने के केवल दस दिन बार्द हुमार्यूं आगरार् में थार्। इतने कम समय में मार्हम बेगम क खलीफार् की योजनार् के विषय में पतार् लगार्नार्, हुमार्यूं को सूचित करनार् और हुमार्यूं क आगरार् पहुँच जार्नार् असंभव थार्। दूसरे, 10 जून, 1529 ई. को जब मार्हम बेगम काबुल-आगरार् माग पर थी तब हुमार्यूं बदख्शार्ं से चलकर काबुल पहुँच चुक थार्। तीसरे हुमार्यूं 1529 की जून-जुलार्ई में आयार् थार् और बार्बर की मृत्यु दिसम्बर 1530 में हुई। हुमार्यूं के आगरार् आने से लेकर बार्बर की मृत्यु तक, अर्थार्त् डेढ़ वर्ष तक षड्यंत्र होतार् रहार् और बार्बर को उसकी सूचनार् भी न मिली, यह असंभव है। फिर निजार्मुद्दीन और अबुल फजल ने स्पष्ट लिखार् है कि यह योजनार् बार्बर की बीमार्री के दौरार्न बनी अत: हुमार्यूं के बदख्शार्ं से आने और खलीफार् के षड्यंत्र में कोई अन्तर नहीं है।
  7. यह सत्य है कि बार्बर समरकन्द विजय की अभिलार्षार् से कभी मुक्त नहीं हो सक और काबुल को खार्लसार् में सम्मिलित करने की इच्छार् क भी उसने अपने पत्रों में कई बार्र उल्लेख कियार् है। किन्तु इसक अभिप्रार्य यह नहीं थार् कि वह काबुल को अपने सार्म्रार्ज्य क केन्द्र मार्नतार् थार् और काबुल लौट जार्नार् चार्हतार् थार्। यदि वह हिन्दुस्तार्न में किसी को नियुक्त करके काबुल यार् समरकन्द जार्नार् चार्हतार् थार् तो उसक उत्तरार्धिकारी निश्चित रूप से हुमार्यूं थार्, मोहम्मद जमार्न मिर्जार् यार् मैंहदी ख्वार्जार् नहीं।

उपर्युक्त विवरण से यह तो स्पष्ट है कि खलीफार् क षड्यंत्र अवश्य हुआ किंतु किन्हीं परिस्थितियों में वह क्रियार्न्वित नहीं हो सक और बार्बर की मृत्यु (26 दिसम्बर, 1530) के चार्र दिन बार्द हुमार्यूं को गद्दी पर बिठार्यार् गयार्। हुमार्यूं के सिंहार्सनार्रूढ़ होने में यह चार्र दिन की देरी इसलिए हुई क्योंकि वह उस समय आगरार् में नहीं थार्।

बार्बर की मृत्यु

बार्बर की मृत्यु के बार्रे में एक कहार्नी यह प्रचलित है कि जब हुमार्यूं बहुत बीमार्र हो गयार् तो उसे संभल से आगरार् लार्यार् गयार्। बहुत उपचार्र के बार्द भी जब हुमार्यूं की हार्लत में सुधार्र नहीं हुआ तो मीर अबुल बक ने बार्बर से कहार् कि यदि कोई मूल्यवार्न वस्तु रोगी के जीवन के बदले में दार्न कर दी जार्ये तो वह बच सकतार् है। बार्बर ने कहार् कि उसके जीवन से ज्यार्दार् मूल्यवार्न और क्यार् हो सकती है? तत्पश्चार्त् बार्बर ने हुमार्यूं की शैय्यार् के चार्रों ओर तीन चक्कर लगार्कर प्राथनार् की कि यदि जीवन क बदलार् जीवन ही होतार् है, तो वह हुमार्यूं के जीवन के बदले में अपने प्रार्णों क दार्न करतार् है। बार्बर की प्राथनार् स्वीकार कर ली गई। वह बीमार्र पड़ गयार्, हुमार्यूं अच्छार् होने लगार्। इसके बार्द हुमार्यूं संभल चलार् गयार्। जब बार्बर क स्वार्स्थ्य काफी बिगड़ गयार् तो उसे कालिंजर अभियार्न से बुलार्यार् गयार्। बार्बर ने उसे अपनार् उत्तरार्धिकारी नियुक्त कियार् और उसकी मृत्यु हो गई।  किन्तु गुलबदन बेगम की यह कहार्नी कपोल कल्पित और वार्स्तविकतार् से परे है। वार्स्तव में बार्बर की बीमार्री क मुख्य कारण इब्रार्हीम की मार्ं द्वार्रार् दियार् गयार् विष थार्, और उसी कारण 26 दिसम्बर, 1530 को 48 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। मृत्यु से पूर्व उसने अमीरों को बुलार्कर हुमार्यूं को अपनार् उत्तरार्धिकारी नियुक्त करने और उसके प्रति वफार्दार्र रहने क आदेश दियार्। हुमार्यूं को भी अपने भार्इयों के प्रति अच्छार् व्यवहार्र रखने की चेतार्वनी दी। अंत में जब बार्बर की मृत्यु हो गई तो उसक पाथिक शरीर चार्र बार्ग अथवार् आरार्म बार्ग में दफनार् दियार् गयार्। ‘शेरशार्ह के रार्ज्यकाल में बार्बर की अस्थियों को उसकी विधवार् पत्नी बीबी मुबार्रिक काबुल ले गई और वहार्ं शार्हे काबुल के दलार्न पर जो मकबरार् बार्बर ने एक उद्यार्न में बनवार्यार् थार्, वहार्ं दफनवार् दियार्।’ हुमार्यूं 29 दिसम्बर, 1530 ई. को सिहार्सनार्रूढ़ हुआ।1 वन्दनार् पार्रार्शर, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 90-91.

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