प्रबंध के सम्प्रदार्य

प्रबन्ध की विचार्रधार्रार् क जन्म कब हुआ, इसक स्रोत क्यार् थार्? इस विषय में चिरकाल से आजतक स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहार् जार् सकतार्, किन्तु इस सम्बन्ध में यह तो स्पष्ट रूप से कहार् जार् सकतार् है कि जितनी पुरार्नी हमार्री मार्नव सभ्यतार् है उतनार् ही पुरार्नार् प्रबन्ध की विचार्रधार्रार् क जन्म। इसके सम्बन्ध में भी दो रार्य नहीं है कि प्रार्चीनकाल में प्रबंध क स्वतंत्र अस्तित्व नहीं थार्, दूसरे शब्दों में व्यवसार्य क स्वार्मी ही स्वयं प्रबन्ध कार्यों को कियार् करतार् थार्। किन्तु आज के प्रतिस्पर्धार्त्मक दौर में प्रबन्ध क स्वतंत्र आवतल समार्प्त हो गयार् है और इसकी जगह पेशेवर प्रबन्ध ने ले ली है। प्रार्य: प्रबन्ध विचार्रधार्रार् के उदगम में तीन चरणों को रखार् जार् सकतार् है यथार् प्रार्चीन काल में प्रबन्ध, मध्यकाल में प्रबन्ध तथार् आधुनिक प्रबन्धन। इसी प्रकार प्रबन्ध की विचार्रधार्रार्ओं को भी तीन सम्प्रदार्यों (रूढ़िवार्दी, नवरूढ़िवार्दी एवं आधुनिक) में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है –

जैसार् कि हमने देखार् अध्ययन को सुव्यवस्थित करने के लिए हम प्रबन्ध के विकास को तीन चरणों में विभक्त करते हैं। आइये अब उन्हें क्रमवार्र गहराइ से समझने क प्रयार्स करें –

मार्नव सभ्यतार् क विकास तथार् प्रबन्ध क विकास लगभग सार्थ सार्थ हुआ है। मार्नव सभ्यतार् के विकास के सार्थ ही प्रबन्ध कलार् लगभग सभी संगठनों में विद्यमार्न थी। सर्वप्रथम प्रबन्ध विचार्रधार्रार् क अभ्युदय व्यक्तिगत नेतृत्व के रूप में हुआ। इसक प्रथम उदभव मेसोपोटार्मियार् में पार्दरियों क समूह थार् जो प्रबन्ध कौशल व कलार् के लिए विख्यार्त थार्। ये अपने को र्इश्वर क प्रतिनिधि कहते थे और इस नार्ते वे नेतृत्व एवं नियंत्रण क कार्य करते थे। इन्होंने व्यार्पार्रिक क्रियार्ओं क नियोजन कियार्।

प्रबन्ध कार्य को सुलभ बनार्ने के लिए हिसार्ब कितार्ब हेतु अंक विद्यार् तथार् लिखने के कुछ सार्धनों क आविष्कार भी कियार् थार्। इसी प्रकार धामिक पुस्तक बार्इबिल में भी प्रबन्ध के संबंध में पतार् चलतार् है कि उस युग में भी योग्य व्यक्तियों क चयन और सत्तार् के भार्रापण जैसे कुछ सिद्धार्न्त प्रचलन में थे जो आज विशार्लकाय औद्योगिक उपक्रमों में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुए। इसी क्रम में प्रार्चीन सार्हित्य में सुकरार्त तथार् अन्य लेखकों के संवार्दों में विशिष्टीकरण एवं अन्य प्रबन्धकीय सिद्धार्न्तों क उल्लेख मिलतार् है।

प्रार्चीन मिस्रवार्सियों की प्रबन्ध कुशलतार् एवं इंजीनियरिंग क अन्दार्जार् विश्व विख्यार्त पिरार्मिडों को देखने से लग जार्तार् है। इसी प्रकार यूनार्न, रोम व ग्रीक आदि देशों की प्रार्चीन सुन्दर इमार्रतें भी इस तथ्य को सिद्ध करती हैं कि उस समय भी श्रमिकों को निर्देशित करने के लिए प्रबन्धक उपस्थित थे। हमार्रे देश भार्रत में कौटिल्य द्वार्रार् रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशार्स्त्र‘ जिसकी रचनार् आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व हुर्इ थी, में रार्जनीतिक अर्थव्यवस्थार् के विभिन्न पहलुओं के सार्थ सार्थ सावजनिक प्रबन्ध के विभिन्न समस्यार्ओं और उनके समार्धार्न पर भी प्रकाश डार्लार् गयार् है।

उपर्युक्त व्यार्ख्यार् से यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि इस संबंध में कोर्इ मतभेद नहीं है कि प्रार्चीन काल में प्रबंधकीय सिद्धार्न्तों के लिए जो शब्दार्वली प्रयोग में लार्यी जार्ती थी वह वर्तमार्न शब्दार्वली से बिल्कुल भिन्न थी परन्तु यह तो सिद्ध हो ही जार्तार् है कि प्रबन्ध के कुछ मूलभूत सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन पहले ही हो चुक थार्।

औद्योगिक विकास की मध्य यार्त्रार् प्रबंध विकास क आदि काल कहार् जार्तार् है। यह आत्मनिर्भरतार् क समय थार्। अधिकांश जनसंख्यार् ग्रार्मीण थी जिनकी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति गार्ंवों में ही हो जार्यार् करती थी अर्थार्त व्यार्पार्र सीमित थार्। मध्य युग में औद्योगिक उत्पार्दन विधियॉं अत्यन्त सरल थीं और जिनके प्रयोग से ज्ञार्न के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकतार् नहीं थी। विद्वार्नों ने मार्नार्, मध्यकाल में कारीगर, मजदूर, निरीक्षक, पूंजीपति, व्यार्पार्री तथार् दुकानदार्र सभी कुछ थार्। शिल्पकार पर ही कारखार्नार् तथार् परिवार्र के सदस्य कारखार्ने में काम करने वार्ले कारीगर होते थे। जो कुछ भी उत्पन्न होतार् थार् उसक यार् तो स्वयं उपभोग कर लियार् करते थे अथवार् यदि कुछ शेष बचतार् थार्, तो वह निकटवर्ती लोगों को तुरंत बेच दियार् जार्तार् थार् इस प्रकार उपभोक्तार् (क्रेतार्) और उत्पार्दक में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होतार् थार्। संक्षेप में एक ही व्यक्ति प्रशार्सक, संगठनकर्तार्, व प्रबंधक कहलार्तार् थार्। जिससे प्रतिस्पर्द्धार् की भार्वनार् नहीं होती थी। इस प्रकार व्यार्पार्रिक गतिविधियों को पुत्र अपने पितार् के सार्थ कार्य करके सीख लेतार् थार्। इस प्रकार यह पैतृक ज्ञार्न पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़तार् रहतार् थार्।

यूरोप के विभिन्न देशों में हुर्इ औद्योगिक क्रार्न्ति ने व्यार्पार्रिक क्षेत्र के सार्मार्जिक संरचनार् में गंभीर परिवर्तन किए तथार् संगठन के विकास तथार् विकेन्द्रीयकरण को प्रोत्सार्हन मिलार्। नये आविष्कार, अधिक उत्पार्दन, श्रम विभार्जन, विशिष्टीकरण आदि के विकास से नर्इ प्रबन्धकीय समस्यार्ओं को आधार्र मिलार्। इसी समय एडम स्मिथ ने 1776 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Wealth of Nations’ में कुछ समार्न्य प्रबन्धकीय समस्यार्ओं को रखार् तथार् कुछ सिद्धार्न्तों क सूत्रपार्त कियार्। एडम स्मिथ के कार्यों को आगे बढ़ार्ते हुए कैम्ब्रिज विश्वविद्यार्लय में गणित के प्रो. चार्ल्र्स बैवेज ने अपने लेख ‘On the Economy of Machinery and Manufactures’ में उत्पार्दन प्रबन्ध के अनेक सिद्धार्न्तों की विस्तार्र से व्यार्ख्यार् की।

20वीं शतार्ब्दी के आरम्भ से ही वैज्ञार्निक प्रबन्ध क सूत्रपार्त हुआ जो बार्द में आधुनिक प्रबन्ध क आधार्र स्रोत बनार् तथार् प्रबन्ध को एक पेशे के रूप में मार्न्यतार् दिलाइ। वर्तमार्न प्रतियोगार्त्मक युग में प्रबन्ध विज्ञार्न क विकास चार्र अवस्थार्ओं में हुआ है। यथार्-

आधुनिक व्यवसार्य की सबसे प्रमुख घटनार् व्यार्वसार्यिक संगठन के प्रमुख स्कंघ कम्पनी प्रार्रूप क रहार् जिसके अन्तर्गत मुख्यत: तीन बार्तों क खुलार्सार् हुआ –

आवश्यकतार्ओं के परिणार्मस्वरूप संबंधित औद्योगिक इकार्इ क संचार्लन पेशेवर प्रबन्ध के द्वार्रार् सम्भव हो सका। इस प्रकार आधुनिक प्रबन्ध औद्योगिक इकाइयों को निर्देशित करने वार्ली विधार् के रूप में प्रकट हुआ। जिससे लार्खों करोड़ों लोगों को रोजगार्र के अवसर मिले तथार् अर्थव्यवस्थार्ओं को भी आगे विकास करने क समुचित आधार्र प्रार्प्त हुआ।

प्रबन्धकीय इतिहार्स में विभिन्न सम्प्रदार्यों को प्रेरित करने वार्ले कुछ तत्व निम्नलिखित हैं, जिनक चयन हमार्रे ज्ञार्न को निश्चित ही सुव्यवस्थित करेगार्।

भार्रत में प्रबंधकीय विचार्रधार्रार् अपने शैशवकाल में है। यहॉं इसक इतिहार्स अधिक प्रार्चीन नहीं है। यहॉं स्वतंत्रतार् से पूर्व औद्योगिक विकास की स्थिति असंतोषजनक थी। स्वतंत्रतार् के पश्चार्त हमार्रे देश में आर्थिक नियोजन के आधार्र पर देश क आर्थिक एवं औद्योगिक विकास कियार् गयार्। प्रथम पंचवष्र्ार्ीय योजनार् में औद्योगिक विकास की गति को तीव्र कियार् तथार् निजी एवं सावजनिक क्षेत्र में यह महसूस कियार् गयार् कि औद्योगिक उपक्रमों के सफल संचार्लन के लिए पेशेवर प्रबन्धकों की आवश्यकतार् है। प्रबन्धकीय प्रशिक्षण की दिशार् में हमार्रे देश में विगत वर्षों से जो प्रयार्स हुए हैं, आइये उनको समझने क प्रयार्स करें-

1949 में भार्रत सरकार द्वार्रार् अखिल भार्रतीय तकनीकी शिक्षार् परिषद की स्थार्पनार् की। इस परिषद के सुझार्व पर औद्योगिक एवं व्यार्वसार्यिक प्रशार्सन उपसमिति की स्थार्पनार् हुर्इ जिसने जून 1953 में अपने प्रतिवेदन में अन्य बार्तों के अतिरिक्त तीन प्रमुख सिफार्रिशें की थी –

भार्रत सरकार ने अखिल भार्रतीय प्रबन्ध तकनीकी अध्ययन मण्डल की सिफार्रिश के आधार्र पर प्रन्धकीय शिक्षार् में शोध कार्य हेतु तथार् निजी एवं सावजनिक क्षेत्र के औद्योगिक उपक्रमों को प्रशिक्षित प्रबन्धक उपलब्ध करने के उद्देश्य से अहमदार्बार्द और कलकत्तार् में शिक्षण कार्य के लिए संस्थार्न स्थार्पित किये।

3. स्नार्तकोत्तर प्रशिक्षण की स्थार्पनार् –

भार्रत सरकार ने अखिल भार्रतीय प्रबन्ध तरनीकी अध्ययन मण्डल की सिफार्रिशों के आधार्र पर औद्योगिक प्रबन्ध तथार् इंजीनियरिंग में स्नार्तकोत्तर प्रशिक्षण देने की व्यवस्थार् निम्न संस्थार्ओं में की है –

  1. इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट, अहमदार्बार्द 
  2. इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी, खड़गपुर 
  3. इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर एण्ड बिजनेस मैनेजमेंट, कोलकतार् 
  4. इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सार्इंस, बंगलौर 
  5. विक्टोरियार् जुबली टेक्नीकल इंस्टीट्यूट, मुम्बर्इ 
  6. जमनार्लार्ल बजार्ज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंन्ट, मुम्बर्इ, 
  7. बिड़लार् इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलार्जी, पिलार्नी, 
  8. मोतीलार्ल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एण्ड बिजनेस मैनेजमेंट, इलार्हार्बार्द 
  9. प्रशार्सकीय कर्मचार्री कालेज, हैदरार्बार्द, आदि । 

4. कालेज एवं विश्वविद्यार्लयों में प्रबन्धकीय शिक्षार् की व्यवस्थार् –

विभिन्न कालेज और विश्वविद्यार्लयों में व्यवसार्य प्रशार्सन एवं प्रबंधन की उच्च शिक्षार् एवं शोध की व्यवस्थार् हुर्इ जिनमें व्यवसार्य प्रशार्सन विभार्ग की स्थार्पनार् की गर्इ विश्वविद्यार्लय, जौनपुर विश्वविद्यार्लय, बनार्रस हिन्दू विश्वविद्यार्लय, दिल्ली विश्वविद्यार्लय बम्बर्इ विश्वविद्यार्लय, मद्रार्स विश्वविद्यार्लय के नार्म उल्लेखनीय हैं। 

5. विशिष्ट पहलुअुओंं के लिए शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थार्न – 

प्रबन्धकीय शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अनेक पेशेवर संगठन अपनी भूमिक निभार् रहे हैं, जिनमें –

  1. इंस्टीट्यूट ऑफ कास्ट एण्ड वक्र्स एकाउन्टेंट्स कोलकतार्, 
  2. इंस्टीट्यूट ऑफ चाटर्ड एकाउन्टेंट्स, मुम्बर्इ, 
  3. इंस्टीट्यूट ऑफ पर्सनल मैनेजमेंट, कोलकतार्, 
  4. इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोडक्शन इन्जीनियरिंग, मुम्बर्इ 
  5. इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्सटार्इल रिसर्च एसोसियेशन अहमदार्बार्द आदि के नार्म विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 

6. लघु उद्योग संगठन – 

भार्रत सरकार द्वार्रार् 1955 में लघु उद्योग संगठन की स्थार्पनार् हुर्इ। यह संगठन ‘लघु उद्योग सेवार् संस्थार्न’ एवं ‘विस्तार्र केन्द्रों के द्वार्रार् प्रबन्धकीय शिक्षार् की व्यवस्थार् सुनिश्चित करतार् है। यह संस्थार् लघु उद्योंग कारखार्नों को तकनीकी प्रशिक्षण सुविधार्यें प्रदार्न करने, विदेशी विशेषज्ञों को आमंत्रित करने और भार्रतीय व्यक्तियों को प्रशिक्षण के लिए विदेशों में भेजने से संबंधित कार्यों में महत्वपूर्ण योगदार्न दे रहार् है।

7. औद्योगिक प्रबन्ध संघ –

भार्रत सरकार ने अपने मंत्रार्लयों के अधीन स्थार्पित सावजनिक उपक्रमों में उच्च प्रबंधकीय पदों पर नियुक्ति के लिए नवम्बर 1957 में ‘औद्योगिक प्रबंध संघ’ की स्थार्पनार् की इस संघ में सुयोग्य प्रबन्धक ही रखे जार्ते हैं।

8. रार्ष्ट्रीय उत्पार्दकतार् परिषद –

 भार्रत सरकार ने वार्णिज्य एवं उद्योग मंत्रार्लय के अधीन फरवरी 1958 में भार्रत सरकार के वार्णिज्य एवं उद्योग मंत्रार्लय के अधीन फरवरी 1958 में रार्ष्ट्रीय उत्पार्दकतार् परिषद की स्थार्पनार् की। इस परिषद ने देश में उत्पार्दकतार् एवं प्रबन्धकीय प्रशिक्षण को प्रार्रम्भ करने, विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार् है।

9. निजी उद्योगपतियों द्वार्रार् प्रबन्धकीय प्रशिक्षण की व्यवस्थार् – 

उद्योगपतियों ने अपने संस्थार्नों में ही प्रबन्धकीय प्रशिक्षण प्रदार्न करने की व्यवस्थार् की हुर्इ है जिनमें टार्टार्, बिड़लार्, जे.के., अम्बार्नी, बजार्ज आदि के नार्म विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वर्तमार्न समय में भार्रत में छोटे-बड़े सभी स्तर के उद्योग स्थार्पित हैं जिनमें निजी, सहकारी, सावजनिक तथार् संयुक्त स्वार्मित्व के उद्योग शार्मिल हैं। प्रबन्ध की विक्तिार्यों और तकनीकी परिवर्तनों के कारण प्रबन्धकीय क्रार्न्ति क सभी पैमार्ने की इकाइयों में समार्न महत्व हैं। विशेषकर बड़े पैमार्ने के निजी एवं सावजनिक क्षेत्र के उद्योगों में प्रबंध व्यवस्थार् में तीव्र गति से हो रहे परिवर्तन भार्रत में प्रबन्धकीय क्रार्न्ति के स्पष्ट प्रमार्ण हैं। भार्रत सरकार ने स्वतंत्रतार् के बार्द प्रबन्ध के विकास में पर्यार्प्त रूचि ली हैं

प्रबंध क रूढ़िवार्दी सम्प्रदार्य 

यद्यपि प्रबन्धकीय विज्ञार्न क सुव्यवस्थित प्रार्दुर्भार्व अभी कुछ ही वर्षों पूर्व हो सक है। किन्तु प्रबन्ध की समस्यार्यें तथार् इनक समार्धार्न मार्नव आदिकाल से निरन्तर करतार् चलार् आयार् है। हर युग में मार्नवीय प्रबंधकों ने तत्कालीन संगठनों की समस्यार्ओं के निरार्करण क माग ढॅूढार्। इस प्रकार प्रबन्ध के कर्इ विचार्रकों को शार्मिल कर एक विचार्रधार्रार् क जन्म हुआ, जिसे रूढ़िवार्दी विचार्रधार्रार् कहकर सम्बोधित कियार् गयार्।

प्रार्य: रूढ़िवार्दितार् क अर्थ पुरार्ने समय से चले आ रहे नियमों यार् परम्परार्ओं से होतार् है। इसक यह अर्थ कदार्पि नहीं है कि कोर्इ चीज स्थाइ यार् समयबद्ध है यार् उसे छोड़ देनार् चार्हिए। हम अपने अध्ययन की सुविधार् के लिये इस विचार्रधार्रार् के अन्तर्गत तीन महार्न प्रबन्ध विद्वार्नों को समझने क प्रयार्स करेंगे यथार् अधिकार तंत्र यार् दफ्तरशार्ही, वैज्ञार्निक प्रबन्ध तथार् प्रशार्सनिक प्रबन्ध।

(क) रूढ़िवार्दी विचार्रधार्रार् के अन्तर्गत सर्वप्रथम हम मैक्स वेबर के अधिकार तंत्र यार् दफ्तरशार्ही संगठन से जुड़े विचार्रों को जार्नेंगे अपने अधिकार तंत्र क ढॉंचार् वेबर ने एक प्रतिक्रियार् के रूप में निर्मित कियार् थार्। औद्योगिक क्रार्न्ति के बार्द प्रबन्धकों के व्यवहार्र में कर्मचार्रियों के दमन भाइ-भतीजार्वार्द, निदयतार्, मनमार्नी तथार् व्यक्तिगत स्वाथ पूर्ति जैसे निमर्म बुरार्इयॉं पैदार् हो गर्इ थीं और इन्हीं के विरोध में अधिकार तंत्रीय संगठन संरचनार् क सुझार्व वेबर ने रखार् थार्। उनक विश्वार्स थार् कि अधिकार तंत्रीय ढार्ंचार् मार्नवीय तथार् यार्ंत्रिक शक्तियों के उचित समन्वय क अचूक शस्त्र बनेगार् जिससे संगठनार्त्मक क्रियार्ओं क और अधिक कुशलतार् से सम्पन्न कियार् जार् सकेगार्। आपके द्वार्रार् अधिकार तंत्र यार् दफ्तरशार्ही संगठन के सुव्यवस्थित रूप के लिए अग्रलिखित सूत्र दिये गये।

  1. कार्यों क सुव्यवस्थित विभार्जन, 
  2. कार्य में अनिश्चिततार् को दूर करने तथार् उनके पूर्वार्नुमार्न करने के लिए सुनिश्चत नियमों क निर्धार्रण
  3. अधिकार एवं दार्यित्वों के सम्बंधों की स्थार्पनार् हेतु अधिकारों की एक सुपरिभार्षित क्रमिक श्रृंखलार्, 
  4. अधीनस्थों से व्यवहार्र करते समय अधिकारियों को निरपेक्ष रहनार्, 
  5. लिखित नियम एवं निर्णय तथार् संदर्भों के लिए एक विस्तृत फार्इलिंग व्यवस्थार्, 
  6. पदार्धिकारियों के लिए निर्धार्रित योग्यतार्एं, 
  7. रोजगार्र के चयन यार् पदोन्नति केवल गुण यार् तकनीकी क्षमतार् के आधार्र पर तथार् 
  8. जीवनपर्यन्त के लिए रोजगार्र तथार् मनमार्ने ढंग से सेवार्मुक्ति से सुरक्षार्। 

दफ्तरशार्ही के गुण 

  1. सुनिश्चिततार् 
  2. तीव्रतार्, 
  3. स्पष्टतार्, 
  4. फार्इलों क ज्ञार्न, 
  5. निरन्तरतार्, 
  6. विवेकपूर्णतार्, 
  7. एकतार्, 
  8. कड़ी अधीनस्थतार्, 
  9. टकरार्व की कमी तथार् 
  10. सार्मग्री एवं श्रम लार्गतों की कमी। 

आलोचनार् – यह बड़े दुर्भार्ग्य की बार्त है कि अधिकार तंत्र को वर्तमार्न में अकुशलतार्, अलोचपूर्णतार्, भ्रष्टार्चार्र, लार्लफीतार्शार्ही आदि नकारार्त्मक विचार्रों के सार्थ जोड़ार् जार्तार् है। आलोचकों के अनुसार्र यह इसे यूरोपीय विपत्ति, भीमकाय जार्नवर तथार् अदृश्य पिशार्च जैसी संज्ञार्न प्रदार्न की है। संक्षेप में अधिकार तंत्रीय संगठनों के दोष होते हैं –

  1. नियमों की आलोचपूर्णतार् 
  2. अधीनस्थों से अव्यक्तिगत संबंध, 
  3. पहल और निर्णय में स्वतंत्रतार् क अभार्व तथार् नियमों क आधिपत्य,
  4. विलम्ब तथार् लार्लार् फीतार्शार्ही, 
  5. बर्बार्दीपूर्ण प्रबंध, 
  6. भ्रष्टार्चार्र तथार्,
  7. पक्षपार्त । 

इन बुरार्इयों के उपरार्न्त भी संगठन क मूल ढॉंचार् अधिकार तंत्र पर ही आधार्रित होतार् है अर्थार्त प्रबंध के ऐसे कोर्इ सिद्धार्न्त यार् नियम नहीं बने थे, जिनको प्रबंधक पढ़ सके और उनक अपने वार्स्तविक जीवन में प्रयोग कर सकें। उन्नीसवीं शतार्ब्दी के अंतिम चरण में प्रबन्ध के इस परम्परार्गत दृष्टिकोण में अन्तर आयार्, वैज्ञार्निक प्रबन्ध के लिए प्रयार्स हुए और अन्त में ‘‘वैज्ञार्निक प्रबन्ध’’ की संज्ञार् उन प्रयार्सों को दी गर्इ। 

वैज्ञार्निक प्रबन्ध 

उन्नीसवीं सदी के समार्पन तक प्रबंध क उपयोग पुरार्ने ढर्रे पर चलतार् रहार् और इसको व्यक्ति क विशेष गुण कह कर ही सम्बोधित कियार् जार्तार् रहार्। यह तरीक पूर्णरूपेण अवैज्ञार्निक तथार् सहजबुद्धि की उपज थी तथार् इसमें भूल सुधार्र के मार्ध्यम से प्रबन्ध सम्पन्न होतार् थार्। लोगों क अपने तरीके से, तथार् अपनी बुद्धिमतार् से ही सुलझार् सकतार् है। उसकी प्रबंध क्षमतार् में कोर्इ भी सुधार्र सैद्धार्न्तिक ज्ञार्न के अभार्व में नहीं कियार् जार् सकतार् थार्। दूसरे कोर्इ से कोर्इ सिद्धार्न्त यार् नियम नहीं बने थे, जिनको प्रबन्धक पद दे सकते और प्रयोग कर सकते। इस सदी के अंत में प्रबन्ध के इस पुरार्ने दृष्टिकोण में परिवर्तन आनार् प्रार्रम्भ हुआ, वैज्ञार्निक प्रबन्ध के लिए प्रबंधकीय चिन्तकों ने सकारार्त्मक सुझार्व प्रस्तुत किये जिनमें चार्ल्र्स वैवेज और टेलर क योगदार्न प्रमुख रहार्। आइये चार्ल्र्स वैवेज के योगदार्न को समझने क प्रयार्स करें :- 

चार्ल्र्स बैवेज क योगदार्न 

वैज्ञार्निक प्रबंध क शुभार्रम्भ वार्स्वत में चार्ल्र्स बैवेज ने 1832 में (Economy of Machines and Manufacturers) नार्मक एक निबन्ध से कियार् थार्। कैम्ब्रिज विश्वविद्यार्लय के गणित के प्रोफेसर सर चार्ल्र्स बैवेज ने इंग्लैण्ड तथार् फ्रार्ंस के कर्इ कारखार्नों क दौरार् करने के बार्द से इस निष्कर्ष पर पहुॅंचे कि लगभग सभी कारखार्नों में पुरार्नी रूढ़िवार्दी और व्यक्ति पर विधियों से कार्य होतार् है तथार् समस्त कार्य अवैज्ञार्निक ढंग से कियार् जार्तार् है। अधिकांश कार्यों क आधार्र केवल अनुमार्न ही होतार् है। उन्होंने यह अनुभव कियार् कि इन कारखार्नों को चलार्ने में विज्ञार्न एवं गणित की विधियों क उपयोग सम्भव है। उन्होंने हिसार्ब लगार्ने की मशीन (Difference Engine) क भी आविष्कार कियार् तथार् अपने उपर्युक्त निबन्ध द्वार्रार् प्रबन्धकों और मार्लिकों से अनुरोध कियार् कि गणितीय सिद्धार्न्तों द्वार्रार् प्रत्येक प्रक्रियार् क विश्लेषण करके वार्ंछनीय प्रक्रियार् मार्लूम की जार्नी चार्हिए तथार् केवल उसी प्रक्रियार् क प्रयोग कियार् जार्नार् चार्हिए। प्रत्येक प्रक्रियार् की लार्गत निकाल कर प्रत्येक श्रमिक को उसकी कार्य कुशलतार् के आधार्र पर बोनस देने की व्यवस्थार् भी होनी चार्हिए। 

इसलिए उनक सुझार्व थार् कि परम्परार्गत, व्यक्तिपरक और अनुमार्न के आधार्र पर हो रहे प्रबन्ध के स्थार्न पर वैज्ञार्निक ढंग से प्रबन्ध कियार् जार्नार् चार्हिए। वैज्ञार्निक ढंग से प्रबन्ध के लिए विस्तृत निरीक्षण, आंकड़ों क वस्तुपरक वर्गीकरण और विश्लेषण, सही मार्प, तथार् कारण और प्रभार्वों क सही सम्बन्ध निश्चित करनार् आदि कुछ महत्वपूर्ण तत्व भी उन्होंने बतार्ये। वैज्ञार्निक प्रबंध की दिशार् में उठार्यार् गयार् यह पहलार् कदम थार्। लेकिन व्यार्वसार्यिक प्रबन्ध के क्षेत्र में वैज्ञार्निक दृष्टिकोण क प्रतिपार्दन मुख्य रूप से फेडरिक डब्ल्यू. टेलर ने ही कियार् थार्। 

फ्रेडरिक विन्सले टेलर 

20वीं शतार्बदी के आरम्भ में वैज्ञार्निक प्रबंध की विचार्रधार्रार् को यू.एस.ए. में एफडब्ल्य ू. टेलर ने प्रतिपार्दित कियार् थार्। उस समय प्रबन्ध पहल तथार् प्रेरणार् तत्वों के बल पर कियार् जार्तार् थार्। टेलर ने अपनार् जीवन मेडिविल स्टील कारखार्नें में कार्य करने वार्ले मशीन पर काम करने वार्ले कारीगर के रूप में शुरू कियार् थार्। धीरे धीरे उन्होंने अपनी योग्यतार् में वृद्धि की और फोरमैन तथार् बार्द में उसी कारखार्ने में मुख्य अभियन्तार् क पद पार्यार्। उसके पश्चार्त उन्होंने एक दूसरी स्टील कम्पनी के परार्मर्शदार्तार् के रूप में कार्य कियार्। यह कंपनी उत्पार्दन की गंभीर समस्यार्ओं से ग्रसित थी। बहुत से प्रेक्षणों तथार् शॉप फ्लोर पर कार्य करने से संबंधित प्रयोगों और श्रमिकों के प्रति अधिकारियों के व्यवहार्र के अध्ययन के आधार्र पर टेलर ने वैज्ञार्निक प्रबंध के सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन कियार्। टेलर द्वार्रार् प्रतिपार्दित वैज्ञार्निक प्रबंध क सिद्धार्न्त वार्स्तव में प्रबंध क वैज्ञार्निक दृष्टिकोण रखतार् है। इसक प्रमुख उद्देश्य भूल तथार् सुधार्र और अंगूठे के जोर पर प्रबंध की परम्परार् को बदलतार् थार्। नर्इ विचार्रधार्रार् क आधार्र  सिद्धार्न्त थे- 

  1. कार्य क मार्पदण्ड निर्धार्रित करने, उचित मजदूरी की दर को निश्चित करने तथार् कार्य को श्रेष्ठतम विधि से करने के लिए वैज्ञार्निक विधियों क विकास तथार् प्रयोग करनार्। 
  2. अधिकतम कुशलतार् प्रार्प्त करने के लिए श्रमिकों क वैज्ञार्निक विधि से चयन तथार् उनको कार्य पर लगार्नार् तथार् उनके प्रशिक्षण एवं विकास की व्यवस्थार् करनार्। 
  3. अधिकारियों तथार् श्रमिकों के बीच स्पष्ट आधार्र पर कार्य विभार्जन तथार् उत्तरदार्यित्व को निर्धार्रित करनार्।
  4. नियोजन कार्यों तथार् उपकार्यों के अनुसार्र कार्य निष्पार्दित करार्ने के हेतु श्रमिकों के बीच सहयोग तथार् मधुर संबंधों की स्थार्पनार् करनार्। 

वैज्ञार्निक प्रबंध को सफलीभूत करने के लिए बहुत सी तकनीकों क विकास कियार् गयार्। इन सभी को मिलार्जुलार्कर नर्इ विचार्रधार्रार् के तंत्र के लिए निम्नलिखित तकनीकों को अपनार्यार् गयार् –

  1. किसी कार्य की विभिन्न प्रक्रियार्ओं को पूरार् करने में लगने वार्ले समय क मार्पन तथार् विश्लेषण क अध्ययन, प्रक्रियार्ओं क प्रमार्पीकरण और उचित मजदूरी क निर्धार्रण करनार्। 
  2. किसी कार्य को निष्पार्दित करने में की जार्ने वार्ली गति क अध्ययन जिससे कार्य की जार्ने वार्ली गति को रोक जार् सके तथार् कार्य निष्पार्दित करने क एक सर्वश्रेष्ठ तरीक निर्धार्रित कियार् जार् सके।
  3. उपकरण यंत्रों व मशीनों क प्रमार्पीकरण तथार् कार्य करने की दशार्ओं में सुधार्र।
  4. कुशल व अकुशल श्रमिकों की मजदूरी की भिन्न दरें तथार् प्रेरणार्त्मक मजदूरी दर को अपनार्नार्।
  5. कार्यार्त्मक फोरमैनी को अपनार्नार् जिसमें मशीन की गति, सार्मूहिक कार्य, रिपेयर्स, करार्ने आदि के लिए पृथक पृथक फोरमैनों की नियुक्ति की जार्नी चार्हिए। 

टेलर ने वैज्ञार्निक प्रबंध के अपने विचार्रों को व्यवस्थित रूप से व्यक्त कियार् है। प्रबंध व्यवहार्र के क्षेत्र में उनक प्रमुख योगदार्न पहलुओं से संबंध रखतार् है:- 

  1. प्रबन्ध की समस्यार्ओं को हल करने के लिए पूछतार्छ, अवलोकन और प्रयोग करने के लिए वैज्ञार्निक विधियों को अपनार्नार्। 
  2. नियोजन कार्य को उसकी निष्पत्ति से पृथक रखनार् जिससे श्रमिक अपनी सर्वश्रेष्ठतार् क प्रदर्शन कर अपनी जीविक अर्जित कर सके। 
  3. प्रबंध क उद्देश्य उद्योगपति की अधिकतम खुशहार्ली के सार्थ श्रमिकों की अधिकतम भलाइ होनी चार्हिए। वैज्ञार्निक प्रबंध के लार्भ को प्रार्प्त करने हेतु श्रमिकों और प्रबंधकों में संपूर्ण मार्नसिक क्रार्न्ति की आवश्यकतार् है। सार्थ ही ये लार्भ आपसी सम्बंधों में मधुरतार् तथार् सहयोग से प्रार्प्त होनार् चार्हिए व्यक्तिवार्द तथार् मनमुटार्व से नहीं। 

गुण – 

वैज्ञार्निक प्रबंध क प्रमुख लार्भ शक्ति के प्रत्येक औंस क संरक्षण तथार् उचित प्रयोग करनार् है। फिर, विशिष्टकरण और श्रम विभार्जन ने एक दूसरी औद्योगिक क्रार्न्ति उत्पन्न कर दी है। कार्यों को अधिक कुशल एवं विवेकपूर्ण रीति से निष्पार्दित करने के लिए समय तथार् गति की तकनीकें महत्वपूर्ण उपकरण हैं। संक्षेप में वैज्ञार्निक प्रबंध उपक्रम की समस्यार्ओं क हल निकालने के लिए केवल एक विवेकपूर्ण विधि ही नहीं है वरन् यह प्रबंधन के व्यार्वहार्रिक पक्ष को भी सुविधार्जनक बनार्तार् है। 

यद्यपि टेलर द्वार्रार् ही वैज्ञार्निक प्रबंध के प्रमुख सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार् गयार् थार्, तथार्पि उनके कर्इ अनुयार्यियों ने जैसे गैंट, फ्रैंक और विलियम, गिलब्रेथ तथार् इमरसन ने इन विचार्रों क विस्तार्र कियार्, नर्इ तकनीक विकसित की तथार् प्रबंध की इस नवीन विचार्र धार्रार् में सुधार्र कियार्। व्यवहार्रिक रूप में वैज्ञार्निक प्रबंध उत्पार्दकतार् में वृद्धि लार्ने तथार् कार्य प्रक्रियार्ओं की क्षमतार् बढ़ार्ने के लिए यू.एस.ए. तथार् पश्चिमी योरोप में दूर दूर तक अपनार्यार् गयार्।

सीमार्एॅं 

वैज्ञार्निक प्रबंध की अपनी सीमार्एं भी हैं तथार् कर्इ आधार्रों पर इसकी आलोचनार् भी की गर्इ है। कुछ आलोचकों क कहनार् है कि वैज्ञार्निक प्रबंध तकनीकी अर्थ में ही श्रमिकों की कार्यकुशलतार् से संबंधित है तथार् यह उत्पार्दन के महत्व पर ही बल देतार् है। श्रमिक आरम्भ से कामचोर होते हैं। प्रबंधकों की उन पर कड़ी निगरार्नी की आवश्यकतार् है तथार् प्रबंधकों को अपनार् अधिकार इस संबंध में प्रयोग करनार् चार्हिए। इन मार्न्यतार्ओं पर यह सिद्धार्न्त आधार्रित है। यह भी कहार् जार्तार् है कि श्रमिकों को केवल मुद्रार् से ही अभिप्रेरित कियार् जार् सकतार् है।कार्य के वार्तार्वरण के सार्मार्जिक तथार् मनोवैज्ञार्निक पहलुओं पर कोर्इ विचार्र नहीं कियार् जार्तार्। अन्य आलोचकों ने इसे अवैज्ञार्निक, असमार्जिक, मनोवैज्ञार्निक रूप से अनुचित तथार् प्रजार्तंत्रीय विरोधी बतार्यार् है। यह अवैज्ञार्निक हैं, क्योंकि श्रमिकों की क्षमतार् तथार् मजदूरी मार्पन की कोर्इ उचित तथार् विश्वसनीय विधि नहीं है। यह असमार्जिक है क्योंकि श्रिमेकों को आर्थिक उपकरणों के रूप में व्यवहार्र कियार् जार्तार् है यह मनोवैज्ञार्निक रूप में अनुचित है क्योंकि एक श्रमिक को दूसरे के सार्थ अधिक उत्पार्दन करने तथार् अधिक कमार्ने के लिए, अस्वस्थ प्रतियोगितार् करनी पड़ती है। यह प्रजार्तंत्रीय विरोधी है क्योंकि यह श्रमिकों की स्वार्धीनतार् को कम करती है। श्रमिक संघ इसक विरोध करते, क्योंकि यह प्रबंध को तार्नार्शार्ही बनार्ती है कर्मचार्रियों के कार्य क भार्र बढ़ार्ती है तथार् उनके रोजगार्र के अवसरों पर विपरीत प्रभार्व डार्लती है।

रूढ़िवार्दी सम्प्रदार्य के प्रमुख विचार्र को मेंसर हेनरी फेयोल क नार्म भी प्रमुखतार् से लियार् जार्तार् है। प्रबन्धक के क्षेत्र में आप द्वार्रार् किये गये योगदार्न को प्रबन्ध के प्रशार्सकीय सिद्धार्न्तों के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। जब श्री फेयोल फ्रार्ंस की एक कोयले की कम्पनी में बतौर निदेशक कार्यरत थे तभी उन्होंने प्रबन्धन प्रक्रियार् क सुव्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत कियार् थार्। आपके अनुसार्र किसी भी संगठन में समस्त व्यार्पार्रिक प्रक्रियार्ओं को छ: भार्गों में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है तथार् ये परस्पर एक दूसरे पर निर्भर रहती है ये है, तकनीकी, व्यार्पार्रिक, वित्तीय सुरक्षार्, लेखार्कार्य तथार् प्रशार्सनिक कार्य।

आपके अनुसार्र प्रबंधन प्रक्रियार् सावभौमिक है तथार् इस प्रक्रियार् में निम्नलिखित पॉंच विशेषतार्एं होती हैं, यथार् – पूर्वनुमार्न, नियोजन, व्यवस्थार्पन, आदेश, समन्वय तथार् नियंत्रण। इसके सार्थ सार्थ अपने 14 सिद्धार्न्तों क एक सैट भी प्रतिपार्दित कियार्। ये सिद्धार्न्त प्रबंधन प्रक्रियार् क प्रयोग करने में पथ प्रदर्शक बनते हैं ।आप इन सिद्धार्न्तों क इकार्इ संख्यार् 3 में विस्तृत रूप में अध्ययन करेंगे।

प्रभार्वी प्रबंधन के लिए आवश्यक गुण तथार् योग्यतार्एं उपक्रम के विभिन्न स्तरों के प्रबंधकीय पदों पर निर्भर करती है। फेयॉल के अनुसार्र प्रशार्सनिक गुण प्रबंधकों के उच्चस्तरीय स्तर पर अनिवाय है जबकि तकनीकी गुण नीचे के स्तर क कार्य करने वार्ले पदों के प्रबंधकों के लिए आवश्यक है। उनक यह भी विश्वार्स थार् कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर व्यक्तियों के लिए प्रबंधकीय प्रशिक्षण अनिवाय है। उन्होंने ही पहली बार्र प्रबंध क्षेत्र में औपचार्रिक शिक्षार् तथार् प्रशिक्षण की आवश्यकतार् पर बल दियार्। संक्षेप में फेयॉल क विश्लेषण सार्धनों क एक सैट (अर्थार्त नियोजन, व्यवस्थार्, आदेश, समन्वय तथार् नियंत्रण) प्रबंधक प्रक्रियार् को चलार्ने तथार् मागदर्शन के लिए (जैसे प्रक्रियार् को व्यार्वहार्रिक रूप देने के लिए सिद्धार्न्त) प्रदार्न करतार् है।

प्रबंध क प्रशार्सनिक सिद्धार्न्त एवं प्रबंध की कार्यार्त्मक विचार्रधार्रार् फेयॉल द्वार्रार् रखी गर्इ नींव पर ही विकसित हुए हैं। उन्होंने प्रंबंध प्रक्रियार् क विश्लेषण करने के लिए एक अवधार्रणार्त्मक ढार्ंचार् बनार्कर दियार्। सार्थ ही, उन्होंने प्रबंध को एक पृथक स्वतंत्र इकार्इ क सम्मार्न देकर उसक विश्लेषण कियार्। ज्ञार्न के समूह के रूप में प्रबंध को अत्यधिक लार्भ फैयॉल द्वार्रार् प्रबंधकीय गुणों क विश्लेषण कर उन्हें सावभौमिकतार् प्रदार्न करने तथार् उसके सार्मार्न्य प्रबंध के सिद्धार्न्तों से ही मिलार्। यद्यपि कुछ आलोचकों ने इसे असंगत अथवार् पार्रस्परिक विरोधी, अस्पष्ट तथार् प्रबंधकों क पक्ष लेने वार्लार् सिद्धार्न्त बतार्यार् है, फिर भी यह सिद्धार्न्त सम्पूर्ण विश्व में प्रबंध शार्स्त्र की शिक्षार् तथार् व्यवहार्र में अपनार् महत्वपूर्ण प्रभार्व रखतार् है।

रूढ़िव़वार्दी विचार्रधार्रार्ओं की आलोचनार्एं 

इसमें संदेह नहीं कि रूढ़िवार्दी विचार्रधार्रार् ने प्रबन्धशार्स्त्र के विकास से सरार्हनीय योगदार्न कियार् है, फिर भी इनकी आलोचनार्एं निम्न आधार्र पर की जार् सकती हैं :-

  1. रूढ़िवार्दी प्रबन्ध सिद्धार्न्त एवं अवधार्रणार्एं व्यक्तिगत अनुभव तथार् सीमित अवलोकन पर आधार्रित है। इनमें प्रयोग सार्क्ष्यों क अभार्व है। इनक सत्यार्पन, नियंत्रित कथन कहनार् ही अधिक उचित है। वैज्ञार्निक कहनार् नहीं। 
  2. बहुत से रूढ़िवार्दी सिद्धार्न्तों को यार् तो स्पष्ट रूप से परिभार्षित ही नही कियार् जार् सकतार् है। दूसरे शब्द में अल्पज्ञतार्, अति सार्धार्रणीयतार् और अवार्स्तविकतार् के शिकार हैं।’’ अत: यह भी प्रहार्र कियार् कि इन्हें कहार्वत से अधिक नहीं समझनार् भूल होगी उनकी तुलनार् लोकोक्ति यार् लोक सार्हित्य से की जार् सकती है।
  3. रूढ़िवार्दी प्रबन्धशार्स्त्रियों ने बन्द प्रणार्ली मार्न्यतार्ओं के आधार्र पर सिद्धार्न्तों को प्रस्तुत कियार् और संगठन पर पर्यार्वरणीय घटकों के प्रभार्वों पर विचार्र नहीं कियार्। जबकि हर संगठन आर्थिक, सार्मार्जिक और रार्जनैतिक वार्तार्वरण से प्रभार्वित होतार् है। प्रक्रियार् प्रभार्व पड़तार् है।
  4. रूढ़िवार्दी प्रबन्धशार्स्त्रियों ने यह मार्नार् कि संगठन गतिहीन और अपरिवर्तनीय होते हैं जब कि वार्स्तव में वे गतिशील एवं परिवर्तनशील होते हैं तथार् निरन्तर समार्योजन की आवश्यकतार् महसूस होती है। अत: इनक केवल ऐतिहार्सिक महत्व रह जार्तार् है।
  5. रूढ़िवार्दी प्रबन्धशार्स्त्रियों ने श्रमिकों को केवल जीवित संयत्र ही समझार् जिन्हें प्रेरणार्ओं के मार्ध्यम से संचार्लित कियार् जार् सकतार् है। लेकिन मार्नवीय व्यवहार्र बड़ार् ही विषम है, यह आर्थिक, सार्मार्जिक, मनोवैज्ञार्निक तथार् अन्य कारकों में प्रभार्वित होतार् है। श्रमिक प्रार्य: अपने किसी वर्ग के सदस्य के रूप में व्यवहार्र करते हैं। उनकी क्षमतार् और विवेक उनकी शार्रीरिक क्षमतार् से निर्धार्रित नहीं होते बल्कि उनके सार्मार्जिक मूल्यों से होते हैं इसीलिए गैर आर्थिक कारक और उनके व्यवहार्र के निर्धार्रण में महत्वपूर्ण होते है। 
  6. प्रशार्सनिक विचार्रधार्रार् के प्रबन्धशार्स्त्रियों क यह मत है कि प्रबन्ध के कार्य, सिद्धार्न्त एवं अवधार्रणार्एं सभी संगठनों पर लार्गू होती है तर्कसंगत प्रार्प्ति नही होतार्। 

प्रबंध का नवरूढ़ि वार्दी  सम्प्रदार्य 

रूढ़िवार्दी सम्प्रदार्य की ही उपज है नवरूढ़ि वार्दी सम्प्रदार्य। इस सम्प्रदार्य में अग्रलिखित प्रबन्ध विद्वार्नों को शार्मिल कियार् जार्तार् है :- एल्टन, मेयो, मेरी पाकर फोलेट, सी.आर्इ. वर्नार्ड, तुगलस एम.सी. ग्रेगर तथार् आर.लार्इकर्ट। मूलत: ये सभी समार्जशार्स्त्री थे तथार् इन्होंने वैज्ञार्निक प्रबन्ध एवं प्रशार्सनिक प्रबंध के सिद्धार्न्तों की व्यार्ख्यार् समार्जशार्स्त्रीय दृष्टिकोण से की और पार्यार् कि इन सिद्धार्न्तों के परिणार्म अच्छे नहीं हैं क्योंकि इनमें कार्य की वार्स्तविक दशार्ओं की अवहेलनार् ओर मार्नवीय तथार् सार्मार्जिक कारकों के प्रभार्व एवं महत्व की घोर उपेक्षार् की गर्इ है। नव रूढ़िवार्दी सम्प्रदार्य के विचार्रकों को हम दो भार्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं। (क) मार्नवीय सम्बन्धों के विचार्रक (ख) व्यवहार्रिक विज्ञार्न के विचार्रक आइये इन्हें क्रमश: समझने क प्रयार्स करें।

मार्नवीय सम्बन्धी के विचार्रक 

प्रबन्ध में मार्नवीय दृष्टिकोण क प्रतिपार्दन एल्टन मेयो तथार् उनके सहयोगी जार्न ड्यवे, डब्ल्यू. एफ. ह्वार्इटे तथार् कुर्ट लेविन ने कियार्। एल्टन मेयो हार्वर्ड विश्वविद्यार्लय में समार्जशार्स्त्र प्रार्चाय थे और उन्होंने वेस्टर्न एलेक्ट्रिक कम्पनी के होथेर्ने कारखार्ने में विभिन्न प्रयोगों द्वार्रार् अपने इन विचार्रों क प्रतिपार्दन टेलर तथार् अन्य रूढ़िवार्दी प्रबन्ध शार्स्त्रियों ने व्यवस्थार्, विवेकपूर्णतार्, कार्य विभार्जन, विशिष्टीकरण और अधिकार सम्बन्धों पर आधार्रित औपचार्रिक संगठन ढार्ंचे पर विशेष जोर दियार् थार् तथार् श्रमिकों को केवल एक आर्थिक सार्धन मार्नार् थार्। मार्नवीय सम्बन्ध दृष्टिकोण के प्रबन्ध शार्स्त्रियों ने इस समरूप आर्थिक दर्शन को चुनौती दी। उन्होंने निश्चित नियमों, व्यवस्थार्, विवेकपूवर्णतार् और अधिकार तंत्र पर आधार्रित औपचार्रिक संगठन ढार्ंचे पर कड़ार् प्रहार्र कियार्। और अनौपचार्रिक प्रजार्तार्ंत्रिक तथार् सहभार्गी संगठन ढार्ंचे क समर्थन कियार् जिसमें श्रमिकों के मनोबल, सृजनार्त्मकतार् तथार् संतोष वृद्धि पर विशेष ध्यार्न दियार् गयार्।

यह विचार्र धार्रणार् पर आधार्रित थी कि आधुनिक व्यवस्थार् एक सार्मार्जिक तंत्र है जिसमें सार्मार्जिक वार्तार्वरण और पार्रस्परिक संबंध कर्मचार्रियों के व्यवहार्र को प्रभार्वित करते हैं। यह इस बार्त पर बल देतार् है कि अधिकारियों तथार् अधीनस्थों के अधिकार दार्यित्व संबंध कर्मचार्रियों की सार्मार्जिक एवं मनोवैज्ञार्निक संतुष्टि से संबंष्टिार्त होनार् चार्हिए। कर्मचार्रियों को प्रसन्न रखकर ही एक उपक्रम उनक पूर्ण सहयोग प्रार्प्त कर सकतार् है तथार् इस प्रकार उनकी कार्यक्षमतार् में वृद्धि लार्तार् है। प्रबन्ध को कार्यरत सार्मार्जिक समूहों के विकास को प्रोत्सार्हित करनार् चार्हिए तथार् कर्मचार्रियों के विचार्रों को मुक्त रूप से व्यक्त करने क अवसर प्रदार्न करनार् चार्हिए। प्रबन्धकों को प्रजार्तार्ंत्रिक नेतृत्व के महत्व को स्वीकार कर लेनार् चार्हिए जिससे सम्प्रेषण मुक्त रूप से प्रवार्हित हो सकेगार् और अधीनस्थ निर्णयन में भार्ग ले सकेंगे।

ऐलटन मार्यो तथार् उनके सार्थियों द्वार्रार् किए गये बहुत से प्रयोगार्त्मक अध् ययनों के परिणार्म स्वरूप प्रबंध में मार्नव संबंध विचार्रधार्रार् क विकास हुआ। ये अध्ययन यू.एस.ए. में होथोर्न स्थित वेस्टर्न इलेक्ट्रिक प्लार्ंट में किये गये थे। होथोर्न अध्ययन क उद्देश्य श्रमिकों की उत्पार्दकतार् तथार् कार्य निश्पत्ति को प्रभार्वित करने वार्ले कारकों को ढूॅंढ निकालनार् थार्। ये निष्कर्ष इस प्रकार थे।

  1. कार्यस्थल क नैसर्गिक वार्तार्वरण कार्यक्षमतार् पर कोर्इ विशेष प्रभार्व नहीं डार्लतार्। 
  2. श्रमिकों तथार् उनकी कार्य टोली क कार्य के प्रति अनुकूल व्यवहार्र कार्यक्षमतार् को प्रभार्वित करने वार्ले महत्वपूर्ण कारक है। 
  3. श्रमिकों की सार्मार्जिक तथार् मनोवैज्ञार्निक आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करने से श्रमिकों के मनोबल तथार् कार्यक्षमतार् पर महत्वपूर्ण प्रभार्व पड़तार् है। 
  4. श्रमिकों गु्रप जो सार्मार्जिक पार्रस्परिक प्रभार्व तथार् सार्मार्न्य हित पर आधार्रित होते हैं, श्रमिकों के कार्य निष्पार्दन पर गहरार् प्रभार्व डार्लते हैं। 
  5. केवल आर्थिक पार्रितोषण श्रमिकों को प्रभार्वित नहीं कर पार्तार्। कार्य सुरक्षार्, अधिकारियों द्वार्रार् प्रशंसार्, सम्बन्धित विषयों पर विचार्र व्यक्त करनार् आदि कारक अभिप्रेरित करने के अधिक महत्वपूर्ण कारक है। 

यह ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि मार्नव संबंधों की विचार्रधार्रार् क उद्देश्य कर्मचार्रियों की उत्पार्दन क्षमतार् में वृद्धि करनार् थार्। कर्मचार्रियों की संतुष्टि ही उच्च उत्पार्दकतार् तथार् कार्यक्षमतार् के उद्देश्य को प्रार्प्त करने क सर्वश्रेष्ठ सार्धन है। इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रबंधक यह जार्न लें कि कर्मचार्री वह काम क्यों है जो वे करनार् चार्हते हैं तथार् कौन से सार्मार्जिक तथार् मनोवैज्ञार्निक कारक उन्हें अभिप्रेरित करते हैं। अत: संतुष्टि प्रदार्न करने वार्ले कार्य वार्तार्वरण को उत्पन्न करने के लिए प्रयार्स करनार् चार्हिए जिससे वे लोग अपनी आवश्यकतार्ओं को पूरार् कर सकें तथार् संगठन के उद्देश्यों को प्रार्प्त करने में सहार्यक सिद्ध हों। 

मार्नवीय सम्बन्ध दृष्टिकोण क मूल्यार्ंकन 

इस विचार्रधार्रार् क सबसे प्रमुख योगदार्न यही थार् कि इसने संगठन को एक सार्मार्जिक व्यवस्थार् तथार् श्रमिकों को उसक सबसे महत्वपूर्ण अंग बतार्कर प्रबन्धकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन क प्रयार्स कियार् गयार्। संगठन की उत्पार्दकतार् कर्मचार्रियों को अधिक संतुष्ट करके ही सम्भव है। कर्मचार्रियों को अधिक संतुष्ट एवं उत्पार्दकतार् तभी बनार्यार् जार् सकतार् है जब उनकी आर्थिक, सार्मार्जिक, तथार् मनोवैज्ञार्निक आवश्यकतार्एं पूरी की जार्यं। दूसरे, इस विचार्रधार्रार् ने अनौपचार्रिक सम्बन्धों तथार् अनौपचार्रिक व्यक्ति समूहों क संगठन में महत्व बतार्कर संगठन में उत्पार्दकतार् एवं संतोष दोनों के परस्पर सम्बन्धों की स्थार्पनार् की। इस प्रकार, व्यक्ति उन्मुख प्रबंध की विचार्रधार्रार् क सूत्रपार्त हुआ। दूसरी ओर इस विचार्रधार्रार् की कड़ी आलोचनार् भी की गर्इ जिन्हें निम्न प्रकार से क्रमबद्ध कियार् जार् सकतार् है।

  1. मार्नवीय सम्बन्ध विचार्रधार्रार् के अधिकांश निष्कर्षों क कोर्इ वैज्ञार्निक आधार्र नहीं है। वे संकीर्णतार् के शिकार हैं क्योंकि वे व्यार्पक और नियंत्रित प्रयोगों के ऊपर आधार्रित नहीं हैं। 
  2. मार्नवीय सम्बन्धों की विचार्रधार्रार् के निष्कर्षों क सोचने क आधार्र बहुत संकीर्ण है क्योंकि वे केवल मार्नवीय सम्बन्ध और अनौपचार्रिक व्यक्ति समूह पर ही बल देते हैं और संगठन के ढार्ंचे एवं तकनीकी पक्ष को भूल जार्ते हैं। उन्होंने कार्य संतोष के आर्थिक घटकों की भी उपेक्षार् की है। उन्होंने केवल निम्न स्तर पर कार्यरत श्रमिकों के व्यवहार्र पर ही अपनार् ध्यार्न केन्द्रित रखार् है और उच्च प्रबन्धक के व्यवहार्र के सम्बन्धों में कोर्इ मागदर्शन नहीं दियार् है। 
  3. प्रयोगों में ऐसार् कोर्इ प्रमार्ण कर्मचार्रियों की उत्पार्दकतार्, कार्य संतोष और प्रसन्नतार् में सम्बन्ध को प्रस्तुत नहीं करतार् है जिससे उनके दृष्टिकोण में विश्वार्स कियार् जार् सके।
  4. समूह निर्णय कुछ निश्चित परिस्थितियों में अच्छे हो सकते हैं किन्तु यह झगड़ों, उत्तरदार्यित्व के हस्तार्न्तरण, प्रबन्धक के पद की अवहेलनार् तथार् अनिर्णयन जैसी जोखिमों से भरार् हुआ है और नकारार्त्मक है।
  5. मार्नवीय सम्बन्ध से जुड़े प्रबन्धशार्स्त्री संगठन विरोध को सदैव एक सार्मार्जिक हार्नि की दृष्टि से तथार् सहयोग को सार्मार्जिक गुणतार् की दृष्टि से देखते हैं, फलस्वरूप वें संगठन में समूह की एकतार् पर जोर देते हैं और विरोध को कम करने की बार्त करते हैं लेकिन संगठन क स्वस्थ रहनार् विरोध से सर्वथार् मुक्ति में नहीं बल्कि विरोधों के सार्मन्जस्य और उनकी रचनार्त्मक शक्ति के रूप में उपयोग में निहित हैं। 
  6. यह सिद्धार्न्त व्यक्ति विरोधी है। यह दृष्टिकोण प्रबन्धक के अधिकार के महत्व को कम करतार् है उसे पहल करने से रोकतार् है और उसक मनोबल गिरार्तार् है। अन्य सदस्य भी व्यक्तिगत पहल और रूचि में कमी कर देते हैं और अपने व्यक्तित्व को समूह में खो बैठते हैं। 

व्यार्वहार्रिक विज्ञार्न के विचार्रक 

व्यार्वहार्रिक विज्ञार्न की विचार्रधार्रार् क उदगम मार्नव सम्बन्धी विचार्रधार्रार् से ही हुआ है। यह विचार्रधार्रों संगठन में मार्नव व्यवहार्र के सार्मार्जिक और मनोवैज्ञार्निक पहलुओं को स्पष्ट करती है। आइये अब व्यवहार्रिक विज्ञार्न के अग्रलिखित लक्षणों को समझने क प्रयार्स करें – 

  1. यह अन्तरविषयी विज्ञार्न है जिसमें विभिन्न सार्मार्जिक विज्ञार्नों के ज्ञार्न क समन्वय होतार् है। 
  2. यह प्रयोगार्त्मक विज्ञार्न है जिसमें शोध द्वार्रार् संगठन की विभिन्न समस्यार्ओं क निदार्न होतार् है।
  3. यह आदर्श विज्ञार्न है जो केवल कारक परिणार्म सम्बन्ध को प्रदर्शित करतार् है माग दर्शन करतार् है कि सफलतार् के क्यार् उपार्य कर सकतार् है।
  4. यह व्यक्ति प्रधार्न है अत: व्यक्तियों के विचार्रों, भार्वनार्ओं, आवश्यकतार्ओं और प्रेरणार्ओं पर विशेष बल देतार् है और मार्नवीय मूल्यों को स्वीकार करतार् है।
  5. यह लक्ष्य प्रधार्न विज्ञार्न भी है। यह संगठन के विरोधों को मार्नवतार् प्रदार्न करतार् है तथार् व्यक्तियों एवं संगठनों दोनों की संतुष्टि के लिए अन्र्तविरोधी लक्ष्यों में सार्मन्जस्य स्थार्न के लिए सुझार्ार्व देतार् है। 
  6. यह प्रणार्ली अवधार्रणार् प्रधार्न है तथार् यह सभी कारकों क विश्लेषण करती है जिनक प्रभार्व संगठन की कार्यकुशलतार् पर पड़तार् है। 

मार्नव सम्बन्धी विचार्रधार्रार् जहॉं प्रसन्न श्रमिक को अधिक उत्पार्दक मार्नार् जार्तार् है वहीं यह विचार्रधार्रार् लक्ष्य एवं कुशलतार् की प्रार्प्ति क एक प्रमुख मार्ध्यम मार्त्र ही है। व्यार्वहार्रिक विज्ञार्न को हम तीन बिन्दुओं के मार्ध्यम से और गहनतार् से समझ सकते हैं।

(क) व्यक्ति क व्यवहार्र उसके समूह के व्यवहार्र से प्रभार्वित होतार् है। हर व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अपने व्यवहार्र में परिवर्तन लार्ने वार्ले दबार्वों क विरोध कर सकतार् है किन्तु जब उसक समूह इस परिवर्तन को स्वीकार करतार् है तो वह इस परिवर्तन के लिए सहर्ष तैयार्र हो जार्तार् है। समूह द्वार्रार् कार्य क मार्नदंड निर्धार्रित करने पर उस समूह से संबंधित व्यक्ति अधिक कड़ाइ के सार्थ परिवर्तन क विरोध करेंगें। फिर, जो कुछ भी श्रमिक मार्लिकों की उत्पार्दन संबंधी अपेक्षार् को जिस रूप में समझ पार्ते हैं वही उत्पार्दन स्तर को निर्धार्रित करती है अथवार् उसको प्रभार्वित करती है इसक कारण यह है कि प्रबंध किसी विशेष उत्पार्दन स्तर क निर्धार्रण नहीं कर पार्तार् बल्कि यह उचित स्तर क सुझार्व देतार् है। और श्रमिक प्रार्य: यह विश्वार्स करते हैं कि यदि वे अधिक कार्य करेंगे तो उनकी मजदूरी की दर कम कर दी जार्येगी। 

(ख) अनौपचार्रिक नेतृत्व के औपचार्रिक अधिकार की अपेक्षार् सार्मूहिक निष्पार्दन के मार्नदंण्ड को निर्धार्रित करने में अधिक महत्व रखतार् है। नेतार् के रूप में प्रबंधक अधिक प्रभार्वी रहेगार् और अधीनस्थों को स्वीकार्य होगार् यदि वह प्रजार्तार्ंत्रिक नेतृत्व स्वरूप को अपनार्तार् है । यदि लक्ष्य निर्धार्रण में अधीनस्थों को प्रोत्सार्हित कियार् जार्तार् है तो उसके प्रति उनकी भूमिक अधिक उपयोगी रहेगी। तकनीक और कार्य विधि में परिवर्तन को श्रमिकों द्वार्रार् प्रार्य: विरोध कियार् जार्तार् है। परन्तु श्रमिकों को योजनार् और कार्य डिजार्इन में सहभार्गी बनार्कर इस परिवर्तन को आसार्नी से कियार् जार् सकतार् है। 

(ग) अधिकांश व्यक्ति स्वभार्व से ही कार्य करने में आनंद की अनुभूति करते हैं तथार् स्व नियंत्रण और स्वयं के विकास से अभिप्रेरित होते हैं। प्रबन्धकों को उन परिस्थितियों को पहचार्ननार् चार्हिए और उपक्रम के कार्यों में मार्नव शक्ति के प्रयोग हेतु आवश्यक वार्तार्वरण प्रदार्न करनार् चार्हिए। प्रबंधकों क अधीनस्थों के प्रति व्यवहार्र सदैव धनार्त्मक होनार् चार्हिए। उन्हें ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि ओसतन व्यक्ति आलसी नहीं होतार् वरन् प्रकृति के अनुसार्र आगे बढ़ने की इच्छार् रखतार् है। वह महत्वार्कांक्षी होतार् है। प्रत्येक व्यक्ति कार्य करनार् तथार् उत्तरदार्यित्व स्वीकार करनार् पसंद करतार् है। प्रबन्ध की नर्इ रूढ़िवार्दी विचार्रधार्रार् ने प्रबन्ध की रूढ़िवार्दी विचार्रधार्रार् के सिद्धार्न्तों पर प्रतिस्थार्पन के लिए कोर्इ नयार् सिद्धार्नत नहीं दियार् है। यह मूलरूप से संगठनार्त्मक परिवर्तन के स्थार्न पर कुछ समयोजनों से ही सम्बन्धित है। टिप्पणी कीजिए। 

प्रबंध क आधुनिक सम्प्रदार्य 

प्रबन्ध विज्ञार्न में तीव्र गतिशीलतार् क समय द्वितीय विश्व युद्ध के बार्द से प्रार्रम्भ मार्नार् जार्तार् है। यह वही समय थार् जब रूढ़िवार्दी और नव रूढ़िविचार्रकों की विचार्रधार्रार्ओं क विश्लेषण एवं एकीकरण की कोशिश की गर्इ। प्रबन्ध क यह आधुनिक सम्प्रदार्य प्रणार्लीगत विचार्रधार्रार् तथार् प्रार्संगिक विचार्रधार्रार् को प्रस्तुत करतार् है। यह सम्प्रदार्य रूढ़िवार्दी विचार्रधार्रार् तथार् स्थिर स्वरूप और अनौपचार्रिक तथार् गतिशील स्वरूप पर आधार्रित थी। एक समन्वित रूप है। इस सम्प्रदार्य ने उन समस्यार्ओं क हल प्रस्तुत कियार् जिसक हल रूढ़िवार्दी और नवरूढ़िवार्दी सम्प्रदार्यों द्वार्रार् प्रस्तुत नहीं कियार् जार् सक थार्। आइये अब क्रमार्वार्र आधुनिक सम्प्रदार्य की विचार्रधार्रार्ओं को समझने क प्रयार्स करें – 

प्रणार्लीगत विचार्रधार्रार् 

प्रणार्ली क तार्त्पर्य, ऐसी इकाइयों से है जो अन्र्तसम्बन्धित होती है तथार् प्रत्येक एक दूसरे को किसी न किसी रूप में प्रभार्वित करती हैं जैसे -मार्नव शरीर क निर्मार्ण पंच तत्वों से होतार् है और उसके शरीर ने स्थित हृदय उस शरीर रूपी प्रणार्ली की उप प्रणार्ली है । एक सार्मार्न्य प्रणार्ली की अग्रलिखित विशेषतार्एं हो सकती हैं – 

  1. प्रत्येक प्रणार्ली के अन्तर्गत अनेक उपप्रणार्लियॉं होती हैं ।
  2. प्रत्येक प्रणार्ली के ऊपर अन्य बड़ी प्रणार्लियार्ं हो सकती हैं। 
  3. प्रत्येक उपप्रणार्ली अन्र्तसम्बन्धित होती है।
  4. प्रत्येक प्रणार्ली लक्ष्य से उन्मुख होती है तथार् समस्त उपप्रणार्लियॉं उसे सुव्यवस्थित रूप से पार्ने में सहयोग करती हैं।
  5. सभी प्रणार्लियों को दो भार्गों में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है। खुली प्रणार्ली व बन्द प्रणार्ली। 
  6. बन्द प्रणार्ली अपने वार्तार्वरण से कोर्इ सम्बन्ध नहीं रखती अर्थार्त वह तो प्रभार्वित होती है और न ही प्रभार्वित करती है। इसके विपरीत खुली प्रणार्ली प्रभार्वित होती है और प्रभार्वित भी करती है।
  7. समस्त प्रणार्लियों में सार्धन व उत्पार्दन दोनों होते हैं। 
  8. खुली प्रणार्ली में प्रतिपुष्टि निरन्तर चलती रहती है। जिससे समय समय पर आवश्यक समार्योजन एवं संशोधन चलतार् रहतार् है। 

उपरोक्त विवेचन के पश्चार्त हम कह सकते हैं कि इस विचार्रधार्रार् की दृष्टि में प्रबंध भी एक प्रणार्ली है तथार् इसकी प्रकृति खुली है। अत: प्रबन्ध को अपने संगठन की सफलतार् के लिए एक एकीकृत प्रणार्ली समझनार् चार्हिए। प्रबन्ध रूपी प्रणार्ली के निरन्तर प्रवार्ह के लिए पार्ंच प्रमुख कारक आवश्यक होते हैं, यथार् संसार्धन,रूपार्न्तरण सम्प्रेषण व्यवस्थार्, उत्पार्दन तथार् प्रतिपुष्टि। इस प्रकार प्रबन्ध रूपी प्रणार्ली की विशेषतार्एं हो सकती हैं आइये इसे क्रमवार्र समझने क प्रयार्स करें।

  1. यह विचार्रधार्रार् सम्पूर्ण संगठन को एक इकार्इ मार्नती है। 
  2. चूॅंकि प्रबन्ध की प्रकृति खुली है अत: इसमें परिस्थितिनुकूल परिवर्तन सम्भव है
  3. परिस्थितिनुकूल परिवर्तनों के कारण इसे एक गतिशील प्रक्रियार् में इस बार्त क ध्यार्न रखनार् चार्हिए।
  4. प्रत्येक प्रबन्धक को संगठन को एक इकार्इ के रूप में देखनार् चार्हिए न कि उसक विभार्गीकरण कर अलग अलग इकाइयों में।
  5. प्रबन्धकों को सदैव बहु विषयक दृष्टि अपनार्नी चार्हिए। क्योकि संगठन एक बहु आयार्मी बहुस्तरीय तथार् अनेक तत्वों के सम्मिश्रण से निर्मित प्रणार्ली है। 
  6. इस विचार्रधार्रार् के मतार्नुसार्र संगठन एक समन्वित व एकीकृत इकार्इ होती है अत: सभी विभार्गों के समन्वित प्रयार्सों से ही सफलतार् मिलती है। 
  7. उत्पार्दकतार् में वृद्धि तभी सम्भव है जब संगठनार्त्मक सभी उपप्रणार्लियों समन्वित रूप से सम्पूर्ण संगठन की सफलतार् के लिए मिलकर कार्य करें। 

प्रबन्ध की इन प्रक्रियार्त्मक विशेषतार्ओं के पश्चार्त आइये इसके कुछ लार्भों क भी समझने क प्रयार्स करें –

  1. यह संगठनार्त्मक प्रयार्सों को एकीकृत करतार् है।
  2. यह प्रबंधकों को उपक्रम को समग्र रूप में देखने क अवसर प्रदार्न करतार् है। समग्र रूप में उपक्रम अपने विभिन्न भार्गों के योग से भी बड़ार् होतार् है। 
  3. यह विचार्रधार्रार् संगठन को एक खुलार् तंत्र मार्नकर चलती है।फिर उपतंत्रों के बीच पार्रस्परिक प्रभार्व भी गतिशील होते हैं।
  4. आधुनिक विचार्रधार्रार् बहुस्तरों तथार् बहुआयार्म पर आधार्रित है अर्थार्त इसमें सूक्ष्म तथार् दोनों ही पहलुओं पर विचार्र कियार् जार्तार् है। यह देश के औद्योगिक कार्यों पर सूक्ष्म रूप से विचार्र करती है तथार् इनक आन्तरिक इकाइयों पर बहुत रूप से विचार्र करती है।
  5. यह तंत्र पद्धति बहुचरों पर आधार्रित है क्योंकि एक घटनार् बहुत से कारकों क परिणार्म हो सकती है जो एक दूसरे से जुड़े हुए तथार् परस्पर निर्भर रहते हों। 
  6. परिष्करण प्रक्रियार् उपक्रम को अपने हिस्सों क पर्यार्वरण में परिवर्तन के अनुसार्र फिर से व्यवस्थित करने क अवसर प्रदार्न करती है। 

इस प्रणार्ली की आकर्षक अपील के कारण वर्तमार्न युग में इसकी विशेष मार्न्यतार् है। यह व्यवसार्यिक निर्णयन प्रक्रियार् में क्रार्न्ति लार् रही है। इससे विस्तृत सूचनार्एं आसार्नी से सुलभ हो जार्ती हैं जिनके कारण निर्णय लेने में सुविधार् होती है। किन्तु इसकी कुछ सीमार्यें भी हैं वार्स्तव में यह व्यवस्थार् प्रणार्ली के सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत नहीं कर पार्तार् है। यह एक संगठन विशेष के उपतंत्रों क संबंध पर्यार्वरण से किस प्रकार रहतार् है स्पष्ट नहीं कर पार्तार् है। अत: इसे अव्यवहार्रिक मार्नार् जार्तार् है। अत: यह प्रबन्ध की किसी तकनीकी को स्पष्ट नहीं करती है।

प्रार्संगिकतार् की विचार्रधार्रार् 

प्रार्संगिकतार् विचार्रधार्रार् क आधार्र यह है कि प्रबंधन की कोर्इ एक सर्वश्रेष्ठ विधि नहीं हो सकती वार्स्तव में प्रबंध के विभिन्न कार्यों को करने के लिए बहुत से तरीके हैं। यह विचार्रधार्रार् इस बार्त पर बल देती है कि नेतृत्व, नियोजन, व्यवस्थार् तथार् प्रबंध कार्यों को करने की विधियॉं परिस्थितियों के अनुसार्र बदलती रहती हैं । एक विशिष्ट विधि से एक विशिष्ट परिस्थिति में श्रेष्ठ परिणार्म प्रार्प्त हो सकतार् है किन्तु अन्य परिस्थितियों में वह विधि कतर्इ बेकार सिद्ध हो सकती हैं। परिस्थितियों में एक सावभौमिक विधि नहीं अपनाइ जार् सकती। प्रबन्धकों को विभिन्न परिस्थितियों क विश्लेषण करनार् चार्हिए और उस परिस्थिति में श्रेष्ठतम परिणार्म देने के लिए वैज्ञार्निक प्रबंध के हिमार्यती, कार्य के सरलीकरण और अतिरिक्त अभिप्रेरणार्त्मक सुविधार्ओं क सुझार्व दे सकते हैं। व्यार्वहार्रिक वैज्ञार्निक कार्य को समृद्ध बनार्ने तथार् कर्मचार्रियों को प्रजार्तार्ंत्रिक रूप से कार्यों के निर्णयन में भार्ग लेने क सुझार्व कर सकते हैं।किन्तु प्रार्संगिक विचार्रधार्रार् के समर्थकों द्वार्रार् सम्पूर्ण परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में एक श्रेष्ठ हल ढूॅंढने की वकालत की जार्ती हैं। 

सीमित सार्धनों, अकुशल श्रमिक, सीमित प्रशिक्षण तथार् स्थार्नीय बार्जार्रों में सीमित उत्पार्दों के होने की दशार् में कार्य क सरलीकरण आदर्श उपार्य होगार्। उपक्रमों जहॉं कुशल श्रम शक्ति की बहुलतार् हो, में कृत्य समृद्धि क होनार् आदर्श विविध होगी। इससे यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि एक दी हुर्इ स्थिति में परिस्थितियों के अनुसार्र प्रबंधकीय कार्य करनार् होतार् है। इस विचार्रधार्रार् में प्रबंधकों को सर्वप्रथम स्थिति क ज्ञार्न करनार् होतार् है। और उस स्थिति के अनुसार्र उत्पन्न समस्यार्ओं को हल करने की विधि ढूंढनी होती हैं संक्षेप में दो पहलुओं पर प्रार्संगिकतार् की विचार्रधार्रार् जोर देती है-  (क) यह प्रार्संगिक विशिष्ट कारकों पर अपनार् ध्यार्न केन्द्रित करतार् है।ये कारक एक प्रबंधक की समरनीति को दूसरे की तुलनार् में उपयुक्त बनार्ने में प्रभार्वित करती हैं।  (ख) प्रार्संगिक परिस्थितियों क विश्लेषण करने में प्रबंधकों के गुणों को विकसित करने के महत्व को यह और अधिक प्रकाश में लार्ती है। इस प्रकार के गुण प्रबंधकों को प्रबंधन करने की उनकी विचार्रधार्रार् को प्रभार्वित करने वार्ले कारकों को खोजने में सहार्यक होते है। 

इस प्रकार प्रार्संगिक विचार्रधार्रार् प्रबन्धकों की निदार्नार्त्मक और विश्लेषणार्त्मक परिवर्तनशीलतार् के प्रति सचेत, सार्वधार्न, एवं समार्योजन शील बने रहने क सुझार्व देती है। वह सुझार्व भी देती है कि उन्हें लक्ष्य, सार्धन यार् कार्य विधियों की किसी पूर्व धार्रणार् क शिकार नहीं होनार् चार्हिए तथार् हमेशार् परिस्थितियों के संदर्भ में वस्तुनिष्ठ निर्णय लेनार् चार्हिए। अत: यह कहार् जार् सकतार् है कि प्रार्संगिक विचार्रधार्रार् प्रणार्लीगत विचार्रधार्रार् से अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि यह उसके सब से बड़े दुर्गुण क समार्धार्न देती है। यह विचार्रधार्रार् अधिक व्यार्वहार्रिक एवं कार्य उन्मुख है। 

अत्यधिक सैद्धार्न्तिक जटिलतार् के कारण इस विचार्रधार्रार् की खूब आलोचनार्एं हुर्इ हैं। अनेक विद्वार्नों ने इसे प्रबन्धन की पृथक विचार्रधार्रार् मार्नने से भी इन्कार कियार् है। सभी प्रबन्धक विभिन्न परिस्थितियों के अनुरूप सिद्धार्न्तों क उपयोग सुव्यवस्थित रूप से नहीं कर पार्ते क्योंकि इनक ज्ञार्न, बुद्धिमतार्, अनुभव एवं कुशलतार् एक दूसरे से भिन्न होती है। कभी कभी परिस्थितियों की जटिलतार् व तीव्रतार् के कारण उनको समझनार् आसार्न नहीं होतार् है इसलिए इस विचार्रधार्रार् क कोर्इ अधिक महत्व नहीं रहार् पार्तार्। 

आधुनिक प्रबंध 

पार्रिवार्रिक प्रबन्ध से आरार्म ऐसी प्रबन्ध व्यवस्थार् से है जिसमें परिवार्र के सदस्यों द्वार्रार् प्रबन्धकीय कार्य सम्पन्न करार्ये जार्यें। जिस प्रकार किसी परिवार्र में पितार् की मृत्यु होने के बार्द उसक उत्तरार्धिकारी उसक पुत्र होतार् है। ठीक उसी प्रकार पार्रिवार्रिक प्रबन्ध व्यवसार्यी के प्रबन्ध प्रक्रियार् क उत्तरार्धिकार भी परिवार्र के सदस्यों को जार्तार् है।इस सम्बन्ध में ध्यार्न रखने योग्य बार्त यह है कि इस कार्य के लिए विशिष्ट योग्यतार् प्रार्प्त व्यक्तियों को कोर्इ प्रार्थमिकतार् नहीं दी जार्ती । इसी आधार्र पर पार्रिवार्रिक प्रबन्ध व्यवस्थार् को उत्तरार्धिकारी द्वार्रार् प्रबन्ध की संज्ञार् दी जार्ती है। भार्रत में प्रबन्ध अभिकर्तार् प्रणार्ली इस प्रकार की प्रबन्ध व्यवस्थार् क ज्वलन्त उदार्हरण है। इसके अतिरिक्त बड़े बड़े औद्योगिक घरार्नों जैसे – रिलार्यन्स, टार्टार्, बिड़लार् आदि परिवार्रों में इसी प्रकार की प्रबन्ध व्यवस्थार् अपनाइ गर्इ है। पार्रिवार्रिक प्रबन्ध व्यवस्थार् के अन्तर्गत अनेक दोषों क अनुभव कियार् गयार् है जैसे –

  1. औद्योगिक सत्तार् क उपकरण हो जार्नार्, 
  2. वित्तीय प्रभुत्व क विस्तार्र 
  3. स्वाथपूर्ण कुप्रबन्ध, 
  4. जनतार् के हितों क शोषण , 
  5. श्रमिकों क शोषण आदि।

इन दोषों के कारण ही भार्रत में 3 अप्रैल, 1970 से प्रबन्ध अभिकर्तार् प्रणार्ली को एक विशेष अधिनियम पार्रित करके पूर्ण रूप से समार्प्त कर दियार् गयार् थार्।

‘‘पेशेवर प्रबन्ध से तार्त्पर्य ऐसे प्रबन्ध से है जिसके अन्तर्गत प्रबन्ध कार्य प्रबन्ध ज्ञार्न में प्रशिक्षित व्यक्तियों से करार्यार् जार्तार् है। अर्थार्त पेशेवर प्रबन्ध कार्य प्रबन्ध ज्ञार्न में विशिष्ट ज्ञार्न प्रार्प्त व्यक्तियों को दी जार्ती है। वर्तमार्न प्रबन्ध व्यवस्थार् में पेशेवर प्रबन्ध क भी महत्व बढ़तार् जार् रहार् है। संयुक्त स्कन्ध कम्पनियों में नीति निर्मार्ण क कार्य संचार्लक मण्डल द्वार्रार् कियार् जार्तार् है और शेष कार्यों क प्रबन्ध संचार्लक यार् जनरल मैनेजर देखतार् है। 

विभिन्न विभार्गों के लिए पृथक पृथक प्रबन्धक होते हैं, जैसे – नियोजन विभार्ग के लिए नियोजन प्रबन्धक, उत्पार्दन विभार्ग के लिए उत्पार्दन प्रबन्धक, वित्त विभार्ग के लिए वित्तीय प्रबन्धक, विपणन विभार्ग के लिए विपणन प्रबन्धक होते हैं तथार् उनकी सहार्यतार् के लिए उप प्रबन्धक भी नियुक्त किये जार् सकते हैं। प्रबन्ध कार्य के लिए परार्मर्श हेतु विशेषज्ञों की भी नियुक्ति की जार् सकती है अथवार् प्रबन्ध सलार्हकार एजेन्सियों से परार्मर्श लियार् यजार् सकतार् है। इस प्रकार की प्रबन्ध व्यवसार्यी को ही पेशेवर प्रबन्धकाय व्यवस्थार् कहते हैं।’’ 

यह निर्विवार्द रूप से कहार् जार् सकतार् है कि पार्रिवार्रिक प्रबन्ध की अपेक्षार् पेशेवर प्रबन्ध अधिक सफल रहार् है क्योंकि पार्रिवार्रिक प्रबन्ध व्यवस्थार् के अन्तर्गत प्रबन्धकीय अधिकार विरार्सत में प्रार्प्त होते हैं और इसमें प्रबन्धकीय ज्ञार्न में विशिष्ट योग्यतार् पर कोर्इ ध्यार्न नहीं दियार् जार्तार् है जबकि पेशेवर प्रबन्ध व्यवस्थार् के अन्तर्गत प्रबन्धकीय ज्ञार्न में प्रशिक्षित व्यक्तियों को ही प्रबन्धकीय अधिकार दिये जार्ते हैं।

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