प्रार्कृतिक चिकित्सार् के सिद्धार्न्त

मनुष्य प्रकृति क एक हिस्सार् है। उसक शरीर इन्हीं प्रकृति तत्व से बनार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् के सिद्धार्न्त नितार्न्त मौलिक है इनके अनुसार्र प्रकृति के नियमों क उल्लंघन करने से रोग पैदार् होते है तथार् प्रार्कृतिक नियमों क पार्लन करते हुए पुन: निरोग हो सकते है। मनुष्य शरीर में स्वार्भार्विक रूप एक ऐसी प्रकृति प्रदत्त्ार् पार्यी जार्ती है जो सदैव भीतरी और बार्हरी हार्निकारक प्रभार्वों से मार्नव की रक्षार् करती है जिसको नियमियतार् कहार् जार्तार् है और सार्धार्रण लोग जिसे जीवनी शक्ति के नार्म से पुकारते है वही शक्ति सब प्रकार के रोगों के कारणों को स्वयंमेव दूर करती है। वह निरन्तर शरीर क पुननिर्मार्ण करती रहती है और जो टूट फूट हो जार्ती है। उसकी मरमत क भी ध्यार्न रखती है सार्थ ही शरीर भीतर से अस्वार्भार्विक तत्व पैदार् हो जार्ते है यार् बार्हर से पहुँच जार्ते है उन्हें निकालने क भी प्रयत्न करती रहती है। रोग मनुष्य के लिए अस्वार्भार्विक अवस्थार् है जब वह प्रार्कृतिक नियमों क उल्लंघन यार् विरूद्ध माग पर चलने लगतार् है तो उसके शरीर मे विजार्तीय द्रव्य की मार्त्रार् बढ़ने लगती है जिसके परिणार्म स्वरूप शरीर में तरह-तरह के विष उत्पन्न होने लगते है और वार्तार्वरण मे पार्ए जार्ने वार्ले हार्निकारक कीटार्णुओं क भी उस पर आक्रार्मण होने लगतार् है इससे शरीर क पोषण और सफाइ करने वार्ले यन्त्र निर्बल पड़ने लगते है। उनके कायोर्ं में त्रुटि होने लगती है और मनुष्य रोगी हो जार्तार् है। शरीर के भीतर रोग निरोधक शक्ति भरी पड़ी है जिसके द्वार्रार् शरीर मे उत्पन्न हुए अथवार् बार्हर से प्रवेश पार्कर पहुँचे हुए रोग कीटार्णुओं क विनार्श निरन्तर होतार् है। उदार्हरण-यदि आँख में कोर्इ विष कीटार्णु जार् पहुँचे तो निरन्तर आँसू निकलतार् है। इन आँसुओं में लार्इसोजीम नार्मक पदाथ रहतार् है जिसकी निरोध शक्ति अद्भूत है।

प्रार्कृतिक चिकित्सार् की मार्न्यतार् है कि रोग एक है और उसक इलार्ज भी एक है अत: कोर्इ भी आसार्ह्य से असार्ह्य रोग हो इस चिकित्सार् से उसक उचित समय से निरार्करण कियार् जार् सकतार् है। रोगी के ठीक हो जार्ने पर पुन: उसके रोगी होने की सम्भार्वनार् क्षीण हो जार्ती है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् से रोग जड़ से दूर होते है। स्वार्स्थ्य के सम्बन्धित नियमों क पार्लन तथार् किसी भी काम में अति न करनार् प्रार्कृतिक चिकित्सार् क मुख्य सिद्धार्न्त है। प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमार्रियार्ँ पैदार् होती है। जबकि प्रकृति के नियमों क पार्लन करने से हमार्रे स्वार्स्थ्य की रक्षार् होती है। प्रकृति के नियमों के पार्लन के लिए आवश्यक होतार् है कि हमें प्रार्कृतिक चिकित्सार् के महत्वपूर्ण सिद्धार्न्तो के बार्रे में जार्नकारी हो जो  है- प्रार्कृतिक चिकित्सार् के मूलभूत सिद्धार्न्त है जीवनशैली मनुष्य रोगी न बने इसके लिए प्रार्कृतिक चिकित्सार् के दस आधार्र भूत सिद्धार्न्त  है-

1. सभी रोग एक हैं, और उनक कारण भी एक ही है, और उनक उपचार्र भी एक ही है-

सभी रोग, उनके कारण उनकी चिकित्सार् भी एक है चोट और वार्तार्वरणजन्य परिस्थितियों को छोड़कर सभी रोगों क मूल कारण एक ही है और उसक उपचार्र भी एक है शरीर में विजार्तीय पदाथों की संग्रह हो तार्नार् जिससे रोग उत्पन्न होते है। उनक निष्कासन ही चिकित्सार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् पद्धति क मौलिक सिद्धार्न्त वह है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् के अनुसार्र सभी रोग एक ही है। रोग को अलग-अलग नार्मों से जार्नार् जार्तार् है जिस प्रकार चार्ंदी से बने आभूशणों के अलग अलग नार्म हैं जैसे- कंगन, पार्यल, अॅंगूठी आदि उसी प्रकार एक ही विजार्तीय द्रव्य के अलग अलग स्थार्न पर एकत्र होने के कारण रोग के अनेकों नार्म हैं। रोग क एक मार्त्र कारण विजार्तीय द्रव्य है। जिसे टॉक्सिक मैटर कहते हैं, शरीर एक मशीन के समार्न कार्य करतार् है जिसके कारण हमार्रे शरीर में विजार्तीय द्रव्य एकत्र होते रहते हैं और उत्सर्जन तंत्र के मार्ध्यम से बार्हर निकालार् जार्तार् है। जैसे पसीने के रूप में, मल मूत्र के रूप में और जब यही मल जब शरीर से सुचार्रू रूप से नहीं निकलतार् तो शरीर के विभिन्न स्थार्नों पर जमार् होने लगतार् है, और वही सड़ने लगतार् है जिसके कारण रोग होते हैं। जैसे आंतों की सफाइ न होने पर कब्ज होती है जिसके कारण बवार्सीर और फिसर जैसे रोग होते हैं अंन्त में इनक व्यार्पक रूप हमार्रार् रक्त भी दूषित कर देतार् है जिससे चर्मरोग होतार् है। हृदय पर ज्यार्दार् दबार्व पड़ने से हृदय रोग भी हो जार्तार् है। श्वसन क कार्य बढ़ जार्ने से श्वार्ंस संबन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। इन सबकी जड़ केवल विजार्तीय द्रव्य ही होते हैं। इसीलिये जब सार्रे रोग एक है और उनक कारण भी एक हैं तो उसक उपचार्र भी एक ही होगार् और वह है शरीर से विजार्तीय द्रव्यों क निष्कासन जिससे शरीर शुद्ध हो और रोग समार्प्त हो सकें। विजार्तीय द्रव्य के समार्प्त होने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिवार्न हो जार्तार् है। इसीलिये प्रार्कृतिक चिकित्सार् में शरीर की शुद्धि को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार् है और विभिन्न मार्ध्यमों से शरीर से विजार्तीय द्रव्यों को बार्हर निकाल कर इसक उपचार्र कियार् जार्तार् है। इससे स्पष्ट होतार् है कि सभी रोग एक हैं। क्योंकि वे एक ही प्रकार के कारण से उत्पन्न होते होते हे इसलिये उनक उपचार्र भी एक मार्त्र है शरीर से विजार्तीय द्रव्यों को बार्हर निकालनार्।

2. तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं-

तीव्र रोग चकि शरीर के एक उपचार्रार्त्मक प्रयार्स है अत: हमार्रे शत्रु नहीं है। जीर्ण रोग तीव्र रोगों को दबार्ने से और गलत उपचार्र से पैदार् होते है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् के अनुसार्र रोगों को दो श्रेणी में बार्ंटार् गयार् है। 1. तीव्र रोग, 2. जीर्ण रोग। जीर्ण रोग वह होते हैं जो शरीर में दबे रहते हैं और लंबे समय के बार्द प्रकट होते हैं जिनके शरीर में रहते हुये हमार्रार् शरीर काम तो करतार् है लेकिन अंदर से क्षतिग्रस्त होतार् रहतार् है और लंबे समय तक शरीर में बने रहते हैं क्योंकि इनकी जड़ें शरीर में जम चुकी होती हैं इसके विपरीत तीव्र रोग वह होते हैं जिनकी अवस्थार् में शरीर कार्य करने में सक्षम नहीं हो पार्तार् है और यह शरीर में तीव्र गति से आते है और वैसे ही तीव्र गति से चले भी जार्ते हैं। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में तीव्र रोगों को मित्र कहार् गयार् है जिस प्रकार सार्मने से वार्र करने वार्ले से खतरनार्क छिपकर वार्र करने वार्लार् होतार् है। उसी प्रकार तीव्र रोग सार्मने से वार्र करतार् है इससे व्यक्ति को संभलने क अवसर मिल जार्तार् है।

तीव्र रोग के कारण शरीर से विजार्तीय द्रव्यों क निष्कासन भी हो जार्तार् है जैसे- उल्टी, दस्त हार्ने से पेट और ऑंतों की सफाइ हो जार्ती है। जुकाम व बुखार्र में यही विजार्तीय द्रव्य पसीने के रूप में बार्हर निकलते हैं और जीवनीशक्ति क पुन: विकास होने लगतार् है। तीव्र रोग हमार्रे अंदर के विष को बार्हर निकालने क कार्य करते हैं किन्तु हम घबरार्कर औषधियों के मार्ध्यम से उनके कार्य में रूकावट डार्ल देते हैं जिससे तीव्र रोग कुछ समय बार्द जीर्ण रोग क रूप ले लेते हैं। उदार्हरण के लिये सार्मार्न्य सर्दी जुकाम जो कि मौसम बदलने के कारण हमार्रे शरीर की प्रतिक्रियार् होती है जिसके कारण मल बार्हर निकलनार् चार्हतार् है लेकिन हम औषधियों को खार्कर इसे रोक देते हैं और कुछ समय बार्द यही अस्थमार्, बोंकार्इटिस, सार्यनस जैसी जीर्ण बीमार्रियों के रूप में सार्मने आते हैं। तीव्र रोग हमें हमार्री भूल क स्मरण करार्ते हैं। गलत आहार्र के कारण उल्टी और दस्त ठण्डी चीजों के अधिक सेवन के कारण सर्दी जुकाम आदि इसके उदार्हरण हैं। इसलिये ही इन्हें मित्र कहार् गयार् है क्योंकि सच्चार् मित्र ही हमें हमार्री भूलों की पहचार्न करार् सकतार् है। जिससे वह भूल दुहराइ न जार् सके।

3. रोग क कारण कीटार्णु नहीं-

रोग क मुख्य कारण कीटार्णु नहीं है। जीवार्णु शरीर में जीवनी शक्ति के हार्स होने के कारण एवं विजार्तीय पदाथों के संग्रह के पश्चार्त् तब आक्रमण कर पार्ते है जब शरीर में उनके रहने और पनपने लार्यक अनुकूल वार्तार्वरण तैयार्र हो जार्तार् है अत: मूलकारण विजार्तीय पदाथ है जीवार्णु नहीं है जीवार्णु तो दूसरार् कारण है। उपर्युक्त सिद्धार्ंत से स्पष्ट हो जार्तार् है कि रोग क एक मार्त्र कारण विजार्तीय द्रव्य हैं तो कीटार्णु रोग क कारण कैसे हो सकते हैं। स्वस्थ शरीर में कीटार्णुओं क अस्तित्व नहीं रहतार् लेकिन इसके विपरीत रोगियों में विभिन्न प्रकार के कीटार्णु प्रवेश करते रहते हैं और रोगी को जर्जर करते रहते हैं। ऐसार् क्यों होतार् है, यह एक प्रार्कृतिक नियम है कि सृष्टि में जितने पदाथ हैं इनके सूक्ष्म परमार्णु अनवरत रूप से गतिशील रहते हैं। जिन वस्तुओं के परमार्णु एक सी गति रखते हैं उनमें परस्पर आकर्षण होतार् है। और विरूद्ध गति के परमार्णु एक दूसरे से भार्गते हैं। अत: इस सिद्धार्ंत के अनुसार्र कीटार्णुओं क अस्तित्व उन्ही शरीरों में होतार् है जिनमें पहले से ही विजार्तीय द्रव्य विद्यमार्न हो अथवार् जो रोग ग्रस्त है यार् जीवनी शक्ति कमजोर हो क्योंकि विजार्तीय द्रव्य के कारण जीवनी शक्ति क ह्रार्स होतार् है उस अवस्थार् में कीटार्णुओं क प्रवेश शरीर में होतार् है।

जिस प्रकार गुड़ के पार्स ही मक्खियार्ं आती है। ठीक उसी प्रकार गंदगी में ही मच्छर आते हैं क्योंकि कीटार्णुओं भी जीवित रहने के लिये उनक आहर चार्हिये जो कि स्वस्थ व्यक्ति में उन्हें नहीं मिलतार् और वे जीवित नहीं रह पार्ते। इसके विपरीत रोगी के शरीर में उनक चौगुनार् विकास होतार् है। यही कारण है कि किसी भी प्रकार के कीटार्णुओं के संक्रमण में 100 प्रतिशत लोग प्रभार्वित नही होते वही उसकी चपेट में आ जार्ते हैं। जिनक रहन सहन सही नहीं है जीवनी शक्ति प्रबल होती है उनमें कीटार्णु जीवित नहीं रह पार्ते इसीलिये वह स्वस्थ रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि रोग के प्रभार्व क प्रथम कारण एक मार्त्र विजार्तीय द्रव्य ही होते हैं कीटार्णु नहीं।

4. प्रकृति स्वयं चिकित्सक है-

प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सार् है शरीर में स्वयं रोगों से बचने व अस्वस्थ्य हो जार्ने पर पुन: स्वस्थ प्रार्प्त करने की क्षमतार् विद्यमार्न है। प्रकृति जीव क संचार्लन करती है जो प्रत्येक जीवन के पार्श्र्व में रहकर उसके जन्म, मरण, स्वार्स्थ्य एवं रोग आदि क ध्यार्न रखती है, उस महार्न शक्ति को जीवनी शक्ति, प्रार्ण आदि कहते हैं। शरीर की समस्त क्रियार्यें इसी के मार्ध्यम से संपन्न होती हैं। हमार्रार् खार्नार् पीनार्, बोलनार् चार्लनार्, उठनार् बैठनार् सब इसी पर निर्भर है। मार्ं अपने बच्चे के लिये इन सब बार्तों क जैसे ध्यार्न रखती है वैसे ही प्रकृति भी हमार्रार् ख्यार्ल रखती है, और जब तक बच्चार् मार्ं के पार्स रहतार् है वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करतार् है। जिस प्रकार खार्नार् खिलार्ते समय यदि खार्नार् अटक जार्ये तो मार्ं बच्चे को पीठ पर जोर से मार्रती है पार्नी पिलार्ती है। ठीक इसी प्रकार से प्रकृति भी हर तरह से ध्यार्न रखती है। जब खार्नार् गलती से श्वार्ंस नली में चलार् जार्तार् है तो प्रकृति के समार्न ही तुरंत खार्ंसी उत्पन्न कर उसे बार्हर निकाल देती है।

इसी प्रकार जब कोर्इ भी जहरीली चीज मुंह में चली जार्ती है तो तुरंत उल्टी होने लगती है और जहर बार्हर निकल जार्तार् है। घार्व हो जार्ने पर उसे कौन भरतार् है, हड्डी टूट जार्ने पर उसे कौन जोड़तार् है। चिकित्सक केवल सहार्रार् देतार् है, लेकिन हड्डी को जोड़ नहीं सकतार्। यह कार्य केवल और केवल प्रकृति रूप में मार्ं ही कर सकती है। संसार्र में प्रकृति से बड़ार् चिकित्सक कोर्इ नहीं है, प्रकृति ही सभी सार्ध्य व असार्ध्य रोगों क उपचार्र करती है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् तो प्रकृति के कार्य में सहार्यक के रूप में कार्यकरतार् है।

5. चिकित्सार् रोग की नहीं संपूर्ण शरीर की होती है- 

प्रार्कृतिक चिकित्सार् में चिकित्सार् रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है। अन्य चिकित्सार् पद्धतियों में केवल रोग निवार्रण पर बल दियार् जार्तार् है परन्तु प्रार्कृतिक चिकित्सार् केवल रोग क ही नहीं अपितु संपूर्ण शरीर की चिकित्सार् करती है जिससे रोग स्वत: मिट जार्तार् है क्योंकि रोग क मूल कारण तो शरीर में एकत्र विष है। जैसे सिरदर्द होने पर अधिकांश लोग दवार्ओं क प्रयोग करते हैं जिससे कुछ समय के लिये दर्द समार्प्त हो जार्तार् है लेकिन बार्र बार्र होतार् रहतार् है क्योंकि उसकी जड़ तो कहीं और ही होती है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में पेट तथार् आंतों को सार्फ करके सिरदर्द को पूर्ण रूप से समार्प्त कियार् जार्तार् है।

इसके सार्थ ही शरीर के शुद्धि करण से सिरदर्द और अन्यरोग स्वत: ही समार्प्त हो जार्ते हैं। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में किसी अंग विशेष को रोगी नहीं मार्नार् जार्तार् है बल्कि किसी भी रोग में संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जार्तार् है जैसे एक सार्धार्रण लगने वार्ली कब्ज के कारण व्यक्ति क संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जार्तार् है। कब्ज के कारण अपच अजीर्ण गैस, ऐसीडिटी, बवार्सीर, फिसर, त्वचार् रोग, अस्थमार्, हृदय रोग आदि होते है। सभी रोग क कारण आंतों में रूक हुआ मल है जो विष क रूप धार्रण कर संपूर्ण शरीर में फैल जार्तार् है। सिर की ओर जार्ने पर सिर दर्द, बेचैनी, घबरार्हट आदि होती है इसलिये केवल पेट की चिकित्सार् और शरीर की सफाइ से ये सार्रे रोग एक के बार्द एक करके समार्प्त हो जार्ते हैं इसलिये केवल चिकित्सार् न करके संपूर्ण शरीर की चिकित्सार् की जार्ती है।

6. प्रार्कृतिक चिकित्सार् में निदार्न की विशेष आवश्यकतार् नहीं-

प्रार्कृतिक चिकित्सार् के सिद्धार्ंत के अनुसार्र सभी रोग एक है और उनके कारण भी एक ही हैं ऐसी अवस्थार् में रोग निदार्न की विशेष आवश्यकतार् नही रह जार्ती है। वर्तमार्न समय में रोग के निदार्न के लिये बड़ी बड़ी मशीने व उपकरण प्रयोग में लार्ये जार्ते हैं जिनके मार्ध्यम से शरीर में रोग क पतार् लगार्यार् जार्तार् है जिनके विपरीत प्रभार्व रोगी पर देखने को मिलतार् है। एक्सरे मशीन से ऑंखों की रोशनी प्रभार्वित होती है। गर्भार्शय शिशु पर विपरीत प्रभार्व पड़तार् है यहॉं तक की बच्चार् अपंग पैदार् हो सकतार् है। इस प्रकार की मशीनों के अत्यधिक प्रयोग से रोग निवार्रण नहीं रोग को बढ़ार्यार् जार् रहार् है बल्कि शरीर और दूषित होतार् है इसके अतिरिक्त रोगी पर अत्यधिक आर्थिक दबार्व पड़ती है जिससे मार्नसिक रूप से क्षुब्ध हो जार्तार् है लेकिन प्रार्कृतिक चिकित्सार् में किसी भी उपकरण की सहार्यतार् के बिनार् आकृति निदार्न की व्यवस्थार् है रोगी की आकृति को देखकर सिर्फ यह पतार् लगार्नार् है कि शरीर के किस भार्ग पर विजार्तीय द्रव्य की अधिकतार् है। चहेरे को देखकर, गर्दन को देखकर और पेट को देखकर ही रोगों क निदार्न कियार् जार्तार् है जो एक बहुत ही सरल और सहज प्रकिय्रार् है। रोगी को किसी प्रकार की परेशार्नी नही होती और आर्थिक दबार्व बिल्कुल नहीं होतार् है।

7. जीर्ण रोगी के आरोग्य में समय लग सकतार् है-

जीर्ण रोगी क अर्थ है जिसमें रोग लंबे समय से बैठार् है। उसे समार्प्त करने में समय लगतार् है। जीर्ण रोग न तो बहुत जल्दी आते है और न ही पलक झपकते ठीक हो सकते हैं। जीर्ण रोग उस पेड़ के समार्न होते हैं जो कर्इ वर्षो से अपनी जड़े जमार्ये हुये हैं इसलिये उसकी जड़े जमीन में बहुत अंदर तक चली जार्ती है। पेड़ को तने से बहुत जल्दी काटार् जार् सकतार् है। इसी प्रकार जीर्ण रोग भी शरीर में बहुत जड़ें बनार् लेते हैं और उन्हें जड़ से मिटार्ने में थोड़ार् समय लगतार् है।

वर्तमार्न समय की चिकित्सार् पद्धतियार्ं रोग के लक्षणों को मिटार्ती है जो कुछ समय के लिये होतार् है और बार्र बार्र उभर कर सार्मने आती रहती है। क्योंकि जल्दी आरार्म पार्ने के चक्कर में वे औषधियों के मार्ध्यम से रोग रूपी पेड़ के तने को काटते हैं जिसके कुछ समय बार्द फिर अंकुर आकर वही पेड़ बन जार्तार् है लेकिन प्रार्कृितेक चिकित्सार् रोग को जड़ से मिटार्ने क प्रयार्स करती है और सार्थ ही जीवनी शक्ति क विकास करती है जो कि औषधियों के सेवन से नष्ट होती है।

यह मनुष्य क दुर्भार्ग्य ही है कि वह प्रकृति से दूर होतार् जार् रहार् है और कृत्रिम दुनियार्ं में जी रहार् है। आज की औषधियार्ं इसी क उदार्हरण है जिन्हें खार् कर मनुष्य सोचतार् है कि वह स्वार्स्थ्य को प्रार्प्त कर रहार् है। परन्तु सत्य यह है कि वह खुशी से जहर खार् रहार् है जो धीरे धीरे उसे अंदर से खार्ये जार् रहार् है जिसक पतार् उसे कुछ समय बीत जार्ने के बार्द लगतार् है। जब वह एक रोग को दूर करने के लिये ली गर्इ औषधियों के कारण दूसरे रोग को आमंत्रित कर देतार् है।

प्रार्कृतिक चिकित्सार् में जीर्ण रोगी के स्वार्स्थ्य लार्भ में समय लगने क एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि व्यक्ति हर जगह से थक हार्र कर इसकी ओर मुड़तार् है और फिर अपने सार्थ जगह जगह से एकत्र कियार् हुआ औशधीय विष लेकर आतार् है जो प्रार्कृतिक चिकित्सक के कार्य को और भी बढ़ार् देतार् है। जिससे रोगी के आरोग्य लार्भ में समय लग सकतार् है। इस लिये रोगी को धैर्यपूर्वक प्रार्कृतिक चिकित्सार् करवार्नी चार्हिये जिससे पूर्ण लार्भ मिल सके।

8. प्रार्कृतिक चिकित्सार् में दबे रोग उभरते हैं-

प्रार्कृतिक चिकित्सार् के द्वार्रार् रोग भी उभर कर ढीक हो जार्ते है। वर्तमार्न औशधीय चिकित्सार् में जहॉं उभरे रोग दब जार्ते हैं, उसके विपरीत प्रार्कृतिक चिकित्सार् में दबे रोग उभरते हैं जिसके कारण कर्इ रोगी अविश्वार्स करने लगते है कि उनकी बीमार्रियार्ं बढ़ गर्इ हैं। जबकि बीमार्रियार्ं बढ़ती नहीं हैं बल्कि अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष में आ जार्ती हैं जिससे उनक उपचार्र कियार् जार् सकतार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में संपूर्ण शरीर क उपचार्र कियार् जार्तार् है जिससे संपूर्ण शरीर के विजार्तीय द्रव्य बार्हर निकलते हैं जिससे शरीर में दबे अन्य रोग भी बार्हर निकलते हैं जो उचित उपचार्र से जल्दी ही चले जार्ते हैं। उभार्र को चिकित्सकीय भार्षार् में रोग क तीव्र रोग की अपकर्शार्वस्थार् पुरार्ने रोग क प्रत्यार्वर्तन रोग उपशन, संकट आदि कर्इ नार्मों से पुकारते हैं इसक सार्मार्न्य अर्थ है कि एक रोग क तीव्र अवस्थार् में अलग-अलग स्थार्नों में विष क बार्हर निकलनार् जो उपद्रव कहलार्ते हैं। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में इसे सकारार्त्मक रूप में लियार् जार्तार् है, क्योंकि इसक अर्थ है हमार्री जीवनी शक्ति अपनार् कार्य रही है। जिस प्रकार एक सार्मार्न्य ज्वर की चिकित्सार् के समय तीव्र सिरदर्द व पेट दर्द एवं दस्त भी हो सकते हैं। क्योंकि सिरदर्द होने पर हम दवार् से दबार् देते हैं। इसी प्रकार पेटदर्द होने पर भी हम इसे दवार् से दबार् देते हैं, और दस्त को रोक देते हैं जिससे मल शरीर में ही अलग-अलग स्थार्नों पर जमार् हो जार्तार् है और प्रार्कृतिक उपचार्र के समय यह बार्हर निकलने क प्रयार्स करतार् है जिससे सभी रोग उभर आते हैं।

एक प्रार्कृतिक चिकित्सक क कर्तव्य है कि इन उभार्रों की अनदेखी न करें और तत्काल उनकी चिकित्सार् करें। जिससे रोगी की जीवनी शक्ति क अधिक क्षय न हो। रोगी को इससे घबरार्ने की आवश्यकतार् नही है। रोगी को यह सोचनार् चार्हिये कि उनक रोग जड़ से ही समार्प्त हो रहार् है जिससे उसके दुबार्रार् हार्ने की संभार्वनार् लगभग समार्प्त हो जार्ती है।

9. प्रार्कृतिक चिकित्सार् में मन, शरीर तथार् आत्मार् तीनों की चिकित्सार् की जार्ती है-

प्रार्कृतिक चिकित्सार् में शार्रीरिक मार्नसिक, आध्यार्त्मिक तीनों पक्षों की चिकित्सार् एक सार्थ की जार्ती है। शरीर, मन और आत्मार् तीनों के सार्मंजस्य क नार्म ही पूर्ण स्वार्स्थ्य है क्योंकि शरीर के सार्थ मन जब तक स्वस्थ नहीं है तब तक व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ नही कहार् जार् सकतार् है। और शरीर, मन तभी स्वस्थ रह सकते हैं जब आत्मार् स्वस्थ हो, केवल शरीर को ही स्वस्थ रखनार् मनुष्य क कर्तव्य नहीं है क्योंकि मन और आत्मार् शरीर के अभिन्न अंग है। बिनार् मन के खुश हुये हमार्री इंन्द्रियार्ं कैसे खुश रह सकती है। यदि मन स्वस्थ नहीं हैं तो विषार्ल काय शरीर भी कुछ समय में समार्प्त हो जार्तार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में इन तीनों की स्वार्स्थ्योन्नति पर बरार्बर ध्यार्न रखार् जार्तार् है।

यह प्रार्कृतिक चिकित्सार् प्रणार्ली की सबसे बड़ी विशेषतार् है कि प्रार्कृतिक चिकित्सक मनुष्य के मार्नसिक स्वार्स्थ्य को उससे शार्रीरिक स्वार्स्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण मार्नते हैं और आत्मिक स्वार्स्थ्य यार् बल को सर्वोपरि मार्नते हैं, क्योंकि शरीर तभी स्वस्थ होगार् जब आत्मार् और मन स्वस्थ होतार् है।

भार्रतीय दर्शन के अनुसार्र आध्यार्त्मिक रूप से मनुष्य ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होतार् है वही, जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्रार्प्त कर सकतार् है। क्योंकि आध्यार्त्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समार्ज की स्थार्पनार् कर सकतार् है। जहॉं हिंसार्, द्वेष, का्रेध, घृणार् आदि विकृत मार्नसिकतार् न पनप सके। प्रार्कृतिक चिकित्सार् शार्रीरिक स्वार्स्थ्य के सार्थ ही महत्-तत्व चिकित्सार्, रार्म नार्म चिकितसार् पर भी बल देती है जिससे मनुष्य आत्म संयम सीख सके और अपनी जीवन शैली को बदलकर संपूर्ण जीवन को उचित दिशार् दे सके।

10. प्रार्कृतिक चिकित्सार् में उत्तेजक औषधियों के सेवन क प्रश्न ही नहीं-

प्रार्कृतिक चिकित्सार् में औषधियों क प्रयोग नहीं होतार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् के अनुसार्र आधार्र ही औषधि है। औषधि उपचार्र क सिद्धार्ंत है कि रोग बार्हरी चीज है जिसक शरीर पर आक्रमण होतार् है। अत: इसे औषधियों के मार्ध्यम से दूर करनार् चार्हिये। बार्हर से आये कीटार्णुओं को औषधियों से समार्प्त करनार् चार्हिये। जबकि संपूर्ण प्रकार की औषधियार्ं एक प्रकार क विष हैं जिनसे व्यक्ति ठीक कैसे हो सकतार् है। एक निर्धार्रित मार्त्रार् से अधिक लेने पर व्यक्ति की मौत हो सकती है लेकिन विष तो विष है आज नही तो कल अपनार् प्रभार्व दिखार्येगार् ही। क्योंकि एक ही बार्र में ली गयी नींद की गोलियार्ं व्यक्ति को तुरंत समार्प्त कर देती हैं। लेकिन धीरे धीरे ली गयी गोलियार्ं व्यक्ति को पंगु बनार्ती हैं शरीर को धीरे धीरे खार्ती हैं आज मिलने वार्ली दवार् पर कुछ समय बार्द प्रतिबंध लग जार्तार् है। सभी दवार्ओं पर सार्वधार्नी के निर्देश दिये रहते हैं। प्रो0 ए0 क्लाक के अनुसार्र ‘‘हमार्री सभी आरोग्यकारी औषधियार्ं विष हैं और इसके फलस्वरूप औषधि की हर एक मार्त्रार् रोगी की जीवनी शक्ति क ह्रार्स करती है।’’

फिर भी मनुष्य उनक उपयोग करतार् रहतार् है लेकिन प्रार्कृतिक चिकित्सार् में किसी प्रकार की औषधियों क प्रयोग नहीं कियार् जार्तार् है। औषधियों को अत्यधिक हार्निकारक मार्नार् जार्तार् है जिससे रोग कम होने के बजार्य बढ़तार् जार्तार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् मार्नती है कि शरीर औषधि से नही बल्कि प्रकृति से निर्मित हुआ है इसलिये पंचतत्वीय शरीर की चिकित्सार् के लिये पंच तत्वों क ही प्रयोग कियार् जार्तार् है क्योंकि प्रकृति से बड़ार् चिकित्सक और कोर्इ नहीं है। प्रकृति के सभी सप्रार्ण खार्द्य पदाथ ही औषधि है। शुद्ध वार्यु, धूप, जल आदि ही औषधि हैं जो रोग को दूर करने की क्षमतार् रखते हैं। अमेरिक के लियेण्डर के अनुसार्र -’’औषधि विज्ञार्न को जितनी कीटार्णुनार्शक दवार्यें मार्लूम हैं उनसे कही अधिक सूर्य स्नार्न कीटार्णुनार्शक शक्ति को बढ़ार्तार् है।’’ प्रार्कृतिक चिकित्सार् में कृत्रिम औषधियों क प्रयोग वर्जित मार्नार् जार्तार् है। प्रार्कृतिक चिकित्सार् में विषैली औषधियों को शरीर के लिये अनार्वश्यक ही नहीं घार्तक भी समझार् जार्तार् है। प्रकृति चिकित्सक है दवार् नहीं। औषधि क काम रोग छुड़ार्नार् नहीं है बल्कि यह वह सार्मग्री है जो प्रकृति के द्वार्रार् मरम्त के काम में लगाइ जार्ती है। इस लिये प्रार्कृतिक चिकित्सार् में सभी सप्रार्ण खार्द्य सार्मग्री ही औषधि हैं।

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