प्रार्गैतिहार्सिक संस्कृति

प्रार्गैतिहार्सिक काल 

प्रार्गैतिहार्सिक शब्द प्रार्ग+इतिहार्स से मिलकर बनार् है जिसक शार्ब्दिक अर्थ है- इतिहार्स से पूर्व क युग । मार्नव प्रगति की कहार्नी के उस भार्ग को इतिहार्स कहते है जिसके लिये लिखित वर्णन मिलते है । परन्तु लेखन-कलार् के विकास के पहले भी मार्नव लार्खों वर्षो तक पृथ्वी पर जीवन व्यतीत कर चुक थार् । इस काल में वह लिखने की कलार् से पूर्णतयार् अपरिचित थार् । यह लम्बार् अतीत काल जब मनुष्य ने घटनार्ओं क कोर्इ लिखित वर्णन नहीं रखार् ‘प्रार्क्र इतिहार्स’ यार् प्रार्गैतिहार्सिक काल कहार् जार्तार् है । प्रार्गैतिहार्सिक भार्रत को निम्नलिखित भार्गों में विभक्त कियार् गयार् है :-

  1.  पूर्व पार्षार्ण काल
  2.  मध्य पार्षार्ण काल
  3.  उत्तर पार्षार्ण काल
  4. धार्तु पार्षार्ण काल

पूर्व पार्षार्ण काल- 

पूर्व पार्षार्ण कालीन सभ्यतार् के केन्द्र दक्षिण भार्रत में मदुरार् त्रिचनार्पल्ली, मैसूर, तंजौर आदि क्षेत्रों में इस सभ्यतार् के अवशेष मिले है । इस समय मनुष्य क प्रार्रंभिक समय थार्, इस काल में मनुष्य और जार्नवरों में विशेष अन्तर नहीं थार् । पूर्व पार्षार्ण कालीन मनुष्य कन्दरार्ओं, गुफार्ओं, वृक्षो आदि में निवार्स करतार् थार् । पूर्व पार्षार्ण कालीन मनुष्य पत्थरों क प्रयोग अपनी रक्षार् के लिये करतार् थार् । कुल्हार्ड़ी और कंकड के औजार्र सोहन नदी की घार्टी में मिले है । सोहन नदी सिंधु नदी की सहार्यक नदी है। उसके पत्थर के औजार्र सार्धार्रण और खुरदुरे थे । इस युग में मार्नव शिकार व भोजन एकत्र करने की अवस्थार् में थार् । खार्नार्बदोश जीवन बितार्तार् थार् और उन जगहों की तलार्श में रहतार् थार्, जहॉं खार्नार् पार्नी अधिक मार्त्रार् में मिल सके ।

मध्य पार्षार्ण काल- 

मध्य पार्षार्ण काल में पत्थर के औजार्र बनार्यें जार्ने लगे इस काल में कुल्हार्डियों के अलार्वार्, सुतार्री, खुरचनी और बार्ण आदि मिले है । इस काल में मिट्टी क प्रयोग होने लगार् थार् । पत्थरों में गोमेद, जेस्पर आदि क प्रयोग होतार् थार् । इस काल के अवशेष सोहन नदी, नर्मदार् नदी और तुगमद्रार् नदी के किनार्रे पार्ये गये ।

उत्तर पार्षार्ण काल- 

हजार्रों वर्षो तक पवूर् पार्षार्ण कालीन जीवन व्यतीत करने के बार्द धीरे-धीरे मार्नव सभ्यतार् क विकास हुआ व उत्तर पार्षार्ण काल क प्रार्रम्भ हुआ । इस काल में भीमार्नव पार्षार्णो क ही प्रयोग करतार् थार्, किन्तु इस काल में निर्मित हथियार्र पहले की अपेक्षार् उच्च कोटि के थे । पार्षार्ण काल क समय मार्नव जीवन के लिये विशेष अनुकूल थार् । इस काल के मनुष्य अधिक सभ्य थे । उनक जीवन सुख मय हो गयार् थार् । उन्होंने पत्थर व मिट्टी को जोड़कर दीवार्रे व पेड़ की शार्खार्ओं व जार्नवरों की हड्डियों से छतों क निर्मार्ण कियार् एवं समूहों में रहनार् प्रार्रम्भ कर दियार् । मिट्टी के बर्तन, वस्त्र बुननार् आदि प्रार्रम्भ कर दियार् । हथियार्र नुकीले सुन्दर हो गये। इस काल के औजार्र सेल्ट, कुल्हार्ड़ियार्ँ, छेनियार्ँ, गदार्यें, मूसलार्, आरियार्ँ इत्यार्दि थे । उत्तर पार्षार्ण कालीन लोग पत्थर को रगड़कर आग जलार्ने व भोजन पकाने की कलार् जार्नते थे । इस काल में धामिक भार्वनार्यें भी जार्गृत हुर्इ । प्रार्कृतिक पूजार् वन, नदी आदि की करते थे ।

नवपार्षार्ण युग में मार्नव को खेती-बार्ड़ी क ज्ञार्न थार् । वह पशुपार्लन भी करतार् थार्। वह उच्च स्तर के चिकने औजार्र बनार्तार् थार् । इस युग में मार्नव कुम्हार्र के चार्क क उपयोग भी करतार् थार् । इस परिवर्तन और उन्नति को ‘‘नवपार्षार्णार् क्रार्न्ति’’ भी कहार् जार्तार् है ।

उत्तर पार्षार्ण काल

धार्तु युग – 

धार्तु यगु मार्नव सभ्यतार् के विकास क द्वितीय चरण थार् । इस युग में मनुष्य ने धार्तु के औजार्र तथार् विभिन्न वस्तुयें बनार्नार् सीख लियार् थार् । इस युग में सोने क पतार् लगार् लियार् थार् एवं उसक प्रयोग जेवर के लिये कियार् जार्ने लगार् । धार्तु की खोज के सार्थ ही मार्नव की क्षमतार्ओं में भी वृद्धि हुर्इ । हथियार्र अधिक उच्च कोटि के बनने लग गये । धार्तुकालीन हथियार्रों में चित्र बनने लगे। इस युग में मार्नव ने धार्तु युग को तीन भार्गों में बार्ंटार् गयार्:-

  1. तार्म्र युग
  2. कांस्य युग
  3. लौह युग

तार्म्र युुग- इस युग में तार्बें क प्रयोग प्रार्रम्भ हुआ । पार्षार्ण की अपेक्षार् यह अधिक सुदृढ़ और सुविधार्जनक थार् । इस धार्तु से कुल्हार्ड़ी, भार्ले, तलवार्र तथार् आवश्यकतार् की सभी वस्तुयें तॉबे से बनाइ जार्ने लगी । कृषि कार्य इन्ही औजार्रों से कियार् जार्ने लगार् ।

कांस्य युग:- इस यगु में मार्नव ने तार्ंबार् और टिन मिलार्कर एक नवीन धार्तु कांसार् बनार्यार् जो अत्यंत कठोर थार् । कांसे के औजार्र उत्तरी भार्रत में प्रार्प्त हुये इन औजार्र में चित्र भी थे । अनार्ज उपजार्ने व कुम्हार्र के चार्क पर बर्तन बनार्ने की कलार् सीख ली थी । वह मार्तृ देवी और नर देवतार्ओं की पूजार् करतार् थार् । वह मृतकों को दफनार्तार् थार् और धामिक अनुष्ठार्नों में विश्वार्स करतार् थार् । तार्म्र पार्षार्ण काल के लोग गार्ंवों में रहते थे ।

लौह युग-दक्षिण भार्रत में उत्तर पार्षार्ण काल के उपरार्न्त ही लौह काल प्रार्रम्भ हुआ। लेकिन उत्तरी भार्रत में तार्म्रकाल के उपरार्न्त लौह काल प्रार्रम्भ हुआ । इस काल में लोहे के अस्त्र शस्त्रों क निर्मार्ण कियार् जार्ने लगार् । तार्म्र पार्षार्ण काल में पत्थर और तार्ंबे के औजार्र बनार्ये जार्ते थे । 

प्रार्गैतिहार्सिक कलार्- 

प्रार्गैतिहार्सिक कलार् क पहलार् प्रमार्ण 1878 में इटली और फ्रार्ंस में मिलार्। भार्रत में प्रार्गैि तहार्सिक गुफार्एं  जिनकी चट्टार्नों पर चित्रकारी की हुर्इ है, आदमबेटका, भीमबेटका, महार्देव, उत्तरी कर्नार्टक और आन्ध्र प्रदेश के कुछ भार्गों में पाइ जार्ती है । दो पत्थर की चट्टार्न जो चित्रित है, बुर्जहोम में भी पाइ गर्इ । इस समय के चित्र प्रतिदिन के जीवन से सम्बन्धित थे । हार्थी, चीतार्, गैंडार् और जंगली सूअर के चित्र मिले, जिन्हें लार्ल, भूरे और सफेद रंगो क प्रयोग करके दिखार्यार् गयार् है । कुछ चित्रों को चट्टार्नों को खुरेद कर बनार्यार् गयार् है। प्रार्गैतिहार्सिक काल के चित्र शिकार के है, जिनमें पशुओं की आकृति एवं शिकार करते हुये दिखार्यार् गयार् है ।

प्रार्गैतिहार्सिक कलार्

आरम्भिक पुरार्पार्षण युग की हार्थ की कुल्हार्ड़ियार्ँ तथार् चीरने फार्ड़ने के औजार्र

प्रार्गैतिहार्सिक कलार्

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