प्रार्कृतिक चिकित्सार् क इतिहार्स

भार्रत में प्रार्कृतिक चिकित्सार् क इतिहार्स-

प्रार्कृतिक चिकित्सार् उतनी ही पुरार्नी है जितनी की प्रकृति स्वयं है और उनके आधार्र भूत तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वार्यु, आकाश। प्रकृति के तत्व जिनसें जीवन की उत्पित्त होती है सदैव वही तत्व रोगों को दूर करने में सहार्यक रहे। प्रार्चीन काल से ही तीर्थ स्नार्न पर घूमनार्, उपवार्स रखनार्, सार्दार् भोजन करनार्, आश्रमों में रहनार्, पेड़ पौधों की पूजार् करनार्, सूर्य, अग्नि, तथार् जल की पूजार् करनार् आदि कर्म के अंग मार्ने जार्ते रहे है यदि किसी प्रार्कृतिक नियमों को तोड़ने में कोर्इ कभी अस्वस्थ हो जार्तार् थार् तो उपवार्स, जड़ी-बूटियों तथार् अन्य प्रार्कृतिक सार्धनों क प्रयोग करके स्वस्थ हो जार्तार् हैै। वेदकाल के वेद तथार् अन्य प्रार्चीन ग्रन्थों में इसके सन्दर्भ मिलते है।
वार्यु तत्व-

‘‘पद दौ वार्त ते ग्रेहअमृतस्य निधिर्हित तहोनो देहि जीवसे’’ 

अर्थार्त्! हे वार्यु तेरे घर जो है वे अपूर्व अमृत क खजार्नार् है उसमें से हमार्रे दीर्घ जीवन के लिए थोड़ार् सार् भार्ग प्रदार्न करे।

सूर्य तत्व-

‘‘सवितार्नु: सवितु सर्वार्तीत सवितोनार्रार्जतार्ं दीर्घमार्यु’’

अर्थार्त्! वह श्रेष्ठ प्रकाश जो विश्व को प्रकाशित कर रहार् है हमें सद्बुद्धि और दीघार्यु प्रार्दन करे।सूर्य आत्मार् जगतस्वस्थश्च। अर्थार्त् सूर्य संसार्र के समस्त पदाथों की आत्मार् है।

जल तत्व-

‘‘सन्नो देवीर भस्तमार्योशवन्तुपीतयेशं शयोरीशभवन्तु’’।(ऋग्वेद 10/4/4)

अर्थार्त्! हे र्इश्वर दिव्य गुण वार्लार् जल हमार्रे लिए सुखकारी हो जो हमें अभीष्ट पदाथ प्रार्प्त करार्ये। हमार्रे पीने के लिए ये सम्पूर्ण रोगों क नार्श करे तथार् रोग से पैदार् होने वार्ले भय को न पैदार् होने दे, हमार्रे सार्मने बहे।

पृथ्वी तत्व-

‘‘अधतेडीप च भूतनित्यन्नत्व मुच्यते
तैित्त्ार्रीयक वेदार्न्ते तस्य भार्वोऽनुचिन्तयतार्म्
अध्यते विधिवद् मुक्तमति भोकतरमन्यथार्’’।(तैतरीय उपनिशद)

अर्थार्त् भोजन जो खार्यार् जार्तार् है और भोजन खार्ने वार्लार् जो भी खार्तार् है भोजन क यह महत्व विचार्रणीय है विचित्र रीति से कियार् गयार् भोजन खार्ने वार्ले द्वार्रार् खार्यार् जार्तार् हैै परन्तु जो गलत विधि से खार्यार् जार्तार् है ऐसार् भोजन खार्ने वार्ले को खार् जार्तार् है पहले प्रकार क भोजन मनुष्य को आयुश एवं स्वार्स्थ्य प्रदार्न करतार् है जबकि दूसरे प्रकार के भोजन क विपरीत प्रभार्व पड़तार् है। वैदिक सभ्यतार् के बार्द पुरार्ण काल में प्रार्कृतिक चिकित्सार् प्रचलित थी रार्जार् दिलीप ने दुग्ध कल्प, फल जल सेवन (रहनार्) लार्भ प्रार्प्त कियार्।

आयुर्वेद के अनुसार्र-

वार्यु तत्व-

दध्यार्न्ते ध्यार्यमार्ननार्ं धार्तू नार्हि यथार् मलार्:।
तर्थोन्द्रयार्णि दध्यन्ते दोशार्: प्रार्णस्य निग्रहत।।(ऋग्वेद-10/86/3) 

अर्थार्त्! धार्तुओं को आग में डार्लने से जैसे उनके मल नष्ट हो जार्ते है वैसे ही प्रार्णार्यार्म से मनुष्य के समस्त रोग दूर हो जार्ते है। वार्यु हमार्रे हृदयों में शक्ति पैदार् करे। वह सुख देने वार्लार् होकर हमार्रे पार्स बहती रहे जब हमार्री आयु को दीर्घ करें।

सूर्य तत्व-

‘‘कफीयतोदभवार् रोगार्न वार्त, रोगार्स्तथैव च।तत्सवनार्न्न रोजित्वार् जीवेच्च शरदार्शतम्।।’’ 

अर्थार्त् सूर्य रश्मियों के दैनिक प्रयोग से मनुष्य कफ पित्त व वार्यु दोश से उत्पन्न सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रह सकतार् है।

‘‘ददुविस्फोट कुश्टहन कामलार् शोध नार्शक:।
ज्वार्दि सार्र शूलनार् हार्रको नार्त्रसंशय:।।’’ 

अर्थार्त् सूर्य रश्मियार्ँ दार्द, कुश्टपूर्ण दार्ने, कोढ़, जलशोथ, अति उदरशूल जैसे रोगों को नष्ट कर देती है इसमें सन्देह नहीं।

जल तत्व-

दीपनं वृश्य दृश्टार्तार्युश्यं स्नार्नमोजो बल।
प्रदम् कडमलश्रम स्वेदन्द्रोतऽदार्ह पार्युत।
रक्त प्रसार्दन चार्पि सवेन्द्रिय विशोधनम्।। 

अर्थार्त् स्नार्न, ओज, आयु, जीवनी शक्ति को बढ़ार्तार् है। थकावट, पसीनार्, चर्म रोग, मल और उसकी दुर्गन्ध आलस्य, प्यार्स, जलन तथार् पार्प क नार्श करतार् है सार्थ रक्त को शुद्ध करतार् है एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों को स्वच्छ व निर्मल कर देतार् है।

पृथ्वी तत्व-

पृथ्वी न चार्हार्रसमं किंचिद् भैशज्य मुकलभ्यते।
शक्यतेऽयन्नं मार्त्रेण नर: कुर्त निरार्मय:।।
भेशजो नोपन्नोऽसि निरार्हार्रो न शक्यते।
तस्यार्द् भिशग्भिरार्हार्रो महार् भैशन्यमुच्यते।। 

अर्थार्त्! भोजन से बढ़कर दूसरी दवार् नहीं है केवल भोजन सुधार्र से मनुष्य के सार्रे रोग दूर हो जार्ते है दवार् कितनी दी जार्ए पर यदि रोगी के भोजन में उचित सुधार्र न कियार् जार्येगार् तो कुछ लार्भ नहीं होगार् मनुष्य जो खार्तार् है वह भैशज्य नही महार् भैशज्य है। पद्यपथ्यं किमौशधयार्, यदि पथ्यं किमौशधै:। अर्थार्त् यदि रोगी क पथ्य ठीक नहीे है तो औशधीय दिये जार्ने क कोर्इ अर्थ नहीं और यदि ठीक है तब भी औषधि निरर्थक है। भोजन सुधार्र से मनुष्य के सार्रे रोग दूर हो जार्ते है, दवार् कितनी ही दी जार्ए पर रोगी के भोजन में उचित सुधार्र नहीं कियार् जार्येगार् तो कुछ लार्भ नहीं होगार्। मनुष्य जो खार्तार् है भोजन नहीं महार्भैशज है। सदार् पथ्यं किमौशधयार् यदिपथ्यं किमौशधै:। अर्थार्त् यदि रोगी क पथ्य ठीक नहीं है तो औषधि लिए जार्ने क कोर्इ अर्थ नहीं और यदि पथ्य ठीक है तो भी औषधि निरर्थक है।

पुरार्ण काल-वेदकाल के बार्द पुरार्ण काल में प्रार्कृतिक चिकित्सार् क उपयोग रोगों को दूर करने तथार् स्वार्स्थ्य वर्धन के लिये कियार् जार्तार् थार्। प्रार्रम्भ में कोर्इ औषधि चिकित्सार् नहीं थी लोग लंघन (उपवार्स) को ही अचूक औषधि मार्नते थे। इस सम्बन्ध प्रसंग आतार् है कि रार्जार् दिलीप दुग्धकल्प एवं फल सेवन तथार् रार्जार् दशरथ की रार्नियों ने फल द्वार्रार् संतार्न लार्भ प्रार्प्त कियार्। उपवार्स सभी रोगों से मुक्त होने क सहज उपचार्र मार्नार् जार्तार् है।

त्रेतार्युग में रार्वण के समय जड़ी-बूटी क औषधि के रूप में प्रयोग होने लगे क्योंकि भोग-विलार्सी होने के कारण रार्वण को प्रार्कृतिक चिकित्सार् में कष्ट होतार् थार् उसने वैधों क लघंन (उपवार्स) के बिनार् चिकित्सार् की विधि खोजने क आदेश दियार् तभी से औषधि चिकित्सार् क आरम्भ हो गयार्।

महार्बग्ग बौद्ध ग्रन्थ-इस ग्रन्थ में वर्णन कियार् गयार् है कि एक बार्र भगवार्न बुद्ध श्रार्वस्ती नगर से रार्जगृह जार्ते हुए कलंद निवार्स नार्मक संघ मे रूके थे। वहार्ँ एक बौद्ध भुक्षु को सार्ंप ने काट लियार् उसकी सूचनार् भगवार्न बुद्ध को मिली उन्होंने सलार्ह दी कि विष नार्श करने के लिए चिकनी मिट्टी, गोबर, गौमूत्र और रार्ख क उपयोग कियार् जार्ए इस प्रकार कियार् जार्य इस प्रकार के प्रसंग से ज्ञार्त होतार् है कि भगवार्न बुद्ध ने अपने शिष्यों को प्रार्कृतिक चिकित्सार् से सही करते, करवार्ते थे।

सिन्धुघार्टी की सभ्यतार्- इस काल में भी प्रार्कुतिक चिकित्सार् क उपयोग होतार् थार्। मोहन जोदड़ो में पार्ये गये पुरार्ने स्नार्नगार्र जिस में गरम, ठण्डार् दोनों ही प्रकार के स्नार्न क प्रबन्ध थार्। इससे यह स्पष्ट होतार् है कि 350 र्इ0 पूर्व जल चिकित्सार् महत्वपूर्ण स्थार्न रखती थी।

मिस्र यूनार्नी व यहूदी जार्तियार्ँ- जल से चिकित्सार् होती थी। 2000 वर्ष यूनार्न एक व्यक्ति बुकरार्त ने जल और सूर्य चिकित्सार् द्वार्रार् लोगों क ज्वर, रक्तविकार, चर्मरोग आदि को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध थे।रोम में 800 वर्ष पूर्व सूर्य चिकित्सार् होती थी ।

आधुनिक प्रार्कुतिक चिकित्सार् क जन्म एवं विकास- 

र्इसार् के जन्म के 400 वर्ष पूर्व ग्रीस के हिप्पोक्रेटीज प्रार्कृतिक चिकित्सार् के जनक कहे जार्ते है। उनके समय तक दौ सौ पैसठ औषधियों क अविष्कार हो चुक थार् ये उनकी लिखी पुस्तकों से ज्ञार्न होतार् है लेकिन ये औषधियार्ँ मुख्यत: कुछ नये रोगों में ही प्रयोग की जार्ती थी। यदपि हिप्पोक्रेटीज इन औषधियों में विश्वार्स रखतार् थार् , उनकी धार्रणार् थी कि प्रकृति में रोग निवार्रण शक्ति है। तथार् नये-नये रोग स्वयं ही शरीर में एक प्रकृति तरीके से उभार्र लार्कर शरीर के भार्गों में से एक अधिक के द्वार्रार् विकारों के बार्हर कर देते है। उनक कहनार् थार् कि चिकित्सक क कर्त्त्ार्व्य है कि वह रोगी में आये बदलार्व क अनुमार्न पहले से कर ले जिससे वह उन प्रार्कृतिक तरीको को सहज सफल होने में सहार्यतार् दे तथार् रोगी चिकित्सक की मदद से रोग निवार्रण कर सके।

हिप्पोक्रेटीज को जल चिकित्सार् क पूरार्-पूरार् ज्ञार्न थार् उन्होंने शीतल तथार् उष्ण दोनों प्रकार के जल क उपयोग अल्सर, ज्वर और अन्य रोगों में कियार्। उन्होंने कहार् कि शीतल जल क स्नार्न लघु कालीन होनार् चार्हिए उसके तुरन्त बार्द यार् घर्षण स्नार्न करनार् चार्हिए। लघुकालीन शीतल स्नार्न से शरीर गरम रहतार् है इसके विपरीत उष्ण जल से स्नार्न से इसके विपरीत प्रभार्व पड़तार् है। यूनार्न के स्पाटन नार्मक जार्ति में शीतल जल से स्नार्न करने क कानून बनार् थार् वहार्ँ बड़े-बड़े स्नार्नगार्र में शीतल और उष्ण वार्यु स्नार्न की व्यवस्थार् की। फार्दर नीप ने प्रार्कृतिक चिकित्सार् क उपयोग बड़े उत्सार्ह से कियार् और जड़ी बूटी व जल के प्रयोग सम्बन्धी बहुमूल्य अविष्कार किये। मध्यकाल में अरार् के चिकित्सकों ने जल चिकित्सार् को महत्व दियार्।

रेजेज ने ज्वर के तार्प को कम करने के लिए बरफीलार् जल थोड़ार् पार्नी की सलार्ह दी।

एवी सेनार् कब्ज निवार्रण हेतु शीलत जल क स्नार्न तथार् मिट्टी को लार्भकारी बतार्यार्।

कुलेन चिकित्सक के रूप में जल के सन्दर्भ में कुछ व्यवस्थिति अवलोकन प्रस्तुत किये। उन्होंने ज्वर के उपचार्र के लिए जल के सम्बन्ध में कहार् कि जब प्रतिक्रियार् की दिशार् को कम करने के लिए जल क उपयोग कियार् जार्तार् है तो उसक प्रभार्व शार्न्तिदार्यक होतार् है लेकिन जब हृदय और धमनियों के कार्यों को बढ़ार्ने के लिए तथार् सबल देने के लिए जल क उपयोंग कियार् जार्तार् है तो वह टॉनिक क कार्य करतार् है। जल रोग निवार्रण और स्वार्स्थ्य संवर्धन के लिए उपयुक्त मार्नार् जार्तार् है।

प्रार्कृतिक चिकित्सार् पद्धति भार्रत की प्रार्चीनतम चिकित्सार् पद्धति है किन्तु बीच में इस चिकित्सार् प्रणार्ली के संसार्र से लोप हो जार्ने के बार्द उसके पुर्नरूथार्न क श्रेय पार्श्चार्त्य देशों को दी है इस सत्य को नकारार् नहीं जार् सकतार्। प्रार्कृतिक चिकित्सार् के पुनरूथार्न में मदद देने वार्ले अनेक प्रार्कृतिक चिकित्सक थे और ये लोग वह थे जो औषधियों द्वार्रार् रोगों क उपचार्र करते-करते अपनी आयु के एक बड़े भार्ग को समार्प्त कर देने पर भी शार्न्ति नहीं पार् सके। उनके स्वयं के प्रार्ण प्रार्कृतिक चिकित्सार् द्वार्रार् बचे थे। इस सम्बन्ध में निम्नवत जार्नकारी है।

पार्श्चार्त्य देशों में प्रार्कृतिक चिकित्सार् क इतिहार्स-

डार्क्टर फ्लार्यर इग्लैण्ड के लिचफील्ड निवार्सी थे। लिचफील्ड के एक स्त्रोत के पार्नी में कुछ किसार्नों को नहार्ते देखकर स्वार्स्थ्य लार्भ प्रार्प्त देखार् और इस सम्बन्ध में उन्होंने खोज की और जल चिकित्सार् आरम्भ की।
सन् 1667 में सर जार्न फ्लोयर ‘‘हिस्ट्री आफ कोल्ड बार्यिंग’’ नार्मक पुस्तक लिखी जिसमें इन्होंने शीतल जल के महत्व स्नार्न पर विस्तार्र से प्रकाश डार्लार्। उन्होंने कहार्ँ कि शीतल जल के स्नार्न देने से पहले रोगी को पसीनार् अवश्य आनार् चार्हिए। इसके लिए रोगी को एक गीलार् चार्दर लपेट कर कम्बल से ढक देनार् चार्हिए। इसके बार्द पसीनार् आ जार्येगार्, तब स्नार्न करार्नार् चार्हिए। उन्होंने इग्लैण्ड के लिचफील्ड में वार्टर क्योर केन्द्र बनार्यार् इसमें दो कमरे हुआ करते थे। एक कमरे में रोगी को उष्ण स्नार्न तथार् शुष्क लपेट पसीनार् लार्ने के लिए दी जार्ती थी। दूसरे कमरे में शीतल जल की स्नार्न करवार्यार् जार्तार् थार्। दोनों कमरे एक दूसरे से बिल्कुल आस-पार्स थे।

आधुनिक प्रार्कृतिक चिकित्सार् के प्रणेतार् विनसेन्ज प्रेविनज मार्ने जार्ते है। जो कि फार्दर ऑफ वार्टर थरैपी मार्ने जार्ते है। इनक जन्म जर्मनी के सिलेसियन पहार्ड़ की तलहटी मे एक गार्ँव में 1752 में एक गरीब परिवार्र में हुआ थार्। बड़े होने पर चरवार्हे क काम करते हुए एक लगड़ी हिरनी को बुरी तरह घार्यल देखार् वह हिरनी झरने के नीचे आधे घण्टे पार्नी में खड़े होने के बार्द पार्नी से निकलकर जिधर से आयी थी उधर ही चली गयी। दूसरे दिन भी वह हिरनी करीब उसी समय आयी और इस बार्र आधे घण्टे से अधिक समय तक पार्नी में रहने के पश्चार्त पुन: चली गयी। प्रिस्निज ने देखार् कि तीन सप्तार्ह तक हिरनी इसी प्रकार आती रही। उन्होंने लगड़ी हिरनी झरने में नहार्ने से उसकी चोट को ठीक होतार् हुआ देखकर आश्चर्य चकित हुए।

प्रिस्निज जी सोलह वर्ष के थे जब एक दिन जंगल से लकड़ी काटकर लौटते समय बर्फ गिरने लगी। वह आधी तूफार्न में फसकर चार्र पसलियार्ं टूट गयी। उन्होंने अपनी चिकित्सार् हिरनी की तरह जल से की। इन्होंने गीली पट्टी बार्धकर ठीक कियार्। सूती कपड़े की गद्दी पार्नी में भिगोकर अपने अंग पर रखने लगे और गद्दी सूख जार्ती तो फिर से उसे पार्नी में भिगोकर रख लेते। इस तरह कुछ समय के पश्चार्त वह बिल्कुल स्वस्थ हो गये।

इनक जल चिकित्सार् पर गहन विश्वार्स हो गयार्। इन्होंने 1829 में जल चिकित्सार् प्रणार्ली की स्थार्पनार् की। जिससे इनके पार्स दूर-दूर से रोगी आने लगे। प्रिस्निज की चिकित्सार् में विशेष जल के व्यवहार्र और सार्दार् भोजन थार्। इनक आधार्रभूत सिद्धार्न्त पसीनार् निकाल कर ठण्डे जल क प्रयोग थार्। इसके बार्द रोगी की प्रतिरोधक क्षमतार् शक्ति को भी बढ़ार्ने में सहार्यतार् करने लगार्। प्रिस्निज के बार्द जोहार्न्स स्क्रार्थ ने शोध से कार्य को आगे बढ़ार्यार्।

जोहार्न्स स्क्रार्थ- प्रिस्निज के काल है इन्होंने एक सार्धु के उत्सार्हित करने पर अपनी चोट को जल चिकित्सार् से सही कियार् थार् बार्द में जार्नवरों पर सिद्धस्य हो जार्ने पर मनुष्यों पर जल चिकित्सार् क प्रयोग कियार्। इनकी ख्यार्ति बढ़ने पर ऎलोपैथिक चिकित्सार् में विश्वार्स रखने वार्ले लोगों ने शडयंत्र करके इन्हें जेल भिजवार् दियार्। जेल से बार्हर आकर 1849 में जब एक घार्यल सिपार्ही को कुछ ही दिनों में ठीक कर दियार् तो इनक यश बढ़ने लगार्। इनकी चिकित्सार् प्रणार्ली को ‘‘स्क्रार्थ चिकित्सार्’’ कहते है। इमेन्युल स्क्रार्थ यह जोहार्न्स के पुत्र थे इन्होंने प्रार्कृतिक चिकित्सार् के द्वार्रार् अनेक रोगियों क उपचार्र कियार्।

फार्दर सेबस्टिन नीप जो देवरियार् के रहने वार्ले थे इन्होंने प्रार्कृतिक चिकित्सार् क बहुत प्रचार्र कियार् तथार् जल क सफल प्रयोग कियार्। इन्होंने एक स्वार्स्थ्य ग्रह 45 वर्ष तक चलार्यार् अनेकों संस्थार्यें जर्मनी में इस चिकित्सार् प्रणार्ली से चल रही है। जल चिकित्सार् पर पुस्तक भी लिखी है।

अर्नार्ल्ड रिचली एक व्यार्पार्री थे। इन्होंने जब प्रार्कृतिक चिकित्सार् के गुणों को देखार् और सुनार् तो उससे प्रभार्वित होकर इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार् और वार्यु चिकित्सार्, जल चिकित्सार् पर कार्य कियार्।

क्रार्फोर्ड ने भी 1781 में शीतल जल के शरीर पर प्रभार्व क अध्ययन कियार् तथार् उपचार्र हेतु उपयोग भी कियार्।
डॉ0 हैलरी बेन्जार्मिल प्रार्कृतिक चिकित्सार् के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योग दियार्। उनके द्वार्रार् रचित पुस्तक इवरी बडी गार्इड टू नेचर क्योर एक प्रसिद्ध पुस्तक है।

डॉ0 मेकफेडन ने प्रार्कृतिक चिकित्सार् के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार्। उन्होंने ‘‘फार्स्टिंग फार्र हेल्थ’’ तथार् ‘‘मेकफेडन इन्सार्इक्लोपीडियार् फार्र फिजिकल क्योर’’ जैसी अनेकों पुस्तक लिखी। डॉ0 लार्केट ने अपने अनुभव पर भार्प स्नार्न द्वार्रार् पसीनार् निकालने की नयी विधि अपनार्यी गयी।
एडोल्फ जूस्ट इन्होंने प्रार्कृतिक चिकित्सार् की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘‘रीटर्न टू नेचर’’ लिखी। इन्होंने बतार्यार् कि मिट्टी के प्रयोग द्वार्रार् समस्त रोगों को दूर कियार् जार् सकतार् है। इन्होंने अपने आप मार्लिश करने की क्रियार् को भी जन्म दियार्।

रार्वर्ड हार्वर्ड यह प्रार्कृतिक आहार्र के अच्छे ज्ञार्तार् मार्ने जार्ते है।

सेलमन आपके प्रार्कृतिक चिकित्सार् के प्रचार्र में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार् इनकी लिखी पुस्तक स्वार्स्थ्य और दीर्घार्यु आज भी लोकप्रिय है।

डॉ0 केलार्ग ने रेशनल हार्इड्रोथेरेपी पुस्तक लिखी और प्रार्कृतिक चिकित्सार् में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार्। डॉ0 केलार्ग ने मार्लिश, धूप चिकित्सार्, आहार्र चिकित्सार् आदि अनेक विषयों पर अनेकानेक पुस्तक लिखी। सभी चिकित्सार् प्रणार्लियार्ँ जैसे आहार्र चिकित्सार्, जल चिकित्सार्, शल्य चिकित्सार्, विघुत चिकित्सार्, द्वार्रार् रोगों क उपचार्र होतार् है वहार्ँ यह भी बतार्यार् जार्तार् है कि उत्त्ार्म स्वार्स्थ्य तथार् लम्बी आयु कैसे प्रार्प्त करें।आज अमेरिक में प्रार्कृतिक चिकित्सार् एक चिकित्सार् विज्ञार्न के रूप में कर्इ विश्वविद्यार्लय में पढ़ाइ जार् रही है तथार् उनके चिकित्सीय महत्पपूर्ण योगदार्न दे रहे है। डॉ0 जार्नबेल द्वार्रार् रचित पुस्तक ‘‘बार्थ’’ एक प्रसिद्ध कृति है।
स्टैनली लीफ क सन् 1892 र्इ0 में रूस के एक गार्ँव में जन्म हुआ। और इनक जीवन दक्षिण अफ्रीक में बीतार् और जब बड़े हुए तब अमेरिक जार्कर मैकफेडन के प्रार्कृतिक शिक्षार्लय में भर्ती होकर प्रार्कृतिक चिकित्सार् की शिक्षार् प्रार्प्त की। इग्लैण्ड से निकलने वार्ली मार्सिक पत्र ‘‘हेल्थ फार्र आल’’ के सम्पार्दक तथार् दो प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी। वेनेडिक्ट लुस्ट अमेरिक के एक जार्ने मार्ने प्रार्कृतिक चिकित्सक रहे है उन्होंने ‘‘नीप वार्टर क्योर’’ नार्मक एक मार्सिक पत्रिक निकाली तथार् न्यूयाक में नैच्यूरोपेथी स्कूल आफ कैरोप्रेिक्ट्स की भी स्थार्पनार् की।
आस्ट्रियार् के फ्रंन प्रार्न्त के अन्र्तगत टेल्डार्स- नार्मक स्थार्न पर सन् 1848 र्इ0 में धूप और वार्यु क जो संसार्र में सर्वप्रथम अपने ढंग क प्रार्कृतिक चिकित्सार् भवन यार् बार्द में लगभग सभी प्रार्कृतिक चिकित्सकों ने इसी आधार्र पर चिकित्सार् ग्रहों क निर्मार्ण करार्यार्। अपने 67 वर्ष की लम्बी आयु क उपयोग कियार् और मरने के समय तक स्वस्थ और स्फूर्तिवार्न बने रहे। लुर्इ कुने-प्रार्कृतिक चिकित्सार् को विकास एवं उन्नति के शिखर पर पहुँचार्ने क श्रेय प्रिस्निज, नीप एवं कूने तीनों को है। परन्तु कुने के विशेष योगदार्न की वजह से आज प्रार्कृतिक चिकित्सार् को कुने चिकित्सार् प्रणार्ली के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है।

लूर्इ कूने क जन्म जर्मनी के लिपजिंग नगर में एक जुलार्हे के घर हुआ थार्। इनके मार्तार् पितार् की मृत्यु एलोपैथ चिकित्सकों के उपचार्र के मध्य हुर्इ 20 वर्ष की अल्पार्यु में ही इन्हे भी मस्तिष्क एवं फुस्फुस के भयंकर रोग के सार्थ-सार्थ आमार्शय क फोड़ार् हो गयार् जो कि किसी भी डार्क्टर से ढीक नहीं हुआ जीवन से ऊबकर अंत में सन् 1864 में इन्होंने प्रार्कृतिक चिकित्सार् की शरण ली और बहुत जल्दी स्वार्स्थ्य प्रार्प्त कियार्।परिणार्मत: ये प्रार्कृतिक चिकित्सार् के भक्त बने और निरन्तर अध्ययन मनन के बार्द 10 अक्टूबर 1883 र्इ0 में लिपजिंग स्थित प्लार्स प्लेट्ज स्थार्न पर एक निज क स्वार्स्थ्य ग्रह खोल दियार्। कुने की जर्मन भार्षार् में लिखी अनेक पुस्तकों में the science of facial expression vkSj New science of healing जिनक हिन्दी रूपार्न्तर सस्तार् सार्हित्य मंडल दिल्ली एवं आरोग्य मंदिर गोरखपुर ने क्रमश: आकृति से रोगी की पहचार्न एवं रोगों की नर्इ चिकित्सार् नार्म से कियार् है ये पुस्तकें विश्व प्रसिद्ध है। फ्रेच, ग्रीक, इंग्लिश आदि कर्इ भार्षार् में इन पुस्तकों के अनुवार्द हो चुके है तथार् अन्य भार्षार्ओं में हो रहे है।कुने प्रार्कृतिक चिकित्सार् सिद्धार्न्तों में रोगों क कारण एक ही है, शरीर में विजार्तीय द्रव्य क इक्कठार् होनार् मुख्य कारण है इनके उपचार्र के तरीकों में सूर्य चिकित्सार्, भार्प स्नार्न, कटिस्नार्न प्रमुख है।

Schweninger ऐलोपैथिक डार्क्टर ने बार्द में प्रार्कृतिक चिकित्सार् बने। इन्होंने The Doctor नार्मक एक सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखकर वर्तमार्न में प्रचलित जहरीली तथार् प्रार्ण घार्तक औषधियों द्वार्रार् चिकित्सार् विधि की बड़ी कटु आलोचनार् की।

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