फ्रार्यड क मनोविश्लेषणार्त्मक सिद्धार्न्त

मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में सिगमण्ड फ्रार्यड के नार्म से प्रार्य: सभी लोग परिचित है। फ्रार्यड ने व्यक्तित्व के जिस सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्, उसे व्यक्तित्व क मनोविश्लेषणार्त्मक सिद्धार्न्त कहार् जार्तार् है। फ्रार्यड क यह सिद्धार्न्त उनके लगभग 40 सार्ल के वैदार्निक अनुभवों पर आधार्रित है। क्यार् आप जार्नते हैं कि व्यक्तित्व क अध्ययन करने वार्लार् सर्वप्रथम उपार्गम कौन सार् है? आपकी जार्नकारी के लिये बार्तार् दें कि सबसे पहले मनोविश्लेषणार्त्मक उपार्गम के आधार्र पर व्यक्तित्व को जार्नने समझने क प्रयार्स कियार् गयार्। फ्रयड क सिद्धार्न्त इसी उपार्गम पर आधार्रित है।

किसी भी सिद्धार्न्त को ठीक प्रकार से जार्नने के लिये यह आवश्यक है कि उसकी मूल मार्न्यतार्यें बचार् है? फ्रार्यड की भी मार्नवीय स्वभार्व के बार्रे में कुछ व् पूर्वकल्पनार्यें हैं, जिनको जार्नने से उनके व्यक्तित्व सिद्धार्न्त को समझने में काफी मदद मिल सकती है। ये पूर्व कल्पनार्यें नियमार्नुसार्र हैं-

हम फ्रार्यड के व्यक्तित्व सिद्धार्न्त क अध्ययन निम्नार्ंकित बिन्दुओं के अन्तर्गत कर सकते हैं-

  1. व्यक्तित्व की संरचनार्
  2. व्यक्तित्व की गतिकी 
  3. व्यक्तित्व क विकास 

सबसे पहले हम चर्चार् करते हैं फ्रार्यड के व्यक्तित्व की संरचनार् संबंधी विचार्रों पर।  

व्यक्तित्व की संरचनार् 

फ्रार्यड ने व्यक्तित्व की संरचनार् क वर्णन निम्नार्ंकित दो मॉडलों के आधार्र पर कियार् है- (अ) आकारार्त्मक मॉडल (ब) गत्यार्त्मक यार् संरचनार्त्मक मॉडल इन दोनों में से सबसे पहले हम आकारार्त्मक मॉडल को समझने क प्रयार्स करते हैं- 

1. आकारार्त्मक मॉडल- 

आप सोच रहे होंगे कि मन के आकारार्त्मक मॉडल से क्यार् आशय है? फ्रार्यड के अनुसार्र आकारार्त्मक मॉडल गव्यार्त्मक शक्तियों में हार्ने वार्ले संबंधों क एक कार्यस्थल होतार् है? इसके तीन तरह हैं-

  1. चेतन- चेतन मन में से समस्त अनुभव। इच्छार्यें, प्रेरणार्यें, संवेदनार्यें आती हैं। किनक सम्बन्ध वर्तमार्न समय से होतार् है और जिसमें व्यक्तित्व जार्ग्रतार्वस्थार् में होतार् है। अत: केवल वर्तमार्न संबंध होने के कारण चेतन मन व्यक्तित्व के अत्यन्त सीमित पहलू क प्रतिनिधित्व करतार् है।
  2. अर्द्धचेतन- यह चेतन एवं अचेतन के मध्य की स्थिति है। इस अवस्थार् में व्यक्तित्व न तो पूरी तरह जार्ग्रत अर्थार्त् चेतन होतार् है। और न ही पूरी तरह से अचेतनार् फ्रार्यड क मार्ननार् है कि अद्धचेतन मन में ऐसी इच्छार्एं, भार्वनार्यें एवं अनुभूतियार्ं आती हैं, किन्तु प्रयार्स करने पर चेतन स्तर पर आ जार्ती है। अवचेतन मन को सुलभस्मृति के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। उदार्हरण- जैसे कि कोर्इ व्यक्ति अपनार् चश्मार् यार् अन्य कोर्इ वस्तु रखकर भूल जार्तार् है। कुछ समय तक सोचने के बार्द उसे यार्द आतार् है कि वह चश्मार् यार् वस्तु तो उसके उदार्हरण में आप देखिये कि व्यक्ति को प्रार्रंभ में यार्द नहीं आत है कि अचुक वस्तु उसने कहीं रखी है अर्थार्त् वह स्मृति अभी चेतनमन के स्तर पर नहीं है, किन्तु कुछ समय के बार्द उसे स्मरण हो आतार् है कि वह चीज उसने यहार्ं पर रखी है। इस प्रकार वह स्मृति चेतन मन क एक अच्छार् उदार्हरण है। 
  3. अचेतन- अचेतन शब्द, चेतन के ठीक विपरीत है अर्थार्त् जो चेतनार् से परे हो, वह अचेतन है। फ्रार्यड ने व्यक्तित्व के आकारार्त्मक मॉडल में चेतन एवं अर्द्धचेतन की तुलनार् में अचेतन को कहीं अधिक महत्वपूर्ण मार्नार् है। उनके अनुसार्र मनुष्य क व्यवहार्र अचेतन अनुभूतियार्ं अच्छार्ओं एवं प्रेरणार्ओं से ही सर्वार्धिक प्रमार्णित होतार् है। फ्रार्यड की यह भी मार्न्यतार् है कि अचेतन में जो भी इच्छार् है, विचार्र, अनुभव एवं प्रेरणार्यें होती हैं। उनक स्वरूप कामुक, अनैतिक,घृणित एवं आसार्मार्जिक होतार् है। कहने के आशय यह है कि नैतिक दबार्व अथवार् सार्मार्जिक दबार्व इत्यार्दि के कारण अपनी कुछ इच्छार्ओं की पूर्ति व्यक्ति चेतन में नहीं कर पार्तार् है। अत: ऐसी इच्छार्एं चेतन स्तर पर निष्क्रिय होकर अचेतन मन में दमित हो जार्ती है और मार्नवीय व्यवहार्र को निरन्तर प्रभार्वित करती रहती है। इसी के परिणार्म स्वरूप व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के मनोरोगों क सार्मनार् करनार् पड़तार् है। 
    1. 2. गव्यार्त्मक यार् संरचनार्त्मक मॉडल-  

    आकारार्त्मक मॉडल को जार्नने के बार्द अब आपके मन में गत्यार्त्मक भी संरचनार्त्मक मॉडल के बार्रे में जार्नने की जिज्ञार्सार् उत्पन्न हो रही होगी। फ्रार्यड क मत है कि मूल प्रवृतियों से उत्पन्न मार्नसिक संघर्षों क समार्धार्न जिन सार्धनों के द्वार्रार् होतार् है। वे सभी गत्यार्त्मक यार् संरचनार्त्मक मॉडल के अन्तर्गत आते हैं। फ्रार्यड के अनुसार्र ऐसे सार्धन तीन हैं- 1. उपार्हं 2. अहं 3. परार्हं

    1.  उपार्हं- 
      1. यह व्यक्तित्व क जैविक तत्व है। इसमें व्यक्ति की जन्मजार्त प्रवृत्तियार्ं होती हैं। 
      2. उपार्हं आनन्द सिद्धार्न्त के आधार्र पर कार्य करतार् है। इनक आशय यह है कि इसमें केवल ऐसी प्रसवृत्तियार्ं होती हैं जिनक मुख्य उद्देश्य सुख प्रार्प्त करनार् होतार् है। अत: इन प्रवृत्तियों क उचित अनुचित विवेक- अविवेक इत्यार्दि से कोर्इ भी संबंध नहीं होतार् है। 
      3. उपार्हं की प्रवृत्तियार्ं क गुण, असंगठित आक्रार्मकतार् युक्त तथार् नियम-कानून इत्यार्दि को नहीं मार्नने वार्ली होती हैं। 
      4. उपार्हं पूरी तरह से अचेतन होतार् है। इसलिये वार्स्तविकतार् यार् यथाथ से इसक कोर्इ संबंध नहीं होतार् है? 
      5. एक छोटे बच्चे में उपार्हं की प्रवृत्तियार्ं होती हैं। 
        1. अहं- 
          1. अहं व्यक्तित्व के संरचनार्त्मक मॉडल क दूसरार् महत्वपूर्ण पहलू है। 
          2. यह वार्स्तविकतार् सिद्धार्न्त के आधार्र पर कार्य करतार् है अर्थार्त् इसक संबंध वार्तार्वरण की वार्स्तविकतार् के सार्थ होतार् है। 
          3. जन्म के कुछ समय बार्द जब नैतिक एवं सार्मार्जिक नियमों के कारण व्यक्ति की सभी इच्छार्ओं की पूर्ति नहीं हो पार्ती है, तो उनमें निरार्शार्वार्दी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है और उसक परिचय वार्स्तविकतार् से होतार् है। 
          4. परिणार्म स्वरूप उसमें अहं क विकास होतार् है। अहं को व्यक्तित्व क निर्णय लेने वार्लार् पहलू मार्नार् गयार् है। 
          5. अहं आंशिक रूप से चेतन आंशिक रूप से अवचेतन यार् अर्द्धचेतन तथार् आंशिक रूप से अचेतन होतार् है। इसलिये अहं द्वार्रार् मन के तीनों स्तरों पर ही निर्णय लियार् जार्तार् है। 
            1. परार्हं- 
              1. अहं के बार्द गत्यार्त्मक मॉडल क तीसरार् महत्वपूर्ण पहलू है परार्हं। 
              2. सच्चार् जैसे-जैसे अपने जीवन के विकासक्रम में आगे बढ़तार् जार्तार् है, वैसे-वैसे उसक दार्यरार् बढ़ने लगतार् है। उसक अपने मार्तार्-पितार् से तार्दार्त्म्य, जुड़ार्व स्थार्पित होतार् है। परिणार्म स्वरूप वह जार्ननार् शुरू करतार् है कि क्यार् गलत है और क्यार् सही? क्यार् उचित है? क्यार् अनुचित/इस प्रकार उसमें परार्हं विकसित होतार् है। 
              3. अहं के समार्न परार्हं भी आंशिक रूप से चेतन अर्द्धचेतन एवं अचेतन अर्थार्त् तीनों होतार् है।
              4.  परार्हं आदर्शवार्दी सिद्धार्न्त द्वार्रार् नियंत्रित होतार् है अर्थार्त् यह नैतिकतार् पर आधार्रित होतार् है। 
              5. इस प्रकार आपने जार्नार् कि फ्रार्यड के अनुसार्र व्यक्तित्व की संरचनार् क्यार् है अर्थार्त् व्यक्तित्व किन-किन हार्टकों से मिलकर बनार् है। अब चर्चार् करते हैं, व्यक्तित्व की गति के विषय में। 

                व्यक्तित्व की गतिकी- 

          व्यक्तित्व की गतिकी क आशय है- व्यक्तित्व में उर्जार् क स्त्रोत क्यार् है? यह उर्जार् कहार्ं से प्रार्प्त होती है तथार् समय-समय पर व्यक्तित्व में किस प्रकार से परिवर्तन होते हैं। फ्रार्यड के अनुसार्र मनुष्य एवं शार्रीरिक एवं मार्नसिक दोनों ही प्रकार की उपार्धि होती है। जिनक मुख्य स्त्रोत यौन उर्जार् है। चलनार्, दौड़नार्, लिखनार् इत्यार्दि कार्य करने में शार्रीरिक उर्जार् तथार् सोचनार्, तर्क करनार्, निर्णय लेनार्, समस्यार् क समार्धार्न करनार् इत्यार्दि में मार्नसिक उर्जार् काम में आती है। फ्रार्यड ने व्यक्तित्व के कुछ गत्यार्त्मक पहलू बतार्ये हैं, जो निम्न हैं- 1. मूलप्रवृत्ति 2. चिन्तार् 3. मनोरचनार्यें इनक वर्णन  है- 

          1. मूलप्रवृत्ति- 

          मूलप्रवृत्ति से फ्रार्यड क आशय है- जन्मजार्त शार्रीरिक उत्तेजनार् यही मूल प्रवृत्ति के समस्त व्यवहार्र की निर्धार्रक होती है। इन मूलप्रवृत्तियों को फ्रार्यड ने निम्न दो श्रेणियों में वर्गीकृत कियार् है- (1) जीवनमूल प्रवृत्ति (इरोस) (2) मृत्यु मूल प्रवृत्ति (थैनार्टोस)

          1. जीवनमूल प्रवृत्ति- जीवन मूलप्रवृत्ति के कारण व्यक्ति की प्रवृत्ति रचनार्त्मक कार्यों में होती है। वह नये-नये अर्थार्त् मौलिक और अच्छे-अच्छे कार्य करने के लिये प्रेरित होतार् है। रचनार्त्मक कार्यों में मार्नवजार्ति क प्रजनन भी शार्मिल है। यहार्ं पर ध्यार्न देने योग्य बार्त यह है कि फ्रार्यड ने अपने पूरे सिद्धार्न्त में ‘‘यौन मूल प्रवृत्ति’’ पर सर्वार्धिक बल डार्लार् है। फ्रार्यड के अनुसार्र यौन उर्जार् व्यक्तित्व विकास के लिए अत्यधिक आवश्यक है।
          2. यौन मूलप्रवृत्ति (थैनार्टोस)- इस प्रवृत्ति के कारण हिंसार्त्मक एवं आक्रार्मक व्यवहार्र करतार् है। उसकी प्रवृत्ति विध्वंसार्त्मक कार्यों की ओर होती है। 
            1. 2. चिन्तार्- 

            व्यक्तित्व क दूसरार् गत्यार्त्यक पहलू है-’’चिन्तार्’’। फ्रार्यड के अनुसार्र चिन्तार् क अर्थ है- ‘‘एक दु:खद भार्वनार्त्मक अवस्थार्’’। यह चिन्तार् व्यक्ति के अहं में भविष्य के खतरे के प्रति सतर्क एवं सार्वधार्न करतार् है, जिसके कि व्यक्ति अपने परिवेश के प्रति सार्मार्न्य एवं अनुकूली व्यवहार्र हो सके तथार् वह वार्तार्वरण के सार्थ समार्योजन कर सके। फ्रार्यड ने चिन्तार् के निम्न तीन प्रकार बतलार्ये हैं-

            1. वार्स्तविक चिन्तार्- वार्स्तविक चिन्तार् क अर्थ है- ‘‘बार्हरी वार्तार्वरण में विद्यमार्न वार्स्तविक खतरे के प्रति की गर्इ सार्ंवेगिक अनुक्रियार्।’’ इस प्रकार की चिन्तार् इसलिये उत्पन्न होती है, क्योंकि अहं कुछ हद तक बार्हृय वार्तार्वरण पर निर्भर होतार् है। उदार्हरण- भूकंप, आँधी-तूफार्न, शेर इत्यार्दि से डर उत्पन्न होकर चिन्तित होनार् वार्स्तविक चिन्तार् के उदार्हरण है। 
            2. तंत्रिकातार्पी चिन्तार्- इस प्रकार की चिन्तार् के उत्पन्न होने क कारण है- अहं क उपार्हं की इच्छार्ओं पर निर्भर होनार्। उदार्हरण- जैसे व्यक्ति क यह सोचकर चिंतार्ग्रस्त हो जार्नार् कि क्यार् अहं, उपार्हं की यौन इच्छार्ओं, आक्रार्मक एवं हिंसार्त्मक इच्छार्ओं को नियंत्रित करने में सक्षम हो पार्येगार्
            3. नैतिक चिन्तार्- अहं की परार्हं पर निर्भरतार् के कारण व्यक्ति में नैतिक चिन्तार् उत्पन्न होती है। कहने क तार्त्पर्य यह है कि जब अहं, उपार्हं की अनैतिक इच्छार्ओं को कार्यरूप दे देतार् है, तो उसे परार्हं से दण्डित होने की धमकी मिलती है। इससे वह नैतिक रूप से चिन्तार्ग्रस्त हो जार्तार् है तथार् उसमें दोषभार्ष, शर्म इत्यार्दि की भार्वनार् उत्पन्न हो जार्ती है। यदि हम सार्मूहिक रूप से देखें तो ये तीनों प्रकार की चिन्तार्यें एक दूसरे से संबंधिक है तथार् एक प्रकार की चिन्तार् दूसरे प्रकार की चिन्तार् को जन्म देती हैं। 
              1. 3. मनोरचनार्यें यार् अहंरक्षार्त्मक प्रक्रम- 

              जब व्यक्ति के अन्दर अनेक प्रकार की चिन्तार्यें उत्पन्न होने लगती है तो वह इन चिन्तार्ओं से छुटकारार् पार्ने के लिये अहं रक्षार्त्मक प्रक्रमों के संप्रत्यय क प्रतिपार्दन तो फ्रार्यड द्वार्रार् कियार् गयार्, किन्तु इसकी सूची को पूरार् करने क कार्य उनकी पुडी अन्नार् फ्रार्यड एवं दूसरे नव-फ्रार्यडियनों द्वार्रार् कियार् गयार्। एक सीमार् तक इन रक्षार्त्मक प्रक्रमों क प्रयोग करनार् ठीक है, किन्तु इनके लगार्तार्र तथार् अधिक प्रयोग के कारण व्यक्ति के मन में अनेक प्रकार के मनोरोग जन्म लेने लगते हैं। अहं रक्षार्त्मक प्रक्रमों की विशेषतार्यें- फ्रार्यड के मतार्नुसार्र इन रक्षार्त्मक प्रक्रमों की दो मुख्य विशेषतार्यें हैं, जो हैं-

              1. अचेतन स्तर पर कार्य करने के कारण प्रत्येक रक्षार्त्मक प्रक्रम ‘‘आत्म-भ्रार्मक’’ होतार् है। 
              2. ये वार्स्तविकतार् के प्रत्यक्षण को विकृत कर देते हैं अर्थार्त् व्यक्ति पूर्णत: यथाथ परिस्थिति से रूबरू नहीं हो पार्तार्। इसलिये व्यक्ति अपेक्षार्कृत कम चिन्तित होतार् है। कुछ प्रमुख रक्षार्त्मक प्रक्रमों के नार्म निम्नार्ंकित हैं-
                1. दमन 
                2. विस्थार्पन 
                3. प्रक्षेपण 
                4. प्रतिगमन 
                5. प्रतिक्रियार् निर्मार्ण 
                6. यौक्ति की करण 

              इस प्रकार स्पष्ट है कि रक्षार्त्मक प्रक्रम व्यक्ति को चिन्तार् एवं तनार्व से कुछ हद तक बचार्ते हैं तथार् एक सीमार् तक प्रार्य: सभी स्वस्थ व्यक्ति इनक प्रयोग करते हैं तथार् इनक उपयोग करने में मनोवैज्ञार्निक ऊर्जार् लगती है। 

              व्यक्तित्व क विकास- 

              फ्रार्यड ने व्यक्तित्व विकास को ‘‘मनोलैंगिक विकास’’ की संज्ञार् दी है तथार् इस विकास के पार्ँच चरण यार् अवस्थार्यें बतार्यी है इनमें से प्रत्येक अवस्थार् क विवरण निम्नार्नुसार्र है- 

              1. मुखार्वस्थार्- 

              1.  मनोलैंगिक विकास की यह प्रथमार्वस्थार् है। यह व्यक्ति के जन्म से लेकर लगभग 1 सार्ल की आयु तक होती है। 
              2. फ्रार्यड के अनुसार्र इस चरण में व्यक्ति क व्यार्मुकतार् क्षेत्र मुँह होतार् है अर्थार्त- मुँह के मार्ध्यम से वह कामुक क्रियार्यें करतार् है। जैसे- चूसनार्, निगलनार्, जबड़े यार् दार्ँत निकल आने पर दबार्नार्, काटनार् इत्यार्दि। 
                1. 2. गुदार्वस्थार्- 

                  1. व्यक्तित्व विकास की यह दूसरी अवस्थार् 2 से 3 सार्ल की उम्र के बीच होती है। 
                  2. इस अवस्थार् में व्यक्ति क कामुकतार् क्षेत्र गुदार् होतार् है। फ्रार्यड के करने क अर्थ यह है कि इस उम्र में बच्चार् मुल-मूत्र त्यार्गकर कामुक क्रियार्ओं क आनंद उठार्तार् है। 
                    1. 3. लिंग प्रधार्नार्वस्थार्- 

                      1. यह व्यक्तित्व विकास की तीसरी अवस्थार् है, 4 से 5 सार्ल की उम्र के बीच की अवस्थार् है। 
                      2. इसमें कामुकतार् क क्षेत्र जननेन्द्रिय होते हैं। 
                        1. 4. अव्यवक्तार्वस्थार्- 

                          1. यह अवस्थार् 6 से 7 सार्ल की उम्र से आरंभ होकर 12 वर्ष की आयु तक बनी रहती है। 
                          2. इस अवस्थार् में कोर्इ नयार् कामुकतार् क्षेत्र उत्पन्न नहीं होतार् है। 
                          3. लैंगिक इच्छार्यें सुषुप्त हो जार्ती है और इनकी अभिव्यक्ति अनेक प्रकार की अलैंगिक क्रियार्ओं के मार्ध्यम से होती है। उदार्हरण के तौर पर हम पढ़ाइ, चित्रकारी, संगीत नृत्य, खेल इत्यार्दि को ले सकते हैं। 
                            1. 5.  जननेन्द्रियार्वस्थार्- 

                              1. मनोलैंगिक विकास के इस चरण में किशोरार्वस्थार् एवं प्रौढ़ार्वस्थार् यार् वयस्यार्वार्स्थार् दोनों को ही शार्मिल कियार् गयार् है। 
                              2. यह 13 वर्ष की उम्र से प्रार्रंभ होती है और निरन्तर चलती ही रहती है। 
                              3. फ्रार्यड के अनुसार्र इस अवस्थार् में व्यक्ति के शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन होते हैं। जैसे की हामोन्स में परिवर्तन होनार् और इनके अनुसार्र शरीर में भी किशोरार्वस्थार् के अनेक लक्षण दिखार्यी देने लगते है। 
                              4. फ्रार्यड के अनुसार्र इस अवस्थार् के प्रार्रंभिक वषो्र में अर्थार्त् किशोरार्वस्थार् में व्यक्ति में अपने ही लिंग के व्यक्तियों के सार्थ सम्पर्क बनार्ये रखने की प्रवृत्ति अधिक होती है। जैसे लड़कियों में लड़कियों के सार्थ रहने की तथार् लड़कों में लड़कों के सार्थ रहने की प्रवृत्ति अधिक रहती है। 
                              5. किन्तु जब व्यक्ति किशोरार्वस्थार् से वयस्कावस्थार् में प्रवेश करतार् है तो उसमें ‘‘विषमलिंग कामुकतार्’’ की प्रवृत्ति विकसित होने लगती है अर्थार्त- वह अपने से विपरीत लिंग के व्यक्तियों के सार्थ उठतार्-बैठतार् है, बार्तचीत करतार् है, अपनार् समय व्यतीत करतार् है। 
                              6. इस अवस्थार् में व्यक्ति क व्यक्तित्व हर दृष्टि से परिपक्व होतार् है। जैसे- कि सार्मार्जिक, शार्रीरिक, मार्नसिक दृष्टि से। 
                              7. इसी अवस्थार् में व्यक्ति विवार्ह जो कि समार्ज द्वार्रार् मार्न्य एवं अनुमोदित प्रथार् है। उसको अपनार्कर एक सन्तोषजनक जीवन की ओर अपने कदम बढ़ार्तार् है। 
                                1. उपर्युक्त विवेचन से आप मनोलैंगिक विकास की सभी अवस्थार्ओं को समझ गये होंगे। फ्रार्यड क मार्ननार् है कि प्रत्येक अवस्थार् में व्यक्ति की लैंगिक ऊर्जार् क क्रमश: विकास होतार् है, जिसके कारण विकास की अंतिम अवस्थार् में वह सक्रिय होकर उपयोगी एवं सन्तोषजनक जीवनयार्पन करतार् है। 

                        फ्रार्यड के सिद्धार्न्त क मूल्यार्ंकन – 

                        जैसार् कि आप जार्नते हैं कि मूल्यार्ंकन में किसी भी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति अथवार् सिद्धार्न्त के गुण एवं दोष की समीक्षार् की जार्ती है। फ्रार्यड के व्यक्तित्व सिद्धार्न्त में भी कुछ गुण है और कुछ इसकी सीमार्यें हैं, जिनको हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं- 

                         गुण- 

                        1. विस्तृत एवं चुनौतीपूर्ण सिद्धार्न्त- फ्रार्यड ने काफी व्यार्पक ढंग से व्यक्तित्व क अध्ययन कियार् है। उन्होंने प्रार्य: व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू को समझार्ने की भरपूर कोशिश की है। 
                        2.  बोधगम्य भार्षार्- फ्रार्यड ने व्यक्तित्व के विकास को बहुत ही आसार्न भार्षार् में समझार्ने की कोशिश की है। फ्रार्यड क मार्ननार् है कि एक स्वस्थ व्यक्तित्व में जीवन एवं मृत्यु मूलप्रवृत्तियों में एक प्रकार क समन्वय एवं सार्मंजस्य पार्यार् जार्तार् है तथार् इससे अर्थार्त् जीवन मूल प्रवृत्ति थेनार्टोस अर्थार्त् मृत्युमूलप्रवृत्ति की तुलनार् में अधिक सक्रिय एवं प्रधार्न होती है। 

                        दोष – 

                        आलोचकों ने निम्न आधार्रों पर फ्रार्यड के सिद्धार्न्त की आलोचनार् की है  

                        1. वैज्ञार्निक विधि क अभार्व – आलोचकों क मत है कि फ्रार्यड ने अपने शोध कार्यो को सुव्यवस्थत एवं क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत नहीं कियार् है जो किसी भी सिद्धार्न्त की वैज्ञार्निकतार् के लिये अत्यधिक आवश्यक है। 
                        2. लैंगिक उर्जार् पर आवश्यकतार् से अधिक बल देनार् – फ्रार्यड के सिद्धार्न्त की सबसे कड़ी आलोचनार् इस आधार्र पर की जार्ती है कि उन्होंने अपने पूरे सिद्धार्न्त में एकमार्त्र लैंगिक उर्जार् को ही आधार्रभूत इकार्इ मार्नार् है और आवश्यकतार् से अधिक इसके महत्व को स्वीकार कियार् है। 
                        3. मनोरोगियों की अनुभूतियों पर आधार्रित – फ्रार्यड क सिद्धार्न्त एक तो उनके अपने व्यक्तिगत अनुभवों और इसके उन मनोरोगियों के अनुभवों पर आधार्रित है, जो उनके यहार्ँ उपचार्र के लिये आते थे। आलोचकों क कहनार् है कि किस सिद्धार्न्त की नींव ही मनोरोगियों की अनुभूतियों पर टिकी है। उसे सार्मार्न्य व्यक्तियों पर कैसे लार्गू कियार् जार् सकतार् है। 

                        इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से आप जार्न गये हैं कि फ्रार्यड के सिद्धार्न्त क क्यार् महत्व है और उसमें क्यार्-क्यार् कमियार्ँ है। उनके कमियार्ँ होने के बार्वजूद भी व्यक्तित्व मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में फ्रार्यड के मनोविश्लेषणार्त्मक सिद्धार्न्त क अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थार्न है। 

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