प्रशिक्षण क्यार् है ?

सार्धार्रण शब्दों में, प्रशिक्षण किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने के लिए एक कर्मचार्री के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं में वृद्धि करने क कार्य है। प्रशिक्षण एक अल्पकालीन शैक्षणिक प्रक्रियार् है तथार् जिसमें एक व्यवस्थित एवं संगठित कार्य-प्रणार्ली उपयोग में लार्यी जार्ती हैं, जिसके द्वार्रार् एक कर्मचार्री किसी निश्चित उद्देश्य के लिए तकनीकी ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं को सीखतार् है। दूसरे शब्दों में प्रशिक्षण कार्य एवं संगठन की आवश्यकतार्ओं के लिए एक कर्मचार्री के ज्ञार्न निपुणतार्ओं, व्यवहार्र, अभिरूचियों तथार् मनोवृत्तियों में सुधार्र करतार् है, परिर्वतन उत्पन्न करतार् है तथार् ढार्लतार् है। इस प्रकार प्रशिक्षण एक सीखने क अनुभव है। जिसके अन्तर्गत यह एक कर्मचार्री में तुलनार्त्मक रूप से स्थार्यी परिवर्तन लार्ने क प्रयार्स करतार् है, जो कि उसके कार्य क निष्पार्दन क्षमतार् में सुधार्र लार्तार् है। प्रशिक्षण की कुछ प्रमुख परिभार्षार्यें निम्नलिखित प्रकार से है:

  1. एडविन बी. फिलिप्पार् के अनुसार्र ‘‘प्रशिक्षण किसी कार्य विशेष को करने के लिए एक कर्मचार्री के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं में वृद्धि करने क कार्य है’’ 
  2. डेल एस. बीच के अनुसार्र’’ प्रशिक्षण एक संगठित प्रक्रियार् है, जिसके द्वार्रार् लोग किसी निश्चित उद्देश्य के लिए ज्ञार्न तथार्/अथवार् निपुणतार्ओं को सीखने है।’’ 
  3. अरून मोनप्पार् एवं मिर्जार् एस. सैय्यदैन के अनुसार्र, ‘‘प्रशिक्षण सिखार्ने/सीखने के क्रियार्कलार्पों से सम्बन्धित होतार् है, जो कि एक संगठन के सदस्यों को उस संगठन द्वार्रार् अपेक्षित ज्ञार्न निपुणतार्ओं, योग्यतार्ओं तथार् मनोवृत्तियों को अर्जित करने एवं प्रयोग करने के लिए सहार्यतार् करने में प्रार्थमिक उद्देश्य हेतु जार्री रखी जार्ती है।’’ 

प्रशिक्षण के विशेषतार्यें 

  1. प्रशिक्षण, मार्नव संसार्धन विकास की एक महत्वपूर्ण उप-प्रणार्ली तथार् मार्नव संसार्धन प्रबन्धन के लिए आधार्रभूत संचार्लनार्त्मक कार्यों में से एक है 
  2. प्रशिक्षण कर्मचार्रियो के विकास की एक व्यवस्थित एवं पूर्व नियोजित प्रक्रियार् होती है। 
  3. प्रशिक्षण एक सतत् जार्री रहने वार्ली प्रक्रियार् है। 
  4. प्रशिक्षण सीखने क अनुभव प्रार्प्त करने की प्रक्रियार् है। 
  5. प्रशिक्षण किसी कार्य की व्यार्वहार्रिक शिक्षार् क स्वरूप होतार् है। 
  6. प्रशिक्षण के द्वार्रार् कर्मचार्रियों के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं में वृद्धि की जार्ती हैं। तथार् उनके विचार्रों, अभिरूचियो एवं व्यवहार्रों में परिर्वतन लार्यार् जार्तार् है। 
  7. प्रशिक्षण से कर्मचार्रियो की कार्यक्षमतार् में वृद्धि होती है। 
  8. प्रशिक्षण मार्नवीय संसार्धनों में उद्देश्यपूर्ण विनियोग है, क्योंकि यह संगठनार्त्मक लक्ष्यों की पूर्ति में सहार्यक होतार् है। 
  9. प्रशिक्षण प्रबन्धतन्त्र क महत्वपूर्ण उत्तरदार्यित्व होतार् है। 

अत: निष्कर्ष के रूप में यह कहार् जार् सकतार् है कि प्रशिक्षण, कार्यों को सही एवं प्रभार्वपूर्ण ढंग से सम्पन्न करने के लिए कर्मचार्रियों को जार्नकारी प्रदार्न करने की प्रक्रियार् है, जिससे कि उनकी कार्य के प्रति समझ, कार्यक्षमतार् तथार् उत्पार्दकतार् में वृद्धि हो सके।

प्रशिक्षण एवं शिक्षार् 

प्रशिक्षण, शिक्षार् से भिन्न होतार् है तथार् दोनों के बीच भेद इस प्रकार के है:-

  1. प्रशिक्षण वह प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने के लिए कर्मचार्रियों के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं में वृद्धि की जार्ती है, इसके विपरीत, शिक्षार् ऐसी प्रक्रियार् है जिसके मार्ध्यम से किसी व्यक्ति के सार्मार्न्य ज्ञार्न तथार् बोध-शक्ति में वृद्धि की जार्ती है।
  2. प्रशिक्षण क क्षेत्र एक कार्य विशेष तक ही सीमित होतार् है, जबकि शिक्षार् क क्षेत्र अपेक्षार्कृत व्यार्पक होतार् है जो कि विभिन्न पहलुओं के सम्बन्ध में सार्मार्न्य ज्ञार्न प्रदार्न करती है;
  3. प्रशिक्षण तकनीकी ज्ञार्न से सम्बन्धित होतार् है, वहीं दूसरी ओर शिक्षार् तकनीकी एवं सैद्धार्न्तिक दोनों ही प्रकार के ज्ञार्न से सम्बन्धित होती है; 
  4. प्रशिक्षण व्यार्वहार्रिक ज्ञार्न पर आधार्रित होतार् है, जबकि शिक्षार् सैद्धार्न्तिक ज्ञार्न पर बल देती है; तथार् 
  5. प्रशिक्षण रोजगार्र-उन्मुख होतार् है, इसके विपरीत शिक्षार् व्यक्ति-उन्मुख होती है। शिक्षार् एवं प्रशिक्षण दोनों ही कर्मचार्रियों के ज्ञार्न, निपुणतार्ओं तथार् योग्यतार्ओं के लिए आवश्यक है, सार्थ ही दोनो ही परस्पर घनिष्ट रूप से सम्बन्धित होते है। अत’ यह कहार् जार् सकतार् है। कि प्रशिक्षण शिक्षार् क भार्ग है।

प्रशिक्षण एवं विकास 

प्रशिक्षण एवं विकास भी एक-दूसरे से भिन्न होते है दोनों के बीच भिन्नतार् को इस प्रकार से समझार् जो सकतार् है:-

  1. प्रशिक्षण कर्मचार्रियों को उनके कार्यों के सम्बन्ध में क्रियार्ओं तथार् तकनीकी एवं सहार्यक क्षेत्रों के लिए प्रदार्न कियार् जार्तार् है, जबकि विकास, प्रबन्ध, प्रशार्सन तथार् संगठन आदि के सिद्धार्न्तों एवं तकनीकों के क्षेत्र में विकसित करने से सम्बन्धित होतार् है।
  2. प्रार्य: ‘प्रशिक्षण’ शब्द तकनीकी कर्मचार्रियों एवं गैर-प्रबन्धकीय व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होतार् है वहीं दूसरी ओर ‘विकास’ शब्द क प्रयोग अधिकतर प्रबन्धकीय व्यक्तियों के सन्दर्भ में ही कियार् जार्तार् है।
  3. प्रशिक्षण क मुख्य उद्देश्य कर्मचार्रियों को किसी कार्य को करने के योग्य बनार्नार् होतार् है, इसके विपरीत विकास क मुख्य उद्देश्य प्रबन्धकीय व्यक्तियों के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं के सार्थ-सार्थ व्यक्तित्व क सर्वार्गीण विकास करनार् होतार् है। तेजी से बदलते हुए प्रौद्योगिक तथार् सार्मार्जिक, आर्थिक एवं रार्जनैतिक वार्तार्वरण मे संगठनों के लिए प्रशिक्षण एवं विकास दोनों ही अत्यन्त आवश्यक हो गये है।

प्रशिक्षण के उद्देश्य 

किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलतार् इस बार्त पर निर्भर करती है कि इसके उद्देश्यों क निर्धार्रण कितनी कुशलतार् से कियार् गयार् है। सार्मार्न्य: संगठनों द्वार्रार् अपने कर्मचार्रियों को प्रशिक्षित करने के लिए जो उद्देश्य होते है, वे निम्नलिखित प्रकार से है:-

  1. कार्य एवं संगठन की वर्तमार्न तथार् सार्थ ही परिवर्तित आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए नये तथार् पुरार्ने दोनों कर्मचार्रियों को तैयार्र करनार् 
  2. किसी निश्चित कार्य के कुशलतार्पूर्ण निष्पार्दन के लिए नव-नियुक्त कर्मचार्रियों को आवश्यक आधार्रभूत ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं को प्रदार्न करनार्। 
  3. संगठन के सभी स्तरों पर योग्य एवं कुशल कर्मचार्रियों की व्यवस्थार् को बनार्ये रखनार्।
  4. कर्मचार्रियों को कार्य-दशार्ओं एवं संगठनार्त्मक संस्कृति के अनुकूल बनार्नार्। 
  5. न्यूनतम लार्गत, अपव्यय एवं बर्बार्दी तथार् न्यूनतम पर्यवेक्षण पर कर्मचार्रियों से श्रेष्ठ ढंग से कार्य सम्पार्दन को प्रार्प्त करनार्। 
  6. कर्मचार्रियों को दुर्घटनार्ओं से बचार्व की विधियों से परिचित करार्नार्। 
  7. नवीन प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी परिवर्तनों से कर्मचार्रियों को परिचित करवार्ने तथार् बदलते हुए वार्तार्वरण के सार्थ कदम मिलार्कर चलने के लिए कर्मचार्रियों को विकसित करनार्।
  8. स्थार्नार्न्तरण एवं पदोन्नति के सम्बन्ध में नवीन कार्य-दशार्ओं में समार्योजित करने के लिए कर्मचार्रियों को तैयार्र करनार् 
  9. कर्मचार्रियों को नवीनतम अवधार्रणार्ओं, सूचनार्ओं एवं तकनीकों के विषय में जार्नकारी प्रदार्न करने तथार् उन निपुणतार्ओं, जिनकी उन्हें अपने-अपने विशेष क्षेत्रों मे आवश्यकतार् है अथवार् होगी, उनको विकसित करने के द्वार्रार् उन्हें उनके वर्तमार्न पदों पर अधिक प्रभार्वपूर्ण रूप से कार्य सम्पé करने के लिए सहार्यतार् प्रदार्न करनार्। 
  10. संगठन के अन्तर्गत समस्त विभार्गों की कार्य-प्रणार्ली को सरल एवं प्रभार्वी बनार्नार्। 
  11. कर्मचार्रियों की कार्य सम्पार्दन सम्बन्धी आदतों में सुधार्र करनार्। 
  12. कर्मचार्रियों की आत्म-विश्लेषण करने की योग्यतार् तथार् कार्य सम्बन्धी निर्णय क्षमतार् क विकास करनार्ं 
  13. वैयक्तिक एवं सार्मूहिक मनोबल, उत्तदार्यित्व की अनुभूति, सहकारितार् की मनोवृत्तियों तथार् मधुर सम्बन्धों को बढ़ार्वार् देनार्। 
  14. संगठन द्वार्रार् आपेक्षित स्तर के आर्थिक लक्ष्यों की प्रार्प्ति को सुनिश्चित करनार्। 
  15. मार्नव संसार्धन विकास के लक्ष्यों की पूर्ति करनार्।

प्रशिक्षण की आवश्यकतार् 

प्रशिक्षण किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने हेतु कर्मचार्रियों को महत्वपूर्ण विशिष्ट निपुणतार्ओं के प्रदार्न किये जार्ने से सम्बन्धित होतार् है। प्रशिक्षण, मुख्य रूप से कार्य-उन्मुख होतार् है तथार् इसक लक्ष्य वर्तमार्न कार्य-निष्पार्दन को बनार्ये रखनार् एवं उसमें सुधार्र करनार् होतार् है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण निम्नलिखित कारणों से आवश्यक होतार् है:-

  1. शैक्षणिक संस्थार्नों एवं विश्वविद्यार्लयों की शिक्षार् सैद्धार्न्तिक ज्ञार्न की ठोस नींव तो डार्ल सकती है, किन्तु विभिन्न कार्यों के सफल निष्पार्दन हेतु व्यार्वहार्रिक ज्ञार्न एवं विशिष्ट निपुणतार्ओं की आवश्यकतार् होती है, जो कि प्रशिक्षण द्वार्रार् ही पूरार् की जार् सकती है। 
  2. नव-नियुक्त कर्मचार्रियों को प्रशिक्षण प्रदार्न करनार् आवश्यक होतार् है, तार्कि वे अपने कार्यों को प्रभार्वपूर्ण रूप से सम्पन्न कर सके। 
  3. वर्तमार्न कर्मचार्रियों को उच्चतर स्तर के कार्यों के लिए तैयार्र करने हेतु प्रशिक्षण अनिवाय होतार् है। 
  4. वर्तमार्न कर्मचार्रियों के लिए पुर्नअभ्यार्स प्रशिक्षण आवश्यक होतार् है, तार्कि वे कार्य-संचार्लनों में होने वार्ले नवीनतम विकासों के सार्थ-सार्थ चल सकें। इसके अतिरिक्त तीव्र गार्ति से होने वार्ले प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के लिए भी यह अत्यन्त आवश्यक होतार् है। 
  5. कर्मचार्रियों को गतिशील एवं परिवर्तनशील बनार्ने के लिए प्रशिक्षण अनिवाय होतार् है। इससे उन्हें संगठनार्त्मक आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र विभिन्न कार्यों पर नियुक्त कियार् जार्तार् सकतार् हैं। 
  6. कर्मचार्री के पार्स क्यार् है? तथार् कार्य की आवश्यकतार् क्यार् है, इन दोनों के बीच के अन्तर को दूर करने हेतु प्रशिक्षण अत्यन्त आवश्यक होतार् हैं। इसके अतिरिक्त, कर्मचार्रियों को अधिक उत्पार्दक एवं दीर्घकालिक उपयोगी बनार्ने के लिए भी प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। 
  7. अधिसमय, कार्य-लार्गत, अनुपस्थिततार् तथार् कर्मचार्री-परिवर्तन में कमी लार्ने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होतार् है। 
  8. दुर्घटनार्ओं की दरों में कमी लार्ने तथार् उत्पार्दन की गुणवत्तार् में सुधार्र करने के लिए समय-समय पर कर्मचार्रियों को प्रशिक्षित कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है।

प्रशिक्षण के क्षेत्र 

प्रार्य: विभिन्न संगठन अपने कर्मचार्रियों को निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदार्न करते है:-

  1. ज्ञार्न: इसके अन्तर्गत प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी कार्यो, कर्मचार्री-व्यवस्थार् तथार् संगठन द्वार्रार् उत्पार्दित वस्तुओं अथवार् प्रदत्त सेवार्ओं के विषय में निर्धार्रित नियमों एवं विनियमों को सीखते है। इसक उद्देश्य नव-नियुक्त कर्मचार्रियों को इस सम्बन्ध में पूर्ण रूप से अवगत करार्नार् होतार् है कि संगठन के भीतर तथार् बार्हर क्यार्-क्यार् घटित होतार् है। 
  2. तकनीकी निपुणतार्यें: इसमें कर्मचार्रियों को एक विशिष्ट निपुणतार् (जैसे-किसी यन्त्र क संचार्लन करनार् अथवार् कम्प्यूटर क संचार्लन करनार्) को सिखार्यार् जार्तार् है, तार्कि वे उस निपुणतार् को अर्जित कर सकें तथार् संगठन के प्रति अर्थपूर्ण रूप से अपनार् योगदार्न दे सकें। 
  3. सार्मार्जिक निपुणतार्यें: इसके अन्तर्गत कर्मचार्रियों को कार्य-सम्पार्दन के लिए एक उचित मार्नसिक स्थिति क विकास करने तथार् वरिष्ठों, सहकर्मियों एवं अधीनस्थों के प्रति आचरण के ढंगों को सिखार्यार् जार्तार् हैं। इसमें प्रमुख ध्यार्न इस बार्त पर दियार् जार्तार् है कि एक कर्मचार्री को कार्य-समूह के सदस्य के रूप में किस प्रकार से समार्योजित कियार् जार्ये। 
  4. तकनीकें: इसमें कर्मचार्रियों को कार्य सम्पार्दन की विभिन्न स्थितियों में उनके द्वार्रार् अर्जित ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं के प्रयोग के विषय में जार्नकारी प्रदार्न की जार्ती है। कर्मचार्रियों के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं के सुधार्र करने के अतिरिक्त, प्रशिक्षण क उद्देश्य कर्मचार्रियों की मनोवृत्तियों को संगठनार्त्मक संस्कृ ति के अनुरूप ढार्लनार् भी होतार् है। जब एक प्रशिक्षण कार्यक्रम क प्रशार्सन समुचित ढंग से कियार् जार्तार् है तो इससे संगठन के क्रियार्कलार्पों के लिए कर्मचार्रियों की निष्ठार्, लगार्व एवं वचनबद्धतार् को स्थार्यी रूप से प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है।

प्रशिक्षण के सिद्धार्न्त 

संगठनार्त्मक कार्यों की सफलतार् के लिए कर्मचार्रियों को प्रशिक्षित करनार् अनिवाय होतार् है। परन्तु कार्य-सम्बन्धी ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं के लिए प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्नार् एक जटिल प्रक्रियार् है। विद्धार्नों ने विभिन्न शोधों एवं प्रयोगों पर आधार्रित कुछ सिद्धार्न्तों को विकसित कियार् है। इन मागदर्शक सिद्धार्न्तों क अनुपार्लन प्रशिक्षण प्रक्रियार् को सुलभ बनार् देतार् है तथार् इससे प्रशिक्षण के उद्देश्यों को प्रार्प्त करनार् भी सम्भव होतार् है। इनसें से कुछ प्रमुख सिद्धार्न्तों क वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है।

  1. अभिप्रेरण : प्रशिक्षण कार्यक्रम इस प्रकार क होनार् चार्हिये, जो कि प्रशिक्षाथियों को प्रशिक्षण प्रार्प्त करने के लिए अभिप्रेरित कर सके। प्रशिक्षाथियों को अभिपे्िर रत करने के लिए प्रशिक्षण की उपयोगितार् एवं प्रशिक्षाथियों की आवश्यकतार्ओं के बीच एकात्मकतार् स्थार्पित करनार् आवश्यक है। प्रशिक्षाथियों की आवश्यकतार्यें, सार्मार्जिक आर्थिक एवं मनोवज्ञै ार्निक हो सकती हैं। जब प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी यह अनुभव करते हैं। कि प्रशिक्षण उनकी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति की सहार्यक हो सकतार् है, तो इसके प्रति उनमें रूचि एवं उत्सार्ह क उत्पन्न हो जार्नार् स्वार्भार्विक है। 
  2. प्रगति प्रतिवेदन : प्रशिक्षण को प्रभार्वपूर्ण बनार्ने तथार् प्रशिक्षाथियों के मनोबल को बनार्ये रखने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक हैं कि प्रशिक्षाथियों को उनकी प्रगति के विषय में समय-समय पर जार्नकारी प्रदार्न की जार्ये। प्रशिक्षण काल के दौरार्न प्रशिक्षक द्वार्रार् निरन्तर यह अनुमार्न लगार्यार् जार्नार् चार्हिये कि प्रशिक्षाथियों ने किन-किन क्षेत्रों में कितनी प्रगति कर ली हैं प्रगति प्रतिवेदन से प्रशिक्षण में नियमिततार्, तत्परतार् एवं प्रभार्वशीलतार् बनी रहती है। 
  3. प्रबलन : प्रशिक्षण कार्यक्रम की प्रभार्वपूर्णतार् के लिए पुरस्कार एवं दण्ड के मार्ध्यम से प्रशिक्षाथियों क प्रबलन भी कियार् जार्नार् चार्हिये। इसक अर्थ यह है कि प्रगति क मूल्यार्ंकन करने पर अच्छे परिणार्मों के लिए पुरस्कार तथार् खरार्ब परिणार्मों के लिए दण्डित करने की भी व्यवस्थार् होनार् आवश्यक है। पदोन्नति, वेतन-वृद्धि, प्रशंसार् एवं मार्न्यतार् आदि के द्वार्रार् अच्छे परिणार्मों के लिए प्रशिक्षाथियों को पुरस्कृत कियार् जार् सकतार् हैं। परन्तु दण्ड के सम्बन्ध में प्रबन्धतन्त्र को अत्यन्त ही सार्वधार्नी बरतनी चार्हिये। 
  4. प्रतिपुष्टि : प्रगति प्रतिवेदन एवं प्रतिपुष्टि दोनों एक-दूसरे के सहार्यक सिद्धार्न्त है। प्रतिपुष्टि को प्रगति प्रतिवेदन क पूरक कहार् जार् सकतार् है। इसक आशय यह है कि प्रशिक्षाथियों को उनकी त्रुटियों एवं कमियों क ज्ञार्न प्रशिक्षण की अवधि में समय-समय पर प्रार्प्त होते रहनार् आवश्यक है, तार्कि समय रहते वे त्रुटियों को सुधार्र सकें। प्रशिक्षक को भी चार्हिए कि वह त्रुटियों के कारणों क पतार् लगार्कर उन्हें सुधार्रने हेतु प्रयार्स करें 
  5. वैयक्तिक भिéतार्ये : प्रार्य: प्रशिक्षाथियों को सार्मूहिक रूप से प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्तार् है, क्योंकि इससे समय एवं धन दोनों की बचत होती है। परन्तु प्रशिक्षाथियों की बौद्धिक क्षमतार् एवं सीखने की तत्परतार् एक-दूसरे से भिन्न होती है। अत; प्रशिक्षाथियों की इन भिन्नतार्ओं को ध्यार्न में रखकर प्रशिक्षण कार्यक्रम को तैयार्र कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  6. अभ्यार्स : किसी कार्य को भली-भार्ँति सीखने के लिए उसक वार्स्तविक अभ्यार्स अत्यन्त आवश्यक है। केवल व्यार्ख्यार्न सुनने एवं चलचित्र आदि देखने से किसी कार्य को सम्पन्न करने की विधि सीखनार् कठिन होतार् है। अत:, प्रशिक्षण एवं साथक बनार्ने के लिए यह भी आवश्यक हैं कि प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी को कार्य के अभ्यार्स क पर्यार्प्त अवसर प्रदार्न कियार् जार्ये

विभिन्न श्रेणियों के कर्मचार्रियों के लिए प्रशिक्षण स्तर 

प्रार्य:, किसी भी संगठन में विभिé श्रेणियों के कर्मचार्री कार्य करते हैं। इन सभी कर्मचार्रियों को एक सार् प्रशिक्षण नहीं दियार् जार् सकतार्, बल्कि इनके लिए अलग-अलग स्तर के प्रशिक्षण की आवश्यकतार् होती है। कर्मचार्रियों की श्रेणी के आधार्र पर प्रशिक्षण के विभिé स्तरों क वर्णन निम्नलिखित प्रकार से कियार् जार् सकतार् है:-

  1. पर्यवेक्षकों के लिए प्रशिक्षण: प्रार्य: पर्यवेक्षक कर्मचार्रियों के कार्यों क निरीक्षण करते हैं तथार् उन्हें कार्यों के सम्बन्ध में आवश्यक सुझार्व देते है। पर्यवेक्षक अधिकतर एक प्रबन्धक के निर्देशन में निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण की सीखते है। इसलिए पर्यवेक्षकों के लिए कार्य पर प्रशिक्षण विधियों पर बल दियार् जार्नार् चार्हिये। इन विधियों की कमी को विभिé कार्य से पृथक प्रशिक्षण विधियों के द्वार्रार् पूरार् कियार् जार् सकतार् है। सार्मार्न्यत:, पर्यवेक्षक के प्रशिक्षण में उत्पार्दन-नियन्त्रण, कार्य एवं क्रियार्कलार्प नियन्त्रण, कार्य-पद्धति अध्ययन, समय संसार्धन नीतियार्ँ अधीनस्थों क प्रशिक्षण, परिवेदनार् निवार्रण पद्धति, अनुशार्सनिक प्रक्रियार्, सम्प्रेषण, प्रभार्वी निर्देशन करनार्, प्रतिवेदन बनार्नार्, निष्पार्दन मूल्यार्ंकन, कर्मचार्री अभिलेख, अनुपस्थिततार् क निवार्रण, कर्मचार्री-परिवर्तन, औद्योगिक एवं श्रमिक विधियार्ँ, नेतृत्व क्षमतार् तथार् दुर्घटनार्ओं की रोकथार्म आदि विषय सम्मिलित कियार् जार्तार् है। 
  2. विक्रय प्रतिनिधियों के लिए प्रशिक्षण : विक्रय प्रतिनिधियों के लिए प्रशिक्षण में कार्य पर प्रशिक्षण के सार्थ-सार्थ कार्य से पृथक प्रशिक्षण विधियों पर बल दियार् जार्नार् चार्हिए। विक्रय प्रतिनिधियों को संगठनार्त्मक ज्ञार्न, संगठन के उत्पार्दन, ग्रार्हकों , प्रतिस्पर्धियों, विक्रय प्रशार्सन एवं प्रबन्ध प्रक्रियार्ओं, ग्रार्हकों के समक्ष प्रस्तुतीकरण के ढंगों, ग्रार्हकों की आपत्तियों को निपटार्ने के तरीकों, संगठन के प्रति निष्ठार् तथार् संगठन के उत्पार्दों के विषय में विश्वार्स सृजन आदि विषयों में प्रशिक्षित कियार् जार्तार् है। 
  3. लिपिकीय कर्मचार्रियों के लिए प्रशिक्षण : लिपिकीय कर्मचार्रियों के लिए प्रशिक्षण आार्वश्यक होतार् है। इन कर्मचार्रियों के प्रशिक्षण में कार्य से पृथक प्रशिक्षण विधियों को अपनार्यार् जार् सकतार् है। प्रार्य: लिपिकीय कर्मचार्रियों को संगठन की पृष्ठभूमि के विषय में ज्ञार्न, संगठन की नीतियों, प्रक्रियार्ओं एवं कार्यक्रमों, लिखित सम्प्रेषण की विधियों, लिपिकीय योग्यतार् तथार् प्रतिवेदनार् , अभिलेखों एवं पत्रार्वलियों के रखरखार्व आदि के विषय में प्रशिक्षित कियार् जार्तार् है। 
  4. कुशल श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण : किसी भी संगठन के कुशल श्रमिक अधिकतर विभिन्न तकनीकी संस्थार्नों द्वार्रार् प्रशिक्षित व्यक्ति होते है। फिर भी, कार्य एवं संगठन की आवश्यकतार् तथार् संगठनार्त्मक परिस्थितियों के अनुकूल उन्हें ढार्लने के लिए प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। प्रार्य:, कुशल श्रमिकों को कार्य करने के तरीकों, उत्तरदार्यित्वों, वरिष्ठ अधिकारियों, अधीनस्थ श्रमिकों, वेतन भुगतार्न के तरीकों, छुट्टियों एवं अवकाशों, विभिé कल्यार्ण सुविधार्ओं तथार् अनुशार्सन के सम्बन्ध में प्रशिक्षित कियार् जार्तार् है।
  5. अर्द्ध-कुशल श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण : चूँकि, अर्द्ध-कुशल श्रमिकों को तकनीकी ज्ञार्न पहले से ही होतार् है, अत: इनके प्रशिक्षण में अधिक श्रम नहीं करनार् पड़तार् है। फिर भी, इन्हें प्रशिक्षित कियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है। ऐसे श्रमिकों को प्रशिक्षण, विशेषज्ञों द्वार्रार् कार्य पर अथवार् प्रशिक्षशार्लार्ओं में दियार् जार्नार् चार्हिये। प्रार्य:, ऐसे श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण उनकी प्रशिक्षण सम्बन्धी आवश्यकतार् पर निर्भर करतार् है।
  6. अकुशल श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण : अकुशल श्रमिकों केार् उनके कार्यों के आधार्र पर ही उनके पर्यवेक्षकों द्वार्रार् कार्य स्थल पर ही तथार् कार्य करते समय ही प्रशिक्षित कियार् जार्नार् चार्हिए। अकुशल श्रमिकों के प्रशिक्षण में कार्य-पद्धति क सुधार्र करनार् तथार् यन्त्रों, उपकरणों एवं वस्तुओं क मितव्यतार्पूर्ण प्रयोग कर उत्पार्दन लार्गत में कमी करनार् आदि को सम्मिलित कियार् जार्तार् है।

प्रशिक्षण के प्रकार 

विभिé संगठनों द्वार्रार् अपने उद्देश्यों एवं आवश्यकतार्ओं के आधार्र पर भिé-भिé प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों क उपयोग अपने कर्मचार्रियों को प्रशिक्षित करने हेतु कियार् जार्तार् है। उनमें से कुछ प्रमुख क विवरण निम्नलिखित प्रकार से है:-

  1. कार्य-परिचय अथवार् अभिमुखीकरण प्रशिक्षण : इस प्रकार के प्रशिक्षण के उद्देश्य नव-नियुक्त कर्मचार्रियों को उनके कार्य एवं संगठन से परिचित करार्नार् होतार् है। इसके द्वार्रार् नव-नियुक्त कर्मचार्रियों को संगठन की नीतियों, उद्देश्यों, संगठन की सरंचनार्, उत्पार्दन-प्रणार्लियों तथार् कार्य-दशार्ओं आदि की जार्नकारी प्रदार्न की जार्ती है। यह प्रशिक्षण नव-नियुक्त कर्मचार्रियों में संगठन के प्रति निष्ठार्, रूचि एवं विश्वार्स उत्पन्न करने तथार् संगठन के सार्थ एकात्मकतार् स्थार्पित करने के लिए आवश्यक होतार् है। 
  2. कार्य प्रशिक्षण : कार्य प्रशिक्षण, कर्मचार्रियों को उनके कार्यों में दक्ष एवं निपुण बनार्ने तथार् कार्यों की बार्रीकियार्ँ समझार्ने के लिए प्रदार्न कियार् जार्तार् है, तार्कि वे अपने कार्यों क कुशलतार्पूर्वक सम्पार्दन कर सकें। इसमें कर्मचार्रियों को कार्य के विभिन्न पहलुओं, उसमें प्रयुक्त यन्त्रों एवं उपकरणों तथार् कार्यविधियों की जार्नकारी प्रदार्न की जार्ती है। इस प्रकार के प्रशिक्षण से कर्मचार्रियों की कार्यकुशलतार् एवं उत्पार्दकतार् में वृद्धि होती है। यह प्रशिक्षण नये तथार् पुरार्ने दोनों प्रकार के कर्मचार्रियों को दियार् जार्तार् सकतार् है। 
  3. पदोéति प्रशिक्षण : संगठन में जब कर्मचार्रियों को पदोéत कियार् जार्तार् है तो उन्हें उच्च पद के कार्य क प्रशिक्षण दियार् जार्नार् आवश्यक होतार् है, तार्कि वे अपने नवीन कर्तव्यों एवं उत्तरदार्यित्वों क कुशलतार्पूर्वक निर्वार्ह कर सकें। सार्मार्न्यत: संगठन द्वार्रार् उच्च पदों की भार्वी रिक्तियों क अनुमार्न लगार्कर सम्भार्वित प्रत्यार्शियों को पहले से ही प्रशिक्षित करने की व्यवस्थार् की जार्ती है। कर्इ बार्र कर्मचार्रियों को पदोéति के तुरन्त बार्द भी प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्तार् है इसमें कर्मचार्रियों को नये पदों के कर्तव्यों, उत्तरदार्यित्वों, अधिकारों तथार् अन्य कार्यों से सम्बन्धों आदि क ज्ञार्न करवार्यार् जार्तार् है। 
  4. पुनअभ्यार्स प्रशिक्षण : वर्तमार्न परिवर्तनशील वार्तार्वरण एवं तीव्र प्रौद्योगिकीय विकास के परिणार्मस्वरूप इस प्रकार के प्रशिक्षण क महत्व बढ़ गयार् है। अत: कर्मचार्रियों को केवल एक बार्र प्रशिक्षित कर देनार् ही पर्यार्प्त नहीं होतार् है। उत्पार्दन में नवीन तकनीकों एवं यन्त्रों क प्रयोग किये जार्ने तथार् नवीतम कार्य-प्रणार्लियों को अपनार्ये जार्ने की दशार् में पुरार्ने कर्मचार्रियों को पुन: प्रशिक्षित किये जार्ने की आवश्यकतार् उत्पन्न हो जार्ती है पुरार्ने कर्मचार्रियों के ज्ञार्न को तरार्-तार्जार् करने उनकी मिथ्यार् धार्रणार्ओं को दूर करने, उन्हें नवीन कार्य-पद्धतियों एवं नये सुधार्रों से परिचित करवार्ने तथार् उन्हें नवीन परिवर्तन से अवगत करार्ने की दृष्टि से यह प्रशिक्षण आवश्यक है। इस प्रकार ज्ञार्न क नवीनीकरण एंव विकास सूचनार्ओं क प्रसार्र, कार्य-शैलियों में परिवर्तन तथार् वैयक्तिक विकास आदि इस प्रशिक्षण के प्रमुख उद्देश्य हैं।

प्रशिक्षण की विधियार्ँ 

विभिé संगठनों द्वार्रार् प्रशिक्षण के लिए अनेक विधियों क प्रयोग कियार् जार्तार् है। प्रत्येक संगठन अपनी आवश्यकतार्ओं के अनुरूप इनमें से उपयुक्त विधि क चयन करतार् है। सार्मार्न्यत:, ये प्रशिक्षण विधियार्ँ प्रचार्लनार्त्मक तथार् पर्यवेक्षकीय कर्मचार्रियों के लिए प्रयोग की जार्ती है। प्रशिक्षण की इन विधियों को निम्नलिखित दो भार्गों में विभार्जित करके समझार्ार् जार् सकतार् है।

  • कार्य पर प्रशिक्षण विधियार्ँ 
  • कार्य से पृथ्क प्रशिक्षण विधियार्ँ 

कार्य पर प्रशिक्षण विधियार्ँ 

सार्मार्न्यत: कार्य पर प्रशिक्षण विधियार्ँ अत्यधिक प्रयोग में लार्यी जार्ती है। इन विधियों में प्रशिक्षाथियों को संगठन के नियमित कार्यों पर नियुक्त करके उन्हें उन कार्यों को सम्पन्न करने हेतु अनिवाय निपुणतार्ओं को सिखार्यार् जार्तार् है। प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी योग्य कर्मचार्रियों अथवार् प्रशिक्षकों के पर्यवेक्षण एवं निर्देशन में कार्य सम्बन्धी ज्ञार्न प्रार्प्त करते है। कार्य पर प्रशिक्षण, वार्स्तविक कार्य-दशार्ओं में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञार्न प्रार्प्त करते है। कार्य पर प्रशिक्षण, वार्स्तविक कार्य-दशार्ओं में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञार्न एवं अनुभवों को प्रदार्न करने में अत्यन्त उपयोगी होते हैं। प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी, कार्य के विषय में सीखने के दौरार्न, नियमित रूप से संगठन के कर्मचार्री भी होते हैं, जो कि अपनी सेवार्यें संगठन को देते हैं तथार् जिसके लिए उन्हें संगठन द्वार्रार् परिश्रमिक क भुगतार्न भी कियार् जार्तार् है। इससे प्रशिक्षाथियों के स्थार्नार्न्तरण की समस्यार् भी समार्प्त हो जार्ती है, क्योंकि वे अपने कार्य पर ही प्रशिक्षण प्रार्प्त कर लेते है। इन विधियों के अन्तर्गत कार्यों को किस प्रकार से सम्पार्दित कियार् जार्ये इसे सिखार्ने की अपेक्षार् प्रशिक्षाथियों की सेवार्ओं को अत्यधिक प्रभार्वपूर्ण रूप से प्रार्प्त करने पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। कार्य पर प्रशिक्षण विधियों में सम्मिलित है:-

  1. कार्य परिवर्तन : इस विधि के अन्तर्गत प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी क एक कार्य से दूसरे कार्य पर प्रतिस्थार्पन सम्मिलित होतार् है। प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी, विभिé निर्दिष्ट कार्यों में से प्रत्येक में अपने पर्यवेक्षक अथवार् प्रशिक्षक से कार्य क ज्ञार्न प्रार्प्त करतार् है। तथार् अनुभवों को अर्जित करनार् है। यद्यपि, यह विधि प्रार्य: प्रबन्धकीय पदों के लिए प्रशिक्षण में सार्मार्न्य होती हैं। परन्तु कर्मचार्री- प्रशिक्षाथियों को भी कार्यशार्लार् कार्यों में एक कार्य से दूसरे कार्य पर परिवर्तित कियार् जार् सकतार् है। यह विधि प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी को दूसरे कार्यों पर नियुक्त कर्मचार्रियों की समस्यार्ओं को समझने तथार् उनक सम्मार्न करने क अवसर प्रदार्न करती है।
  2. कोचिगं : इस विधि में प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी को एक विशेष पर्यवेक्षक के अधीन नियुक्त कर दियार् जार्तार् है, जो कि उसके प्रशिक्षण में शिक्षक की भार्ँति कार्य करतार् है। पर्यवेक्षक प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी को उसके कार्य-निष्पार्दन पर त्रुटियों एवं कमियों के विषय में बतार्तार् है तथार् उसे उनके सुधार्र के लिए कुछ सुझार्वों को भी प्रस्तुत करतार् है। प्रार्य: इस विधि में प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी, पर्यवेक्षक के कुछ कर्तव्यों एवं उत्तरदार्यित्वों में भार्गीदार्र बनतार् है तथार् उसे उसके कार्य-भार्र से कुछ मुक्ति प्रदार्न करतार् है। प्रशिक्षण की इस विधि में जो दोष होतार् है वह यह कि प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी को कार्य सम्पन्न करने में किसी प्रकार की न तो स्वंतंत्रतार् होती है तथार् न ही उसे अपने विचार्रों को व्यक्त करने क अवसर प्रार्प्त होतार् है। 
  3. समूह निर्दिष्ट कार्य : समूह निर्दिष्ट कार्य प्रशिक्षण विधि के अन्तर्गत, प्रशिक्षाथियों के एक समूह को कोर्इ वार्स्तविक संगठनार्त्मक समस्यार् दी जार्ती है। तथार् उनसे उसक समार्धार्न करने को कहार् जार्तार् है। प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी संयुक्त रूप से समस्यार् क समार्धार्न करते हैं। इस विधि से उनमें दलीय-भार्वनार् क विकास होतार् है। 

कार्य से पृथ्क प्रशिक्षण विधियार्ँ 

कार्य से पृथक प्रशिक्षण विधियों के अन्तर्गत प्रशिक्षाथियों को उनके कार्य की परिस्थितियों से अलग करके केवल उनके भार्वी कार्य निष्पार्दन से सम्बन्धित सीखने की विषय-वस्तु एवं सार्मग्री पर ही उनक ध्यार्न केन्द्रित करवार्यार् जार्तार् है। चूँकि इनमें प्रशिक्षाथियों के कार्य से पृथक रहने से उनके कार्य की आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् उनकी एकाग्रतार् भंग नहीं होती है, इसलिए वे अपनार् सार्रार् ध्यार्न कार्य सम्पé करने में समय बितार्ने की अपेक्षार् कार्य सीखने में लगार् सकते है।

  1. वेस्टिब्यूल टे्रनिंग : इस विधि में प्रशिक्षण, कार्य स्थल से पृथक एक विशेष प्रशिक्षणशार्लार् में प्रदार्न कियार् जार्तार् है, जिसमें यन्त्र, उपकरण,कम्प्यूटर तथार् अन्य सार्ज-सार्मार्न आदि जो कि सार्मार्न्यत: वार्स्तविक कार्य निष्पार्दन में प्रयुक्त होते हैं, वे भी उपलब्ध होते हैं तथार् जहार्ँ लगभग कार्य स्थल जैसार् वार्तार्वरण स्थार्पित कियार् जार्तार् है। सार्मार्न्यत: इस प्रकार क प्रशिक्षण लिपिकीय तथार् अद्धकुशल कार्यों के कर्मचार्रियों के लिए प्रयोग कियार् जार्तार् है। यह प्रशिक्षण कुशल पर्यवेक्षकों अथवार् फोरमैन द्वार्रार् प्रदार्न कियार् जार्तार् है। इस विधि के अन्तर्गत सिद्धार्न्तों को अभ्यार्स के सार्थ सम्बद्ध करते हुए प्रशिक्षण दियार् जार् सकतार् है। जब प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी अपनार् प्रशिक्षण पूर्ण कर लेते है तो उन्हें कार्य पर नियुक्त कर दियार् जार्तार् है। 
  2. रोल प्लेइंग : इस विधि को मार्नवीय अन्त:क्रियार् की एक पद्धति के रूप में पार्रिभार्षिति कियार् जार् सकतार् है, जिसमें अधिकल्पित परिस्थितियों में वार्स्तवित व्यवहार्र सम्मिलित होतार् है। प्रशिक्षण की इस विधि में कार्य, क्रियार्शीलतार् तथार् अभ्यार्स सम्मिलित होते है। इसमे प्रशिक्षाथियों को विभिन्न पद काल्पनिक रूप से सार्ंपै े जार्ते हैं। तथार् उन्हैं। उन पदों की भूमिकाओं क निर्वार्ह करने को कहार् जार्तार् है। उदार्हरणाथ, प्रशिक्षाथियों में से किसी को विक्रय अधिकारी, किसी को क्रय पर्यवेक्षक तथार् किसी को विक्रेतार् की भूमिक सार्ंपै कर किसी संगठनार्त्मक समस्यार् को हल करने के लिए कहार् जार्तार् है। प्रशिक्षाथियों द्वार्रार् भूमिक निर्वार्ह के समय प्रशिक्षक उनक गम्भीरतार्पूर्वक अवलोकन करतार् है तथार् बार्द में उन्हें उनकी त्रुटियों एवं कमियों के विषय में जार्नकारी देतार् है, तार्कि वे वार्स्तविक कार्य निष्पार्दन के समय उन्हें दूर कर सकें। इस विधि क अधिकतर प्रयोग अन्तवैंयक्तिक अन्त: क्रियार्ओं एवं सम्बन्धों के विकास के लिए कियार् जार्तार् है। 
  3. व्यार्ख्यार्न विधि : यह एक परम्परार्गत विधि है, जिसके अन्तर्गत एक अथवार् अधिक प्रशिक्षक, प्रशिक्षाथियों के समूह को व्यार्ख्यार्न देकर किसी विषय-वस्तु के सम्बन्ध में ज्ञार्न प्रदार्न करते हैं। प्रशिक्षक को व्यार्ख्यार्न कलार् एवं विषय-वस्त ु क अच्छार् ज्ञार्न होतार् है। व्यख्यार्न को प्रभार्वशार्ली बनार्ने के लिए, प्रशिक्षर्थियों को अभिप्रेरित करनार् तथार् उनमें रूचि उत्पन्न करनार् अनिवाय होतार् है। व्यार्ख्यार्न विधि क एक लार्भ यह हैं कि यह एक प्रत्यक्ष विधि है, जिसे कि प्रशिक्षाथियों के एक बड़े समूह के लिए प्रयोग कियार् जार् सकतार् है। अत: इससे समय एवं धन, दोनों की बचत होती है। इस विधि क प्रमुख दोष यह है कि इसके द्वार्रार् केवल सैद्धार्न्तिक ज्ञार्न की प्रदार्न कियार् जार् सकतार् है, व्यवार्हार्रिक ज्ञार्न नहीं । 
  4. सम्मेलन अथवार् विचार्र-विमर्श विधि: इस विधि के अन्तर्गत, सार्मूहिक विचार्र-विमर्श द्वार्रार् सूचनार्ओं एवं विचार्रों क आदार्न-प्रदार्न कियार् जार्तार् है। इसके उद्देश्य एक समूह के ज्ञार्न एवं अनुभव से सभी को लार्भार्न्वित करनार् होतार् है। इस विधि के अन्तर्गत भार्ग लेने वार्ले प्िरशक्षार्थ्र्ार्ी विभिन्न विषयों पर अपने विचार्रों को प्रस्ततु करते हैं, तथ्यों, विचार्रों एवं आँकडों क आदार्न-प्रदार्न एवं परीक्षण करते हैं, मार्न्यतार्ओं की जार्ँच करते हैं, निष्कर्षों को निकालते है तथार् परिणार्मस्वरूप कार्यों के निष्पार्दन में सुधार्र हेतु योगदार्न देते है। 
  5. प्रोग्रार्म्ड इन्स्ट्रक्शन : हार्ल ही के वर्षों में यह विधि काफी लोकप्रिय हुर्इ है। इस विधि में जो भी विषय-वस्तु सिखार्यी जार्नी होती है, उसे सार्वधार्नीपूर्वक नियोजित कर क्रमिक इकाइयों के एक अनुक्रम में प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। ये इकाइयार्ँ अनुदेशक के सरल से जटिल स्तर की ओर व्यवस्थित की गयी होती हैं। इन इकाइयों को प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी प्रश्नों के उत्तर देकर अथवार् रिक्त स्थार्नों को भरकर पर करते है। तथार् आगे बढ़ जार्ते हैं। इस विधि क प्रमख्ु ार् लार्भ यह हैं। कि प्रशिक्षार्थ्र्ार्ी अपने सीखने क समार्योजन अपनी सुविधार्नुसार्र किसी भी स्थार्न पर कर सकते है। आज सार्ंख्यिकी विज्ञार्न एवं कम्प्यूटर के क्षेत्र में अनेक प्रोग्रार्म्ड बुक उपलब्ध हैं। यह विधि समय एवं धन के हिसार्ब से खर्चीली होतार् है।

प्रशिक्षण की प्रक्रियार् 

प्रशिक्षण एक ऐसी प्रक्रियार् हैं। जिसके द्वार्रार् संगठनों के कर्मचार्रियों के ज्ञार्न, निपुणतार्ओं तथार् रूचियों में वृद्धि की जार्ती है। विभिन्न संगठनों की परिवर्तित आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रखते हुए यह अत्यन्त आवश्यक है कि कर्मचार्रियों के लिए उचित प्रशिक्षण की व्यवस्थार् की जार्यें। एक आदर्श प्रशिक्षण प्रक्रियार् के महत्वपूर्ण चरण निम्नलिखित प्रकार से है-

  • प्रशिक्षण आवश्यकतार्ओं की निर्धार्रण: प्रशिक्षण प्रक्रियार् चरण में प्रशिक्षण की आवश्यकतार्ओं क निर्धार्रण कियार् जार्तार् है। प्रशिक्षण आवश्यकतार्ओं की निर्धार्रण सर्वार्धिक महत्वपूर्ण चरण होतार् है, क्योंकि इसी के आधार्र पर हीे प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रशिक्षण की विधियों तथार् प्रशिक्षण की विषय-वस्तु को निर्धार्रित कियार् जार्तार् है। प्रशिक्षण आवश्यकतार्ओं क निर्धार्रण निम्नलिखित प्रकार के विश्लेषणों के मार्ध्यम से कियार् जार् सकतार् है।
    • संगठनार्त्मक विश्लेषण: इसमें संगठन के उद्देश्य, विभिन्न क्षेत्रों में संगठनार्त्मक वार्तार्वरण क गहन अवलोकन जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में संगठनार्त्मक क्षमतार्ओं एवं कमजोरियों, जैसे- दुर्घटनार्ओ, बार्र-बार्र यन्त्रों की टूट-फूट, अत्यार्धिक कर्मचार्री-परिवर्तन बार्जार्र अंश एवं बार्जार्र सम्बन्धी अन्य क्षेत्रों, उत्पार्दन की गुणवत्तार् एवं मार्त्रार् उत्पार्दन-सार्रणी, कच्चार् मार्ल तथार् वित्त आदि क विश्लेषण सम्मिलित है। 
    • विभार्गीय विश्लेषण: इसमें विभिन्न विभार्गों की विशेष समस्यार्ओं अथवार् उन विभार्गों के कर्मचार्रियों के एक समूह की सार्मार्न्य समस्यार्, जैसे-ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं को प्रार्प्त करने की समस्यार् सहित, विभिन्न विभार्गीय क्षमतार्ओं एवं कमजोरियों आदि क विश्लेषण सम्मिलित है। 
    • कार्य एवं भूमिक विश्लेषण: इसमे विभिन्न कार्यों एवं उनकी भूमिकाओं, परिवर्तनों के परिणार्मस्वरूप किये गये कार्य अभिकल्पों, कार्य-विस्तार्र तथार् कार्य समृद्धिकरण आदि क विश्लेषण सम्मिलित है। 
    • मार्नवीय संसार्धन विश्लेषण : इसमें कार्यों के ज्ञार्न एवं निपुणतार्ओं के क्षेत्रों में संगठन के कर्मचार्रियों की क्षमतार्ओं एवं कमजोरियों क विश्लेषण सम्मिलित है। 
  • प्रशिक्षण के उद्देश्यों क निर्धार्रण: प्रशिक्षण की प्रक्रियार् क अगलार् चरण इसके उद्देश्य क निर्धार्रण करनार् होतार् है एक बार्र प्रशिक्षण की आवश्यकतार् क निर्धार्रण कर लेने से इसके उद्देश्यों को इंगित करनार् सरल हो जार्तार् है। प्रशिक्षण के उद्देश्यों क निर्धार्रण अत्यन्त ही सार्वधार्नीपूर्वक कियार् जार्नार् चार्हिए क्योंकि सम्पूर्ण प्रशिक्षण की सफलतार् इसके उद्देश्यों द्वार्रार् ही निर्देशित होती है। 
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम क संगठन: प्रशिक्षण आवश्यकतार्ओं एवं उद्देश्यों क निर्धार्रण हो जार्ने के पश्चार्त् अगलार् चरण प्रशिक्षण कार्यक्रम क संगठन अथवार् नियोजन करनार् होतार् है। यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण चरण होतार् है। क्योंकि इसके द्वार्रार् सम्पूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखार् तैयार्र की जार्ती है। इसके अन्तर्गत संगठन क प्रबन्धतन्त्र विचार्र-विमर्श के द्वार्रार् इन बार्तों के विषय में निर्णय करतार् है कि:
    1. किन-किन कर्मचार्रियों को प्रशिक्षित कियार् जार्नार् है। 
    2. प्रशिक्षण की विषय-वस्तु क्यार् होगी ।
    3. किन-किन विधियों द्वार्रार् प्रशिक्षण प्रदार्न कियार् जार्येगार्। 
    4. प्रशिक्षण क समय, अवधि एवं स्थार्न क्यार् होगार्।
    5. कौन-कौन से व्यक्ति प्रशिक्षक होंगे, आदि।

    प्रशिक्षण कार्यक्रम क मूल्यार्कंन 

    प्रशिक्षण कार्यक्रम के अन्तिम चरण में उसक मूल्यार्ंकन कियार् जार्तार् है। प्रशिक्षण कार्यक्रम क मूल्यार्ंकन प्रशिक्षण के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होतार् है। इसमें प्रशिक्षण की आवश्यकतार् एवं उद्देश्यों के परिपेक्ष््र य में प्रशिक्षण कार्यक्रम के परिणार्मों क तुलनार्त्मक अध्ययन कियार् जार्तार् है तथार् यह ज्ञार्त कियार् जार्तार् है। कि प्रशिक्षण कार्यक्रम कितनार् सफल रहार् है। सार्थ ही प्रशिक्षण के पश्चार्त् संगठन के उत्पार्दन, अनुपस्थिततार्, कर्मचार्री-परिवर्तन, दुर्घटनार्ओं तथार् कर्मचार्री मनोबल आदि पर पड़ने वार्ले प्रभार्व क भी मूल्यार्ंकन कियार् जार्तार् हैं। 

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